Adultery ☆ प्यार का सबूत ☆ (Completed) - Page 8 - SexBaba
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Adultery ☆ प्यार का सबूत ☆ (Completed)

Bhai kahani ko dhyaan se padhna tha. Usme saaf saaf likha hai baag me jagan aur safedposh ke alawa aur kaun tha.... :D

Vibhor aur ajeet sudhar gaye hain ki nahi ye to aage hi pata chalega. Sahukaar ke ladke ka jo bhi hua hoga baad me pata chal jaayega. Kusum se vaibhav ki mulakaat hone me abhi time hai....

Shukriya bhai...
 
अध्याय - 53

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अब तक....

"किसी भी इंसान के सितारे हमेशा गर्दिश में नहीं रहते जगताप।" पिता जी ने हल्की मुस्कान में कहा____एक दिन हर इंसान का बुरा वक्त आता है। हमें यकीन है कि उस सफ़ेदपोश का भी बुरा वक्त जल्द ही आएगा।"




कुछ देर और इस संबंध में भी बातें हुईं उसके बाद सब अपने अपने काम पर चले गए। दादा ठाकुर अकेले ही बैठक में बैठे हुए थे। उनके चेहरे पर कई तरह के विचारों का आवा गमन चालू था। सहसा जाने क्या सोच कर वो मुस्कुराए और फिर उठ कर हवेली के अंदर की तरफ बढ़ गए।

अब आगे....

"इधर क्यों मोड़ दिया जीप को?" मैंने अपने नए बन रहे मकान के रास्ते की तरफ जीप को मोड़ा तो भाभी ने चौंक कर मुझसे पूछा____"क्या चंदनपुर जाने का इस तरफ से भी रास्ता है?"

"नहीं भाभी।" मैंने हल्के से मुस्कुरा कर कहा____"इस तरफ से आपके मायके जाने का रास्ता नहीं है लेकिन इधर इस लिए जीप को मोड़ा है क्योंकि मुझे कुछ काम है यहां पर किसी से।"

मेरी बात सुन कर भाभी मेरी तरफ देखने लगीं। ऐसा लगा जैसे कुछ सोचने लगीं हो। मैंने उनकी तरफ एक नज़र डाली और फिर ख़ामोशी से जीप चलाते हुए कुछ ही देर में मैं उस जगह पर पहुंच गया जहां पर मेरा नया मकान बन रहा था। मेरी उम्मीद के अनुसार भुवन वहीं मौजूद था। मुझे आया देख वो जल्दी से मेरे पास आया और पहले मुझे सलाम किया फिर भाभी को। मैंने भाभी को जीप में ही बैठे रहने को कहा और खुद जीप से उतर कर भुवन को लिए थोड़ा दूर चला आया।

"मैं कुछ दिनों के लिए भाभी के साथ उनके मायके जा रहा हूं भुवन।" मैंने भुवन से कहा_____"पिता जी के हुकुम से मुझे उनके मायके में कुछ दिन रुकना भी पड़ेगा। इस लिए मैं तुम्हें कुछ ज़िम्मेदारियां दे कर जा रहा हूं और उम्मीद करता हूं कि तुम उन ज़िम्मेदारियों को हर कीमत पर निभाओगे।"

"आप बस हुकुम कीजिए छोटे ठाकुर।" भुवन ने एकदम सतर्क हो कर कहा_____"आपकी हर आज्ञा का पालन मैं अपनी जान दे कर करूंगा। बताइए, आपके यहां ना रहने कर मुझे क्या करना होगा?"

"तुम्हें मुरारी काका के घर वालों की सुरक्षा का हर कीमत पर ख़्याल रखना है।" मैंने कहा____"तुम्हें इस बात पर ख़ास ध्यान देना है कि उस घर में बाहर का कौन व्यक्ति आता है और क्या करता है? तुम्हें तो पता ही है कि आज कल हालात बहुत ही ख़राब हैं इस लिए उनकी सुरक्षा का भार अब तुम्हारे कंधो पर रहेगा। एक बात और, जगन भले ही मुरारी का भाई है लेकिन तुम्हें उसकी गतिविधियों पर भी नज़र रखनी है।"

"मैं समझ गया छोटे ठाकुर।" भुवन ने कहा____"आप बिलकुल बेफ़िक्र हो कर जाइए। मुरारी के घर वालों पर मेरे रहते कोई आंच नहीं आएगी।"

"बहुत बढ़िया।" मैंने उसके कंधे पर हाथ रख कर कहा_____"इस सबके लिए तुम्हारे पास आदमियों की कोई कमी नहीं है इस लिए सिर्फ़ अपने आदमियों के ही भरोसे मत रहना बल्कि इस मकान से ज़्यादा मुरारी के घर वालों की सुरक्षा का ज़िम्मा तुम खुद अपने हाथ में लिए रहोगे। रही बात यहां की तो इस बारे में तुम्हें सब पता ही है।"

"आप निश्चिंत रहिए छोटे ठाकुर।" भुवन ने पूरी गर्मजोशी से कहा____"भुवन आपको वचन देता है कि मेरे रहते मुरारी के घर वालों पर कोई आंच नहीं आएगी। इसके अलावा बाकी जो काम आपने मुझे सौंपे हैं वो भी बेहतर तरीके से होते रहेंगे।"

भुवन से मैंने विदा ली और जीप में आ कर बैठ गया। अब मैं निश्चिंत हो चुका था इस लिए खुशी मन से जीप को स्टार्ट किया और मोड़ कर वापस मुख्य सड़क की तरफ चल पड़ा। मेरे पीछे एक दूसरी जीप में मेरे कुछ आदमी भी पूरी सतर्कता से आ रहे थे।

"यहां कोई ज़रूरी काम था क्या तुम्हारा?" रास्ते में भाभी ने मुझसे पूछा____"वैसे इस जगह पर मकान बनवाने का विचार क्यों आया था तुम्हारे मन में?"

"बस ये समझ लीजिए भाभी कि यहां पर मकान बनवा कर मैं ऐसा कोई काम नहीं करुंगा जिसकी शायद आप सब मुझसे उम्मीद कर रहे हैं।" मैंने एक नज़र भाभी के चेहरे पर डालने के बाद कहा____"ख़ैर ये सब छोड़िए, और ये बताइए कि मायके जाने की ख़ुशी तो है न आपको?"

"ख़ुशी क्यों नहीं होगी भला?" भाभी ने मुस्कुराते हुए कहा____"मेरे भैया को दस सालों बाद बड़ी मन्नतों से पहली संतान हुई है। सच कहूं तो मैं बहुत खुश हूं और मुझे यकीन है कि भैया तो इस खुशी में आज कल फूले न समा रहे होंगे। जी करता है एक पल में वहां पहुंच जाऊं और उन सबके खुशी से जगमगाते चेहरे देखूं।"

"ज़रूर देखेंगी भाभी।" मैंने कहा____"बहुत जल्द मैं आपको उन सबके पास पहुंचा दूंगा। वैसे वहां पहुंच कर आप तो अपनों के साथ ही ब्यस्त हो जाएंगी लेकिन सोच रहा हूं कि मुझ मासूम का क्या होगा? वहां कोई मेरी तरफ ध्यान भी देगा या नहीं?"

"सब ध्यान देंगे।" भाभी ने मेरी तरफ देखते हुए कहा____"और हां, मेरे सामने तुम ज़्यादा मासूम और भोला बनने का ये नाटक मत करो। सब जानती हूं तुम्हारे कारनामे।"

"मेरे कारनामे??" मैं एकदम से चौंका____"ये क्या कह रही हैं आप?"

"मैंने कहा न कि मेरे सामने नाटक मत करो।" भाभी ने हल्के से मुस्कुरा कर कहा____"तुम अगर ये सोचते हो कि मुझे कुछ पता नहीं है तो ये तुम्हारी भूल है। तुमने मेरे मायके में अपने नाम का जो डंका बजा रखा है न उसके बारे में सब पता है मुझे।"

"पता नहीं ये क्या कह रही हैं आप?" मैं अंदर ही अंदर उनकी इस जानकारी पर हैरान था किंतु प्रत्यक्ष में अंजान बनते हुए बोला_____"भला मैं भोला भाला आदमी कैसे कहीं अपने नाम का डंका बजा सकता हूं?"

"कुछ तो शर्म करो वैभव, कुछ तो भगवान से डरो।" भाभी ने मेरे बाजू पर ज़ोर से मारते हुए कहा____"मैंने मां जी से सुना है कि बड़े दादा ठाकुर के भी हर जगह ऐसे ही डंके बजते थे और अब तुम्हारे बजने लगे हैं। आख़िर कब सुधरोगे तुम?"

"क्या आपको नहीं लगता कि मैं पहले से थोड़ा सा ही सही लेकिन सुधर गया हूं?" मैंने इस बार थोड़ा गंभीर हो कर कहा____"क्या आपको नहीं लगता भाभी कि मैं आपकी बातों को मान कर वो सब करने लगा हूं जो मुझे करना चाहिए?"

"बिल्कुल लगता है वैभव।" भाभी ने इस बार मुझे प्रशंशा की दृष्टि से देखते हुए कहा____"और सच कहूं तो तुम्हारे इस बदले हुए रूप को देख कर मैं बेहद खुश हूं। तुमने तो वो काम किया है जिसके बारे में कोई सोच भी नहीं सकता था। तुमने मेरी बेरंग और उजाड़ दुनिया में जो खुशी के रंग भर दिए हैं उसके लिए मैं हमेशा तुम्हारी ऋणी रहूंगी। अब तो बस एक ही इच्छा है कि तुम पूरी तरह से सुधर जाओ और पूरी ईमानदारी से हर ज़िम्मेदारी को निभाओ।"

"मुझसे जो हो सकता है उसे मैं पूरी ईमानदारी से कर रहा हूं भाभी।" मैंने संजीदगी से कहा____"और आगे भी यही कोशिश करता रहूंगा कि आपकी उम्मीदों पर खरा उतरूं। ख़ैर ये सब छोड़िए और ये बताइए कि अब भैया का बर्ताव कैसा है आपके साथ?"

"उनका तो जैसे कायाकल्प हो गया है वैभव।" भाभी ने ख़ुशी ज़ाहिर करते हुए कहा____"साढ़े तीन साल पहले जैसे वो थे उससे कहीं ज़्यादा अब उनका बर्ताव बेहतर हो गया है। आज कल तो मैं उनके हर क्रिया कलाप से हैरान होती रहती हूं। कभी कभी तो ऐसा आभास होता है जैसे वो मेरे पति हैं ही नहीं बल्कि उनकी शक्ल में कोई और ही बेहतर इंसान आ गया है।"

"हाहाहा ऐसा क्या करने लगे हैं वो।" मैंने हंसते हुए कहा____"जिससे आप इतना ज़्यादा हैरान होती रहती हैं?"

"अब तुमसे क्या बताऊं वैभव।" भाभी के चेहरे पर सहसा शर्म की लाली उभर आई____"बस यूं समझो कि अब उनके हर कार्य से मैं खुश हूं।"

"फिर तो ये अच्छी बात है।" मैंने सहसा मायूस हो कर कहा_____"बस एक हम ही हैं जिस पर इतने कड़े प्रतिबंध लगा दिए गए हैं। कुछ लोगों को शायद हमारा ख़ुश रहना अच्छा नहीं लगता।"

"चिंता मत करो।" भाभी ने हल्के से हंसते हुए कहा_____"तुम्हारी ख़ुशी का भी जल्द इंतजाम किया जाएगा। इस बार मां जी से कहूंगी कि वो तुम्हारे लिए कोई अच्छी सी लड़की खोजें और फिर जल्दी ही तुम्हारा ब्याह कर दें ताकि ख़ुश होने का तुम्हें भी एक बेहतरीन साधन मिल जाए।"

"ये तो ग़लत बात है भाभी।" मैंने बुरा सा मुंह बनाते हुए कहा____"अभी तो मेरी खेलने कूदने की उमर है और आप मेरे गले में किसी लड़की से ब्याह करवा के घंटी बांध देने की बात कर रही हैं? सरासर नाइंसाफी है ये मेरे साथ।"

"कोई नाइंसाफी नहीं है ये।" भाभी ने हंसते हुए कहा____"बल्कि ये तो ऐसी बात है जिसके बाद तुम्हारा हर जगह झंडे गाड़ना बंद हो जाएगा। ऐसी देवरानी लाऊंगी जो हर वक्त तुम्हारी अक्ल को ठिकाने लगाती रहे और तुम्हारा उछलना कूदना बंद कर दे।"

"वाह! क्या बात है।" मैंने कहा____"मेरी अपनी ही प्यारी भाभी मेरी खुशियों को आग लगा देना चाहती हैं। हे ऊपर वाले! ये सब सुनने से पहले मैं बहरा क्यों नहीं हो गया?"

