Adultery मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #02 Running - Page 19 - SexBaba
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Adultery मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #02 Running

अंदर पहुंचते hi मैंने एक लम्बी सांस भरी मानो जैसे अब मुझे किसी का कोई भी दर न हो.. कुछ पल रहत लेने क बाद मैंने अपने पल्लू को अपने हाथों में भरा और उसके खींचते हुए अपने कोमल आज जैम क मसले गए कामुक सरीर से धीरे से खींच क अलग कर दिया जिससे मेरे यौवन और उसकी उचाई अब सिर्फ मेरे ब्लाउज में अपनी खूबसूरती छुपाते हुए रह गयी थी.. पर अभी तोह सुरुवात मात्र थी, ककी बारिश क कारन पूरी तरह भीगी हुई साड़ी अब भी मेरे जिस्म से ऐसे चिपकी हुई थी जैसे जिस्म क एक एक कामुक अंग को कपड़ों क ऊपर से hi निवस्त्र दिखने की कोशिश कर रही हो.. बारिश की छोटी छोटी चमकती हुई बूंदें मेरे कोमल गोर जिस्म पे ऐसे दिख रही थी जैसे जल से निकली हुई किसी जलपरी क जिस्म पे सजी हुई मोतिया



पल्लू हट्टे hi मेरे कैसे हुए मजबूत उरोज जिनका आज जैम क मर्दन हुआ था.. वो उस ब्लाउज में ऐसे नज़र आ रहे थे जैसे किसी भी पल ब्लाउज खुद hi पहात जायेगा वो मेरे यौवन का निखार उस छोटे से स्नानघर में चमक उठेगा, पल्लू क हटने क बाद मैंने अपना एक हाथ अपने पेटीकोट में घुसी हुई अपनी साड़ी पे रखा और अगले hi वो मेरी साड़ी मेरे जिस्म से ऐसे अलग होती जा रही थी मानो जैसी बारिश से भरे ठन्डे मौसम में उसमे कामुकता की अग्नि लग चुकी हो और अगर मैंने उसे जल्दी से अपने सरीर से अलग नहीं किया तोह मैं फिर से जिस्म की मादक गर्मी में जलना सुरु हो जाउंगी, और इसका परिणाम ये हुआ की अब मैं सिर्फ पेटीकोट और ब्लाउज में रह गयी थी और मेरी यौवन को छुपाने वाली मेरी साड़ी मेरे पैरों को चुम रही थी

अब बरी थी मेरे उस भीगे ब्लाउज की जो मेरे जिस्म से ऐसे चिपका हुआ था जैसे उसकी कामुकता का hi हिस्सा हो.. मैंने अपने दोनों हाथों को ब्लाउज क आगे किया और आगे लगे उन 3 बटन को बरी बरी से खोलना सुरु कर दिया, वैसे सायद मुझे गलत लग रहा हो पर ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे जैसे में अपने ब्लाउज को खोलती जा रही थी वैसे वैसे स्नानघर की ठंडक में गर्मी का तापमान बढ़ता जा रहा था, मेरे ब्लाउज क तीनो बटन खुल चुके थे वैसे तोह अब मेरा यौवन उछाल क बहार आ जाना चाइये था पर बारिश में भीगा ब्लाउज मेरे उरोजों पे चिपका हुआ अब भी मेरी लाज बचा था की तभी मुझे एक पल क लिए ऐसा प्रतीत होता है जैसे स्नानघर क बहार मैंने कुछ आहत सुनी हो, आज एक hi दिन में इतना सब हो चूका था की हर छोटी चीज़ मेरे जिस्म क एक एक रोये को जगा दे रही थी

मेरा ब्लाउज जो आगे से पूरी तरह खुल चूका था पर भी मेरे बड़े बड़े उरोजों पे चिपका हुआ था.. मैंने अपने यौवन को उसी हालत में चोरते हुए अपने दिल की बढ़ती हुई गति को सँभालते हुए धीरे से कहा

"कोण है.. ?

कोई है.. वह..

मैंने पूछा कोई है किया.. ?"

पर हर बार सिर्फ बारिश का शोर hi था, मुझे कोई भी उत्तर प्राप्त नहीं हुआ था.. पूर्ण सन्नाटा hi मिला उत्तर में, मैं खुद hi इस निष्कर्ष पे पहुंच चुकी थी

"लगता है.. हवा ज्यादा तेज़ चलने लगी है.."

एक बार फिर से अपने आप को निवस्त्र करने का कार्यक्रम फिर से सुरु कर दिया, मेरे ब्लाउज क सरे बटन तोह खुले hi थी इसलिए अगला पड़ाव अब अपने आप को ऊपर से पूरी तरह नंगा करना hi था.. इसलिए बिना किसी अतिरिक्त देरी क मैंने अपने ब्लाउज को पहले दाए कंधे से नीचे सरकाया और फिर बाए कंडे से उतारते हुए वही जमीन पे गिरने दिया, जिसके चलते अब में पूरी तरह ऊपर से नंगी हो चुकी थी मेरी नज़रें एक पल क लिए मेरी उन्नत चूचियों पे अटक सी गयी जिनका आज भरपूर मर्दन हुआ था और अभी भी वो मजबूत हाथों की पकड़ क कारन लाल नज़र आ रही है.. जैसे उनपे होली का रंग चढ़ा हो

अब बरी थी आगे बढ़ने की यानि पेटीकोट को उतर क पूर्ण नंगे होने ककी.. ककी ऊपर से तोह मैं मादरजात नंगी हो hi चुकी थी जहा मेरी गोरी चूचिया जिनकी हाल कुछ एशिया था जैसे उसपे हल्का गुलाबी रंग मॉल दिया गया हो पर उसके साथ hi मेरी काले जामुन सामान तने हुए निप्पल्स अब भी मेरी कामुकता का बखान करते नहीं थक रहे थे

जल्दी hi मेरे हाथ एक बार फिर से मेरे पेटीकोट क नाड़े तक पहुंच चुके थे जहा बिना रुके मैं एक पल क लिए एक लम्बी सी सांस लेती हु और फिर उसे खींच देती है जिसके चलते मेरा बारिश में भीगा हुआ पेटीकोट मेरे जिस्म को पूर्ण नंगा करते हुए मेरे पैरों में आके अपना दम तोड़ने लगता है

अब उस ठन्डे और छोटे से स्नानघर में में पूरी तरह निवस्त्र कड़ी हुई थी जहा मेरा गोरा जिस्म मेरे जवान भतीजे क हाथों आज इतना रगड़ा गया था की वो हल्का गुलाबी नज़र आने लगा थे जैसे गुलहड़ क फूल को मेरे पुरे जिस्म में जोरो से रगड़ा गया हो.. वही मेरी सूज चुकी छूट अब भी अपने होंठों को खोले हुए अपनी बेहरहम कुटाई की कहानी खुद hi बता रही थी

मेरी योनि क ऊपर उघि हुई मेरी काली काली सुन्दर झांटें पूरी तरह सत्यम क वीर्य से सनी हुई थी, सायद ऐसे ठन्डे मौसम क कारन मेरे जवान भतीजे का गाड़ा वीर्य अभी तक नहीं सूखा था और मेरे योनि स्थल को पूरी तरह गीला किये थे.. जिसे अगर कोई देख ले तोह यक़ीनन उसका लुंड बगावत करने पे उतारू हो जाएग, कुलमिला क कहु तोह मेरे जिस्म का हर हिस्सा फिर चाहे वो मेरे जोरो से मसली गयी चूचिया हो या बेहरहमी से छोड़ी गयी बुर जिसका मेरे भतीजे ने आज भोषड़ा बना दिया था वो अपनी हालत क द्वारा सत्यम की म्हणत क निशाँ लिए हुए और ज्यादा खिल उठी थी

मैंने धीरे से अपनी योनि पे अपना हाथ सरकाया तोह मेरी काली झांटों क बीच से होती हुई मेरी उंगलिया जब योनि द्वार पे पहुंची तोह मुझे एक मीठे मीठे दर्द की गहरी तीस महसूस होती है जिसके चलते मेरी आँखें स्वतः hi बंद होती चली जाती है और मुंह से कामुक सिसकारी फुट पड़ती है

"आआआआअह्ह्ह्ह.. कमीने ने सच में बुर का भोषड़ा बना दिया.. ेस्शह्ह्ह्ह.. अभी तक दर्द है.. हैईईईई"

पर मुझे इस बात का तनिक भी ज्ञान नहीं था की दरवाजे क बहार कोई छुपा हुआ ये सब देख रहा था और इस पल उसकी साँसें लगातार तेज़ होती चली जा रही थी.. और वो मेरे जिस्म को अपनी आँखों से hi छोड़ने की कल्पना करने लगा था

ऐसी क साथ बहार बारिश का शोर लगातार बढ़ता hi जा रहा था, स्नानघर क ऊपर वाली तीन की छत्त पे गिरती हुई बूंदें कुछ ज्यादा hi शोर पैदा कर रही थी और धीरे धीरे फिर से मौसम में ठंडक बाँड्ने लगी थी

यहाँ से आगे बढ़ने से पहले आपको वापस सविता और सोनू क पास लौटना होगा.. तोह चलिए जाइए और देखिये वह किया हो रहा है 🙈



कंटिन्यू... 👇
 
सविता लगभग दौड़ते हुए अपने कमरे में पहुंच चुकी थी, ककी अब उसके पास ज्यादा समय नहीं था उसे अपने पति और पियरे देवर क कहे अनुसार उनके लिए खास अपने हाथों से गुड़ वाली चाय बना क पिलानी थी.. पर सविता ने सब कुछ इतनी आसानी से हाथ से नहीं जाने दिया था उसने थोड़ा बदलाव जरूर किया था पर पीछे नहीं हटी थी



कमरे में अंदर आते hi उसने सबसे पहले दरवाजे को हल्का सा खोल दिया था कुछ ऐसे की न पूरी तरह खुला प्रतीत हो न बंद.. ऐसी क साथ उसके अधरों पे मुस्कान खिल उठी थी एक पल क लिए उसने कमरे में एक और लगे सीसे में खुद को देखा और फिर अपनी अगली शरारत पे खुद hi है उठी और अब उसका हाथ उसके hi पल्लू पे पहुंच चूका था जहा उसने बिना समय व्यर्त किये अपने पल्लू को अपने भरी भरकम यौवन और गेहुआ रंग वाले जिस्म से अलग कर दिया था जिससे सीसे में नज़र आती हुई भरी भरी नारियल सामान चूचिया देख क वो खुद hi अपने आप पे गर्व करने से खुद को रोक नहीं पायी थी

सविता जो हमेशा कैसे ब्लाउज hi पहनना पसंद करती जिसकी आदत उसे खालिद क बाप ने लगाई थी ककी गाओं में वही तोह एकलौता ऐसा दर्ज़ी था जो बस आँखों से उस जैसी गदराई औरत का नाप ले लिया करता था.. इसके बाद सविता वापस से पहले hi निकल चुके मालती क कपड़ों की और देखती है और उसके अधरों पे रहसीमान मुस्कान बिखर जाती है पर जिस चीज़ को देख क उसे सबसे ज्यादा गुड़गुई हो रही थी वो थी वो छोटी सी टॉवल जिसे लेके उसने न जाने किया सोच लिया था

