Adultery ☆ प्यार का सबूत ☆ (Completed) - Page 9 - SexBaba
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Adultery ☆ प्यार का सबूत ☆ (Completed)

Vaibhav ka byauhaar badla to hai lekin puri tarah se nahi aur jo badla bhi hai wo sirf Anuradha ke liye. Dusri baat abhi na to vaibhav ne kabool kiya hai ki uske dil me Anuradha ke liye prem wala ehsaas hai aur na hi Anuradha ne. Insaan real me tabhi aisa sochta hai jab wo ye samajh jaye ki wo ab kisi ka ho chuka hai. Is maamle me abhi aisa hai hi nahi so ye sochna nayaaysangat nahi hai....

Daroga ne aisa kyo kaha iska pata aage chalega....well shukriya dost
 
Ragini bhabhi ke ghar pariwar me jhande gaadne ki koshish ki thi usne but safal nahi raha tha. Haan gaav me zarur jhande gaade the... ;)

Sungadha ko thoda bahut sach batana bhi zaruri tha, baad me to waise bhi pata chal jata use...baad me pata chalne se maamla bigad bhi sakta tha...

Sach jald hi saamne aayega...

Dara nahi Shera :declare:

Ye Shera wahi shakhs hai jo nakabposh ban kar vaibhav ki raksha karta tha....well shukriya dost :hug:
 
Jald hi pata chal jayega dost ki daroga ne vaibhav ko hatyara kyo saabit kiya...

Shera abhi tak vaibhav ki suraksha me laga hua tha lekin ab wo dada thakur ke kahne par kaale aur safedposh ka pata lagayega. Dekho uske hath kuch lagta hai ya kuch aisa hota hai jiski kisi ne kalpana bhi nahi hai. Well shukriya mitra :dost:
 
अध्याय - 55

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अब तक....



धनंजय को समझ न आया कि वो उन्हें क्या जवाब दे। हालाकि, उसे जो सबूत मिले थे और जो कुछ उसने देखा सुना था उसके आधार पर वो इसी नतीजे पर पहुंचा था कि मुरारी की हत्या दादा ठाकुर के बेटे वैभव सिंह ने ही की है। दादा ठाकुर जवाब पाने की उम्मीद में उसी की तरफ देख रहे थे और धनंजय मन ही मन इस दुविधा में पड़ गया था कि उसने जो कुछ दादा ठाकुर को मुरारी की हत्या के संबंध में विस्तार से बताया है क्या वास्तव में वही सच है या अभी भी कुछ ऐसा शेष है जिसे समझना उसके लिए बाकी है?



अब आगे....



क्षितिज में चमक रहा सूरज तेज़ी से पश्चिम दिशा की तरफ बढ़ते हुए शाम ढलने का संकेत दे रहा था। हालाकि सूरज के डूबने में अभी क़रीब एक से डेढ़ घंटे का समय लगना था किन्तु सूरज की तपिश अब कम हो गई थी। सरोज किसी काम से अपने देवर जगन के घर गई हुई थी जबकि अनुराधा अपने छोटे भाई अनूप के साथ घर पर ही थी। बाहर घर के बगल से ही एक ऊंचा तथा लंबा पेड़ था जिसकी छाया आंगन में आ रही थी। अनुराधा ने बरामदे से चारपाई ला कर आंगन में ही बिछा लिया था और अपने भाई अनूप के साथ लेटी हुई थी। खुले आंगन में पेड़ से छन कर ठंडी हवा आ रही थी जिसके चलते गर्मी से काफ़ी राहत थी।

चारपाई में एक तरफ लेटा अनूप अपने एक खिलौने के साथ खेल रहा था जबकि अनुराधा बिना पलकें झपकाए किसी गहरे ख़्यालों में गुम नज़र आ रही थी। आज सारा दिन वो गुमसुम ही रही थी और अभी भी उसका यही हाल था। मां के सामने उसने किसी तरह खुद को सम्हाले रखा था किंतु मां के जाते ही वो फिर से कहीं खो गई थी। सुबह से किसी भी काम में उसका मन नहीं लग रहा था। उसे ऐसा महसूस होता था जैसे उसके लिए दुनिया में अब ऐसी कोई चीज़ नहीं रही जिसमें कोई ख़ास बात हो और जिसे देख कर उसे कोई खुशी हो। आज से पहले अपना जीवन उसे कभी भी इतना नीरस और मायूसी भरा नहीं लगा था। वो अपने छोटे से घर में अपनी मां और छोटे भाई के साथ खुश थी मगर एक ही दिन में जैसे सब कुछ बदल गया था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्यों उसका मन बार बार वैभव की तरफ चला जाता था? वो ये मानती थी कि उसने वैभव के साथ कठोरता से बात कर के ठीक नहीं किया था और इसका उसे पछतावा भी था लेकिन इसके बावजूद क्यों उसका मन इतना विचलित था? आख़िर क्यों वो अपने ज़हन से वैभव और उससे संबंधित सभी बातों को निकाल नहीं पा रही थी?

सरोज ने उसे दुनियादारी की बातें तो बताई थी और अच्छे बुरे का भेद भी बताया था लेकिन ये नहीं बताया था कि अगर कोई किसी भी तरह से हमारे ज़हन से न जाए तो उसका क्या मतलब होता है? प्रेम के किस्से तो उसने कहानियों में सुने थे जो उसकी बूढ़ी दादी तब सुनाया करती थी जब वो ज़िंदा थीं लेकिन उन कहानियों में भी ज़्यादातर ज़िक्र किसी राज कुमार और राज कुमारी के प्रेम संबंधों का ही होता था। उस समय अनुराधा का ज़हन इतना विकसित नहीं था। उस समय तो कहानियां उसे बस अच्छी लगती थीं। उनके मर्म का अथवा उन कहानियों के भावों का उसे एहसास नहीं होता था। ये अलग बात है कि जहां पर उसके पसंदीदा किरदारों के बिछड़ जाने का प्रसंग आता तो उसे भी इस बात से बुरा लगता था। असल ज़िंदगी में प्रेम के मायने कभी उसने किसी के द्वारा समझे ही नहीं थे और ना ही कभी ऐसा उसके जीवन में हुआ था जिसके चलते उसे प्रेम के इस गहरे एहसास का पता चला होता।

वैभव को जब उसने पहली बार देखा था तो उसकी सुंदरता को देख कर उसे अपनी बूढ़ी दादी की कहानियों वाले राज कुमार की ही याद आई थी। अक्सर सोचती थी कि काश वो भी कहानियों की राज कुमारी की तरह सुंदर होती मगर जल्द ही उसे एक ऐसी हकीक़त का एहसास हुआ जिसने उसे विचलित कर दिया। उसने भी सुना था कि वैभव का चरित्र कैसा है। उसके चरित्र के बारे में सोचते ही उसे कहानियों वाला राज कुमार समझ लेने की अपनी ग़लती का एहसास हो गया था। हालाकि गुज़रते वक्त के साथ उसे एहसास हो चुका था कि वैभव उसके बारे में कुछ भी ग़लत नहीं सोचता है। वैभव का उससे बातें करना, उसका छेड़ना, और उसके बनाए खाने की तारीफ़ करना उसे एकदम से पुलकित कर देता था लेकिन वो इस सबको ये नहीं सोचती थी कि ये किस तरह का एहसास है अथवा ये किस तरह की खुशी है? वैभव को एक बार फिर से उसने कहानियों वाला राज कुमार मान लिया था मगर अचानक एक दिन उसे एक ऐसे सच का पता चला जिसकी वजह से उसे सदमा सा लग गया था।

रूपचंद्र नाम का एक लड़का एक दिन जाने कहां से आ टपका था और उसने वैभव के बारे में जो कुछ उसे बताया और फिर जो कुछ उसे करने के लिए कहा था वो उसके लिए किसी सदमे से कम नहीं था। उसके लिए इस हकीक़त को हजम करना बेहद मुश्किल हो गया था कि जिस वैभव को वो कहानियों वाला राज कुमार समझ कर खुश होती है उसी वैभव के उसके मां के साथ नाजायज़ संबंध हैं। पलक झपकते ही उसे ऐसा प्रतीत हुआ था जैसे वो आसमान से गिर कर धरती पर आ गई हो। रूपचंद्र की बातों का उसे बिलकुल भी यकीन नहीं हुआ था मगर जब रूपचंद्र ने ये कहा कि इस सच को खुद वैभव उसके सामने कुबूल करेगा तो उसके ज़हन ने जैसे काम करना ही बंद कर दिया था। ख़ैर जल्दी ही वैभव से उसका सामना हुआ और जब उसने उस संबंध में बात करते हुए वैभव को लताड़ा तो वैभव ने उस कड़वे सच को कबूल कर ही लिया। उस वक्त अनुराधा को बहुत तकलीफ़ हुई थी। वैभव के बारे में फैली हुई बातें जो उसने सुन रखी थीं उसका उसे बेहद ही कड़वा प्रमाण मिल गया था। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि उसने उसकी ही मां के साथ ऐसा पाप कर्म किया था। उसे अपनी मां पर भी बेहद गुस्सा आया था लेकिन वो इस बारे में भला कर ही क्या सकती थी? जब उसकी अपनी मां ही ऐसी निकली थी तो दूसरे को क्या कहती?

बाद में भले ही वैभव ने दुबारा वैसा न किया हो और हर तरह से उसके परिवार की रक्षा की हो लेकिन उसके मन में उसके प्रति ये बात बैठ चुकी थी कि जो इंसान उसकी मां को अपने जाल में फांस कर उसके साथ ग़लत कर सकता है वो किसी दिन उसके साथ भी यही सब करने की कोशिश करेगा। अनुराधा ने सोच लिया था कि वो वैभव के जाल में किसी भी कीमत पर नहीं फंसेगी और अगर कभी ऐसा उसने महसूस किया तो वो उसी दिन वैभव को खरी खोटी सुना कर उसे अपने घर से चले जाने को कह देगी।

इंसान की सोच और उसके संकल्प महज परिस्थियों के तहत जन्म लेते हैं और फिर ऐसी ही दूसरी परिस्थितियों में वो या तो कमज़ोर पड़ जाते हैं या फिर एक अलग ही रूप अख़्तियार कर लेते हैं। अनुराधा ने भले ही ये सब सोच लिया था लेकिन हालात ऐसे बने कि वैभव के प्रति उसके विचार फिर से पहले जैसे बनते चले गए थे। इसकी वजह शायद ये थी कि हर मुलाक़ात में वैभव ने जिस तरह से अपने चरित्र को दर्शाया था और जिस तरह से उसके परिवार की जिम्मेदारी ली थी उससे उसके कोमल हृदय में उसके लिए नरमी आ गई थी। हर मुलाक़ात में वैभव ने उसे ये समझाने की कोशिश की थी कि वो एक ऐसी लड़की है जिसने उसके मुकम्मल वजूद को बदल दिया है और इसके लिए वो बेहद खुश है। वो उसके बारे में कभी ग़लत नही सोच सकता और अगर ग़लती से भी उसके मन में उसके प्रति कोई ग़लत ख़्याल आ जाता है तो वो खुद को कोसने लगता है। वक्त और हालात बड़े से बड़े ज़ख्म और बड़ी से बड़ी बात को इंसान के ज़हन से निकाल देते हैं।

अनुराधा चारपाई पर लेटी वैभव के ख़्यालों में खोई ही हुई थी कि तभी बाहर के दरवाज़े की शांकल बजी जिससे उसका ध्यान भंग हो गया। वो हड़बड़ा कर उठी तो उसके बगल से लेटा अनूप भी उठ बैठा। अनुराधा ने जा कर दरवाज़ा खोला तो बाहर किसी अंजान आदमी पर उसकी नज़र पड़ी। बाहर किसी अंजान आदमी को यूं खड़ा देख अनुराधा अंदर ही अंदर घबरा गई। बिजली की तरह उसके ज़हन में वैभव की बातें गूंज उठीं कि हालात ठीक नहीं हैं इस लिए किसी अंजान व्यक्ति के लिए दरवाज़ा मत खोलना।

"घबराओ मत।" अनुराधा के चेहरे पर उभर आई घबराहट को देख कर उस आदमी ने बड़ी शालीनता से कहा____"मैं कोई ऐसा व्यक्ति नहीं हूं जिससे तुम्हें घबराने की अथवा डरने की ज़रूरत हो। मैं बस ये देखने आया हूं कि यहां सब ठीक है कि नहीं?"

"अ..आप कौन हैं?" अनुराधा ने बड़ी मुश्किल से हिम्मत कर के पूछा।

"मैं भुवन हूं।" बाहर खड़े आदमी ने कहा____"और यहां पर मैं छोटे ठाकुर के हुकुम पर ही हाल चाल पूछने आया हूं।"

भुवन नाम सुनते ही अनुराधा को झटका लगा। मस्तिष्क में बिजली की तरह वैभव द्वारा कही गई उस दिन की बात गूंज उठी जब उसने उससे कहा था कि जहां पर उसका नया मकान बन रहा है वहां एक भुवन नाम का आदमी मिलेगा उसे। अगर उसे कोई परेशानी हो तो वो फ़ौरन उसके पास जा कर अपनी परेशानी बता सकती है। इस बात के याद आते ही अनुराधा के अंदर एक हूक सी उठी जिसके चलते उसका समूचा वजूद एक अजीब एहसास से आंदोलित हो उठा।

"घर में सब ठीक है ना बहन?" अनुराधा को ख़ामोशी से कुछ सोचता देख भुवन ने उसका ध्यान अपनी तरफ आकर्षित करते हुए पूछा____"तुम मुझे अपना बड़ा भाई समझ सकती हो। छोटे ठाकुर ने मुझे तुम्हारे घर की जिम्मेदारी सौंपी है और ये भी कहा है कि इस घर के किसी भी सदस्य को किसी भी तरह से कोई समस्या न होने पाए। इस लिए बहन तुम मुझे बताओ, यहां सब ठीक है ना?"