"ज़्यादा नाटक मत करो।" भाभी ने हंसते हुए कहा____"और अब चुपचाप गाड़ी चलाओ। एक बात और, मेरे मायके में किसी के यहां झंडे गाड़ने का सोचना भी मत वरना इस बार मैं ख़ुद पिटाई करूंगी तुम्हारी।"

"देखिए ऐसा है भाभी कि मैं अपनी तरफ से तो पूरी कोशिश करूंगा कि ऐसा न हो।" मैंने मज़ाकिया लहजे में कहा____"लेकिन अगर कोई मुझ पर मोहित हो कर ख़ुद ही मेरे पास प्रसाद लेने आएगी तो फिर मैं प्रसाद दिए बगैर मानूंगा भी नहीं।"

"हाय राम! बहुत ही निर्लज्ज हो तुम।" भाभी ने फिर से मेरी बाजू पर ज़ोर से मारा____"मैं समझ गई कि तुम कभी नहीं सुधर सकते। जाओ मुझे तुमसे अब कोई बात नहीं करना।"

"अच्छा ठीक है बात मत कीजिए।" मैंने उन्हें छेड़ने के इरादे से कहा____"लेकिन ये तो बताइए कि आपके मायके में वो शालिनी नाम की लड़की अभी भी है न? असल में पिछली बार जब उससे मुलाक़ात हुई थी तो बता रही कि अब उसका भी ब्याह हो जाएगा तो शायद ही अब उससे मेरी मुलाक़ात हो पाए।"

"हे भगवान! क्या तुमने उसे भी नहीं बक्शा?" भाभी ने आश्चर्य से आंखें फाड़ कर मेरी तरफ देखा____"कितने ख़राब हो तुम वैभव। यकीन नहीं होता कि तुमने मेरी सहेली को भी....। उफ्फ क्या कहूं तुम्हें?"

"अरे! आप ग़लत समझ रही हैं भाभी।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"मैंने उस लड़की के साथ कुछ भी ग़लत नहीं किया है लेकिन हां, उस पर दिल ज़रूर आ गया था। जितनी प्यारी वो दिखती थी उतनी ही प्यारी बातें भी करती थी। हमारे बीच मामला कुछ हद तक आगे बढ़ चुका था। पिछली बार जब मैं उसकी गोद में सिर रख के लेटा हुआ था तो उसने अपनी ज़ुल्फों से मेरे चेहरे को ढंक दिया था। क़सम से भाभी, वो दृश्य बड़ा ही मनमोहक था। उसके बाद आपको पता है आगे क्या हुआ?"

"मुझे मत बताओ।" भाभी ने गुस्से से कहा____"मुझे तुम्हारी ये गंदी बातें हर्गिज़ नहीं सुनना। तुम बस ख़ामोशी से गाड़ी चलाओ।"

"ज़ालिम लोग।" मैंने हताश भाव से कहा____"किसी को हमारी खुशी की परवाह ही नहीं है। ख़ैर कोई बात नहीं, ठाकुर वैभव सिंह का नसीब ही खोटा है तो कोई क्या ही कर सकता है?"

मैं जानता था कि भाभी मेरी बातों से चिढ़ गई हैं इस लिए अब मैं और उन्हें गुस्सा नहीं दिलाना चाहता था। उसके बाद का सारा सफ़र ख़ामोशी में ही गुज़रा। आख़िर हम भाभी के मायके चंदनपुर पहुंच ही गए। वहां सबने बड़ी गर्मजोशी से हमारा स्वागत किया। भाभी अपने माता पिता और भैया भाभी से मिल कर बेहद खुश हो गईं थी।

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अनुराधा रसोई में दोपहर का खाना बना रही थी लेकिन उसका ध्यान खाना बनाने में नहीं बल्कि कहीं और ही था। बार बार उसके ज़हन में वैभव की कही हुई बातें गूंज उठती थी और वो उन बातों के बारे में सोचने लगती थी। जब से वैभव उसके यहां से वो सब कह कर गया था तब से वो ज़्यादातर उसी के बारे में ही सोचती रही थी। पिछली रात तो उसे नींद ही नहीं आ रही थी। चारपाई पर देर रात तक वो करवटें बदलती रही थी। बड़ी मुश्किल से पता नहीं रात के कौन से पहर उसे नींद आई थी। उसके बाद सुबह हुई और फिर जैसे ही उसे पिछली रात नींद न आने की वजह याद आई तो वो फिर से वैभव के बारे में सोचने लगी थी।

अनुराधा की मां सरोज सुबह से अब तक कई बार उससे पूछ चुकी थी कि वो इतना खोई खोई सी क्यों है? अगर उसकी तबियत ठीक नहीं है तो वो उसे वैद्य के पास ले जाएगी मगर अनुराधा ने बस यही कहा कि ऐसी कोई बात नहीं है। अब भला वो उसे क्या बताती कि वो क्यों सुबह से गुमसुम है अथवा किस वजह से खोई खोई सी है? वो घर के कामों में अपना मन लगा कर किसी तरह उस सबको भूलने की कोशिश करती रही लेकिन रसोई में बैठ कर जब वो खाना बनाने लगी तो एक बार फिर से उसके ज़हन में वही सब चलने लगा था।

अनुराधा कोई बच्ची नहीं थी, वो जानती थी कि दुनिया में क्या क्या होता है और लोग कैसी कैसी मानसिकता के होते हैं। उसने अपनी छोटी सी दुनिया में यूं तो और भी बहुत कुछ देखा सुना था लेकिन पिछले कुछ महीनों में जो कुछ उसने देखा सुना था वो उस सबसे अलग था। वो एक ऐसी लड़की थी जिसने कभी किसी मर्द जात को नज़र उठा कर नहीं देखा था, सिवाय अपने बापू और काका जगन के। गांव से थोड़ा दूर उसका घर अकेला ही बना हुआ था इस लिए गांव के लड़के इस तरफ नहीं आते थे। जगन काका के घर भी जब वो जाती थी तो कोई न कोई उसके साथ होता था इस लिए उसके साथ कभी ऐसा वैसा कुछ हुआ ही नहीं था। दूसरे उसका स्वभाव भी कुछ शांत और शर्मीला सा था जिसकी वजह से वो कभी किसी पराए मर्द की तरफ देखने की हिम्मत नहीं करती थी। अपने बापू की लाडली थी वो, अपने बापू का गुरूर थी वो। हालाकि उसकी मां हमेशा उसके इस गुप्पे स्वभाव के लिए डांटती थी।

जीवन बहुत खुशहाल भले ही नहीं था लेकिन जैसा भी था वो उससे खुश थी। उसकी एक छोटी सी दुनिया थी, जिसमें उसके मां बापू और एक छोटा सा लेकिन प्यारा सा भाई था। उसने ख़्वाब में भी नहीं सोचा था कि आगे एक ऐसा वक्त आएगा जब उसके छोटे से संसार में बहुत कुछ बदल जाएगा। एक दिन उसे पता चला कि उसके बापू ने दूसरे गांव के एक ऐसे लड़के की मदद करने की ज़िम्मेदारी ले ली है जिसके बाप ने उसे गांव समाज से बेदखल कर दिया है।

वक्त कभी किसी के लिए नहीं रुकता, वो पंख लगाए उड़ता ही रहता है। अनुराधा के कानों तक भी ये बात पहुंच चुकी थी कि दादा ठाकुर ने अपने जिस लड़के को गांव समाज से बेदखल किया है उस लड़के का नाम क्या है और उसका चरित्र कैसा है। अनुराधा ये सोच कर तो खुश हुई थी कि उसके बापू किसी बेसहारे की मदद कर रहे हैं लेकिन इस बात से वो थोड़ा असहज भी हो गई थी कि जिस लड़के का चरित्र ही ठीक नहीं है उसकी मदद करने का कोई बुरा असर न पड़ जाए। उसकी मां ने भी इस बात के लिए उसके बापू को समझाया था लेकिन होनी को तो जैसे यही मंजूर था। ख़ैर वक्त ऐसे ही गुज़रता रहा, और गुज़रते वक्त के साथ वैभव नाम के लड़के के प्रति जो ख़ौफ था वो भी दूर होता गया।

वैभव जब पहली बार उसके बापू के साथ उसके घर आया था तब उसने भी उसे चुपके से देखा था। उसके भोले भाले मन में ये जानने की उत्सुकता थी कि जिस लड़के के बारे में दूर दूर तक के गांव में भी बातें फैली हुई हैं वो दिखता कैसा है? जिस घर में वो बड़ी बेबाकी के साथ रहती आई थी उस दिन वैभव के आने से पता नहीं क्यों उसे असहज महसूस होने लगा था। ख़ैर जब उसकी नज़र उस करामाती लड़के पर पड़ी तो जैसे वो कुछ देर के लिए ख़ुद को ही भूल गई थी। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि कामदेव की तरह सुंदर और हट्टे कट्टे जिस्म वाला ये लड़का ऐसे काम भी करता होगा। उस मासूम को भला कैसे ये ज्ञान हो सकता था कि आंखें जो देखती हैं हमेशा वही सच नहीं होता। दुनिया में ऐसे नेक इंसान भी भरे पड़े हैं जिनकी शक्लो सूरत अच्छी नहीं होती लेकिन लोग पहली नज़र में उन्हें एक बुरा इंसान ही समझ बैठते हैं।

वैभव शक्ल सूरत से भले ही एक सुंदर नवयुवक था लेकिन उसके कर्म उसकी तरह सुंदर नहीं थे। अनुराधा को उस वक्त झटका लगा था जब वैभव ने भी उसकी तरफ देखा था और उसकी नज़र उससे जा मिली थी। वो एकदम से हड़बड़ा गई थी, दिल की धड़कनें धाड़ धाड़ कर उसकी कनपटियों पर बजने लगीं थी। वो घबरा कर जल्दी से अन्दर भाग गई थी। उसके बाद वो अक्सर यही कोशिश करती कि वैभव के घर आने पर वो उसके सामने कम ही जाए। हालाकि उसकी सूरत को एक बार देख लेने की चाह उसके मन में ज़रूर रहती थी और ऐसा क्यों था ये उसे ख़ुद नहीं पता था। शायद ये वैभव के सुंदर होने की वजह से था जिसके चलते न चाहते हुए भी एक लड़की उसे देखने पर मज़बूर हो जाती थी।

वैभव जब भी उसके घर आता तो वो चुपके से उसे देख लेती और फिर अपने सामने उसके बारे में तरह तरह की बातें सोचने लगती। उसे बार बार याद आता कि ये वही लड़का है जो न जाने कितनी लड़कियों और औरतों को अपने जाल में फांस कर उनके साथ ग़लत कर चुका है। इस ख़्याल के साथ ही अनुराधा के मन में वैभव के प्रति एक घृणा सी भर जाती लेकिन इसके लिए वो ख़ुद कुछ नहीं कर सकती थी। ऐसे ही वक्त गुज़रता रहा और एक महीना गुज़र गया। इस एक महीने में काफी कुछ बदल गया था। वैभव के प्रति उसके मन में जो ख़्याल पहले पैदा हुए थे वो अब ये सोच कर ग़ायब से होने लगे थे कि अगर ये इतना ही गंदा लड़का होता तो अब तक वो मुझे भी अपने जाल में फांस लेता, ये अलग बात है कि मैं उसके जाल में कभी न फंसती। उसने ख़ुद महसूस किया था कि इस एक महीने में वैभव ने कभी उसे ग़लत नज़र से नहीं देखा और ना ही कभी उससे बात करने की कोशिश की है। अनुराधा को लगने लगा कि शायद उसने उसके बारे में ग़लत सुना था, लेकिन फिर वो ये भी सोचती कि हर कोई तो ग़लत नहीं कह सकता ना?