सविता ने जल्दी से मालती क उन कपड़ों को उठाया और उसे वह से उठा क बिस्तर क सामने वाली लकड़ी की अलमारी में वापस से रख दिया और बिस्तर क नीचे राखी हुई एक पुराणी सी कपड़ों की सूटकेस निकल क उसे बिस्तर पे रख लिया और फिर बिना देरी क उसके ऊपर पूरी झुक सी गयी जैसे न जाने उन कपड़ों क बीच कोनसा लाल जोड़ा ढूंढ़ने में मग्न हो गयी हो.. पर असल में ये सब बस एक बहाना था असली बिजली तोह उसकी वो बहार को निकल चुकी भरी गांड गिराने वाली थी जो इस समय दरवाजे की और थी जिसे उसने जान क हिलना सुरु कर दिया था, अब बस सोनू क आने की देरी थी

सोनू भी जल्दी hi बेमन से बारिश की हलकी फुहार से बचते हुए जैसे hi अंदर प्रवेश करता है और उसके होंठ कुछ बोलने क लिए खुलते hi है की उसका वो मुंह बस वैसे hi खुला का खुला रह जाता है ककी सामने का नज़ारा hi कुछ ऐसा था.. सोनू क कपडे बारिश की फुहार क चलते हलके से भीग भी गए थे पर सामने जो नज़ारा था उसके आगे वो फुहार किया उस जैसा जवानी में आगे बढ़ता हु लड़का नदी में भी गोते लगा सकता था, ककी अंदर प्रवेश करते hi उसकी नज़र अब सविता की हलके से हिलती हुई कामुक मोती गदराई गांड पर जैम चुकी थी जिसे देख क एक पल क लिए तोह सोनू बेचारे भूल hi गया था की उसने अपना मुंह क्यू खोला है वो बस किसी दीवाने जैसा अपना मुंह खोले हुए सामने का कामुक दृश्य यानि अपनी बड़ी माँ की डोलती हुई गांड को देखे जा रहा था.. जहा सविता अपने नाटक को आगे बढ़ती हुई उस पुराणी सी सूटकेस में अब भी कपड़ों को बार बार इधर करते हुए न जाने किया hi ढूंढ रही थी

"पता नहीं.. ये मालती अपने कपडे कहा रखती है.. ?"

सविता क इन शब्दों ने सोनू को जैसे वापस धरा पे लाके पटक दिया था पर अब भी वो एकटुक बस अपनी गदराई भैंस जैसी कामुक बड़ी माँ की गांड को निहारने से खुद को रोक नहीं प् रहा था

बार बार इधर उधर आने जाने क साथ सविता की साड़ी पीछे से अब भी थोड़ी भीगी सी हुई थी जहा वैसे तोह उसने मोनू क लुंड की सवारी करने क बाद कपडे बदल लिए थे और ब्रा भी अपने यौवन पे चढ़ा ली थी पर पेंटी पहनने की जरुरत उसे अब भी महसूस नहीं हुई थी.. और ऐसे में उसकी साड़ी पीछे से गीली होने क कारन कुछ पारदर्शी सी हो चुकी थी और उसकी मादक और मोती गांड पे पूरी तरह चिपकी हुई थी, इतनी की गांड की दरार कुछ ज्यादा hi अचे से पता चल रही थी और ऐसे में सोनू को वो नज़ारा कुछ ज्यादा hi साफ़ साफ़ नज़र आ रहा था जिसका असर उसके सर उठाते नाग पे दिखने लगा था

बड़ी माँ 'सविता' की गांड इतनी मोती है की जब वो अपनी गांड को हौले हौले हिलाते हुए सोनू का गाला सूखने की कोशिश करती तोह हर बार उसकी साड़ी उसकी गांड पे इतनी ज्यादा कास जाती की जैसे लगता की कही साड़ी पीछे से पहात न जाये.. सोनू का लुंड तोह जैसे गरम बारिश करने क लिए पागल hi होने लगा था वैसे भी वो जिस उम्र में था उसमें सविता जैसी औरत को संभल पाना इतना आसान नहीं, सविता क सामने तोह अचे अचे मर्द लुंड की उलटी कर दे फिर ये तोह बस एक जवान होता बचा hi था

"उफ्फ्फ्फ़.. बड़ी माँ की गांड कितनी बड़ी है.. "

आश्चर्य से भरे हुए सोनू क लिए वो नज़ारा hi काफी था उसकी साँसों को गरम करने क लिए और सायद ऐसी कारन ये सब्द उसके होंठों से फुट पड़े थे, जिसे सविता ने भी सुन लिया था और धीरे से पीछे मुड़ती हुए सोनू का खुला मुंह और उसके लोअर में बना हुआ वो तम्बू देख क उसके अधरों पे मुस्कान खिल हुई थी पर वो अपने संस्कारी रूप का परिचय देते हुए कहती है

"अरे आ गया बीटा.. वैसे कुछ कहा किया ?.."

सोनू तोह एक पल क लिए बस काँप hi उठा था, उसके सब्द तोह जैसे बहार आने से भी डरने लगे थे और चेहरा जैसे एक hi पल में पीला पड़ने लगा हो.. जहा उसकी ऐसी हालत देख क सविता मंद मंद मुस्कुरा उठती है

"किया हुआ.. कुछ कहा था किया.. ?"

सविता क वापस अपने सवाल दोहराने पे सोनू को जैसे कुछ होश आता है और ये भी लगता है जैसे उसकी बड़ी माँ ने कुछ सुना नहीं है, जिसके चलते उसकी जान में जान भी लौट आती है पर जैसे hi वो कुछ सामान्य सा होता है उसपे बिजली बांके गिरने क लिए सविता क यौवन सामने खड़ा था

जहा बिना पल्लू क अपने यौवन का दर्शन करवाती हुई सविता की भरी भरकम बड़ी बड़ी चूचिया उसके कैसे ब्लाउज में ऐसे प्रतीत हो रही थी जैसे बस बहार hi निकल पड़ेगी.. बेचारा सोनू तोह एक बार फिर से इस खूबसूरत दृश्य में खोता hi चला जाता है जहा इस बार उसे वापस बुलाने का कार्य सविता का स्वर hi करता है

"किया हुआ.. सोनू बीटा.. ?"

सविता क इन शब्दों में कितनी शैतानी भरी थी वो बस वही समझ सकती थी

"कुछ… कुछ नहीं बड़ी माँ.. कुछ नहीं.. वो.. वो आपने बुलाया था न.. कुछ.. कुछ काम था"

सोनू क इन टूटे हुए शब्दों का कारन एक बार फिर से सविता hi थी, ककी वो ऐसी पल अपना एक हाथ अपने ब्लाउज क नीचे ले जाती है और कपडे क अंतिम सिरे को पकड़ क ऐसे नीचे की और खींचती है जैसे मानो ब्लाउज ऊपर चढ़ गया हो

"उफ्फ्फ.. ये बारिश की चिपचिप भी न.. न जाने कहा कहा गीला कर देती है.."

पर सविता की शरारत इतने पे hi नहीं ख़तम हुई थी वो वो जान क अपने सीने को कुछ ज्यादा hi आगे की और करते हुए अपनी बड़ी बड़ी पपीते सामान चूचियों को सोनू की नज़रों क आगे लगभग हिलाते हुए सी कहती है

"बीटा.. देख न मेरा ब्लाउज कुछ खास सा हो गया है किया.."

अब एक ऐसा लड़का जो अभी पूरी तरह जवानी में कदम भी नहीं रखा पाया था उसकी आँखों क सामने कोई सविता जैसी Maha-Chinar औरत अपनी बड़ी बड़ी चूचियों को ऐसे उछलते हुए उससे सवाल करेगी तोह भला वो वो सोनू हो या कोई भी कहा कोई उत्तर दे पायेगा.. और ठीक ऐसा hi हाल बेचारे सोनू का भी था वो तोह बस थूक गटकने की hi कोशिश करता रह जाता है पर इस समय तोह उसका गाला तक सुख चूका था पर सविता इतनी आसानी से कहा सोनू को जाने देने वाली थी

"बता न.. किया हुआ ?"

सोनू- (मुश्किल से अपनी उखड़ी हुई साँसों को जैसे तैसे काबू कर लेता है, पर उसके लोअर में तने हुए तम्बू का किया करा जाये जो ऐसे हिल रहा था जैसे बस पहाड़ क बहार निकल पड़ेगा और सविता की टांगों क बीच hi घुस क दम लेगा) जी.. जी बड़ी माँ.. है.. वो..

सोनू की हालत तोह ऐसी थी की वो कुछ बोल hi नहीं पाटा पर उसकी हालत पे सविता मन hi मन बस मुस्कुराती रहती है.. ऐसे एक जवान होते लड़के को तंग करने में उसे कुछ ज्यादा hi आनंद आ रहा था, सविता को अभी चाय भी बनानी थी इसलिए इस सब को और लम्बा नहीं खींच सकती थी अपितु उसे ेस्मिन बड़ा hi आनंद आ रहा था

सविता वापस से मुद क फिर से बिस्तर क ऊपर झुक जाती है और वही बिस्तर पे पड़ी उस टॉवल को उठा लेती है इस पल में एक बार फिर से सोनू को उसकी बड़ी माँ की बड़ी सी गांड क दीदार मिल गए थे.. उसका मन तोह बस यही कर रहा था की किसी प्रकार से वो दोनों हाथों से अपनी बड़ी माँ की महँ गांड को दबोच ले पर अभी उसमें इतनी हिम्मत कहा था, सविता टॉवल हाथ में लिए हुए वापस से सोनू की और देखती है तोह वो जल्दी से खिड़की क बहार होती वर्षा की और देखने लगता है जैसे मानो उसे दर हो की कही उसी चोरी न पकड़ ली जाये और ऐसी हर हरकत सविता की छूट में कामुकता की सिरहन भर दे रही थी

सविता इस बार हाथ में वो टॉवल थामे हुए उसकी और बढ़ती है और वो टॉवल उसकी और आगे बढ़ाते हुए मुस्कुरा क कहती है

"ये ले जा.. पीछे स्नानघर में मालती नाहा रही होगी उसे दे आ, और अगर वो कपड़ों का पूछे तोह बता देना मुझे मिले नहीं"

सोनू अपने कांपते हाथों से धीरे से वो टॉवल ऐसे पकड़ता है जैसे उसे दर हो की कही अगर उंगलिया भी सविता की गरम जिस्म से छू गयी तोह वो कही जल न जाये.. और उसे ऐसे देख क सविता हर पल का भरपूर आनंद ले रही थी, सोनू अपना थूक गटकने की नाकाम सी कोशिश करता है और धीरे से वो टॉवल ले लेता है

सोनू का लुंड कुछ ऐसी हालत में था इस समय जैसे किसी भी पल बस पहात hi जायेगा, वैसे भी आज का दिन उसके लिए सुबह से hi खास hi रहा था पहले अपनी माँ की कासी चूचियों को देखते हुए उसकी आँख खुली थी और फिर दूध देते हुए उसे एक बार फिर से अपनी सगी माँ की चूचियों क दर्शन प्राप्त हो चुके थे और अब ये.. आज का दिन सच में उसके लिए कुछ ज्यादा hi खास होता जा रहा था, सोनू टॉवल को लेके जल्दी से बस बहार निकल जाना च रहा था ककी उसके लुंड में लग चुकी आग उसे अंदर hi अंदर जलने लगी थी वो टॉवल लेके कुछ कदम hi आगे बड़ा होगा की एक बार फिर से पीछे से उसकी गदराई भैंस जैसी बड़ी माँ की आवाज़ उसके कानो में पड़ती है

"रुक ऐसे भीग जायेगा.."