"ह..हां भैया सब...ठीक है।" अनुराधा के दिलो दिमाग़ में एकदम से तूफान उठ खड़ा हुआ था जिसे वो बड़ी मुश्किल से दबाते हुए कापती आवाज़ में बोली____"यहां हमें कोई समस्या नहीं है।"

"अच्छी बात है बहन।" भुवन ने नम्रता से कहा____"बाकी किसी भी चीज़ की ज़रूरत हो तो अपने इस भाई के पास आ जाना। मैं अपनी जान दे कर भी तुम्हारी ज़रूरत को पूरा करूंगा। ख़ैर, मैं यहीं पास में ही हूं इस लिए दिन में भी और रात में भी यहां का हाल चाल देखने आता रहूंगा।"

अनुराधा को समझ में न आया कि वो भुवन को अब क्या जवाब दे इस लिए ख़ामोशी से उसने सिर हिला दिया। भुवन के जाने के बाद अनुराधा ने दरवाज़ा बंद किया और चारपाई पर आ कर बैठ गई। अनूप चारपाई में ही अपना खिलौना लिए बैठा था। भुवन की बातें सुन कर अनुराधा को अब एक अलग ही तरह का एहसास हो रहा था। एक बार फिर से उसके ज़हन में वैभव द्वारा कही गई बातें गूंजने लगीं थी।

"अगर तुम्हें लगता है कि मेरे यहां आने का सिर्फ़ यही एक मकसद है कि मैं तुम्हें भी बाकी लड़कियों की तरह अपने जाल में फंसाना चाहता हूं तो ठीक है। मैं तुम्हें वचन देता हूं कि ठाकुर वैभव सिंह आज के बाद तुम्हारे इस घर की दहलीज़ पर अपने क़दम नहीं रखेगा। तुम्हारे साथ जो चंद खूबसूरत लम्हें मैंने बिताए हैं वो जीवन भर मेरे लिए एक अनमोल याद की तरह रहेंगे। ये भी वचन देता हूं कि इस घर के किसी भी सदस्य पर किसी के द्वारा कोई आंच नहीं आने दूंगा। चलता हूं अब, ऊपर वाला तुम्हें हमेशा खुश रखे।"

वैभव द्वारा कही गई ये बातें बार बार उसके जहन में गूंजने लगीं थी जिसके असर से अनुराधा के कोमल हृदय में दर्द का आभास होने लगा था। वो अपनी आंखें बंद कर के इस सबको अपने मन से निकालने का प्रयास करने लगी मगर कामयाब न हुई। बेबस और लाचारी का एहसास होते ही उसकी आंखें भर आईं और न चाहते हुए भी उसकी आंखों से आंसू के कुछ कतरे छलक ही पड़े। सहसा किसी आहट से वो चौंकी और फिर घबरा कर जल्दी जल्दी अपने आंसू पोछने लगी।



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"क्या सोचने लगे धनंजय?" दादा ठाकुर ने दारोगा को सोचो में गुम हुआ देखा तो बोले____"तुम्हारी चुप्पी और तुम्हारा अचानक से इस तरह से सोच में पड़ जाना इस बात को ज़ाहिर करता है कि तुमने जो कुछ मुरारी और उसके हत्यारे के संबंध में हमें बताया है उसे तुम खुद ही कबूल नहीं कर पा रहे हो।"

दादा ठाकुर की बात सुन कर दरोगा ने सिर उठा कर उनकी तरफ देखा किंतु जल्दी ही उनसे नज़रें हटा कर बगले झांकने लगा। चेहरे पर अजीब से भाव उभर आए थे। दादा ठाकुर उसी को देख रहे थे।

"प्रतीत होता है जैसे तुम हमसे कुछ छुपा रहे हो।" दादा ठाकुर ने उसके चेहरे पर तेज़ी से बदलते भावों को देखते हुए कहा____"हम अच्छी तरह जानते हैं कि तुम्हारे जैसा पढ़ा लिखा दारोगा इस मामले में ऐसे निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकता। तुम भी अच्छी तरह समझते हो कि अगर वैभव ही मुरारी का हत्यारा होता तो खुद उस पर नकाबपोशों का हमला नहीं होता और ना ही वो हमें मुरारी के हत्यारे का पता लगाने के लिए ज़ोर देता।"

"मुझे माफ़ कर दीजिए ठाकुर साहब।" धनंजय ने नज़रें चुराते हुए कहा____"मैं इस मामले में कुछ भी नहीं कर सकता।"

"ऐसा क्यों कह रहे हो तुम?" दादा ठाकुर के माथे पर सिलवटें उभर आईं____"आख़िर बात क्या है धनंजय? ऐसा क्या है जो तुम हमें बता नहीं रहे?"

"मैं जानता हूं कि आपके बहुत उपकार हैं मुझ पर।" दरोगा ने भारी गले से कहा____"आपने मेरे और मेरे परिवार के लिए बहुत कुछ किया है। आपके उपकारों का बदला मैं अपनी जान दे कर भी चुका नहीं सकता।"

"तुम्हें ऐसा कुछ करने की ज़रूरत भी नहीं है।" दादा ठाकुर ने कहा____"हम सिर्फ़ ये जानना चाहते हैं कि असल बात क्या है?"

"अपनी मां की तबियत के बारे में मैंने आपको जो कुछ बताया वो झूठ था ठाकुर साहब।" धनंजय ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"जबकि सच ये है कि मेरी मां का कुछ समय पहले अपहरण कर लिया गया है।"

"ये क्या कह रहे हो तुम?" दादा ठाकुर बुरी तरह चौंके____"कैसे हुआ ये और किसने किया ऐसा?"

"एक ऐसे रहस्यमई आदमी ने जो खुद को सफ़ेद कपड़े और नक़ाब में छुपा के रखता है।" धनंजय ने कहा____"एक हफ़्ता पहले की बात है। मैं इस कमरे से आगे की तहक़ीकात के लिए निकल ही रहा था कि तभी बाहर से दरवाज़ा खटखटाया गया। मैंने सोचा शायद आप होंगे इस लिए जा कर दरवाज़ा खोला। जैसे ही मैंने दरवाज़ा खोला एकदम से क़यामत टूट पड़ी मुझ पर। एक काला नकाबपोश आदमी बिजली की सी तेज़ी से टूट पड़ा था मुझ पर। मुझे उस सबकी ख़्वाब में भी उम्मीद नहीं थी इस लिए मैं उस सबसे बुरी तरह बौखला गया था किंतु जब तक सम्हला तब तक मैं काले नकाबपोश आदमी के कब्जे में आ चुका था। उसने पीछे से मेरे गले पर तेज़ धार वाला खंज़र लगा दिया था। अगर बात सिर्फ़ इतनी ही होती तो शायद मैं कुछ कर भी सकता था किंतु अगले ही पल दरवाज़े से उसके ही जैसा एक और नकाबपोश कमरे में आ गया। दूसरे नकाबपोश में सिर्फ़ इतना ही फ़र्क था कि उसके कपड़े सफ़ेद थे और चेहरे पर भी सफ़ेद रंग का ही नक़ाब था। उसे देख कर मेरी आंखों के सामने उस दिन का मंज़र घूम गया जब वो अपने ही एक नकाबपोश आदमी की जान ले रहा था। मैं सोच में पड़ गया था कि वो सफ़ेदपोश आदमी अपने काले नकाबपोश साथी के साथ मेरे पास क्यों आया है? क्या वो मेरी जान लेने आया था? अभी मैं ये सब सोच ही रहा था कि तभी कमरे में उस सफ़ेदपोश की अजीब सी आवाज़ गूंजी। उसने मुझसे कहा कि अब से मैं वही करूंगा जो वो चाहेगा और अगर मैने ऐसा नहीं किया तो ये मेरे लिए ठीक नहीं होगा। उसके अनुसार मुझे मुरारी के हत्यारे का पता लगाने में कोई जल्दबाजी नहीं करनी है और ना ही कोई ईमानदारी दिखाना है। अगर आप मेरे पास आ कर मुझसे इस मामले में कुछ पूछते हैं तो मुझे यही बताना है कि मुरारी का हत्यारा आपका बेटा वैभव सिंह ही है। इसको प्रमाणित करने के लिए उसने मुझे वही तरीका बताया जो मैं आपको बता चुका हूं कि आपके बेटे का मुरारी की बीवी सरोज के साथ नाजायज़ संबंध बन गया था और ये बात मुरारी को पता चल गई थी। ख़ैर ये सब कह कर उस सफ़ेदपोश ने मुझे फिर से चेताया कि अगर मैंने उसका कहा नहीं माना तो अंजाम अच्छा नहीं होगा। उसके बाद उसके काले नकाबपोश साथी ने मेरे सिर पर वार किया जिससे मैं बेहोश हो गया। होश आया तो देखा वो दोनों कमरे से गायब थे। मैं सोचने लगा कि आख़िर वो सफ़ेदपोश मुझसे ये सब क्यों करवाना चाहता है? भला ऐसा करने से उसे क्या फ़ायदा हो सकता था जबकि वैभव को मुरारी का हत्यारा साबित करने से भी कुछ नहीं हो सकता था? ख़ैर उसकी धमकी को मैंने पूरी तरह नज़रंदाज़ कर दिया था। मैं भला ऐसे किसी आदमी के कहने पर अपने फर्ज़ से कैसे मुंह मोड़ लेता लेकिन जल्दी ही मुझे समझ में आ गया कि मुझे उसका कहा मान लेना चाहिए था। चार दिन पहले मुझे पता चला कि मेरी मां घर से गायब है। मैंने उन्हें बहुत खोजा मगर उनका कहीं पता नहीं चला। मुझे समझते देर न लगी कि ये काम ज़रूर उस सफ़ेदपोश का ही होगा। इस दुनिया में मां के अलावा मेरा है ही कौन? मैं बुरी तरह घबरा गया था कि अगर मां को कुछ हो गया तो मैं कैसे खुद को माफ़ कर पाऊंगा? मन में ख़्याल आया कि इस बारे में आपको बताऊं लेकिन फिर ये सोच कर बताना सही नहीं समझा कि इससे कहीं बात और न बिगड़ जाए। मैं जानता था उस सफ़ेदपोश से यहीं मुलाक़ात हो सकती है इस लिए मैं यहीं आ गया। दो दिन पहले रात के अंधेरे में सच में ही वो सफ़ेदपोश मेरे सामने आ गया और फिर उसने खुद ही बताया कि मेरी मां उसके कब्जे में है। अगर अब भी मैं उसका कहा नहीं मानूंगा तो इस बार मैं अपनी मां से हाथ धो बैठूंगा। बेबस हो कर मुझे उसके अनुसार चलना ही पड़ा ठाकुर साहब।"

"तो क्या तुम्हारी मां अभी भी उसी के कब्जे में है?" दादा ठाकुर ने पूछा।

"हां।" धनंजय ने हताश भाव से कहा____"उसका कहना है कि वो तभी मेरी मां को आज़ाद करेगा जब मैं आपको ये सब बता दूंगा कि मुरारी का हत्यारा आपका बेटा ही है।"

"बड़ी अजीब बात है।" दादा ठाकुर ने हैरानी भरे भाव से कहा____"भला उसे तुम्हारे द्वारा ऐसा करवाने से क्या लाभ हो सकता है? क्या उसे इतना भी ज्ञान नहीं है कि तुम्हारे द्वारा वैभव को मुरारी का हत्यारा साबित कर देने से भी हमें यकीन नहीं हो सकता या ये कहें कि हमारे बेटे पर कोई आंच नहीं आ सकती?"

"मैं खुद भी अभी तक यही बात सोच सोच कर परेशान हूं ठाकुर साहब।" धनंजय ने कहा____"मुझे खुद समझ में नहीं आ रहा कि मेरे द्वारा ऐसा करवाने से उसे क्या लाभ हो सकता है। ख़ैर, मैं तो ये सोच कर डर रहा हूं कि आपको असलियत बता देने के बाद अब मेरी मां का क्या होगा? कहीं वो मेरी मां को जान से न मार दे, अगर ऐसा हुआ तो मैं अनाथ हो जाऊंगा ठाकुर साहब। मेरी वजह से मेरी मां की जान चली गई तो कैसे इस अपराध बोझ से जी पाऊंगा मैं?"

"कुछ नहीं होगा तुम्हारी मां को।" दादा ठाकुर ने उसे धीरज बंधाते हुए कहा____"हमें यकीन है कि वो तुम्हारी मां के साथ कुछ भी बुरा नहीं करेगा।"

"पता नहीं वो कौन सी मनहूस घड़ी थी।" धनंजय ने हताश हो कर कहा____"जब मेरा तबादला इस शहर में हुआ था और फिर मैं इस मामले में फंस गया?"

"फ़िक्र मत करो धनंजय।" दादा ठाकुर ने खड़े हो कर उसके कंधे पर हाथ रखा____"तुम्हारी मां सही सलामत तुम्हें मिल जाएंगी। एक बात और, हम तुम्हें अब इस मामले से आज़ाद करते हैं। तुम्हारे आला अधिकारी से बात कर के हम तुम्हारा तबादला भी कहीं और करवा देंगे। हम नहीं चाहते कि हमारी वजह से तुम दोनों मां बेटे पर कोई संकट आए। अच्छा अब हम चलते हैं, अपना ख़्याल रखना।"

धनंजय ने हाथ जोड़ कर दादा ठाकुर को प्रणाम किया तो दादा ठाकुर उसे आशीर्वाद दे कर कमरे से बाहर निकल गए। कुछ ही देर में वो जीप में अपने दोनों आदमियों के साथ बैठे हवेली की तरफ बढ़े चले जा रहे थे। उनके चेहरे पर सोचो के गहरे बादल छाए हुए थे।



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शाम हो चुकी थी।

मैं सबके साथ बैठा चाय पी रहा था। गांव की कुछ औरतें आई हुईं थी और अंदर वो सब सोहर गीत गा रहीं थी। ये सुबह शाम रोज़ का ही काम बन गया था उनका। जब से बड़े भैया के साले वीरेंद्र को पुत्र हुआ था तभी से घर में खुशियों का माहौल छाया हुआ था। हम सब बाहर ही बैठे हुए थे इस लिए गाना बजाना साफ साफ सुनाई दे रहा था। मैं पहली बार रागिनी भाभी के द्वारा कोई गीत सुन रहा था। उनकी आवाज़ तो मधुर थी ही किंतु गाना भी वो बहुत ही सुंदर गा रहीं थी। कुछ गांव की औरतें और लड़कियां भी थीं जो उनका साथ दे रहीं थी।

चाय के दौरान ही मैंने वीरेंद्र से कहा कि मेरे लायक जो भी काम हो वो बेझिझक मुझे बताएं। मेरी ये बात सुन कर सब कहने लगे कि वो अपनी बेटी के देवर से कोई काम नहीं करवाएंगे। मैंने काफी कहा लेकिन वो न माने तब मैंने कहा कि ठीक है लेकिन मेरे साथ जो आदमी आए हैं वो यहां काम करने के लिए ही आए हैं इस लिए वो उन्हें काम पर लगा लें। मेरी इस बात से सब राजी हो गए। ख़ैर उसके बाद मैं गांव घूमने का बोल कर निकल गया।

