Adultery ☆ प्यार का सबूत ☆ (Completed) - Page 10 - SexBaba
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Adultery ☆ प्यार का सबूत ☆ (Completed)

अध्याय - 58

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अब तक....



शेरा को लगा काला नकाबपोश बेवजह ही सफ़ेदपोश का गुणगान कर रहा है इस लिए समय को बर्बाद न करते हुए उसने उसकी कनपटी के ख़ास हिस्से पर वार किया जिसका नतीजा ये हुआ कि काला नकाबपोश जल्द ही बेहोशी की गर्त में डूबता चला गया। उसके बाद शेरा ने उसे उठा कर कंधे पर लादा और एक तरफ को बढ़ता चला गया।



अब आगे....



रूपा अपने कमरे में पलंग पर लेटी गहरी सोच में डूबी हुई थी। बार बार उसके कानों में बाग़ में मौजूद उस पहले साए की बातें गूंज उठती थीं जिसकी वजह से वो गहन सोच के साथ साथ गहन चिंता में भी पड़ गई थी। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि जिस आवाज़ को उसने सुना था वो उसका कोई अपना था। वो अच्छी तरह जान गई थी कि वो आवाज़ किसकी थी लेकिन उसने जो कुछ कहा था उस पर उसे यकीन नहीं हो रहा था। उसे तो अब यही लगता था कि दादा ठाकुर से हमारे रिश्ते अच्छे हो गए हैं और इस वजह से वो वैभव के सपने फिर से देखने लगी थी। वो वैभव से बेहद प्रेम करती थी और इसका सबूत यही था कि उसने अपना सब कुछ वैभव को सौंप दिया था।

रूपा को पता चल गया था कि उसके प्रियतम वैभव की जान को ख़तरा है। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो अपने प्रियतम की जान को कैसे महफूज़ करे? उसका बस चलता तो वो इसी वक्त चंदनपुर जा कर वैभव को इस बारे में सब कुछ बता देती और उससे कहती कि वो अपनी सुरक्षा का हर तरह से ख़्याल करे। सहसा उसे वैभव की वो बातें याद आईं जो उसने पिछली मुलाक़ात में उससे मंदिर में कही थीं। उस वक्त रूपा को उसकी बातों पर ज़रा भी यकीन नहीं हुआ था और यही वजह थी कि उसने कभी ये जानने और समझने की कोशिश नहीं की थी कि उसके घर वाले संबंध सुधार लेने के बाद भी दादा ठाकुर और उनके परिवार के बारे में कैसे ख़्याल रखते हैं? आज जब उसने बाग़ में वो सब सुना तो जैसे उसके पैरों तले से ज़मीन ही खिसक गई थी। वो सोचने पर मजबूर हो गई कि क्या सच में उसके घर वाले कुत्ते की दुम ही हैं जो कभी सीधे नहीं हो सकते?

जब से दोनों खानदान के बीच संबंधों में सुधार हुआ था तब से वो वैभव के साथ अपने जीवन के हसीन सपने देखने लगी थी। वो जानती थी कि उसकी तरह वैभव के दिल में उसके प्रति प्रेम के जज़्बात नहीं हैं लेकिन वो ये भी जानती थी कि बाकी लड़कियों की तरह वैभव उसके बारे में नहीं सोचता। अगर वो उसे प्रेम नहीं करता है तो उसे बाकी लड़कियों की तरह अपनी हवस मिटाने का साधन भी नहीं समझता है। कहने का मतलब ये कि कहीं न कहीं वैभव के दिल में उसके प्रति एक सम्मान की भावना ज़रूर है।

अभी रूपा ये सब सोच ही रही थी कि सहसा उसे किसी के आने का आभास हुआ। वो फ़ौरन ही पलंग पर सीधा लेट गई और अपने चेहरे के भावों को छुपाने का प्रयास करने लगी। कुछ ही पलों में उसके कमरे में उसकी एकमात्र भाभी कुमुद दाखिल हुई। कुमुद उसके ताऊ मणि शंकर की बहू और चंद्रभान की बीवी थी।

"अब कैसी तबियत है मेरी प्यारी ननदरानी की?" कुमुद ने पलंग के किनारे बैठ कर उससे मुस्कुरा कर पूछा____"चूर्ण का कोई फ़ायदा हुआ कि नहीं?"

"अभी तो एक बार दिशा मैदान हो के आई हूं भौजी।" रूपा ने कहा____"देखती हूं अब क्या समझ में आता है।"

"फ़िक्र मत करो।" कुमुद ने रूपा के हाथ को अपने हाथ में ले कर कहा____"चूर्ण का ज़रूर फ़ायदा होगा और मुझे यकीन है अब तुम्हें शौच के लिए नहीं जाना पड़ेगा।"

"यही बेहतर होगा भौजी।" रूपा ने कहा____"वरना रात में आपको भी मेरे साथ तकलीफ़ उठानी पड़ जाएगी। अगर ऐसा हुआ तो आपका मज़ा भी ख़राब हो जाएगा।"

"कोई बात नहीं।" रूपा के कहने का मतलब समझते ही कुमुद ने गहरी मुस्कान के साथ कहा____"अपनी प्यारी ननदरानी के लिए आज के मज़े की कुर्बानी दे दूंगी मैं। तुम्हारे भैया कहीं भागे थोड़े न जा रहे हैं।"

कुमुद की बात सुन कर रूपा के होठों पर मुस्कान उभर आई। इस घर में कुमुद का सबसे ज़्यादा रूपा से ही गहरा दोस्ताना था। दोनों ननद भाभी कम और सहेलियां ज़्यादा थीं। अपनी हर बात एक दूसरे से साझा करतीं थीं दोनों। कुमुद को रूपा और वैभव के संबंधों का पहले शक हुआ था और फिर जब उसने ज़ोर दे कर रूपा से इस बारे में पूछा तो रूपा ने कबूल कर लिया था कि हां वो वैभव से प्रेम करती है और वो अपना सब कुछ वैभव को सौंप चुकी है। कुमुद को ये जान कर बेहद आश्चर्य हुआ था लेकिन वो उसके प्रेम भाव को भी बखूबी समझती थी। एक अच्छी सहेली की तरह वो उसे सलाह भी देती थी कि वैभव जैसे लड़के से प्रेम करना तो ठीक है लेकिन वो उस लड़के के सपने न देखे क्योंकि उसके घर वाले कभी भी उसका रिश्ता उस लड़के से नहीं करना चाहेंगे। दूर दूर तक के लोग जानते हैं कि दादा ठाकुर का छोटा बेटा कैसे चरित्र का लड़का है। कुमुद के समझाने पर रूपा को अक्सर थोड़ा तकलीफ़ होती थी। वो जानती थी कि कुमुद ग़लत नहीं कहती थी, वो खुद भी वैभव के चरित्र से परिचित थी लेकिन अब इसका क्या किया जाए कि इसके बावजूद वो वैभव से प्रेम करती थी और उसी के सपने देखने पर मजबूर थी।

"क्या हुआ?" रूपा को कहीं खोया हुआ देख कुमुद ने कहा____"क्या फिर से उस लड़के के ख़्यालों में खो गई?"

"मुझे आपसे एक सहायता चाहिए भौजी।" रूपा ने सहसा गंभीर भाव से कहा____"कृपया मना मत कीजिएगा।"

"बात क्या है रूपा?" कुमुद ने उसकी गंभीरता को भांपते हुए पूछा____"कोई परेशानी है क्या?"

"हां भौजी।" रूपा एकदम से उठ कर बैठ गई, फिर गंभीर भाव से बोली____"बहुत बड़ी परेशानी और चिंता की बात हो गई है। इसी लिए तो कह रही हूं कि मुझे आपसे एक सहायता चाहिए।"

"आख़िर बात क्या है?" कुमुद के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं____"ऐसी क्या बात हो गई है जिसकी वजह से तुम मुझसे सहायता मांग रही हो? मुझे सब कुछ बताओ रूपा। आख़िर ऐसा क्या हो गया है जिसके चलते अचानक से तुम इतना चिंतित हो गई हो?"

"पहले मेरी क़सम खाइए भौजी।" रूपा ने झट से कुमुद का हाथ पकड़ कर अपने सिर पर रख लिया, फिर बोली____"पहले मेरी क़सम खाइए कि मैं आपको जो कुछ भी बताऊंगी उसके बारे में आप इस घर में किसी को कुछ भी नहीं बताएंगी।"

"तुम मेरी ननद ही नहीं बल्कि सहेली भी हो रूपा।" कुमुद ने कहा____"तुम अच्छी तरह जानती हो कि हम कभी भी एक दूसरे के राज़ किसी से नहीं बताते। फिर क़सम देने की क्या ज़रूरत है तुम्हें? क्या तुम्हें अपनी भौजी पर यकीन नहीं है?"

"खुद से भी ज़्यादा यकीन है भौजी।" रूपा ने बेचैन भाव से कहा____"लेकिन फिर भी आप एक बार मेरी क़सम खा लीजिए। मेरी बात को अन्यथा मत लीजिए भौजी।"

"अच्छा ठीक है।" कुमुद ने कहा____"मैं अपनी सबसे प्यारी ननद और सबसे प्यारी सहेली की क़सम खा कर कहती हूं कि तुम मुझे जो कुछ भी बताओगी उसके बारे में मैं कभी भी किसी से ज़िक्र नहीं करूंगी। तुम्हारा हर राज़ मेरे सीने में मरते दम तक दफ़न रहेगा। अब बताओ कि आख़िर बात क्या है?"

"वैभव की जान को ख़तरा है भौजी।" रूपा ने दुखी भाव से कहा____"अभी कुछ देर पहले जब मैं दिशा मैदान के लिए गई थी तब मैंने बाग़ में कुछ लोगों से इस बारे में सुना था।"

"य...ये क्या कह रही हो तुम?" कुमुद ने हैरत से आंखें फैला कर कहा____"भला बाग़ में ऐसे वो कौन लोग थे जो वैभव के बारे में ऐसी बातें कर रहे थे?"

"आप सुनेंगी तो आपको यकीन नहीं होगा भौजी।" रूपा ने आहत भाव से कहा____"मुझे ख़ुद अभी तक यकीन नहीं हो रहा है।"

"पर वो लोग थे कौन रूपा?" कुमुद ने उलझनपूर्ण भाव से पूछा____"जिन्होंने वैभव के बारे में ऐसा कुछ कहा जिसे सुन कर तुम ये सब कह रही हो। मुझे पूरी बात बताओ।"

रूपा ने कुमुद को सब कुछ बता दिया। जिसे सुन कर कुमुद भी गहरे ख़्यालों में खोई हुई नज़र आने लगी। उधर सब कुछ बताने के बाद रूपा ने कहा_____"आपको पता है वैभव को ख़त्म करने के लिए कहने वाला कौन था? वो व्यक्ति कोई और नहीं आपके ही ससुर थे यानि मेरे ताऊ जी। मैंने अच्छी तरह उनकी आवाज़ को सुना था भौजी। वो ताऊ जी ही थे।"

कुमुद को रूपा के मुख से अपने ससुर के बारे में ये जान कर ज़बरदस्त झटका लगा। एकदम से उससे कुछ कहते न बन पड़ा था। चेहरे पर ऐसे भाव उभर आए थे जैसे वो इस बात को यकीन करने की कोशिश कर रही हो।

"बाकी दो लोग कौन थे मैं नहीं जानती भौजी।" कुमुद को गहरी सोच में डूबा देख रूपा ने कहा____"उन दोनों की आवाज़ मेरे लिए बिल्कुल ही अंजानी थी लेकिन ताऊ जी की आवाज़ को पहचानने में मुझसे कोई ग़लती नहीं हुई है।"

"ऐसा कैसे हो सकता है रूपा?" कुमुद ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"अब तो हवेली वालों से हमारे संबंध अच्छे हो गए हैं ना? ससुर जी ने तो खुद ही अच्छे संबंध बनाने की पहल की थी तो फिर वो खुद ही ऐसा कैसे कर सकते हैं?"

"यही तो समझ में नहीं आ रहा भौजी।" रूपा ने चिंतित भाव से कहा____"अगर ताऊ जी ने खुद पहल कर के हवेली वालों से अपने संबंध सुधारे थे तो अब वो ऐसा क्यों कर रहे हैं? इसका तो यही मतलब हो सकता है ना कि संबंध सुधारने का उन्होंने सिर्फ़ दिखावा किया था जबकि आज भी वो हवेली वालों को अपना दुश्मन समझते हैं। यही बात कुछ समय पहले वैभव ने भी मुझसे कही थी भौजी।"

"क्या मतलब?" कुमुद ने चौंकते हुए पूछा____"क्या कहा था वैभव ने?"

"उसे भी यही लगता है कि हमारे घर वालों ने उससे संबंध सुधार लेने का सिर्फ़ दिखावा किया है जबकि ऐसा करने के पीछे यकीनन हमारी कोई चाल है।" रूपा ने कहा____"वैभव ने मुझसे कहा भी था कि अगर वो ग़लत कह रहा है तो मैं खुद इस बारे में पता कर सकती हूं। उस दिन मुझे उसकी बातों पर यकीन नहीं हुआ था इस लिए मैंने कभी इसके बारे में पता लगाने का नहीं सोचा था लेकिन अभी शाम को जो कुछ मैंने सुना उससे मैं सोचने पर मजबूर हो गई हूं।"

"अगर सच यही है।" कुमुद ने गंभीरता से कहा____"तो यकीनन ये बहुत ही गंभीर बात है रूपा। मुझे समझ नहीं आ रहा कि ससुर जी ऐसा क्यों कर रहे हैं? आख़िर हवेली वालों से उनकी क्या दुश्मनी है जिसकी वजह से वो ऐसा कर रहे हैं? इस घर में मुझे आए हुए डेढ़ दो साल हो गए हैं लेकिन मैंने कभी किसी के मुख से दोनों खानदानों के बीच की दुश्मनी का असल कारण नहीं सुना। ये ज़रूर सुनती आई हूं कि तुम्हारे भाई लोगों का उस लड़के से कभी न कभी लड़ाई झगड़ा होता ही रहता है। जब संबंध अच्छे बने तो ससुर जी खुद ही उस लड़के को हमारे घर ले कर आए थे। मैंने सुना था कि वो घर बुला कर उस लड़के का सम्मान करना चाहते थे। उस दिन जब वैभव आया था तो मैंने देखा था कि वो सबसे कितने अच्छे तरीके से मिल रहा था और अपने से बड़ों के पैर छू कर आशीर्वाद ले रहा था। मेरी गुड़िया को तो वो अपने साथ हवेली ही ले गया था। अब सोचने वाली बात है कि अगर ससुर जी खुद उस लड़के को सम्मान देने के लिए यहां ले कर आए थे तो अब उसी लड़के को ख़त्म करने का कैसे सोच सकते हैं?"

"ज़ाहिर है वैभव को अपने घर ला कर उसे सम्मान देना महज दिखावा ही था।" रूपा ने कहा____"जबकि उनके मन में तो वैभव के प्रति नफ़रत की ही भावना थी। ये भी निश्चित ही समझिए कि अगर ताऊजी ऐसी मानसिकता रखते हैं तो ऐसी ही मानसिकता उनके सभी भाई भी रखते ही होंगे। भला वो अपने बड़े भाई साहब के खिलाफ़ कैसे जा सकते हैं? कहने का मतलब ये कि वो सब हवेली वालों से नफ़रत करते हैं और उन सबका एक ही मकसद होगा____'हवेली के हर सदस्य का खात्मा कर देना।"

रूपा की बातें सुन कर कुमुद हैरत से देखती रह गई उसे। उसके ज़हन में विचारों की आंधियां सी चलने लगीं थी। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि उसके घर वालों का सच ऐसा भी हो सकता है।

"मुझे आपकी सहायता चाहिए भौजी।" रूपा ने चिंतित भाव से कहा____"मुझे किसी भी तरह वैभव को इस संकट से बचाना है।"

"पर तुम कर भी क्या सकोगी रूपा?" कुमुद ने बेचैन भाव से कहा____"तुमने बताया कि वैभव अपनी भाभी को ले कर चंदनपुर गया हुआ है तो तुम भला कैसे उसे इस संकट से बचाओगी? क्या तुम रातों रात चंदनपुर जाने का सोच रही हो?"

"नहीं भौजी।" रूपा ने कहा____"चंदनपुर तो मैं किसी भी कीमत पर नहीं जा सकती क्योंकि ये मेरे लिए संभव ही नहीं हो सकेगा लेकिन हवेली तो जा ही सकती हूं।"

"ह...हवेली??" कुमुद ने हैरानी से रूपा को देखा।

"हां भौजी।" रूपा ने कहा____"आपकी सहायता से मैं हवेली ज़रूर जा सकती हूं और वहां पर दादा ठाकुर को इस बारे में सब कुछ बता सकती हूं। वो ज़रूर वैभव को इस संकट से बचाने के लिए कुछ न कुछ कर लेंगे।"

"बात तो तुम्हारी ठीक है।" कुमुद ने सोचने वाले भाव से कहा____"लेकिन तुम हवेली कैसे जा पाओगी? सबसे पहले तो तुम्हारा इस घर से बाहर निकलना ही मुश्किल है और अगर मान लो किसी तरह हवेली पहुंच भी गई तो वहां रात के इस वक्त कैसे हवेली में प्रवेश कर पाओगी?"

"मेरे पास एक उपाय है भौजी।" रूपा के चेहरे पर सहसा चमक उभर आई थी, बोली____"घर में सबको पता है कि मेरा पेट ख़राब है जिसके चलते मुझे बार बार दिशा मैदान के लिए जाना पड़ता है। तो उपाय ये है कि मैं आपके साथ दिशा मैदान जाने के लिए घर से बाहर जाऊंगी। उसके बाद बाहर से सीधा हवेली चली जाऊंगी। वैसे भी घर में कोई ये कल्पना ही नहीं कर सकता कि मैं ऐसे किसी काम के लिए सबकी चोरी से हवेली जा सकती हूं।"

"वाह! रूपा क्या मस्त उपाय खोजा है तुमने।" कुमुद के चेहरे पर खुशी की चमक उभर आई, अतः मुस्कुराते हुए बोली____"आज मैं पूरी तरह से मान गई कि तुम सच में वैभव से बेहद प्रेम करती हो वरना अपने ही परिवार के खिलाफ़ जा कर ऐसी बात हवेली में जा कर बताने का कभी न सोचती।"

"मुझे इस बात को बताने की कोई खुशी नहीं है भौजी।" रूपा ने उदास भाव से कहा____"क्योंकि हवेली में दादा ठाकुर को जब मेरे द्वारा इस बात का पता चलेगा तो ज़ाहिर है कि उसके बाद मेरे अपने घर वाले भी संकट में घिर जाएंगे। वैभव की जान बचाने के चक्कर में मैं अपनों को ही संकट में डाल दूंगी और ये बात सोच कर ही मुझे अपने आपसे घृणा हो रही है।"

"मैं मानती हूं कि ऐसा करने से तुम अपने ही घर वालों को संकट में डाल दोगी।" कुमुद ने कहा____"लेकिन इसका भी एक सटीक उपाय है मेरी प्यारी ननदरानी।"

"क्या सच में?" रूपा के मुरझाए चेहरे पर सहसा खुशी की चमक फिर से उभर आई____"क्या कोई ऐसा उपाय है जिससे मेरे ऐसा करने के बाद भी मेरे घर वालों पर कोई संकट न आए?"

"हां रूपा।" कुमुद ने कहा____"उपाय ये है कि तुम दादा ठाकुर से इस बारे में बताने से पहले ये आश्वासन ले लो कि वो हमारे घर वालों पर किसी भी तरह का कोई संकट नहीं आने देंगे। अगर वो आश्वासन दे देते हैं तो ज़ाहिर है कि तुम्हारे द्वारा ये सब बताने पर भी वो हमारे घर वालों के लिए ख़तरा नहीं बनेंगे।"

"और अगर वो न माने तो?" रूपा ने संदिग्ध भाव से पूछा____"अगर वो गुस्से में आ कर सच में हमारे घर वालों के लिए ख़तरा बन गए तो?"

"नहीं, ऐसा नहीं होगा।" कुमुद ने मानों पूरे विश्वास के साथ कहा____"डेढ़ दो सालों में इतना तो मैं भी जान गई हूं कि दादा ठाकुर किस तरह के इंसान हैं। मुझे यकीन है कि जब तुम सब कुछ बताने के बाद हमारे परिवार पर संकट न आने के लिए उनसे कहोगी तो वो तुम्हें निराश नहीं करेंगे। आख़िर वो ये कैसे भूल जाएंगे कि तुमने अपने परिवार के खिलाफ़ जा कर उनके बेटे के जीवन को बचाने का प्रयास किया है? मुझे पूरा यकीन है रूपा कि वो हमारे लिए कोई भी ख़तरा नहीं बनेंगे।"

"अगर आपको उन पर यकीन है।" रूपा ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"तो फिर हम दोनों दिशा मैदान के लिए चलते हैं। अब एक पल का भी देर करना ठीक नहीं है।"

"रुको, एक उपाय और है रूपा।" कुमुद ने कुछ सोचते हुए कहा____"एक ऐसा उपाय जिससे किसी बात की चिंता करने की ज़रूरत ही नहीं रहेगी।"

"क्या मतलब??" रूपा के माथे पर उलझन के भाव उभर____"भला इस तरह का क्या उपाय हो सकता है भौजी?"

"बड़ा सीधा सा उपाय है मेरी प्यारी लाडो।" कुमुद ने मुस्कुराते हुए कहा____"और वो ये कि हम दादा ठाकुर को ये नहीं बताएंगे कि वैभव को ख़त्म करने के लिए किसने कहा है। कहने का मतलब ये कि तुम उनसे सिर्फ यही बताना कि तुमने हमारे बाग में कुछ लोगों को ऐसी बातें करते सुना था जिसमें वो लोग चंदनपुर जा कर वैभव को जान से मारने को कह रहे थे। दादा ठाकुर अगर ये पूछेंगे कि तुम उस वक्त बाग में क्या कर रही थी तो बोल देना कि तुम्हारा पेट ख़राब था इस लिए तुम वहां पर दिशा मैदान के लिए गई थी और उसी समय तुमने ये सब सुना था।"

"ये उपाय तो सच में कमाल का है भौजी।" रूपा के चेहरे पर खुशी के भाव उभर आए____"यानि मुझे ताऊ जी के बारे में दादा ठाकुर से बताने की ज़रूरत ही नहीं है और जब ताऊ जी का ज़िक्र ही नहीं होगा तो दादा ठाकुर से हमारे परिवार को कोई ख़तरा भी नहीं होगा। वाह! भौजी क्या उपाय बताया है आपने।"

"ऐसा करने से एक तरह से हम अपने परिवार वालों के साथ गद्दारी भी नहीं करेंगे रूपा।" कुमुद ने कहा____"और उन्हें दादा ठाकुर के क़हर से भी बचा लेंगे। वैभव से तुम प्रेम करती हो तो उसके लिए ऐसा कर के तुम उसके प्रति अपनी वफ़ा भी साबित कर लोगी। इससे कम से कम तुम्हारे दिलो दिमाग़ में कोई अपराध बोझ तो नहीं रहेगा।"

"सही कहा भौजी।" रूपा एकदम कुमुद के लिपट कर बोली____"आप ने सच में मुझे एक बड़े धर्म संकट से बचा लिया है। आप मेरी सबसे अच्छी भौजी हैं।"

"सिर्फ़ भौजी नहीं मेरी प्यारी ननदरानी।" कुमुद ने प्यार से रूपा की पीठ को सहलाते हुए कहा___"बल्कि तुम्हारी सहेली भी। तुम्हें मैं ननद से ज़्यादा अपनी सहेली मानती हूं।"

"हां मेरी प्यारी सहेली।" रूपा ने हल्के से हंसते हुए कहा____"अब चलिए, हमें जल्द से जल्द ये काम करना है। देर करना ठीक नहीं है।"

रूपा की बात सुन कर कुमुद मुस्कुराई और फिर रूपा के दाएं गाल को प्यार से सहला कर पलंग से उठ गई। उसके बाद उसने रूपा को चलने का इशारा किया और खुद कमरे से बाहर निकल गई। रूपा को ऐसा महसूस हुआ जैसे उसके दिलो दिमाग़ में जो अब तक भारी बोझ पड़ा हुआ था वो पलक झपकते ही गायब हो गया है। हवेली जाने के ख़्याल ने उसे एकदम से रोमांचित सा कर दिया था। आज पहली बार वो हवेली जाने वाली थी और पहली बार वो कोई ऐसा काम करने वाली थी जिसके बारे में उसके घर वाले कल्पना भी नहीं कर सकते थे।



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"क्या बात है?" बैठक में बैठे दादा ठाकुर ने हैरानी भरे भाव से अभिनव को देखते हुए कहा____"उनसे कुछ पता चला है क्या?"

"अभी तो कुछ पता नहीं चला है पिता जी।" अभिनव ने कहा____"हमारे आदमी वैभव के दोनों दोस्तों और जगन पर बराबर नज़र रखे हुए हैं। अभी मैं उनसे ही मिल कर आ रहा हूं। हमारे आदमियों के अनुसार वो तीनों सामान्य दिनों की तरह ही अपने अपने काम में लगे हुए थे। सुबह से अब तक वो लोग अपने अपने घरों से बाहर तो गए थे लेकिन किसी ऐसे आदमी से नहीं मिले जिसे सफ़ेदपोश अथवा काला नकाबपोश कहा जा सके। वैसे भी सफ़ेदपोश और काला नकाबपोश उन लोगों से रात के अंधेरे में ही मिलता है। दिन में शायद इस लिए नहीं मिलता होगा क्योंकि इससे उनका भेद खुल जाने का ख़तरा रहता होगा।"

"मेरा खयाल तो ये है भैया कि हम सीधे उन तीनों को पकड़ लेते हैं।" जगताप ने कहा____"माना कि वो लोग सफ़ेदपोश अथवा काले नकाबपोश के बारे में कुछ न बता पाएंगे लेकिन इतना तो ज़रूर बता सकते हैं कि उन लोगों ने आख़िर किस वजह से हमारे खिलाफ़ जा कर सफ़ेदपोश से मिल गए और उसके इशारे पर चलने लगे?"

"जगन का तो समझ में आता है चाचा जी कि उसने अपने बड़े भाई की ज़मीन हड़पने के लिए ये सब किया होगा।" अभिनव ने कहा____"लेकिन सुनील और चेतन किस वजह से उस सफेदपोश के सुर में चलने लगे ये सोचने वाली बात है। संभव है कि इसके पीछे उनकी कोई मजबूरी रही होगी लेकिन ये पता करना ज़रूरी है कि दोनों ने सफ़ेदपोश के कहने पर क्या किया है? रही बात उन लोगों को सीधे पकड़ लेने की तो ऐसा करना ख़तरनाक भी हो सकता है क्योंकि अगर वो लोग किसी मजबूरी में सफ़ेदपोश का साथ दे रहे हैं तो ज़ाहिर है कि हमारे द्वारा उन्हें पकड़ लेने से उनकी या उनके परिवार वालों की जान को ख़तरा हो जाएगा।"

"हम अभिनव की बातों से सहमत हैं जगताप।" दादा ठाकुर ने कहा____"हम किसी भी मामले को जानने के लिए किसी निर्दोष की जान को ख़तरे में नहीं डाल सकते। बेशक हमारा उनसे बहुत कुछ जानना ज़रूरी है लेकिन इस तरीके से नहीं कि हमारी किसी ग़लती की वजह से उन पर या उनके परिवार पर संकट आ जाए। जहां अब तक हमने इंतज़ार किया है वहीं थोड़ा इंतज़ार और सही।"

दादा ठाकुर की बात सुन कर जगताप अभी कुछ बोलने ही वाला था कि तभी एक दरबान अंदर आया और उसने दादा ठाकुर से कहा कि एक आदमी आया है और उनसे शीघ्र मिलना चाहता है। दरबान की बात सुन कर दादा ठाकुर ने कुछ पल सोचा और फिर दरबान से कहा ठीक है उसे अंदर भेज दो। दरबान के जाने के कुछ ही देर बाद जो शख़्स बैठक में आया। उसे देख दादा ठाकुर हल्के से चौंके। आने वाला शख़्स कोई और नहीं बल्कि शेरा था। दादा ठाकुर को समझते देर न लगी कि शेरा को उन्होंने जो काम दिया था उसमें वो कामयाब हो कर ही लौटा है। अगर वो कामयाब न हुआ होता तो वो अपनी शक्ल न दिखाता। दादा ठाकुर इस बात से अंदर ही अंदर खुश हो गए और साथ ही उनकी धड़कनें भी थोड़ा तेज़ हो गईं।

"प्रणाम मालिक।" शेरा ने हाथ जोड़ कर दादा ठाकुर को प्रणाम किया और फिर जगताप को भी।

"क्या बात है?" दादा ठाकुर ने शेरा की तरफ देखते हुए कहा____"इस वक्त तुम यहां? सब ठीक तो है न?"

"जी मालिक सब ठीक है।" शेरा ने अदब से कहा____"आपको एक ख़बर देने आया हूं। अगर आप मुनासिब समझें तो अर्ज़ करूं?"

"ज़रूरत नहीं है।" दादा ठाकुर कहने के साथ ही एक झटके में अपने सिंहासन से उठे, फिर बोले____"हम जानते हैं तुम क्या कहना चाहते हो। बस ये बताओ कहां हैं वो?"

शेरा ने जवाब देने से पहले बैठक में बैठे अभिनव और जगताप को देखा और फिर कहा____"माफ़ कीजिए मालिक लेकिन एक ही हाथ लगा है। मैं उसे अपने साथ ही ले कर आया हूं।"

शेरा की बात सुन कर दादा ठाकुर मन ही मन थोड़ा चौंके और फिर पलट कर बारी बारी से अपने बेटे अभिनव और छोटे भाई जगताप को देखा। उसके बाद कुछ सोचते हुए उन्होंने जगताप से कहा____"एक अच्छी ख़बर है जगताप।"

"कैसी ख़बर भैया?" जगताप ने उलझन भरे भाव से कहा____"और ये शेरा किसके हाथ लगने की बात कर रहा है?"

"हमने शेरा को एक बेहद ही महत्वपूर्ण काम सौंपा था" दादा ठाकुर ने कहा____"हमें ये तो उम्मीद थी कि ये हमारे द्वारा दिए गए काम को यकीनन सफलतापूर्वक अंजाम देगा लेकिन ये उम्मीद नहीं थी कि ये इतना जल्दी अपना काम कर लेगा। ख़ैर बात ये है कि शेरा के हाथ सफ़ेदपोश अथवा काले नकाबपोश में से कोई एक लग गया है और ये उसे अपने साथ ही ले कर आया है।"

"क...क्या??" जगताप से पहले अभिनव आश्चर्य से बोल पड़ा____"मेरा मतलब है कि क्या आप सच कह रहे हैं पिता जी?"

"बिलकुल।" दादा ठाकुर ने ख़ास भाव से कहा____"शेरा ने उनमें से किसी एक को पकड़ लिया है और उसे अपने साथ यहां ले आया है।" कहने के साथ ही दादा ठाकुर शेरा से मुखातिब हुए____"तुमने बहुत अच्छा काम किया है शेरा। तुम हमारी उम्मीद पर बिलकुल खरे उतरे। ख़ैर ये बताओ कि उनमें से कौन तुम्हारे हाथ लगा है?"