सोनू एक बार फिर से अपनी बड़ी माँ की और मुड़ने को मजबूर हो जाता है जहा वो देखता है की उसकी बड़ी माँ वही कमरे में एक किनारे रखे हुए एक छाते को उठा रही थी और जल्दी hi वो छाता लेके एक बार फिर उसके सामने आके कड़ी हो चुकी थी

"ये ले जा… वर्ण भीग जाएगा.. न जाने वहां कितना समय लगे.."

सविता क इन शब्दों में एक गहरा छुपा हुआ रहस्य था जिसे जवानी की और बढ़ता हुआ सोनू अभी समझ नहीं पाया था वो जल्दी से छाता और वो टॉवल लेके वह से निकल जाता है जैसे अगर वो वह और कुछ दिएर रुक गया तोह पक्का उसका लुंड पहात पड़ेगा

सोनू जल्दी से घर क पिछले हिस्से की और बाद चला था जहा अब वर्षा ने पूरी गति पकड़ ली थी पर ये ठंडी बुँदे भी सोनू क लग चुकी आग को भुजने में सक्षम नहीं थी..



कंटिन्यू... 👇
 
सोनू जैसे hi टॉवल लेके स्नानघर की और बढ़ना सुरु होता है तोह वो एक गरम सांस चोरते हुए रहत भरने का काम करता है पर तभी उसके दिमाग में अब तक की सबसे महत्वपूर्ण बात गूंज उठी है जिसे सविता क भरी भरकम कामुक सरीर की गर्मी क चलते हुए समझ hi नहीं पाया.. यानि मालती



सोनू आगे बढ़ते हुए अचानक से अपनी जगह रुकने को बाध्य सा हो जाता और अपने हाथ में थमी टॉवल को देखते हुए उसके जिस्म में एक नयी कामुकता की चिंगारी फूटने लगती है और उसके अधरों से सब्द निकल पड़ते है

"यानि मालती चची.. नंगी होंगी.."

इन शब्दों क साथ जो सोच उसके मन में और दिमाग में जो तस्वीर उभरी थी उसने एक hi पल में सोनू क लुंड में खून की बाद चुकी रफ़्तार को कई गुना बड़ा दिया था और अब सोनू की आँखों में चमक और होंठों पे मुस्कान थी ककी उसे पता था सायद एक बार से उसे सबसे खूबसूरत मालती चची को नंगा देखने का अवसर प्राप्त हो सकता है.. पर बेचारे सोनू को किया पता आज उसकी किस्मत में देखने से कही जहा है

इधर कमरे से निकल क रसोईघर की और बाद चुकी सविता क भी अधरों पे मुस्कान लगतार विराजमान थी.. ककी उसे पता था की आज बहुत कुछ सोने की संभावना है, पर इस बात का मलाल भी था की उसके पति और देवर क कारन वो खुद ये सब नहीं देख पायेगा.. वो ये नहीं जान पायेगी की जवानी की और बढ़ता सोनू कितना जवान हो चूका है, या अभी भी वो बस एक बचा hi है

और यहाँ जवानी में पहला कदम रखने की जल्दी से भरा हुआ सोनू मन में उठती हुई तरंगों क साथ घर क पिछले हिस्से में पहुंच चूका था पर इस छोटे से रस्ते में भी जबसे उसके दिमाग में ये बात बैठी थी की वो सुंदरपुर की सबसे खूबसूरत गदराई औरत क लिए टॉवल ले जा रहा था और सायद आज फिर से वो किसी तरह 'मोनू की माँ' को नंगा देख पायेगा, इस एक सोच ने hi उसके लुंड में जो भूचाल मचाया था वैसे तूफान उसने आज तक महसूस नहीं किया था.. हर कदम क साथ आगे बढ़ते हुए कभी उसकी आँखों क सामने मालती का निवस्ट यौवन होता तोह कभी उस निवस्त्र सरीर क साथ hi उसकी बड़ी माँ की वो बड़ी सी गांड.. एक जवान होता लड़का इस समय एक साथ 2 गदराई औरतों को याद करते हुए अपने कदम बड़ा रहा था

सोनू छाता कंधे पर रखे पे और टॉवल हाथ में थामे हुए जल्दी hi स्नानघर क सामने पहुंच चूका था.. जहा उसके लोअर में लुंड इतना सख्त हो चूका था की हर एक सांस क साथ हिलोरे खाने लगा था और बस किसी भी प्रकार से वो दहकता हुआ लुंड बहार आके खुली हवा में सांस लेना च रहा था.. सोनू स्नानघर क सामने पहुंच क एक पल क लिए छाता संभाले हुए एक लम्बी सी सांस लेके खुद को सँभालने की कोशिश सी करता है और तेज़ी होती बारिश क बीच धीरे से कहता है

"चची.. तोवे…."

पर तभी उसके सब्द उसके गले में hi अटक से जाते है और मन में उसकी ीचा प्रबल होक उससे बोल उठती है

'किया कर रहा है.. ऐसे तोह मालती चची को पता चल जायेगा न, सोच वो इस समय पूरी नंगी हो सकती है.. सोच सोनू.. सोच'

सोनू एक पल क लिए पूरी तरह अपनी जगह पे जैम सा जाता है और उसके मन की वो आवाज़ एक बार फिर से उसके कानो में गूंज उठती है

'सोच सोनू.. मालती चची क सरीर से बेहटा हुआ पानी, जो उनकी ुचि ुचि चूचियों से बेहटा हुआ उसकी काली झांटों तक जायेगा और फिर वह से धीरे से आगे बढ़कर उनकी खूबसूरत गोरी और गुलाबी छूट में समां जायेगा.. सोच सोनू सोच'

सोनू क मन की बात ने उसके पुरे जिस्म में झुरझुरी सी दौड़ा दी थी, और उसका लुंड तोह जैसे बस लोअर क कपडे को चीरता हुआ बहार hi आ जायेगा

सोनू क मन में जवानी का पाप हावी हो चूका था वैसे भी यहाँ आने से पहले सविता क गदराये यौवन ने जो हमला उसपे किया था उसके बाद उसका ऐसा सोचना गलत भी नहीं था.. आखिर था तोह एक जवान बचा hi वो

सोनू इधर उधर ऐसे देखता है जैसे कही कोई उसे चुप क देख तोह नहीं रहा है, पर ये तोह बस उसके मन का वो चोर था जो उसपे हावी होता जा रहा था ककी उसके अंदर सुलग चुकी मालती को नंगा देखने की ीचा उसे अँधा बनती जा रही थी.. सोनू जल्दी से वो छाता अपने कंधे और सर के बीच दबा लेता है जिससे वो इस घनघोर होती वर्षा से बच सके पर नीच का हिस्सा लगभग भीगना सुरु हो चूका था पर उसे कहा उसकी परवा थी, सोनू धीरे से अपना पहला कदम आगे बढ़ाता और अपने dhak-dhak करते हुए दिल क साथ धीरे से दरवाज़े क हैंडल क पास वाले पुराने से छेद पे अपनी एक आँख लगा देता है और फिर जो अंदर नज़र आना सुरु होता है उससे उसके लुंड की ताक़त की आज परीक्षा होने वाली थी

सोनू जैसे hi उस नन्हे से छेद से अंदर देखता है उसके पुरे जिस्म में मानो ज्वाला भड़क उठती है ककी अंदर उसकी खूबसूरत मालती चची लब्मी लम्बी साँसे ले रही थी जिसके चलते उनकी कासी और उन्नत चूचिया जोरो से हिलोरे खा रही थी और ऐसा नज़ारा देख क सोनू का लुंड भी हिलोरे खाने लगा था.. ये वही समय था जब मालती अंदर पहुंचने क बाद अपने आप को शांत कर रही थी और उसके मन में सविता की कामुक पर तीखी बातें चल रही थी और उसके मन में यही चल रहा था की किया.. बड़की भौजाई को सब पता चल गया है

पर मालती की मनोदशा से पूरी तरह अनभिग सोनू उसे अंदर देख क अपनी बढ़ती साँसों को काबू करने की चैस्ता कर रहा था, ककी उसे अभी बहुत कुछ देखा था.. तभी मालती अपने पल्लू को अपने हाथों में भरते हुए उसे खींच देती है जिससे अगले hi पल उसका कामुक यौवन उस छेद से देखते हुए सोनू की आँखों क सामने था जिसकी कठोरता सोनू की आँखों में बस्ती जा रही थी और उसका असर उसके लुंड की कठोरा पे नज़र आने लगा था जो बस लोअर को पहाड़ क बहार आ जाना च रहा था, पर तभी सोनू थोड़े धियान से देखता है तोह उसकी साँसों की रफ़्तार और बाद जाती है ककी मालती क भीगे हुए ब्लाउज से उसके काले जामुन जैसे निप्पल्स की हलकी झाला भी देखि जा सकती थी.. अभी तोह मालती नंगी भी नहीं हुई थी और घर का सबसे छोटा बीटा अभी से कामुकता की अग्नि में तपने लगा था, कुछ ऐसा कामुक यौवन है मेरी माँ 'मालती' का..