चंदनपुर गांव में ज़्यादातर ठाकुर ही थे और बाकी अन्य जाति के लोग थे। यहां मुझे सब जानते थे और बड़े ही प्रेम भाव से मिलते थे। गांव में ज़्यादातर कच्चे मकान बने हुए थे। मैं बाहर आया और सोचा किस तरफ घूमने के लिए जाया जाए? घर में क्योंकि सब लोग गीत संगीत ने व्यस्त थे इस लिए किसी के पास मेरे लिए समय ही नहीं था। मैं चलते हुए अपने भैया के चाचा ससुर के घर की तरफ आ गया। शाम ढल चुकी थी इस लिए हर घर में लालटेन जला दी गई थी। हालाकि बिजली भी थी गांव में लेकिन उसके आने का कोई समय नहीं था। चौबीस घंटे में मुश्किल से चार पांच घंटे ही बिजली रहती थी, वो भी भगवान भरोसे।

घर का दरवाज़ा खुला हुआ था तो मैं अंदर दाखिल हो गया। चाचा ससुर यानि बलभद्र सिंह भाभी के घर में ही बैठे हुए थे और उनके साथ में उनका बड़ा बेटा भी था। मैं अंदर आया तो देखा बैठका खाली था तो मैं अंदर की तरफ बढ़ गया। थोड़ी ही देर में मैं अंदर आंगन में आ गया। आंगन में आ कर जैसे ही मैंने बाएं तरफ नज़र डाली तो एकदम से मेरी आंखें फट पड़ीं। अंदर की सांस अंदर और बाहर की बाहर ही रह गई। मैं अपनी जगह पर बुत बना खड़ा रह गया था।

आंगन के बाएं तरफ कोने में बलवीर की बीवी सुषमा पूरी तरह नंगी खड़ी थी। उसकी साड़ी नीचे ज़मीन पर पड़ी हुई थी। उसका पूरा जिस्म लालटेन के प्रकाश में नहाया हुआ था। उसकी नज़र मुझ पर नहीं पड़ी थी। मैंने देखा वो एक दूसरी साड़ी को हाथ में लिए उसे पहनने वाली थी। सहसा उसे किसी बात का आभास हुआ तो उसने नज़र उठा कर देखा और जैसे ही उसकी नज़र किसी पराए मर्द पर पड़ी तो वो बुरी तरह उछल पड़ी। डर और घबराहट के मारे उसके कंठ से चीख ही निकल गई। उसके बाद फ़ौरन ही वो अपनी नग्नता को छुपाने में लग गई थी। इधर उसकी चीख सुन कर मुझे होश आया था। उसको हैरत से अपनी तरफ देखता देख मैं एकदम से बौखला गया और फ़ौरन ही पलट कर बाहर की तरफ भागा।

बाहर बैठक में आ कर मैं एक तरफ रखे लकड़ी के तख्त पर बैठ गया। मेरी सांसें इतनी तेज़ चलने लगीं थी मानों मैं सैकड़ों मील भाग कर आया था। आंखों के सामने सुषमा का नंगा जिस्म बार बार घूमे जा रहा था। गोरे जिस्म का एक एक अंग साफ देखा था मैंने। सीने पर मध्यम आकार की ठोस और तनी हुई चूचियां, उसके नीचे सपाट पेट, पेट के बीच सुंदर सी नाभि और उसके नीचे चिकनी जांघों के बीच घने बालों में छुपी उसकी योनि। उफ्फ मैंने आंखें बंद कर के एक गहरी सांस ली। बंद आंखों में सुषमा का डरा सहमा और हैरत से सराबोर चेहरा उभर आया। यकीनन इस तरह उसे किसी के आ जाने की बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी और उसे ही बस क्यों मुझे खुद भी इसकी उम्मीद नहीं थी। मैं सोचने लगा कि साला ये कैसा चूतियापा हो गया? सहसा मेरे मन में ख़्याल उभरा कि वो आंगन में उस हालत में क्यों थी? अभी मैं ये सोच ही रहा था कि तभी अंदर से पायलों की छम छम करती आवाज़ बाहर आती सुनाई दी। मैं एकदम से सम्हल कर बैठ गया। मेरी धड़कनें अनायास ही तेज़ हो गईं।

कुछ ही पलों में सुषमा बाहर आ गई। मैंने नज़र उठा कर उसकी तरफ देखा। हमारी नज़रें मिलीं तो उसने बुरी तरह शरमा कर अपना सिर झुका लिया। इस वक्त वो साड़ी पहने हुए थी। गोरा चेहरा लाज्जावश सुर्ख पड़ा हुआ था।

"माफ़ कीजिएगा, मुझे पता नहीं था कि अंदर आप उस हालत में होंगी।" मैंने झिझकते हुए धीमें स्वर में कहा____"मैं तो बस आपसे मिलने आया था। मुझे बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था कि अंदर मुझे ऐसा ख़ूबसूरत नज़ारा देखने को मिल जाएगा।"

"आप बहुत ख़राब हैं ननदोई जी।" सुषमा ने बुरी तरह शरमा कर किन्तु नाराज़गी जताते हुए कहा____"भला कोई किसी के घर के अंदर इस तरह दबे पांव जाता है क्या? कम से कम आवाज़ तो लगाना चाहिए था आपको।"

"देखिए अब जो हो गया उसके लिए क्या ही किया जा सकता है भाभी जी।" मैंने जब देखा कि सुषमा उस सबसे ज़्यादा नाराज़ नहीं हुई है तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"रही बात आवाज़ लगा कर अन्दर आने की तो अब मैंने फ़ैसला कर लिया है कि अब से जब भी यहां आऊंगा तो ऐसे ही दबे पांव आऊंगा ताकि ऐसा ही ख़ूबसूरत नज़ारा देखने को मिलें।"

"धत्त, सच में बहुत गंदे हैं आप?" सुषमा एक बार फिर बुरी तरह लजा गई फिर बोली____"अगर आइंदा इस तरह दबे पांव आएंगे तो कूटे जाएंगे आप।"

"कोई बात नहीं सरकार।" मैंने मुस्कुरा कर कहा___"ऐसे ख़ूबसूरत नज़ारे को देखने के लिए तो हम खुशी से अपनी जान भी दे देंगे।"

"बस कीजिए अब।" सुषमा मानों शर्म से गड़ी जा रही थी____"वरना रागिनी दीदी से आपकी शिकायत कर देंगे हम।"

"ज़रूर कर दीजिए सरकार।" मैंने छेड़ा____"और ये भी बताइएगा कि कैसे आप मुझ मासूम को अपने हुस्न का दीदार करा रहीं थी।"

"हाय राम! हमने कब किया ऐसा?" सुषमा बुरी तरह हैरान हो कर बोल पड़ी थी।

"ख़ैर ये सब छोड़िए।" मैंने कहा____"और ये बताइए कि आप आंगन में उस हालत में क्यों थीं? भला आपको ये कैसा शौक चढ़ा हुआ था?"

"धत्त।" सुषमा ने शर्म से मुस्कुराते हुए कहा____"हमें ऐसा करने का कोई शौक नहीं चढ़ा हुआ था। हम तो दिशा मैदान जाने के लिए कपड़ा बदल रहे थे। घर में कोई था नहीं इस लिए सोचा आंगन में ही झट से कपड़ा बदल लेते हैं और फिर दिशा मैदान के लिए चले जाएंगे। अब हमें क्या पता था कि आप ऐसे दवे पांव आ जाएंगे।"

"शायद मेरी किस्मत बहुत अच्छी थी भाभी।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"इसी लिए तो इतना खूबसूरत नज़ारा देखने को मिल गया मुझे। उफ्फ! क्या लग रहीं थी आप?"

"भगवान के लिए ऐसी बातें मत कीजिए।" सुषमा ने फिर से शर्मा कर कहा____"हमारा वैसे भी शर्म से बुरा हाल है। कृपया इस बात का ज़िक्र किसी से मत कीजिएगा वरना बहुत बदनामी होगी हमारी।"

"फ़िक्र मत कीजिए।" मैंने उसके शर्म से लाल पड़े चेहरे को देखते हुए कहा____"मैं इस बारे में किसी से कुछ नहीं कहूंगा, लेकिन ये भी तो बताइए कि इससे मुझे क्या मिलेगा?"

"क...क्या मतलब है आपका?" सुषमा मानों उलझ गई।

"सीधी सी बात है भाभी।" मैंने समझाने वाले अंदाज़ से कहा____"मैं आपके इतने बड़े राज़ को सबसे छुपा कर रखूंगा जिससे कोई आपके बारे में ग़लत नहीं सोचेगा? तो मेरे इतने बड़े काम के लिए मुझे भी तो आपसे कुछ मिलना चाहिए।"

"क..क्या चाहते हैं आप?" सुषमा ने संदेहपूर्ण भाव से मेरी तरफ देखा।

"ज़्यादा कुछ नहीं।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"सिर्फ़ यही कि एक बार फिर से वैसा ही ख़ूबसूरत नज़ारा देखने को मिल जाए।"

"हाय राम! ये क्या कह रहे हैं आप?" सुषमा ने बुरी तरह चौंकते हुए कहा_____"नहीं नहीं, ऐसा नहीं हो सकता।"

"क्यों नहीं हो सकता?" मैंने तख्त से उतर कर कहा____"अभी थोड़ी देर पहले तो हुआ ही है तो एक बार फिर से क्यों नहीं हो सकता?"

"वो तो बस अंजाने में हुआ था।" सुषमा ने शर्म से नज़रें झुकाते हुए कहा____"अब वैसा कुछ भी हम जान बूझ कर नहीं करेंगे। कृपया आप हमें इसके लिए मजबूर न करें। अच्छा, अब हम चलते हैं। हमें दिशा मैदान के लिए जाना है।"

सुषमा मेरी कोई बात सुने बिना ही चली गई। शायद वो समझ गई थी कि जितना वो मुझसे इस बारे में बातें करेगी उतना वो खुद ही फंसती जाएगी। या फिर ये भी संभव था कि दिशा मैदान के लिए जाना उसके लिए ज़रूरी हो गया था। ख़ैर, मैं उसकी हालत को सोच कर मन ही मन मुस्कुराया और फिर बाहर की तरफ चल पड़ा। अभी दरवाज़े पर ही पहुंचा था कि सामने से मुझे सुषमा की ननद कंचन इधर ही आती हुई दिखी। उसे आता देख मेरे होठों पर गहरी मुस्कान उभर आई और मैं पलट कर इस बार दरवाज़े के बगल से दीवार की ओट में छिप गया।



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Bilkul sahi guess kiya hai dost, anuradha ki filhaal yahi haalat hai :approve:

Kya baat hai bhai, kya khubsurat sher arz kiya hai Anuradha e liye vaibhav ki taraf se :applause:

Jald hi is bare me pata chalega...

😆 Next update vaibhav ke kaand wala hi hai dost :D

Well shukriya is Khubsurat pratikriya ke liye :hug:
 
VPS ek mahaan writer the, unki nakal kar pana bhi mumkin nahi hai. Kaash itna jaldi wo is duniya se rukhsat na huye hote to unke dwara likhe aur bhi novels padhne ko milte. Unke novels padhne ke baad hi maine likhne ka faisla kiya tha. Us din bahut dukh hua mujhe jis din maine jana ki wo ab nahi rahe....ek baar meerut gaya tha main. Shahdara me wo rahte the, shahdara jane wale raaste se laut aaya tha main. Baad me bahut pachhtawa hua. Well is inspector ka aisa kuch bhi case nahi hai vps ke novel jaisa. Jo bhi hai jald hi pata chalega...

Aap guru ghantaal aadmi hain...har cheez me PhD ki hai aapne aur kamdev bhaiya ne. Bas aise hi gyaan dete rahiyega 🙇

Baaki readers ka naam le kar aap apni fantasy ko sare aam bakhaan kar rahe hain na :D

Dekh rahe hain kamdev99008 bhaiya, matlab ki full charge le liya hai inhone aapka :D

Beshak ho sakta hai agar is beech koi bighn badha na ho 🚬

Shukriya bhaiya ji is khubsurat sameeksha ke liye :hug:
 
Bilkul sahi kaha aapne. Vaibhav jab tak vanwas me tha tab tak wo murari aur uske ghar tak hi seemit rah gaya tha. Anuradha par usne shuruaat me try karne ka socha tha lekin jald hi uska mood badal gaya tha uske baad usne jo kuch Anuradha ke bare me socha dekha aur feel kiya usse wo ek alag hi tarah nazar aane laga tha. Uske baad jab wo waapas haweli lauta to alag hi maamle me fans gaya. Idhar Anuradha ki baato ne use aahat kiya aur fir wo chandanpur pahuch gaya jaha par ek se badh kar ek husn uski nazar me aa gaye jinhe dekh kar uske andar ka hawsi vaibhav fir se jaag utha....

Ragini sushma ki bhatiji nahi nanad lagti hai. Sushma ki shadi huye abhi ek saal hi hua hai. Ek tarah se aap ye bhi kah sakte hain ki sushma ki umar zyada nahi hai....

Kahani me kamini ki bhumika ke bare me abhi kuch socha nahi hai, baaki dekhiye kaise halaat bante hain....

Waise kamini vaibhav ke liye sahi ladki nahi hai...aur ye baat vaibhav khud bhi achhi tarah samajhta hai. So usse shadi karne ka wo sochega hi nahi. Dada thakur agar chaahe bhi to sambhav nahi kyoki vaibhav jo bhi karega apni marzi se karega. Ye alag baat hai ki halaat aise ban jaaye jaha vaibhav ko kamini se shadi karna ek majburi ban jaye...

Wo kahte hain na ki Dilli bhi bahut door hai so itna aage kya abhi kyo sochna. Abhi to yahi ek bada sawaal hai ki kya in dono ke beech prem sambandh ho sakega.??? :D

Ab ye to aane wala samay hi batayega ki kise kya pata hai aur kaun kya kar raha hai... :D

Dhananjay jaisa inspector khud confusion ka shikaar hai ki safedposh usse aisa kyo karwana chaahta tha? Aakhir uske aisa kahne aur karne se use kya faayda hoga? Baaki aage pata chalega...

Sahi kaha ek reason ye bhi ho sakta hai... :approve:

Safedposh ke aisa karne ka asli maksad baad me pata chalega...

😆 Ragini bhabhi se apne ko koi prem nahi hai dost. Maine us din aapko clearly bataya tha ki jo koi bhi ye khel khel raha hai usme Ragini ka ya uske maayke walo ka koi sambandh nahi hai aur is baat ko clear bata dene ka mera ek hi maksad tha ki aap maamle me bhatke nahi. Yu samajhiye ki saara chakkar isi gaav se sambandhit hai.... :D

Sahi kaha, vaibhav ki gair maujoodgi me dada thakur ne Shera ko jo kaam saupa hai usi me asli daromadaar hai. Ab dekhna ye hai ki Shera apne kaam me safal hota hai ya wo khud hi kaal ka graas ban jata hai.... :D

Shukriya Death Kiñg bhai aisi shandaar sameeksha ke liye :hug:
 
अध्याय - 56

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अब तक....