इस सृष्टि का नियम है कि देर से ही सही लेकिन हमारे लिए सब कुछ सामान्य हो जाता है और हम सब कुछ भूल कर एक नए सिरे से जीवन को जीना शुरू कर देते हैं। यही हाल अनुराधा का हुआ था। उसे पूरी तरह से भले ही यकीन नहीं हुआ था लेकिन क्योंकि वो देख और महसूस कर चुकी थी कि वैभव वैसा तो बिलकुल नहीं है जैसा कि उसके बारे में लोगों ने फैला रखा है, इस लिए अब वो काफी हद तक सहज हो गई थी।

अपने गांव के लड़कों को देखा था उसने लेकिन वैभव उन सबसे अलग ही दिखता था उसे। वो उन सबसे सुंदर दिखता था, उसका जिस्म हट्टा कट्टा था जो उसकी उमर के लड़कों में उसने किसी का भी नहीं देखा था। जब भी किसी दिन वो उसके घर आता था तो वो उसे छुप कर देखती थी। अकेले में वो बस यही सोचती थी कि उसकी बूढ़ी दादी अपनी कहानियों में जिन राजकुमारों का ज़िक्र करती थी वैभव बिलकुल वैसा ही लगता है। ये बात सोच कर वो एकदम से खुश हो जाती और फिर सहसा मायूस हो कर सोचती कि काश वो भी एक राजकुमारी की तरह सुंदर होती।

सहसा कुछ जलने की गंध महसूस हुई तो अनुराधा को होश आया। उसने हड़बड़ा कर देखा तो तवे में पड़ी रोटी धुआं देने लगी थी। चूल्हे के अंदर जो रोटी लकड़ी के अंगारों की आंच में पकने के लिए एक तरफ टिकी थी वो तो कब की ख़ाक हो चुकी थी। ये सब देख कर अनुराधा बुरी तरह घबरा गई। एक तो गर्मी और ऊपर से चूल्हे की आंच में वैसे भी उसका बुरा हाल था। जीवन में पहली बार उसे खाना बनाना इतना मुश्किल काम लग रहा था। वो हताश और परेशान सी हो कर कभी तवे के ऊपर पड़ी अधजली और धुआं दे रही रोटी को देखती तो कभी अपने हाथ में लिए उस लोई को जिसे दोनों हथेलियों द्वारा थाप लगाने से उसे रोटी का आकार देना बाकी था।

अनुराधा ने फौरन ही लोई को गुंथे हुए आटे पर रखा और चिमटे से तवे को चूल्हे से उतारा। तवे पर पड़ी रोटी तवे पर एकदम से चिपक गई थी और धुआं छोड़ रही थी। अनुराधा जल्दी जल्दी चिमटे से उसे कुरेद कुरेद कर निकालने लगी। पसीने से उसका बुरा हाल था, उसने महसूस किया जैसे आज कुछ ज़्यादा ही गर्मी है। कुछ ही देर के प्रयास में उसने तवे से उस अधजली रोटी को निकाल कर एक तरफ रख दिया। तवे में एक काली परत सी बन गई थी जिससे नई बनने वाली रोटियां यकीनन ख़राब हो सकतीं थी इस लिए अनुराधा चिमटे से तवे को पकड़ कर बाहर नरदे के पास ले आई। उसकी मां कपड़े वगैरा ले कर घर के पीछे कुएं में गई हुई थी। अनुराधा ने जल्दी जल्दी पानी डाल कर पहले गर्म तवे को ठंडा किया और फिर थोड़ी मिट्टी ले कर तवे को मांजने लगी। कुछ ही देर में उसने तवे को एकदम साफ़ कर दिया।

रसोई में आ कर अनुराधा ने तवे में सफ़ेद छुई से हल्का लेप लगाया और फिर उस तवे को मिट्टी के चूल्हे पर चढ़ा दिया। चूल्हे में मौजूद लकड़ी और कंडे को उसने सुव्यवस्थित किया और फिर गुंथे हुए आटे से लोई ले कर रोटी पोने लगी। उसने निश्चय कर लिया कि अब वो सिर्फ़ रोटी बनाने पर ही ध्यान देगी वरना अगर उसकी मां आ गई और उसे रोटियों के जलने की गंध महसूस हो गई तो बहुत डांटेगी।

अक्सर ऐसा होता है कि हम सोचते कुछ हैं और होता कुछ और ही है। जिस चीज़ को हम भुलाने का प्रयास करते हैं वो भूलने के बहाने से याद आती ही रहती है। अनुराधा को सच में आज का खाना बनाना बेहद मुश्किल काम लगा था। ख़ैर किसी तरह खाना बना ही डाला उसने। उसकी मां भी नहा धो कर आ गई थी इस लिए सबने एक साथ ही बैठ कर खाना खाया। खाने के बाद अनुराधा ने जूठे बर्तनों को एक तरफ रखा और फिर वो अपने कमरे में चारपाई पर आराम करने के लिए लेट गई। आंखें बंद की तो एक बार फिर से वैभव का चेहरा उभर आया और साथ ही उसकी बातें उसके कानों में गूंजने लगीं।

अनुराधा ने झट से आंखें खोली और फिर बेचैनी से करवट बदल कर दूसरी तरफ घूम गई। वो बच्ची नहीं थी, उसे दुनियादारी वाली हर बातों की समझ थी। अच्छे बुरे का भली भांति ज्ञान था उसे। जो चीज़ उसे रात से परेशान कर रही थी उसका उसे अब शिद्दत से एहसास हो रहा था। उसे एहसास हो रहा था कि उसने वैभव को भावना में बह कर कुछ ज़्यादा ही बोल दिया था। पिछले पांच महीनों से वो वैभव को पहचानने की कोशिश कर रही थी और इन पांच महीनों में इतना तो उसे एहसास हो ही चुका था कि वैभव दूसरी लड़कियों के बारे में भले ही चाहे जैसा सोचता हो लेकिन कम से कम उसके बारे में वो ग़लत नहीं सोचता था।

अनुराधा को सहसा याद आया कि कैसे वो हर बार उसे ठकुराईन कह कर चिढ़ाता था और वो अपने लिए ठकुराईन सुन कर शर्म से सिमट जाती थी। आम तौर पर ठकुराईन शब्द किसी ब्याहता औरत के लिए प्रयोग किया जाता है किंतु वैभव का उसे ठकुराईन कहना अजीब तो लगता ही था लेकिन कहीं न कहीं अपने लिए उसे वैभव के मुख से ये सुन कर अच्छा भी लगता था। एक अलग ही तरह का एहसास होता था उसे जिसके बारे में उसे ख़ुद ही पता नहीं था। चारपाई पर दूसरी तरफ मुंह किए लेटी अनुराधा वैभव के साथ बिताए आख़िरी पलों में जैसे खो सी गई।

"आप क्यों बार बार मुझे ठकुराईन कहते हैं?" वैभव के ठकुराईन कहने पर वो शर्म से लाल हो गई थी, और फिर उसने उससे यही कहा था।

"क्यों न कहूं?" उसने मानों उसे छेड़ा____"आख़िर तुम हो तो ठकुराईन ही। अगर तुम्हें मेरे द्वारा ठकुराईन कहने पर ज़रा सा भी एतराज़ होता तो तुम्हारे होठों पर इस तरह मुस्कान न उभर आती।"

"तो क्या चाहते हैं आप कि मैं आपके द्वारा ठकुराईन कहने पर आप पर गुस्सा हुआ करूं?" उसने अपनी मुस्कान को छुपाने की नाकाम कोशिश करते हुए कहा था।

"क्यों नहीं।" वैभव ने उसकी गहरी आंखों में देखा था____"तुम्हें मुझ पर गुस्सा होने का पूरा हक़ है। तुम मेरी डंडे से पिटाई भी कर सकती हो।"

"धत्त! ये क्या कह रहे हैं आप?" वो वैभव की ये बात सुन कर बुरी तरह चौंकी थी, फिर शर्माते हुए बोली____"मैं भला कैसे आपकी पिटाई कर सकती हूं?"

"क्यों नहीं कर सकती?" वैभव ने मुस्कुराते हुए कहा था____"अगर मैं कोई ग़लती करता हूं तो तुम्हें पूरा हक़ है मेरी पिटाई करने का।"

"न जी न।" वो शरमा कर दरवाज़े से एक तरफ हट गई थी, फिर अपनी मुस्कुराहट को दबाते हुए बोली____"मैं तो ऐसा सोच भी नहीं सकती।"

चारपाई पर लेटी अनुराधा की आंखों के सामने जैसे ही ये सारे दृश्य उजागर हुए और वैभव से उसकी ये बातें महसूस हुईं तो सहसा उसके होठों पर मुस्कान उभर आई। उसके नन्हे से दिल में एक हलचल सी मच गई थी। तभी सहसा उसे कुछ ऐसा याद आया जिसने उसे कहीं और ही धकेल दिया।

"ओह! तो मेरी अनुराधा रूठ गई है मुझसे?" वैभव के मुख से जैसे ही उसने ये सुना तो उसे बड़ा ज़ोर का झटका लगा था। आंखें फाड़े वो उसकी तरफ देखने लगी थी, किंतु जल्दी ही सम्हली और फिर बोली____"ये क्या कह रहे हैं आप? मैं आपकी अनुराधा कैसे हो गई?"

"पता नहीं कैसे मेरे मुख से निकल गया?" उसने महसूस किया जैसे वैभव ने अपनी घबराहट को दबाने का प्रयास करते हुए कहा था____"वैसे क्या तुम्हें मेरी अनुराधा कह देने पर एतराज़ है?"