सोनू उस छेद से जितना देख सकता था उतना देखते हुए अपनी मालती चची क जिस्म क हर उभर और हर उचाई को अपनी आँखों में भरता जा रहा था.. सोनू को उसकी खूबसूरत चची क कामुक जिस्म पे बारिश की छोटी छोटी चमकती हुई बंधे नज़र आती है जो इतनी खूबसूरत लग रही थी जिसकी तुलना क लिए भी कोई सब्द नहीं मिल रहा था उसे पर उसे इंतज़ार था की कब उसकी खूबसूरत चची पूर्ण निवस्त्र होंगी

सोनू अब भी छाते को अपने कंधे और सर क बीच फसाये हुए एक हाथ से टॉवल को थामे हुए एकटुक अंदर का दृश्य देखे जा रहा था, जहा मालती अपना एक हाथ आगे ले जेक अपने पेटीकोट में फांसी हुई अपनी साड़ी को निकल देती है और बिना समय नस्ट किये अपने कामुक सरीर क चारो और घूमती चली जाती है जिस कारन सोनू को ज्यादा दिएर की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती और जल्दी hi वो अपनी चची की साड़ी को उनके पैरों क समीप गिरते हुए पाटा है.. मालती जैसे जैसे अपने यौवन को परत दर्परट खोलती जा रही थी वैसे वैसे सोनू क लुंड की नसे फूलती चली जा रही थी, और इसका परिणाम ये निकला की उसकी चची अब सिर्फ पेटीकोट और ब्लाउज में रह गयी थी

सोनू का पूरा सरीर कंपकपी से भर चूका था हर एक पल उसे जानते जैसा प्रतीत होने लगा था उसके मन से एक आवाज़ निकल रही थी

'बाकि सब भी उतरो चची.. जल्दी से नंगी हो जाओ'

और जवानी क द्वार पे खड़े सोनू की ये प्राथना जैसे अंदर कड़ी मालती भी सुन लेती है ककी वो अब अपने दोनों हाथों को ब्लाउज क आगे कर चुकी थी जहा उसकी इज्जत की रक्षा करते हुए ब्लाउज क वो 3 बटन इस समय सोनू को किसी दुश्मन जैसे लग रहे थे.. मालती एक पल क लिए रुक क सांस भर्ती है जिससे ऐसा लगता है की ऐसी हरकत से उसके तीनो बटन टूटने सुरु हो जायेंगे पर ऐसा तोह कुछ नहीं हुआ इसलिए वो खुद hi बरी बरी से अपने बटन खोलना सुरु कर देती है और हर एक खुलते बटन क साथ सोनू की साँसे ऐसे उखाड़ने लगी थी जैसे मानो अंतिम बटन क खुलने से पहले कही उसकी साँसे hi चलनी बंद न हो जाये

जल्दी hi सोनू को तीनो बटन खुले हुए नज़र आते है जहा अब ब्लाउज क बीच से उसे उसकी खूबसूरत चची का गोरा और कामुक बदन और चूचियों क बीच की कामुक गहराई नज़र आने लगती है पर बारिश में भीगे ब्लाउज क कारन उनका वो कपडा उनकी चूचियों से अब भी चिपका हुआ था वर्ण बटन खुलते hi सायद सोनू को सुंदरपुर की असली खूबसूरती दिख जाती.. और ऐसी खूबसूरती देख क तड़पते हुए सोनू क मुख से वो सब्द फहुत पड़ते है

"आह्ह्ह्ह.. जल्दी से उतरो चची.."

पर इस बार ये आवाज़ सिर्फ उसके मन तक सीमित नहीं रही थी, अपितु उसके मन की ये ीचा शब्दों का रूप लेके बहार आ गयी थी जो वैसे तोह बारिश का तेज़ शोर क चलते मालती सुन नहीं पायी थी पर एक पल क लिए उसे कुछ एहसास जरूर हो गया तभी तोह वो बोल पड़ी थी

"कोण है.. ?

कोई है.. वह..

मैंने पूछा कोई है किया.. ?"

मालती की आवाज़ सुनते hi सोनू का हाल तोह ऐसा हो गया जैसे वो पकड़ा hi गया, एक पल क लिए वो इतना दर चूका था की उसने सांस तक रोक ली की कही उसके कारन मालती उसे जान न जाये पर ये मालती क जिस्म का जादू hi था जो वो अब भी वही खड़ा था भले hi दर क मरे उसके पैरों में कंपकपी भर गयी थी.. सोनू अपनी साँसों को रोके हुए बस अंदर की और देखता hi रहता है न जाने अब किया होगा सायद 30 सेकंड hi गुजरे होंगे पर ये समय भी सोनू क लिए काटना संभव नहीं हो प् रहा था पर तभी उसे फिर से मालती का स्वर सुनाई पड़ता है जो उसके अंदर रहत की लहर दौड़ा देती है

"लगता है.. हवा ज्यादा तेज़ चलने लगी है.."

ये सुनते hi सोनू को जैसे नया जीवन मिल गया हो

सोनू देखता है एक बार फिर से उसकी कामुक और खूबसूरत चची ने खुद को निवस्त्र करने का कार्यक्रम सुरु कर दिया है, जिसके चलते वो जल्दी से टॉवल को मुंह में दबा लेता है और अपने एक हाथ को पूरी तरह आज़ाद करके उसके नीचे की और ले जाता है जहा उसका सर उठाये हुए उसका लुंड जल्दी hi उसकी मुठी में आ चूका था भले hi अभी भी उसके हाथ और लुंड क बीच उसके लोअर का कपडा था पर अंदर का नज़ारा देखते हुए जो मज़ा उसे मिल रहा था उससे ये खुद भी यही लग रहा था जैसे उसके अपने जलते हुए मोठे लुंड को थमा हुआ हो

ब्लाउज क सरे बटन तोह खुले hi थी इसलिए अब और समय नस्ट न करते हुए मालती कुछ hi पल में ब्लाउज को अपने कोमल गोर कामुक सरीर से पूरी तरह उतर क वही जमीन पे गिरा देती है और अब जवानी की और बढ़ते हुए सोनू की आँखों क समाने दुनिया की सबसे खूबसूरत चीज़ थी यानि मेरी माँ की नंगी बड़ी बड़ी चूचिया जिसे देखते hi सोनू क खून में मानो उबाल उठ गया और तुरंत अपना लोअर खींच लेता है जिससे उसका जवान लुंड उछलते हुए पुरे गर्व से बहार लहरा उठता है बस फिर किया था अंदर स्नानघर में कुंदन की नंगी पत्नी को नंगा देखते हुए वो जल्दी से अपने जवान और जोशीले लुंड को मुठी में दबोच लेता है

"उफ्फ्फ्फफ्फ्फ़.. कितनी खूबसूरत है मेरी मंझली चची, चूचिया तोह देखो.. उफ्फ्फ.. पर ये इतनी लाल क्यू है

.. जैसे किसी ने इनपे लाल गुलाल मॉल दिया हो"

सत्यम क मजबूत हाथों की रगड़ ने मालती की जिन चूचियों को पूरा लाल कर दिया था सोनू उन्हें गुलाल क रंग से जोड़ रहा था.. जैसे मालती कोई होली खेल क आयी हो, वैसे होली तोह खेली hi गयी थी जिसमें बारिश का पानी भी था और सत्यम क लुंड से निकलने वाला सफ़ेद रंग भी

सोनू अभी मालती क गदराये ऊपर से नंगे हो चुके यौवन को निहारने में hi व्यस्त है की तभी उसकी साँसों को और तीव्र करने क लिए मालती क दोनों हाथ उसकी गहरी कामुक नाभि से नीचे होते हुए उसके नाड़े तक जा चुके थे जहा एक hi पल में उसने अपने नाड़े को पकड़ क खींच दिया पर उससे पहले मालती ने एक गहरी सांस भरी थी जिसके चलते उसके बेहरहमी से मसले गए यौवन में जो उतर चाड़व आया था उसके चलते सोनू जोर से अपने लुंड को मुठी में भरने पे मजदुर हो गया था.. बल्कि उसने जोश में आपके इतने जोर से अपने लुंड को जकड लिया था की एक पल क लिए उसके पुरे सरीर में दर्द की सिहरन सी उठ पड़ी थी पर उसने काबू नहीं खोया ककी अब उसकी आँखों क सामने 'मुरली दस' की मंझली बहु यानि उसकी चची पूर्ण नंगी हो चुकी थी

"आआआआअह्ह.. haiiiiiiiiiii… आज तोह चची ने अंदर कुछ पहना hi नहीं था… uffffffffff.. पर ये छूट का हल.. कुछ.."

सोनू अभी अपनी कामुक मंझली चची क पुरे नंगे हो चुके यौवन को अपनी आँखें फाड़े देख hi रहा था की उसकी नज़र जब मेरी माँ की बुर पे पड़ती है तोह अनायास hi वो वही रुक सा जाता है ककी आज सत्यम ने जो हाल किया था उस बुर का उसके बाद वो बुर नहीं भोषड़ा बन चुकी थी

"बहनचोद.. किया मालती चची को आज किसीने.. पर वो तोह सत्यम भैया क साथ…"

जैसे hi सोनू क मुंह से धीमे स्वर में निकलते उसके शब्दों में सत्यम नाम आता है उसकी आँखें चौड़ी होती चली जाती और जैसे उसे अब और कुछ समझने की जरुरत hi न हो

"मतलब.. सत्यम भैया ने.. आज चची को पेल दिया किया…?"

सोनू अपनी उखड़ती हुई साँसे और जोर से मुठी में पड़के हुए अपने हाथ और कंधे और सर क बीच दबाये हुए उस छाते को थामे हुए खुद से कहता है.. वैसे उसके मुंह से निकलने वाले वो सब्द साफ़ नहीं थी ककी मुंह में उसने टॉवल को भी तोह दबा रखा था

उस ठन्डे और छोटे से स्नानघर में अपनी सबसे कामुक चची को ऐसे नंगा देख क सोनू से और रुका नहीं जाता और धीरे धीरे अपने लुंड को आगे पीछे की और सरकने लगता है जिससे उसकी चमड़ी उसके लाल सुपडे को खोलते हुए उसे खुली हवा में सामने ला देती है.. और अब हाल कुछ ऐसा था जहा एक जवान लड़का अपनी कामुक चची को नंगा देखते हुए धीरे धीरे अपने लुंड को सेहला रहा था उसे मसलने लगा था और आँखें अब भी उसी छेद पे तिकी हुई थी जैसे मानो एक पल क लिए भी उसने अपनी नज़रों को हटाया तोह उसके सामने से दुनिया का सबसे सुन्दर नज़ारा हैट जायेगा

सोनू देखता है की उसकी चची का गोरा जिस्म आज कुछ गुलाबी सा नज़र आ रहा था जैसे किसी ने उनके जिस्म पे गुलाबी गुलाल माला हो.. पर ये रंगत तोह सत्यम क हवस की निशानी थी

वही उसकी खूबसूरत कामुक चची की योनि जो काली काली झाटों क बीच छुपी होने क बाद भी वो वह पे सूजन को साफ़ साफ़ देख प् रहा था जैसे मानो आज मालती फिर से जवान हो गयी हो, अब खुद hi अंदाज़ा लगाना की मेरी माँ को ऐसी हालत में देख क सोनू जैसे किसी जवान लड़के का किया हाल होगा 🔥

तभी मालती अपने पैरों में पड़े अपने कपड़ों को एक पेअर से थोड़ा दूर करती है जिससे एक पल क लिए hi सही पर सोनू को दोनों पैरों को एक दूसरे से दूर होने पे उसकी चची की गुलाबी योनि और उनके अंदर का हिस्सा भी नज़र आ जाता है साथ hi साथ उसे ये भी नज़र आता है की अब भी वह मालती की योनि में कुछ चिपचिपा सा भरा हुआ है.. जिसके बारे में सोचते hi सोनू का हाथ उसके लुंड पे जोर जोर से चलने लगता है

"ाःह.. ये तोह.. आअह्ह्ह्हह.. गरम गरम माल लग रहा है, यानि सच में आज मालती चची को सत्यम भैया ने बजा दिया है.. हैईईई.. कितना मज़ा आ गया उन्हें ऐसे माल छोड़ क.. उफ्फफ्फ्फ़…"