सुषमा मेरी कोई बात सुने बिना ही चली गई। शायद वो समझ गई थी कि जितना वो मुझसे इस बारे में बातें करेगी उतना वो खुद ही फंसती जाएगी। या फिर ये भी संभव था कि दिशा मैदान के लिए जाना उसके लिए ज़रूरी हो गया था। ख़ैर, मैं उसकी हालत को सोच कर मन ही मन मुस्कुराया और फिर बाहर की तरफ चल पड़ा। अभी दरवाज़े पर ही पहुंचा था कि सामने से मुझे सुषमा की ननद कंचन इधर ही आती हुई दिखी। उसे आता देख मेरे होठों पर गहरी मुस्कान उभर आई और मैं पलट कर इस बार दरवाज़े के बगल से दीवार की ओट में छिप गया।



अब आगे....



मैं दीवार के ओट में छुपा देख रहा था कि कंचन तेज़ कदमों से चली आ रही थी। शाम का अंधेरा घिरने लगा था इस लिए उसका क़यामत ढाता हुस्न ज़्यादा साफ़ नहीं दिख रहा था। उसे ज़रा भी उम्मीद नहीं थी कि उसके घर में इस वक्त मेरे अलावा कोई नहीं है। ख़ैर जल्दी ही वो अंदर दाखिल हुई। बिना इधर उधर देखे वो सीधा अंदर ही बढ़ती चली गई। कुछ ही पलों में उसकी आवाज़ मुझे सुनाई दी। वो सुषमा को भौजी कह कर पुकार रही थी। दो तीन बार पुकारने के बाद उसका पुकारना बंद हो गया। मेरे मन में ये जानने की उत्सुकता बढ़ गई कि अंदर वो क्या करने लगी होगी अकेले घर में?

मैं दबे पांव अंदर की तरफ बढ़ चला। बाहर बैठक में और अंदर आंगन में लालटेन जल रही थी, बाकी बाहर बरोठ में अंधेरा था। अंदर वाले बरोठ में जब मैं पहुंचा तो आंगन में जल रही लालटेन का हल्का प्रकाश महसूस हुआ। मैंने दीवार की ओट से छुप कर अंदर आंगन की तरफ देखा, कंचन कहीं नज़र ना आई। मेरे दिल की धड़कनें थोड़ा तेज़ हो गईं थी लेकिन फिर भी मैं दबे पांव आगे बढ़ा और जल्दी ही आंगन वाली दीवार के पास आ गया। मैंने आंगन के पूरे हिस्से में निगाह घुमाई और अगले ही पल मेरी नज़र आंगन के एक कोने में ठहर गई।

अपनी भाभी सुषमा की तरह कंचन भी अपने कपड़े उतारे पूरी नंगी खड़ी दूसरे कपड़े पहनने की तैयारी कर रही थी। लालटेन की रोशनी में उसका जिस्म ऊपर से नीचे तक एकदम साफ़ नज़र आ रहा था। उसे इस हालत में देख कर मेरे अंदर ज़बरदस्त हलचल मच गई। पहले सुषमा और अब उसकी ननद कंचन। मैं समझ गया कि वो भी दिशा मैदान जाने के लिए कपड़े बदल रही है। ये औरतों का रोज सुबह शाम का नियम था। दिशा मैदान जाने के लिए दूसरे कपड़े पहनते थे सब।

कंचन के सीने पर मध्यम आकार के उभार एकदम ठोस और तने हुए दिख रहे थे। उन उभारों के बीच भूरे रंग के चूचक बहुत ही सुंदर नज़र आ रहे थे। मेरा मन किया कि अभी जाऊं और उन चूचकों को मुंह में भर कर चूसना शुरू कर दूं लेकिन फिर किसी तरह मैंने खुद को रोका। ऐसा करना यकीनन ख़तरनाक हो सकता था, क्योंकि ये उसके साथ ज़बरदस्ती कहलाता। कंचन का पेट तक का हिस्सा मुझे साफ़ दिख रहा था किंतु उसके नीचे का हिस्सा उसके उस दूसरे कपड़े की वजह से छिपा हुआ था जिसे वो पहनने वाली थी। उसे इस हालत में देख कर मेरे अंदर का खून उबाल मारने लगा और मेरी टांगों के बीच कच्छे में छुपा मेरा लंड आधे से ज़्यादा सिर उठा चुका था। दिल की धड़कनें धाड़ धाड़ बजती महसूस हो रहीं थी।

मैं जानता था कि कंचन को फंसाने का इससे अच्छा मौका नहीं मिलने वाला था लेकिन मैं ये भी जानता था कि अगर मैंने कुछ भी उल्टी सीधी हरकत की तो भारी गड़बड़ हो जाएगी। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूं? उधर कंचन अपने दूसरे कुर्ते को सीधा करने में लगी हुई थी। जल्द ही वो कपड़े पहन कर दिशा मैदान के लिए निकल जाने वाली थी। मेरा ज़हन बड़ी तेज़ी से कोई उपाय सोचने में लगा हुआ था लेकिन हड़बड़ी में कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। अचानक मैंने एक फ़ैसला किया, मैंने सोच लिया कि अब जो होगा देखा जाएगा। मैं ऐसा सुनहरा मौका गंवाना नहीं चाहता था।

आंखें बंद कर के मैंने दो तीन गहरी गहरी सांसें ली और पलट कर चार पांच क़दम पीछे आया। उसके बाद सामान्य अंदाज़ में भाभी भाभी पुकारते हुए मैं एकदम से आंगन में आ गया। उधर मेरे द्वारा भाभी भाभी पुकारने पर कंचन बुरी तरह हड़बड़ा गई और साथ ही घबरा भी गई। वो मादरजाद नंगी खड़ी थी। हम दोनों की नज़रें जैसे ही एक दूसरे से मिलीं तो मानो वक्त ठहर गया। मैंने तो ख़ैर बुरी तरह चकित हो जाने का नाटक किया लेकिन कंचन भौचक्की सी खड़ी रह गई। अचानक उसे अपनी हालत का एहसास हुआ। उसने बुरी तरह हड़बड़ा कर उसी कुर्ते को अपने सीने पर छुपा लिया जिसे वो सीधा कर के पहनने वाली थी।

"ह....हाय राम।" फिर वो बुरी तरह से शरमाते हुए बड़ी मुश्किल से बोली_____"आप यहां क्या कर रहे हैं जीजा जी? जाइए यहां से।"

"म...मैं तो यहां भाभी से मिलने आया था।" मैंने बुरी तरह हकलाने का नाटक किया____"मुझे क्या पता था कि यहां ग़ज़ब का सौंदर्य दर्शन हो जाएगा।"

"हे भगवान! कितने ख़राब हैं आप?" कंचन झल्लाहट में दबी आवाज़ से मानों चीखी____"जाइए आप यहां से। आपको शर्म नहीं आती किसी लड़की को इस तरह देखते हुए?"

"लो कर लो बात।" मैंने पूरी ढिठाई से कहा____"मैं थोड़ी ना नंगा खड़ा हूं जो मुझे शर्म आएगी? शर्म तो आपको आनी चाहिए सरकार जो मुझ जैसे भोले भाले लड़के के सामने अपना ये ख़ूबसूरत बदन दिखा रही हैं।"

"भगवान के लिए चले जाइए यहां से।" कंचन ने इस बार मिन्नतें की____"मुझे आपके सामने इस हालत में बहुत शर्म आ रही है।"

"ठीक है आप कहती हैं तो चला जाता हूं।" मैंने उसको ऊपर से नीचे तक देखते हुए कहा____"वैसे अब मुझसे कुछ छुपाने लायक तो रहा नहीं।"

"हे भगवान! क्या आपने सब देख लिया?" कंचन ने इस तरह कहा जैसे उसके प्राण ही निकल गए हों।

"मैं क्या करता भला?" मैंने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा____"आप सब कुछ खोले खड़ी थीं तो नज़र पड़ ही गई। अगर मुझे पहले से पता होता तो यहां आंगन में आता ही नहीं बल्कि छुप कर आपके ख़ूबसूरत बदन का जी भर के दीदार करता।"

"हाय राम!" कंचन आश्चर्य से आंखें फाड़ कर बोली____"कितने बेशर्म हैं आप? जा कर दीदी से शिकायत करूंगी आपकी।"

"ज़रूर कीजिएगा सरकार।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा_____"इतना ख़ूबसूरत नज़ारा देखने के बाद तो अब मैं सूली पर भी चढ़ जाऊंगा।"

कंचन का चेहरा शर्म से पानी पानी हुआ जा रहा था। वो कुर्ते को अपने सीने पर ऐसे कस के चिपकाए हुए थी मानो उसे डर हो कि कहीं वो उसके चिकने बदन से फिसल न जाए। अपनी समझ में उसने खुद को उस कुर्ते से पूरा छुपा लिया था जबकि सच तो ये था कि कुर्ते से अपने उभारों को छुपाने के चक्कर में उसकी नाभि से नीचे तक का पूरा हिस्सा बेपर्दा हो गया था। वो क्योंकि मेरी तरफ ही मुड़ कर खड़ी थी इस लिए लालटेन की रोशनी में मुझे मस्त गुदाज़ जांघों के बीच हल्के बालों से घिरी उसकी योनि साफ़ झलकती दिख रही थी। उसे इस बात का ध्यान ही नहीं रह गया था कि उसकी सबसे ज़्यादा अनमोल चीज़ तो मेरे सामने ही बेपर्दा है।

"मुझे और शर्मिंदा मत कीजिए?" कंचन ने बेबस भाव से कहा____"कृपया चले जाइए न यहां से। अगर कोई आ गया तो भारी मुसीबत हो जाएगी।"

"ठीक है जा रहा हूं।" मैंने इस बार थोड़ा संजीदा भाव से कहा____"और हां, आपको शर्मिंदा होने की कोई ज़रूरत नहीं है। इसमें आपकी कोई ग़लती नहीं है। जो कुछ हुआ वो बस इत्तेफ़ाक़ से हुआ है। वैसे एक बात कहूं, आप बिना कपड़ों में बहुत ही ख़ूबसूरत दिखती हैं। ख़ास कर आपकी राजकुमारी।"

इतना कह कर मैं पलटा और तेज़ी से बाहर निकल गया। मैं जानता था कि मेरी आख़िरी बात ने कंचन को बुरी तरह चौंका दिया होगा। वो जब अपने बदन के निचले हिस्से को बेपर्दा देखेगी तो उसका और भी शर्म से बुरा हाल हो जाएगा। अब इस घर में रुकना ठीक नहीं था इस लिए मैं घर से बाहर ही आ गया।

हर तरफ अंधेरा फ़ैल गया था। रागिनी भाभी के घर जाने का मेरा कोई इरादा नहीं था इस लिए मैं उस तरफ चल पड़ा जहां कुछ मिलने की उम्मीद थी। एक मोड़ से मुड़ कर मैं कुछ ही देर में एक घर के पास पहुंच गया। घर के सामने जो खाली जगह थी वहां एक तरफ मवेशी बंधे हुए थे जिनको एक आदमी भूसा डाल रहा था। घर के बाहर दीवार से सट कर ही चबूतरा बना हुआ था जिसमें लालटेन रखी हुई थी। द्वार के सामने कुछ ही दूरी पर एक चारपाई रखी हुई थी। मैं आगे बढ़ा और जा कर उस चारपाई पर बैठ गया।

"कैसे हैं राघव भैया?" मैंने भूसा डाल रहे आदमी को आवाज़ लगाते हुए कहा तो उसने फ़ौरन ही पलट कर मेरी तरफ देखा और मुझ पर नज़र पड़ते ही उसके चेहरे पर चमक उभर आई।

"अरे! वैभव महाराज आप यहां?" वो फ़ौरन ही भूसे की झाल को वहीं छोड़ कर भागता हुआ आया और मेरे पैर छूते हुए बोला____"धन्य भाग हमारे जो आपके दर्शन हो गए।"

"आज दोपहर ही आया हूं।" मैंने कहा____"साले साहब ने संदेशा भेजा था तो भाभी को ले कर आना पड़ा।"

"ये तो बहुत ही अच्छा हुआ जो आप यहां आ गए।" राघव भारी खुश हो गया था, बोला____"क़सम से आंखें तरस गईं थी आपको देखने के लिए।"

राघव सिंह इसी गांव का था और मेरी उससे काफ़ी अच्छी बनती थी। मुझसे उमर में दो तीन साल बड़ा था लेकिन मेरी ही तरह औरतबाज था वो। उससे मेरी इतनी गहरी दोस्ती हो गई थी कि कई बार हमने एक साथ ही एक दो औरतों को पेला था। ख़ैर मेरे कहने पर राघव ने पहले मवेशियों को भूसा डाला उसके बाद वो हाथ पैर धो कर अंदर चला गया। कुछ ही देर में मैंने देखा अंदर से एक लड़की उसके साथ बाहर आई। लड़की के हाथ में एक थाली थी। वो लड़की राघव की बहन जमुना थी। पिछली बार जब मैने उसे देखा था तो वो थोड़ा दुबली पतली थी किंतु अब उसका जिस्म भरा भरा दिख रहा था और उसके सीने के उभार भी अच्छे खासे दिख रहे थे। मुझ पर नज़र पड़ते ही उसने मुस्कुराते हुए नमस्ते किया।

जमुना ने घागरा चोली पहन रखा था इस लिए झुक कर जैसे ही उसने थाली मेरी तरफ बढ़ाई तो चोली के बड़े गले से उसकी आधे से ज़्यादा चूचियां दिखने लगीं। मेरी नज़र मानों उसके गोलों पर ही चिपक गई। जमुना भी समझ गई कि मैं उसकी चूचियों को देख रहा हूं इस लिए उसने मुस्कुराते हुए धीमें से कहा____"पहले थाली का प्रसाद खा लीजिए जीजा जी, उसके बाद अंदर का प्रसाद खाने का सोचिएगा।"

जमुना की बात सुन कर मैं पहले तो हल्के से हड़बड़ाया और फिर मुस्कुराते हुए थाली में रखी कटोरी को उठा लिया। राघव उसके पीछे कुछ ही दूरी पर खड़ा था। मैंने कटोरी लिया तो जमुना सीधी खड़ी हो गई और फिर मुस्कुराते हुए अंदर जाने लगी तो राघव ने उसे लोटा गिलास में पानी लाने को कहा।

जमुना के जाने के बाद राघव चबूतरे में बैठ गया। हम दोनों इधर उधर की बातें करने लगे। कुछ देर में जमुना लोटा गिलास में पानी ले कर आई और राघव से कहा कि भौजी बुला रही हैं। जमुना की बात सुन कर राघव मुझसे अभी आया महाराज बोल कर अंदर चला गया।

"क्या बात है सरकार, आप तो गज़ब का माल लगने लगी हैं।" मैंने जमुना के सीने के उभारों को देखते हुए कहा____"कभी हमें भी चखने का मौका दीजिए।"

"धत्त।" जमुना बड़ी अदा से बोली____"हम ऐसे वैसे नहीं हैं जीजा जी इस लिए होश में रह कर बात कीजिए।"

"आपको देखने के बाद अब हम होश में रहे कहां सरकार?" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"आपके इस हुस्न ने तो हमारे अंदर के हर पुर्जे को हिला दिया है।"

"अच्छा जी ऐसा है क्या?" जमुना ने मुस्कुराते हुए कहा____"फिर तो आपके पुर्जों को जल्दी ही ठीक करना पड़ेगा हमें, है ना?"