"हां बिलकुल एतराज़ है मुझे।" उसके चेहरे पर अजीब से भाव उभर आए थे____"मैं सिर्फ़ अपने माता पिता की अनुराधा हूं किसी और की नहीं। अगर आप ये समझते हैं कि आप बाकी लड़कियों की तरह मुझे भी अपने जाल में फंसा लेंगे तो ये आपकी सबसे बड़ी भूल है छोटे ठाकुर।"

अनुराधा को अपनी कही हुई बातें जब महसूस हुई तो सहसा उसके समूचे बदन में सिहरन सी दौड़ गई। ज़हन में ख़्याल उभरा कि उस वक्त कितना कठोर हो गई थी वो। उसने वैभव की उन बातों का बस वही एक मतलब समझा था, पर क्या ये ज़रूरी था कि उसके कहने का सिर्फ़ वही मतलब रहा हो? ये सब सोच कर उसके अंदर एक हूक सी उठी जिसके चलते उसे एक ऐसे दर्द की अनुभूति हुई जो अब तक मिले हर दर्द से अलग था। अचानक उसके कानों में वैभव के कहे शब्द गूंज उठे।

"अब जल्दी से कोई डंडा खोज कर लाओ।" उसकी तीखी बातें सुन कर वैभव ने कहा था____"और उस डंडे से मेरी पिटाई करना शुरू कर दो।"

"ये क्या कह रहे हैं आप?" वैभव की बात सुन कर जब वो उलझ गई थी तो उसने जैसे उसे समझाते हुए कहा था____"सही तो कह रहा हूं मैं। कुछ देर पहले मैंने तुमसे कहा था ना कि अगर मैं कोई ग़लती करता हूं तो तुम्हें मेरी पिटाई करने का पूरा हक़ है। अब क्योंकि मैंने ग़लती की है तो इसके लिए तुम्हें डंडे से मेरी पिटाई करनी चाहिए।"

"बातें मत बनाइए।" उसने कठोरता से कहा था____"सब समझती हूं मैं। अगर आपके मन में मेरे प्रति यही सब है तो चले जाइए यहां से। अनुराधा वो लड़की हर्गिज़ नहीं है जो आपके जाल में फंस जाएगी। हम ग़रीब ज़रूर हैं छोटे ठाकुर लेकिन अपनी जान से भी ज्यादा हमें अपनी इज्ज़त प्यारी है।"

"तो फिर ये भी जान लो अनुराधा कि तुम्हारी इज्ज़त मुझे भी खुद अपनी जान से भी ज़्यादा प्यारी है।" उसकी बातें सुन कर वैभव मानो हताश हो कर बोल पड़ा था____"मैं खुद मिट्टी में मिल जाना पसंद करूंगा लेकिन तुम्हारी इज्ज़त पर किसी भी कीमत पर दाग़ नहीं लगा सकता और ना ही किसी के द्वारा लगने दे सकता हूं। मैं जानता हूं कि मेरा चरित्र ही ऐसा है कि किसी को भी मेरी किसी सच्चाई पर यकीन नही हो सकता लेकिन एक बात तुम अच्छी तरह समझ लो अनुराधा कि मैं चाहे सारी दुनिया को दाग़दार कर दूं लेकिन तुम पर दाग़ लगाने की कल्पना भी नहीं कर सकता। मैं तुम्हें कई बार बता चुका हूं कि तुम वो लड़की हो जिसने मेरे मुकम्मल वजूद को बदल दिया है और मुझे खुशी है कि तुमने मेरा कायाकल्प कर दिया है। तुमसे हसी मज़ाक करता हूं तो एक अलग ही तरह का एहसास होता है। मेरे मन में अगर ग़लती से भी तुम्हारे प्रति कोई ग़लत ख़्याल आ जाता है तो मैं अपने आपको कोसने लगता हूं। ख़ैर, मैं तुम्हें कोई सफाई नहीं देना चाहता। अगर तुम्हें लगता है कि मेरे यहां आने का सिर्फ़ यही एक मकसद है कि मैं तुम्हें भी बाकी लड़कियों की तरह अपने जाल में फंसाना चाहता हूं तो ठीक है। मैं तुम्हें वचन देता हूं कि ठाकुर वैभव सिंह आज के बाद तुम्हारे इस घर की दहलीज़ पर अपने क़दम नहीं रखेगा। तुम्हारे साथ जो चंद खूबसूरत लम्हें मैंने बिताए हैं वो जीवन भर मेरे लिए एक अनमोल याद की तरह रहेंगे। ये भी वचन देता हूं कि इस घर के किसी भी सदस्य पर किसी के द्वारा कोई आंच नहीं आने दूंगा। चलता हूं अब, ऊपर वाला तुम्हें हमेशा खुश रखे।"

कानों में गूंजते वैभव के ये एक एक शब्द मानो अनुराधा के हृदय को चीरते हुए उसकी अंतरात्मा तक को झकझोरते चले गए थे। उसे एकदम से ऐसा महसूस हुआ जैसे सब कुछ एक पल में शांत हो गया हो। अपने चारो तरफ उसे दूर दूर तक फैली एक सफेद धुंध सी दिखाई दी और उस धुंध के बीच उसने खुद को अकेला पाया___एकदम बेबस, लाचार और असहाय। अनुराधा घबरा कर चारपाई पर उठ कर बैठ गई। समूचे बदन में एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई उसके। दिलो दिमाग़ में बड़ी तेज़ी से कोई तूफ़ान सा उठ खड़ा हुआ। नन्हे दिल में अभी अभी पैदा हुए जज़्बात बुरी तरह से मचल उठे। सहसा उसकी बाईं आंख से एक आंसू का कतरा निकला और उसके रुखसार पर टपक पड़ा। उसने चौंक कर इधर उधर देखा और फिर आंसू के उस कतरे को पोंछते हुए कमरे से बाहर निकल गई। उसे बहुत तेज़ रोने का मन करने लगा था।


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Anuradha ghar se bhala kaha jaayegi....halaaki is samay wo jo feel kar rahi hai uske chalte usse kuch aise waise ki ummid yakeenan ki ja sakti hai. Well dekhte hain kya hota hai...

Vaibhav ne har jagah jhande gaad rakhe hain, dekho chandanpur me kya hota hai...

Bhuwan ke rahte itna jaldi Anuradha ya uske pariwar par khatra nahi aa sakta lekin satark rahna zaruri hai...
 
Vaibhav se ye algaav hi Anuradha ke komal man me uske prati komal jazbaat panpenge. Abhi to vichaaro ka manthan shuru hua hai...dekhiye ye kis had tak jata hai.. :D

Devar bhabhi ke beech thoda bahut hansi mazaak chalta hi rahta hai, baaki vaibhav yaha kya karega ye to aane wala wakt hi batayega...

Vaibhav ke na rahne par idhar dushman kya karenge ye dekhna dilchasp hoga...well shukriya mitra :hug:
 
Dhairya rakho dost, insaan ka jab hriday pariwartan hota hai to wo pichhla ghatiya hua sab kuch yaad karta hai. Ye real life me bhi hota hai...maine bas wahi dikhaya hai. Anuradha ke man ka chitran is tarike se nahi karta to kayi logo sawaal bhi khade kar dete. Abhi bhi kayi sawaal hain jinke jawaab aane wale updates me milte rahenge. Well shukriya mitra :hug:
 
Anuradha ke andar abhi to aise manthan hona shuru huye hain..dekho aage aur kya hota hai...

Wo vaibhav ka khaas hi hai.. :approve:

Bilkul vichaar kiya jayega, waise to vaibhav Anuradha se hi kah kar gaya hai ki wo uske pariwar par kabhi koi aanch nahi aane dega, so agar bhuwan usse ye sab na bhi batayega tab bhi Anuradha yahi samjhegi ki ye sab vaibhav ki hi vajah se ho raha hai. Khair dekhte hain aage kya hota hai....

Shukriya mitra, :hug:
 
Bilkul, aapka nature jaanta hai apan :D

Anuradha ne khud nahi dekha tha ki vaibhav uski maa ke sath sambandh bana raha hai. Ye baat to use rupchandra ke dwara pata chali thi, shayad aapke zahen se nikal gayi hai ye baat. Khair ye sach hai ki Anuradha ko vaibhav aur apni maa ke sambandho ka pata hai aur is vajah se vaibhav par yakeen karna uske liye asaan nahi hai..

Ye sach hai ki Vaibhav Anuradha ki vajah se badal gaya hai lekin kitna badla hai ye abhi sochne ka vishay hai. Ye bhi sach hai ki Anuradha ke asar ke chalte hi usne uski maa se sambandh banana chhod diya hai...lekin sirf itna kaafi nahi hai usko achha samajh lene ke liye. Rahi baat Anuradha ka vaibhav ko apne jiwan sathi ke roope dekhne ki to is bare me abhi use bahut sochna baaki hai...

Wo madan nahi balki murari ka bhai jagan hai... :declare:

Jagan ne kya kiya hai ya wo kyo dushmano ka sath raha hai iska pata jald hi chalega. Sunil aur Chetan jaise vaibhav ke dost uske khilaaf ja kar kyo dushman ka sath de rahe hain iska bhi khulasa hoga aage...

Yaha bahut se log Ragini aur vaibhav ke beech ek alag hi relation ki ummid kiye hain, jabki main kayi baar bata chuka hu aisa nahi hoga. Devar bhabhi ke beech hasi mazaak chalta hai aur ye jag zaahir baat hai. Well dekhiye bhavishya me kya hota hai...

Is bare zyada kuch nahi kahuga kyoki AAP soongh lenge asal player ko :D

Haan itna zarur kahuga ki khel mamuli nahi hai, balki gahra hai...

Wo safedposh hamesha awaaz badal kar apne mohro se baat karta hai...so ye farmula kaam nahi karega ;)

Shukriya is Khubsurat sameeksha ke liye :hug:
 
Devar bhabhi ke beech thoda bahut hasi mazaak to chalta hi rahta hai bhai, vaibhav jaanta hai ki wo apni bhabhi ke liye kaisa feel karta hai is liye ye hasi mazaak bhi sirf wakti taur par tha, baaki wo bhabhi se door rahne ki hi koshish karta hai....

Anuradha filhaal abhi vicharadheen hai, dekho use apne andar kya samajh aata hai... :D
 
Death Kiñg bhai, maine dekha hai ki aapke sath sath aur bhi kayi log is kahani me Ragini ko shadyantrakarta ka Mohra samajh rahe hain....Sanju bhaiya ne Ragini naam ke adhaar par hi use suspect bana rakha hai. Main aap logo ki jankaari aur sahuliyat ke liye ye clear kar dena chaahta hu ki Ragini waisi bilkul bhi nahi hai jaise ki aap log shanka jata rahe hain. Ragini ka bhinav se saadhe teen saal pahle vivaah hua tha aur ye vivaah sabki sahmati aur khushi se hua tha. Ragini ka gaav chandanpur in logo ki sarhad se bahut door hai. Ragini ke vivah se pahle chandanpur me in logo ka aisa kuch bhi nahi hua tha jise vivaad ya ranjish kaha jaaye. Kahne ka matlab ye hai ki Ragini ko suspect banana byarth hai....main chaahta to Ragini ke bare me ye sab bata use clean chit nahi deta...par maine socha aap kyo andhere me teer chala kar us par shak kare... :D

Baaki paatro ke bare me main aisi koi safaayi nahi doonga... ;)

Point hai :approve:

Ye sach hai ki dhananjay daroga ne abhi tak aisa kuch bhi nahi kiya hai jabki murari ke kaatil ka pata use laga lena chahiye tha. Uski nakaami ne shayad use sandeh ke ghere me la kar khada kar diya hai. Well next update me uska zikra hoga.... :declare:

Jagan, Sunil aur Chetan aise na jane kitne mohre honge us safedposh ke jinse wo badi hi hoshiyaari se kaam karwa raha hai. Haan, ye zarur sochne ka vishay hai ki jagan ke alawa Sunil aur Chetan ne vaibhav ke khilaaf ja kar ye sab kyo kiya hai? Jagan ne kya kiya hai aur kyo kiya hai...aise hi sawaal tabhi milenge jab ye pakad me aayenge...

Jagan ka thakuro se koi hisaab kitaab hai ki nahi ye to aage hi pata chalega...

Chetan aur Sunil ka us safedposh ke sath dekha jana kayi saare sawaal khade kar deta hai. Unke sambandh me aapne jo kuch kaha wo yakeenan sach hai iske baavjood unhone aisa kyo kiya ye wahi bata sakte hain...well dekhiye kab Inka number aata hai :D

Sahi kaha filhaal to aisa nahi lagta...par kya pata...

Safedposh ke sath jagan ke alawa do byakti Chetan aur Sunil hi the... :approve:

Bilkul sahi kaha, is situation me kaafi kuch hone ki ummid hai..dekhiye kya hota hai. Dushman itna shaatir hai ki wo bhi samajhta hai ki use kis situation me kis tarah ka kadam uthana hai aur kaise uthana hai.....

Ragini ke bare me upar ke quote me bata chuka hu dost, is liye udhar is matter ko bhool jaaiye... :D

Vaibhav ke charitra ko jaanne wala itna to bakhubi samajhta hai ki wo jaha jaayega apna asar dikhayega. Bas yahi baat hai ki Ragini ko ye sab pata hai...baaki usne apni aankho se dekha hai ki nahi ye sirf wahi bata sakti hai..