"मैं तो सफ़ेदपोश को ही पकड़ने के लिए उसके पीछे गया था मालिक।" शेरा ने कहा___"लेकिन बाग़ में अचानक से वो गायब हो गया। मैंने उसे बहुत खोजा लेकिन उसका कहीं पता नहीं चल सका। उसके बाद मैं काले नकाबपोश को खोजने लगा और आख़िर वो मुझे मिल ही गया। उसको अपने कब्जे में लेने के लिए मुझे उसके साथ काफी ज़ोरदार मुकाबला करना पड़ा जिसका नतीजा ये निकला कि आख़िर में मैंने उसे अपने कब्जे में ले ही लिया।"

"ये तो सच में बड़े आश्चर्य और कमाल की बात हुई भैया।" जगताप ने खुशी से कहा____"शेरा के हाथ उस सफ़ेदपोश का खास आदमी लग गया है। अब हम उसके द्वारा पलक झपकते ही सफ़ेदपोश तक पहुंच सकते हैं। उसके बाद हमें ये जानने में देर नहीं लगेगी कि हमारे साथ इस तरह का खेल खेलने वाला वो सफ़ेदपोश कौन है? बस एक बार वो मेरे हाथ लग जाए उसके बाद तो मैं उसकी वो हालत करूंगा कि दुबारा जन्म लेने से भी इंकार करेगा।"

"बेशक ऐसा ही होगा जगताप।" दादा ठाकुर ने कहा____"लेकिन तब तक हमें पूरे होशो हवास में रहना होगा। ख़ैर तुम शेरा के साथ जाओ और उस काले नकाबपोश को हवेली के किसी कमरे में बंद कर दो। हम सुबह उससे पूछताछ करेंगे।"

"सुबह क्यों भैया?" जगताप ने कहा____"हमें तो अभी उससे पूछताछ करनी चाहिए। उससे सफ़ेदपोश के बारे में सब कुछ जान कर जल्द से जल्द उस सफ़ेदपोश को खोजना चाहिए।"

"इतना बेसब्र मत हो जगताप।" दादा ठाकुर ने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा____"धीरज से काम लो। हम जानते हैं कि तुम जल्द से जल्द हमारे दुश्मन को खोज कर उसको नेस्तनाबूत कर देना चाहते हो लेकिन इतना बेसब्र होना ठीक नहीं है। अब तो वो काला नकाबपोश हमारे हाथ लग ही गया है इस लिए सुबह हम सब उससे तसल्ली से पूछताछ करेंगे।"

"ठीक है भैया।" जगताप ने कहा____"जैसा आपको ठीक लगे।"

"हम तुम्हारे इस काम से बेहद खुश हैं शेरा।" दादा ठाकुर ने शेरा से कहा____"इसका इनाम ज़रूर मिलेगा तुम्हें?"

"माफ़ कीजिए मालिक।" शेरा ने हाथ जोड़ कर कहा____"आपके द्वारा इनाम लेने में मुझे तभी खुशी होगी जब उस सफ़ेदपोश को भी पकड़ कर आपके सामने ले आऊंगा।"

शेरा की बात सुन कर दादा ठाकुर मुस्कुराए और आगे बढ़ कर शेरा के बाएं कंधे पर अपना हाथ रख कर हल्के से दबाया। उसके बाद उन्होंने जगताप को शेरा के साथ जाने को कहा। जगताप और शेरा बैठक से बाहर आए। हवेली के एक तरफ दीवार के सहारे और दो दरबानों की निगरानी में काला नकाबपोश बेहोश पड़ा हुआ था। जगताप के कहने पर शेरा ने उसे उठा कर कंधे पर लाद लिया और फिर वो जगताप के पीछे पीछे हवेली के उत्तर दिशा की तरफ बढ़ता चला गया। जल्दी ही वो हवेली के एक तरफ बने एक सीलनयुक्त कमरे में पहुंच गया।

जगताप के कहने पर शेरा ने उस काले नकाबपोश को उस खाली कमरे में एक तरफ डाल दिया। काले नकाबपोश के चेहरे पर अभी भी काला नक़ाब था जिसे जगताप ने एक झटके से उतार दिया। कमरे में एक तरफ लालटेन का प्रकाश था इस लिए उस प्रकाश में जगताप ने उस आदमी को देखा। काला नकाबपोश उसे इस गांव का नहीं लग रहा था। जगताप की नज़र उसके एक हाथ पर पड़ी जो टूटा हुआ था। उसने पलट कर शेरा की तरफ देखा तो शेरा ने बताया कि मुकाबले में उसी ने उसका हाथ तोड़ा है, तभी तो वो उसके हाथ लगा था। ख़ैर, जगताप और शेरा कमरे से बाहर आ गए। जगताप के कहने पर एक दरबान ने उस कमरे के दरवाज़े की कुंडी बंद कर उसमें ताला लगा दिया।



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अध्याय - 59

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अब तक....

जगताप के कहने पर शेरा ने उस काले नकाबपोश को उस खाली कमरे में एक तरफ डाल दिया। काले नकाबपोश के चेहरे पर अभी भी काला नक़ाब था जिसे जगताप ने एक झटके से उतार दिया। कमरे में एक तरफ लालटेन का प्रकाश था इस लिए उस प्रकाश में जगताप ने उस आदमी को देखा। काला नकाबपोश उसे इस गांव का नहीं लग रहा था। जगताप की नज़र उसके एक हाथ पर पड़ी जो टूटा हुआ था। उसने पलट कर शेरा की तरफ देखा तो शेरा ने बताया कि मुकाबले में उसी ने उसका हाथ तोड़ा है, तभी तो वो उसके हाथ लगा था। ख़ैर, जगताप और शेरा कमरे से बाहर आ गए। जगताप के कहने पर एक दरबान ने उस कमरे के दरवाज़े की कुंडी बंद कर उसमें ताला लगा दिया।

अब आगे....

उस वक्त शाम के क़रीब नौ बजने वाले थे। रूपा अपनी भाभी कुमुद के साथ अपने घर से दिशा मैदान जाने के लिए निकली थी। यूं तो आसमान में आधे से कम चांद था जिसकी वजह से हल्की रोशनी थी किंतु आसमान में काले बादलों ने डेरा जमाना शुरू कर दिया था। ऐसा लगता था जैसे रात के किसी प्रहर बारिश हो सकती थी। काले बादलों ने उस आधे से कम चांद को ढंक रखा था जिसकी वजह से उसकी रोशनी धरती पर नहीं पहुंच पा रही थी। रूपा और कुमुद पर मानों काले बादलों ने मेहरबानी कर रखी थी। घर के पीछे आने के बाद वो दोनों लंबा चक्कर लगाते हुए सीधा हवेली पहुंच गईं थी। कुमुद ने साड़ी से घूंघट किया हुआ था और रूपा ने अपने दुपट्टे को मुंह में लपेट लिया था ताकि रास्ते में अगर कोई मिले भी तो वो उन दोनों को पहचान न सके। दोनों ने अपने अपने लोटे को घर के पीछे ही एक जगह छिपा दिया था।

ननद भौजाई दोनों ही पहली बार हवेली आईं थी। दादा ठाकुर की हवेली के बारे में सुना बहुत था दोनों ने लेकिन कभी यहां आने का कोई अवसर नहीं मिला था। दोनों की धड़कनें बढ़ी हुईं थी। कुमुद कई बार रूपा को बोल चुकी थी कि कहीं हम किसी के द्वारा पकड़े न जाएं इस लिए वापस घर लौट चलते हैं लेकिन रूपा ने तो जैसे ठान लिया था कि अब तो वो हवेली जा कर दादा ठाकुर को सब कुछ बता कर ही रहेगी।

हवेली के हाथी दरवाज़े के पास पहुंच कर दोनों ही रुक गईं। हल्के अंधेरे में उन्हें हाथी दरवाज़े के पार दूर हवेली बनी हुई नज़र आई जो अंधेरे में बड़ी ही अजीब और भयावह सी नज़र आ रही थी। कुछ देर तक दोनों इधर उधर देखती रहीं उसके बाद आगे बढ़ चलीं। दोनों की धड़कनें पहले से और भी ज़्यादा तेज़ हो गईं। अभी दोनों ने हाथी दरवाज़े को पार ही किया था कि सहसा एक तेज़ मर्दाना आवाज़ को सुन कर दोनों के होश उड़ गए। घबराहट के मारे पलक झपकते ही दोनों का बुरा हाल हो गया।

"कौन हो तुम दोनों?" सहसा एक आदमी अंधेरे में दोनों के सामने किसी जिन्न की तरह नमूदार हो कर कड़क आवाज़ में बोला____"और इस वक्त कहां जा रही हो?"

"ज...जी वो हमें दादा ठाकुर से मिलना है।" कुमुद से पहले रूपा ने हिम्मत जुटा कर धीमें स्वर में कहा।

"दादा ठाकुर से??" वो आदमी जोकि हवेली का दरबान था चौंकते हुए दोनों को देखा____"तुम दोनों को भला उनसे क्या काम है?"

"देखिए हमारा उनसे मिलना बहुत ही ज़रूरी है।" रूपा ने अपनी बढ़ी हुई धड़कनों को काबू करते हुए कहा____"आप कृपया हमें दादा ठाकुर के पास पहुंचा दीजिए।"

"अरे! ऐसे कैसे भला?" दरबान ने हाथ झटकते हुए संदिग्ध भाव से कहा____"पहले तुम दोनों ये बताओ कि कौन हो और रात के इस वक्त अंधेरे में कहां से आई हो?"

"देखिए आप समझ नहीं रहे हैं।" कुमुद ने सहसा आगे बढ़ कर कहा____"आपके लिए ये जानना ज़रूरी नहीं है कि हम कौंन है और कहां से आए हैं, बल्कि ज़रूरी ये है कि आप हमें जल्द से जल्द दादा ठाकुर के पास पहुंचा दीजिए।"

"आप हमें ग़लत मत समझिए।" रूपा ने कहा____"असल में बात कुछ ऐसी है कि हम सिर्फ़ दादा ठाकुर को ही बता सकते हैं। कृपा कर के आप या तो हमें दादा ठाकुर के पास पहुंचा दीजिए या फिर आप ख़ुद ही जा कर दादा ठाकुर को बता दीजिए कि कोई उनसे मिलने आया है।"

दरबान दोनों की बात सुन कर सोच में पड़ गया। रात के इस वक्त दो औरतों का हवेली में आना उसके लिए हैरानी की बात थी किंतु आज कल जो हालात थे उसका उसे भी थोड़ा बहुत पता था इस लिए उसने सोचा कि एक बार दादा ठाकुर को इस बारे में सूचित ज़रूर करना चाहिए।

"ठीक है।" फिर उसने थोड़ा नम्र भाव से कहा___"तुम दोनों यहीं रुको। मैं दादा ठाकुर को तुम दोनों के बारे में सूचित करता हूं। अगर उन्होंने तुम दोनों को बुलाया तो मैं तुम दोनों को अंदर उनके पास ले चलूंगा।"

दरबान की बात सुन कर दोनों ने हां में सिर हिलाया। उसके बाद दरबान दोनों को यहीं रुकने का बोल कर तेज़ कदमों के साथ हवेली की तरफ बढ़ता चला गया। इधर कुमुद और रूपा अंधेरे में इधर उधर देखने लगीं थी। उन्हें डर भी लग रहा था कि कहीं कोई गड़बड़ न हो जाए अथवा वो दोनों किसी ऐसे आदमी के द्वारा न पकड़ी जाएं जो उन्हें पहचानता हो। दूसरा डर इस बात का भी था कि अगर दोनों को घर लौटने में ज़्यादा देर हो गई तो वो दोनों घर वालों को क्या जवाब देंगी?

ख़ैर कुछ ही देर में दरबान लगभग दौड़ता हुआ आया और हांफते हुए दोनों से अंदर चलने को कहा। दरबान के द्वारा अंदर चलने की बात सुन कर दोनों ने राहत की लंबी सांस ली और फिर दरबान के पीछे पीछे हवेली की तरफ बढ़ चलीं। कुछ ही समय में दोनों उस दरबान के साथ हवेली के अंदर बैठक में पहुंच गईं। दोनों के दिल बुरी तरह धड़क रहे थे। दरबान उन दोनों को बैठक में छोड़ कर बाहर चला गया था। बैठक में इस वक्त कोई नहीं था। दोनों अपनी घबराहट को काबू करने का प्रयास करते हुए बैठक की दीवारों को देखने लगीं थी। तभी सहसा किसी के आने की आहट से दोनों चौंकीं और फ़ौरन ही पलट कर पीछे देखा। नज़र एक ऐसी शख्सियत पर पड़ी जिनके लंबे चौड़े और हट्टे कट्टे बदन पर सफ़ेद कुर्ता पजामा था। कुर्ते के ऊपर उन्होंने एक साल ओढ़ रखा था। चेहरे पर रौब और तेज़ का मिला जुला संगम था। बड़ी बड़ी मूंछें और क़रीब तीन अंगुल की दाढ़ी जिनके बाल आधे से थोड़ा कम सफ़ेद नज़र आ रहे थे।

"कौन हैं आप दोनों?" दादा ठाकुर ने अपने सिंहासन पर बैठने के बाद बड़े नम्र भाव से दोनों की तरफ देखते हुए पूछा____"और रात के इस वक्त हमसे क्यों मिलना चाहती थीं?"

दादा ठाकुर की आवाज़ से दोनों को होश आया तो दोनों हड़बड़ा गईं और फिर खुद को सम्हाले हुए आगे बढ़ कर एक एक कर के दोनों ने झुक कर दादा ठाकुर के पांव छुए। दादा ठाकुर दोनों को ये करते देख हल्के से चौंके किन्तु फिर सामान्य भाव से दोनों को आशीर्वाद दिया। कुमुद ने तो उनके सामने घूंघट कर रखा था लेकिन रूपा ने अपने चेहरे से दुपट्टा हटा लिया।

"मैं रूपा हूं दादा ठाकुर।" रूपा ने अपनी घबराहट को काबू करते हुए कहा____"मेरे पिता जी का नाम हरि शंकर है और ये मेरी भाभी कुमुद हैं।"

"हरि शंकर??" दादा ठाकुर एकदम से चौंके, फिर हैरानी से बोले___"अच्छा अच्छा, तुम साहूकार हरि शंकर की बेटी हो? हमें लग ही रहा था कि कहीं तो तुम्हें देखा है। ख़ैर, ये बताओ बेटी कि रात के इस वक्त इस तरह से यहां आने का क्या कारण है? अगर कोई बात थी तो सुबह दिन के उजाले में भी तुम आ सकती थी यहां।"

"सुबह दिन के उजाले में आती तो शायद देर हो जाती दादा ठाकुर।" रूपा ने बेचैन भाव से कहा____"इस लिए रात के इस वक्त यहां आना पड़ा हम दोनों को।"

"हम कुछ समझे नहीं बेटी।" दादा ठाकुर के चेहरे पर उलझन के भाव उभर आए थे, बोले____"आख़िर ऐसी क्या बात थी जिसके लिए तुम दोनों को रात के इस वक्त यहां आना पड़ा। एक बात और, तुम हमें दादा ठाकुर नहीं बल्कि ताऊ जी कह सकती हो। हम दादा ठाकुर दूसरों के लिए हैं, जबकि तुम तो हमारे घर परिवार जैसी ही हो। ख़ैर, अब बताओ बात क्या है?"

"वो बात ये है ताऊ जी कि आपके छोटे बेटे की जान को ख़तरा है।" रूपा ने अपनी बढ़ी हुई धड़कनों को बड़ी मुश्किल से सम्हालते हुए कहा____"अगर हम सुबह आते तो बहुत देर हो जाती इस लिए हम आपको इस बारे में बताने के लिए फ़ौरन यहां चले आए।"

"हमारे बेटे की जान को ख़तरा है?" दादा ठाकुर बुरी तरह चौंके____"ये क्या कह रही हो बेटी?"

"मैं सच कह रही हूं ताऊ जी।" रूपा ने कहा।

"पर तुम्हें कैसे पता कि हमारे बेटे की जान को ख़तरा है?" दादा ठाकुर बुरी तरह हैरान थे कि रूपा जैसी लड़की को इतनी बड़ी बात कैसे पता चली? उसी हैरानी से उसकी तरफ देखते हुए बोले____"हम तुमसे जानना चाहते हैं बेटी कि इतनी बड़ी बात तुम्हें कहां से और कैसे पता चली?"

रूपा ने एक बार कुमुद की तरफ देखा और फिर गहरी सांस ले कर सब कुछ दादा ठाकुर को बताना शुरू कर दिया। उसने ये नहीं बताया कि वैभव को ख़त्म करने के लिए कहने वाला खुद उसका ताऊ मणि शंकर था। सारी बातें सुनने के बाद दादा ठाकुर गहरी सोच में डूब गए। सबसे ज़्यादा उन्हें ये सोच कर हैरानी हो रही थी कि इतनी बड़ी बात को बताने के लिए साहूकार हरि शंकर की बेटी अपनी भाभी के साथ रात के वक्त हवेली आ गई थी।

"इतनी बड़ी बात बता कर तुमने हम पर बहुत बड़ा उपकार किया है बेटी।" दादा ठाकुर ने गंभीर भाव से कहा____"तुम्हारे इस उपकार का बदला हम अपनी जान दे कर भी नहीं चुका सकते। बस यही दुआ करते हैं कि ऊपर वाला तुम्हें हमेशा खुश रखे लेकिन बेटी इसके लिए तुम दोनों को खुद रात के इस वक्त यहां आने की क्या ज़रूरत थी? हमारा मतलब है कि ये बात तुम अपने पिता जी अथवा ताऊ जी को बताती। वो खुद हमारे पास आ कर हमसे ये सब बता सकते थे। इसके लिए तुम्हें खुद इतनी तकलीफ़ उठाने की क्या ज़रूरत थी?"

"मैंने उस वक्त जब ये सब सुना था तो मुझे समझ ही नहीं आया था कि क्या करूं?" दादा ठाकुर की बात सुन कर रूपा अंदर ही अंदर बुरी तरह घबरा गई थी, किंतु फिर जल्दी ही खुद को सम्हाले हुए बोली____"मेरे साथ कुमुद भाभी भी थीं तो मैंने इन्हें बताया। हम दोनों ने निश्चय किया कि जितना समय हमें अपने घर वालों को ये सब बताने में लगेगा उतने में तो हम खुद ही यहां आ कर आपको सब कुछ बता सकते हैं।"

"ख़ैर जो भी किया तुम दोनों ने बहुत ही अच्छा किया है।" दादा ठाकुर ने कहा____"और इसके लिए हम तुम दोनों से बेहद प्रसन्न हैं। हम अपने बेटे की जान को बचाने के लिए जल्द ही कुछ न कुछ करेंगे। ये सब होने के बाद हम तुम्हारे पिता और ताऊ से भी मिलेंगे और उन्हें खुशी खुशी बताएंगे कि उनकी बहू और बेटी ने हम पर कितना बड़ा उपकार किया है।"

"नहीं नहीं ताऊ जी।" रूपा बुरी तरह घबरा गई, फिर खुद को सम्हाले हुए बोली____"आप ये सब बातें हमारे पिता जी को या ताऊ जी को बिलकुल भी मत बताइएगा।"

"अरे! ये कैसी बात कर रही हो बेटी?" दादा ठाकुर ने हैरानी से कहा____"तुम दोनों ने हम पर इतना बड़ा उपकार किया है और हम तुम्हारे इतने बड़े उपकार को तुम्हारे ही घर वालों को न बताएं ये तो बिल्कुल भी उचित नहीं है। आख़िर तुम्हारे पिता और ताऊ जी को भी तो पता चलना चाहिए कि उनकी तरह उनकी बहू बेटी भी हमारे प्रति वफ़ादार हैं और हमारे अच्छे के लिए सोचती हैं। तुम चिंता मत करो बेटी, देखना ये सब जान कर तुम्हारे घर वाले भी बहुत प्रसन्न हो जाएंगे।"

"नहीं ताऊ जी।" रूपा का मारे घबराहट के बुरा हाल हो गया था, किसी तरह बोली____"मैं आपसे विनती करती हूं कि आप इस बारे में मेरे घर वालों में से किसी को भी कुछ मत बताइएगा। मेरे घर वाले बहुत ज़्यादा पुराने विचारों वाले हैं। अगर उन्हें पता चला कि उनके घर की बेटी और बहू रात के वक्त उनकी गैर जानकारी में हवेली गईं थी तो वो हम पर बहुत ही ज़्यादा नाराज़ हो जाएंगे।"

"ऐसा कुछ भी नहीं होगा बेटी।" दादा ठाकुर ने मानो उसे आश्वासन दिया____"तुम दोनों को इस बारे में फ़िक्र करने की कोई ज़रूरत नहीं है। हम उन्हें समझाएंगे कि तुम दोनों ने रात के वक्त हवेली में आ कर कोई अपराध नहीं किया है बल्कि हवेली में रहने वाले दादा ठाकुर पर उपकार किया है। हमें यकीन है कि ये बात जान कर उन सबका सिर गर्व से ऊंचा हो जाएगा।"

"आप मुझे बेटी कह रहे हैं ना ताऊ जी।" रूपा ने इस बार अधीरता से कहा____"तो इस बेटी की बात मान लीजिए ना। आप हमारे घर वालों को इस बारे में कुछ भी नहीं बताएंगे, आपको हम दोनों की क़सम है ताऊ जी।"

"बड़ी हैरत की बात है।" दादा ठाकुर ने चकित भाव से कहा____"ख़ैर, अगर तुम ऐसा नहीं चाहती तो ठीक है हम इस बारे में किसी को कुछ नहीं बताएंगे। तुमने हमें क़सम दे दी है तो हम तुम्हारी क़सम का मान रखेंगे।"

"आपका बहुत बहुत धन्यवाद ताऊ जी।" रूपा ने कहने के साथ ही दादा ठाकुर के पैर छुए और फिर खड़े हो कर कहा____"अब हमें जाने की इजाज़त दीजिए। काफी देर हो गई है हमें।"

रूपा के बाद कुमुद ने भी दादा ठाकुर के पांव छुए और फिर दादा ठाकुर की इजाज़त ले कर हवेली से बाहर निकल गईं। दादा ठाकुर हवेली के मुख्य दरवाज़े तक उन्हें छोड़ने आए। कुछ ही देर में दोनों अंधेरे में गायब हो गईं। उनके जाने के बाद दादा ठाकुर गहरी सोच और चिंता में डूब गए। उनके ज़हन में ख़्याल उभरा कि वैभव की जान को ख़तरा है अतः उन्हें जल्द से जल्द कुछ करना होगा। रूपा के अनुसार वैभव को जान से मारने वाला सुबह ही चंदनपुर के लिए रवाना हो जाएगा। दादा ठाकुर के मन में सवाल उभरा कि ऐसा कौन हो सकता है जो उनके बेटे को जान से मारने के लिए सुबह ही चंदनपुर के लिए निकलने वाला है? क्या वो इसी गांव का है या फिर किसी दूसरे गांव का?

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"वैभव महाराज कहां चले गए थे आप?" मैं जैसे ही घर पहुंचा तो वीरेंद्र ने पूछा____"हमने सोचा एक साथ ही दिशा मैदान के लिए चलेंगे पर आप तो जाने कहां गायब हो गए थे?"

"जी वो गांव तरफ घूमने निकल गया था।" मैंने सामान्य भाव से कहा____"सोचा आप सब व्यस्त हैं तो अकेला ही घूम फिर आता हूं। वैसे आप फ़िक्र न करें, यहां से निकला तो राघव भैया मिल गए। उन्हीं से दरबार होने लगी तो समय का पता ही नहीं चला।"

"चलिए कोई बात नहीं।" वीरेंद्र ने कहा____"अगर आपको दिशा मैदान के लिए चलना हो तो चलिए मेरे साथ।"

"नहीं, अब तो सुबह ही जाऊंगा।" मैंने कहा____"आप फुर्सत हो आइए। मैं यहीं बाबू जी के पास बैठता हूं।"

वीरेंद्र सिर हिला कर निकल गया और मैं अंदर आ कर बैठक में भाभी के पिता जी के पास बैठ गया। बैठक में और भी कुछ लोग बैठे हुए थे जिनसे बाबू जी ने मेरा परिचय कराया। अब क्योंकि मैं भी दामाद ही था इस लिए सबने मेरे पांव छुए। मुझे अपने से बड़ों का इस तरह से पांव छूना अजीब लगता था लेकिन क्या करें उनका अपना धर्म था। सब मेरा और मेरे पिता जी का हाल चाल पूछते रहे उसके बाद गांव के लोग चले गए।

रात में हम सबने साथ ही भोजन किया। भाभी और भाभी की छोटी बहन कामिनी रसोई में थी जबकि वीरेंद्र की पत्नी अपने कमरे में अपने नन्हें से बच्चे के साथ थी। खाना परोसने का काम कंचन और मोहिनी कर रहीं थी। बड़े भैया के चाचा ससुर भी हम सबके साथ खाना खाने के लिए बैठे हुए थे। मैंने महसूस किया कि कंचन मुझसे नज़रें चुरा रही थी। ज़ाहिर था आज शाम को जो कुछ हमारे बीच हुआ था उससे उसका नज़रें चुराना लाज़मी था। मैं उसे पूरी तरह से नंगा देख चुका था और इस वजह से वो मेरे सामने शर्मा रही थी। आस पास सब लोग थे इस लिए उससे मैं कुछ कह नहीं सकता था वरना उसकी अच्छी खासी खिंचाई करता। ख़ैर जल्दी ही हम सब का खाना हो गया तो हम सब उठ गए।

गर्मी का मौसम था इस लिए घर के बाहर ही चारपाई लगा कर हम सबके सोने की व्यवस्था की गई। मेरे साथ जो आदमी आए थे उन सबको वीरेंद्र ने भोजन करवाया और उन लोगों को भी घर के बाहर ही अलग अलग चारपाई पर सोने की व्यवस्था कर दी। कुछ देर हम सब बातें करते रहे उसके बाद सोने के लिए लेट गए।

मुझे नींद नहीं आ रही थी। आंखों के सामने बार बार जमुना के साथ हुई चुदाई का दृश्य उजागर हो जाता था जिसके चलते मेरा रोम रोम रोमांच से भर जाता था। सुषमा और कंचन के नंगे जिस्म भी आंखों के सामने उजागर हो जाते थे। मैं सोचने लगा कि अब जब दोनों से दुबारा अकेले में मुलाक़ात होगी तो वो दोनों कैसा बर्ताव करेंगी? मैं इस बारे में सोच जी रहा था कि सहसा मुझे अनुराधा का ख़्याल आ गया।

अनुराधा का ख़्याल आया तो एकदम से मेरे दिलो दिमाग़ में अजीब से ख़्याल उभरने लगे। मैं सोचने लगा कि इस वक्त वो भी चारपाई पर लेटी होगी। मेरे मन में सवाल उभरा कि क्या वो भी मेरे बारे में सोचती होगी? मुझे याद आया कि उस दिन उसने कितनी बेरुखी से मुझसे बातें की थी और फिर मुझे वो सब कह कर उसके घर से चले जाना पड़ा था। क्या सच में अनुराधा को यही लगता है कि मैं बाकी लड़कियों की तरह ही उसे अपने जाल में फंसाना चाहता हूं? इस सवाल पर मैं विचार करने लगा। कुछ देर सोचने के बाद सहसा मुझे कुछ आभास हुआ। मैंने सोचा, अगर वो मेरे बारे में ऐसा सोचती है तो क्या ग़लत सोचती है? माना कि ये सिर्फ मैं जानता हूं कि मैं उसके बारे में कुछ भी ग़लत नहीं सोचता हूं लेकिन इस बात को भी तो नकारा नहीं जा सकता कि मेरा चरित्र पहले जैसा ही है।

एकदम से मुझे आभास हुआ कि मैं अपने उसी चरित्र की वजह से अभी कुछ घंटे पहले जमुना के साथ ग़लत काम कर के आया हूं और ये भी सच ही है कि जमुना के अलावा मैं सुषमा और कंचन को भी भोगने की हसरत पाले बैठा हूं। भला ये क्या बात हुई कि एक तरफ मैं अनुराधा की नज़र में अच्छा इंसान बनने का दिखावा कर रहा हूं वहीं दूसरी तरफ मैं अभी भी पहले की तरह हर लड़की और हर औरत को भोगने की ख़्वाइश रखे हुए हूं? इस बात के एहसास ने एकदम से मुझे सोचो के गहरे समुद्र में डुबा दिया। मैंने सोचा, अनुराधा ने अगर मुझसे वो सब कहा तो क्या ग़लत कहा था? मैं तो आज भी वैसा ही हूं जैसा हमेशा से था। फिर मैं अनुराधा से ये क्यों कहता हूं कि उसने मुझे मुकम्मल तौर पर बदल दिया है? क्या सच में मैं बदल गया हूं? नहीं, बिल्कुल नहीं बदला हूं मैं। अगर सच में बदल गया होता तो आज ना तो मैं सुषमा और कंचन को भोगने की इच्छा रखता और ना ही जमुना के साथ वो सब करता। इसका मतलब अनुराधा से मैंने अपने बदल जाने के बारे में जो कुछ कहा वो सब झूठ था। इस सबके बावजूद मैं ये ख़्वाइश रखता हूं कि अनुराधा मुझे समझे और वही करे जो मैं उससे चाहता हूं।

अचानक से मैंने महसूस किया कि मेरे दिलो दिमाग़ में आंधियां सी चलने लगीं हैं। एक अजीब सा द्वंद चलने लगा था मेरे अंदर जिसकी वजह से एकदम से मुझे अजीब सा लगने लगा। मैंने बेचैनी और बेबसी से चारपाई पर करवट बदली और ज़हन से इन सारी बातों को निकालने की कोशिश करने लगा मगर जल्दी ही आभास हुआ कि ये इतना आसान नहीं है। काफी देर तक मैं इन सारी बातों की वजह से परेशान और व्यथित रहा और फिर ना जाने कब मेरी आंख लग गई।

✮✮✮✮

"मालिक आप यहां?" शेरा ने दरवाज़ा खोला और जैसे ही उसकी नज़र बाहर खड़े दादा ठाकुर पर पड़ी तो आश्चर्य से बोल पड़ा था____"अगर मेरे लिए कोई हुकुम था तो किसी आदमी के द्वारा मुझे बोलवा लिया होता। आपने यहां आने का कष्ट क्यों किया मालिक?"