उस छोटे से छेद से सोनू को जितना दिख प् रहा था उसके चलते फिर चाहे उसकी चची की जोरो से मसली गयी चूचिया हो या बेहरहमी से छोड़ी गयी बुर जिसका आज भोसड़ा बना दिया गया था.. सोनू आज पहली बार किसी औरत को ऐसे देख रहा था, मैं नंगे जिस्म की बात नहीं कर रहा हु.. मैं बात कर रहा हु एक ताज़ा चूड़ी हुई औरत की

और न जाने क्यों उसे मालती को ऐसी हालत में देखना ज्यादा ाचा लग रहा था.. न की सिर्फ नंगा, उसके मन की आवाज़ धीरे से उसके मुंह से बहार आ hi जाती है

"हैई.. न जाने सत्यम भैया ने कैसी बेहरहमी से छोड़ा होगा.. काश में भी वह होता तोह मालती चची की छूट में उनका लुंड जाता हुआ देख पता

उफ्फ्फ.. कितना मज़ा आया होगा सत्यम भैया को.. काश में देख पता कैसे उन्होंने इनकी बड़ी बड़ी सख्त चूचियों को चूसा होगा

कैसे इनकी छूट में अपना मोटा काला लुंड घुसाया होगा.. और उस समय चची क चेहरे का हाल देख पता.. उफ्फ्फ्फफ्फ्फ़… मालती चची…"

सोनू अपनी खूबसूरत चची को अपने ताऊ जी क बेटे सत्यम क साथ सोचते हुए पूरा पागल होता जा रहा था.. और इसका परिणाम उसके लुंड क ऊपर चलते उसके हाथों की गति से चल रहा था जहा वो अब बहुत जोर जोर से अपने लुंड को मुठियाने लगा था बार बार अपनी चमड़ी को आगे पीछे करते हुए वो असीम आनंद को प्राप्त कर रहा था

तभी अपने लुंड को जोर जोर से मथते हुए सोनू देखता है की उसकी चची धीरे से अपना एक हाथ अपनी योनि की और सरका रही है जिसे देख क उसके खून मानो सिर्फ उसके लुंड की और भागने लगता है.. जहा मालती अपनी काली झांटों क बीच से अपने हाथ को आगे ले जेक जब अपनी उँगलियों को बुर तक ले जाती है तोह सोनू ये साफ़ साफ़ देख पता है की मालती को दर्द महसूस हुआ

"उफ्फ्फफ्फ्फ़.. लगता है सत्यम भैया ने बहुत छोड़ा है.. तभी तब बस हाथ लगाने से hi दर्द हो रहा है चची को… ufffffffffffff.. Aaaaaaaaaa.. कितनी हसीं छूट है.. और छोड़ने क बाद तोह लगता है छूट और खूबसूरत हो जाती है"

सोनू जितना ज्यादा अपनी चची और सत्यम क बारे में सोच रहा था उसके लुंड का हाल उतना hi बिगड़ता जा रहा था उसके में एक hi ीचा थी इस पल

'काश वो देख पाटा..'

अनजाने में hi सही पर उसके अंदर एक नयी कल्पना और ीचा ने जमन ले लिया था, किसी औरत को चुड़ते हुए देखने की सबसे खूबसूरत कल्पना

उसकी सोच उस पल और प्रबल हो जाती है जब अपनी योनि को छूटे hi उसे उसकी कामुक चची की दर्द से भरी हुई ाः और वो सब्द सुनाई पड़ते है

"आआआआअह्ह्ह्ह.. कमीने ने सच में बुर का भोषड़ा बना दिया.. ेस्शह्ह्ह्ह.. अभी तक दर्द है.. हैईईईई"

अब तोह सोनू को पूरा यकीन हो गया था.. ककी मालती सत्यम क साथ hi तोह गयी थी, और उसका भाई कैसा है ये तोह वो जनता hi है

बारिश अपनी गति लगातार बढ़ाने लगी थी पर स्नानघर क बहार छाता लिए खड़ा सोनू अपनी hi धुन में उस छोटे से छेद से अंदर का नज़ारा देखने में व्यस्त था.. जबकि नीचे उसका निचला हिस्सा पूरी तरह बारिश में भीग चूका था

सोनू की साँसें पूरी गति से चल रही और उसकी गति से बड़ा तेज उसका हाथ उसके लुंड पे चल रहा था जो अंदर पूर्ण निवस्त्र कड़ी हुई छुड़वा क आयी अपनी चची को देख क जोरो से उसके लुंड को मसल रहे थे.. सोनू अपने लुंड को जोर जोर से मसल रहा था जिसमें कभी वो अपने टोपे पे अपना अन्घुता भी दबा देता जैसे वो अपने वीर्य को बहार आने से रोकने की कोशिश करता और फिर वापस से जोर जोर से अपने जवानी क जोश से भरे हुए लुंड को हिलने का ास्मीन आनंद देने वाला काम करने लगता

"उफ़ वैसे चची की चूचिया कितनी मस्त है.. काश कभी इन्हे मुंह में लेके चूस पाव.. उफ्फ्फ वैसे आज सत्यम भैया ने तोह पक्का जोर जोर से चूसा होगा इन्हे.."

सोनू जितना इस बारे में सोच रहा था उसके हाथ की गति उतनी hi बढ़ती जा रही थी, उसका हाल कुछ ऐसा होता जा रहा था जहा ऐसी ठण्ड और बारिश क बाद भी उसके माथे पे पसीने की बंधे नज़र आणि सुरु हो गयी थी



कंटिन्यू... 👇
 
मालती अपनी जगह कड़ी हुई अपना सर एक और घुमा क देखती है जहा उसे 2 बाल्टी नज़र आती है जो पूरी तरह पानी से भरी हुई थी और वही एक छोटी सी मचिया भी राखी हुए थी, वो बिना समय गवाए उसपे बैठी चली जाती है पर यहाँ असली बिजली तोह सोनू पे अब गिरने वाली थी ककी मालती जैसे hi उस छोटी सी मचिये पे बैठी है उसकी टंगे फैलती चली जाती है ककी मचिये की उचाई एक हाथ क अंघूठे से भी काम थी जिसकारण उसपे बैठते hi बैठने वाले की टंगे स्वतः hi खुलती चली जाती है.. और यानि मालती क साथ भी हुआ था जिसका परिणाम था उसकी चूड़ी हुई गुलाबी छूट अपनी पंखुडिया खोल देती है और अब सोनू छूट को पूरी गहराई तक साफ़ साफ़ देख प् रहा था



उसने अपनी पूरी ज़िन्दगी में आज तक इससे सुन्दर कोई चीज़ नहीं देखि थी.. उसके हाथ तोह जैसे वही क वही जैम से जाते है, सोनू अपने हाथ में फड़फड़ाते हुए लुंड को थामे हुए एकटुक अपनी चची की फैली हुई टैंगो क बीच उनकी गुलाबी छूट को देखता hi रह जाता है जहा जैसे hi मालती की योनि अपना मुंह फैलाती है उसके अंदर भरा हुआ सत्यम का वीर्य जो ठण्ड क कारन सुख नहीं पाया था वो रिस्ता हुआ बहार आ जाता है और ऐसा नज़र देख क सोनू खुद का काबू खो देता है और उसके लुंड से वीर्य की तीव्र पिचकारी फुट पड़ती है और जवान होते लड़के का पूरा सरीर ऐसे काँप उठता है जैसे वो सूखे पत्ते सामान काँप उठा था और उसकी आँखें खुद hi बंद होती चली जाती है.. ये मालती की योनि की गर्मी hi थी जिसे बस देखने भर से सोनू का virya-paat हो गया था

सोनू पूरा पागल हो चूका था उसकी आँखें बंद थी और लुंड से जोरदार पिचकारी निकलते हुए स्नानघर की दिवार को रंगति चली जा रही थी, पैरों में ऐसी कंपकपी भर गयी थी की खड़े रहना भी उसके लिए मुश्किल था पर वो काबू नहीं खोता और उसी प्रकार छाता थामे हुए तब तक आँखें बंद किये रहता है जब तक उसके लुंड से अंतिम पिचकारी नहीं निकल जाती.. है पर खुद को सँभालने क लिए वो अपना दूसरा हाथ जरूर धीरे से स्नानघर क दरवाजे पे टिका लेता है

ऐसा लग रहा था जैसे माटी की योनि क दर्शन मात्र ने उसके सरीर से उसकी पूरी शक्ति चूस ली हो.. ऐसे hi न जाने कब तक वो आँखें बंद किये हुए धीरे धीरे अपने लुंड को मसलते हुए उनके अंदर की हर बंध को गिरता रहता है की तभी उसे स्नानघर क अंदर से पानी क गिरने की आवाज़ आती है और उस हालत में भी वो अपनी आँखों को खोल क अंदर देखने से खुद को रोक नहीं पाटा है

जहा अंदर मालती एक जग से अपने जिस्म पे पानी डालते हुए नहाना सुरु कर चुकी थी, जहा पानी उसके सर पे गिरता और फिर वह से उसके खूबसूरत चेहरे से होता हुआ उसकी गर्दन को चूमने क बाद उसकी मजबूत और सम्मान से तानी चूचियों पे बेहटा हुआ उसके गोर पेट को पार करते हुए उसकी गहरी नाभि में एक पल क लिए रुकता और फिर वह से होता हुआ उसकी काली काली झांटों को भिगोते हुए उसके योनि को धुलने का कार्य करते हुए नीचे गिर रहा था.. इस पल भर क नज़ारे ने सोनू की जवानी में फिर से जान फंक दी थी और वापस से एक बार फिर से अंदर का कामुक नज़ारा देखने में व्यस्त हो जाता है, तभी माटी फिर से जग को बाल्टी में दाल क उसे वापस से भर्ती और इस बार अपने दोनों पैरों को थोड़ा और फैला देती फिर सीधा hi पूरा पानी अपनी योनि पे डालने लगती जहा जैसे hi पानी की धार सीधा उसकी सूजी हुई योनि पे पड़ती उसके जिस्म में ास्मीन दर्द उठा है पर साथ hi ये दर्द अपने अंदर कामुकता भी लिए था जिसके चलते उसकी कामुक सिसकारी बहार सोनू भी सुनने में सफल रहता है

"आआआआहहह.. माआआआ… कुत्ते ने पूरी छूट सुजा दी छोड़ छोड़ क.. एक hi दिन में 3 बार छोड़ डाला कुत्ते ने.."

सोनू को तोह अपने कानो पे यकीन hi नहीं होता की उसकी मंझली चची 'मालती' आज 3 बार छुड़वा क आयी है.. वो मन hi मन अपनी चची की क्षमता पे गर्व करने लगता है

'वाह्ह.. चची.. आप तोह बड़ी महँ है..'