Filhaal to baad muddat ke vaibhav ke purane din laute hain, dekhiye kya gul khilata hai bhabhi ke maayke me :D

Bilkul sahi kaha aapne. Anuradha ki manodasha ko bilkul sahi pakda hai...aur isse ye saabit ho jata hai ki main aapke zahen me wo baat daalne me kamyab hua jo main chaahta tha ki har koi samjhe....

Well Anuradha ke sath pichhle kuch mahino me jo kuch hua hai wo uske liye hajam kar lena asaan nahi tha. Vaibhav ke prati uska ek akarshan tha lekin kyo tha ye wo khud hi nahi jaanti thi....magar is ghatna ke baad ab wo har cheez ke bare me gahraayi se sochegi aur jab sochegi to zaahir hai ki use cheezo ka ehsaas hoga. Ab dekhna yahi hai ki Anuradha ko kya ehsaas hota hai aur us ehsaas ke liye wo kya kadam uthaati hai....

Story title ko justify karna first priority hai aur ye aap bhi jaante ho, story me kiye gaye badlaav ki vajah se ye thoda mushkil aur chunauti bhara ho gaya hai mere liye lekin koshish jaari hai.... :D

Bahut bahut dhanyawad Death Kiñg bhai is shandaar sameeksha ke liye :hug:
 
अध्याय - 54

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अब तक....

कानों में गूंजते वैभव के ये एक एक शब्द मानो अनुराधा के हृदय को चीरते हुए उसकी अंतरात्मा तक को झकझोरते चले गए थे। उसे एकदम से ऐसा महसूस हुआ जैसे सब कुछ एक पल में शांत हो गया हो। अपने चारो तरफ उसे दूर दूर तक फैली एक सफेद धुंध सी दिखाई दी और उस धुंध के बीच उसने खुद को अकेला पाया___एकदम बेबस, लाचार और असहाय। अनुराधा घबरा कर चारपाई पर उठ कर बैठ गई। समूचे बदन में एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई उसके। दिलो दिमाग़ में बड़ी तेज़ी से कोई तूफ़ान सा उठ खड़ा हुआ। नन्हे दिल में अभी अभी पैदा हुए जज़्बात बुरी तरह से मचल उठे। सहसा उसकी बाईं आंख से एक आंसू का कतरा निकला और उसके रुखसार पर टपक पड़ा। उसने चौंक कर इधर उधर देखा और फिर आंसू के उस कतरे को पोंछते हुए कमरे से बाहर निकल गई। उसे बहुत तेज़ रोने का मन करने लगा था।

अब आगे....

गांव के शमशान में काफ़ी लोग जमा थे।

दरोगा ने रेखा और शीला की लाश को उनके घर वालों के सुपुर्द कर दिया था और अब दोनों के घर वाले अपनी अपनी बीवियों का अंतिम संस्कार करने के लिए उन्हें शमशान में ले आए थे। गांव के लोग तो थे ही साथ ही पास के गांव के भी लोग आ गए थे। दादा ठाकुर भी अपने छोटे भाई जगताप और बड़े बेटे अभिनव के साथ वहां मौजूद थे। गांव का साहूकार मणि शंकर तथा मुंशी चंद्रकांत भी वहीं था। ख़ैर सारी क्रियाएं होने के बाद लाशों का अंतिम संस्कार कर दिया गया। दोनों मृतकों के घर वाले बेहद दुखी थे। रेखा और शीला के छोटे छोटे बच्चे थे जो अब बिना मां के हो गए थे। कुछ समय बाद एक एक कर के सब लोग वहां से चले गए।

दादा ठाकुर ने आगे बढ़ कर मंगल और देवधर को सांत्वना दी और साथ ही ये भी कहा कि उन्हें जिस चीज़ की भी ज़रूरत हो वो हमेशा उन्हें हवेली से मिलती रहेगी। मंगल और देवधर को क्योंकि अपनी अपनी बीवियों का सच पता चल चुका था इस लिए वो खुद भी उस सबके लिए दादा ठाकुर के सामने हाथ जोड़े हुए थे। ख़ैर उसके बाद दादा ठाकुर और साहूकार मणि शंकर साथ साथ ही वहां से वापस चल दिए। रास्ते में इसी संबंध में थोड़ी बहुत बातें हुईं उसके बाद मणि शंकर ने बताया कि उसकी बेटी का रिश्ता एक जगह पक्का हो गया है और अब लग्न बनवा कर वो जल्द ही अपनी बेटी का ब्याह कर देना चाहते हैं। मणि शंकर की इस बात से दादा ठाकुर ने उसे बंधाई दी।

कुछ समय बाद दादा ठाकुर अपने भाई और बेटे के साथ हवेली पहुंच गए। बैठक में रखे अपने सिंहासन पर बैठने के बाद दादा ठाकुर ने जगताप और अभिनव को अलग अलग काम सौंपा और फिर कुछ देर आराम करने के लिए अपने कमरे में चले गए।

"क्या हुआ?" कमरे में आते ही हवेली की ठकुराईन सुगंधा देवी ने दादा ठाकुर से कहा____"आराम करने की जगह कहीं खोए हुए हैं आप?"

"कोई ख़ास बात नहीं है।" दादा ठाकुर ने बात को टालने की गरज से कहा____"बस ऐसे ही किसी के बारे में सोच रहे थे।"

"आप तो कभी हमसे कुछ बताते ही नहीं हैं।" सुगंधा देवी ने शिकायती लहजे में कहा____"हम तो सिर्फ़ नाम के लिए ही हैं इस हवेली में। आप मानें या न मानें लेकिन ये सच है कि इस हवेली के मर्द औरत जात को कभी कोई प्राथमिकता नहीं देते।"

"आप बेवजह ही ऐसा सोचती हैं।" दादा ठाकुर ने पलंग के सिरहाने से अपनी पीठ टीका कर कहा____"हमारी नज़र में तो इस हवेली की असल मालकिन आप ही हैं। हवेली के अंदर सिर्फ़ आप ही का शासन चलता है।"

"ये तो आप हमारा दिल रखने के लिए कह रहे हैं।" सुगंधा देवी ने कटाक्ष किया____"शायद आप ये समझते हैं कि हम बिल्कुल ही दिमाग़ से पैदल हैं इस लिए जो कुछ आप कह देंगे उसी को हम सच समझ बैठेंगे।"

"आज क्या हो गया है आपको?" दादा ठाकुर के माथे पर सहसा बल पड़ गया____"आज से पहले तो कभी आपने हमसे ऐसे उखड़े हुए लहजे में बात नहीं की, फिर आज ऐसा क्या हो गया है? क्या हमें बताएंगी नही?"

"हम जानना चाहते हैं कि आज कल हवेली के अंदर और बाहर दोनों जगह क्या चल रहा है?" सुगंधा देवी ने दादा ठाकुर की तरफ देखते हुए कहा____"अगर आप ये समझते हैं कि हमें कुछ महसूस नहीं होता तो ये आपकी ग़लतफहमी है।"

दादा ठाकुर ने फ़ौरन कोई जवाब नहीं दिया, बल्कि वो सुगंधा देवी के चेहरे पर मौजूद भावों को पढ़ने की कोशिश करने लगे थे। उधर सुगंधा देवी उनके मुख से जवाब सुनने की उम्मीद में उन्हीं को देखे जा रहीं थी।

"ऐसा कुछ भी नहीं चल रहा है जैसे कि आप आशंका जता रही हैं।" दादा ठाकुर ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"आप इन सब बातों के बारे में इतना ज़्यादा मत सोचिए। बाकी आप तो जानती ही हैं कि हर इंसान के जीवन में छोटी मोटी समस्याएं बनी ही रहती हैं। हमारे सामने भी छोटी मोटी समस्याएं हैं लेकिन आप फ़िक्र मत कीजिए, हम अपने तरीके से सब सम्हाल लेंगे।"

"हवेली की दो नौकरानियों की मौत हो गई।" सुगंधा देवी ने सहसा नाराज़गी भरे अंदाज़ से कहा____"कल सुबह गांव के कुछ लोग उनकी मौत होने पर आपकी हवेली में आ कर आपके ही सामने ऊंची आवाज़ में आप पर ही उनकी हत्या का आरोप लगा रहे थे और आप कहते हैं कि ये छोटी मोटी समस्या है? गांव के लोगों का तो समझ में आता है कि वो रेखा और शीला की इस तरह हो गई मौत से दुखी हो कर आपसे ऐसा कह रहे थे लेकिन ये समझ में नहीं आता कि हवेली में काम करने वाली दो नौकरानियों की इस तरह से मौत हो जाए? रेखा ने हमारी ही हवेली के एक कमरे में ज़हर खा कर खुदकुशी कर ली और शीला को किसी ने हमारे ही बगीचे में गला रेत कर मार डाला। क्या ये सब बातें आपको छोटी मोटी लगती हैं? नहीं ठाकुर साहब, ये कोई छोटी मोटी बात नहीं है बल्कि बहुत बड़ी बात है। आख़िर ऐसा क्या हो रहा है आज कल जिसे आप हम सबसे छुपा रहे हैं? आख़िर क्यों हवेली की दो दो नौकरियां इस तरह से ऊपर वाले को प्यारी हो गईं?"

दादा ठाकुर को समझते देर न लगी कि सुगंधा देवी बिना जवाब पाए मानेंगी नहीं। अतः उन्होंने उन्हें संक्षेप में उतना ही बताया जितना बताना ज़रूरी था और जितने में उनके मन में ज़्यादा बुरा असर न पड़ सके। दादा ठाकुर के मुख से सुगंधा देवी ने जो कुछ सुना वो उन्हें हैरत में डाल देने के लिए और सोचो में गुम कर देने के लिए काफ़ी था।

"हम चाहते हैं कि ये सब बातें सिर्फ़ आप तक ही रहें।" अपनी पत्नी सुगंधा देवी को कहीं खोए हुए देख कर दादा ठाकुर ने कहा____"हवेली के अंदर किसी को भी इन सब बातों का पता नहीं लगना चाहिए। हम नहीं चाहते कि इस सबके चलते किसी के भी मन में डर और चिंता के भाव पैदा हो जाएं।"

"हमें तो यकीन ही नहीं हो रहा कि इतने समय से ये सब चल रहा है।" सुगंधा देवी ने हैरानी भरे भाव से कहा____"हे भगवान! ये कैसा दिन दिखा रहे हैं आप?"

"शांत हो जाइए।" दादा ठाकुर ने पलंग से उठ कर सुगंधा देवी को सम्हाला____"इसी लिए हम आपसे कुछ भी नहीं बताना चाहते थे, क्योंकि इससे आप पर गहरा असर पड़ जाना था। ख़ैर, हमने जो कहा है उस बात पर ध्यान दीजिएगा। हवेली में किसी को भी इन बातों का पता नहीं लगना चाहिए।"

"कौन कर रहा है ये सब?" सुगंधा देवी ने दादा ठाकुर की तरफ देखते हुए पूछा____"आख़िर क्या दुश्मनी है उसकी हमसे?"