"कोई बात नहीं शेरा।" दादा ठाकुर ने दरवाज़े के अंदर दाख़िल होते हुए कहा____"वैसे भी बात ऐसी है कि उसके लिए हमारा खुद ही यहां आना ज़रूरी था।"

शेरा ने फटाफट चारपाई को सरका कर दादा ठाकुर के पास रखा तो दादा ठाकुर उस पर बैठ गए। ये पहला अवसर था जब दादा ठाकुर शेरा जैसे अपने किसी गुलाम के घर आए थे। दादा ठाकुर ने एक नज़र घर की दीवारों पर डाली और फिर शेरा की तरफ देखा।

"तुम्हें इसी वक्त चंदनपुर जाना होगा शेरा।" फिर उन्होंने गंभीर भाव से कहा____"अपने साथ कुछ आदमियों को भी ले जाना। असल में हमें अभी कुछ देर पहले ही पता चला है कि वैभव की जान को ख़तरा है। हम नहीं जानते कि वो कौन लोग हैं लेकिन इतना ज़रूर पता चला है कि वो सुबह ही चंदनपुर जाएंगे और वहां वैभव पर जानलेवा हमला करेंगे। तुम्हारा काम वैभव की जान को बचाना ही नहीं बल्कि उन लोगों को पकड़ना भी है जो वैभव को जान से मारने के इरादे से वहां पहुंचेंगे।"

"आप फ़िक्र मत कीजिए मालिक।" शेरा ने गर्मजोशी से कहा____"मेरे रहते छोटे ठाकुर को कोई छू भी नहीं सकेगा। मैं अपनी जान दे कर भी छोटे ठाकुर की रक्षा करूंगा और उन लोगों को पकडूंगा।"

"बहुत बढ़िया।" दादा ठाकुर ने शाल के अंदर से कुछ निकाल कर शेरा की तरफ बढ़ाते हुए कहा____"इसे अपने पास रखो और साथ में इस पोटली को भी लेकिन ध्यान रहे इसका स्तेमाल तभी करना जब बहुत ही ज़रूरी हो जाए।"

शेरा ने दादा ठाकुर के हाथ से कपड़े में लिपटी दोनों चीजें ले ली। शेरा ने एक चीज़ से कपड़ा हटाया तो देखा उसमें एक रिवॉल्वर था। दूसरी कपड़े की पोटली कुछ वजनी थी और उसमें से कुछ खनकने की आवाज़ भी आई। शेरा समझ गया कि उसमें रिवॉल्वर की गोलियां हैं।

"हमें पूरी उम्मीद है कि तुम अपना काम पूरी सफाई से और पूरी सफलता से करोगे।" दादा ठाकुर ने चारपाई से उठते हुए कहा____"कोशिश यही करना कि वो हमलावर ज़िंदा तुम्हारे हाथ लग जाएं।"

"मैं पूरी कोशिश करूंगा मालिक।" शेरा ने कहा____"मैं अभी इसी समय कुछ आदमियों को ले कर चांदपुर के लिए निकल जाऊंगा।"

"अगर वहां के हालात काबू से बाहर समझ में आएं तो फ़ौरन किसी के द्वारा हमें सूचना भेजवा देना।" दादा ठाकुर ने कहा____"चंदनपुर का सफ़र लंबा है इस लिए तुम हरिया के अस्तबल से घोड़े ले लेना।"

दादा ठाकुर की बात सुन कर शेरा ने सिर हिलाया और फिर उन्हें प्रणाम किया। दादा ठाकुर ने उसे विजयी होने का आशीर्वाद दिया और फिर दरवाज़े से बाहर निकल गए। दादा ठाकुर के जाने के बाद शेरा ने फ़ौरन ही अपने कपड़े पहने और कपड़ों की जेब में रिवॉल्वर के साथ दूसरी पोटली डालने के बाद घर से बाहर निकल गया।



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अध्याय - 60

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अब तक....

"मैं पूरी कोशिश करूंगा मालिक।" शेरा ने कहा____"मैं अभी इसी समय कुछ आदमियों को ले कर चंदनपुर के लिए निकल जाऊंगा।"

"अगर वहां के हालात काबू से बाहर समझ में आएं तो फ़ौरन किसी के द्वारा हमें सूचना भेजवा देना।" दादा ठाकुर ने कहा____"चंदनपुर का सफ़र लंबा है इस लिए तुम हरिया के अस्तबल से घोड़े ले लेना।"

दादा ठाकुर की बात सुन कर शेरा ने सिर हिलाया और फिर उन्हें प्रणाम किया। दादा ठाकुर ने उसे विजयी होने का आशीर्वाद दिया और फिर दरवाज़े से बाहर निकल गए। दादा ठाकुर के जाने के बाद शेरा ने फ़ौरन ही अपने कपड़े पहने और कपड़ों की जेब में रिवॉल्वर के साथ दूसरी पोटली डालने के बाद घर से बाहर निकल गया।


अब आगे....

सुबह सुबह ही दादा ठाकुर, अभिनव और जगताप हवेली के बाहर तरफ बने उस कमरे में पहुंचे जहां पर काले नकाबपोश को रखा गया था। काले नकाबपोश की हालत बेहद ख़राब थी। उसका एक हाथ शेरा ने तोड़ दिया था जिसके चलते वो बुरी तरह सूझ गया था और दर्द से काले नकाबपोश का बुरा हाल था। रात भर दर्द से तड़पता रहा था वो।

"वैसे तो तुमने जो किया है उसके लिए तुम्हें सिर्फ़ और सिर्फ़ मौत की ही सज़ा मिलनी चाहिए।" दादा ठाकुर ने अपनी भारी आवाज़ में उससे कहा____"लेकिन अगर तुम हमें उस सफ़ेदपोश व्यक्ति के बारे में सब कुछ सच सच बता देते हो तो न केवल तुम्हें माफ़ कर दिया जाएगा बल्कि तुम्हारे इस टूटे हुए हाथ का बेहतर इलाज़ भी करवा दिया जाएगा।"

"मुझे प्रलोभन देने का कोई फ़ायदा नहीं होगा दादा ठाकुर।" काले नकाबपोश ने दर्द में भी मुस्कुराते हुए कहा____"क्योंकि मुझे उस रहस्यमय आदमी के बारे में कुछ भी पता नहीं है। हां इतना ज़रूर बता सकता हूं कि कुछ महीने पहले उससे मुलाक़ात हुई थी। मेरे साथ मेरा एक साथी भी था। हम दोनों ही शहर में कई तरह के जुर्म करते थे जिसके लिए पुलिस हमें खोज रही थी। पुलिस से बचने के लिए हमने शहर छोड़ दिया और शहर के नज़दीक ही जो गांव था वहां आ गए छुपने के लिए। मैं नहीं जानता कि उस रहस्यमय आदमी को हमारे बारे में कैसे पता चला था लेकिन एक दिन अचानक ही वो हमारे सामने अपने उसी सफ़ेद लिबास और नक़ाब में आ गया और हम दोनों से अपने अधीन काम करने को कहा। हम दोनों ने कभी किसी के लिए या किसी के आदेश पर काम नहीं किया था इस लिए जब उस रहस्यमय आदमी ने हमें अपने अधीन काम करने को कहा तो हमने साफ़ इंकार कर दिया। उसके बाद उसने हमें ढेर सारा धन देने का लालच दिया और ये भी कहा कि हम दोनों कभी भी पुलिस के हाथ नहीं लगेंगे। उसकी इस बात से हमने सोचा कि सौदा बुरा नहीं है क्योंकि हर तरह से हमारा ही फ़ायदा था लेकिन किसी अजनबी के अधीन काम करने से हमें संकोच हो रहा था। इस लिए हमने भी उससे एक बचकानी सी शर्त रखी कि हम दोनों उसके अधीन तभी काम करेंगे जब वो हम दोनों में से किसी एक के साथ मुकाबला कर के हमें हरा देगा। हम दोनों ने सोचा था कि उसे हरा कर पहले उसका नक़ाब उतार कर देखेंगे कि वो कौन है और ऐसा कौन सा काम करवाना चाहता है हमसे। ख़ैर हमारी शर्त पर वो बिना एक पल की भी देरी किए तैयार हो गया। उससे मुकाबला करने के लिए मैं ही तैयार हुआ था क्योंकि मेरा दूसरा साथी उस समय थोड़ा बीमार था। हमारे बीच मुकाबला शुरू हुआ तो कुछ ही देर में मुझे समझ आ गया कि वो किसी भी मामले में मुझसे कमज़ोर नहीं है बल्कि मुझसे बीस ही है। नतीजा ये निकला कि जब मैं उससे मुकाबले में हार गया तो शर्त के अनुसार हम दोनों उसके अधीन काम करने के लिए राज़ी हो गए। उसके बाद उसने हमें बताया कि हमें कौन सा काम किस तरीके से करना है। ये भी कहा कि हमारा भेद और हमारा चेहरा कोई देख न सके इसके लिए हमें हमेशा काले नकाबपोश के रूप में ही रहना होगा। हम दोनों के मन में कई बार ये ख़्याल आया था कि उसके बारे में पता करें मगर हिम्मत नहीं हुई क्योंकि उस मुक़ाबले के बाद ही उसने हम दोनों को सख़्ती से समझा दिया था कि अगर हम लोगों ने उसका भेद जानने का सोचा तो ये हमारे लिए अच्छा नहीं होगा क्योंकि उस सूरत में हमें अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ सकता है। हमने भी सोच लिया कि क्यों ऐसा काम करना जिसमें जान जाने का जोख़िम हो अतः वही करते गए जो करने के लिए वो हमें हुकुम देता था।"

"सबसे पहले उसने तुम्हें क्या काम सौंपा था?" दादा ठाकुर ने पूछा।

"हम दोनों को उसने यही काम दिया था कि वैभव सिंह नाम के लड़के को या तो पकड़ के लाओ या फिर उसे ख़त्म कर दो।" काले नकाबपोश ने कहा____"उसने हमें बता दिया था कि वैभव सिंह कौन है और कहां रहता है? उसके आदेश पर हम दोनों सबसे पहले उस लड़के को ज़िंदा पकड़ने के काम में लगे मगर जल्द ही हमें महसूस हुआ कि उस लड़के को पकड़ना आसान नहीं है क्योंकि हमें ऐसा प्रतीत हुआ जैसे कि कुछ अज्ञात लोग अक्सर उसकी सुरक्षा के लिए आस पास मौजूद रहते हैं। हमने कई बार उसे रास्ते में घेरना चाहा लेकिन नाकाम रहे। हम दोनों समझ चुके थे कि उस लड़के को ज़िंदा पकड़ पाना हमारे बस का नहीं है इस लिए हमने उसको जान से ख़त्म करने का प्रयास शुरू कर दिया मगर यहां भी हमें नाकामी ही मिली क्योंकि हमारी ही तरह भेस वाला एक काला नकाबपोश उसकी सुरक्षा के लिए जाने कहां से आ गया था। हमने बहुत कोशिश की उस नकाबपोश को मारने की मगर कामयाब नहीं हुए। हर बार की हमारी इस नाकामी से वो सफ़ेदपोश आदमी हम पर बहुत गुस्सा हुआ। एक रात उसी गुस्से से उसने मेरे साथी को जान से मार दिया। मैं अकेला पड़ गया और पहली बार मुझे एहसास हुआ कि उस सफ़ेदपोश के लिए काम करने की हमने कितनी बड़ी भूल की थी। वो कितना ताकतवर था ये मैं अच्छी तरह जानता था मगर अब उसकी मर्ज़ी के बिना मैं कुछ नहीं कर सकता था। एक दिन मुझे पता चला कि मेरे समान से मेरी कुछ ऐसी चीज़ें गायब हैं जिसके चलते बड़ी आसानी से मुझे पुलिस के हवाले किया जा सकता था। मैं समझ गया कि ये सब उस सफ़ेदपोश ने ही किया होगा लेकिन उससे पूछने की हिम्मत न हुई थी मेरी। मैं अब पूरी तरह से उसके रहमो करम पर था। मुझे हर हाल में अब वही करना था जो वो करने को कहता। अभी कुछ दिन पहले उसने आदेश दिया था कि मुझे एक औरत को ख़त्म करना है और अगर मैं ऐसा करने में नाकाम रहा तो वो मुझे भी मेरे साथी की तरह जान से मार देगा।"

"मुरारी की हत्या में किसका हाथ था?" दादा ठाकुर ने उससे घूरते हुए पूछा_____"क्या उसकी हत्या करने का आदेश उसी सफ़ेदपोश ने तुम्हें दिया था?"

"नहीं।" काले नकाबपोश ने इंकार में सिर हिलाते हुए कहा_____"मैं किसी मुरारी को नहीं जानता और ना ही उस सफ़ेदपोश आदमी ने मुझे ऐसे किसी आदमी को हत्या करने का आदेश दिया था। हम दोनों का काम सिर्फ़ वैभव सिंह को पकड़ना या फिर उसे ख़त्म करना था जोकि हम आज तक नहीं कर पाए।"

"सफ़ेदपोश से तुम्हारी मुलाक़ात कैसे होती है?" सहसा अभिनव ने पूछा____"क्या तुम दोनों का कोई निश्चित स्थान है मिलने का या फिर कोई ऐसा तरीका जिससे तुम आसानी से उससे मिल सकते हो?"

"शुरू में एक दो बार मैंने उसका पीछा किया था।" काले नकाबपोश ने कहा____"किंतु पता नहीं कर पाया कि वो कहां से आता है और फिर कैसे गायब हो जाता है? हमारे द्वारा अपना पीछा किए जाने का उसे पता चल गया था इस लिए जब वो अगली बार हमसे मिला तो उसने गुस्से में हम दोनों से यही कहा था कि अब अगर हमने दुबारा उसका पीछा करने की कोशिश की तो इस बार हम जान से हाथ धो बैठेंगे। हमने भी सोचा क्यों ऐसा काम करना जिसमें अपनी ही जान जाने का ख़तरा हो। ख़ैर दिन भर तो हम सादे कपड़ों में दूसरे गांवों में ही घूमते रहते थे या फिर अपने एक कमरे में सोते रहते थे और फिर शाम ढलते ही काले नकाबपोश बन कर निकल पड़ते थे। सफ़ेदपोश से हमारी मुलाक़ात ज़्यादातर इस गांव से बाहर पूर्व में एक बरगद के पेड़ के पास होती थी या फिर आपके आमों वाले बाग़ में। मिलने का दिन और समय वही निर्धारित कर देता था। अगर हम अपनी मर्ज़ी से उससे मिलना चाहें तो ये संभव ही नहीं था।"

"तांत्रिक की हत्या किसने की थी?" दादा ठाकुर ने कुछ सोचते हुए पूछा____"क्या उसकी हत्या करने का आदेश उस सफ़ेदपोश ने तुम्हें दिया था?"

"मैं किसी तांत्रिक को नहीं जानता।" काले नकाबपोश ने कहा____"और ना ही उस सफ़ेदपोश ने मुझे ऐसा कोई आदेश दिया था। हम दोनों को दिन में कोई भी ऐसा वैसा काम करने की मनाही थी जिसके चलते हम लोगों की नज़र में आ जाएं या फिर हालात बिगड़ जाएं।"

"क्या तुम्हें पता है कि तुम दोनों के अलावा।" जगताप ने शख़्त भाव से पूछा____"उस सफ़ेदपोश से और कौन कौन मिलता है या ये कहें कि वो सफ़ेदपोश और किस किस को तुम्हारी तरह अपना मोहरा बना रखा है?"

"सिर्फ़ एक के बारे में जानता हूं मैं।" काले नकाबपोश ने कहा____"और वो एक पुलिस वाला है। कल शाम को ही सफ़ेदपोश के साथ मैं उसके घर पर था।"

"सफ़ेदपोश ने दारोगा को अपने जाल में कैसे फंसाया?" जगताप ने हैरानी और गुस्से से पूछा____"क्या दरोगा भी उससे मिला हुआ है?"

"सफ़ेदपोश के आदेश पर मैंने एक हफ्ता पहले उस पुलिस वाले की मां का अपहरण किया था।" काले नकाबपोश ने कहा____"दरोगा को जब उस सफ़ेदपोश आदमी के द्वारा पता चला कि उसकी मां सफ़ेदपोश के कब्जे में है तो उसने मजबूरी में वही करना स्वीकार किया जो सफ़ेदपोश ने उससे करने को कहा।"

"दरोगा को क्या करने के लिए कहा था उस सफ़ेदपोश आदमी ने?" दादा ठाकुर ने पूछा।

"क्या आपको नहीं पता?" काले नकाबपोश ने हल्की मुस्कान के साथ उल्टा सवाल किया तो अभिनव और जगताप दोनों ही हैरानी से दादा ठाकुर की तरफ देखने लगे जबकि काले नकाबपोश ने आगे कहा____"आप तो मिले थे न दरोगा से और उसने आपको सब कुछ बताया भी था न?"

"ये क्या कह रहा है भैया?" जगताप ने हैरानी से दादा ठाकुर की तरफ देखते हुए कहा____"क्या आपको पता है ये सब?"

"हां लेकिन हमें भी कल ही पता चला है।" दादा ठाकुर ने कहा_____"ख़ैर दरोगा ने जो कुछ हमें बताया था वो सब तो कदाचित उस सफ़ेदपोश के द्वारा रटाया हुआ ही बताया था जबकि हम ये जानना चाहते हैं कि असल में वो सफ़ेदपोश दरोगा से क्या करवाया था और हमसे वो सब कहने को क्यों कहा जो दरोगा ने हमें बताया था?"

"इस बारे में मुझे कुछ भी पता नहीं है।" काले नकाबपोश ने कहा____"उस सफ़ेदपोश आदमी से हमें कुछ भी पूछने की इजाज़त नहीं थी और ना ही वो हमें कभी कुछ बताना ज़रूरी समझता था।"

"अगर तुम सच में जीवित रहना चाहते हो।" दादा ठाकुर ने सर्द लहजे में कहा____"तो अब वही करो जो हम कहें वरना जिस तरह से तुमने हमारे बेटे को जान से मारने की कोशिश की है उसके लिए तुम्हें फ़ौरन ही मौत की सज़ा दे दी जाएगी।"

"मौत तो अब दोनों तरफ से मिलनी है मुझे।" काले नकाबपोश ने फीकी मुस्कान में कहा____"सफ़ेदपोश को जब पता चलेगा कि मैं आपके हाथ लग चुका हूं तो वो मुझे ज़िंदा नहीं छोड़ेगा और इधर यदि मैं आपके आदेश पर कोई काम नहीं करुंगा तो आप भी मुझे ज़िंदा नहीं छोड़ेंगे।"

"अगर तुम हमारे कहने पर उस सफ़ेदपोश को पकड़वाने में सफल हुए।" दादा ठाकुर ने कहा____"तो यकीन मानो तुम्हें एक नई ज़िंदगी दान में मिल जाएगी। रही बात उस सफ़ेदपोश की तो जब वो हमारी पकड़ में आ जाएगा तब वो तुम्हारे साथ कुछ भी बुरा नहीं कर पाएगा।"

"आपको उस सफ़ेदपोश की ताक़त का अंदाज़ा नहीं है अभी।" काले नकाबपोश ने कहा____"मेरे जैसे छटे हुए बदमाश को उसने कुछ ही देर में पस्त कर दिया था। वो इतना कमज़ोर नहीं है कि इतनी आसानी से आपकी पकड़ में आ जाएगा।"

"वो हम देख लेंगे।" दादा ठाकुर ने कहा____"तुम्हें ये सब सोचने की ज़रूरत नहीं है। तुम सिर्फ़ ये बताओ कि क्या तुम उसे पकड़वाने में हमारी मदद करोगे?"

"टूटे हुए हाथ से भला मैं क्या कर सकूंगा?" काले नकाबपोश ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"दर्द से मेरा बुरा हाल है। ऐसे हाल में तो कुछ नहीं कर सकता मैं।"

"हां हम समझ सकते हैं।" दादा ठाकुर ने कहा____"इस लिए हम तुम्हारे दर्द को दूर करने में लिए तुम्हें दवा दे देंगे लेकिन तुम्हारे टूटे हुए हाथ का इलाज़ तभी करवाएंगे जब तुम उस सफ़ेदपोश को पकड़वाने में सफल होगे।"

दादा ठाकुर की बात सुन कर काले नकाबपोश ने हां में सिर हिलाया। उसके बाद दादा ठाकुर अभिनव और जगताप तीनों ही कमरे से बाहर चले गए। दादा ठाकुर ने जगताप को काले नकाबपोश के लिए दर्द की दवा लाने का आदेश दिया जिस पर जगताप जो हुकुम भैया कह कर एक तरफ को बढ़ता चला गया। दादा ठाकुर अपने बड़े बेटे अभिनव के साथ हवेली के अंदर बैठक में आ गए। बैठक में दादा ठाकुर एकदम से किसी सोच में डूबे हुए नज़र आने लगे थे।

✮✮✮✮

चंदनपुर में भी सुबह हो चुकी थी।

मैं वीरेंद्र और वीर सिंह के साथ दिशा मैदान के लिए गया हुआ था। मेरे साथ आए आदमी भी सुबह दिशा मैदान के लिए गए हुए थे। मैं वीरेंद्र और वीर के साथ चलते हुए नदी के पास आ गया था। मुझे याद आया कि पिछली शाम इसी नदी के पास मैंने जमुना के साथ संभोग किया था। इस बात के याद आते ही मुझे अजीब सा लगने लगा। आम तौर पर ऐसी बातों से मेरे अंदर खुशी के एहसास जागृत हो जाते थे किंतु ये पहली दफा था जब मुझे अपने इस कार्य से अब किसी खुशी का एहसास नहीं बल्कि ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे मैंने कोई गुनाह कर दिया है। वीरेंद्र और वीर दुनिया जहान की बातें कर रहे थे लेकिन मैं एकदम से ख़ामोश हो गया था। ख़ैर नदी के पास पहुंचते ही हम तीनों अलग अलग दिशा में बढ़ चले।

नदी के किनारे कुछ दूरी पर पेड़ पौधे और झाड़ियां थीं। मैं शौच क्रिया के लिए वहीं बैठ गया। मन एकदम से विचलित सा हो गया था। बार बार अनुराधा का ख़्याल आ रहा था। किसी तरह मैंने अपने ज़हन से उसके ख़्याल निकाले और फिर शौच के बाद अपनी जगह से उठ कर चल दिया। मैंने आस पास निगाह घुमाई तो वीरेंद्र और वीर कहीं नज़र ना आए। मैं समझ गया कि वो दोनों अभी भी बैठे हग रहे होंगे। आसमान में काले बादल दिख रहे थे। ऐसा लगता था जैसे कुछ ही समय में बरसात हो सकती थी। मैं चलते हुए अनायास ही उस जगह पर आ गया जहां पर पिछली शाम मैंने जमुना के साथ संभोग किया था। एक बार फिर से मेरा मन विचलित सा होने लगा।

अभी मैं विचलित हो कर कुछ सोचने ही लगा था कि सहसा मुझे अपने आस पास कुछ अजीब सा महसूस हुआ। यूं तो ठंडी ठंडी हवा चल रही थी जिससे पेड़ों के पत्ते सर्र सर्र की आवाज़ कर रहे थे किंतु पत्तों के सरसराने की आवाज़ के बावजूद कुछ अजीब सा महसूस होने लगा था मुझे। अभी मैं इस एहसास के साथ इधर उधर देखने ही लगा था कि सहसा एक तरफ से कोई बिजली की तरह आया और इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता कोई चीज़ बड़ी तेज़ी से मेरे पेट की तरफ लपकी। मैं बुरी तरह घबरा कर चीख ही पड़ा था कि तभी वातावरण में धांय की तेज़ आवाज़ गूंजी और साथ ही एक इंसानी चीख भी। सब कुछ बड़ी तेज़ी से और हैरतअंगेज तरीके से हुआ था। कुछ पलों के लिए तो मैं सकते में ही आ गया था किंतु जैसे ही मुझे होश आया तो मेरी नज़र अपने से थोड़ी ही दूर पड़े एक आदमी पर पड़ी। उसकी छाती के थोड़ा नीचे गोली लगी थी जिसके चलते बड़ी तेज़ी से उस जगह से खून बहते हुए नीचे ज़मीन पर गिरता जा रहा था। सिर पर पगड़ी बांधे क़रीब पैंतीस से चालीस के बीच की उमर का आदमी था वो जो अब ज़िंदा नहीं लग रहा था।

मैं बदहवास सा आंखें फाड़े उस आदमी को देखे ही जा रहा था कि अचानक मैं कुछ आवाज़ों को सुन कर चौंक पड़ा। मेरे पीछे तरफ से वीरेंद्र और वीर चिल्लाते हुए मेरी तरफ भागे चले आ रहे थे। दूसरी तरफ कई सारी लट्ठ की आपस में टकराने की आवाज़ें गूंजने लगीं थी। मैंने फ़ौरन ही आवाज़ की दिशा में देखा तो क़रीब सात आठ आदमी मुझसे क़रीब पंद्रह बीस क़दम की दूरी पर एक दूसरे पर लाठियां भांज रहे थे। उन लोगों को इस तरह एक दूसरे से लड़ते देख मुझे समझ ना आया कि अचानक से ये क्या होने लगा है?

"वैभव महाराज आप ठीक तो हैं ना?" वीरेंद्र और वीर मेरे पास आते ही चिंतित भाव से पूछ बैठे____"गोली चलने की आवाज़ सुन कर हमारे तो होश ही उड़ गए थे और...और ये आदमी कौन है? लगता है गोली इसी को लगी है तभी बेजान सा पड़ा हुआ है।"

"ये सब कैसे हुआ महाराज?" वीर ने हैरानी और चिंता में पूछा____"और वो कौन लोग हैं जो इस तरह आपस में लड़ रहे हैं?"

"पहले मुझे भी कुछ समझ में नहीं आया था वीर भैया।" मैंने गंभीर भाव से कहा____"किंतु अब सब समझ गया हूं। ये आदमी जो मरा हुआ पड़ा है ये मुझे चाकू के द्वारा जान से मारने वाला था। अगर सही वक्त पर इसे गोली नहीं लगती तो यकीनन इसकी जगह मेरी लाश ज़मीन पर पड़ी होती।"

"लेकिन क्यों महाराज?" वीरेंद्र ने भारी उलझन और हैरानी के साथ कहा____"आख़िर ये आदमी आपको क्यों मारना चाहता था और ये लोग कौन हैं जो इस तरह आपस में लड़ रहे हैं? आख़िर क्या चक्कर है ये?"

"उनमें से कुछ लोग शायद इस मरे हुए आदमी के साथी हैं।" मैंने संभावना ब्यक्त करते हुए कहा____"और इसके साथियों से जो लोग लड़ रहे हैं वो मेरी सुरक्षा करने वाले लोग हैं। ख़ैर मैं ये चाहता हूं कि इस बारे में आप घर में किसी को कुछ भी न बताएं। मैं नहीं चाहता कि खुशी के माहौल में एकदम से सनसनी फ़ैल जाए।"

"ये कैसी बातें कर रहे हैं महाराज?" वीरेंद्र ने चकित भाव से कहा____"इतनी बड़ी बात हो गई है और आप चाहते हैं कि हम इस बारे में घर में किसी को कुछ न बताएं?"

"मेरी आपसे विनती है वीरेंद्र भैया।" मैंने गंभीर भाव से ही कहा____"इस बारे में आप किसी को कुछ नहीं बताएंगे, ख़ास कर भाभी को तो बिलकुल भी नहीं। बाकी आप फ़िक्र मत कीजिए। पिता जी ने मेरी सुरक्षा के लिए आदमी भेज दिए हैं।"

मैंने किसी तरह वीरेंद्र और वीर को समझा बुझा कर इस बात के लिए मना लिया कि वो इस बारे में किसी को कुछ न बताएं। उधर देखते ही देखते कुछ ही देर में कुछ लोग ज़मीन पर लहू लुहान पड़े नज़र आने लगे। मैंने देखा उन लोगों से वो आदमी भी भिड़े हुए थे जो मेरे साथ गांव से आए थे। कुछ ही देर में लट्ठबाजी बंद हो गई। वातावरण में अब सिर्फ़ उन लोगों की दर्द से कराहने की आवाज़ें गूंज रहीं थी जो शायद मेरे दुश्मन थे और मुझे जान से मारने के इरादे से आए थे।

"कौन हो तुम लोग?" मैं फ़ौरन ही एक आदमी के पास पहुंच कर तथा उसका गिरेबान पकड़ कर गुर्राते हुए पूछा____"और मुझ पर इस तरह जानलेवा हमला करने के लिए किसने भेजा था?"

मेरे पूछने पर वो आदमी कुछ न बोला, बस दर्द से कराहता ही रहा। थोड़ी थोड़ी दूरी पर करीब पांच आदमी अधमरी हालत में पड़े थे। मैंने दो तीन लोगों से अपना वही सवाल दोहराया लेकिन किसी के मुख से कोई जवाब न निकला। मैं ये तो समझ चुका था कि मुझ पर जानलेवा हमला करने वाले ये लोग मेरे दुश्मन के ही आदमी थे किंतु अब मेरे लिए ये जानना ज़रूरी था कि असल में मेरा दुश्मन है कौन? मेरे पूछने पर जब किसी ने भी कोई जवाब नहीं दिया तो मेरे अंदर का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। मैं बिजली की तेज़ी से उस आदमी के पास आया जिसकी जान गोली लगने से गई थी। उसके पास ही उसका चाकू पड़ा हुआ था। मैंने उसके चाकू को उठा लिया और फिर से उन लोगों के पास पहुंच गया।

"तुम लोग अगर ये सोचते हो कि मेरे पूछने पर सच नहीं बताओगे।" मैंने सर्द लहजे में सबकी तरफ बारी बारी से देखते हुए कहा____"तो जान लो कि अब तुम लोगों की हालत बहुत भयानक होने वाली है। ठाकुर वैभव सिंह को जान से मारने की कोशिश करने वाला इस धरती पर ज़िंदा रहने का हक़ खो देता है। अब तुम लोग गा गा कर बताओगे कि तुम लोगों को किसने यहां भेजा था।"

मैं एक आदमी की तरफ़ बढ़ा। मुझे अपनी तरफ बढ़ता देख उस ब्यक्ति ने थरथराते हुए एकदम से अपने जबड़े भींच लिए। ऐसा लगा जैसे वो खुद को तैयार कर चुका था कि वो किसी भी हालत में मुझे सच नहीं बताएगा। इस बात का एहसास होते ही मेरे अंदर का गुस्सा और भी बढ़ गया। मैं उसके क़रीब बैठा और चाकू को उसके कान की जड़ में रखा। मेरी मंशा का आभास होते ही उस आदमी के चेहरे पर दहशत के भाव उभर आए और इससे पहले कि वो कुछ कह पाता या कुछ कर पाता मैंने एक झटके में उसके कान को उसकी कनपटी से अलग कर दिया। फिज़ा में उसकी हृदयविदारक चीखें गूंजने लगीं। बुरी तरह तड़पने लगा था वो।

"ये तो अभी शुरुआत है।" मैंने उसके कटे हुए कान को उसकी आंखों के सामने लहराते हुए कहा____"तुम सबके जिस्मों का एक एक अंग एक एक कर के ऐसे ही अलग करुंगा मैं। तुम सब जब तड़पोगे तो एक अलग ही तरह का आनंद आएगा।"

"तुम कुछ भी कर लो।" उस आदमी ने दर्द को सहते हुए कहा____"लेकिन हम में से कोई भी तुम्हें कुछ नहीं बताएगा।"

"ठीक है फिर।" मैं सहसा दरिंदगी भरे भाव से मुस्कुराया____"हम भी देखते हैं कि तुम लोगों में कितना दम है।"

"छोटे ठाकुर।" सहसा मेरे पीछे से आवाज़ आई तो मैं पलटा। मेरी नज़र एक हट्टे कट्टे आदमी पर पड़ी। उसने मेरी तरफ देखते हुए आगे कहा____"इन लोगों को आप मुझे सम्हालने दीजिए। यहां पर ये सब करना ठीक नहीं है। मालिक ने मुझे हुकुम दिया है कि इन लोगों को मैं जीवित पकड़ कर लाऊं। अगर आपने इन्हें इस तरह से तड़पा तड़पा कर मार दिया तो मैं मालिक को क्या जवाब दूंगा?"