"ये भी कोई पूछने की बात है क्या?" मैं जमुना की बेबाकी पर मन ही मन हैरान था मगर उसकी मंशा समझते हुए बोला____"अगर आप हमारे पुर्जों को ठीक करेंगी तो ये हमारा सौभाग्य होगा।"

"अगर ऐसी बात है तो ठीक है।" जमुना ने एक बार अंदर की तरफ निगाह डालते हुए कहा____"हम दिशा मैदान के लिए जा रहे हैं। आप भी कुछ देर में नदी तरफ आ जाइएगा। हम वहीं आपके पुर्जों को ठीक करेंगे।"

जमुना अपना निचला होठ दांतों से दबा कर मुस्कुराई और फिर अपनी गोल गोल गांड को मटकाते हुए अंदर चली गई। सच कहूं तो मुझे उससे ऐसी बातों की बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी। मुझे समझते देर न लगी कि राघव की ये बहन खेली खाई लौंडिया है। काफी समय हो गया था किसी लड़की को पेले हुए तो सोचा चलो यही सही। ज़हन में कंचन और सुषमा का ख़्याल तो आया लेकिन उनकी तरफ से कुछ मिलने की उम्मीद अगर थी भी तो अभी उसमें समय लगना था।

राघव आया तो हम दोनों फिर से बातों में लग गए। कुछ ही देर में जमुना हाथ में एक लोटा लिए बाहर आई और अपने भाई राघव से नज़र बचा कर मुझे आंखों से इशारा करते हुए चली गई। मेरी धड़कनें ये सोच कर थोड़ा तेज़ हो गईं कि ये तो साली सच में ही चुदने को तैयार है। कुछ देर तक मैं राघव से बातें करता रहा और फिर उससे कल मिलने का कह कर मैं उठ कर चल दिया। सड़क पर आ कर मैं रुका और पलट कर राघव की तरफ देखा। वो मेरे जाते ही चारपाई पर लेट गया था। शायद दिन भर की मेहनत से थका हुआ था वो। उसे लेटा देख मैं फ़ौरन ही उस तरफ बढ़ चला जिधर जमुना गई थी।

गांव के उत्तर में एक नदी थी इस लिए मैं तेज़ी से उसी तरफ बढ़ता चला जा रहा था। अंधेरा हो चुका था इस लिए दूर का साफ़ साफ़ दिख नहीं रहा था। शुक्र था कि गगन में आधे से थोड़ा कम चांद था जिसकी वजह से कुछ कुछ दिख रहा था। मन में कई तरह के ख़्याल बुनते हुए मैं जल्दी ही नदी के पास पहुंच गया। आम तौर पर गांव के लोग नदी की तरफ दिन में ही दिशा मैदान के लिए आते थे। आज कल तो वैसे भी खेत खलिहान खाली पड़े थे इस लिए जिसका जहां मन करता था रात के अंधेरे में वहीं हगने बैठ जाते थे। नदी के पास पेड़ पौधे और झाड़ियां थी इस लिए अंधेरे में कोई इस तरफ नहीं आता था।

नदी के पास आ कर मैं जमुना को इधर उधर देखने लगा। सहसा दाएं तरफ से हल्की आवाज़ आई तो मैं उस तरफ बढ़ चला। कुछ ही पलों में एक पेड़ के पीछे खड़ी जमुना मुझे मिल गई। मुझे देख कर वो मुस्कुराई और फिर जाने क्या सोच कर शर्माने लगी। अब क्योंकि हम दोनों ही जानते थे कि हम यहां किस लिए आए थे तो देर करने का सवाल ही नहीं था। मैं तो वैसे भी देर नहीं करना चाहता था।

"तो शुरू करें सरकार?" मैंने उसके कंधों को पकड़ कर उससे कहा तो उसने मुस्कुराते हुए मेरी तरफ देखा और फिर कहा____"आप हमें ऐसी वैसी समझ रहे होंगे न?"

"उससे क्या फ़र्क पड़ता है?" मैंने उसकी आंखों में देखा।

"नहीं, फ़र्क पड़ता है जीजा जी।" जमुना ने धीमी आवाज़ में कहा____"हम सच में ऐसी वैसी नहीं हैं। पिछली बार जब आपको देखा था तो आप हमें बहुत अच्छे लगे थे। फिर जब आपके बारे में हमें पता चला तो सोचने लगे कि क्या सच में आप ऐसे होंगे? मन में आपको परखने की ख़्वाइश पैदा हो गई थी लेकिन फिर कुछ ऐसा हुआ कि हम बर्बाद ही हो गए।"

"क्या मतलब?" मैं उसकी आख़िरी बात सुन कर चौंका।

"कुछ महीने पहले हमारी बड़ी दीदी के घर वाले आए थे।" जमुना ने सिर झुकाते हुए कहा____"उन्होंने हमें अपने जाल में फांस लिया और फिर हमारे साथ वो सब कर डाला जो शादी के बाद मिया बीवी करते हैं। हम नादान और नासमझ थे। जीजा जी हमारे लिए नए नए कपड़े लाए थे जिससे हम बहुत खुश थे और उसी खुशी की वजह से हम समझ न पाए कि वो हमारे साथ क्या क्या करते जा रहे थे। उनके छूने से उस वक्त हमें अच्छा लग रहा था और फिर धीरे धीरे बात आगे तक बढ़ती चली गई। उन्होंने हमें एक लड़की से औरत बना दिया। दर्द में हम बहुत रोए थे मगर किसी से कह नहीं सकते थे क्योंकि उन्होंने हमें अच्छी तरह समझाया कि ऐसा करने से हमारी बदनामी तो होगी ही साथ ही कोई हमसे ब्याह भी नहीं करेगा। उसके बाद कुछ समय तक सब ठीक रहा लेकिन एक दिन जीजा जी के यहां से हमारा बुलावा आ गया। असल में दीदी को बच्चा होना था तो वो घर के कामों के लिए हमें भेज देने को बोले थे। राघव भैया हमें उनके यहां भेज आए। वहां जाने के बाद दूसरी रात ही वो हमारे पास आ गए और हमारे साथ वो सब करने लगे तो हमने उन्हें रोका मगर वो कहने लगे कि अगर हमने उन्हें वो सब नहीं करने दिया तो वो सबको बता देंगे। बस अपनी बदनामी के डर से हम भी मजबूर हो गए और उन्होंने उस रात हमारे साथ कई बार वो सब किया। उसके बाद तो जब तक हम दीदी के यहां रहे तब तक वो हमारे साथ वही सब करते रहे। दीदी के यहां से जब हम यहां अपने घर आए तो हमें जल्दी ही महसूस हुआ कि हमें उसकी ज़रूरत है। शायद हम इसके आदि हो गए थे। हमें समझ ना आया कि हम क्या करें? किसी तरह समय गुज़रा। फिर भैया का ब्याह हुआ और भौजी आ गई। हम जानते थे कि बंद कमरे में भैया और भौजी क्या करते हैं। उन्हें चुपके से देखते तो हमारे अंदर और भी वो सब करने की इच्छा बढ़ गई। एक दिन हमने देखा कि गांव का एक लड़का हमें ग़लत इशारे कर रहा था। हम समझ गए कि वो हमसे क्या चाहता है। हमें भी उसी की ज़रूरत थी इस लिए हमने भी उसे मुस्कुरा कर देखा। उसी शाम को यहीं पर उस लड़के से हम मिले और फिर हमारे बीच वो सब हुआ। अब तो आदत पड़ गई है जीजा जी लेकिन यकीन मानिए उस लड़के के अलावा हमने और किसी के साथ ऐसा नहीं किया।"

"छोड़ो इस बात को।" मैंने उसके चेहरे को हथेलियों में ले कर कहा____"जो कुछ तुम्हारे साथ हुआ उसमें तुम्हारी कोई ग़लती नहीं थी लेकिन हां ये ग़लती ज़रूर है कि तुम गांव के किसी लड़के के साथ ये सब करती हो। मान लो किसी दिन उस लड़के ने गांव में किसी और को ये सब बता दिया तो क्या होगा? गांव समाज के बीच तुम्हारी और तुम्हारे घर परिवार की इज्ज़त मिट्टी में मिल जाएगी। इस लिए बेहतर ये है कि फ़ौरन ही ब्याह कर लो। मैं कल ही तुम्हारे भाई राघव से इस बारे में बात करूंगा।"

जमुना मेरी आंखों में देख रही थी। मैंने झुक कर उसके होठों को चूमा और फिर उसके होठों को मुंह में भर कर मज़े से चूसने लगा। जमुना पूरा साथ दे रही थी। मैं चोली के ऊपर से ही उसके ठोस उभारों को मुट्ठी में ले कर मसलने लगा था जिससे उसके मुंह से सिसकारियां निकलने लगीं थी।

मैंने चोली के अंदर हाथ डाला और उसकी एक चूची को पकड़ कर थोड़ा ज़ोर से दबाया तो जमुना सिसकी लेते हुए मचल उठी। वो पूरे जोश में आ चुकी थी और मेरी पीठ पर अपने हाथ चला रही थी। कुछ देर उसके होठों को चूमने चूसने के बाद मैंने उसे घुमा दिया जिससे उसकी पीठ मेरी तरफ आ गई। मैंने जल्दी जल्दी उसकी चोली की डोरी को छोरा और फिर उसे उसके जिस्म से उतार दिया। जमुना अब ऊपर से पूरी तरह नंगी हो गई थी। मैंने पीछे से दोनों हाथ बढ़ा कर उसकी नंगी चूचियों को मुट्ठी में भर कर मसलना शुरू कर दिया। जमुना सिसकियां भरते हुए अपने चूतड़ों को मेरे लंड पर घिसने लगी जिससे मेरा शख़्त लंड और भी बुरी तरह से अकड़ गया।

मैंने जमुना को अपनी तरफ घुमाया और उसकी एक चूची को मुंह में भर लिया। जमुना के मुंह से आनन्द में डूबी सिसकी निकल गई। वो मेरे सिर को अपनी चूची पर दबाने लगी। मैंने अच्छी तरह बारी बारी से उसकी दोनों चूचियों को मुंह में ले कर चूसा और फिर एक हाथ सरका कर घाघरे में डाल दिया। जमुना ने कच्छी पहन रखी थी। उसकी योनि वाला हिस्सा बुरी तरह धधक रहा था। मैंने कच्छी के अंदर हाथ डाल कर उसकी योनि को छुआ तो मेरी उंगली में उसका कामरस लग गया। जमुना पूरी तरह गरम हो गई थी। मैंने बीच वाली उंगली को उसकी योनि के अंदर डाला तो जमुना ने अपनी टांगों को भींच लिया और साथ ही उसके मुख से सिसकी निकल गई। उसने झटके से अपना एक हाथ मेरे हाथ के ऊपर रख लिया और उसे दबाने लगी।

मेरे पास ज़्यादा समय नहीं था इस लिए मैंने फ़ौरन ही अपना पैंट खोला और कच्छे से अपने लंड को निकाल कर जमुना के हाथ में पकड़ा दिया। जमुना को जैसे ही मेरे लंड की लंबाई और मोटाई का अंदाज़ा हुआ तो उसे झटका लगा।

"य...ये तो बहुत बड़ा और मोटा है जीजा जी।" जमुना ने हकलाते हुए कहा____"आह! कितना गरम है ये। मेरी योनि को तो फाड़ ही देगा ये।"

मैं उसकी बात पर मुस्कुराया, उधर जमुना बड़े प्यार से मेरे लंड को सहलाने लगी थी। उसके कोमल हाथों के स्पर्श से मेरा लंड और भी झटके खाने लगा था। जमुना एकदम से नीचे उकड़ू हो कर बैठ गई और मेरे लंड को पकड़ कर अपने चेहरे को आगे कर उसे चूम लिया। मैंने आश्चर्य से उसकी तरफ देखा। मुझे उम्मीद नहीं थी कि वो ऐसा भी कर सकती है लेकिन फिर याद आया कि शायद उसके जीजा ने उससे ये सब करवाया होगा इस लिए उसे ये सब भी पता था। ख़ैर एक दो बार चूमने के बाद जमुना ने अपना मुंह खोला और मेरे लंड को मुंह में भर लिया। उसके गर्म मुख में मेरा लंड गया तो मेरे समूचे जिस्म में मज़े की लहर दौड़ गई। वो मेरे लंड के सुपाड़े को बड़े अच्छे तरीके से चूस रही थी। पलक झपकते ही मैं मज़े के सातवें आसमान में पहुंच गया।

मैंने जमुना को अपनी कच्छी उतारने को कहा तो उसने खड़े हो कर अपनी कच्छी उतारी। मैंने उसे घुमा दिया जिससे उसकी गांड मेरी तरफ हो गई। उसके बाद मैंने उसे पेड़ का सहारा ले कर झुक जाने को कहा तो वो झुक गई। मैंने उसके घाघरे को उसकी कमर तक चढ़ा कर एक हाथ से अपने लंड को उसकी कामरस बहा रही योनि में टिकाया और अपनी कमर को आगे की तरफ धकेल दिया।

"आह! जीजा जी।" लंड जैसे ही उसकी योनि में घुसा तो उसने आह भरी। मेरा लंड एक तिहाई ही उसकी योनि में घुसा था और फिर अगले ही पल मैंने ज़ोर का धक्का लगा दिया जिससे जमुना के मुख से हल्की दर्द भरी आह निकल गई। उसने पेड़ को दोनों हाथों से थाम लिया था।

जमुना की योनि पहले से ही चुदी हुई थी लेकिन इसके बावजूद मुझे थोड़ा कम खुली हुई महसूस हुई। मैंने जमुना की कमर को दोनों हाथों से पकड़ा और ज़ोर ज़ोर से धक्के लगाने लगा। जमुना मेरे धक्के लगाने से जल्दी ही गनगना गई। शान्त वातावरण में उसकी मादक सिसकारियां गूंजने लगीं थी। मुझे जमुना को इस तरह झुका कर चोदने में बहुत मज़ा आ रहा था।