"वैसे तो हमें थोड़ा बहुत अंदाज़ा है।" दादा ठाकुर ने कहा____"लेकिन जब तक कोई प्रमाण नहीं मिलता तब तक न हमारी आशंका सच हो सकती है और न ही ये पता चल सकता है कि ये सब कौन कर रहा है। ख़ैर आप इस सबको अपने ज़हन से निकाल दीजिए और सबके सामने पहले की तरह ही सामान्य बने रहिए। मेनका, रागिनी बहू और हमारी कुसुम बिटिया को इस सबका पता नहीं चलना चाहिए।"

"ठीक है।" सुगंधा देवी ने गहरी सांस ली____"हम इस बारे में किसी से कुछ नहीं कहेंगे। हमें भी भान है कि इस सबका पता चलने से हमारे अपनों पर बुरा प्रभाव पड़ेगा।"

"ठीक है अब आप आराम कीजिए।" दादा ठाकुर ने कहा____"हमें एक जगह ज़रूरी काम से जाना है।"

"जी ठीक है।" सुगंधा देवी ने कहा____"आप अपना ख़्याल रखिएगा। ऐसे समय में लेश मात्र की भी लापरवाही नुकसानदायक हो सकती है।"

दादा ठाकुर आगे बढ़े और एक तरफ की दीवार से लगी लकड़ी की अलमारी को खोल कर उसमें से अपना एक रिवॉल्वर निकाला और फिर उसे कुर्ते के अंदर कमर के पास धोती में छुपा लिया। उसके बाद उन्होंने अलमारी को बंद किया और कमरे से बाहर निकल गए। सुगंधा देवी सोचो में गुम उन्हें जाता देखती रहीं।

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जब से वैभव के साथ रागिनी अपने मायके आई थी तब से घर के सभी सदस्य खुश थे। पूरे चंदनपुर में ये ख़बर फैल गई थी कि नरसिंहपुर के दादा ठाकुर का छोटा बेटा यानि ठाकुर वैभव सिंह आया है। दादा ठाकुर की ख्याति दूर दूर तक फैली हुई थी इस वजह से लोग उन्हें भली भांति जानते थे और उनकी भारी इज्ज़त करते थे। दादा ठाकुर की तरह वैभव सिंह का नाम भी लोगों ने काफी सुन रखा था लेकिन उसके बारे में सबके मन में अलग अलग विचार थे। वो ये तो जानते थे कि ठाकुर वैभव सिंह एक रंग मिज़ाज नवयुवक है लेकिन उन्हें ये भी पता था कि वो ज़बरदस्ती किसी पर अत्याचार नहीं करता था। जहां उसके पिता दादा ठाकुर नम्र और शांत स्वभाव वाले थे वहीं वैभव थोड़ा गरम स्वभाव का था। लोग जब वैभव को देखते थे तो उसके चेहरे की सुंदरता और मासूमियत को देख कर भ्रम का शिकार भी हो जाते थे, ये सोच कर कि ऐसा सुंदर और मासूम दिखने वाला नवयुवक भला इतने संगीन काम कैसे कर सकता है?

(दोस्तो, यहां पर मैं रागिनी के मायके वालों का संक्षिप्त परिचय देना उचित समझता हूं।)

☞ ठाकुर किशन सिंह (रागिनी के दादा/ये अब इस दुनिया में नहीं हैं)

गायत्री सिंह (रागिनी की दादी/ये भी अब इस दुनिया में नहीं हैं)

ठाकुर किशन सिंह और गायत्री को कुल तीन संतानें हैं। जो इस प्रकार हैं:-

(01) वीरभद्र सिंह

(02) बलभद्र सिंह

(03) राधिका सिंह

✮ वीरभद्र सिंह (रागिनी के पिता)

सुलोचना सिंह (रागिनी की मां)

वीरभद्र सिंह और सुलोचना को चार संतानें हैं।

(01) वीरेंद्र सिंह (रागिनी का बड़ा भाई)

वंदना सिंह (वीरेंद्र सिंह की पत्नी)

वीरेंद्र सिंह और वंदना को दस सालों बाद बड़ी मन्नतों से पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई है।

(02) रागिनी सिंह (वीरेंद्र की बहन और दादा ठाकुर की बहू)

(03) नागेंद्र सिंह (रागिनी का छोटा भाई)

नागेंद्र सिंह अपने बड़े भाई की तरह ही एक अच्छा इंसान था और घर की सभी जिम्मेदारियां निभाता था। किसी को आज तक समझ नहीं आया कि आख़िर ऐसा क्या हो गया था जिसके चलते वो अचानक ही एक दिन घर गांव से गायब हो गया। उसके गायब होने के दो साल बाद रागिनी का ब्याह हुआ था। नागेंद्र को तलाश करने का बहुत प्रयास किया गया लेकिन उसका कहीं कोई सुराग़ तक नहीं मिला। अब तो बस ऊपर वाले पर ही भरोसा रह गया है कि शायद वो खुद ही किसी दिन वापस घर आ जाए। हालाकि गांव में तो सब दबी जुबान में यही कहते हैं कि नागेंद्र शायद अब इस दुनिया में नहीं है।

(04) कामिनी सिंह (रागिनी की छोटी बहन)

कामिनी का अभी तक ब्याह नहीं हुआ है किन्तु वीरभद्र और वीरेंद्र उसके ब्याह के लिए लड़के की तलाश करने लगे हैं। कामिनी, एक ऐसी लड़की है जो रागिनी की तरह सुंदर तो है लेकिन स्वभाव से एकदम शांत और किसी से ज़्यादा मतलब नहीं रखती है। वैभव ने कई बार उसको अपने झांसे में लेने की कोशिश की थी लेकिन सफल नहीं हो पाया था। वैभव की नीयत का उसे बखूबी पता है इस लिए जब भी वैभव उसके यहां आता है तो वो उससे दूर ही रहती है।

वीरभद्र सिंह अपने गांव में सबसे ज़्यादा संपन्न व्यक्ति हैं। उनके पास काफ़ी सारी जमीनें हैं जिन पर कई तरह की फसलें उगाई जाती हैं। उनकी आय का मुख्य स्त्रोत फल और सब्जियां हैं जो उनकी ज़मीन के काफी सारे हिस्से में उगाई जाती हैं। इधर कुछ सालों से वीरभद्र को घुटने में बात की समस्या हो गई है जिसके चलते उन्हें कहीं आने जाने में समस्या होती है। उधर उनकी पत्नी सुलोचना की भी तबियत ज़्यादा ठीक नहीं रहती है। असल में बेटे नागेंद्र के लापता होने का कुछ ज़्यादा ही दुख हुआ है उन्हें जिसके चलते उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता।

✮ बलभद्र सिंह (रागिनी के चाचा जी)

पुष्पा सिंह (रागिनी की चाची)

बलभद्र सिंह और पुष्पा के कुल चार बच्चे हैं जो इस प्रकार हैं:-

(01) वीर सिंह (बलभद्र सिंह का बड़ा बेटा)

गौरी सिंह (वीर सिंह की पत्नी)

=> वीर सिंह और गौरी के दो बच्चे हैं जो अभी बालिग नहीं हुए हैं।

(02) बलवीर सिंह (बलभद्र सिंह का दूसरा बेटा)

सुषमा सिंह (बलवीर की पत्नी)

=> बलवीर सिंह और सुषमा की शादी को अभी एक साल ही हुआ है, इन्हें अभी कोई औलाद नहीं हुई है।

(03) कंचन सिंह (बलभद्र सिंह की बेटी/अविवाहित)

(04 मोहिनी सिंह (बलभद्र सिंह की सबसे छोटी बेटी/अविवाहित)

कंचन और मोहिनी दोनों ही विवाह के योग्य हो गई हैं।

✮ राधिका सिंह (ठाकुर किशन सिंह की इकलौती बेटी)

राधिका सिंह का विवाह बहुत पहले हो गया था इस लिए अब वो यहां नहीं रहती। ससुराल में उसका अपना परिवार है। ख़ास मौकों पर ही उसका यहां आना होता है।

वीरभद्र सिंह और बलभद्र सिंह दोनों ही परिवार यूं तो अलग अलग घरों में रहते हैं लेकिन दोनों परिवारों के बीच आपसी रिश्ते बहुत ही गहरे हैं। इसका सबूत ये है कि दोनों भाइयों ने अभी तक ज़मीन का बटवारा नहीं किया है और सारी ज़मीन पर सब एक साथ ही मेहनत कर के अपना जीवन यापन करते हैं। जैसा प्रेम वीरभद्र और बलभद्र का आपस में है वैसा ही प्रेम उन दोनों के बच्चों में भी है। गांव के सब लोग इनकी बहुत इज्ज़त करते हैं, क्योकि ये सबकी हर तरह से मदद करते हैं।

(तो दोस्तो, ये था रागिनी के मायके वालों का संक्षिप्त परिचय, अब चलते हैं कहानी की तरफ।)

वैभव का हर बार की तरह इस बार भी ख़ास स्वागत सत्कार हुआ था। वैभव एक ऐसा लड़का था जिसे सब बेहद पसंद करते थे, क्योंकि सबको वैभव सिंह में असली ठाकुर के लक्षण नज़र आते थे। वीरभद्र तो मन ही मन ये भी चाहते थे कि उनकी बड़ी बेटी की तरह उनकी दूसरी बेटी कामिनी भी दादा ठाकुर की बहू बन जाए। अपनी बेटी कामिनी के लिए उन्हें वैभव हर तरह से पसंद था लेकिन वो खुल कर इस रिश्ते के लिए दादा ठाकुर से बात करने में झिझकते थे और इसका कारण ये था कि उन्हें अपनी बेटी कामिनी में वो बात नहीं दिखती थी जो वैभव सिंह जैसे लड़के के लिए योग्य हो। वो अपनी बेटी के स्वभाव को अच्छी तरह जानते थे। कामिनी यूं तो शांत स्वभाव की थी लेकिन जब उसे गुस्सा आता था तो वो खुद का ही नुकसान करने लगती थी जिसमें उसकी जान तक का ख़तरा हो जाता था। वीरभद्र वैभव के चरित्र से भी वाक़िफ थे इस लिए वो समझते थे कि अगर उनकी बेटी का वैभव सिंह से ब्याह हुआ तो वो उसके चरित्र को ध्यान में रख कर कोई समझौता नहीं कर पाएगी। वो ये भी जानते थे कि वैभव सिंह एक ऐसा लड़का है जो कभी किसी के बंधन में बंध जाना पसंद नही करता। वो अपनी मर्ज़ी से चलने वाला नवजवान है जिसके ऊपर खुद उसके पिता दादा ठाकुर भी आज तक कोई पाबंदी नहीं लगा पाए। ऐसे में अगर कामिनी ने पत्नी के रूप में उस पर पाबंदी लगाने की कोशिश की तो बहुत हद तक संभव है कि बात बिगड़ जाएगी और फिर आगे जो कुछ होगा उसकी कल्पना करना ज़्यादा मुश्किल नहीं है।

एक तो लंबा सफर, दूसरे स्वागत सत्कार के चक्कर में वैभव को इतना खिला पिला दिया गया था कि उसने बस आराम करना ही बेहतर समझा था। यूं तो अब तक उसे हर कोई नज़र आ चुका था लेकिन अब तक उसे अपनी भाभी की छुटी बहन कामिनी नज़र नहीं आई थी। पिछली बार दोनो के बीच झगड़ा हो ही गया होता अगर रागिनी ने आ कर फ़ौरन ही सब कुछ सम्हाल न लिया होता।

ख़ैर शाम तक वैभव किसी राजा महाराजा की तरह पलंग पर सोता रहा उसके बाद जब उसकी आंख खुली तो सहसा उसकी नज़र दरवाज़े के ओट से झांकती किसी के हसीन चेहरे पर पड़ी। ये देख कर वो मुस्कुराया। भाभी के मायके आने के लिए वो हमेशा तैयार रहता था क्योंकि यहां पर सुंदर सुंदर चेहरों वाली और मादक जिस्मों वाली लड़कियों की कमी नहीं थी। अभिनव सिंह की तो ये नाम मात्र की ससुराल थी जबकि ससुराल का असली मज़ा तो वैभव लेता था।

"अब अगर जी भर के दीदार कर लिया हो तो हम पर भी थोड़ा नज़रे इनायत कर दीजिए।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"हमारी नज़रों को भी आपके खूबसूरत चेहरे को देखने की हसरत है।"

"अच्छा जी।" बलभद्र सिंह की बड़ी बेटी कंचन दरवाज़े के उस पार से निकल कर कमरे के अंदर आते हुए किंतु शर्मा कर बोली____"तो आपकी नज़रें सिर्फ़ ख़ूबसूरत चेहरे देखने की ही हसरत रखती हैं हमेशा?"