"ठीक है।" मैंने कहा____"तुम इन सबको ले जाओ लेकिन सिर्फ़ ये मेरे पास ही रहेगा। इसने मुझे चुनौती दी है कि ये मेरे किसी भी प्रयास में नहीं बताएगा कि इसे किसने भेजा है।"

शेरा ने मेरी बात सुन कर हां में सिर हिलाया और फिर अपने आदमियों को इशारा किया। कुछ ही देर में शेरा ने सब को बेहोश कर दिया और फिर उन सबको कंधों पर लाद कर एक तरफ को बढ़ते चले गए। उन लोगों के जाने के बाद मैं एक बार फिर से उस आदमी के पास बैठा। वीरेंद्र और वीर मेरे पास ही आ गए थे। वो दोनों कुछ सहमे हुए से थे। शायद ऐसा मंज़र दोनों ने कभी नहीं देखा था।

"वैभव महाराज ये सब क्या हो रहा है?" वीरेंद्र ने घबराए हुए अंदाज से कहा____"और आप इस आदमी के साथ अब क्या करने वाले हैं?"

"कुछ ऐसा जिसे आप दोनों देख नहीं पाएंगे।" मैंने जहरीली मुस्कान के साथ कहा____"इस लिए बेहतर होगा कि आप दोनों यहां से चले जाएं।"

"नहीं, हरगिज़ नहीं।" वीर ने इंकार में सिर हिलाते हुए कहा____"हम आपको अकेला छोड़ कर कहीं नहीं जाएंगे। आपसे बस इतनी ही विनती है कि जो भी करना है सोच समझ कर कीजिए क्योंकि अगर गांव का कोई आदमी इस तरफ आ गया और उसने ये सब देख लिया तो बात फैल जाएगी।"

मैंने वीर की बात को अनसुना किया और उस आदमी की तरफ देखा जो अभी भी दर्द से कराह रहा था। मेरे एक हाथ में अभी भी उसका कटा हुआ कान था और दूसरे हाथ में चाकू। मैंने उसके कटे हुए कान को ज़मीन पर फेंका और चाकू को उसके दूसरे कान की तरफ बढ़ाया। मेरे ऐसा करते ही वो एक बार फिर से दहशतजदा हो गया। घबराहट और खौफ के मारे उसका बुरा हाल हो गया था।

"शुरू में जब तुझे देखा था तो लगा था कि कहीं तो तुझे देखा है।" मैंने चाकू को उसके दूसरे कान की जड़ में रखते हुए कहा____"अब याद आया कि कहां देखा था और ये भी याद आ गया कि तू किस गांव का है। तू हमारे पास के गांव कुंदनपुर का है न? तुझे मेरे बारे में तो सब पता ही होगा कि मैं कौन हूं, क्या हूं और क्या क्या कर सकता हूं, है ना?"

मेरी बातें सुन कर वो आदमी पहले से कहीं ज़्यादा भयभीत नज़र आने लगा। चेहरा इस तरह पसीने में नहाया हुआ था जैसे पानी से धोया हो। उसके चेहरे के भावों को समझते हुए मैंने कहा____"तूने जो कुछ किया है उसके लिए अब तेरे पूरे खानदान को सज़ा भुगतनी होगी। मुझ पर जानलेवा हमला करने का जो दुस्साहस तूने किया है उसके लिए अब तेरे बीवी बच्चों को मेरे क़हर का शिकार बनना होगा।"

"नहीं नहीं।" मेरी बात सुनते ही वो आदमी बुरी तरह घबरा कर बोल पड़ा_____"भगवान के लिए मेरे घर वालों के साथ कुछ मत कीजिएगा। मैंने जो कुछ किया है वो मजबूरी में किया है, कृपया मुझे माफ़ कर दीजिए।"

"ज़रूर माफ़ कर सकता हूं तुझे।" मैंने सर्द लहजे में कहा____"मगर तब जब तू ये बताएगा कि तुझे किसने मजबूर किया है और किसने मुझ पर इस तरह से हमला करने का हुकुम दिया है?"

"अगर मैंने आपको इस बारे में कुछ भी बताया।" उस आदमी ने इस बार दुखी भाव से कहा____"तो वो लोग मेरे बीवी बच्चों को जान से मार देंगे।"

"बुरे काम का बुरा फल ही मिलता है।" मैंने कहा____"तू अब ऐसी हालत में है कि तुझे दोनों तरफ से बुरा फल ही मिलना है लेकिन ये भी संभव हो सकता है कि अगर तू मुझे सच बता देगा तो शायद उतना बुरा न हो जितने की तुझे उम्मीद है। चल बता, किसने भेजा था तुम लोगों को यहां?"

"कल रात आपके गांव का एक साहूकार आया था मेरे घर।" उस आदमी ने दर्द को सहते हुए कहा____"उस साहूकार का नाम गौरी शंकर है। उसी ने मुझसे कहा कि मुझे कुछ आदमियों के साथ सुबह सूरज निकलने से पहले ही चंदनपुर जाना है और वहां पर आपको ख़त्म करना है। मैंने जब ऐसा करने से इंकार किया तो उसने कहा कि अगर मैंने ऐसा कर दिया तो वो मेरा सारा कर्ज़ माफ़ कर देगा और अगर मैंने ऐसा नहीं किया अथवा इस बारे में किसी को भी कुछ बताया तो वो मेरे बीवी बच्चों को जान से मार देगा। मैं क्या करता छोटे ठाकुर? अपने बीवी बच्चों की जान बचाने के चक्कर में मैंने मजबूर हो कर ये क़दम उठाना ही बेहतर समझा।"

"वो साहूकार मणि शंकर का छोटा भाई गौरी शंकर ही था न?" मैंने संदिग्ध भाव से पूछा____"क्या तूने अच्छे से देखा है उसे?"

"मैं सच कह रहा हूं छोटे ठाकुर।" उस आदमी ने कहा____"वो गौरी शंकर ही था। भला उस इंसान को मैं पहचानने में कैसे ग़लती कर सकता हूं जिससे मैंने कर्ज़ लिया था और जिसके घर के आवारा लड़के हमारे गांव में आ कर गांव की बहू बेटियों को ख़राब करते हैं?"

"अगर तू ये सब पहले ही बता देता तो तुझे अपने इस कान से हाथ नहीं धोना पड़ता।" मैंने कहा____"ख़ैर अब मैं तुझे जान से नहीं मारूंगा। तूने ये सब बता कर अच्छा काम किया है। तेरे बीवी बच्चों की सुरक्षा की पूरी कोशिश की जाएगी लेकिन तू इस हालत में वापस गांव नहीं जा सकता। तेरा यहीं पर इलाज़ किया जाएगा और तू कुछ समय तक यहीं रहेगा। उन लोगों को यही लगना चाहिए कि तू मेरे द्वारा मारा गया होगा।"

मैंने वीरेंद्र और वीर को उस आदमी के इलाज़ की जिम्मेदारी सौंपी। वो दोनों ये सब सुन कर बुरी तरह हैरान तो थे लेकिन ये देख कर खुश भी हो गए थे कि मैंने उस आदमी के साथ आगे कुछ भी बुरा नहीं किया। ख़ैर मेरे कहने पर वीर ने अभी उस आदमी को सहारा दे कर उठाया ही था कि तभी मेरे साथ आए मेरे आदमी भी आ गए। उन्होंने बताया कि वो दूर दूर तक देख आए हैं लेकिन इनके अलावा और कोई भी नज़र नहीं आया। मैंने अपने दो आदमियों को वीर भैया के साथ भेजा और ये भी कहा कि अब से उस आदमी के साथ ही रहें और उस पर नज़र रखे रहें।


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Bilkul Bhai, Ham sochte kuch hain aur ho kuch aur jata hai. Time ki bahut Kami hai...jiske chalte is kahani ko aage badhana behad mushkil kaam hai. Well koshish jaari hai...

:approve:

Sahi kaha...

Agar halaat aise hi rahe to vaibhav ke charitra me yakeenan ek din badlaav aayega..

Safodposh ka rahasya itna jaldi open nahi hoga...

Dekhiye kya hota hai aage...

Fauji bhai ki kahani samay ki kami ke chalte aage nahi padh paya lekin jab bhi makool samay milega to tasalli se padhuga...rahasya aur romanch ka tadka lagane me unko maharat haasil hai :declare:
 
Lagta hai kaafi secret maamla hai :D

Btw chhupana hi tha to aisa kahne ki kya zarurat thi :roll:

Ghar walo ne charo taraf se gher liya hai apan ko. Ladki wadki dekh ke baat pakki kar li hai unhone. November/December me ya fir next year gale me ghanti baandh di jaayegi. Freedom ke din khatam hone wale hain...zindagi barbaad hone wali hai :verysad:

Yaha ke sansaar me itne saal kaise guzar gaye pata hi nahi chala. In chaar saalo me kayi dost bane aur aap jaise bade bhaiyo ka ashirwaad tatha margdarshan mila. Kabhi kabhi socha karta hu ki kaash aise log real me bhi sath hote. Dukh sukh, utaar chadhaav to jeewan me bana hi rahta hai lekin is sabke beech jo hamare beech sambandh bane wo shayad hi bhulaye ja sakenge....Yu to kisi ke bhi jeewan ka koi bharosa nahi hai lekin jab tak jeewan hai aur jab tak ham sab is forum me hain tab tak to sath hain hi aur aage bhi aisa hi sath bana rahe aisi koshish karte rahenge....
 
अध्याय - 61

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अब तक....



मैंने वीरेंद्र और वीर को उस आदमी के इलाज़ की जिम्मेदारी सौंपी। वो दोनों ये सब सुन कर बुरी तरह हैरान तो थे लेकिन ये देख कर खुश भी हो गए थे कि मैंने उस आदमी के साथ आगे कुछ भी बुरा नहीं किया। ख़ैर मेरे कहने पर वीर ने अभी उस आदमी को सहारा दे कर उठाया ही था कि तभी मेरे साथ आए मेरे आदमी भी आ गए। उन्होंने बताया कि वो दूर दूर तक देख आए हैं लेकिन इनके अलावा और कोई भी नज़र नहीं आया। मैंने अपने दो आदमियों को वीर भैया के साथ भेजा और ये भी कहा कि अब से उस आदमी के साथ ही रहें और उस पर नज़र रखे रहें।



अब आगे....



पिछली रात दादा ठाकुर के लिए ऐसी थी जो बड़ी मुश्किल से गुज़री थी। पिछली रात कई बातें ऐसी हुई थीं जिसके चलते वो सो नहीं सके थे। एक तो साहूकार हरि शंकर की बेटी रूपा का रात में अपनी भौजाई के साथ उनसे मिलने के लिए हवेली आना दूसरे उसके द्वारा ये बताया जाना कि उनके बेटे वैभव की जान को ख़तरा है। इसके अलावा शेरा का उस काले नकाबपोश को पकड़ लाना। शेरा ने काले नकाबपोश का हाथ तोड़ दिया था जिसकी वजह से वो दर्द से तड़प रहा था। दादा ठाकुर ने सुबह उसे दवा देने का काम जान बूझ कर जगताप को सौंपा था। अपने शक को यकीन में बदलने का उनके पास फिलहाल यही एक उपाय था और इसी लिए वो देर रात तक जागते भी रहे थे किंतु जगताप द्वारा ऐसा कुछ भी होता हुआ उन्हें नहीं दिखा जिससे उनका शक यकीन में बदल जाए। सुबह नकाबपोश उन्हें सही सलामत ही मिला था। जगताप ने उनके हुकुम के अनुसार काले नकाबपोश को दर्द की दवा ला कर दी थी। उसके बाद जगताप की तरफ से किसी भी तरह की कोई कार्यवाही नहीं हुई और इस बात ने दादा ठाकुर के मन में कई सारे सवाल खड़े कर दिए थे।

दूसरी तरफ अपने बेटे वैभव की सुरक्षा का जिम्मा शेरा को दे कर भी दादा ठाकुर सुकून से सो न सके थे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि ऐसा वो कौन था जो उनके बेटों के साथ साथ उनके पूरे खानदान को ख़त्म कर देने पर अमादा था? उन्हें गांव के साहूकारों पर शक तो था लेकिन सिर्फ शक के आधार पर वो कुछ नहीं कर सकते थे। ख़ैर, वो इस बात के लिए ऊपर वाले का बार बार धन्यवाद कर रहे थे कि समय रहते उन्हें साहूकार की बेटी रूपा द्वारा ऐसी ख़बर मिल गई थी। वो सोचने पर मजबूर हो गए थे कि साहूकार की लड़की ने इतनी बड़ी बात बताने के लिए वक्त और हालात को भी नहीं देखा था बल्कि अपने घर वालों को बिना बताए सीधा हवेली आ गई थी। रूपा के बारे में ये सब सोच सोच कर दादा ठाकुर के मन में जहां बड़े सुखद ख़्याल उभर आते थे वहीं वो ये भी सोच रहे थे कि हरि शंकर की लड़की ने उनके ऊपर कितना बड़ा उपकार किया है।

बड़ी मुश्किल से उन्हें नींद आई थी किंतु जल्दी ही सुबह हो जाने से उन्हें बिस्तर छोड़ देना पड़ा था। हालाकि सुबह होने का तो उन्हें बड़ी शिद्दत से इंतज़ार था और साथ ही इस बात का भी कि चंदनपुर में उनके बेटे के साथ क्या होगा? क्या शेरा उनके बेटे को सुरक्षित रखने में कामयाब हो पाएगा? क्या शेरा उन लोगों को पकड़ पाएगा जो उनके बेटे को जान से मारने के इरादे से वहां पहुंचेंगे? दादा ठाकुर के अंदर हर गुज़रते पल के साथ एक बेचैनी सी बढ़ती जा रही थी। उनका जी कर रहा था कि वो खुद ही उड़ कर चंदनपुर पहुंच जाएं और वहां जो कुछ भी होने वाला हो उसका वो खुद ही सामना करें।

सुबह सबने नाश्ता किया। नाश्ते के बाद दादा ठाकुर अपने छोटे भाई जगताप और बड़े बेटे अभिनव के साथ हवेली के बाहर बने उस कमरे में एक बार फिर पहुंचे जहां पर काला नकाबपोश बंद था। कमरे का दरवाज़ा खुला तो बाहर की रोशनी में काला नकाबपोश अजीब ही हालत में नज़र आया। तीनों ये देख कर बुरी तरह चौंके कि काला नकाबपोश कमरे के एक कोने में बेजान सा पड़ा हुआ है। उसके जिस्म से निकलने वाला खून कमरे के फर्श पर फैला हुआ था। फर्श पर वो एक तरफ को करवट लिए हुए था किंतु अवस्था उकडू बैठने जैसी थी। दोनों घुटने जुड़े हुए थे और उसके पेट की तरफ खिंचे से लग रहे थे। उसके दोनों हाथ जो बंधे हुए थे वो उसके पेट की तरफ सख़्ती से भिंचे हुए प्रतीत हो रहे थे। उसकी ये हालत देख पहले तो वो तीनों बुरी तरह चौंके ही थे किंतु जल्दी ही दादा ठाकुर को होश आया।

"ये सब क्या है जगताप?" दादा ठाकुर ने व्याकुल भाव से किंतु ज़रा ऊंची आवाज़ में पूछा____"इसकी हालत और कमरे में फैला ये ढेर सारा खून देख कर ऐसा लग रहा है जैसे अब ये ज़िंदा नहीं है।"

"य...ये कैसे हो सकता है पिता जी?" अभिनव ने हैरत से आंखें फाड़ कर दादा ठाकुर की तरफ देखा____"अभी सुबह तो ये अच्छा भला था, फिर थोड़ी ही देर में ये सब कैसे हो गया?"

"बड़े आश्चर्य की बात है भैया।" जगताप ने काले नकाबपोश की तरफ देखते हुए चकित भाव से कहा____"आपके हुकुम पर मैंने इसे दर्द दूर करने की दवा दी थी। इसने मेरी आंखो के सामने दवा को खाया था। उसके बाद मैं यहां से चला गया था। समझ में नहीं आ रहा कि ये सब कैसे हो गया?"

कहने के साथ ही जगताप आगे बढ़ा और काले नकाबपोश के जिस्म को अपने हाथ के ज़ोर पर अपनी तरफ घुमाया तो काला नकाबपोश सीधा हो गया। उसके सीधा होते ही तीनों की नज़र उसके पेट वाले हिस्से पर पड़ी। किसी चीज़ को उसने दोनों हाथों से बड़ी सख़्ती से पकड़ रखा था और उसे अपने पेट पर पूरी ताक़त से दबा रखा था। उसके पेट के उसी हिस्से से इतना सारा खून निकला था जोकि अब भी गीला था और ज़ख्म से हल्का हल्का रिस रहा था।

दादा ठाकुर और अभिनव उसके क़रीब पहुंचे और ध्यान से देखना शुरू किया। काले नकाबपोश के हाथों में जो चीज़ थी वो लोहे का कोई चपटा सा टुकड़ा था। जगताप ने उसकी मुट्ठियों को ज़ोर दे कर खोला तो लोहे का वो चपटा सा टुकड़ा स्पष्ट दिखने लगा। वो लोहे का टुकड़ा कुछ और नहीं बल्कि खुरपी थी जिसकी मूठ नहीं थी। उसे देख कर दादा ठाकुर को समझने में ज़रा भी देर ना लगी कि काले नकाबपोश ने सुबह उन सबके जाने के बाद अपनी जान ले ली है।

काला नकाबपोश इस तरह अपनी जान ले लेगा इसकी तीनों में से किसी को भी उम्मीद नहीं थी। खुरपी में मौजूद उस लोहे के टुकड़े से काले नकाबपोश ने अपनी जान ले ली थी। उन लोगों ने इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया था कि खुरपी में लगने वाला लोहे का कोई टुकड़ा इस कमरे में कहीं पड़ा हुआ हो सकता है। ख़ैर अब जो होना था वो तो हो ही चुका था। दादा ठाकुर के हुकुम पर फ़ौरन ही कुछ आदमियों ने काले नकाबपोश की लाश को कमरे से निकाला और उसे ठिकाने लगाने चले गए।

"हमने ख़्वाब में भी नहीं सोचा था कि ऐसा कुछ हो जाएगा।" बैठक में अपने सिंहासन पर बैठे दादा ठाकुर ने गंभीरता से कहा____"हमें इस कमबख़्त पर भरोसा ही नहीं करना चाहिए था बल्कि सुबह ही उसके हलक में हाथ डाल कर सफ़ेदपोश के बारे में सब कुछ जान लेना चाहिए था।"

"इस सबके लिए आप खुद को दोष क्यों दे रहे हैं भैया?" जगताप ने कहा____"सुबह जिस तरह उसने हमारा साथ देने के लिए कहा था उससे हम पूरी तरह यही समझ गए थे कि वो हमें उस सफ़ेदपोश के बारे में कुछ न कुछ ऐसा ज़रूर बताइएगा जिससे हम उस तक पहुंच सकेंगे। हम में से कोई भला ये कैसे सोच सकता था कि उसका वो सब कहना महज हमें मूर्ख बनाना हो सकता है?"

"बड़ी हैरत की बात है जगताप कि सफ़ेदपोश के इशारे पर काम करने वाला खुद की जान लेने के लिए एक पल का भी वक्त लगा कर ये नहीं सोचता कि जान कितनी कीमती होती है।" दादा ठाकुर ने कहा____"और उस जान को इस तरह अपने ही हाथों नहीं ले लेना चाहिए।"

"मजबूरी इंसान से बहुत कुछ करा देती है भैया।" जगताप ने गहरी सांस ले कर कहा____"ख़ैर जो भी हुआ ठीक नहीं हुआ है। काले नकाबपोश के रूप में हमारे हाथ एक ऐसा शख़्स लग गया था जिसके द्वारा हम बड़ी आसानी से उस सफ़ेदपोश तक पहुंच सकते थे। उसके बाद ज़ाहिर है उसका ये खेल भी यहीं पर समाप्त हो जाता लेकिन काले नकाबपोश की इस तरह से हो गई मौत के बाद एक बार फिर से हम निहत्थे से हो गए हैं।"

"बात तो तुम्हारी ठीक है जगताप।" दादा ठाकुर ने कहा____"किन्तु ये भी सच है कि नकाबपोश से हमें कोई लाभ नहीं मिल सकता था। कहने का मतलब ये कि उसे सफ़ेदपोश के बारे में जितना पता था उतना उसने हमें बता दिया था। यकीनन इसके अलावा उसे उस सफ़ेदपोश के बारे में कुछ नहीं पता था लेकिन हैरत की बात ये है कि उसने खुद की जान ले ली जबकि उसे ऐसा नहीं करना चाहिए था। खुद की इस तरह से जान ले लेना बिल्कुल भी समझ नहीं आया।"

दादा ठाकुर की इस बात पर दोनों कुछ न बोले, बल्कि किसी सोच में डूबे नज़र आए। कुछ पलों की ख़ामोशी के बाद दादा ठाकुर ने ही कहा_____"ख़ैर, अब हालात ऐसे हो गए हैं कि किसी भी पल कुछ भी हो सकता है। हम मानते हैं कि काले नकाबपोश की मौत हो जाने से फिलहाल उस सफ़ेदपोश तक पहुंचना हमारे लिए आसान नहीं रहा किंतु हमारे दुश्मन ने कुछ ऐसा किया है जिसके चलते हम बहुत जल्द उस तक पहुंचेंगे।"

"य...ये क्या कह रहे हैं आप?" जगताप के साथ साथ अभिनव के भी चेहरे पर हैरानी के भाव उभरे, उधर जगताप ने कहा_____"ऐसा क्या कर दिया है हमारे दुश्मन ने?"

"पिछली रात तुम दोनों के जाने के बाद हम भी सोने के लिए अपने कक्ष में चले गए थे।" दादा ठोकर ने अपनी प्रभावशाली आवाज़ में कहा____"कुछ समय बाद हमें एक दरबान ने बताया कि हमसे कोई मिलने आया है। हम जब बाहर आए तो देखा हमारा एक गुप्तचर अंधेरे में खड़ा था। उसने हमें कुछ ऐसा बताया जिसे सुन कर हम एकदम से सन्न रह गए थे।"

"उसने ऐसा क्या बताया आपको।" जगताप ने हैरत से पूछा।

"यही कि पिछली शाम कुछ लोगों ने वैभव को जान से मारने के लिए एक रणनीति बनाई है।" दादा ठाकुर ने कहा_____"उन लोगों की नीति के अनुसार उनके कुछ महारथी आज सुबह सूर्य के उगने से पहले ही चंदनपुर के लिए रवाना हो जाएंगे और फिर वहां पर वैभव को जान से मारने के काम पर लग जाएंगे।"

"क....क्या???" अभिनव और जगताप बुरी तरह उछल पड़े थे_____"ये आप क्या कह रहे हैं पिता जी? मेरे छोटे भाई की जान लेने के लिए दुश्मन चंदनपुर जा रहे हैं और मैं यहां आराम से बैठा हूं। लानत है मुझ जैसे भाई पर। आपने मुझे पहले क्यों नहीं बताया इस बारे में?"

"शांत हो जाओ।" दादा ठाकुर ने बड़े धैर्य के साथ कहा____"फ़िक्र करने की कोई बता नहीं है। वैभव अगर तुम्हारा छोटा भाई है तो वो हमारा बेटा भी है। तुमसे कहीं ज़्यादा हमें उसकी फ़िक्र है। हमें जब इस बारे में हमारे उस गुप्तचर से पता चला तो हमने उसी वक्त अपने कुछ खास आदमियों को चंदनपुर भेज दिया था ताकि वो लोग वहां पर वैभव की रक्षा कर सकें। हमारा ख़्याल है कि अब तक वहां पर बहुत कुछ हो चुका होगा।"

"इतनी बड़ी बात हो गई और रात आपने मुझे इस बारे में बताया भी नहीं भैया?" जगताप ने शिकायती लहजे में कहा____"क्या आप मुझे मेरे बेटों की करतूतों की वजह से बेगाना समझने लगे हैं?"

"ऐसी कोई बात नहीं है जगताप।" दादा ठाकुर ने कहा____"रात ज़्यादा हो गई थी इस लिए हमने इस सबके लिए तुम में से किसी को भी तकलीफ़ देना उचित नहीं समझा था।"

"इसमें तकलीफ़ जैसी कौन सी बात थी भैया?" जगताप ने कहा____"आप अच्छी तरह जानते हैं कि वैभव को मैं अपने बेटे की तरह स्नेह और प्यार करता हूं। उसकी जान को दुश्मनों से ख़तरा हो और मुझे इसका पता न हो तो लानत है मुझ पर। मैं अभी चंदनपुर जा रहा हूं और अपने भतीजे पर बुरी नजर डालने वालों को मिट्टी में मिलाता हूं।"

"इस सबकी ज़रूरत नहीं है जगताप।" दादा ठाकुर ने कहा_____"हमें यकीन है कि शेरा ने वहां पर सब कुछ सम्हाल लिया होगा। हमने उसे हुकुम दिया था कि वो उन लोगों को ज़िंदा पकड़ने की ही कोशिश करें ताकि उनके द्वारा हमें पता चल सके कि हमारे बेटे को जान से मारने के लिए उन्हें चंदनपुर किसने भेजा था?"

"हम ख़ामोशी से शेरा के वापस आने का इंतज़ार नहीं कर सकते पिता जी।" अभिनव ने कहा____"और ना ही इस यकीन के साथ चुप बैठे रह सकते हैं कि शेरा ने सब कुछ सम्हाल लिया होगा। आप भी जानते हैं कि हमारा दुश्मन कितना शातिर और कितना ख़तरनाक है। सिर्फ शेरा के भरोसे में हमें यहां पर ख़ामोशी से नहीं बैठे रहना चाहिए।"

"अभिनव बिलकुल ठीक कह रहा है भैया।" जगताप ने कहा_____"वैभव हमारा बेटा है। दुश्मन उसे ख़त्म करने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है इस लिए हम सिर्फ शेरा के भरोसे नहीं रह सकते। उसकी सुरक्षा के लिए और दुश्मन से मुकाबला करने के लिए हमें खुद वहां जाना होगा।"

"वैसे तो हमें ऐसा ज़रूरी नहीं लगता।" दादा ठाकुर ने कहा____"लेकिन अगर तुम दोनों को शेरा की काबिलियत पर भरोस नहीं है तो बेशक अपने मन की कर सकते हो।"

दादा ठाकुर की बात सुनते ही जगताप और अभिनव अपनी अपनी कुर्सी से उठ कर खड़े हो गए। जगताप ने अभिनव से कहा कि वो अंदर से रायफल ले कर आए तब तक वो कुछ खास आदमियों को साथ चलने के लिए कहता है। कुछ ही देर में अभिनव हाथों में बंदूक और रायफल लिए हवेली से बाहर आया। बाहर दादा ठाकुर और जगताप जीप के पास ही खड़े थे। दादा ठाकुर का हुकुम मिलते ही जगताप और अभिनव जीप में बैठ गए। जीप में चार हट्टे कट्टे आदमी भी हाथों में बंदूकें लिए बैठ गए। उसके बाद जीप हाथी दरवाज़े की तरफ तेज़ी से बढ़ती चली गई।



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अनुराधा घर पर अकेली थी। उसकी मां सरोज और भाई अनूप घर के पीछे कुएं में नहाने गए हुए थे। पिछली रात अनुराधा को तेज़ बुखार आ गया था जिसकी वजह से उसका चेहरा इस वक्त एकदम से मुरझाया हुआ दिख रहा था। रात सरोज ने उसे बुखार की दवा दी थी जिसके चलते उसे थोड़ा आराम मिला था। इस वक्त वो चारपाई पर पड़ी हुई थी। उसका पूरा बदन पके हुए फोड़े की तरह दुख रहा था। सरोज ने उसे कहा था कि वो फिलहाल आराम करे, घर के काम धाम वो खुद कर लेगी।

चारपाई पर लेटी वो वैभव के ही बारे में सोच रही थी। जब से वैभव वो सब बोल कर उसके घर से गया था तब से उसे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था। यूं तो ये अभी कुछ ही दिनों की बात हुई थी लेकिन उसे ऐसा प्रतीत होता था जैसे जाने कितनी सदियां गुज़र गईं हैं वैभव को देखे हुए। उसे वैभव की बहुत याद आ रही थी। वैभव का उसको छेड़ना याद आ रहा था। उसे याद आ रहा था कि कैसे वो वैभव के आने से खुश हो जाती थी और जब वो उसे ठकुराईन कहता था तो कैसे वो शर्म से सिमट जाती थी। ये सब उसे पहले भी अकेले में याद आता था लेकिन तब इस सबके याद आने से उसे तकलीफ़ नहीं होती थी बल्कि अकेले में ही वो इस सबको याद कर के शर्म से मुस्कुराने लगती थी और फिर खुद से ही कहती_____'मैं ठकुराईन नहीं हूं समझ गए ना आप?'