मालती अपनी सूजी हुई छूट पे जब अचे से पानी डालती है तोह साथ hi साथ दूसरे हाथ से अपनी योनि को साफ़ करने क लिए उसे थोड़ा रगड़ती भी हैज इसके चलते उसकी योनि में उठने वाला दर्द कई गुना बाद जाता है

"आआआहहह.. Maaaaaaaaaaaaaa.. हरामी ने सच में मेरी छूट पहाड़ डाली है… uffffffffffff… कित्ती दर्द कर रही है मेरी छूट.. haiiiiiiiiiiiii"

मालती का एक एक सब्द सोनू क लुंड में जोश भरने का काम करने लगा था और अभी अभी सफ़ेद उलटी करने वाला उसका लुंड एक बार फिर से खड़ा होने लगा था.. ये है मेरी माँ का जादू 🙏

मालती अचे से अपनी छूट को धुलने क बाद इधर उधर देखती है जहा उसे जल्दी hi कोने में दबा कुचला साबुन नज़र आ जाता है और बिना एक भी पल गवाए वो उसे उठा लेती है और अपनी छूट पे लगाना सुरु कर देती है, जिसके चलते जल्दी hi मालती की योनि साबुन क झाग से भरने लगती है और सोनू का मुंह उतर जाता है ककी वो अब अपनी चची की योनि क दर्शन नहीं कर प् रहा था

"पता नहीं साबुन की किया जरुरत थी.."

सोनू क मन क अंदर क विचार उसके शब्दों में बहार आ hi जाते है

इधर मालती अपने जवान होते भतीजे की उपस्तिथि से पूरी तरह अनभिग अपनी छूट पे साबुन लगाती रहती है जिसके चलते उसकी चूचियों में अलग hi कामुक थिरकन नज़र आ रही थी पर सोनू की नज़रें तोह उसकी चची की छूट पे थी जहा साबुन क झाग क चलते वो उस सबसे खूबसूरत नज़ारे को नहीं देख प् रहा था, और उसके बाद वो साबुन को दोनों हाथों में अचे से रगड़ती है और फिर साबुन को नीचे चोर क अपने हाथों से अपनी टांगों को मलने लगती है जिसके चलते उसकी मसल जांघें जल्दी hi साबुन क झाग से भर उठी थी पर ये नज़ारा भी इतना कामुक था की सोनू का लुंड फिर से अपना सर उठा चूका तह और वापस से उसपे उसके हाथों की रगड़ सुरु हो चुकी थी.. यहाँ मालती दोनों हाथों से अपनी गदराई जाँघों पे साबुन लगा क उसे अचे से साफ़ करती है और फिर धीरे से कड़ी हो जाती है

सोनू क दिल से एक hi सवाल उठता है

"चची अब किया करने वाली है.. ?"

उसकी खूबसूरत चची 'मालती' अब पूरी तरह कड़ी हो चुकी थी जहा वो पूरी तरह भीगी हुई थी और उसकी छूट और जाँघों पे साबुन और उसका झाग नज़र आ रहा था, तभी मालती वापस से नीचे झुक पड़ती है जिससे सोनू की आँखों क आगे उसके दुधारू दूध लहरा उठते है और ऐसा नज़ारा देख क कोई पागल hi अपना लुंड नहीं मुठियाना चाहेगा और यही काम सोनू भी करता है

पर मालती तोह वापस से वो साबुन उठाने क लिए झुकी थी जहा वो उस छोटे से बचे साबुन को अचे से वापस बरी बरी से अपने दोनों हाथों में रगड़ती है और एक बार फिर उस बचे हुए साबुन को नीचे फैक देती है फिर एक हाथ उस स्नानघर क दरवाजे पे टिका देती है जिसके चलते उसकी भीगी और बड़ी मजबूत कठोर चूचिया पहले से कही ज्यादा सोनू की आँखों क पास आ चुकी थी जिन्हे देखते हुए वो अब और ज्यादा जोर जोर से लुंड हिलने पे मजबूर हो चूका था.. देखा जाये तोह दोनों अब इतने पास थे की अगर उनके बीच वो दरवाजा न होता तोह सोनू अपना मुंह आगे करके अपनी चची की चुकी को मुंह में भर सकता था

"Aaaaaaaaaaaaaahhhh… किया हसीं नज़ारा है……… Ufffffffffff.."

अब मेरी माँ यानि मालती जब अपने एक हाथ को स्नानघर क दरवाजे पे टिका चुकी थी और इस कारन उसकी बड़ी विशाल कामुक नंगी भीगी हुई चूचिया उस दरवाजे क नन्हे से छेद क पास लहराने लगी तोह उन्होंने अगला काम किया, अपने दूसरे हाथ को पीछे की और ले गयी जिसपे साबुन को उन्होंने खूब अचे से रगड़ा था और फिर देखते hi देखते उनका वो हाथ उनकी गांड की गहरी दरार क बीच चलना सुरु हो गया.. वह पीछे हाथ कहा तक जा रहा था या किस चीज़ की सफाई कर रहा था ये तोह सोनू को भले hi पता नहीं चल रहा था पर वो अंदाज़ा लगा रहा था की इस समय चची का हाथ उनकी गांड क बीच उस कोमल छेद तक जा रहा होगा जहा तक कोई भी जवान लड़का या मर्द अपनी जीभ ले जाने की कल्पना करना पसंद करेगा, तभी अचानक से मालती की कामुक आठ फुट पड़ती है

"आआआअह्ह्ह्ह… कमीना तोह इसके चक्कर में भी था.."

ये कहते हुए मालती का सरीर एक पल क लिए पूरी तरह अकड़ सा जाता है जिससे सोनू क पुरे सरीर में कामुकता की सिरहन उमड़ पड़ती है ककी वो अंदाजा लगा सकता था की सायद इस पल उन्होंने अपनी एक ऊँगली को अपनी गांड क कोमल गुलाबी छेद में घुसा लिया था

'अह्ह्ह्हह.. लगता है चची गांड क छेद क अंदर तक की सफाई कर रही.. हैई कितनी गरम चची है मेरी…

…पर आप क्यू म्हणत कर रही है मालती चची.. मुझे मौका दो न, मैं अपनी जीभ से अचे से सब साफ़ कर दूंगा'

सोनू क मन में उठने वाले इन विचारों ने एक बार फिर से उसके लुंड को पूरी तरह शान से खड़ा कर दिया था जिसपे न चाहते हुए एक बार फिर से उसके हाथ की पकड़ जैम चुकी थी और फिर से वो धीरे धीरे अपने लुंड पे आगे से पीछे और पीछे से आगे की और हाथ चलते हुए गरम होता हुआ अपने लुंड का दम घटना सुरु कर चूका था

यहाँ अंदर उसकी चची यानि मेरी कामुक माँ 'मालती' इन सब से पूरी तरह अनभिग दरवाजे पे हाथ टिकाये हुए झुक क अपनी गांड को पीछे की और निकल क और अपनी बड़ी बड़ी चूचियों को आगे दरवाजे क पास लेक जोर जोर से अपनी गांड में ऊँगली घुसा रही थी जिसका असर उनकी योनि पे भी पड़ने लगा था और इतनी छोड़ना क बाद भी उनकी योनि से कॉमर्स की नहर चलने क आसार नज़र आने लगे थे.. और इस बात का साबुत उनकी धीरे धीरे चढ़ती हुई आँखें थी जिसका नसीलापन धीरे धीरे और गहरा होता चला जा रहा था

"आह्ह्ह्ह.. लगता है चची को बहुत मज़ा आ रहा है..

किया सत्यम भैया ने गांड का दरवाजा भी तोड़ दिया होगा.. नहीं नहीं ऐसा हुआ होता तोह चची खड़े होने लायक भी कहा होती"

ये बातें सोनू खुद से hi बोले जा रहा था, पर इस पुरे समय वो फिर से जोर जोर से अपने लुंड को हिलने का कार्य कर रहा था खास करके जबसे उसे ये लग रहा था की उसकी चची ऐसे झुक क सायद पीछे अपनी गांड में ऊँगली घुसा रही थी इस सोच मात्र ने सोनू क अंदर जो आग बड़के थी उसके आगे तोह जवालामुखी की गर्मी भी कुछ नहीं थी

सायद 2 मं तक मालती वही करती रहती है और फिर वापस से सीढ़ी कड़ी हो जाती है, मालती ने तोह अपनी इस्तिथि को बदल लिया था पर सोनू अब भी वैसे hi छाता थामे हुए बारिश से बचने की कोशिश करता हुआ उस छेद से अंदर का नज़ारा देखे जा रहा था और अब भी अपने लुंड का दम घोटने का पूरा जातां कर रहा था… जिसके चलते उसकी साँसों की गति अपने चरम पे पहुंच चुकी थी

अब मालती वापस से कड़ी होने क बाद बाल्टी से जग निकलती है जो पूरी तरह पानी से भरा हुआ था और फिर पीछे ले जेक अपनी गांड क ऊपर डालना सुरु कर देती है, जो सोनू को सही से तोह नहीं दीखता पर ये एहसास hi काफी था उसके लुंड से वीर्य की बारिश करवाने क लिए.. मालती 2-3 बार अपनी गांड पे पानी डालते हुए वह अचे से धुलाई करती है और फिर वापस से उसी मचिये पे बैठ जाती है और एक बार फिर से हर्षिता क जवान बेटे क सामने उसकी जेठानी की नंगी छूट खुल चुकी थी

इस बार वापस से मचिये पे बैठे hi मालती वापस से जग भर्ती है और पानी सीधा योनि क स्तन पे गिरना सुरु हो जाता है.. जहा जैसे जैसे पानी उस साबुन की झाग को साफ़ करता जा रहा था वैसे वैसे मोनू यानि मेरी माँ की आज जैम क चूड़ी हुई छूट खिल क सामने आती जा रही थी जो अब साबुन से अचे से धुलने क बाद पहले से ज्यादा निखार चुकी थी और दोनों टंगे फैली होने क कारन उसका गुलाबीपन भी अब पहले से ज्यादा साफ़ साफ़ नज़र आ रहा था, एक बार फिर से मेरी माँ की छूट ने अपना जादू दिखा दिया और फिर से सोनू का हाथ उसके लुंड पे पूरी गति से चलना सुरु हो गया यहाँ माँ अचे से अपनी छूट धुलने क बाद वापस से उस नाम मात्र की बची हुई साबुन की टिकिया उठती है और इस बार अपनी बड़ी बड़ी सख्त चूचियों पे रङ्गना सुरु कर देती है जिससे जब भी उनका हाथ मोठे मोठे बूब्स पे जोरो से चलता तोह उनकी चूचियों में ऐसा मनमोहक नृत्य सी करती की सोनू क हाथ की गति और ज्यादा बढ़ती चली जाती

दोनों चूचियों पे अचे से साबुन लगाने क बाद वो वापस से उस बची हुई साबुन की टिकिया को एक और रख क मालती अब फिर हाथों से hi अपने यौवन और पेट तक साबुन को फैलाना सुरु कर देती है जिससे देखते hi देखते चूचियों क साथ साथ उनका पेट और नाभि तक साबुन क झाग से भरना सुरु हो जाता है पर सोनू तोह इस कामुक नज़ारे को देखते हुए जोर जोर से अपने लुंड का मंथन किये hi जा रहा था जैसे उकसे हाथ पे किसी ने जादू कर दिया हो और वो अपने हाथ को रोक hi न प् रहा हो.. भले hi उसका हाथ अब बुरी तरह से दर्द करने लग था पर वो किया करे वो च क भी अपने हाथ की गति न काम कर प् रहा था न hi उसे रोक प् रहा था, बस जोर जोर से अंदर नहाती हुई माटी को देखते हुए यहाँ बहार खड़ा अपना लुंड बस जोर जोर से राज जा रहा था जहा उसके लुंड की चमड़ी बार बार आगे पीछे होते हुए उसे असीम आनंद दे रही थी और अब तोह उसके लुंड की सभी नसे भी मानो फूल चुकी थी.. सायद वो फिर से एक और बार मुठियाने की इस प्रतिस्पर्धा में जीतने वाला था

"आआआआअह्ह्ह.. किया कोमल और गरम जिस्म है मालती चची का.. आआआहहह.. एक बार मिल जाये तोह साली को कुटिया बना क छोडूंगा.. आआह्ह्ह.."