"नहीं ऐसा तो बिलकुल नहीं है।" मैंने उठ कर पलंग के सिरहाने से अपनी पीठ टिका कर कहा____"आप कहें तो हम अपनी नज़रों को आपके चेहरे के अलावा भी ख़ास हिस्सों पर डाल देते हैं।"

"बड़ी गुस्ताख़ नज़रें है आपकी।" कंचन ने आंखें फैलाते हुए कहा____"अपनी नज़रों को थोड़ा सम्हाल कर रखिए, उन्हें चेहरे के अलावा कहीं और जा कर ठहरने की इजाज़त नहीं है।"

"ये तो संभव ही नहीं है सरकार।" मैंने कंचन को सिर से ले कर पांव तक देखते हुए कहा____"क्योंकि इसमें दोष हमारी नज़रों का नहीं है बल्कि आपके कहर ढाते हुस्न का है जो हमारी नज़रों को अपनी तरफ आकर्षित कर लेता है।"

"हाय राम!" कंचन शर्म से लाल तो हुई ही थी किंतु फिर सम्हल कर बोली____"आपसे तो बात करना ही बेकार है। पता नहीं क्या क्या बिना मतलब की बातें करते रहते हैं।"

"तो आप ही बताइए।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"हम ऐसी क्या बातें करें जो सिर्फ आपके मतलब की हों?"

"हमें नहीं पता।" कंचन ने अपनी मुस्कान को दबाते हुए कहा____"अब चलिए शाम हो गई है, ताऊ जी आपका इंतज़ार कर रहे हैं।"

"आप तो बड़ी ज़ालिम चीज़ हैं सरकार।" मैंने उसकी तरफ देखते हुए कहा____"हम तो बड़ी उम्मीद ले कर आए थे यहां कि हमारी प्यारी प्यारी सालियां हमारा हर तरह से ख़्याल रखेंगी। ख़ैर कोई बात नहीं, अब तो यही हो सकता है कि हम कल सुबह ही यहां से वापस अपने गांव लौट जाएं।"

"ये क्या कह रहे हैं आप?" कंचन एकदम से चौंक कर बोली____"आप इतना जल्दी कैसे चले जाएंगे यहां से?"

"अब रुकने का फ़ायदा ही क्या है सरकार?" मैंने झूठा अफ़सोस जताते हुए कहा____"भारी आस लगा कर आपके पास आए थे। अब जब आपसे ही हर उम्मीद टूट गई तो रुकने का क्या मतलब रह गया?"

"आप तो बड़ा जल्दी हार मान गए।" कंचन ने एक बार फिर से अपनी मुस्कान को दबाते हुए कहा____"जबकि आपको अंतिम सांस तक प्रयास करते रहना चाहिए। क्या पता आख़िरी सांस के वक्त आपको कोई कामयाबी मिल जाए।"

"अच्छा ऐसा है क्या?" मैं उसकी इस बात से मुस्कुरा पड़ा____"फिर तो अभी से प्रयास करना शुरू कर देंगे हम। अगर आख़िरी सांस के वक्त ही कामयाबी के रूप में मीठा फल मिलना है तो बेशक पूरी शिद्दत से प्रयास करेंगे सरकार।"

"बिलकुल प्रयास कीजिए।" कंचन ने मुस्कुराते हुए कहा____"हम भी देखते कि आप कामयाबी पाने के लिए क्या क्या पैंतरे आजमाते हैं?"

"क्या ये चुनौती है?" मैंने उसकी आंखों में देखा।

"चुनौती तो नहीं है।" उसने बड़ी अदा से कहा___"पर क्या आप किसी चुनौती से डरते हैं?"

"सवाल ही नहीं पैदा होता।" मैंने जैसे गर्व से कहा___"ठाकुर वैभव सिंह आज तक किसी चुनौती से नहीं डरा। हम ज़रूर प्रयास करेंगे सरकार, बस आप अपनी बात पर क़ायम रहना।"

मेरी बात सुन कर कंचन ने शरारती अंदाज़ में जीभ निकाल कर मुझे चिढ़ाया और फिर मुस्कुराते हुए कमरे से चली गई। मैं भी सोचने लगा कि अब तो कुछ करना ही पड़ेगा। कंचन नाम की मिठाई को चखने का कोई न कोई जुगाड़ लगाना ही पड़ेगा। ये सब सोचते हुए मैं पलंग से उतरा और बाहर निकल गया।

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"सेवक हाज़िर है मालिक।" एक हट्टे कट्टे आदमी ने बैठक में बैठे दादा ठाकुर के सामने अदब से सिर नवा कर कहा।

"शेरा।" दादा ठाकुर ने उसकी तरफ देखते हुए कहा____"तुम्हें भी पता चल ही गया होगा कि वैभव यहां नहीं है इस लिए जब तक वो यहां नहीं है तब तक तुम्हें एक विशेष काम करना है।"

"हुकुम कीजिए मालिक।" शेरा ने नम्र भाव से कहा____"सेवक अपनी जान दे कर भी आपके हुकुम की तामील करेगा।"

"तुम्हें उस काले नकाबपोश आदमी को पकड़ना है जिसने शुरुआत में हमारे बेटे वैभव पर हमला करने की कोशिश की थी।" दादा ठाकुर ने कहा____"और अभी हाल ही में तुमसे उसका सामना भी हुआ था, ये अलग बात है कि तुम्हारे रहते हुए भी उसने शीला को मौत के घाट उतार दिया था।"

"माफ़ कर दीजिए मालिक।" शेरा ने सिर झुका कर कहा____"आपका हुकुम नहीं था इस लिए मैंने कभी उसे खोजने का प्रयास नहीं किया। आपने सिर्फ़ छोटे ठाकुर की सुरक्षा का कार्य सौंपा था मुझे।"

"हम जानते हैं कि इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है।" दादा ठाकुर ने कहा____"हालात ऐसे थे कि हमें सबसे ज़्यादा वैभव की फ़िक्र थी और इसी लिए हमने तुमसे कहा था कि उसकी सुरक्षा करने के अलावा तुम्हें कुछ भी नहीं करना है। ख़ैर, अब तुम्हारा सिर्फ़ एक ही काम है कि उस काले नक़ाबपोश को खोज कर ज़िंदा पकड़ो और साथ ही उसके आका उस सफ़ेदपोश का भी पता लगाओ। हम जानना चाहते हैं कि जो व्यक्ति रात के अंधेरे में भी अपने सफेद कपड़ों के चलते थोड़ा बहुत दिखता है वो अचानक से गायब कैसे हो जाता है?"

"जो हुकुम मालिक।" शेरा ने कहा____"अब मैं आपको अपनी शक्ल तभी दिखाऊंगा जब मैं अपने कार्य में सफल हो जाऊंगा।"

"ठीक है।" दादा ठाकुर ने कहा____"और हां, इस बात का विशेष ख़्याल रहे कि हमारे अलावा तुम्हारी किसी भी असलियत का किसी को भी पता ना चलने पाए। अब तुम जा सकते हो।"

शेरा ने सिर नवा कर दादा ठाकुर को प्रणाम किया और पलट कर बाहर निकल गया। उसके जाने के बाद दादा ठाकुर कुछ देर तक सोच विचार करते रहे उसके बाद वो उठे और हवेली से बाहर निकल गए। कुछ ही देर में वो जीप में दो आदमियों के साथ बैठे हाथी दरवाज़े से बाहर निकलते नज़र आए।

कुछ ही समय में उनकी जीप एक जगह रुकी। दादा ठाकुर जीप से उतरे और दोनों आदमियों को जीप के पास ही खड़े रहने का बोल कर एक मकान की तरफ बढ़ गए। ये गांव का पूर्वी छोर था। जिस मकान के क़रीब वो आए थे वो कच्चा ही बना हुआ था। दरवाज़े पर बाहर से कुंडी नहीं लगी हुई थी इस लिए उन्होंने कुंडी को पकड़ कर खड़काया तो कुछ ही पलों में दरवाज़ा खुल गया। दरवाज़ा खुलते ही धनंजय नाम का दरोगा नज़र आया। बाहर दादा ठाकुर को देखते ही उसने सबसे पहले उन्हें हाथ जोड़ कर प्रणाम किया और फिर एक तरफ हट गया।

"तुमने हमें काफी निराश किया है धनंजय?" अंदर लकड़ी की एक कुर्सी पर बैठने के बाद दादा ठाकुर ने दारोगा से कहा____"जबकि हमने उम्मीद की थी कि तुम्हारे जैसा पढ़ा लिखा दारोगा जल्द ही मुरारी के हत्यारे को तलाश लेगा और साथ ही उस सफ़ेदपोश का भी पता लगा लेगा जिसने तुम्हारी आंखों के सामने अपने एक काले नकाबपोश को जान से मार दिया था।"

"माफ़ कीजिए ठाकुर साहब कि मैंने आपको निराश किया।" दरोगा ने बेचैनी से पहलू बदलते हुए कहा____"पर बिना किसी साक्ष्य के हत्यारे का पता लगाना इतना भी आसान नहीं था। मुरारी की हत्या जिस हथियार से की गई थी ना तो वो मेरे पास था और ना ही आपने मुझे घटना स्थल पर जाने दिया था। ऐसे में हत्यारे का पता लगाना कैसे आसान हो सकता था? रही बात उस सफ़ेदपोश की तो वो उस समय के बाद कभी नज़र ही नहीं आया मुझे। दूसरी बात ये भी हुई कि मां की तबियत अचानक से काफी बिगड़ गई थी जिसके चलते मैं इस मामले पर ज़्यादा ध्यान भी नहीं दे पाया।"

"ओह! हमें माफ़ करना धनंजय।" दादा ठाकुर ने अफ़सोस जताते हुए कहा____"हमें इस बारे में इल्म नहीं था। ख़ैर अब कैसी तबियत है तुम्हारी मां की?"

"जी अब पहले से बेहतर हैं वो।" दरोगा ने कहा____"उनकी देख भाल के लिए एक औरत को रखा है।"

"चलो ये अच्छा किया।" दादा ठाकुर ने कहा____"ख़ैर, तो अब क्या पता चला है तुम्हें इस मामले में?"

"रेखा और शीला की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से कुछ ख़ास पता नहीं चल सका।" दरोगा ने कहा____"रिपोर्ट में बस यही लिखा गया है कि शीला को किसी तेज़ धार वाले खंज़र से गला रेत कर मारा गया था और रेखा ने खुद ही ज़हर खाया था क्योंकि उसके शरीर पर ऐसे कोई निशान नहीं थे जिससे ये लगे कि किसी ने उसके साथ कोई ज़ोर ज़बरदस्ती की हो।"

"ह्म्म्म।" दादा ठाकुर ने हल्के से हुंकार भरी____"और?"

"मुरारी की हत्या जिस औजार से की गई थी वो मुझे मिल गया है।" दरोगा ने ये कहा तो दादा ठाकुर चौंके और फिर बोले____"क्या सच में?? कहां मिला वो तुम्हें?"

"सच सुनेंगे तो आप यकीन नहीं कर सकेंगे।" दरोगा ने ये कहा तो दादा ठाकुर ने कहा____"अब तक जो कुछ देखा सुना है वो भी यकीन करने लायक नहीं था धनंजय। तुम बेझिझक हो कर बताओ कि तुम्हें मुरारी की हत्या में प्रयोग किया गया औज़ार कहां मिला?"

"आपके बाग़ में जो मकान है वहीं एक जगह मिला है मुझे।" दरोगा ने ये कह कर मानों धमाका सा किया।

"क्या??" दादा ठाकुर बुरी तरह चौंके____"ये क्या कह रहे हो तुम?"