पिछले कुछ दिनों से उसके लिए मानों सब कुछ बदल गया था। अपनी छोटी सी दुनिया में खुश रहने वाली लड़की को अब दुनिया के किसी भी हिस्से में किसी खुशी का आभास नहीं हो रहा था। ऐसा लगता था जैसे ये दुनिया संसार महज एक कब्रिस्तान है जहां पर गहरी ख़ामोशी के सिवा अब कुछ नहीं है। दूर दूर तक कोई जीव नहीं है और अगर कोई है तो सिर्फ वो...एकदम अकेली। अनुराधा लाख कोशिश करती थी कि उसके ज़हन में ऐसे ख़्याल न आएं लेकिन ना चाहते हुए भी उसके मन में ऐसे बेरहम ख़्याल आ ही जाते थे और फिर वो उसे रफ़्ता रफ़्ता दुख देते हुए रुलाने लगते थे। इस वक्त भी उसकी आंखें इन्हीं ख़्यालों के चलते नम थीं।

खाली पड़े घर में गहरी ख़ामोशी विद्यमान थी। उससे जब किसी भी तरह से न रहा गया तो वो किसी तरह उठी और फिर चारपाई से उतर कर आंगन की तरफ बढ़ी। सुबह की मंद मंद चलती ठंडी हवा ने उसके चेहरे को स्पर्श किया तो उसे अजीब सा एहसास हुआ। उसके मन में आज कल चौबीसों घंटे द्वंद सा चलता रहता था। हर तरफ उसकी निगाहें वैभव को ही खोजती रहती थीं। हर जगह पर उसे वैभव के होने की उम्मीद होती थी और जब वो उसे नज़र न आता तो एकदम से उसके दिल में एक ऐसी टीस उठती जो उसकी आत्मा तक को दर्द से थर्रा देती थी।

आंगन में खड़े हो कर उसने चारो तरफ निगाह घुमाई। कमज़ोरी की वजह से उससे ज्यादा देर तक खड़े नहीं रहा जा रहा था। सहसा उसके मन में कुछ आया तो वो पलटी। आंगन में जहां पर नर्दा था वहीं पर स्टील का एक लोटा रखा हुआ था। उसने आगे बढ़ कर उस लोटे को उठाया और बाल्टी से लोटे में पानी लिया। अपने सरक गए दुपट्टे को सही करते हुए वो उस दरवाज़े की तरफ बढ़ी जो घर के पीछे की तरफ जाने के लिए था। दरवाज़े को पार करके उसने अपनी मां को आवाज़ दे कर कहा कि वो दिशा मैदान के लिए जा रही है। जवाब में उसकी मां ने कहा ठीक है बेटी सम्हल के जाना।

वापस आंगन में आ कर वो बाहर जाने वाले दरवाज़े की तरफ धीरे धीरे बढ़ चली। कुछ ही देर में वो घर से बाहर आ गई। आस पास नज़र घुमाने के बाद उसकी नज़र उस रास्ते में जम गई जो वैभव के नए बन रहे मकान की तरफ जाता था। उसने धड़कते दिल से एक बार फिर से आस पास देखा और फिर आगे बढ़ चली। वो नहीं जानती थी कि वो इस रास्ते पर क्यों आगे बढ़ी जा रही है? ऐसा लगता था जैसे किसी के वशीभूत हो कर उसके क़दम अपने आप ही उस रास्ते पर पड़ते चले जा रहे थे।

पूरे रास्ते उसके मन में वैभव के ही ख़्याल मानों तरह तरह के ताने बाने बुन रहे थे। वो वैभव के ख़यालों में इतना खो गई थी कि उसे ना तो कमज़ोरी का एहसास हो रहा था और ना ही किसी और बात का। कुछ ही समय में वो वैभव के नए बन रहे मकान के क़रीब पहुंच गई। वहां पर हो रहे हल्के शोर शराबे से उसकी तंद्रा टूटी तो वो एकदम से चौंकी। चकित भाव से उसने चारो तरफ देखा।

"अरे! अनुराधा बहन तुम यहां?" अनुराधा पर नज़र पड़ते ही भुवन जल्दी से उसके पास आ कर बोला____"क्या बात है बहन? कोई काम था क्या?"

"न..न...नहीं...वो म...मैं।" अनुराधा को हड़बड़ाहट में कुछ समझ में ही न आया कि वो क्या कहे____"वो मैं तो....बस ऐसे ही देखने आई थी....यहां।"

"देखने??" भुवन को कुछ समझ न आया____"यहां भला क्या देखने आई हो बहन? यहां देखने लायक अभी कुछ नहीं है लेकिन हां कुछ समय बाद ज़रूर हो जाएगा क्योंकि छोटे ठाकुर का ये मकान पूरी तरह से बन कर तैयार हो जाएगा। उसके बाद इस बंज़र जगह पर भी सब कुछ बहुत अच्छा लगने लगेगा। "

"छ...छोटे...ठाकुर?? अनुराधा की धड़कनें अनायास ही तेज़ हो गईं____"क..क्या व...वो यहीं हैं?"

"नहीं बहन।" भुवन ने कहा____"वो तो यहां नहीं हैं? किसी काम से वो अपनी भाभी जी के साथ चंदनपुर गए हुए हैं।"

"क..कब तक अ..आएंगे...वो?" अनुराधा को भुवन से ये सब पूछने पर बहुत शर्म आ रही थी। उसे ये सोच कर भी शर्म आ रही थी कि उसके ऐसे सवाल करने पर भुवन उसके बारे में क्या सोचेगा।

"कुछ बता कर तो नहीं गए बहन।" भुवन ने बड़ी शालीनता से कहा____"लेकिन मेरा ख़्याल है कि उन्हें वापस आने में शायद कुछ समय तो लग ही जाएगा। अगर ऐसा न होता तो वो मुझे तुम्हारे घर की जिम्मेदारी न देते। ख़ैर ये बताओ, घर में सब ठीक तो है न?"

"ह...हां सब ठीक ही है भैया।" अनुराधा ने अनमने भाव से कहा____"हम ग़रीब लोग हैं, जिस हालत में होते हैं उसी में खुश रहने की कोशिश करते रहते हैं।"

"हां ये तो है बहन।" भुवन ने सिर हिलाते हुए कहा____"वैसे तुम्हारा चेहरा देख कर लगता है कि तुम इस वक्त ठीक नहीं हो। क्या तुम्हारी तबियत सही नहीं है बहन? देखो अगर ऐसा है तो फ़िक्र मत करो। मैं अभी वैद जी को तुम्हारे घर पर ले कर आता हूं।"

"न...नहीं नहीं भैया।" अनुराधा एकदम से हड़बड़ा गई, बोली_____"इसकी कोई ज़रूरत नहीं है। मैं बिल्कुल ठीक हूं।"

"छोटे ठाकुर ने मुझे तुम्हारी और तुम्हारे घर की जिम्मेदारी सौंपी है बहन।" भुवन ने गंभीर भाव से कहा____"इस लिए मैं अपनी जान दे कर भी तुम लोगों का ध्यान रखूंगा। वैसे भी मैंने तुम्हें बहन कहा है तो भाई होने के नाते ये मेरा फर्ज़ भी है कि मैं अपनी बहन का हर तरह से ख़्याल रखूं। तुम्हारा चेहरा देख कर साफ पता चल रहा है कि तुम्हारी तबियत ठीक नहीं है। इस लिए तुम घर जाओ, मैं जल्द से जल्द वैद जी को ले कर तुम्हारे घर आता हूं।"

"मैंने कहा न भैया कि मैं एकदम ठीक हूं।" अनुराधा ने चिंतित और परेशान भाव से कहा____"फिर क्यों ज़िद कर रहे हैं?"

"अगर तुम भी मुझे अपना बड़ा भाई मानती हो तो मेरी बात मान जाओ अनुराधा।" भुवन ने उसी गंभीरता से कहा____"मुझे मेरा फर्ज़ निभाने दो। अगर छोटे ठाकुर को पता चला कि मैंने तुम लोगों की जिम्मेदारी ठीक से नही निभाई है तो बहुत बुरा हो जाएगा।"

अनुराधा को पहली बार एहसास हुआ कि उसने यहां आ कर कितनी बड़ी ग़लती कर दी है। उसे इस बात से परेशानी नहीं थी कि भुवन वैद को ले कर उसके घर आएगा और उसका इलाज़ करवाएगा बल्कि ये सोच कर वो परेशान हो गई थी कि मां को पता चला तो वो क्या सोचेगी उसके बारे में? उसकी मां उससे पूछेगी कि घर में वैद कहां से आया और भुवन नाम का ये आदमी क्यों उसका इलाज़ करवा रहा है? सवाल जब शुरू होंगे तो इस संबंध में और भी सवाल उठ खड़े हों जाएंगे जिनका जवाब दे पाना उसके लिए मुश्किल हो जाएगा। यही सब सोच कर अनुराधा एकदम से चिंतित हो उठी थी। भुवन से वो खुल कर कह भी नहीं सकती थी कि वो ये सब क्यों नहीं चाहती?

भुवन कोई मंदबुद्धि नहीं था जो ये भी न समझता कि अनुराधा यहां आ कर वैभव के बारे में क्यों पूछ रही थी और खुद वैभव ने क्यों उसके घर वालों की उसे जिम्मेदारी सौंपी थी। वो अच्छी तरह इन सब बातों को समझता था लेकिन वो इस सबके लिए कुछ नहीं कर सकता था। ख़ैर उसने ज़ोर दे कर अनुराधा को वापस घर भेजा और खुद मोटर साईकिल में बैठ कर वैद को लेने चला गया।

क़रीब पंद्रह मिनट के अंदर ही भुवन वैद को ले कर अनुराधा के घर पहुंच गया। अनुराधा जो कि पहले से ही परेशान और घबराई हुई थी वो भुवन और वैद को आया देख और भी घबरा गई। उसे ऐसा लगा जैसे अभी ज़मीन फटे और वो उसमें समा जाए लेकिन फूटी किस्मत ऐसा भी न हुआ। सरोज नहा कर आने के बाद खाना बनाने में लग गई थी लेकिन आंगन में अचानक से मर्दों की आवाज़ सुन कर वो फ़ौरन ही रसोई से बाहर आ गई थी। बाहर दो अजनबियों को देख उसे कुछ समझ ना आया।

"काकी ये वैद जी हैं।" सरोज को देख भुवन ने बड़े सम्मान से कहा_____"और मैं भुवन हूं। असल में छोटे ठाकुर किसी काम से बाहर गए हुए हैं इस लिए उन्होंने मुझे इस घर की और इस घर में रहने वालों की ज़िम्मेदारी सौंपी है। मैं आप लोगों का हाल चाल देखने के लिए यहां आता रहता हूं। अभी कुछ देर पहले ही मैं यहां आया था। अनुराधा बहन को देख कर मैं समझ गया कि इसकी तबियत ठीक नहीं है इस लिए मैं वैद को ले कर आया हूं।"

"अच्छा अच्छा।" सरोज को जैसे सब कुछ समझ आ गया इस लिए फिर सामान्य भाव से बोली____"कल रात अनु को बुखार आ गया था बेटा। मेरे पास दवा रखी हुई थी तो रात में इसे दे दिया था। ख़ैर अच्छा किया तुमने जो वैद जी को ले आए।"

भुवन ने जिस तरह से बातें की थी उससे अनुराधा के अंदर की घबराहट दूर हो गई थी। हालाकि वो ये सोच कर चकित भी थी कि भुवन ने उसकी मां को ये क्यों नहीं बताया कि वो वैभव के मकान के पास गई थी। ख़ैर सब कुछ ठीक ठाक देख उसे बड़ी राहत महसूस हुई। उसके बाद वैद ने उसका इलाज़ शुरू किया। कुछ देर वो उसके हाथ की नब्ज़ देखता रहा उसके बाद अपने थैले से कुछ दवाएं निकाल कर सरोज को पकड़ा दिया। दवा के बारे में निर्देश देने के बाद वैद भुवन के साथ बाहर चला गया। सरोज ये सोच कर खुश थी कि वैभव ने अपने न रहने पर भी उनका ख़्याल रखने के लिए कितना इंतजाम किया हुआ है। ये सब सोचते हुए वो खुशी खुशी रसोई में खाना बनाने चली गई।

अनुराधा एक बार फिर से न चाहते हुए भी वैभव के ख़्यालों में खोती चली गई। एक बार फिर से उसके ज़हन में अपनी वो बातें गूंजने लगीं जो उसने वैभव से कहीं थी। वो सोचने लगी कि क्या सच में उसकी बातें इतनी कड़वी थीं कि वैभव को चोट पहुंचा गईं और वो उससे वो सब कह कर चला गया था? क्या सच में उसने बिना सोचे समझे ऐसा कुछ कह दिया है जिसके चलते अब वैभव कभी उसके घर नहीं आएगा? अनुराधा इस बारे में जितना सोचती उतना ही उसे अपने किए पर पछतावा हो रहा था। वो ये सोच कर दुखी हो रही थी कि अब वैभव उसके घर नहीं आएगा और ना ही वो कभी उसकी शक्ल देख सकेगी। अनुराधा के अंदर एक हूक सी उठी और उसकी आंखों से आंसू बह चले। आंखें बंद कर के उसने वैभव को याद किया और उससे माफ़ी मांगने लगी।



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अध्याय - 62

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अब तक....

अनुराधा एक बार फिर से न चाहते हुए भी वैभव के ख़्यालों में खोती चली गई। एक बार फिर से उसके ज़हन में अपनी वो बातें गूंजने लगीं जो उसने वैभव से कहीं थी। वो सोचने लगी कि क्या सच में उसकी बातें इतनी कड़वी थीं कि वैभव को चोट पहुंचा गईं और वो उससे वो सब कह कर चला गया था? क्या सच में उसने बिना सोचे समझे ऐसा कुछ कह दिया है जिसके चलते अब वैभव कभी उसके घर नहीं आएगा? अनुराधा इस बारे में जितना सोचती उतना ही उसे अपने किए पर पछतावा हो रहा था। वो ये सोच कर दुखी हो रही थी कि अब वैभव उसके घर नहीं आएगा और ना ही वो कभी उसकी शक्ल देख सकेगी। अनुराधा के अंदर एक हूक सी उठी और उसकी आंखों से आंसू बह चले। आंखें बंद कर के उसने वैभव को याद किया और उससे माफ़ी मांगने लगी।

अब आगे....

दादा ठाकुर अपने कमरे में लकड़ी की आलमारी खोले उसमें कुछ कर रहे थे। उन्हें शेरा के वापस आने का बड़ी बेसब्री से इंतज़ार था। आलमारी के पल्ले बंद करने के बाद वो पलटे ही थे कि कमरे के दरवाज़े पर किसी की दस्तक से चौंके। निगाह दरवाज़े पर गई तो देखा उनकी धर्म पत्नी देवी और हवेली की ठकुराईन यानी कि श्रीमती सुगंधा देवी चेहरे पर अजीब से भाव लिए खड़ी थीं।

"क्या बात है?" दादा ठाकुर ने उनके चेहरे पर मौजूद भावों को समझने की कोशिश करते हुए पूछा____"सब ठीक तो है न?"

"दरबान ने बताया कि बैठक में शेरा आपका इंतज़ार कर रहा है।" ठकुराईन सुगंधा देवी ने भावहीन लहजे में कहा____"क्या मैं ठाकुर साहब से पूछ सकती हूं कि माजरा क्या है?"

"कोई ख़ास बात नहीं है।" दादा ठाकुर ने बात को टालने की गरज से कहा____"आपको बेवजह चिंता करने की ज़रूरत नहीं है।"

"हम हवेली की ऊंची ऊंची चार दीवारी के अंदर रहते हैं तो इसका मतलब ये नहीं है कि हमें बाहरी दुनियां का कुछ पता ही नहीं है।" ठकुराईन ने तल्खी से कहा____"आप भले ही हमसे कुछ भी नहीं बताते हैं लेकिन इतना तो हम भी समझते हैं कि आज कल किस तरह के हालातों में हमारा पूरा परिवार घिरा हुआ है।"

"फ़िक्र मत कीजिए।" दादा ठाकुर ने दरवाज़े की तरफ बढ़ते हुए कहा____"शेरा से मिलने के बाद हम आपको सब कुछ बता देंगे, तब शायद आपको हमसे शिकायत न रहे।"

ठकुराईन ने दरवाजे से हट कर उन्हें रास्ता दिया तो वो दरवाज़े से निकल कर बाहर बैठक की तरफ बढ़ गए। कुछ ही पलों में वो बैठक में पहुंच गए जहां शेरा पहले से ही सिर झुकाए मौजूद था। अपने ऊंचे सिंहासन पर बैठने के बाद दादा ठाकुर ने जैसे ही शेरा को देखा तो वो बुरी तरह चौंक पड़े। शेरा के चेहरे पर कई जगह चोटों के निशान थे और इतना ही नहीं दाएं तरफ माथे पर खून भी लगा हुआ था।

"तुम्हारी ऐसी हालत कैसे हो गई शेरा?" दादा ठाकुर ने संदेह पूर्ण भाव से पूछा____"और...और जो काम हमने तुम्हें सौंपा था उसका क्या हुआ?"

"माफ़ करना मालिक।" शेरा ने सिर झुकाए हुए ही कहा____"लेकिन बहुत बुरा हो गया है।"

शेरा का इतना कहना था कि दादा ठाकुर को ऐसा लगा जैसे उनकी धड़कनें ही थम गईं हों। कुछ कहते ना बन पड़ा था उनसे। बड़ी मुश्किल से उन्होंने खुद को सम्हाला और फिर थोड़ा सख़्त भाव अख़्तियार करते हुए शेरा से कहा____"ये क्या कह रहे हो तुम? आख़िर क्या बुरा हो गया है? हमें सब कुछ साफ साफ बताओ।"

"म...मालिक।" शेरा ने सहसा दुखी हो कर कहा_____"आपके हुकुम के अनुसार मैं चंदनपुर गया था। वहां पर सच में कुछ लोग छोटे कुंवर को जान से मारने के लिए गए थे लेकिन मेरे और मेरे आदमियों के रहते वो छोटे कुंवर को कोई नुकसान नहीं पहुंचा सके। कुछ लोगों को पकड़ कर मैं वहां से आपके पास आ ही रहा था कि रास्ते में अचानक से कुछ ऐसा हो गया कि हमारे लाख सम्हालने पर भी हालात बिगड़ गए और फिर सब कुछ तबाह हो गया।"

"आख़िर हुआ क्या है शेरा?" दादा ठाकुर का मन बुरी तरह आशंकित हो उठा, बोले_____"पहेलियां बुझाने की बजाय सब कुछ साफ शब्दों में क्यों नहीं बता रहे तुम?"

"म..मालिक।" शेरा की आवाज़ बुरी तरह लड़खड़ाने लगी____"जब मैं और मेरे आदमी चंदनपुर से वापस आ रहे थे तब रास्ते में मैंने देखा कि काफी सारे लोग मझले ठाकुर और बड़े कुंवर पर हमला कर रहे थे। मैं और मेरे आदमियों ने बहुत कोशिश की कि मझले ठाकुर और बड़े कुंवर पर कोई खरोंच तक न आए लेकिन हम अपनी कोशिशों में नाकाम रहे मालिक।"

शेरा से आगे कुछ बोला ही न गया और वो वहीं घुटनों के बल फर्श पर गिर कर तथा अपने दोनों हाथ जोड़ कर रोने लगा। ये पहला अवसर था जब दादा ठाकुर ने अपने उस मुलाजिम को किसी बच्चे की तरह रोते देखा था जिसके चेहरे पर हमेशा पत्थर जैसी कठोरता विद्यमान रहती थी। किसी भारी अनिष्ट की आशंका ने दादा ठाकुर को सिंहासन से फौरन ही उठ जाने पर मजबूर कर दिया। दो ही क़दमों में वो शेरा के पास पहुंचे और झुक कर उसे कंधों से पकड़ कर उठाया।

"क्या हुआ है हमारे भाई और हमारे बेटे को?" फिर उन्होंने शेरा के चेहरे पर दृष्टि जमाते हुए भारी गले से पूछा_____"वो दोनों सकुशल तो हैं न?"

"मुझे माफ़ कर दीजिए मालिक।" शेरा रोते हुए एकदम से दादा ठाकुर के पैरों में ही गिर पड़ा_____"मैं उन दोनों की रक्षा नहीं कर सका। दुश्मनों ने उन दोनों को.....।"

"शेरा.....।" दादा ठाकुर इतना जोर से दहाड़े कि बैठक की दीवारें तक हिल गईं_____"य...ये क्या कह रहे हो तुम? नहीं नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। ऐसा कुछ भी नहीं हो सकता। कह दो कि ये सब झूठ है वरना, कसम भवानी की हम तुम्हारी खाल में भूसा भर देंगे।"

"मुझे मृत्यु दण्ड दे दीजिए मालिक।" शेरा उनके पैरों में मानों लोट ही गया_____"ऐसे गुलाम को जीने का कोई अधिकार नहीं है जो अपने मालिकों की रक्षा न कर सके।"

दादा ठाकुर को पहली बार ऐसा लगा जैसे उनके सिर पर एकाएक पूरा आसमान भरभरा कर गिर पड़ा है। दोनों टांगों में खड़े रहने की ताकत न रही। उनका भारी भरकम और हट्टा कट्टा शरीर किसी कटे हुए पेड़ की तरह लहराया और अभी वो गिरने ही वाले थे कि शेरा ने फौरन ही उठ कर उन्हें सम्हाल लिया। शेरा की हालत खुद भी बहुत ख़राब थी। दुख और संताप उसके चेहरे पर मानो कुंडली मार कर बैठ गए थे। चेहरा आंसुओं से तर था।

"हमें उनके पास ले चलो।" शेरा के कानों में दादा ठाकुर की बदहवास सी आवाज़ पड़ी____"जल्दी ले चलो शेरा। हम भी उन्हीं के साथ मर जाना चाहते हैं। हमारे दुश्मन अभी भी वहां मौजूद होंगे न? बिल्कुल होंगे, शायद हमारे आने की राह देख रहे होंगे। हम उन्हें ज़्यादा इंतज़ार नहीं कराना चाहते शेरा। जल्दी ले चलो हमें।"

दादा ठाकुर की हालत पागलों जैसी नज़र आने लगी थी। शेरा ने आज से पहले कभी उन्हें इस तरह विचलित होते नहीं देखा था। रौबदार चेहरे पर हमेशा एक अलग ही तरह का तेज़ देखा था उसने लेकिन इस वक्त उनके चेहरे पर न तेज़ था और ना ही कोई रौब था। अगर कुछ था तो सिर्फ संताप और पागलपन। उनकी ऐसी दशा देख कर शेरा का हृदय मानो हाहाकार कर उठा। आंखों से बहने वाले आंसू मानों पूरे वेग में बहने लगे थे। अभी वो कुछ कहने ही वाला था कि तभी अंदर से भागते हुए ठकुराईन सुगंधा देवी और साथ ही जगताप की पत्नी मेनका और कुसुम भी आ गईं। दादा ठाकुर को ऐसी हालत में देख वो एकदम से बुत सी बन गईं। फिर जैसे एकाएक उनमें जान आई तो ठकुराईन लपक कर दादा ठाकुर के पास आईं।

"क्या हुआ है इन्हें?" ठकुराईन ने बुरी तरह घबरा कर शेरा से पूछा_____"ये इतना ज़ोर से क्यों चिल्लाए थे अभी? आख़िर ऐसा क्या हुआ है शेरा जिसके चलते इनकी ये हालत हो गई है?"

बेचारा शेरा, उसे समझ में ही न आया कि वो हवेली की ठकुराईन को क्या जवाब दे। वो दादा ठाकुर को सम्हाले बस रोए जा रहा था। उसके रोने से ठकुराइन के साथ साथ बाकी सब भी घबरा ग‌ईं। मन में तरह तरह के खयाल उभरने लगे।

"कुछ नहीं हुआ है हमें।" दादा ठाकुर ने शेरा से अलग हो कर सामान्य भाव से कहा____"आप सब अंदर जाएं। हम आते हैं कुछ देर में, चलो शेरा।"

इससे पहले कि ठकुराईन उनसे कुछ पूछतीं दादा ठाकुर तेज़ कदमों से बाहर निकल गए। उनके पीछे ठकुराईन, मेनका और कुसुम भौचक्की सी हालत में खड़ी रह गईं थी। बाहर आते ही दादा ठाकुर ने वहां मौजूद दरबानों को शख़्त आदेश दिया कि ना तो कोई हवेली से बाहर जाने पाए और ना ही कोई बाहरी हवेली में आने पाए।

इसके पहले जहां दादा ठाकुर के चेहरे पर विक्षिप्तता और पागलपन के भाव थे वहीं अब वो फिर से भाव हीन नज़र आने लगे थे। जीप में शेरा के बगल से बैठने के बाद उन्होंने आगे बढ़ने का हुकुम दिया तो शेरा ने जीप को आगे बढ़ा दिया। शेरा के इशारे पर जीप में दो चार आदमी भी बैठ गए थे जिनके हाथों में बंदूखें थीं।

अभी वो जीप में बैठे हाथी दरवाज़े के पास ही पहुंचे थे कि सामने से मुंशी चंद्रकांत अपने बेटे रघुवीर के साथ तेज़ क़दमों से आता नज़र आया। उन दोनों के पीछे गांव के कुछ लोग भी थे।

"मालिक, ये क्या गज़ब हो गया?" मुंशी दादा ठाकुर को देखते ही मानो हाहाकार कर उठा____"दुश्मनों ने मझले ठाकुर और हमारे होने वाले युवराज को.....।"

"जीप में बैठिए मुंशी जी।" दादा ठाकुर ने सपाट लहजे में कहा_____"और रघुवीर तुम इसी वक्त भिवाड़ी जाओ और वहां पर ठाकुर अर्जुन सिंह को हमारा संदेशा दो कि जितना जल्दी हो सके वो अपने आदमियों के साथ हमारे पास आएं।"

"जो हुकुम दादा ठाकुर।" रघुवीर ने अदब से हाथ जोड़ कर कहा और पलट कर चला गया। उसके जाते ही जीप आगे बढ़ चली।

पूरे गांव में ये ख़बर जंगल की आग की तरह फैलती चली गई कि हवेली के ठाकुरों के साथ किसी ने बहुत बुरा किया है। हवेली और दादा ठाकुर के चाहने वाले भागते हुए हवेली की तरफ ही आ रहे जिन्हें रास्ते में ही दादा ठाकुर ने रोक लिया। दादा ठाकुर को देख कर गांव के आए हुए लोग बुरी तरह बिलख बिलख कर रोने लगे थे। दादा ठाकुर ने उन्हें किसी तरह शांत किया और कहा कि सब अपने अपने घर जाएं। जिस किसी ने भी ये सब किया है उसे मौत से कम सज़ा हर्गिज़ नहीं दी जाएगी। दादा ठाकुर ने गांव के कुछ भरोसेमंद लोगों को हवेली जा कर वहां पर सुरक्षा करने के लिए कहा और बाकियों को घर जाने को कहा मगर वो लोग वापस घर जाने को तैयार ना हुए। सबका कहना था कि वो उनके साथ ही रहेंगे। असल में उन्हें डर था कि दुश्मन कहीं दादा ठाकुर पर हमला न करे इस लिए वो अपने देवता की रक्षा करना चाहते थे।

✮✮✮✮

चंदनपुर जाने वाले रास्ते के एक तरफ जंगल था तो दूसरी तरफ पथरीली ज़मीन। कच्ची सड़क के किनारे किनारे लगभग दो किलो मीटर तक नदी चल रही थी। ये नदी आस पास के कई गावों से हो कर गुज़रती थी और इसी नदी के द्वारा किसान लोग खेतों में सिंचाई भी करते थे। हालाकि गांव के जो थोड़ा बहुत संपन्न थे उन लोगों ने अपने खेतों पर ट्यूब बेल लगवा रखा था, ये अलग बात है कि बिजली के ज़्यादा न रहने पर उन्हें ट्यूब बेल से सिंचाई करने का ज़्यादा अवसर नहीं मिल पाता था।

दादा ठाकुर का काफ़िला इसी जगह पर आ कर रुका। एक तरफ जंगल और दूसरी तरफ नदी और नदी के उस पार पथरीली बंज़र ज़मीन। दूर दूर तक कोई गांव नज़र नहीं आता था। हालाकि नदी के उस पार की ज़मीन कुछ सरकार की थी और कुछ दूसरे गांव के ठाकुरों की किंतु ज़मीन से कोई उपज न होने के चलते इस तरफ आना जाना कम ही होता था। दुश्मनों ने अपने शिकार का शिकार करने के लिए बिल्कुल सही जगह का चुनाव किया था।

जीप के रुकते ही दादा ठाकुर नीचे उतरे। मन में आंधियां सी चल रहीं थी और दिल में अथाह पीड़ा भी हो रही थी किंतु किसी तरह खुद को सम्हाले वो उस तरफ चल पड़े जहां पर लाशें पड़ी हुईं थी। सड़क के किनारे जंगल की तरफ क़रीब दस लाशें पड़ी थीं। कुछ लाशें सड़क के दूसरी तरफ नदी के किनारे पर भी पड़ीं थी। कुछ दूरी पर सड़क पर ही दो जीपें खड़ी थीं। जीप के आस पास तीन लोग मरे पड़े थे जबकि जीप के पीछे तरफ जो दो लोग लहू लुहान हालत में अचेत से पड़े थे उन पर नज़र पड़ते ही दादा ठाकुर के क़दम लड़खड़ा गए। न चाहते हुए भी उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े।

दादा ठाकुर ने स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि उन्हें एक दिन इतना बुरा और इतना भयानक दिन भी देखना पड़ जाएगा। बोझिल क़दमों के साथ वो उन दोनों लोगों के पास पहुंचे। जीप के दाहिने पहिए के पास जगताप लहू लुहान पड़ा था जबकि बाएं पहिए से क़रीब दो क़दम की दूरी पर अभिनव पड़ा था। अपने छोटे भाई और अपने बड़े बेटे को इस हालत में देख कर दादा ठाकुर चाह कर भी खुद को सम्हाला न सके। यूं लगा जैसे घुटनें टूट गए हों और वो ज़मीन पर घुटनों के बल जा गिरे। जी किया कि दोनों के लहू लुहान जिस्मों को अपने कलेजे से लगा कर इतना ज़ोर से रोएं कि उनके रुदन से आसमान का कलेजा भी दहल जाए।

"इसके लिए तो इजाज़त नहीं दी थी हमने।" जगताप के सिर को थाम कर दादा ठाकुर ने भारी गले से कहा_____"फिर क्यों हमारी इजाज़त के बिना हमें अकेला छोड़ गए तुम?"

दादा ठाकुर की आंखों से आंसू बह रहे थे और उन्हें ये सब कहते हुए रोता देख बाकी सब भी रोने लगे थे। पास ही खड़ा मुंशी चंद्रकांत भी रो रहा था। उससे जब न रहा गया तो उसने पीछे से दादा ठाकुर को सम्हाल लिया।

"खुद को सम्हालिए मालिक।" मुंशी दुखी भाव से बिलखते हुए बोला____"आप ही हिम्मत हार जाएंगे तो बाकी सबका क्या होगा?"