"आह! जीजा जी और ज़ोर से चोदिए मुझे।" जमुना आहें भरते हुए बोली____"मैं झड़ने वाली हूं। हाय! कितना मज़ा आ रहा है मुझे। मैं आसमान में उड़ी जा रही हूं जीजा जी। कृपया सम्हालिए मुझे....आह...।"

जमुना झटके खाते हुए झड़ने लगी थी। उसका समूचा बदन कांपने लगा था। उसका गरम गरम कामरस जैसे ही मेरे लंड को भिगोया तो मेरे जिस्म में सनसनी फ़ैल गई। आनंद की लहर ने फ़ौरन ही मुझे चरम पर पहुंचा दिया और इससे पहले कि मैं जमुना की योनि में झड़ जाता मैंने फ़ौरन ही अपने लंड को उसकी योनि से निकाल लिया। उधर जमुना जल्दी से पलटी और बैठ कर मेरे लंड को पकड़ लिया। मेरा लंड उसके कामरस में नहाया हुआ था जिसे जल्दी ही उसने अपने मुंह में भर कर चूसना चाटना शुरू कर दिया। मैंने जमुना के सिर को पकड़ा और उसके मुंह को ही योनि समझ कर धक्के लगाते हुए चोदने लगा। जमुना मेरे इस कार्य से थोड़ा हड़बड़ाई मगर उसने लंड को अपने मुंह से नहीं निकाला। जल्दी ही उसकी चुसाई से मेरा जिस्म झटके खाने लगा और मेरे लंड से वीर्य की धार उसके मुंह में ही छूटने लगी। वीर्य की अंतिम बूंद निकल जाने के बाद ही मैंने जमुना के सिर को छोड़ा और फिर शांत सा पड़ गया। उधर जमुना मेरे वीर्य को मजबूरी में पी जाने के बाद खांसने लगी थी।

"आपने तो जान ही निकाल दी मेरी।" जमुना ने अपनी उखड़ी हुई सांसों को काबू करते हुए कहा____"एक पल को ऐसा लगा जैसे अब तो मर ही गई मैं।"

"क्या करें सरकार?" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"आपने चुसाई ही इस तरीके से की कि मैं होश खो बैठा था।"

"सही सुना था आपके बारे में।" जमुना ने कहा____"आप तो सच में कमाल के हैं जीजा जी। मन करता है एक बार और आपसे चुदवा लूं लेकिन घर जाना भी ज़रूरी है। अगर देर हो गई तो आफ़त हो जाएगी।"

हम दोनों ने जल्दी जल्दी अपने बचे हुए कपड़े पहने। जमुना को एक बार और चोदने का मन था मेरा लेकिन उसका घर जाना ज़रूरी था इस लिए उसकी चूचियों को जी भर के मसलने के बाद मैंने उसे जाने दिया। उसके जाने के कुछ देर बाद मैं भी घर की तरफ चल पड़ा। आज काफ़ी समय बाद किसी लड़की को पेलने का मौका मिला था। जमुना को चोदने के बाद मैं काफी खुश था।



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Readers ka aisa thanda response dekh kar bilkul bhi man nahi karta likhne ka....sorry dosto...bekaar me mehnat karne ka koi faayda nahi. Apna yahi keemti wakt agar main apne job par lagaau to shayad meri personal problems solve ho jayengi...

Main ye story yahi par close kar raha hu aur story thread ko close kar ke private kar raha hu. Kabhi time mila to saare update likh kar ek sath post kar duga...Good bye... :ciao:
 
अध्याय - 57

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अब तक....



"सही सुना था आपके बारे में।" जमुना ने कहा____"आप तो सच में कमाल के हैं जीजा जी। मन करता है एक बार और आपसे चुदवा लूं लेकिन घर जाना भी ज़रूरी है। अगर देर हो गई तो आफ़त हो जाएगी।"




हम दोनों ने जल्दी जल्दी अपने बचे हुए कपड़े पहने। जमुना को एक बार और चोदने का मन था मेरा लेकिन उसका घर जाना ज़रूरी था इस लिए उसकी चूचियों को जी भर के मसलने के बाद मैंने उसे जाने दिया। उसके जाने के कुछ देर बाद मैं भी घर की तरफ चल पड़ा। आज काफ़ी समय बाद किसी लड़की को पेलने का मौका मिला था। जमुना को चोदने के बाद मैं काफी खुश था।



अब आगे....



शाम का अंधेरा फ़ैल चुका था। मणि शंकर की बेटी रूपा अपने पुराने आमों के बाग़ में नित्य क्रिया करने के लिए आई हुई थी। बाग़ से क़रीब दो सौ मीटर की दूरी पर ही उसका घर था। बाग़ के किनारे ही वो बैठ गई थी क्योंकि अंदर घने पेड़ों की वजह से अंधेरा ज़्यादा था और उसे अंदर जाने में डर भी लग रहा था। आम तौर पर वो अपनी बाकी बहनों के साथ ही आती थी लेकिन आज उसे कई बार यहां आना पड़ा था और इसकी वजह ये थी कि उसका पेट ख़राब था। उसके एक तरफ खाली खेत थे जिसके पार उसका घर चांद की हल्की रोशनी में नज़र आ रहा था। वो बैठी ही हुई थी कि सहसा उसे कुछ आवाज़ें सुनाई देने लगीं जिससे रूपा की धड़कनें तेज़ हो गईं। उसके अंदर ये सोच कर घबराहट भर गई कि कौन हो सकता है? आवाज़ें लगातार आने लगीं थी। ऐसा लगता था जैसे एक से ज़्यादा लोग ज़मीन पर चल रहे हों। बाग़ की ज़मीन पर क्योंकि पेड़ों के सूखे पत्ते पड़े हुए थे इस लिए चलने से आवाज़ हो रही थी। रूपा ने महसूस किया कि चलने की आवाज़ें उससे थोड़ी ही दूरी पर अचानक से बंद हो गईं हैं।

रूपा जो नित्य क्रिया करने के लिए बैठी हुई थी उसका डर के मारे सब कुछ अपनी जगह पर रुक गया। आवाज़ों से साफ़ था कि कई लोग थे इस लिए रूपा को समझ ना आया कि इस वक्त कौन आया होगा यहां? उसने बड़ी सावधानी से पानी के द्वारा शौच किया और अपनी कच्छी को ऊपर सरका कर कुर्ते को नीचे कर लिया। सलवार उसने पहना ही नहीं था, कदाचित इस लिए कि अंधेरे में कौन देखेगा और वैसे भी उसे हगने के लिए अपने बाग़ में ही तो आना था।

खाली हो गए लोटे को उसने उठाया और दबे पांव उस तरफ़ बढ़ी जिस तरफ से आवाज़ें आनी बंद हो गईं थी। उसे डर भी लग रहा था लेकिन उत्सुकतावश वो बड़ी सावधानी से उस तरफ़ बढ़ती ही चली गई। इस बात का उसने ख़ास ख़्याल रखा कि सूखे पत्तों पर पांव रखने से ज़्यादा तेज़ आवाज़ न होने पाए। अभी वो क़रीब पांच सात क़दम ही आगे गई थी कि सहसा उसके कानों में किसी की आवाज़ सुनाई दी। रूपा एक दो क़दम और आगे बढ़ी और एक पेड़ के पीछे छिप गई। पेड़ की ओट से उसने देखा कि उससे क़रीब आठ दस क़दम की दूरी पर अंधेरे में तीन इंसानी साए खड़े थे। तीनों एक दूसरे से दूरी बना कर खड़े हुए थे किंतु तीनों का ही मुंह एक दूसरे की तरफ था। रूपा को समझ ना आया कि वो तीनों कौन हैं और उसके आमों के बाग़ में क्या करने आए हैं?

"मामला हद से ज़्यादा बिगड़ गया है।" उन तीनों में से एक की आवाज़ रूपा के कानों तक पहुंची____"जो सोचा था वो नहीं हुआ बल्कि सब कुछ उल्टा पुल्टा हो गया है।"

पेड़ के पीछे छुपी रूपा एकदम से चौंकी। उसके दिल की धड़कनें एकदम ज़ोरों से चलने लगीं थी। उसे अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ, इस लिए उसने फिर से अपने कान खड़े कर आवाज़ को सुनने की कोशिश करने लगी।

"अगर यही हाल रहा तो वो दिन दूर नहीं जब हम सबका भेद खुल जाएगा।" एक दूसरे साए की आवाज़ रूपा के कानों में पड़ी____"और हमारी गर्दनें दादा ठाकुर की मुट्ठी में क़ैद हो जाएंगी।"

"मेरा ख़्याल ये है कि अब हमें खुल कर अपने काम को अंजाम देना चाहिए।" तीसरे साए की आवाज़____"और कुछ ऐसा करना चाहिए जिससे हवेली में रहने वालों का कलेजा दहल जाए।"

"मेरे एक आदमी ने बताया कि दादा ठाकुर ने अपने बेटे वैभव को अपनी बहू के साथ उसके मायके भेज दिया है।" पहले साए की आवाज़____"ये हमारे लिए एक सुनहरा अवसर है दादा ठाकुर के उस सपूत को अपने रास्ते से हटाने का और दादा ठाकुर की कमर को तोड़ देने का भी।"

"ये तो एकदम सही कहा आपने।" तीसरे साए की आवाज़ में खुशी झलक रही थी, बोला____"चंदनपुर में जा कर बड़ी आसानी से उस पर प्राण घातक हमला किया जा सकता है। अगर हमने सच में उस हरामजादे को ख़त्म कर दिया तो समझो दादा ठाकुर गहरे सदमे में चला जाएगा और ये भी सच ही जानिए कि अपने बेटे के मौत के ग़म में वो बुरी तरह से टूट जाएगा। उस सूरत में उसको बर्बाद करना और हवेली को नेस्तनाबूत करना बेहद आसान हो जाएगा।"

"बात तो ठीक है तुम्हारी।" पहले साए की भारी आवाज़____"लेकिन ये मत भूलो कि उस हवेली में जगताप भी है जो दादा ठाकुर से कहीं ज़्यादा ख़तरनाक है। उसके दोनों बेटे तो नकारा और निकम्मे ही हैं लेकिन सुना है कि वैभव का बड़ा भाई भी आज कल अपने छोटे भाई के नक्शे क़दम पर चलने लगा है। कमबख़्त तंत्र मंत्र के प्रभाव से जल्दी मर जाता तो आज कहानी ही अलग होती।"

"जो नहीं हो पाया उसके बारे में हम क्या ही कर सकते हैं।" दूसरे साए ने कहा____"दादा ठाकुर के मन में जगताप के लिए जो शक के बीज हमने डाले थे उसका भी कुछ ख़ास असर नहीं हुआ। लगता है दादा ठाकुर को कुछ ज़्यादा ही अपने भाई पर भरोसा है।"

"किसी पर अगर एक बार शक हो जाए।" पहले वाले साए ने कहा____"तो वो धीरे धीरे भरोसे की जड़ों को खोखला करना शुरू कर देता है। दादा ठाकुर को भले ही अपने भाई पर लाख भरोसा होगा लेकिन मौजूदा समय में जो हालात हैं उससे कहीं न कहीं उसके मन में अपने भाई के बारे में शक तो हो ही गया होगा। अब देखना ये है कि इसका कब और क्या असर दिखता है?"

"हमारे पास इंतज़ार करने का ही तो समय नहीं है।" दूसरे साए ने कहा____"अब तक की अपनी नाकामियों के बाद अब हमें कोई ऐसा क़दम उठाना होगा जिससे हमारे दुश्मन का कलेजा दहल जाए। मैं उसके उस सपोले को अब और ज़्यादा दिनों तक ज़िंदा नहीं देखना चाहता।"

"फ़िक्र मत करो।" पहले साए ने कहा____"अगर हम यहां कामयाब नहीं हुए तो चंदनपुर में उसके उस सपोले को ख़त्म करने में ज़रूर कामयाब होंगे। कल ही मैं अपने कुछ आदमियों को उसका खात्मा करने के लिए चंदनपुर भेजूंगा।"

"मैं भी आपके आदमियों के साथ जाऊंगा।" तीसरे साए ने कहा____"मैं उस हरामजादे को अपने हाथों बद से बदतर मौत देना चाहता हूं। तभी मेरे कलेजे को ठंडक मिलेगी।"

"नहीं, तुम वहां नहीं जाओगे।" पहले साए ने सख़्ती से कहा____"वो बहुत ख़तरनाक लड़का है। अगर ज़रा भी बात बिगड़ गई तो अंजाम अच्छा नहीं हो सकता। इस लिए तुम यहीं रहोगे और उसके बदले दादा ठाकुर के बड़े लड़के का शिकार करोगे। मुझे पूरी उम्मीद है कि उसे तुम बड़ी आसानी से काबू में कर लोगे और उसका राम नाम भी सत्य कर दोगे।"

"ये इतना आसान नहीं है।" दूसरे साए ने कहा____"दादा ठाकुर ने आज कल अपने परिवार के हर सदस्य पर शख़्त निगरानी और पहरा लगा दिया है। जिस दिन गांव वाले रेखा और शीला की मौत का इंसाफ़ मांगने हवेली गए थे और जो कुछ दादा ठाकुर से कहा था उससे दादा ठाकुर तो शान्त है लेकिन उसका भाई जगताप बुरी तरह खार खाया हुआ है। इस लिए मेरी सलाह यही है कि यहां पर अभी किसी पर भी हाथ डालना सही नहीं होगा लेकिन हां चंदनपुर जा कर वैभव को ख़त्म करने का विचार ज़्यादा बेहतर है।"

वैभव को ख़त्म करने वाली बातें सुन कर रूपा का दिमाग़ मानों सुन्न सा पड़ गया था। दिलो दिमाग़ में आंधियां सी चलने लगीं थी। उसके बाद उसे कुछ भी सुनने का होश नहीं रह गया था। उसे पता ही नहीं चला कि कब वो तीनों साए वहां से चले गए। किसी पक्षी की आवाज़ से उसे होश आया तो वो चौंकी और हड़बड़ा कर उसने उस तरफ देखा जहां वो तीनों साए खड़े थे किंतु अब वहां किसी को न देख वो एकदम से घबरा गई। चारो तरफ अंधेरे में उसने निगाह घुमाई मगर कहीं कोई नज़र न आया। बाग़ में हर तरफ सन्नाटा फ़ैला हुआ था।