"यही सच है ठाकुर साहब।" धनंजय ने कहा____"आपके बाग़ में बने मकान के पीछे ट्रैक्टर की जो पुरानी टूटी हुई ट्रॉली पड़ी हुई है न उसी की पेटी में पड़ी थी वो कुल्हाड़ी।"

"ये तो बड़े ही आश्चर्य की बात है धनंजय।" दादा ठाकुर ने चकित भाव से कहा____"मुरारी की हत्या जिस औज़ार से हुई थी वो हमारी अपनी जगह पर कैसे पहुंच गया होगा? आख़िर किसने रखा होगा उस कुल्हाड़ी को उस जगह पर और क्यों रखा होगा? क्या इस लिए कि जब वो औज़ार हमारी अपनी किसी जगह पर मिले तो मुरारी की हत्या का आरोप सीधा हम पर या हमारे परिवार के किसी सदस्य पर लगे?"

"बिल्कुल, इसका तो यही मतलब हुआ।" धनंजय ने कुछ सोचते हुए कहा____"वैसे अगर आप बुरा न मानें तो अपनी एक बात आपके सामने रखूं?"

"क्या कहना चाहते हो?" दादा ठाकुर ने उसकी तरफ शंकित भाव से देखा।

"कहीं ऐसा तो नहीं कि मुरारी की इस तरह से हत्या करने वाला।" धनंजय ने धड़कते दिल से कहा____"कोई और नहीं बल्कि आपके ही परिवार का कोई सदस्य है?"

"ऐसा किस आधार पर कर रहे हो तुम?" दादा ठाकुर ने उसे घूरते हुए कहा____"भला हमारे परिवार का कोई सदस्य मुरारी की हत्या क्यों करेगा?"

"फिलहाल तो इसकी एक ही वजह समझ में आती है ठाकुर साहब।" धनंजय ने कहा____"छोटे ठाकुर को मुरारी की हत्या के आरोप में फंसा कर आपके अंदर अपने ही बेटे के प्रति ज़हर भर देना। ये तो सब जानते हैं कि आप छोटे ठाकुर को उनकी ग़लत हरकतों की वजह से पसंद नहीं करते हैं। ऐसे में अगर छोटे ठाकुर पर इतने बड़े संगीन अपराध का आरोप लगेगा तो ज़ाहिर है कि आप उनके और भी खिलाफ़ हो जाएंगे।"

दादा ठाकुर ने दारोगा की बातें सुन कर फ़ौरन कोई जवाब नहीं दिया। उनके चेहरे पर सोचो के भाव गर्दिश करते नज़र आने लगे थे। दरोगा की बातों में कहीं न कहीं सच्चाई तो थी ही। कुछ देर पता नहीं वो क्या सोचते रहे उसके बाद बोले____"बात तो तुम्हारी ठीक है, लेकिन हम सोच रहे हैं कि अगर असल हत्यारा हमारे बेटे को ही पूरी तरह मुरारी का हत्यारा बनाना चाहता था तो वो उस औज़ार को हमारे बाग़ में पड़ी ट्रैक्टर की उस ट्राली में नहीं बल्कि उस जगह पर रखता जहां वैभव झोपड़ा बना कर रह रहा था। उस सूरत में अगर लोगों को वो कुल्हाड़ी उसके झोपड़े से मिलती तो यकीनन हमें भी यकीन कर लेना पड़ता कि मुरारी की हत्या उसी ने ही की है लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। उल्टा ये हुआ कि वो कुल्हाड़ी मुरारी के गांव से दूर हमारे गांव में हमारे बाग़ वाले मकान के पीछे पड़ी ट्राली में मिली। ये बहुत ही अजीब बात है धनंजय, जो आसानी से हजम नहीं हो रही है। ख़ैर हमारे लिए अब ये भी सोचने वाली बात है कि उस हत्यारे की कुल्हाड़ी तक तुम कैसे पहुंचे?"

"पुलिस वाला हूं ठाकुर साहब।" धनंजय ने हल्के से मुस्कुरा कर कहा____"हम पुलिस वालों को ऐसा बना दिया जाता है कि हम अपने आप पर भी शक करने लगते हैं। ख़ैर, कुछ बातें ऐसी थीं जिन पर मैंने पहले ध्यान नहीं दिया था लेकिन अभी हाल ही में सब कुछ मेरी समझ में आया है। दिल तो मेरा भी कहता था कि छोटे ठाकुर भला उस इंसान की हत्या क्यों करेंगे जिसने उनके बुरे समय में हर तरह से मदद की हो लेकिन दिमाग़ पूरी तरह इस सच को मान नहीं रहा था।"

"ऐसा क्यों?" दादा ठाकुर पूछे बगैर न रह सके थे।

"क्योंकि छोटे ठाकुर के नाजायज़ संबंध मुरारी की बीवी सरोज से थे।" धनंजय ने ये कह कर मानों एक बार फिर से धमाका किया। दादा ठाकुर को ये सुन कर मन ही मन झटका तो लगा लेकिन फिर वो ये सोच कर कुछ न बोले कि अपने बेटे से उन्हें अच्छे काम की उम्मीद भी भला कैसे हो सकती है?

"पहले मुझे इस बात का पता नहीं था।" दादा ठाकुर जब कुछ न बोले तो धनंजय ने कहा____"एक दिन मैं छोटे ठाकुर का पीछा करते हुए मुरारी के खेत के पास पहुंच गया था। वहां पर मैंने छुप कर देखा कि मुरारी की बीवी सरोज छोटे ठाकुर के गुप्तांग को पकड़ रही थी और उनसे कुछ कह रही थी जिस पर छोटे ठाकुर ने उसे झिड़क दिया था। मैं ये देख कर बुरी तरह हैरान रह गया था। उनकी बातें सुनने के लिए मैं फ़ौरन ही उनके थोड़ा और क़रीब गया तो मैंने सुना कि छोटे ठाकुर सरोज को डांटते हुए कह रहे थे कि पहले जो कुछ हमारे बीच हुआ है अब वो दुबारा नहीं हो सकता और ये बात सरोज को भी अच्छी तरह समझ लेना चाहिए। वहां से आने के बाद मैं ये सोच सोच कर चकित होता रहा कि छोटे ठाकुर के ऐसे संबंध उस औरत से कैसे हो सकते हैं जो उमर में उनसे दो गुना बड़ी हो। उसके बाद मैं दूसरे मामलों में व्यस्त हो गया। अभी जब कुछ दिन पहले मां का इलाज़ करा के लौटा और फिर से इस मामले में अपना दिमाग़ लगाया तो मुझे वो सब फिर से याद आ गया। एकदम से मेरे दिमाग़ की बत्ती जली कि कहीं मुरारी की हत्या छोटे ठाकुर ने ही तो नहीं की? ऐसा करने का उनके पास ठोस कारण भी था क्योंकि मुरारी की बीवी से उनके नाजायज़ संबंध थे और संभव है कि इस बात का पता मुरारी को चल गया रहा हो। मुरारी ने उन्हें धमकी दी होगी और आपको ख़बर कर के आपसे इंसाफ मांगने की बात कही होगी। छोटे ठाकुर मुरारी की इस धमकी से या तो डर गए होंगे या फिर गुस्से में आ गए होंगे और फिर उसी डर और गुस्से की वजह से उन्होंने मुरारी की हत्या कर दी होगी। हत्या का औज़ार नहीं मिला था इसका मतलब साफ था कि उन्होंने उसे कहीं छुपा दिया होगा। मैंने सोचा कुल्हाड़ी जैसा हत्या का औज़ार वो उस वक्त अपने झोपड़े में नहीं रख सकते थे क्योंकि ऐसे में उनका भेद जल्दी पता चल जाता इस लिए उन्होंने उसे ऐसी जगह छुपाया होगा जहां पर उसके होने की कोई कल्पना भी ना कर सके। अभी कुछ दिन पहले मैंने उन्हें बाग़ के मकान की तरफ जाते देखा था तो मेरे ज़हन में ख़्याल उभरा कि क्या वो हत्या का औज़ार यहां पर छुपाए हो सकते हैं? बस, अपनी तसल्ली के लिए मैं बारीकी से छानबीन के काम पर लग गया। मुझे बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी कि मुरारी की हत्या का औज़ार मुरारी के गांव से दूर इस गांव में ऐसी जगह पर छुपा हुआ मिल जाएगा।"

"तुमने कैसे पहचाना कि जो कुल्हाड़ी हमारी टूटी हुई ट्रॉली की पेटी से तुम्हें मिली है वो वही है जिसके द्वारा मुरारी की हत्या की गई थी?" दादा ठाकुर ने सपाट लहजे में पूछा____"क्या इसका तुम्हारे पास कोई ठोस प्रमाण है?"

"बिलकुल है ठाकुर साहब।" धनंजय ने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा____"कुल्हाड़ी पर लगा खून मुरारी के खून से पूरी तरह मिलता है और इसी से साबित हो जाता है कि वो कुल्हाड़ी ही वो औज़ार है जिसके द्वारा मुरारी की हत्या की गई थी।"

"मुरारी का खून कहां मिला तुम्हें?" दादा ठाकुर के चेहरे पर हैरानी के भाव उभरे____"हमने तो तुम्हें मुरारी की लाश देखने के लिए उसके घर आने से भी मना कर दिया था और फिर कुछ समय बाद उसका अंतिम संस्कार कर दिया गया था। फिर तुम्हें उसका खून कैसे मिला?"

"आपने मुझे घटना स्थल पर आने से ज़रूर मना किया था ठाकुर साहब।" धनंजय ने कहा____"लेकिन ये भी तो कहा था आपने कि मुरारी के हत्यारे का मुझे गुप्त रूप से पता लगाना है। अब भला बिना कोई सबूत या बिना कोई साक्ष्य के में कैसे हत्यारे का पता लगा सकता था? इस लिए मैं आपके मना करने के बावजूद सादे कपड़ों में तथा भेष बदल कर घटना स्थल पर पहुंचा था। घटना स्थल से मैंने मुरारी के खून का सैंपल लिया और थोड़ा बहुत मुआयना करने के बाद वापस चला गया था। उस कुल्हाड़ी के मिलने के बाद मैं उसके फल पर लगे खून की जांच के लिए उसे शहर ले गया था। कुल्हाड़ी पर लगे खून का मिलान तो मुरारी के खून से हो गया लेकिन कुल्हाड़ी की मूठ पर हत्यारे के उंगलियों के निशान कहीं पर भी नहीं मिले। ज़ाहिर है हत्यारा या तो इतना शातिर था कि उसने कुल्हाड़ी से अपनी उंगलियों के निशान मिटा दिए थे या फिर ये हो सोता है कि उसने हाथ में कोई कपड़ा लपेटा रहा होगा जिसकी वजह से कुल्हाड़ी पर उसकी उंगलियों के निशान छपे ही नहीं।"

"तो तुम इस नतीजे पर पहुंच चुके हो कि मुरारी की हत्या हमारे बेटे वैभव ने की है?" दादा ठाकुर ने दारोगा की तरफ देखते हुए कहा____"वजह यही है कि मुरारी की बीवी से उसके नाजायज संबंध थे जिसका पता मुरारी को चल गया था? तुम्हारी इस कहानी का यही सार है न?"

धनंजय को समझ न आया कि वो उन्हें क्या जवाब दे। हालाकि, उसे जो सबूत मिले थे और जो कुछ उसने देखा सुना था उसके आधार पर वो इसी नतीजे पर पहुंचा था कि मुरारी की हत्या दादा ठाकुर के बेटे वैभव सिंह ने ही की है। दादा ठाकुर जवाब पाने की उम्मीद में उसी की तरफ देख रहे थे और धनंजय मन ही मन इस दुविधा में पड़ गया था कि उसने जो कुछ दादा ठाकुर को मुरारी की हत्या के संबंध में विस्तार से बताया है क्या वास्तव में वही सच है या अभी भी कुछ ऐसा शेष है जिसे समझना उसके लिए बाकी है?



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