"सही कह रहे हो तुम।" दादा ठाकुर ने अजीब भाव से कहा____"हमें हिम्मत नहीं हारना चाहिए। हमें तो अपने दिल पर पत्थर रख कर आगे बढ़ना चाहिए। जिस किसी ने भी ये किया है उसे ऐसी मौत देनी चाहिए कि ऊपर बैठे फरिश्तों का भी कलेजा दहल जाए।"

वातावरण में कुछ लोगों की आवाज़ों का शोर हुआ तो सबका ध्यान शोर की तरफ गया। गांव के लोग भागते हुए इस तरफ ही आ रहे थे। कुछ जीपें और कुछ मोटर साईकिल भी आती हुई दिख रहीं थी। दादा ठाकुर ने खुद को किसी तरह सम्हाला और फिर जगताप को छोड़ अपने बेटे की तरफ बढ़े।

अभिनव के जिस्म के दो हिस्सों में गोली लगी थी। एक गोली सीने में तो दूसरी पेट के बाएं तरफ। ज़ाहिर था बचना मुश्किल था। जिस्म एकदम से ठंडा पड़ गया था उसका। अपने बेटे को बेजान पड़ा देख दादा ठाकुर की आंखों से एक बार फिर आंसू बह चले। आंखों के सामने अभिनव का हंसता मुस्कुराता हुआ चेहरा घूम गया और साथ ही वो सब भी जो अब तक हुआ था।

"ये कैसा दिन दिखा दिया बेटे?" फिर वो अभिनव के चेहरे पर हाथ फेरते हुए करुण भाव से बोल पड़े____"अच्छा होता कि तुम्हें इस हालत में देखने से पहले ऊपर वाला हमें मौत दे देता। अपने कंधे में अब तुम्हारा बोझ कैसे उठा सकेंगे हम? हवेली में तुम्हारी मां को क्या जवाब देंगे हम और......और उसे क्या जवाब देंगे जो हर बात से बेख़बर चंदनपुर में है? नहीं नहीं, हम में किसी को भी जवाब देने की हिम्मत नही है।"

दादा ठाकुर जाने क्या क्या कहते हुए रो पड़े। माहौल इतना भयावह और गमगीन हो गया था कि किसी में भी दादा ठाकुर को सम्हाले की कूवत नहीं रही। कुछ ही देर में लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा। वातावरण में चीखों पुकार मच गया। गांव से सिर्फ मर्द लोग ही नहीं आए थे बल्कि उनमें औरतें भी थीं जो ये सब देख कर बुरी तरह रो रहीं थी। दूसरे गांव से जीपों में दादा ठाकुर के चाहने वाले आए थे जो खुद भी ठाकुर थे और दादा ठाकुर की ही तरह संपन्न थे। उन लोगों ने दादा ठाकुर को सम्हाला और इस हादसे के लिए उनसे जो हो सकेगा करने का वादा किया।

"य....ये ज़िंदा हैं मालिक।" अचानक ही फिज़ा में कोई चिल्लाया तो सबके सब तेज़ी से पलटे। सबकी नज़रें मुंशी चंद्रकांत पर जा कर ठहर गईं जो जगताप के पास बैठा था। दादा ठाकुर के बेजान से जिस्म में मानों एकदम से नई शक्ति का संचार हुआ और वो भागते हुए उसके पास पहुंचे।

"क्या सच कह रहे हैं मुंशी जी?" दादा ठाकुर ने व्याकुल भाव से किंतु खुशी ज़ाहिर करते हुए पूछा।

"हां मालिक।" मुंशी ने बड़े जोशीले भाव से कहा_____"मझले ठोकर का शरीर वैसा ठंडा नहीं है जैसे बेजान जिस्म ठंडा पड़ जाता है। इनकी धड़कनें भी चल रही हैं।"

मुंशी की बात ने मानों सबके बीच एक अलग ही माहौल पैदा कर दिया। दादा ठाकुर ने झपट कर जगताप के दाहिने हाथ की नब्ज़ पकड़ ली और साथ ही अपना दूसरा हाथ उसके सीने पर रख दिया। कुछ देर वो चुप रहे और फिर एकदम से उनके चेहरे पर चमक आ गई।

"मुंशी जी ने सही कहा अर्जुन सिंह।" दादा ठाकुर ने पास ही खड़े एक व्यक्ति की तरफ देख कर खुशी से कहा_____"हमारा भाई जगताप ज़िंदा है। इसे गोली ज़रूर लगी हैं लेकिन हमारा जगताप जिंदा है।" कहने के साथ ही वो शेरा की तरफ पलटे_____"फ़ौरन जीप ले कर आओ शेरा। इसे फ़ौरन शहर ले जाना होगा।"

शेरा में भी जैसे नई जान आ गई थी। वो भाग कर गया और जीप को पास ले आया। दादा ठाकुर ने खुद जगताप को दोनों हाथों से उठाया और उसे जीप में बैठा दिया। जगताप को दो गोलियां लगीं थी। एक जांघ में तो दूसरी पेट के दाईं तरफ। खून काफी बह गया था लेकिन सांसें अभी भी बाकी थी उसमें जोकि किसी चमत्कार से कम नहीं था। ज़ख्मों से खून अभी भी बह रहा था इस लिए दादा ठाकुर ने अपना गमछा लगा दिया था ज़ख्म पर।

"ठाकुर साहब।" अर्जुन सिंह नाम के आदमी ने कहा_____"हम भी आपके साथ शहर चलेंगे। दुश्मन का कोई भरोसा नहीं है इस लिए हम आपको अकेले कहीं जाने नहीं दे सकते।"

दादा ठाकुर ने उसकी बात पर सहमति जताई। जैसे ही जीप आगे बढ़ी तभी वहां पर पुलिस की लाल बत्ती लगी हुई दो जीपें आ कर रुकीं। फ़ौरन ही जीपों से पुलिस के अधिकारी बाहर निकले। समय क्योंकि ज़्यादा नही था इस लिए दादा ठाकुर उन्हें मामले के बारे में थोड़ा बहुत बता कर शहर की तरफ निकल लिए। इधर बाकी की कार्यवाही पुलिस की निगरानी में होने लगी।

✮✮✮✮

दादा ठाकुर की जीप पूरे वेग से शहर की तरफ दौड़ी जा रही थी। जीप की कमान शेरा के हाथ में थी, जबकि अर्जुन सिंह उसके बगल में बंदूक लिए बैठा था। जीप की पिछली सीट पर दादा ठाकुर बैठे थे। अपने भाई जगताप को उन्होंने अपनी गोंद में ले रखा था और बार बार पुकार कर उसे होश में लाने का प्रयास कर रहे थे। एक तरफ जहां उन्हें अपने बेटे को खो देने का असहनीय दुख था तो वहीं दूसरी तरफ अपने भाई के ज़िंदा होने की खुशी भी थी। ये अलग बात है कि ये खुशी जगताप के होश में न आने से प्रतिपल फीकी पड़ती जा रही थी। वो बार बार शेरा को और तेज़ जीप चलाने को भी कहते जा रहे थे, जबकि उन्हें भी ये एहसास था कि कच्ची सड़क पर जीप पहले से ही ज़रूरत से ज़्यादा तेज़ चल रही थी।

अर्जुन सिंह बार बार पलट कर दादा ठाकुर को धीरज दे रहा था। अचानक दादा ठाकुर पूरी शक्ति से चीख पड़े। ये उनकी चीख का ही असर था कि शेरा ने ज़ोर से जीप के ब्रेक पैडल पर अपना पांव जमा दिया जिससे जीप तेज़ आवाज़ करते हुए रुकती चली गई। दादा ठाकुर की इस भयानक चीख से अर्जुन सिंह भी बुरी तरह चौंक पड़ा था। जीप के रुकते ही उसने और शेरा ने एकसाथ पलट कर पीछे देखा। दादा ठाकुर अपने छोटे भाई जगताप को अपने सीने से लगाए रोए जा रहे थे।

"क्या हुआ ठाकुर साहब?" अर्जुन सिंह समझ तो गया लेकिन फिर भी पूछे बगैर न रह सका।

"हमारे बेटे की तरह ये भी हमें छोड़ कर चला गया अर्जुन सिंह।" दादा ठाकुर ने करुण भाव से आंसू बहाते हुए कहा____"इसे भी हमारे बेटे की तरह हम पर तरस नहीं आया कि अब हम कैसे इन दोनों के बिना जी पाएंगे?"

"धीरज से काम लीजिए ठाकुर साहब।" अर्जुन सिंह ने अधीर भाव से कहा_____"आप जैसे इंसान को इस तरह विलाप करना शोभा नहीं देता।"

"क्यों? क्यों शोभा नहीं देता अर्जुन सिंह?" दादा ठाकुर जैसे चीख ही पड़े_____"क्या हम इंसान नहीं हैं या फिर हमारे सीने में धड़कता हुआ दिल नहीं है? क्या तुम्हें एहसास नहीं है कि इस वक्त हम किस हालत में हैं?"

"मुझे हर बात का बखूबी एहसास है ठाकुर साहब।" अर्जुन सिंह ने कहा____"मैं अच्छी तरह समझता हूं कि इस वक्त आप बहुत ही ज़्यादा दुखी हैं और यकीन मानिए आपकी तरह मैं भी इस सबसे दुखी हूं लेकिन इसके बावजूद हमें इस असहनीय दुख को जज़्ब कर के बड़े धैर्य के साथ आगे के बारे में सोचना होगा। जो हो गया वो किसी के दुखी होने से या विलाप करने से ठीक नहीं हो जाएगा। इस लिए आपको धीरज से काम लेना होगा और बहुत ही समझदारी से इसके आगे क्या करना है सोचना होगा।"

"कहना आसान है अर्जुन सिंह।" दादा ठाकुर ने दुखी और हताश भाव से कहा____"लेकिन अमल करना बहुत मुश्किल है। एक झटके में हमने अपने जिगर के टुकड़ों को खो दिया है। आख़िर कैसे हम इस दुख को हजम कर जाएं? अब तो ये सोच कर ही हमारी रूह कांपी जा रही है कि हवेली में सबसे क्या कहेंगे और जब इस बारे में उन्हें पता चलेगा तो क्या होगा? नहीं नहीं अर्जुन सिंह, हम उस सबको ना तो देख सकेंगे और ना ही सह पाएंगे। जी करता है अभी इसी वक्त ये ज़मीन फट जाए और हम उसमें समा जाएं।"

"मैं आपकी मनोदशा को बखूबी समझता हूं ठाकुर साहब।" अर्जुन सिंह ने कहा____"लेकिन किसी न किसी तरह हर चीज़ का सामना तो करना ही पड़ेगा और सबको सम्हालना भी पड़ेगा। दूसरी सबसे ज़रूरी बात ये भी सोचनी होगी कि जिसने भी ये सब किया है उसके साथ क्या करना है।"

"अब तो नर संघार होगा अर्जुन सिंह।" दादा ठाकुर के हलक से एकाएक गुर्राहट निकली____"अभी तक हम चुप थे लेकिन अब हमारे दुश्मन हमारा वो रूप देखेंगे जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी न की होगी। एक एक को अपनी जान दे कर इस सबकी कीमत चुकानी होगी।"

कहने के साथ ही दादा ठाकुर ने शेरा को वापस चलने का हुकुम दिया। इस वक्त उनके चेहरे पर बड़े ही खूंखार भाव नज़र आ रहे थे। दादा ठाकुर को अपने जलाल पर आया देख अर्जुन सिंह पहले तो सहम सा गया लेकिन फिर राहत की सांस ली। जीप वापस हवेली की तरफ चल पड़ी थी। वातावरण में एक अजीब सी सनसनी जैसे माहौल का आभास होने लगा था। ऊपर वाला ही जाने कि आने वाले समय में अब क्या होने वाला था?



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अध्याय - 63

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अब तक....



"अब तो नर संघार होगा अर्जुन सिंह।" दादा ठाकुर के हलक से एकाएक गुर्राहट निकली____"अभी तक हम चुप थे लेकिन अब हमारे दुश्मन हमारा वो रूप देखेंगे जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी न की होगी। एक एक को अपनी जान दे कर इस सबकी कीमत चुकानी होगी।"




कहने के साथ ही दादा ठाकुर ने शेरा को वापस चलने का हुकुम दिया। इस वक्त उनके चेहरे पर बड़े ही खूंखार भाव नज़र आ रहे थे। दादा ठाकुर को अपने जलाल पर आया देख अर्जुन सिंह पहले तो सहम सा गया लेकिन फिर राहत की सांस ली। जीप वापस हवेली की तरफ चल पड़ी थी। वातावरण में एक अजीब सी सनसनी जैसे माहौल का आभास होने लगा था। ऊपर वाला ही जाने कि आने वाले समय में अब क्या होने वाला था?



अब आगे....



दादा ठाकुर के पहुंचने से पहले ही हवेली तक ये ख़बर जंगल में फैलती आग की तरह पहुंच गई थी कि जगताप और अभिनव को हवेली के दुश्मनों ने जान से मार डाला है। बस फिर क्या था, पलक झपकते ही हवेली में मानों कोहराम मच गया था। नारी कंठों से दुख-दर्द और करुणा से मिश्रित चीखें पूरी हवेली को मानों दहलाने लगीं थी। हवेली की ठकुराईन सुगंधा देवी, मझली ठकुराईन मेनका देवी, और हवेली की लाडली बेटी कुसुम इन सबका मानों बुरा हाल हो गया था। जगताप के दोनों बेटे विभोर और अजीत भी रो रहे थे और सबको सम्हालने की कोशिश कर रहे थे। हवेली में काम करने वाली नौकरानियां और नौकर सब के सब इस घटना के चलते दुखी हो कर रो रहे थे।

उस वक्त तो हवेली में और भी ज़्यादा हाहाकार सा मच गया जब दादा ठाकुर हवेली पहुंचे। उन्हें बखूबी एहसास था कि जब वो हवेली पहुंचेंगे तो उन्हें बद से बद्तर हालात का सामना करना पड़ेगा और साथ ही ऐसे ऐसे सवालों का भी जिनका जवाब दे पाना उनके लिए बेहद मुश्किल होगा। अंदर से तो अब भी उनका जी चाह रहा था कि औरतों की तरह दहाड़ें मार मार कर रोएं मगर बड़ी मुश्किल से उन्होंने अपने जज़्बातों को कुचल कर खुद को जैसे पत्थर का बना लिया था। पूरा नरसिंहपुर हवेली के बाहर जमा था, जिनमें मर्द और औरतें तो थीं ही साथ में बच्चे भी शामिल थे। सबके सब रो रहे थे। जैसे जैसे ये ख़बर फैलती हुई लोगों के कानों तक पहुंच रही थी वैसे वैसे हवेली के चाहने वाले हवेली की तरफ दौड़े चले आ रहे थे।

"कहां है हमारा बेटा जगताप और अभिनव?" दादा ठाकुर अभी बैठक में दाखिल ही हुए थे कि अचानक उनके सामने सुगंधा देवी किसी जिन्न की तरह आ गईं और रोते हुए उनसे मानों चीख पड़ीं____"आप उन दोनों को सही सलामत अपने साथ क्यों नहीं ले आए?"

दादा ठाकुर ने कोई जवाब नहीं दिया। असल में वो जवाब देने की मानसिकता में थे ही नहीं। उनके अंदर तो इस वक्त भयानक चक्रवात सा चल रहा था जिसे वो किसी तरह सम्हाले हुए थे। उनके साथ दूसरे गांव का उनका मित्र अर्जुन सिंह भी था और साथ ही कुछ और भी लोग जिनसे उनके घनिष्ट सम्बन्ध थे।

"आप चुप क्यों हैं?" जब दादा ठाकुर कुछ न बोले तो ठकुराईन सुगंधा देवी बिफरे हुए अंदाज़ में चीख पड़ीं_____"आप बोलते क्यों नहीं कि हमारे बेटे कहां हैं? क्या हमें इतना भी हक़ नहीं है कि अपने बेटों के मुर्दा जिस्मों से लिपट कर रो सकें? आप इतने पत्थर दिल कैसे हो सकते हैं दादा ठाकुर? क्या उनके लहू लुहान जिस्मों को देख कर भी आपका कलेजा नहीं फटा?"

"खुद को सम्हालिए ठकुराईन।" अर्जुन सिंह ने बड़े धैर्य से कहा_____"ठाकुर साहब पर ऐसे शब्दों के वार मत कीजिए। वो अंदर से बहुत दुखी हैं।"

"नहीं, हर्गिज़ नहीं।" सुगंधा देवी इस बार गुस्से से चीख ही पड़ीं_____"ये किसी बात से दुखी नहीं हो सकते क्योंकि इनके सीने में जज़्बातों से भरा दिल है ही नहीं। ये भी अपने बाप पर ग‌ए हैं जिन्हें लोगों को दुख और कष्ट देने में ही खुशी मिलती थी। हमने न जाने कितनी बार इनसे पूछा था कि हवेली के बाहर आख़िर ऐसा क्या चल रहा है जिसके चलते हमारे अपनों के साथ ऐसी घटनाएं हो रहीं हैं लेकिन ये हमेशा हमसे सच को छुपाते रहे। अगर हम कहें कि जगताप और अभिनव की मौत के सिर्फ और सिर्फ आपके ये ठाकुर साहब ही जिम्मेदार हैं तो ग़लत न होगा। इनकी चुप्पी और बुजदिली के चलते आज हमने अपने शेर जैसे दोनों बेटों को खो दिया है।"

कहने के साथ ही सुगंधा देवी फूट फूट कर रो पड़ीं। उनके जैसा ही हाल मेनका और कुसुम का भी था। दोनों के मन में कहने के लिए तो बहुत कुछ था मगर दादा ठाकुर से कभी जुबान नहीं लड़ाया था इस लिए ऐसे वक्त में भी कुछ न कह सकीं थी। बस अंदर ही अंदर घुटती रहीं। इधर सुगंधा देवी की बातों से दादा ठाकुर के अंदर जो पहले से ही भयंकर चक्रवात चल रहा था वो और भी भड़क उठा। इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता वो तेज़ी से अंदर की तरफ बढ़ते चले गए। कुछ देर में जब वो लौटे तो उनके हाथ में बंदूक थी और आंखों में धधकते शोले। उनके तेवर देख सबके सब दहल से गए। अर्जुन सिंह फ़ौरन ही उनके पास गए।

"नहीं ठाकुर साहब, ऐसा मत कीजिए।" अर्जुन सिंह ने कहा_____"अभी ऐसा करना कतई उचित नहीं है। हमें सबसे पहले ये पता करना होगा कि मझले ठाकुर जगताप और बड़े कुंवर अभिनव पर किसने हमला किया था?"

"अब किसी बात का पता करने का वक्त नहीं रहा अर्जुन सिंह।" दादा ठाकुर गुस्से में गुर्राए____"अब तो सिर्फ एक ही बात होगी और वो है_____नर संघार। हमें अच्छी तरह पता है कि ये सब किसने किया है, इस लिए अब उनमें से किसी को भी इस दुनिया में जीने का हक नहीं रहा।"

"माना कि आपको सब पता है ठाकुर साहब।" अर्जुन सिंह ने कहा_____"लेकिन इसके बावजूद इस वक्त आपको ऐसा रुख अख्तियार करना उचित नहीं है। इस वक्त हवेली में आपका रहना बेहद ज़रूरी है और इस सबकी वजह से जो दुखी हैं उनको सांत्वना देना आपका सबसे पहला कर्तव्य है। एक और बात, हवेली के बाहर इस वक्त सैकड़ों लोग जमा हैं, वो सब आपके चाहने वाले हैं और इस सबकी वजह से वो सब भी दुखी हैं। उन सबको शांत कीजिए, समझाइए और उन्हें वापस घर लौटने को कहिए। इसके बाद ही आपको कोई क़दम उठाने के बारे में सोचना चाहिए।"

अर्जुन सिंह की बातों ने दादा ठाकुर के अंदर मानों असर डाला। जिसके चलते उनके अंदर का गुस्सा थोड़ा शांत हुआ और फिर वो बैठक से बाहर आ गए। हवेली के सामने विसाल मैदान पर लोगों की भीड़ को देखते हुए उन्होंने बड़े ही शांत भाव का परिचय देते हुए उन सबका पहले तो अभिवादन किया और फिर सबको लौट जाने का आग्रह किया। आख़िर दादा ठाकुर के ज़ोर देने पर सब एक एक कर के जाने लगे किंतु बहुत से ऐसे अपनी जगह पर ही मौजूद रहे जो दादा ठाकुर के कहने पर भी नहीं गए। उनका कहना था कि जब तक हवेली के दुश्मनों को ख़त्म नहीं कर दिया जाएगा तब तक वो कहीं नहीं जाएंगे और खुद भी दुश्मनों को ख़त्म करने के लिए दादा ठाकुर के साथ रहेंगे।

वक्त और हालात की गंभीरता को देखते हुए अर्जुन सिंह ने बहुत ही होशियारी से दादा ठाकुर को कोई भी ग़लत क़दम उठाने से रोक लिया था और साथ ही हवेली की सुरक्षा व्यवस्था के लिए आदमियों को लगा दिया था। अपने एक दो आदमियों को उन्होंने अपने गांव से और भी कुछ आदमियों को यहां लाने का आदेश दे दिया था।

गांव के जो लोग रह गए थे उन्हें ये कह कर वापस भेज दिया गया था कि जल्दी ही उन्हें दुश्मनों को ख़त्म करने का अवसर दिया जाएगा। सब कुछ व्यवस्थित करने के बाद अर्जुन सिंह दादा ठाकुर को बैठक में ले आए। इस वक्त बैठक में कई लोग थे जो गंभीर सोच के साथ बैठे हुए थे। इधर दादा ठाकुर के चेहरे पर रह रह कर कई तरह के भाव उभरते और फिर लोप हो जाते। उनकी आंखों के सामने बार बार अपने छोटे भाई जगताप और उनके बेटे अभिनव का चेहरा उजागर हो जाता था जिसके चलते उनकी आंखें नम हो जाती थीं। ये वो ही जानते थे कि इस वक्त उनके दिल पर क्या बीत रही थी।

शहर से पुलिस विभाग के कुछ आला अधिकारी भी आए हुए थे जो ऐसे अवसर पर दादा ठाकुर को यही सलाह दे रहे थे कि खुद को नियंत्रित रखें। असल में कानून के इन नुमाइंदों को अंदेशा ही नहीं बल्कि पूरा यकीन था कि जो कुछ भी हुआ है उसके बाद बहुत कुछ अनिष्ट हो सकता है जोकि ज़ाहिर है दादा ठाकुर के द्वारा ही होगा इस लिए वो चाहते थे कि किसी भी तरह का अनिष्ट न हो। जगताप और अभिनव के मृत शरीरों की जांच करने के लिए उन्होंने अपने कुछ पुलिस वालों के साथ शहर भेज दिया था। हालाकि दादा ठाकुर ऐसा बिलकुल भी नहीं चाहते थे किंतु आला अधिकारियों के अनुनय विनय करने से उन्हें मानना ही पड़ा था।



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"नहीं, ये नहीं हो सकता।" शेरा के मुख से सारी बातें सुनते ही मैं हलक फाड़ कर चीख पड़ा था और साथ ही शेरा का गिरेबान पकड़ कर गुस्से से बोल पड़ा_____"कह दो कि ये सब झूठ है। कह दो कि मेरे चाचा जी और मेरे भैया को कुछ नहीं हुआ है।"

बेचारा शेरा, आंखों में आसूं लिए कुछ बोल ना सका। उसे यूं चुप देख मेरा खून खौल उठा। दिलो दिमाग़ में बुरी तरह भूचाल सा आ गया। मारे गुस्से के मैंने शेरा को ज़ोर का धक्का दिया तो वो फिसलते हुए पीछे जा गिरा। उसने उठने की कोई कोशिश नहीं की। इधर मैं उसी गुस्से में आगे बढ़ा और झुक कर उसे उसका गिरेबान पकड़ कर उठा लिया।

"तुम्हारी ज़ुबान ख़ामोश क्यों है?" मैं ज़ोर से चीखा____"बताते क्यों नहीं कि किसी को कुछ नहीं हुआ है?"

घर के बाहर इस तरह का शोर शराबा सुन कर अंदर से सब भागते हुए बाहर आ गए। मुझे किसी आदमी के साथ इस तरह पेश आते देख सबके सब बुरी तरह चौंक पड़े थे।

"रुक जाइए वैभव महाराज।" वीरेंद्र फौरन ही मेरे क़रीब आ कर बोला____"ये क्या कर रहे हैं आप और ये आदमी कौंन है? इसने ऐसा क्या कर दिया है जिसके लिए आप इसके साथ इस तरह से पेश आ रहे हैं?"

वीरेंद्र के सवालों से आश्चर्यजनक रूप से मुझ पर प्रतिक्रिया हुई। मेरी हरकतों में एकदम से विराम सा लग गया। आसमान से गिरी बिजली जो कहीं ऊपर ही अटक गई थी वो अब जा कर मेरे सिर पर पूरे वेग से गिर पड़ी थी। ऐसा लगा जैसे जिस जगह पर मैं खड़ा था उस जगह की ज़मीन अचानक से धंस गई है और मैं उसमें एकदम से समा गया हूं। आंखों के सामने अंधेरा सा छा गया और इससे पहले कि चक्कर खा कर मैं वहीं गिर पड़ता वीरेंद्र ने जल्दी से मुझे सम्हाल लिया।

मेरी हालत देख कर सब के सब सन्नाटे में आ गए। हर कोई समझ चुका था कि कुछ तो ऐसा हुआ है जिसकी वजह से मेरी ऐसी हालत हो गई है। मुझे फ़ौरन ही बैठक में रखे लकड़ी के तख्त पर लेटा दिया गया और मुझ पर पंखा किया जाने लगा। मेरी हालत देख कर सब के सब चिंतित हो उठे थे। वहीं दूसरी तरफ घर के कुछ लोग शेरा से पूछ रहे थे कि आख़िर ऐसा क्या हुआ है जिसकी वजह से मेरी ये हालत हो गई है? उन लोगों के पूछने पर शेरा कुछ बोल नहीं रहा था। शायद वो समझता था कि सच जानने के बाद कोई भी इस सच को सहन नहीं कर पाएगा और यहां जिस चीज़ की वो सब खुशियां मना रहे थे उसमें विघ्न पड़ जाएगा।

जल्दी ही मेरी हालत में थोड़ा सुधार हुआ तो मुझे होश आया। मैं एकदम से उठ बैठा और बदहवास सा सबकी तरफ देखने लगा। हर चेहरे से होती हुई मेरी नज़र रागिनी भाभी पर जा कर ठहर गई। वो चिंतित और परेशान अवस्था में मुझे ही देखे जा रहीं थी। उन्हें देखते ही मेरे अंदर बुरी तरह मानों कोई मरोड़ सी उठी और मैं फफक फफक कर रो पड़ा। मुझे यूं रोते देख भाभी चौंकी और एकदम से घबरा ग‌ईं। वो फ़ौरन ही मेरे पास आईं और मुझे खुद से छुपका लिया।

"क्या हुआ वैभव?" वो मेरे चेहरे पर अपने कोमल हाथ फेरते हुए बड़े घबराए भाव से बोलीं_____"तुम इस तरह रो क्यों रहे हो? तुम तो मेरे बहादुर देवर हो, फिर इस तरह बच्चों की तरह क्यों रो रहे हो?"

भाभी की बातें सुनकर मैं और भी उनसे छुपक कर रोने लगा। मेरे अंदर के जज़्बात मेरे काबू में नहीं थे। सहसा मैं ये सोच कर कांप उठा कि भाभी को जब सच का पता चलेगा तो उन पर क्या गुज़रेगी? नहीं नहीं, उन्हें सच का पता नहीं चलना चाहिए वरना वो तो मर ही जाएंगी। एकाएक ही मेरे अंदर विचारों का और जज़्बातों का ऐसा तूफान उठा कि मैं उसे सम्हाल न सका। भाभी से लिपटा मैं बस रोए जा रहा था। मुझे रोता देख भाभी भी रोने लगीं। बाकी सबकी भी आंखें नम हो उठीं। किसी को भी समझ में नहीं आ रहा था कि आख़िर ऐसा क्या हो गया है जिसके चलते मैं इस तरह रोए जा रहा हूं। सबको किसी भारी अनिष्ट के होने की आशंका होने लगी थी। सबके ज़हन में तरह तरह के ख़याल उभरने लगे थे।

"तुम्हें मेरी क़सम है वैभव।" भाभी ने रूंधे हुए गले से मेरी तरफ देखते हुए कहा____"मुझे सच सच बताओ कि आख़िर क्या हुआ है? बाहर मौजूद शेरा ने तुमसे ऐसा क्या कहा है जिसे सुन कर तुम इस तरह रोने लगे हो?"

"सब कुछ ख़त्म हो गया भाभी।" भाभी की क़सम से मजबूर हो कर मैंने रोते हुए कहा तो भाभी को झटका सा लगा, बोली____"स..सब कुछ ख़त्म हो गया, क्या मतलब है तुम्हारा?"

"बस इससे आगे कुछ नहीं बता सकता भाभी।" मैंने उनसे अलग हो कर तथा खुद को सम्हालते हुए कहा____"क्योंकि ना तो मुझमें कुछ बताने की हिम्मत है और ना ही आप में से किसी में सुनने की।"

मेरी बात सुन कर जहां भाभी एकदम से अवाक सी रह गईं वहीं बाकी लोगों के चेहरे भी फक्क से पड़ गए। मैंने बड़ी मुस्किल से अपने जज़्बातों को काबू किया और तख्त से उठ कर खड़ा हो गया। मेरे लिए अब यहां पर रुकना मुश्किल पड़ रहा था। मैं जल्द से जल्द हवेली पहुंच जाना चाहता था। मैं अच्छी तरह समझ सकता था कि इस समय हवेली में मेरे अपनों का क्या हाल हो रहा होगा।

"मुझे सच जानना है वैभव।" भाभी ने कठोर भाव से मेरी तरफ देखते हुए कहा____"आख़िर क्या छुपा रहे हो मुझसे?"

"बस इतना ही कहूंगा भाभी।" मैंने उनसे नज़रें चुराते हुए गंभीरता से कहा____"कि जितना जल्दी हो सके यहां से वापस हवेली चलिए। मैं बाहर आपके आने का इंतजार करूंगा।"

कहने के साथ ही मैं तेज़ क़दमों के साथ बाहर आ गया। मेरे पीछे बैठक में सब के सब भौचक्के से खड़े रह गए थे। उधर मेरी बात सुनते ही भाभी ने बाकी सबकी तरफ देखा और फिर बिना कुछ कहे अंदर की तरफ चली गईं। उन्हें भी समझ आ गया था कि बात जो भी है बहुत ही गंभीर है और अगर मैंने वापस हवेली चलने को कहा है तो यकीनन उनका जाना ज़रूरी है।

बाहर आया तो देखा भाभी के पिता और उनके भाई शेरा के पास ही अजीब हालत में खड़े थे। उनकी आंखों में आसूं देख मैं समझ गया कि शेरा ने उन्हें सच बता दिया है। मुझे देखते ही वीरेंद्र मेरी तरफ लपका और मुझसे लिपट कर रोने लगा।

"ये सब क्या हो गया वैभव जी?" वीरेंद्र रोते हुए बोला_____"एक झटके में मेरी बहन विधवा हो गई। इतना बड़ा झटका कैसे बर्दास्त कर सकेगी वो?"