रूपा पलट कर वहां से दबे पांव चल पड़ी। खेतों में बनी पगडंडी पर आ कर वो तेज़ क़दमों से अपने घर की तरफ बढ़ चली थी। पहले वाले साए की आवाज़ अभी भी उसके कानों में गूंज रही थी। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि ऐसा भी कुछ हो सकता है। उसके दिल में जहां एक तरफ हल्का दर्द सा जाग उठा था वहीं दूसरी तरफ ज़हन में एक द्वंद सा भी छिड़ गया था।



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धनंजय नाम का दरोगा अपने कमरे में रखी चारपाई पर बैठा गहरी सोच में डूबा हुआ था। उसे ये सोच कर पछतावा हो रहा था कि उसने दादा ठाकुर को अपनी मां के अपहरण हो जाने की बात बता दी थी जोकि उसे किसी भी कीमत पर नहीं बताना चाहिए था। ऐसे में अगर उस सफ़ेदपोश ने गुस्से में आ कर उसकी मां के साथ बुरा कर दिया तो वो खुद को कभी माफ़ नहीं कर पाएगा। धनंजय को समझ नहीं आ रहा था कि अब वो क्या करे? अभी वो ये सब सोच ही रहा था कि तभी बाहर हुई अजीब सी आवाज़ और आहट से वो चौंका। ज़हन में बिजली की तरह ख़्याल उभरा कि क्या सफ़ेदपोश आया होगा? ये सोच कर वो फ़ौरन ही चारपाई से उठा और तेज़ी से दरवाज़े की तरफ बढ़ा।

दरवाज़ा खोल कर उसने बाहर देखा। बाहर अंधेरा था किंतु चांद की हल्की रोशनी भी थी जिससे धुंधला धुंधला दिख रहा था। धनंजय ने इधर उधर नज़र घुमाई और फिर एकदम से उसकी निगाह एक जगह पर ठहर गई। बाएं तरफ कुछ ही दूरी पर उसे कुछ पड़ा हुआ नज़र आया। एक अंजानी आशंका से धनंजय की धड़कनें तेज़ हो गईं। वो फ़ौरन ही उस तरफ बढ़ा। कुछ पलों में जब वो उस पड़ी हुई चीज़ के पास पहुंचा तो देखा कोई औरत औंधे मुंह ज़मीन पर पड़ी हुई थी।

धनंजय के आशंकित ज़हन में बिजली की तरह सवाल उभरा कहीं ये उसकी मां तो नहीं? उसने झट से उस औरत को पलटा और जैसे ही नज़र औरत के चेहरे पर पड़ी तो उसके सिर पर एक झटके में आसमान गिर पड़ा। वो उसकी मां ही थी। धनंजय एकदम पागलों की तरह अपनी मां को हिलाते डुलाते हुए आवाज़ लगाने लगा लेकिन उसकी मां के द्वारा उसे कोई प्रतिक्रिया होती महसूस नहीं हुई। उसने जल्दी से नब्ज़ टटोली और अगले कुछ ही पलों में उसे ये जान कर ज़बरदस्त झटका लगा कि उसकी मां की नब्ज़ का कहीं पता नहीं है। दरोगा एकदम से बौखला गया, वो कभी अपनी मां की नब्ज़ को टटोलता तो कभी उसकी धड़कनें सुनने की कोशिश करता। जल्द ही उसे पता चल गया कि उसकी मां अब इस दुनिया में नहीं है। धनंजय का जी चाहा कि वो पूरी शक्ति से दहाड़ें मार कर रोना शुरू कर दे। आंखों से आंसुओं की धारा बहने लगी। अपनी मां के बेजान जिस्म से लिपट कर वो फूट फूट कर रो पड़ा।

जाने कितनी ही देर तक धनंजय अपनी मां को सीने से लगाए रोता रहा और उससे कहता रहा कि वो उसे छोड़ कर न जाए लेकिन दुनिया से जाने वाला भला कहां उसे कोई जवाब देता? दिलो दिमाग़ में आंधियां चल रहीं थी। तभी एक तरफ उसे किसी चीज़ की आहट सुनाई दी तो उसने गर्दन घुमा कर उस तरफ देखा। उसके मकान के पास ही अंधेरे में सफ़ेदपोश खड़ा था। धनंजय उसे देख कर पहले तो हड़बड़ाया किंतु अगले ही पल गुस्से से आग बबूला हो गया। अपनी मां को ज़मीन पर लेटा कर वो एक झटके से खड़ा हुआ और फिर किसी आंधी तूफ़ान की तरह उस सफ़ेदपोश की तरफ लपका। सफ़ेदपोश को शायद उससे ऐसे किसी कृत्य की उम्मीद नहीं थी इस लिए इससे पहले कि वो सम्हल पाता धनंजय उस पर जंप लगा कर उसे लिए ज़मीन पर गिरा। सफ़ेदपोश के सीने में सवार हो कर उसने दोनों हाथों से उसकी गर्दन को दबोच लिया।

"हरामजादे तूने मेरी मां को जान से ही मार डाला।" धनंजय गुस्से में मानों चीखते हुए बोला____"अब मैं तुझे भी जान से मार दूंगा।"

सफ़ेदपोश बुरी तरह छटपटाते हुए उससे अपनी गर्दन छुड़ाने का प्रयास कर रहा था लेकिन धनंजय की पकड़ इतनी मजबूत थी कि वो उसके हाथों को हिला भी नहीं पा रहा था। प्रतिपल उसकी सांसें लुप्त होती जा रहीं थी। सफ़ेद नक़ाब में छुपा उसका चेहरा पसीने से तरबतर हो गया था। नक़ाब से झांकती उसकी आंखें बाहर को निकली आ रहीं थी।

"आज मैं तुझे ज़िंदा नहीं छोडूंगा कमीने।" धनंजय गुस्से में पगलाया हुआ गुर्राया____"तूने मेरी मां की जान ले कर अच्छा नहीं किया है। तुझे इसका हिसाब अपनी जान दे कर ही चुकाना होगा। बहुत खेल खेल रहा था न तू, अब तेरा किस्सा ही ख़त्म कर दूंगा मैं।"

दरोगा प्रतिपल अपना दबाव उसकी गर्दन पर बढ़ाता जा रहा था और उधर सफ़ेदपोश को सांस लेने में मुश्किल होने लगी थी। उसका दम घुटने लगा था, जिसकी वजह से वो बुरी तरह अपने हाथ पांव पटक रहा था। तभी सहसा चमत्कार हुआ। वातावरण में दरोगा की घुटी घुटी सी चीख गूंजी और उसका जिस्म हवा में लहराते हुए दूर जा कर गिरा। वो जल्दी ही सम्हल कर उठा तो देखा नीम अंधेरे में उसे काला नकाबपोश नज़र आया। वो समझ गया कि उसी ने अपने पांव की ठोकर से उसे दूर उछाला था। सफ़ेदपोश अब तक खड़ा हो चुका था और बुरी तरह खांस रहा था।

काले नकाबपोश को देख कर धनंजय का गुस्सा और भी बढ़ गया। वो तेज़ी से उसकी तरफ बढ़ा किंतु जल्दी ही उसे ठिठक जाना पड़ा क्योंकि काले नकाबपोश के हाथ में एकदम से उसे लट्ठ नज़र आ गया था। लट्ठ को देख कर धनंजय कुछ पलों के लिए ही रुका था लेकिन अगले ही पल वो फिर से उसकी तरफ तेज़ क़दमों से बढ़ चला।

"अगर अपनी बहन को भी अपनी मां की तरह बेजान लाश के रूप में देखना चाहता है तो बेशक आ कर मुझसे मुकाबला कर।" काले नकाबपोश ने शख़्त भाव से कहा तो दरोगा एकदम से अपनी जगह पर रुक गया।

"अगर मेरी बहन को तुम दोनों ने हाथ भी लगाया तो ये तुम दोनों के लिए अच्छा नहीं होगा।" धनंजय ने गुस्से से गुर्राते हुए कहा____"अगर असली मर्द की औलाद है तो मर्द की तरह अपने दम पर मुझसे मुकाबला कर।"

"अच्छा ऐसा है क्या?" काले नकाबपोश ने इस बार अजीब भाव से कहा____"लगता है दो दो हाथ करने के लिए कुछ ज़्यादा ही मरे जा रहे हो तुम।" काले नकाबपोश ने कहने के साथ ही सहसा सफेदपोश की तरफ देखा____"आपका हुकुम हो तो इसकी ख़्वाइश पूरी कर दूं?"

सफ़ेदपोश ने उसे सिर हिला कर इजाज़त दे दी। इजाज़त मिलते ही काले नकाबपोश ने लट्ठ को एक तरफ रखा और फिर दरोगा को मुकाबला करने का इशारा किया। दरोगा उसका इशारा पा कर गुस्से में तिलमिला उठा। वो तेज़ी से उसकी तरफ बढ़ा। इससे पहले कि वो उस नकाबपोश पर कोई प्रहार कर पाता काले नकाबपोश ने झुक कर उसे दोनों हाथों से सिर से ऊपर तक उठा लिया और कच्ची ज़मीन पर पूरी ताक़त से पटक दिया। वातावरण में दरोगा की दर्द में डूबी चीख गूंज उठी। ज़मीन पर शायद छोटे छोटे कुछ पत्थर पड़े हुए थे जो उसके गिरते ही उसकी पीठ पर गड़ गए थे और उसे भारी दर्द हुआ था। वो दर्द को बर्दास्त करते हुए जल्दी ही उठा लेकिन तभी उसकी पीठ पर काले नकाबपोश की लात का ज़ोरदार प्रहार हुआ जिसके चलते वो एक बार फिर से ज़मीन की धूल को चाटता नज़र आया।

उसके बाद तो दरोगा को सम्हलने तक का मौका न मिला। काला नकाबपोश लात घूंसों से उसको मारता ही चला गया और फिज़ा में दरोगा की दर्द में डूबी चीखें ही गूंजती रही। उसकी नाक और मुंह से खून निकलने लगा था। पूरा जिस्म पके हुए फोड़े की तरह दर्द करने लगा था। उसमें अब कुछ भी करने की हिम्मत न रह गई थी।

"रुक जाओ।" सहसा सफ़ेदपोश की अजीब सी आवाज़ गूंजी____"इतना काफ़ी है इसे ये समझने के लिए कि तुम असली मर्द ही हो जो अपने दम पर इससे बखूबी मुकाबला कर सकता है।"

सफ़ेदपोश के कहने पर काला नकाबपोश रुक गया। सफ़ेदपोश चल कर दरोगा के पास आया। दरोगा ज़मीन में पड़ा हुआ था इस लिए वो उसके समीप ही ज़मीन पर उकडू हो कर बैठा और फिर अपनी अजीब सी आवाज़ में बोला____"अपनी मां की मौत के तुम खुद ज़िम्मेदार हो दरोगा। हमने तुम्हें दादा ठाकुर से सच बताने से मना किया था लेकिन फिर भी तुमने उसे सब कुछ बता दिया। इसका अंजाम तो तुम्हें अपनी मां की मौत के रूप में भुगतना ही था। ख़ैर, अब अगर तुम चाहते हो कि तुम्हारी बहन सही सलामत रहे तो यहां से गधे के सींग की तरह गायब हो जाओ।"

सफ़ेदपोश की ये बात सुन कर दरोगा कुछ न बोला। दर्द को सहते हुए वो बस गहरी गहरी सांसें ले रहा था। इधर सफ़ेदपोश कुछ पलों तक उसे देखता रहा और फिर बोला_____"अगर दादा ठाकुर दुबारा तुमसे मिलने आए तो उससे यही कहना कि तुम्हारी मां तुम्हें सही सलामत मिल गई है और अब तुम यहां से इस मामले से खुद को अलग कर के जा रहे हो। अपनी मां की लाश को या तो कहीं दफना दो या फिर रातों रात इसे ले कर शहर चले जाओ और वहीं उसका अंतिम संस्कार कर देना। अगर हमें पता चला कि इसके बावजूद तुम इस मामले में दिलचस्पी ले रहे हो तो इसके अंजाम में जो होगा उसके ज़िम्मेदार तुम खुद ही होगे।"

सफ़ेदपोश इतना कहने बाद उठा और काले नकाबपोश को कुछ इशारा कर एक तरफ को बढ़ गया। जल्दी ही वो दोनों नीम अंधेरे में कहीं गायब हो गए। ज़मीन पर पड़ा दरोगा कुछ देर तक इस सबके बारे में सोचता रहा और फिर किसी तरह उठ कर अपनी मां की लाश के पास आया। मां की बेजान लाश को देख कर सहसा उसकी आंखें फिर से छलक पड़ीं। उसने फिर से मां को अपने सीने से लगा लिया और फूट फूट कर रोने लगा।



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शेरा काफी देर से सफ़ेदपोश और काले नकाबपोश का पीछा कर रह था। इस वक्त वो सादे कपड़ों में तो था लेकिन उसके कपड़े ऐसे बिलकुल भी नहीं थे कि रात के हल्के अंधेरे में आसानी से किसी की नज़र उस पर पड़ जाए। हथियार के नाम पर उसके हाथ में एक बड़ा सा लट्ठ था। धनंजय दरोगा के मकान के बाहर जो कुछ हुआ था उसे उसने अपनी आंखों से देखा था। उसके बाद जब दोनों नकाबपोश वहां से चल दिए तो वो भी उनके पीछे लग गया था। पीछा करते हुए वो दादा ठाकुर के बाग़ में आ गया था। बाग में घने पेड़ पौधे थे जिसकी वजह से वहां पर अंधेरा ज़्यादा था। फिर भी वो एक निश्चित फांसला बना कर उन दोनों के पीछे लगा हुआ था। सहसा उसने देखा दोनों नकाबपोश अलग अलग दिशा में मुड़ कर चल दिए।

शेरा को समझ ना आया कि सबसे पहले वो किसके पीछे जाए। वो जानता था कि सफ़ेदपोश इसके पहले भी एक बार उसकी आंखों के सामने से गायब हो चुका था और यही हाल काले नकाबपोश का भी हुआ था। नकाबपोश का उसने दो तीन बार पीछा किया था लेकिन पता नहीं कैसे वो उसे चकमा दे जाता था या फिर उसकी आंखों से ओझल हो जाता था?