अपने दाँतों क बीच उस टॉवल को फसाये हुए अपने कांपते सरीर क साथ उस छाते को सँभालते हुए अपने मन क विचारो को कभी कभी बोलने से खुद को रोक नहीं प् रहा था पर बारिश का शोर और स्नानघर की छत्त क तीन पे गिरते हुए पानी क शोर क चलते वो स्वर माटी का कानो तक नहीं पहुंच रहा था

जल्दी hi देखते देखते मालती क पुरे सरीर पे साबुन फिर से लग चूका था.. कमसेकम जितना सोनू को नज़र आ रहा था उतने पे तोह साबुन लगा hi था, और अब दिएर करने का कोई कारन तोह था नहीं इसलिए मालती फिर से वही जग उठा क उसमें पानी भरते हुए अपने सरीर पे पानी गिरना सुरु कर देती है.. जिसके चलते उसका कोमल सरीर धीरे धीरे साबुन की झाग को अलग करता जाता और उसका और खूबसूरत जिस्म सामने आने लगता है.. उसकी बड़ी बड़ी चूचियों से बेहटा हुआ पानी जब गुलाबी और पूरी फैली छूट पे बेहटा है तोह सोनू जैसे बस पागल hi हो जा रहा था और उसके हाथ की रफ़्तार निरंतर बढ़ती जा रही थी

तभी मालती ने कुछ ऐसा किया की सोनू का लुंड उस कामुक दृश्य क आगे एक बार फिर से हार जाता है.. मालती अपने सरीर पे पानी डालते हुए इस बार फिर से जग को अपनी योनि क ऊपर लाती है और पानी की मोती धार उसकी काले बालों से भरी योनि पे गिरनी सुरु हो जाती है पर जिस बात ने एक बार फिर से जवानी क खेत में अपनी फसल काटने की ीचा रखने वाली सोनू क लुंड को पागल बनाया था वो थी माटी की वो हरकत जहा वो अपने दूसरे हाथ को अपनी योनि पे लाती है और अपनी उँगलियों को योनि क दोनों और करते हुए उसे और ज्यादा फैला देती है जिससे उसी पल सोनू को छूट क अंदर तक वो नन्हा सा दाना तक दिख जाता है जो किसी भी कामुक स्त्री की सबसे बड़ी कमजोरी होती है और ऐसा होते hi मालती पानी की सीढ़ी धार उसी पे गिराने लगती है जिसके चलते खुद उसकी आँखें बंद हो जाती है और मुंह से कामुकता की चासनी में लिपटी हुई ाः फुट पड़ती है

"Essssssssssshhhhhhhhhhhhhhh………. आआआआअह्ह्ह्ह.."

अब ऐसा नज़ारा देखने क बाद कैसे कोई खुद को रोक सकता है, और एक बार फिर से सोनू का लुंड जोर की पिचकारी मरना सुरु कर देता है पर इस बार सोनू से एक गलती हो जाती है.. जैसे hi उसका लुंड गरम लावा उगलना सुरु करता है उसका दिमाग़ मानो सुण्या हो जाता है और आँखें बंद होती चली जाती है और दूसरे हाथ से मुंह में दबाई हुई उस टॉवल को खींच क उसे अपने लुंड क टोपे पे आगे दबा देता है, जिसके चलते उसके लुंड से निकलने वाली हर एक पिचकारी उस सफ़ेद टॉवल में समाती जा रही थी पर अपनी आँखों को आनंद से बंद किये हुए सोनू को अभी इस बात की तनिक भी समझ नहीं रही थी वो किया कर रहा है उसे तोह इस समय अपनी बंद आँखों क आगे बस उसकी खूबसूरत और सुंदरपुर की सबसे कामुक औरत 'मालती' अपनी छूट फैलये हुए नज़र आ रही थी जिसकी छूट की गुलाबी रंगत ऐसी प्रतीत हो जैसी रही थी किसी ने गुलाल मॉल दिया हो



कंटिन्यू... 👇
 
सोनू दूसरी बार अपने लुंड की मलाई गिराने क कारन काफी थकन महसूस करने लगा था जिस कारन उसकी आँखें न जाने कब तक बंद hi रहती है.. अपने कंधे और सर क बीच दबाये हुए छाते को बड़ी मुश्किल से सँभालते हुए वो उस टॉवल को तब तक अपने लुंड पे दबाये रहता है जब तक उसके लुंड की आखिरी बून्द एक बार फिर से निकल नहीं जाती और जब आँखें वापस से खोलता है और वापस अपनी इस्तिथि सँभालते हुए अंदर देखता है तोह उसे पता चलता है की सायद को कई मं से ऐसे hi आँखों को बंद किये हुए आनंद में खोया हुआ था ककी अंदर अब मालती पूरी तरह नाहा चुकी थी और अंदर पूरी नंगी हालत में कड़ी हुई थी जहा मालती क सर क काले बालों से लेके छूट की काली झातें तक पूरी भीगी हुई थी.. और इस समय मालती की kaam-Pari निखार चुकी थी



सोनू देखता है तोह अचे से नाहा चुकी मालती क जिस्म पे पानी की बुँदे किसी मोतियों जैसी प्रतीत हो होती है जो उसकी नंगनता को कई गुना बड़ा रही थी, पर बालों से बहने वाला पानी अब भी उसके कामुक और गोल ेस्तानो क बीच की खायी से होता हुआ नीचे नाभि तक जा रहा था.. मालती की छूट अब पूरी तरह अचे से धूल चुकी थी और पहले से कई ज्यादा खूबसूरत और ताज़ी लग रही थी जिसकी खूबसूरती अब जैसे दुगनी हो चुकी थी

मालती अब नाहा क कड़ी हो चुकी थी और दरवाजे की और देखती है तोह उसे याद आता है की वो सविता की नज़रों और उसकी बातों से बचने की जल्दी में बिना कपडे लिए hi आ गयी थी पर सविता भौजाई ने कपडे भिजवाने की बात तोह की थी पर अभी तक आये नहीं थे.. नहाने क बाद मालती को अब ठण्ड महसूस होने लगी थी जहा उसके सरीर की ये कामुक कम्पन देखते हुए सोनू को बड़ा hi मज़ा आ रहा था, कुछ पलों क इन्तिज़ार क बाद मालती आवाज़ देने पे मजबूर हो जाती है

"कोई है… वो मेरे कपडे होंगे…. है किया कोई… "

मालती की पुकार सुनते hi जवानी की और बढ़ता हुआ और घर क लोगो की नज़रों में अभी बस बचा समझा जाने वाला सोनू जल्दी से सीधा खड़ा हो जाता है और तुरंत hi 2 बार सफ़ेद लावे की वर्षा कर चुके लुंड को अंदर अपने लोअर में भर लेता है और अपनी उखड़ती हुई साँसों और अपने जिस्म पे काबू बनाते हुए उत्तर देता है

"है चची.. मैं हु.."

मालती जैसे hi ये आवाज़ सुनती है उसकी जान में जान आ जाती है, ककी उसे तोह दर लगने लगा था की न जाने उसे ऐसे hi कबतक यहाँ रुकना पड़ेगा.. वैसे वो आवाज़ भी पहचान चुकी थी

"सोनू बीटा.. वो मेरे कपडे भेजे होंगे बड़की भौजाई ने.. लाया है. .?"

सोनू जो अपने लुंड से वो टॉवल हटा चूका था की तभी कपड़ों की बात सुनकर उसकी नज़र जब टॉवल पे पड़ती है तोह उसकी जान सुख जाती है ककी टॉवल क ऊपरी हिस्से और थोड़ा सा बीच में उसका वीर्य चिपका हुआ था जो धीरे धीरे नीचे की और बह रहा था जैसे किसी ने उस टॉवल पे देसी घी गिरा दिया हो.. सोनू को तोह समझ hi नहीं आता की वो किया उत्तर दे तोह इतने में मालती की आवाज़ फिर से उसे सुनाई पड़ती है

"किया हुआ.. लाया है न.. मेरे कपडे ?"

सोनू- (बौखलाहट में..) है.. है.. चची लाया हु

मालती ये सुनते hi सुकून की सांस लेती है और अपना हाथ स्नानघर क दरवाजे क ऊपर से हल्का सा बहार निकलते हुए कहती है

"तोह ला दे न.."

सोनू की तोह जैसे जान hi अटक जाती है की वो ऐसी टॉवल कैसे दे सकता है जिसपे उसने अभी अभी अपना गरम वीर्य गिराया है, पर उसके पास कोई और रास्ता भी तोह नहीं था ककी वापस अगर जाता तोह उसे सफाई देनी पड़ती की इस वाली टॉवल में किया हुआ ?.. इसलिए मजबूर होक वो उसी टॉवल को पलट देता है, और ऐसे तहा देता है की वीर्य वाला हिस्सा सबसे अंदर की और हो जाता है और फिर अपने dhak-dhak करते हुए दिल की धड़कन को सँभालते हुए धीरे से अपना काँपता हाथ मालती क नज़र आते हाथ की और बड़ा देता है

"ये.. ये लीजिये चची.."

मालित को जैसे hi अपने हाथों पे कपडे क चुने का ेशस होता है वो लपक क टॉवल को पकड़ लेती है और उसे अंदर खींच लेती है, पर जैसे hi वो देखती है की ये तोह बस एक टॉवल मात्र है उसका जिस्म झुरझुरी सी खा जाता है

"ये तोह बस.. मतलब यही.. मेरे कपडे कहा है.. बीटा.. ?"