"चुप हो जाइए वीरेंद्र भैया।" मैंने उन्हें खुद से अलग करते हुए कहा____"भाभी को अभी इस बात का पता नहीं चलना चाहिए, वरना वो ये सदमा बर्दास्त नहीं कर पाएंगी। मैं इसी वक्त उन्हें ले कर गांव जा रहा हूं।"

"मैं भी आपके साथ चलूंगा।" वीरेंद्र अपने आंसू पोंछते हुए बोला____"ऐसे वक्त में हम आपको अकेला यूं नहीं जाने दे सकते।"

"सही कहा तुमने बेटे।" भाभी के पिता जी ने दुखी भाव से कहा_____"इस दुख की घड़ी में हम सबका वहां जाना आवश्यक है। एक काम करो तुम अपने भाइयों को ले कर जल्द ही इनके साथ यहां से निकलो।"

"नहीं बाबू जी।" मैंने कहा____"इन्हें मेरे साथ मत भेजिए। ऐसे में भाभी को शक हो जाएगा कि कोई बात ज़रूर है इस लिए आप इन्हें हमारे जाने के बाद आने को कहिए।"

मेरी बात सुन कर उन्होंने सिर हिलाया। अभी हम बात ही कर रहे थे कि तभी भाभी अपना थैला लिए हमारी तरफ ही आती दिखीं। उन्हें देख कर एक बार फिर से मेरे दिल पर मानों बरछियां चल गईं। मैं सोचने लगा कि इस मासूम सी औरत के साथ ऊपर वाले ने ऐसा ज़ुल्म क्यों कर दिया? बड़ी मुश्किल से तो उनकी जिंदगी में खुशियों के पल आए थे और अब तो ऐसा हो गया है कि चाह कर भी कोई उनके दामन में खुशियां नहीं डाल सकता था। मुझे समझ न आया कि मैं ऐसा क्या करूं जिससे मेरी भाभी को कोई दुख तकलीफ छू भी न सके। अपनी बेबसी और लाचारी के चलते मेरी आंखें छलक पड़ीं जिन्हें फ़ौरन ही पलट कर मैंने उनसे छुपा लिया।

कुछ ही देर में मैं जीप में भाभी को बैठा कर शेरा और अपने कुछ आदमियों के साथ अपने गांव नरसिंहपुर की तरफ चल पड़ा। मेरे बगल से भाभी बैठी हुईं थी। वो गुमसुम सी नज़र आ रहीं थी, ये देख मेरा हृदय ये सोच कर हाहाकार कर उठा कि क्या होगा उस वक्त जब उन्हें सच का पता चलेगा? आख़िर कैसे उस अहसहनीय दुख को सह पाएंगी वो? मैंने मन ही मन ऊपर वाले से उन्हें हिम्मत देने की फरियाद की।

गांव से निकल कर जब हम काफी दूर आ गए तो भाभी ने मुझसे फिर से पूछना शुरू कर दिया कि आख़िर क्या बात हो गई है? उनके पूछने पर मैंने बस यही कहा कि हवेली पहुंचने पर उन्हें खुद ही पता चल जाएगा। मैं भला कैसे उन्हें सच बता देता और उन्हें उस सच के बाद मिलने वाले दुख से दुखी होते देखता? जीवन में कभी ऐसा भी वक्त आएगा इसकी कल्पना भी नहीं की थी मैंने। आंखों के सामने बार बार अभिनव भैया का चेहरा दिखने लगता था और न चाहते हुए भी मेरी आंखें भर आती थीं। अपने आंसुओं को भाभी से छुपाने के लिए मैं जल्दी से दूसरी तरफ देखने लगता था। मेरा बस चलता तो किसी जादू की तरह सब कुछ ठीक कर देता और अपनी मासूम सी भाभी के पास किसी तरह की तकलीफ़ न आने देता मगर मेरे बस में अब कुछ भी नहीं रह गया था।

मुझे याद आया कि जो लोग मुझे चंदनपुर में जान से मारने के इरादे से आए थे उनमें से एक ने मुझे बताया था कि वो लोग किसके कहने पर मेरी जान लेने आए थे? साहूकारों पर तो मुझे पहले से ही कोई भरोसा नहीं था लेकिन वो इस हद तक भी जा सकते हैं इसकी उम्मीद नहीं की थी मैंने। मुझ पर उनका कोई बस नहीं चल पाया तो उन्होंने मेरे चाचा और मेरे बड़े भाई को मार दिया। मुझे समझ में नहीं आया कि ये सब कैसे संभव हुआ होगा उनके लिए? मेरे चाचा और भैया उन लोगों को कहीं अकेले तो नहीं मिल गए होंगे जिसके चलते वो उन्हें मार देने में सफल हो गए होंगे। ज़ाहिर है वो लोग पहले से ही इस सबकी तैयारी कर चुके थे और मौका देख कर वो लोग उन पर झपट पड़े होंगे।

सोचते सोचते मेरे अंदर दुख तकलीफ़ के साथ साथ अब भयंकर गुस्सा भी भरता जा रहा था। मैं तो पहले ही ऐसे हरामखोरों को ख़ाक में मिला देना चाहता था मगर पिता जी के चलते मुझे रुकना पड़ गया था मगर अब, अब मैं किसी के भी रोके रुकने वाला नहीं था। जिन लोगों ने चाचा जगताप और मेरे भाई की जान ली है उन्हें ऐसी मौत मारुंगा कि किसी भी जन्म में वो ऐसा करने की हिमाकत न कर सकेंगे।

क़रीब सवा घंटे बाद मैं हवेली पहुंचा। इस एहसास ने ही मुझे थर्रा कर रख दिया कि अब क्या होगा? मेरी भाभी कैसे इतने भयानक और इतने असहनीय झटके को बर्दास्त कर पाएंगी? मेरी नज़रें हवेली के विशाल मैदान के चारो तरफ घूमने लगीं जहां पर कई हथियारबंद लोग मुस्तैदी से खड़े थे। ज़ाहिर है वो किसी भी खतरे का सामना करने के लिए तैयार थे। वातावरण में बड़ी अजीब सी शान्ति छाई हुई थी किंतु हवेली के अंदर किस तरह का हड़कंप मचा हुआ है इसका एहसास और आभास मुझे बाहर से ही हो रहा था।

हवेली के मुख्य दरवाज़े के क़रीब जीप को मैंने रोका और फिर उतर कर मैं दूसरी तरफ आया। मैंने देखा भाभी मुख्य दरवाज़े की तरफ ही देखे जा रहीं थी। उनके मासूम से चेहरे पर अजीब से भाव थे। उन्हें देख कर एक बार फिर से मेरा हृदय हाहाकार कर उठा। मैंने बड़ी मुश्किल से अपने अंदर उठे तूफान को काबू किया और भाभी की तरफ का दरवाज़ा खोल दिया जिससे भाभी ने एक नज़र मुझे देखा और फिर सावधानी से नीचे उतर आईं।

अपने सिर पर साड़ी का पल्लू डाले वो अंदर की तरफ बढ़ गईं तो मैंने जीप से उनका थैला लिया और शेरा को जीप ले जाने का इशारा कर के भाभी के पीछे हो लिया। जैसे जैसे भाभी अंदर की तरफ बढ़ती जा रहीं थी वैसे वैसे मेरी सांसें मानों रुकती जा रहीं थी। जल्दी ही भाभी बैठक को पार करते हुए अंदर की तरफ बढ़ गईं जबकि मैं बैठक में ही रुक गया। मेरी नज़र जब कुछ लोगों से घिरे पिता जी पर पड़ी तो मैं खुद को सम्हाल न सका। बैठक में बैठे लोगों को भी पता चल चुका था कि मैं आ गया हूं और साथ ही मेरे साथ भाभी भी आ गईं हैं। मैं बिजली की सी तेज़ी से पिता जी के पास पहुंचा और रोते हुए उनसे लिपट गया। मुझे यूं अपने से लिपट कर रोता देख पिता जी भी खुद को सम्हाल न सके। उनकी आंखों से आंसू बहने लगे और उनके अंदर का गुबार मानों एक ही झटके में फूट गया। मुझे अपने सीने से यूं जकड़ लिया उन्होंने जैसे उन्हें डर हो कि मैं भी उनसे वैसे ही दूर चला जाऊंगा जैसे चाचा जगताप और बड़े भैया चले गए हैं।

जाने कितनी ही देर तक मैं उनसे लिपटा रोता रहा और पिता जी मुझे खुद से छुपकाए रहे। उसके बाद मैं अलग हुआ तो अर्जुन सिंह ने मुझे एक कुर्सी पर बैठा दिया। तभी मेरे कानों में अंदर से आता रूदन सुनाई दिया। हवेली के अंदर एक बार फिर से चीखो पुकार मच गया था। मां, चाची, कुसुम के साथ अब भाभी का भी रूदन शुरू हो गया था। ये सब सुनते ही मेरा कलेजा फटने को आ गया। मेरी आंखें एक बार फिर से बरस पड़ीं थी।



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अध्याय - 64

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अब तक....

जाने कितनी ही देर तक मैं उनसे लिपटा रोता रहा और पिता जी मुझे खुद से छुपकाए रहे। उसके बाद मैं अलग हुआ तो अर्जुन सिंह ने मुझे एक कुर्सी पर बैठा दिया। तभी मेरे कानों में अंदर से आता रूदन सुनाई दिया। हवेली के अंदर एक बार फिर से चीखो पुकार मच गया था। मां, चाची, कुसुम के साथ अब भाभी का भी रूदन शुरू हो गया था। ये सब सुनते ही मेरा कलेजा फटने को आ गया। मेरी आंखें एक बार फिर से बरस पड़ीं थी।

अब आगे....

सारा दिन ऐसे ही मातम छाया रहा। समय के गुज़रने के साथ हवेली के अंदर मौजूद औरतों का रोना चिल्लाना तो बंद हो गया था लेकिन रह रह कर सिसकने की आवाज़ें आ ही जाती थीं। चंदनपुर से बड़े भैया अभिनव के ससुराल वाले भी आ गए थे। जिनमें वीरेंद्र के साथ चाचा ससुर बलभद्र सिंह और उनका बड़ा बेटा वीर सिंह था। ससुर जी यानी वीरभद्र सिंह को चलने फिरने में परेशानी होती थी इस लिए वो नहीं आए थे। हालाकि वो आने की ज़िद कर रहे थे लेकिन उनके छोटे भाई ने समझाया कि घर के बड़े होने के नाते उनका घर में भी रहना ज़रूरी है।

दूसरे गांव से पिता जी के जो कुछ मित्र आए थे वो बाद में आने का बोल कर चले गए थे किंतु अर्जुन सिंह पिता जी के साथ अब भी मौजूद थे। अर्जुन सिंह से पिता जी का गहरा नाता था इस लिए ऐसी परिस्थिति में वो मेरे पिता जी को अकेला नहीं छोड़ना चाहते थे। पुलिस के आला अधिकारी कुछ समय बैठने के बाद जा चुके थे लेकिन ये भी कह गए थे कि जो कुछ भी हुआ है उसकी जांच पड़ताल करना अब पुलिस का काम है इस लिए हम में से कोई भी कानून को अपने हाथ में लेने का न सोचे।

"मालिक।" अभी हम सब सोचो में ही गुम थे कि तभी एक दरबान बैठक में आ कर अदब से बोला____"शेरा के साथ कुछ लोग आपसे मिलना चाहते हैं।"

दरबान की बात सुन कर पिता जी ने उन्हें अंदर भेजने को कहा तो दरबान सिर नवा कर चला गया। थोड़ी ही देर में शेरा और उसके साथ दो आदमी बैठक में दाखिल हुए जिनमें से एक मुंशी चंद्रकांत का बेटा रघुवीर भी था।

"क्या ख़बर है?" पिता जी ने सपाट लहजे में शेरा की तरफ देखते हुए पूछा।

"मालिक हमने हर जगह पता किया।" शेरा ने दबी हुई आवाज़ में कहा____"लेकिन साहूकारों में से किसी का भी कहीं कोई सुराग़ तक नहीं मिला।"

"उनके घरों में पता किया?" पिता जी ने कठोर भाव से कहा____"हो सकता है वो सब अपने घरों में ही चूहे की तरह बिल में घुसे बैठे हों।"

"उनके घरों में सिर्फ़ उनकी औरतें और लड़कियां ही हैं दादा ठाकुर।" रघुवीर ने कहा____"ना तो साहूकारों में से कोई है और ना ही उनके लड़के लोग। ऐसा लगता है जैसे वो जान बूझ कर कहीं चले गए हैं। ज़ाहिर है उन्हें इस बात का डर है कि वो सब आपके क़हर का शिकार हो जाएंगे।"

"सबके सब नामर्द हैं साले।" अर्जुन सिंह ने खीझते हुए कहा____"पीछे से वार करने वाले कायर हैं वो। अब जब सामने से भिड़ने का वक्त आया तो कुत्ते की तरह दुम दबा कर कहीं भाग गए हैं।"

"भाग कर जाएंगे कहां?" पिता जी ने गुस्से में कहते हुए शेरा की तरफ देखा____"आस पास के सभी गांवों में जा जा कर ये घोषणा कर दो कि जो कोई भी साहूकारों के बारे में हमें ख़बर देगा उसे हमारे द्वारा मुंह मांगा इनाम दिया जाएगा और साथ ही ये ऐलान भी कर दो कि अगर किसी ने साहूकारों को पनाह दे कर उन्हें अपने यहां छुपाने की कोशिश की तो उसके पूरे खानदान को नेस्तनाबूत कर दिया जाएगा।"

"मैं कुछ कहना चाहता हूं पिता जी।" मैंने पिता जी की तरफ देखते हुए कहा____"अगर आपकी इजाज़त हो तो कहूं?"

"क्या कहना चाहते हो?" पिता जी ने मेरी तरफ देखा।

"अगर साहूकारों को जल्द से जल्द पकड़ना है तो उसके लिए हमें ये सब ऐलान कराने की ज़रूरत नहीं है।" मैंने संतुलित लहजे में कहा____"बल्कि हर तरफ सिर्फ इतना ही ऐलान कर देना काफी है कि अगर चौबीस घंटे के अंदर साहूकारों ने खुद को हमारे हवाले नहीं किया तो उनके घर की औरतों, लड़कियों और बच्चों के साथ बहुत ही बुरा सुलूक किया जाएगा।"

"ये क्या कह रहे हो तुम?" सब मेरी बातों से हैरानी पूर्वक मेरी तरफ देखने लगे थे जबकि पिता जी ने कहा____"नहीं नहीं, हम उन लोगों की बहू बेटियों के साथ ऐसा कुछ भी नहीं करेंगे।"

"आप ग़लत समझ रहे हैं पिता जी।" मैंने जैसे समझाने वाले अंदाज़ में कहा____"मेरा इरादा ये हर्गिज़ नहीं है कि हम सच में उनके घर की औरतों या लड़कियों के साथ ग़लत ही कर देंगे। इस तरह का ऐलान करना तो बस एक बहाना होगा ताकि चूहे की तरह कहीं छुपे बैठे साहूकार लोग इस बात के डर से फ़ौरन ही बिलों से निकल कर हमारे सामने आ जाएं। इस बात का एहसास तो उन्हें भी होगा कि जो कुछ उन्होंने किया है उससे हम बेहद ही गुस्से में होंगे। उस गुस्से में पगलाए हुए हम उनके साथ या उनके घर वालों के साथ कुछ भी कर गुज़रने से पीछे नहीं हटेंगे और ना ही सही ग़लत के बारे में सोचेंगे। ये सब सोच कर यकीनन वो अपनी बहू बेटियों के लिए चिंतित हो जाएंगे और फिर वही करने पर मजबूर हो जाएंगे जो हम चाहते हैं।"

"मैं छोटे कुंवर की बातों से सहमत हूं ठाकुर साहब।" अर्जुन सिंह ने कहा____"उन कायरों को जल्द से जल्द बिलों से बाहर निकालने का यही एक तरीका बेहतर लगता है।"

"हम भी वैभव बेटा की इन बातों से सहमत हैं ठाकुर साहब।" बलभद्र सिंह ने कहा____"लेकिन एक बात और भी है, और वो ये कि क्या ज़रूरी है कि आपसे खौफ़ खा कर आपके गांव के ये साहूकार आस पास के किसी गांव में ही छुपे हुए होंगे? हमारा ख़याल है बिल्कुल नहीं। अगर उन्हें सच में ही आपसे अपनी ज़िंदगियों को सलामत रखना है तो वो कहीं छुपने से बेहतर पुलिस या कानून के संरक्षण में रहना ही ज़्यादा बेहतर समझेंगे।"

"यकीनन आपकी बातों में वजन है ठाकुर साहब।" पिता जी ने सिर हिलाते हुए कहा____"हमें भी ऐसा ही लगता है कि वो सब के सब इस वक्त कानून के संरक्षण में ही होंगे।"

"तो क्या हुआ पिता जी।" मैंने फिर से हस्ताक्षेप किया____"वो भले ही कानून के संरक्षण में होंगे लेकिन जब वो जानेंगे कि उनकी वजह से उनके घर की बहू बेटियां हमारे निशाने पर हैं तो वो सब मुंह के बल भागते हुए यहां आएंगे और हमसे अपने घर की औरतों को बक्श देने की भीख मांगेंगे।"

"बात तो ठीक है छोटे कुंवर।" अर्जुन सिंह ने कहा____"लेकिन यकीनन ऐसा ही होगा ये ज़रूरी नहीं है क्योंकि तब वो कानून के संरक्षण के साथ साथ कानून का सहारा भी मागेंगे और मौजूदा हालात को देखते हुए कानून हर तरह से उनकी मदद भी करेगा।"

"तो आप ये कहना चाहते हैं कि हम ये सब सोच कर कुछ करें ही नहीं?" मैं एकदम आवेश में आ कर बोल पड़ा____"नहीं चाचा जी, ऐसा किसी भी कीमत पर नहीं हो सकता। उन लोगों ने मेरे चाचा और मेरे बड़े भाई की बेरहमी से हत्या की है इस लिए अब अगर उन्हें बचाने के लिए स्वयं यमराज भी आएंगे तो उन्हें मेरे क़हर से बचा नहीं पाएंगे।"

"गुस्से में होश गंवा कर कोई भी काम नहीं करना चाहिए छोटे कुंवर।" अर्जुन सिंह ने कहा____"मैं ये नहीं कह रहा कि तुम अपनों की हत्या का बदला न लो बल्कि वो तो हम सब लेंगे और ज़रूर लेंगे लेकिन उसी तरह जिस तरह उन लोगों ने पूरी तैयारी के साथ हमारे अपनों की हत्या की है।"

"मैं ये सब कुछ नहीं जानता चाचा जी।" मैंने उसी आवेश के साथ कहा____"मैं सिर्फ इतना जानता हूं कि मैं उन सबको बद से बद्तर मौत दूंगा, फिर चाहे इसके लिए मुझे किसी भी हद से क्यों न गुज़र जाना पड़े।" कहने के साथ ही मैं शेरा और रघुवीर से मुखातिब हुआ_____"तुम दोनों इसी वक्त जाओ और इस गांव में ही नहीं बल्कि आस पास के सभी गांवों में ये ऐलान कर दो कि अगर चौबीस घंटे के अंदर साहूकारों ने दादा ठाकुर के सामने खुद को समर्पण नहीं किया तो उनके घर की बहू बेटियों के साथ बहुत ही बुरा सुलूक किया जाएगा।"

मेरी बात सुन कर शेरा और रघुवीर ने पिता जी की तरफ देखा। पिता जी ने फ़ौरन ही सिर हिला कर उन्हें हुकुम का पालन करने का इशारा कर दिया। शायद पिता जी भी अब वही चाहते थे जो कुछ करने की मैं सोच बैठा था। ख़ैर, इशारा मिलते ही दोनों बैठक से सिर नवा कर चले गए। मेरे अंदर इस वक्त ऐसी आंधी चल रही थी जो हर चीज़ को तबाह कर देने के लिए आतुर थी।

✮✮✮✮

सारा दिन मैं बैठक में ही बैठा रहा था। हवेली के अंदर जाने की मुझमें हिम्मत नहीं हो रही थी लेकिन भला कब तक मैं किसी चीज़ से बचता? शेरा और रघुवीर के जाने के बाद मैं उठ कर अंदर की तरफ बढ़ चला था। अंदर की तरफ बढ़ते हुए मेरे क़दम एकदम से भारी होते जा रहे थे। मां अथवा मेनका चाची से सामना होने का मुझे उतना भय नहीं था जितना भाभी से सामना होने का भय था। मुझे शिद्दत से एहसास था कि उनके दिल पर इस वक्त क्या गुज़र रही होगी और सच तो ये था कि इस वक्त उनकी जो हालत होगी उसे देखने की मुझमें ज़रा सी भी हिम्मत नहीं थी।

अंदर आया तो देखा कई सारी औरतें बरामदे वाले बड़े से हाल में बैठी हुईं थी। वो सब मां चाची और भाभी को घेरे हुए थीं और साथ ही उन्हें धीरज बंधा रहीं थी। वो सब गांव की ही औरतें थी जिनमें मुंशी की बीवी प्रभा और बहू रजनी भी थी। मुझ पर नज़र पड़ते ही मां, चाची, कुसुम और भाभी का रोना फिर से शुरू हो गया। कुछ समय के लिए हवेली में जो सन्नाटा छा गया था वो उनके रोने और चिल्लाने से एकदम से दहल सा उठा। कुसुम दौड़ते हुए आई और मुझसे लिपट कर रोने लगी। मैंने बहुत कोशिश की लेकिन अपनी आंखों को छलक पड़ने से रोक न सका। अपनी लाडली बहन का रोता हुआ चेहरा देखा तो मेरा कलेजा फट गया। रो रो कर कितनी बुरी हालत बना ली थी उसने। ज़ाहिर है उसके जैसा हाल सबका ही था। मैंने किसी तरह उसे शांत किया और भारी क़दमों से आगे बढ़ चला। मां, चाची और भाभी की तरफ जाने की हिम्मत ही न हुई मुझमें।

बड़े से आंगन से होते हुए जब मैं दूसरी तरफ के बरामदे में आया तो देखा विभोर और अजीत अजीब अवस्था में अकेले ही बैठे थे। दोनों की आंखें किसी अनंत शून्य को घूरे जा रहीं थी। आंखों से बहे आंसू उनके गालों पर सूख गए थे और अपनी परत छोड़ चुके थे। मेरे आने की आहट से उनका ध्यान भंग हुआ तो उन्होंने मेरी तरफ देखा। फिर एकाएक ही ऐसा लगा जैसे उन दोनों पर एक बार फिर से बिजली सी गिर पड़ी हो। वो तेज़ी से उठे और भैया कहते हुए मुझसे लिपट गए। मेरा हृदय ये सोच कर हाहाकार कर उठा कि ऊपर वाले ने किस बेदर्दी से उनके सिर से पिता का साया छीन लिया है। मुझसे लिपट कर वो दोनों बच्चों की तरह रोए जा रहे थे। मैंने बड़ी मुश्किल से उन्हें सम्हाला और उन्हें शांत करने की कोशिश की। मुझे समझ में नहीं आया कि आख़िर किन शब्दों से उन दोनों को धीरज बंधाऊं और उन्हें समझाने का प्रयास करुं?

"हम अनाथ हो गए भैया।" अजीत ने रोते हुए कहा____"अब किसके सहारे जिएंगे हम?"

"ऐसा मत कह छोटे।" मैंने लरजते स्वर में उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा____"धीरज रख। हम सब तेरे ही तो हैं। वैसे सच कहूं तो ऐसा लगता है जैसे कि आज मैं खुद भी अनाथ हो गया हूं। जगताप चाचा मुझे तुम लोगों से भी ज़्यादा प्यार करते थे। जब वो मुझे 'मेरा शेर' कहते थे तो मेरे अंदर अपार खुशी भर जाती थी। अब कौन मुझे 'मेरा शेर' कहेगा छोटे?"

कहां मैं उन दोनों को शांत करने की कोशिश कर रहा था और कहां अब मैं खुद ही फफक कर रो पड़ा था। मुझे रोता देख वो दोनों और भी जोरों से रोने लगे। हम तीनों का रोना सुन कर उधर बरामदे में बैठी मां, चाची, कुसुम और भाभी फिर से रोने लगीं। बड़ी मुश्किल से मैंने खुद को सम्हाला, फिर विभोर और अजीत को भी शांत किया। दोनों को अपने साथ ही ले कर ऊपर अपने कमरे में आ गया। वो दोनों अब मेरी ज़िम्मेदारी बन चुके थे। मैं ये हर्गिज़ नहीं चाहता था कि वो अब खुद को दीन हीन समझें।

दोनों को कमरे में ला कर मैंने उन्हें पलंग पर लेटा दिया और खुद किनारे पर बैठ कर दोनों के सिर पर बारी बारी से हाथ फेरने लगा। इस वक्त वो दोनों मुझे छोटे से बच्चे प्रतीत हो रहे थे। दिलो दिमाग़ में तो हलचल मची हुई थी लेकिन इस वक्त उस हलचल को काबू में रखना ज़रूरी था। काफी देर तक मैं उन्हें प्यार से दुलारता रहा। कुछ ही देर में वो सो गए। उन्हें गहरी नींद सो गया देख मैं आहिस्ता से उठा और कमरे से बाहर आ गया। दरवाज़े को ढुलका कर मैं नीचे जाने के लिए आगे बढ़ चला। अभी मैं थोड़ी ही दूर आया था कि मेरी नज़र भाभी और कुसुम पर पड़ी। वो दोनों सीढ़ियों से ऊपर आ कर अपने कमरों की तरफ मुड़ गईं थी। भाभी को देखते ही मेरी धड़कनें ये सोच कर तेज़ हो गईं कि कहीं मेरा उनसे सामना न हो जाए। हालाकि मैं जानता था कि इस वक्त उन्हें थोड़ा सा ही सही लेकिन मेरा सहारा चाहिए था किंतु मुझमें हिम्मत नहीं थी उनका सामना करने की।

मैं तेज़ी से सीढ़ियों की तरफ बढ़ा और जैसे ही बाएं तरफ जाने वाले गलियारे के पास पहुंचा तो अनायास ही मेरी नज़र उस तरफ चली गई। भाभी अपने कमरे के दरवाज़े के पास ही खड़ीं थी। शायद उन्होंने पहले ही मुझे देख लिया था और मेरे आने का इंतज़ार कर रहीं थी। जैसे ही मेरी नज़र उनसे मिली तो मेरा पूरा वजूद कांप गया।

चांद की मानिंद चमकने वाला चेहरा इस वक्त किसी उजड़े हुए गुलशन का पर्याय बना दिखाई दे रहा था। आंखें रो रो कर लाल सुर्ख पड़ गईं थी। चेहरा आंसुओं से तर बतर था। मांग का सिंदूर उनके पूरे माथे पर फैला हुआ था। कमान की तरह दिखने वाली भौंहों के बीच चमकने वाली बिंदी अपनी जगह से ग़ायब थी। बाल बिखरे हुए और गले का मंगलसूत्र नदारद। मेरी नज़र फिसलती हुई उनकी गोरी गोरी कलाईयों पर पड़ी तो देखा कांच की एक भी चूड़ियां नहीं थी उनमें। कलाईयों में जगह जगह ज़ख़्म थे जहां से खून रिसा हुआ नज़र आया। ये सब देख कर मेरी रूह कांप गई। अपनी भाभी का ये रूप देख कर मुझसे बर्दास्त न हुआ। मेरी आंखें अपने आप ही बंद हो गईं और आंखों से आंसू बह चले।

"तुमने तो कहा था कि अब कभी मेरी जिंदगी में कोई दुख नहीं आएगा।" भाभी ने रूंधे हुए गले से मेरी तरफ देखते हुए कहा____"और ये भी कि मेरी आंखें अब कभी आंसू नहीं बहाएंगी तो फिर ये सब क्या है वैभव? आख़िर क्यों तुम्हारा कहा गया सब कुछ झूठ में बदल गया?"

इसके आगे भाभी से कुछ भी न बोला गया और वो फूट फूट कर रो पड़ीं। मुझसे अपनी जगह पर खड़े ना रहा गया तो मैं भाग कर उनके पास पहुंचा और उन्हें पकड़ कर अपने सीने से छुपका लिया। उनकी पीड़ा और उनके दर्द का मुझे बखूबी एहसास था। मुझे अच्छी तरह समझ आ रहा था कि इस वक्त उनके दिल पर किस बेदर्दी के साथ वज्रपात हो रहा था।

मैंने उन्हें अपने सीने से क्या छुपकाया वो तो और भी जोरों से रोने लगीं। काश! मेरे अख़्तियार में होता तो पलक झपकते ही उनके हर दुख दर्द को दूर कर देता मगर हाय रे नसीब, कुछ भी तो नहीं था मेरे बस में। पहली बार मुझे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे इस दुनिया में सबसे ज़्यादा बेबस और लाचार सिर्फ मैं ही हूं।

"मत रोइए भाभी।" मैंने दुखी भाव से उन्हें चुप कराने की कोशिश की____"मुझे आपकी तकलीफ़ का बखूबी एहसास है। मैं जानता हूं कि ऊपर वाले ने आपको ऐसा दुख दे दिया है जो ताउम्र आपको चैन से जीने नहीं देगा।"

"अब जीने की ख़्वाहिश ही कहां है वैभव?" भाभी ने रोते हुए कहा____"ऐसी ज़िंदगी जीने से बेहतर है कि अब मौत आ जाए मुझे।"

"ऐसा मत कहिए भाभी।" मैंने उन्हें और ज़ोर से छुपका लिया, फिर बोला____"जीने मरने की बातें मत कीजिए। मैं जानता हूं कि ऐसे दुख के साथ ज़िंदगी जीना बहुत मुश्किल होता है लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि खुद की जान ही ले ली जाए। आप कभी भी ऐसे ख़याल अपने ज़हन में मत लाइएगा, आपको मेरी क़सम है।"

"ऊपर वाले की तरह तुम भी बहुत ज़ालिम हो वैभव।" भाभी ने सिसकते हुए कहा____"अपनी क़सम में बांध कर मुझे ऐसी ज़िंदगी जीने पर मजबूर कर रहे हो जिसमें दुख और तकलीफ़ के सिवा कुछ भी नहीं है।"

"मैं आपकी ज़िंदगी में दुख और तकलीफ़ को कभी आने नहीं दूंगा भाभी।" मैंने उन्हें खुद से अलग करते हुए कहा____"आपकी तरफ आने वाले हर दुख दर्द को पहले मेरा सामना करना पड़ेगा। मैं दुनिया के कोने कोने से ढूंढ कर आपके लिए खुशियां लाऊंगा भाभी।"

"पहले भी तुमने ऐसे ही झूठे दिलासे दिए थे मुझे।" भाभी की आंखें छलक पड़ीं, मेरी तरफ देखते हुए करुण भाव से बोलीं____"और अब फिर से वैसा ही झूठा दिलासा दे रहे हो। मैं कोई बच्ची नहीं हूं वैभव जिसे तुम ऐसी बातों से बहला देना चाहते हो। सच तो ये है कि अब दुनिया में कहीं भी ऐसा कुछ नहीं रहा जिससे मुझे खुशी मिल सकेगी। एक औरत के जीवन में उसके पति के बिना कहीं कोई खुशी नहीं होती। पति के बिना दुनिया की अपार दौलत, बेपनाह ऐशो आराम कुछ भी मायने नहीं रखता। औरत का पति चाहे कितना ही ग़रीब और लाचार क्यों न हो लेकिन औरत को कहीं न कहीं इस बात की खुशी तो रहती है कि वो सुहागन है। वो ऐसी अभागन और विधवा तो नहीं है जिसके लिए उसे हर रोज़ दुनिया वालों की ऐसी बातें सुनने को मिलेंगी जो बातें किसी नश्तर की तरह उसके दिल को ही नहीं बल्कि उसकी अंतरात्मा तक को छलनी कर देंगी।"

भाभी की बातों का मेरे पास कोई जवाब नहीं था। उन्होंने एक ऐसा सच कहा था जिसे कोई झुठला नहीं सकता था। सच ही तो था कि एक औरत अपने पति के रहने पर ही सच्चे दिल से खुश रह सकती है।

"मैं ये सब समझता हूं भाभी।" मैंने गंभीरता से कहा____"लेकिन इस सबके बावजूद इंसान को अपने दुख दर्द को जज़्ब कर के आगे बढ़ना ही होता है और अपनों की खुशी के लिए खुश रहने का दिखावा करना ही पड़ता है।"

"नहीं, अब मुझमें ऐसी हिम्मत नहीं है।" भाभी एक बार फिर से रो पड़ीं____"और ना ही ऐसी कोई ख़्वाइश है। अब तो बस यही मन करता है कि मौत आ जाए और मैं जल्दी से तुम्हारे भैया के पास पहुंच जाऊं।"

"भगवान के लिए भाभी ऐसा मत कहिए।" मैंने घबरा कर उनके हाथ थाम लिए, फिर कहा____"आपको मेरी क़सम है, आप मरने वाली बातें मत कीजिएगा कभी। क्या भैया ही आपके लिए सब कुछ थे? क्या आपके लिए हम में से कोई मायने नहीं रखता? क्या आपके दिल में हमारे लिए कुछ नहीं है?"