शेरा ने फ़ौरन ही फ़ैसला किया और सफ़ेदपोश के पीछे लग गया। आज वो हर हाल में उसे पकड़ लेना चाहता था। उसने देखा था कि दरोगा ने बड़ी आसानी से उसे दबोच लिया था। ज़ाहिर था कि सफ़ेदपोश कोई ऐसा आदमी था जो काले नकाबपोश से कम ताक़तवर और लड़ने के दांव पेंच जानता था। शेरा ने देखा सफ़ेदपोश बाग़ के अंदर की तरफ तेज़ी से बढ़ा चला जा रहा था। कभी कभी वो किसी न किसी पेड़ की ओट में हो जाता था जिसकी वजह से वो उसे दिखाई देना बंद हो जाता था। सहसा वो शेरा की आंखों से ओझल हो गया।

शेरा ने साफ़ देखा था कि वो एक पेड़ की ओट में हुआ था और फिर उसके बाद वो उसे दुबारा नज़र नहीं आया। शेरा एकदम से बौखला गया और तेज़ी से आगे बढ़ते हुए उस पेड़ के पास पहुंचा लेकिन सफ़ेदपोश उसे दूर दूर तक कहीं नज़र न आया। शेरा को बड़ी हैरानी हुई कि आख़िर वो अचानक से गायब कैसे हो गया? क्या वो कोई जादू जानता था या फिर वो कोई भूत था जो एकदम से गायब हो गया? शेरा ने काफी देर तक आस पास का मुआयना किया लेकिन सफ़ेदपोश की कहीं झलक तक न मिली उसे। हताश हो कर वो वापस उस दिशा की तरफ तेज़ी से बढ़ चला जिधर काला नकाबपोश गया था।

कुछ ही देर में शेरा बाग़ से निकल कर उस जगह पर आ गया जहां दादा ठाकुर का बाग़ वाला मकान बना हुआ था। शेरा के ज़हन में ख़्याल उभरा कि क्या काला नकाबपोश इस मकान में आया होगा? क्या वो रात के अंधेरे में इस मकान में ही छुपता होगा? उसे याद आया कि पिछली बार उससे यहीं पर उसका सामना हुआ था और फिर अचानक से वो बाग़ की तरफ भाग गया था। उसके बाद कुछ ही देर में उसे बाग़ के अंदर किसी नारी की चीख सुनाई दी थी। जब उसने वहां जा कर देखा था तो वैभव किसी औरत के पास बैठा था। शीला नाम की औरत को उस काले नकाबपोश ने गला रेत कर मार डाला था।

शेरा ने ये सब सोच कर पूरी सतर्कता से मकान की छानबीन करने का सोचा। पहले उसने मकान के चारो तरफ का अच्छे से मुआयना किया, उसके बाद वो मकान के मुख्य दरवाज़े पर आया तो देखा दरवाज़े की कुंडी खुली हुई थी। शेरा समझ गया कि काला नकाबपोश अंदर ही गया होगा। उसने बड़ी सावधानी से दरवाज़े को अंदर की तरफ धकेला। दरवाज़ा आधा खोल कर उसने अंदर देखा, अंदर सियाह अंधेरा था।

शेरा अंदर दाखिल हुआ और ख़ामोशी से बारीक से बारीक आहट या आवाज़ को सुनने की कोशिश करने लगा मगर काफी देर की कोशिश में भी उसे कोई आहट अथवा आवाज़ सुनाई नहीं दी। उसने पलट कर दरवाज़ा बंद किया और फिर अपने काले कुर्ते की जेब से माचिस निकाल कर उसे जलाया। माचिस की तीली जैसे ही जली तो हर तरफ रोशनी फेल गई। उस रोशनी में उसे आस पास कोई नज़र ना आया। हाथ में जलती तीली लिए वो आगे बढ़ा और एक कमरे के पास पहुंचा। तीली जल कर बुझने लगी तो उसने फ़ौरन ही उसे फेंक कर दूसरी तीली जलाई और कमरे का दरवाज़ा खोल कर अंदर देखा। कमरे में कुछ समान के अलावा कुछ न दिखा उसे। उसने कई तीलियां जला जला कर सभी कमरों में देखा मगर उसे काला नकाबपोश कहीं नज़र ना आया। उसे समझ ना आया कि अगर नकाबपोश यहां नहीं आया तो गया कहां?

शेरा मकान से बाहर आ कर सोचने लगा कि अब वो उस काले नकाबपोश को कहां खोजे? सहसा उसे कुछ याद आया तो वो मकान के पीछे की तरफ बढ़ चला। जल्दी ही वो मकान के पिछले हिस्से में पहुंच गया। मकान के पिछले हिस्से में ट्रैक्टर की एक पुरानी और टूटी हुई ट्रॉली खड़ी हुई थी जिसके दोनों पहिए ज़मीन पर क़रीब आधा फुट धंसे हुए थे। ट्राली खस्ता हालत में थी और उसका उपयोग कई सालों से नहीं हुआ था। उसकी ऊपर की दीवारें जंग लगने से कुछ टूटी हुई भी थीं। शेरा ने धड़कते दिल से ट्राली में देखने का सोच कर अपने हाथ को ट्राली की दीवार पर रखा और अपना एक पैर ट्राली के पहिए पर रख कर उस पर चढ़ कर खड़ा हो गया।

अभी वो ट्राली के अंदर देखने ही वाला था कि अचानक उसके जबड़े पर किसी का ज़बरदस्त घूंसा पड़ा जिससे दर्द से चीखते हुए वो नीचे कच्ची ज़मीन पर जा गिरा। पीठ के बल गिरने से उसे दर्द तो हुआ लेकिन वो फ़ौरन ही उठा। तभी ट्राली से उसके पास ही कोई कूद कर आया। उसने फ़ौरन ही पास पड़े अपने लट्ठ को उठाया और नज़र उठा कर देखा। उससे क़रीब चार क़दम की दूरी पर काला नकाबपोश हाथ में लट्ठ लिए खड़ा था।

"कौन हो तुम?" काला नकाबपोश गुर्राया____"और यहां मरने के लिए क्यों आए हो?"

"कमाल है दोस्त।" शेरा ने मुस्कुरा कर कहा____"अपनी बिरादरी वाले को ही नहीं पहचान पाए तुम?"

"क्या मतलब??" काला नकाबपोश उसकी बात सुन कर चौंका।

"तुम्हारी तरह इस वक्त अगर मैं भी काले नक़ाब में होता।" शेरा ने कहा____"तो शायद तुम्हें मुझको पहचानने में देर न लगती।"

"अच्छा तो तुम वही हो?" काला नकाबपोश हैरानी भरे भाव से बोला____"जिससे मेरा पहले कई बार आमना सामना हो चुका है।"

"हां, और हर बार तुम मुझे अपनी पीठ दिखा कर भाग खड़े हुए हो।" शेरा ने मुस्कुराते हुए कहा____"ऐसा शायद इस लिए कि तुम मेरा सामना कर पाने में खुद को कमज़ोर समझते हो।"

"बहुत बड़ी ग़लतफहमी के शिकार हो तुम।" काले नकाबपोश ने शख़्त भाव से उसे घूरते हुए कहा____"जो ये समझते हो कि मैं तुम्हारा सामना करने से कतराता हूं और तुम्हें पीठ दिखा कर भाग जाता हूं।"

"तो फिर देर किस बात की दोस्त?" शेरा ने गहरी मुस्कान के साथ कहा____"अगर सच में तुम मेरा सामना करने की कूवत रखते हो तो इस बार तरीके से मुकाबला हो ही जाए। शायद मुझे भी पता चल जाए कि तुम्हारे बारे में मेरे ख़्याल सही हैं या फिर मेरा ऐसा सोचना महज एक भ्रम है।"

नीम अंधेरे में काले नकाबपोश के होठों पर मुस्कान उभर आई, बोला____"अगर तुम्हें मरने का कुछ ज़्यादा ही शौक चढ़ गया है तो आज तुम्हें विधाता भी मुझसे नहीं बचा सकेगा। अभी तक तो मैं तुम्हें इस लिए छोड़ कर चला जाता था क्योंकि मेरा मकसद तुम्हें मारना नहीं बल्कि कुछ और ही होता था।"

कहने के साथ ही काला नकाबपोश हमला करने के लिए तैयार होता नज़र आया। शेरा उससे कई बार मुकाबला कर चुका था इस लिए उसे अच्छी तरह पता था कि वो किसी भी मामले में उससे कमज़ोर नहीं है। जल्दी ही दोनों आमने सामने लट्ठ लिए भिड़ने को तैयार हो गए।

काले नकाबपोश ने लट्ठ को तेज़ी से घुमा कर शेरा पर वार किया किंतु शेरा पहले से ही उसके किसी भी हमले के लिए तैयार था इस लिए फौरन ही लट्ठ से उसके वार को रोका और उसी पल उसने अपनी दाहिनी लात चला दी। लात का ज़बरदस्त प्रहार काले नकाबपोश के पेट में लगा जिससे उसके हलक से हिचकी सी निकली और वो दर्द से झुक गया। उधर वो जैसे ही झुका शेरा ने लट्ठ का वार उसकी पीठ पर किया। प्रहार तेज़ था जिसके चलते काला नकाबपोश चीखते हुए भरभरा कर मुंह के बल ज़मीन पर गिरा। इससे पहले कि वो संभल पाता शेरा ने उसकी पीठ पर पूरी ताक़त से लात जमा दी। वातावरण में काले नकाबपोश की घुटी घुटी चीख गूंज उठी। शेरा ने उसे सम्हलने का मौका नहीं दिया और लात घूंसों की बरसात कर दी उस पर।

काले नकाबपोश के हाथ में सहसा शेरा की टांग आ गई जिसे पकड़ कर उसने पूरी ताक़त से उछाल दिया। शेरा उछलते हुए दूर ज़मीन पर गिरा। इधर काला नकाबपोश फ़ौरन लट्ठ ले कर उठा। इससे पहले कि शेरा सम्हल पाता उसने अपनी टांग चला दी जो शेरा के पेट के बगल से लगी। शेरा बुरी तरह दर्द से बिलबिला उठा। बात अगर सिर्फ़ इतनी ही होती तो शायद वो सम्हल भी जाता लेकिन काला नकाबपोश रुका ही नहीं बल्कि एक के बाद एक लातों का वार शेरा के पेट और छाती पर करता ही चला गया। कुछ देर पहले यही हाल शेरा कर रहा था और काला नकाबपोश दर्द से बिलबिला रहा था। शेरा ने सहसा काले नकाबपोश का पांव पकड़ लिया और उसके जैसे ही उसे उछाल कर दूर गिरा दिया। पेट और छाती में उसे बड़ा तेज़ दर्द हो रहा था जिसे सहते हुए वो तेज़ी से उठा। पास ही पड़े लट्ठ को ले कर वो तेज़ी से काले नकाबपोश के पास पहुंचा।

काला नकाबपोश सम्हल कर खड़ा हो चुका था। शेरा ने जैसे ही लट्ठ का वॉर किया उसने अपने लट्ठ से उसके वार को रोका। उसके बाद वातावरण में लट्ठ के टकराने की आवाज़ें गूंजनें लगीं। दोनों बड़ी दक्षता से एक दूसरे पर वार करते जा रहे थे और उसी दक्षता से एक दूसरे का वार रोकते भी जा रहे थे। अचानक शेरा की लट्ठ बीच से टूट गई और साथ ही काले नकाबपोश का अगला वार उसके बाजू में लगा। शेरा दर्द से बिलबिलाया किंतु जल्द ही सम्हला। काले नकाबपोश ने घुमा कर लट्ठ कर वार शेरा के सिर पर किया। शुक्र था शेरा ने ऐन वक्त पर देख लिया था वर्ना उसकी खोपड़ी लट्ठ लगने से निश्चित ही फूट जाती। शेरा ने झुक कर उसके वार को रोका और साथ ही एक लात काले नकाबपोश की कमर पर लगा दी जिससे नकाबपोश लहरा कर ज़मीन पर गिर गया। उसके हाथ से लट्ठ निकल गया था। शेरा ने उछल कर अपनी कोहनी का वार नकाबपोश की छाती पर किया जिससे नकाबपोश की चीख निकल गई। एकदम से उसकी आंखों के सामने अंधेरा सा छा गया। शेरा ने उसे सम्हलने का मौका नहीं दिया। उसने काले नकाबपोश का दाहिना हाथ पकड़ा और पूरी ताक़त से उल्टा कर के अपनी तरफ खींच लिया। फिज़ा में कड़कड़ की आवाज़ हुई और साथ ही नकाबपोश की दर्दनाक चीख भी गूंज उठी। शेरा ने उसका दाहिना हाथ तोड़ दिया था।

काला नकाबपोश ज़मीन पर पड़ा दर्द से छटपटा रहा था। अपने टूटे हाथ को दूसरे हाथ से पकड़े वो तड़प रहा था। ये देख शेरा ने उसका कालर पकड़ा और गुर्राते हुए कहा____"मैं चाहूं तो इसी वक्त तेरी जीवन लीला समाप्त कर दूं लेकिन तुझे ज़िंदा रहना होगा और फिर बताना होगा कि जिस सफ़ेदपोश के इशारे पर तू ये सब कर रहा है वो असल में है कौन?"

"मुझसे कुछ नहीं जान पाओगे तुम।" काले नकाबपोश ने दर्द से कराहते हुए कहा____"क्योंकि मुझे उसके बारे में कुछ भी पता नहीं है। मैंने उसका चेहरा कभी नहीं देखा।"

"इसके बावजूद तुझे उसके बारे में बहुत कुछ पता है।" शेरा ने कहा____"तेरे द्वारा ही उसे पकडूंगा मैं।"

"मेरा मुकाबला तो कर लिया तुमने।" काले नकाबपोश ने दर्द में भी मुस्कुरा कर कहा____"लेकिन उसका मुकाबला नहीं कर पाओगे। वो तुम जैसों को एक पल में धूल में मिला देने की क्षमता रखता है।"

"हां देखा है मैंने।" शेरा ने कहा____"कुछ देर पहले अपनी आंखों से देखा था कि कैसे उस दरोगा ने उसे दबोच रखा था और वो उससे खुद को छुड़ाने के लिए छटपटा रहा था। अगर तूने दरोगा को ठोकर नहीं मारी होती तो जल्द ही तेरे उस सफ़ेदपोश का काम तमाम हो जाना था।"

"अच्छा तो तुमने वो सब देखा है?" काला नकाबपोश बुरी तरह चौंका था फिर बोला____"ख़ैर उस वक्त तो मैं भी उसको उस हालत में देख कर आश्चर्य चकित हुआ था लेकिन फिर मुझे याद आया कि वो वही था जिसने पहली मुलाक़ात में मुझे बड़ी आसानी से हरा दिया था। उसके बाद ही मैंने उसके लिए काम करना मंजूर किया था।"

शेरा को लगा काला नकाबपोश बेवजह ही सफ़ेदपोश का गुणगान कर रहा है इस लिए समय को बर्बाद न करते हुए उसने उसकी कनपटी के ख़ास हिस्से पर वार किया जिसका नतीजा ये हुआ कि काला नकाबपोश जल्द ही बेहोशी की गर्त में डूबता चला गया। उसके बाद शेरा ने उसे उठा कर कंधे पर लादा और एक तरफ को बढ़ता चला गया।



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