"मैं क्या करूं वैभव?" भाभी फफक कर रो पड़ीं____"मैंने कभी अपनी ज़िंदगी में किसी का बुरा नहीं चाहा। सच्चे मन से हमेशा ऊपर वाले की पूजा आराधना की है इसके बावजूद उस विधाता ने मुझसे मेरा सब कुछ छीन लिया। क्या उस विधाता को मुझ पर ज़रा भी तरस नहीं आया?"

भाभी कहने के साथ ही फूट फूट कर रो पड़ीं। मुझसे उनका यूं रोना देखा नहीं जा रहा था। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि उन्हें कैसे शांत करूं और किस तरह से उन्हें समझाऊं? उनके मुख से मरने की बातें सुन कर मैं अंदर से बुरी तरह घबरा भी गया था। मैं समझ सकता था कि जो दुख तकलीफ़ उन्हें मिली थी उससे उनकी अंतरात्मा तक दुखी हो चुकी है जिसके चलते वो अब जीने मरने की बातें करने लगीं हैं। मेरे ज़हन में ख़याल उभरा कि अगर सच में उन्होंने ऐसा कोई क़दम उठा लिया तो क्या होगा? ये सोच कर ही मेरी रूह कांप उठी।

मैंने भाभी को किसी तरह शांत किया और उन्हें उनके कमरे में ले आया। पलंग पर मैंने उन्हें बैठाया और फिर दरवाज़े के पास आ कर कुसुम को आवाज़ लगाई। मेरे आवाज़ देने पर कुसुम अपने कमरे से निकल कर भागती हुई मेरे पास आई। मैंने उसे भाभी के पास रहने को कहा और साथ ही ये भी कहा कि वो भाभी को किसी भी हाल में अकेला न छोड़े। कुसुम ने हां में सिर हिलाया और भाभी के कमरे में दाखिल हो गई। मैंने भाभी को ज़बरदस्ती आराम करने को कहा और बाहर निकल कर नीचे की तरफ चल पड़ा।



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अध्याय - 65

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अब तक....

मैंने भाभी को किसी तरह शांत किया और उन्हें उनके कमरे में ले आया। पलंग पर मैंने उन्हें बैठाया और फिर दरवाज़े के पास आ कर कुसुम को आवाज़ लगाई। मेरे आवाज़ देने पर कुसुम अपने कमरे से निकल कर भागती हुई मेरे पास आई। मैंने उसे भाभी के पास रहने को कहा और साथ ही ये भी कहा कि वो भाभी को किसी भी हाल में अकेला न छोड़े। कुसुम ने हां में सिर हिलाया और भाभी के कमरे में दाखिल हो गई। मैंने भाभी को ज़बरदस्ती आराम करने को कहा और बाहर निकल कर नीचे की तरफ चल पड़ा।

अब आगे....

शाम हो रही थी।

जगन बहुत परेशान था और साथ ही अंदर से बेहद घबराया हुआ भी था। उसे भी पता चल चुका था कि हवेली में बहुत बड़ी घटना हो गई है जिसमें मझले ठाकुर जगताप और दादा ठाकुर के बड़े बेटे अभिनव ठाकुर की हत्या कर दी गई है। दोनों चाचा भतीजे की इस तरह हत्या हो जाएगी इसकी उसने कल्पना भी नहीं की थी। वो अच्छी तरह जानता था कि अब जो होगा वो बहुत ही भयानक होगा जिसके चलते उसकी अपनी ज़िंदगी भी ख़तरे में ही पड़ गई है। वो पिछले कई दिनों से सबसे छुपता फिर रहा था। उसे इस बात का अंदेशा ही नहीं बल्कि पूरा यकीन था कि उसकी असलियत का पता दादा ठाकुर अथवा ठाकुर वैभव सिंह को चल चुका है इस लिए अब वो उनके ख़ौफ से छुपता फिर रहा था। घर में उसकी बीवी और बच्चे बिना किसी सहारे के ही थे जिनकी अब उसे बेहद चिंता होने लगी थी।

सूरज पश्चिम दिशा में अस्त हो चुका था और हर तरफ शाम का धुंधलका छाने लगा था। जगन सबकी नज़रों से खुद को बचाते हुए उस तरफ तेज़ी से बढ़ता चला जा रहा था जिस तरफ दादा ठाकुर के आमों के बाग थे। यूं तो वहां पर जाने के लिए साफ सुथरा रास्ता था लेकिन क्योंकि उसे सबकी नज़रों से खुद को छुपाए रखना था इस लिए वो लंबा चक्कर लगाते हुए बाग़ की तरफ बढ़ रहा था। वो उस सफ़ेदपोश आदमी से मिलना चाहता था जिसके इशारों पर आज कल वो काम कर रहा था।

जगन ने उस वक्त थोड़ी राहत की सांस ली जब वो आमों के बाग़ में आ गया। यहां पर घने पेड़ पौधे थे और शाम घिर जाने की वजह से अंधेरा भी नज़र आ रहा था। ऐसे में किसी के द्वारा उसको देख लिया जाना इतना आसान नहीं था और यही उसके लिए राहत वाली बात थी। ख़ैर बाग़ में दाखिल होते ही वो सावधानी से उस तरफ बढ़ चला जिस तरफ अक्सर उसे सफ़ेदपोश मिला करता था। जल्दी ही वो उस जगह पर आ गया और हल्के अंधेरे में वो इस उम्मीद में चारो तरफ नज़रें घुमाने लगा कि शायद उसे कहीं पर वो सफ़ेदपोश व्यक्ति नज़र आ जाए लेकिन ऐसा न हुआ। जैसे जैसे समय गुज़र रहा था उसके चेहरे पर बेचैनी के साथ साथ चिंता और परेशानी भी बढ़ती जा रही थी।

काफी देर हो जाने पर भी जब जगन को वो सफ़ेदपोश कहीं नज़र ना आया तो वो हताश सा हो कर वापस चल पड़ा। इतना तो उसे भी पता था कि सफ़ेदपोश बाग़ में हर वक्त बैठा नहीं रहता था और जब भी उसे मिलना होता था तो वो अपने काले नकाबपोश व्यक्ति द्वारा उस तक ख़बर भेजवा देता था। ख़ैर निराश और परेशान हालत में जगन बाग़ से निकल कर वापस उसी रास्ते की तरफ बढ़ चला था जिस तरफ से वो आया था। अभी वो कुछ ही दूर चला था कि तभी उसे अजीब तरह की हलचल महसूस हुई जिसके चलते वो बुरी तरह डर गया। उसके दिल की धड़कनें मानों रुक ही गईं। अभी वो अपनी धड़कनों को नियंत्रित करने का प्रयास ही कर रहा था कि तभी दो तरफ से तीन आदमी लट्ठ लिए एकदम से उसके क़रीब आ गए।

तीन आदमियों को यूं किसी जिन्न की तरह अपने क़रीब प्रगट हो गया देख जगन की गांड़ फट के हाथ में आ गई। एक तो वैसे ही वो डरा हुआ था दूसरे तीन तीन लट्ठधारियों को देखते ही उसे ऐसा लगा जैसे न चाहते हुए भी उसका मूत निकल जाएगा।

"क..कौन हो तुम लोग???" फिर उसने अपनी हालत को काबू करने का प्रयास करते हुए उन तीनों को बारी बारी से देखते हुए घबरा कर पूछा।

"तुम्हारे सिर पर मंडराती हुई तुम्हारी मौत।" एक लट्ठधारी ने अजीब भाव से कहा____"आख़िर पकड़ में आ ही गया आज।"

"क..क्या मतलब??" जगन की सिट्टी पिट्टी गुम, सूखे गले को उसने अपने थूक से तर करने का प्रयास किया फिर बड़ी मुश्किल से उसके गले से आवाज़ निकली____"अ...आख़िर क..कौन हो तुम लोग, अ...और ऐसा क्यों कह रहे हो??"

जगन की बात का उनमें से किसी ने कोई जवाब नहीं दिया बल्कि तीनों ने पहले एक दूसरे की तरफ देखा और फिर बिजली की तरह झपट पड़े उस पर। जगन को ऐसा लगा जैसे एकदम से उसके सिर पर गाज गिर गई है। वो मारे डर के हलक फाड़ कर चिल्ला उठा था मगर तभी उनमें से एक ने उसके मुख को अपने हाथों से भींच लिया। जगन को तीनों ने पकड़ लिया था और वो उनसे छूटने के लिए जी तोड़ कोशिश करने लगा था मगर छूट नहीं पाया। उसका बुरी तरह से छटपटाना उस वक्त एकदम से शांत पड़ गया जब उनमें से एक ने उसकी आंखों के सामने तेज़ धार वाला खंज़र दिखाते हुए ये कहा था कि अब अगर चीखा चिल्लाया तो ये खंज़र हलक में घुसेड़ दूंगा।

✮✮✮✮

मैं जानता था कि ऐसे माहौल में मेरा हवेली से अकेले निकालना कहीं से भी उचित नहीं था मगर अब मैं इसका क्या करता कि मुझसे सब्र ही नहीं हो रहा था। मेरे अंदर आक्रोश, गुस्सा और बदले की आग इस क़दर तांडव सा कर रही थी जिसे काबू में रख पाना अब मेरे बस में नहीं था। पिता जी ने जो पिस्तौल मुझे दिया था उसे ले कर मैं हवेली से निकल आया था और इस बात का ख़ास ध्यान रखा था कि किसी की नज़र मुझ पर न पड़े। शाम का अंधेरा मेरे लिए बेहद उपयोगी साबित हुआ था जिसके चलते हवेली से बाहर निकल आने में मुझे कोई समस्या नहीं हुई थी।

मैं एक गमछा ले रखा था जिससे मैंने अपना चेहरा ढंक लिया था और पैदल ही चलते हुए उस तरफ आ गया था जहां से एक रास्ता नदी की तरफ जाता था। यहां पर रुक कर अभी मैं इधर उधर देखने ही लगा था कि तभी मेरी नज़र एक साए पर पड़ी। साए को देख कर मेरे जबड़े भिंच गए और साथ ही मेरे अंदर गुस्से में इज़ाफा होने लगा। मैं अपनी जगह पर बेख़ौफ खड़ा उस साए को देख ही रहा था कि तभी मैं हल्के से चौंका। ऐसा इस लिए क्योंकि साया मुझे देखने के बाद भी नहीं रुका था और मेरी ही तरफ बढ़ा चला आ रहा था। अंधेरा इतना भी नहीं था कि कुछ दूरी का दिखे ही नहीं। जल्दी ही वो साया मेरे क़रीब आ गया।

"नमस्ते छोटे कुंवर।" वो साया मेरे पास आते ही अदब से बोला तो मैं उसे पहचान गया। वो मेरा ही ख़बरी था। उसके नमस्ते कहने पर मैंने हल्के से सिर हिलाया और फिर कहा____"इस तरह कहां घूमते फिर रहे हो तुम?"

"आपके ही काम में लगा हुआ था कुंवर।" उस व्यक्ति ने कहा जिसका नाम मंगू था____"और एक अच्छी ख़बर देने के लिए आपके ही पास हवेली आ रहा था कि आप यहीं मिल गए मुझे।"

"कैसी ख़बर की बात कर रहे हो तुम?" मैंने सपाट लहजे में उससे पूछा तो उसने कहा____"आपके कहने पर हम लोग मुरारी के छोटे भाई जगन की खोजबीन में लगे हुए थे।"

"तो क्या मिल गया वो?" मैं उत्सुकता और उत्तेजना के चलते पूछ बैठा।

"हां कुंवर।" मंगू ने गर्मजोशी से कहा____"अभी कुछ देर पहले ही हमने उसे पकड़ा है। हालाकि ये बड़े ही इत्तेफ़ाक से हुआ है लेकिन आख़िर वो मिल ही गया हमें।"

"तो कहां हैं वो?" जगन मिल ही नहीं गया है बल्कि पकड़ में भी आ गया है इस बात ने मेरे अंदर एक अलग ही जोश भर दिया था और गुस्सा भी। मैं अपनी मुट्ठी में उसकी गर्दन दबोचने के लिए जैसे मचल ही उठा।

"आपके आमों वाले बाग़ में जो मकान है न।" मंगू ने जवाब दिया____"हमने उसे वहीं पर पकड़ कर रखा है। संपत और दयाल उसके पास वहीं पर हैं जबकि मैं इस बात की सूचना देने के लिए हवेली जा रहा था कि आप यहीं मिल गए मुझे।"

मंगू की बात सुन कर मेरे होठों पर ज़हरीली मुस्कान उभर आई। मैंने उसे चलने का इशारा किया तो वो मुझे रास्ता दे कर मेरे पीछे पीछे चलने लगा। जल्दी ही मैं मंगू के साथ अपने बाग़ वाले मकान में पहुंच गया। मैंने मंगू को रोक कर उसे एक काम सौंपा और जल्द से जल्द आने को कहा तो वो फ़ौरन ही पलट कर चला गया। उसके जाने के बाद मैं मकान के अंदर दाखिल हो गया। अंदर मुझे हल्का उजाला नज़र आया। मैं समझ गया कि संपत और दयाल ने शायद चिमनी जला रखी है।

कुछ ही पलों में मैं उस कमरे में दाखिल हुआ जिसमें संपत और दयाल जगन को कैद किए मौजूद थे। जगन की नज़र जैसे ही मुझ पर पड़ी तो भय से उसका चेहरा पीला पड़ गया। मारे ख़ौफ के वो जूड़ी के मरीज़ की तरह कांपने लगा। संपत और दयाल ने उसे रस्सियों में बांध दिया था जिसके चलते वो कहीं भाग नहीं सकता था। उसे देखते ही मेरे अंदर गुस्से का ज्वालामुखी सा धधक उठा जिसे मैंने बड़ी मुश्किल से शांत करने की कोशिश की।

"म..मुझे म..माफ़ कर दो वैभव।" मैं जैसे ही उसके क़रीब पहुंचा तो जगन ने भयभीत हो कर ये कहा। उसके मुख से जैसे ही मैंने ये सुना तो मुझे एकदम से गुस्सा आ गया और मैंने खींच के एक थप्पड़ उसके गाल पर जड़ दिया जिससे वो वहीं उलट गया।

"वैभव नहीं।" मैंने उसको गिरेबान से पकड़ कर उठाते हुए गुस्से में कहा____"छोटे ठाकुर बोल, छोटे ठाकुर। वैभव कहने का अधिकार खो दिया है तूने।"

मेरे ख़तरनाक तेवर देख जगन की हालत और भी ख़राब हो गई। उसके मुख से कोई आवाज़ न निकली। तभी मैंने देखा कि मारे दहशत के उसका पेशाब छूट गया। कमरे के फर्श पर उसका पेशाब फैलता जा रहा था। ये देख मुझे उसके ऊपर और भी गुस्सा आ गया।

"अभी तो पेशाब ही निकला है तेरा।" मैं उसे छोड़ कर उससे दूर हटते हुए बोला____"जल्दी ही तेरी गांड़ से टट्टी भी इसी तरह निकलेगी। मन तो करता है कि इसी वक्त तेरी जान ले लूं मगर नहीं उससे पहले तू किसी रट्टू तोते की तरह वो सब बताएगा जो जो तूने कुकर्म किए हैं।"

इससे पहले कि वो कुछ बोलता मैं पलटा और संपत तथा दयाल की तरफ देखते हुए कहा___"मंगू के आने के बाद इसे घसीटते हुए इसके गांव ले चलना और हां इस बात की ज़रा भी परवाह मत करना कि घसीटने की वजह से इसकी क्या दुर्गति हो जाएगी।"

ये कह कर मैं बाहर आ गया। असल में मुझे इतना गुस्सा आया हुआ था कि मैं जगन के साथ कुछ भी बुरा कर सकता था जबकि फिलहाल उसका ज़िंदा रहना ज़रूरी था। बाहर आ कर मैं लकड़ी के एक छोटे से तख्त पर बैठ गया और मंगू के आने का इंतजार करने लगा। क़रीब बीस मिनट बाद मंगू आया जोकि भुवन के साथ उसकी मोटर साईकिल पर ही था। भुवन ने मुझे अदब से सलाम किया तो मैंने उसे चलने का इशारा किया और मंगू को पीछे आने को कहा।

✮✮✮✮

सरोज काकी गुमसुम सी बैठी हुई थी। उसके मन मस्तिष्क में हवेली में हुई घटना से संबंधित ही बातें चल रहीं थी। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि हवेली में इतनी बड़ी घटना घट गई है। जब से उसने इस घटना के बारे में सुना था तब से उसके मन में सोच विचार चालू था। यही हाल उसकी बेटी अनुराधा का भी था, बल्कि अगर ये कहा जाए तो ज़्यादा बेहतर होगा कि उसका तो बुरा ही हाल था। ये अलग बात है कि वो अपने हाल को दिल के हाल की ही तरह अपनी मां को ज़ाहिर नहीं होने दे रही थी।

"ऐसे कब तक बैठी रहेगी मां?" अनुराधा ने उदास भाव से अपनी मां की तरफ देखते हुए पूछा____"खाना नहीं बनाएगी क्या? अनूप कई बार कह चुका है कि उसे भूख लगी है।"

"उसके लिए तू ही कुछ बना दे अनु।" सरोज ने बुझे बन से कहा____"और अपने लिए भी। मुझे तो बिल्कुल ही भूख नहीं है।"

अपनी मां की बात सुन कर अनुराधा ने मन ही मन कहा____'भूख तो मुझे भी नहीं है मां।' और फिर वो अनमने भाव से रसोई की तरफ बढ़ गई। एक चिमनी आंगन में उजाला करने के लिए जल रही थी जबकि दूसरी चिमनी ले कर अनुराधा रसोई में चली गई। उसका छोटा भाई अनूप अपनी मां के पास ही एक खिलौना लिए बैठा था।

सरोज के ज़हन से हवेली की घटना जा ही नहीं रही थी। बार बार उसके ख़्यालों में वैभव भी आ जाता था जिसके बारे में सोच कर उसे बड़ा दुख हो रह था। अभी वो ये सब सोच ही रही थी कि तभी घर के बाहर किसी वाहन की आवाज़ उसे सुनाई दी। उसे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे कोई वाहन उसके घर के बाहर ही आ कर रुक गया है। शाम के वक्त किसी वाहन के बारे में सोच सरोज को थोड़ा अजीब सा लगा क्योंकि उसके मन में हवेली की घटना भी चल रही थी। सरोज के अंदर एक भय सा पैदा हो गया। एक तो वैसे भी उसका घर गांव से बाहर एकांत में बना हुआ था इस लिए अगर कोई ऐसी वैसी बात हो जाती तो उसकी मदद के लिए कोई आ भी नहीं सकता था।

सरोज फ़ौरन ही उठ कर खड़ी हो गई और बाहर वाले किवाड़ को देखने लगी। उसके मन में तरह तरह के ख़याल आने लगे थे। तभी किसी ने बाहर वाला किवाड़ बजाया तो सरोज एकदम से घबरा गई। उसे समझ न आया कि शाम के इस वक्त कौन आया होगा? किवाड़ बजाने की आवाज़ रसोई तक भी गई थी जिसे अनुराधा ने भी सुन लिया था।

"बाहर कोई आया है क्या मां?" अनुराधा ने रसोई के अंदर से ही पूछा।

"लगता तो ऐसा ही है अनु।" सरोज ने अपनी घबराहट को छुपाते हुए कहा____"रुक देखती हूं कौन है बाहर। तू रसोई में ही रह।"

कहने के साथ ही सरोज दरवाज़े की तरफ बढ़ चली। धड़कते दिल के साथ अभी वो कुछ ही क़दम चली थी कि किवाड़ फिर से बजाया गया और साथ ही एक मर्दाना आवाज़ भी आई। सरोज ने महसूस किया कि आवाज़ जानी पहचानी है लेकिन किसकी है ये उसे ध्यान में नहीं आ रहा था। ख़ैर कुछ ही देर में उसने जा कर दरवाज़ा खोला तो देखा बाहर भुवन खड़ा था और साथ ही उसके पीछे कुछ और भी लोग थे।

"तुम भुवन हो ना?" सरोज ने भुवन को देखते हुए पूछा तो भुवन ने हां में सिर हिलाते हुए कहा____"हां काकी मैं भुवन ही हूं। वो बात ये है कि छोटे ठाकुर आए हैं।"

"क..क्या तुम वैभव की बात कर रहे हो बेटा?" सरोज को जैसे यकीन ही न हुआ था। उसके पूछने पर भुवन ने एक बार फिर से हां में सिर हिलाया और एक तरफ हट गया। वो जैसे ही हटा तो सरोज की नज़र कुछ ही दूरी पर खड़ी मोटर साईकिल पर पड़ी जिसमें मैं बैठा हुआ था।

"तुम वहां क्यों बैठे हो वैभव बेटा?" सरोज ने व्याकुल भाव से कहा____"अंदर आओ न।"

"नहीं काकी।" मैंने कहा____"मैं यहीं पर ठीक हूं। असल में इस वक्त मेरे यहां आने की एक ख़ास वजह है।"

"कोई भी वजह हो।" सरोज ने कहा____"मुझे इससे मतलब नहीं है। तुम बस अंदर आओ।"

"ज़िद मत करो काकी।" मैंने सपाट लहजे में कहा____"मैंने कहा न कि मैं यहीं पर ठीक हूं। ख़ैर मैं तुम्हें ये बताने आया हूं कि जिसने मुरारी काका की हत्या की थी उसे पकड़ लिया है मैंने और उसको ले कर आया हूं।"

मेरी बात सुनते ही सरोज काकी एकदम बुत सी बनी खड़ी रह गई। मैं समझ सकता था कि ये बात सुनते ही उसके अंदर भीषण हलचल सी मच गई होगी। अभी मैं उसके मुख से कुछ सुनने का इंतज़ार ही कर रहा था कि तभी मेरी नज़र उसके पीछे अभी अभी आई अनुराधा पर पड़ी। अपनी मां के पीछे खड़ी वो एकटक मुझे ही देखने लगी थी। इधर उसको देखते ही मेरे दिल की धड़कनें एकाएक ही तेज़ हो गईं। मैंने महसूस किया कि वो मुझसे अपनी नज़रें नहीं हटा रही है। आम तौर पर पहले ऐसा नहीं होता था। यानि इसके पहले जब भी हमारी नज़रें आपस में मिलती थीं तो वो अपनी नज़रें झुका लेती थी जबकि इस वक्त वो बिना पलकें झपकाए मुझे ही देखे जा रही थी। उसके चेहरे पर ज़माने भर की उदासी और दुख संताप नज़र आया मुझे।

"य..ये तुम क्या कह रहे हो बेटा?" तभी सरोज ने लड़खड़ाती आवाज़ में कहा____"क्या सच में तुम मेरे मरद के हत्यारे को पकड़ कर साथ ले आए हो?"

"मैंने तुमसे वादा किया था न काकी कि मुरारी काका के हत्यारे को एक दिन ज़रूर तुम्हारे सामने ले कर आऊंगा।" मैंने अनुराधा से नज़र हटा कर कहा____"इस लिए आज मैं उसे ले कर आया हूं। मुझे यकीन है कि हत्यारे की शकल देखने के बाद तुम्हें उसके द्वारा की गई जघन्य हत्या पर भरोसा नहीं होगा लेकिन सच तो सच ही होता है न। एक और बात, ये वो हत्यारा है जिसने मुरारी काका की हत्या तो की ही साथ में इसने हवेली के साथ भी गद्दारी की है। ऐसे व्यक्ति को ज़िंदा रहने का अब कोई हक़ नहीं है।"

मेरी बातें सुन कर सरोज काकी हैरत से देखती रह गई मेरी तरफ। मेरी नज़र एक बार फिर से उसके पीछे खड़ी अनुराधा पर पड़ी। वो अब भी मुझे ही देखे जा रही थी। ऐसा लग रहा था मानों उसने मुझे कभी देखा ही न रहा हो।

तभी वातावरण में कुछ आवाज़ें सुनाई दी तो हम सबका ध्यान उस तरफ गया। संपत, दयाल और मंगू घसीटते हुए जगन को लाते नज़र आए। जब वो क़रीब आ गए तो मैने देखा जगन के कपड़े जगह जगह से फट गए थे। मैं समझ गया कि उसकी हालत ख़राब है।

"रहम छोटे ठाकुर रहम।" जगन की नज़र जैसे ही मुझ पर पड़ी तो वो हांफते हुए और दर्द से कराहते हुए बोल पड़ा।

"क्या तुम्हें लगता है कि तुम रहम के क़ाबिल हो?" मैंने कहने के साथ ही सरोज की तरफ देखा और फिर कहा____"काकी, मिलो अपने पति के हत्यारे से। इसी ने अपने बड़े भाई की हत्या की थी, और जानती हो क्यों? क्योंकि इसे अपने भाई की ज़मीन जायदाद को हड़पना था।"

मेरी बात सुनते ही सरोज काकी को मानो होश आया। अनुराधा भी बुरी तरह सन्नाटे में आ गई थी। दोनों मां बेटी जगन को ऐसे देखने लगीं थी मानो वो कोई भूत हो। तभी अचानक सरोज काकी को जाने क्या हुआ कि वो तेज़ी से बाहर निकली और जगन के क़रीब आ कर उसे मारते हुए चीख पड़ी_____"तुमने मेरे मरद की जान ली कमीने? अपने भाई की हत्या करते हुए क्या तेरे हाथ नही कांपे? हत्यारे पापी, मेरी मांग का सिंदूर मिटाने वाले मैं तुझे जिंदा नहीं छोडूंगी।"

सरोज काकी जाने क्या क्या कहते हुए जगन को मारे जा रही थी। उधर जगन जो पहले से ही बुरी हालत में था वो और भी दर्द से कराहने लगा था। अनुराधा अपनी जगह पर खड़ी आंसू बहा रही थी। मैंने भुवन को इशारा किया तो भुवन ने आगे बढ़ कर सरोज काकी को जगन से दूर कर दिया। भुवन के दूर कर देने पर भी सरोज काकी मचलती रही।

"मुझे छोड़ दो भुवन।" काकी रोते हुए चीखी____"मैं इस हत्यारे की जान लेना चाहती हूं। इसने मेरे मासूम से बच्चों को अनाथ कर दिया है। मैं भी इसकी हत्या कर के इसके बच्चों को अनाथ कर देना चाहती हूं। फिर देखूंगी कि इसकी बीवी पर क्या गुज़रती है?"

"शांत हो जाओ काकी।" मैंने कहा____"इसने जो किया है उसकी सज़ा तो इसे ज़रूर मिलेगी लेकिन यहां नहीं बल्कि हवेली में। इसने हमारे दुश्मनों के साथ मिल कर हमारे साथ भी खेल खेला है। इस लिए इसके कुकर्मों का हिसाब हवेली में ही होगा।"

"मुझे माफ़ कर दीजिए भौजी।" जगन ने रोते हुए कहा____"मैं वो सब करने के लिए मजबूर हो गया था। कर्ज़ के चलते मेरी सारी ज़मीनें गिरवी हो गईं थी। एक एक पाई के लिए मोहताज हो गया था मैं। चार चार बच्चों के साथ अपना पेट भरना बहुत मुश्किल हो गया था। भैया को बता भी नहीं सकता था कि कर्ज़ के चलते सारी ज़मीनें मैंने गिरवी रख दी हैं। अगर भैया को पता चलता तो वो बहुत गुस्सा होते। मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूं? फिर एक दिन एक अजीब सा आदमी मिला जिसने मुझे इन सारी परेशानियों से मुक्त होने का उपाय बताया। मैं अपनी परेशानियों से मुक्त तो होना चाहता था लेकिन अपने भाई की जान की कीमत पर नहीं। मैंने बहुत सोचा लेकिन इसके अलावा दूसरा कोई चारा नज़र नहीं आया। कहीं और से कोई कर्ज़ भी नहीं मिल रहा था। गांव के बड़े लोग कर्ज़ देने से मना कर चुके थे, देते भी कैसे? मेरे पास तो अब ज़मीनें भी नहीं बची थीं जिससे वो अपनी वसूली कर लेते। मजबूर हो कर मुझे उस अजीब आदमी की बात माननी ही पड़ी। उसने बताया कि ऐसा करने से मेरे सारे दुख दूर हो जाएंगे और साथ ही अपने भाई की हत्या करने से भी मुझे कुछ नहीं होगा। क्योंकि भैया की हत्या का इल्ज़ाम छोटे ठाकुर पर लगा दिया जाता।"

"नीच इंसान।" सरोज काकी जगन को मारने के लिए झपटी ही थी कि भुवन ने उसे पकड़ लिया, जबकि वो मचलते हुए बोली____"मुझे छोड़ो भुवन, मैं इस हत्यारे की जान ले लेना चाहती हूं। इसने अपने भले के लिए मेरा सब कुछ बर्बाद कर दिया है।"

"इसके गंदे खून से अपने हाथ मैले मत करो काकी।" मैंने कठोरता से कहा____"इसने जो किया है उसकी सज़ा इसे हवेली में मिलेगी। ख़ैर, मैंने अपना वादा पूरा कर दिया है काकी। तुमसे बस इतना ही कहूंगा कि आज कल हालात बहुत ख़राब हैं इस लिए बेवक्त घर से बाहर मत निकलना। बाकी तुम्हारी ज़रूरतें पूरी करने के लिए भुवन है। ये तुम सबका ध्यान रखेगा। अच्छा अब चलता हूं, अपना ख़याल रखना।"

कहने के साथ ही मैंने अनुराधा की तरफ देखा तो पाया कि वो मुझे ही देख रही थी। उसकी आंखों में आसूं थे और चेहरे पर ज़माने भर का दर्द। ऐसा लगा जैसे वो मुझसे बहुत कुछ कहना चाहती है मगर अपनी बेबसी के चलते वो चुप थी। मैंने उससे नज़रें हटा ली और भुवन को चलने का इशारा किया।

कुछ ही पलों में हमारा काफ़िला फिर से चल पड़ा लेकिन इस बार ये काफ़िला हवेली की तरफ चल पड़ा था। संपत, दयाल और मंगू जगन को घसीटते हुए फिर से ले चले थे। जगन की हालत बेहद ख़राब थी। उसके पैरों में अब मानों जान ही नहीं थी। वो लड़खड़ाते हुए चल रहा था। कभी कभी वो गिर भी जाता था जिससे तीनों उसे घसीटने लगते थे। कच्ची मिट्टी पर जब शरीर रगड़ खाता तो वो दर्द से चिल्लाने लगता था और फिर जल्दी ही उठने की कोशिश करता। मैंने मंगू से कह दिया था कि अब उसे ज़्यादा मत घसीटे क्योंकि ऐसे में उसकी जान भी जा सकती थी। फिलहाल उसका ज़िंदा रहना ज़रूरी था। उससे बहुत कुछ जानना शेष था।



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