सोनू- (अभी भी अपने आप को सँभालने की पूरी कोशिश में लगा हुआ था..) वो.. वो बड़ी माँ बस यही दी.. बोली की आपके कपडे उन्हें मिल नहीं रहे है

मालती का हाल ऐसा हो चूका था जैसे आगे खाई तोह पीछे कुवा, ककी वो बस एक टॉवल में बहार आ नहीं सकती थी और वापस सोनू को कपडे लेने भेजने का कोई फायदा नहीं था ककी वो जान चुकी थी की भौजाई ने जान क ये शरारत की है.. और आज उसने और सत्यम ने जो किया था उसके बाद तोह उसके अंदर वैसे भी सविता से नज़रें मिलाने की हिम्मत नहीं बची थी

मालती एक लम्बी सी सांस भरते हुए खुद से मन hi मन कहती है

'अभी ऐसी से काम चलना होगा.. और जल्दी से कमरे में पहुंच क कपडे पेहेन लुंगी

.. किया करू और कोई रास्ता भी तोह नहीं है..'

मालती अपने मन में उसी टॉवल से काम निकलना का विचार बना चुकी थी और ऐसा तय करने क बाद जैसे hi वो पूरी टॉवल को झटक क खोलती है तोह उसकी आँखें फैलती चली जाती है ककी वो टॉवल इतनी छोटी थी की उससे उसकी योनि और चूचियों को एक साथ धक् पाना संभव hi नहीं था.. उसकी साँसे अचानक से जोर पकड़ने लगती है पर वो आज बुरी तरह फास चुकी थी उसके पास और कोई विकल्प भी नहीं था

वो फिर से एक बार कोशिश करने का फैसला करती है ककी इतनी छोटी टॉवल से उसका गदराया जिस्म किसी भी तरह चुप नहीं सकता था

"सोनू.. तू वापस भावजी क पास का और बोल की.. कुछ दे.. ये.. ये बहुत छोटी है.."



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मालती की बात सुनते hi सोनू क मन में विचार चलने लगता है की किया सच में टॉवल इतनी छोटी है की मालती चची का जिस्म नंगा नज़र आएगा, वैसे तोह उसने अभी अभी भरपूर नज़ारा देखा था पर न जाने क्यू माटी चची को बस एक छोटी सी टॉवल में देखने की ीचा उसके लुंड में एक बार फिर से जोश भरने लगी थी

"गया की नहीं…"

पर तभी सोनू क कानो में उसकी खूबसूरत मादक चची का स्वर फिर से गूंज उठता है.. सोनू का वह से जाने का तनिक भी मन नहीं था पर उसे जाना hi पड़ता है

"जाता हु चची.."

सोनू छाते को सँभालते हुए इस बार लगभग दौड़ते हुए कमरे की और चल पड़ता है, जहा तेज़ हवा और उसके दौड़ने क कारन छाता करीब करीब उसके हाथ से निकलते निकलते रह जा रहा था.. पर जैसे तैसे वो कमरे क पास पहुँचता है की तभी उसे सविता हाथों में चाय की तरय लिए हुए नज़र आ जाती है जो सायद अभी अभी रसोई से निकली थी और वो जैसे hi सोनू को देखती है उसकी नज़रें सबसे पहले उसके लोअर में बने उस तम्बू पे अटक जाती है जिसे देखते hi उसकी योनि में खुजली सुरु होने लगी थी

"यहाँ किया कर रहा है..?"

सोनू जो सीधा कमरे की और hi बाद रहा था यु अपनी बड़ी माँ की आवाज़ सुनकर उनकी और पलट जाता है और एक पल क लिए उन्हें देखने से खुद को रोक नहीं पाटा और फिर अपनी बात कहता है

"बड़ी माँ.. वो मालती चची कह रही थी वो टॉवल बहुत छोटी है, कुछ और दे दीजिये.."

सविता को तोह सब पता hi था इसलिए ये सुनते hi वो मन hi मन है पड़ती है पर अपनी शरारत को अपने अधरों पे नहीं आने देती और सीधा सा चेहरा बनाते हुए कहती है

"उससे कहो की यही है बस.. वही लपेट क जा जाये और खुद अपने कपडे निकल ले

.. वर्ण थोड़ी दिएर वही प्रतीक्षा करे में सत्यम क हाथों भेजवा दूंगी.."

सविता अचे से जानती थी की सत्यम का नाम आने पे मालती उसी टॉवल का प्रयोग करने पे मजबूर हो जाएगी ककी कही न कही मालती क मन में उसके और सत्यम क राज़ क खुलने का दर बैठ चूका था इसलिए काम से काम इतनी जल्दी वो ऐसी हालत में फिर से तोह उसके सामने आने की गलती नहीं करेगी वो भी घर क अंदर

सोनू कुछ बोलना hi च रहा था की आगे बोलने का कार्य सविता hi कर देती है

"जा न.. जो कहा है बोल दे.."

सोनू क पास और कोई रास्ता तोह था इसलिए वो एक बार फिर से वापस लौट चलता है जहा जल्दी hi वो स्नानघर क बहार पहुंच क सविता क एक एक सब्द को ठीक वैसे hi मालती को सुना देता है.. जिसे सुनते hi मालती क पास सच में दूसरा कोई भी विकल्प नहीं बचा था ककी वो किसी भी हालत में वापस सत्यम क सामने यहाँ घर में ऐसी किसी हालत में नहीं आ सकती थी वर्ण उस लड़के का कोई भरोषा नहीं

मालती बुरी तरह फास चुकी थी और एक ग़हरी सांस भरते हुए धीरे से बोल पड़ती है

"ाचा ठीक है.."

यहाँ बहार सोनू अब स्नानघर क द्वार से थोड़ा हटके खड़ा हो चूका था ककी उसे लग रहा था की मालती चची किसी भी पल बहार आ सकती है, पर अब हर एक पल उसके में में तरह तरह की कामुक कल्पनाएं पैदा होनी सुरु हो चुकी थी की जब चची जब बहार आएँगी तोह किया.. और किया होगा जब उन्हें टॉवल में उसका वीर्य मिलेगा

सोनू वीर्य वाली बात से जितना दर रहा था उतना hi उसके लुंड में रह रह क इस बार फिर से सनसनी भर रही थी की चची उस टॉवल में कैसी लगेंगी और किया वो टॉवल सुंदरपुर की सबसे कामुक औरत की कामुकता को ढकने क काबिल भी थी

ऐसे न जाने कितने hi विचारों ने सोनू क लुंड में सिरहर भर राखी थी और वह अंदर मालती अब भी उस टॉवल को hi देखे जा रही थी ककी उसे अचे से पता था की कुछ भी हो जाये उसका बदन इस टॉवल में कभी भी समां नहीं सकता.. वर्षा का शोर जैसे जैसे स्नानघर क अंदर मालती को सुनाई पद रहा था वैसे वैसे वो और अपने विचारो में डूबती चली जा रही थी उसकी हिम्मत hi नहीं हो प् रही थी की इतनी छोटी सी टॉवल को लपेट क वो वह से निकले

'अगर किसी ने देख लिया तोह किया होगा..

.. ये बड़की भौजाई ने कहा फसा दिया है मुझे'

मालती अपनी hi उधेरबुन में फास रही थी तभी उसकी अंतरात्मा उसे सहारा देने का काम करती है

'इतना दर क्यू रही है.. अरे इतनी घनघोर वर्षा है कोई ऐसे आँगन में थोड़ी hi बैठा हुआ होगा, सभी लोग बहार है और अब तोह सोनू भी चला hi गया है..

तोह दर किस बात का जल्दी से निकल क भागते हुए अंदर कमरे में चली जा न.. और वैसे भी ऐसा पहली बार थोड़ी है, पहले भी तोह कई बार तू कपडे लाना भूल जाती थी और ऐसे hi पूरी निवस्त्र होक कमरे में गयी है'

मालती की इस आवाज़ का तुरंत hi विरोध भी होता है और ये उसके संस्कारों की आवाज़ थी

'पागल हो गयी है किया.. ऐसा कुछ करने की सोचना भी मत, अरे मर्दो से भरा हुआ घर है कही किसी ने देख लिया तोह किया होगा सोचा भी है

और इससे पहले तोह तू अपने घर पे होती थी न.. वह तोह बस कुंदन था, वो भी चक्की पे होता था पर यहाँ सब है'

मालती क संस्कारो को तुरंत hi जवान भी मिल जाता है

'ाचा तोह तू चाहती है की मालती पूरा दिन यही नंगी ऐसी हालत में कड़ी रह.. बोल ?'

ये एक ऐसा सवाल था जिसका जवाब उसके संस्कारों की किताब में भी नहीं था, और अंततः मालती क पास वही एकलौता विकल्प hi बचता है.. यानि उस छोटी सी टॉवल का प्रयोग करना

वैसे जो सबसे बड़ी बात थी वो ये की माटी को लग रहा था की सोनू जा चूका है.. जबकि सोनू तोह बहार hi स्नानघर से थोड़ा दूर खड़े होक अपनी खूबसूरत कामुक चची की प्रतीक्षा कर रहा है

मालती एक लम्बी सांस भरते हुए धीरे से खुद से बोल पड़ती है

"देखा जायेगा जो होगा…"

बस फिर किया था वो उस टॉवल को एक हाथ से पकड़ क दूसरे हाथ की ब्याह को पूछने लगती है.. ऐसा hi वो दूसरे हाथ क साथ भी करती है और फिर बारी आती है उसके खूबसूरत चेहरे की जिसपे ऊपर सायद hi गाओं का ऐसा कोई मर्द होगा जो अपना वीर्य नहीं गिरना चाहेगा

मालती इस बार टॉवल को पलट लेती है और उसे दोनों हाथों क बीच ले लेती है और वो अपना सरीर पोछने में इतना व्यस्त थी की उसने देखा hi नहीं की टॉवल में कुछ गाड़ा और चिकना जैसा लगा हुआ है, वो अपनी hi धुन में आँखों को बंद करते हुए उस टॉवल को अपने चेहरे पे लगा देती है और पोछना सुरु कर देती है.. पहले अपने माथे फिर अपनी खूबसूरत और गहरी आँखों क ऊपर भी टॉवल को पियर से रगड़ते हुए पुरे चेहरे को अचे से पूछने लगती है पर अभी तक टॉवल का वो हिस्सा उसके चेहरे से नहीं छुआ था जहा वो गरम मलाई लगी हुई थी..

चेहरे को अचे से साफ़ करने क बाद वो वापस से अपने दोनों हाथों को उठा क अपनी बगल अचे से सूखती है और और टॉवल की इस्तिथि थोड़ी से बदलते हुए अपनी गोल यौवन और दूध से भरी हुई चूचियों की और टॉवल को बड़ा देती है पर अब कुछ अलग एहसास मिलने वाला था उसे

मालती जैसे hi टॉवल का ऊपरी हिस्सा अपनी बड़ी कामुक उछलने वाली दोनों चूचियों पे दोनों हाथों की मदद से रख क अपनी hi धुन में रगड़ क पानी पूछने और अपने जिस्म को सूखने की कोषसिंह करती है वैसे hi उसे अजीब सा एहसास होता है जैसे कोई चिकनाहट उसकी चूचियों पे लग गयी हो जो अब भी गरम और ताज़ी थी.. मालती जल्दी से टॉवल को वह से हटा क पहले अपनी चूचियों को देखती है तोह हैरान hi रह जाती है ककी उसकी जामुन सामान काले काले निप्पल्स और उसके अस्स पास क गोल काले हिस्से पे कुछ सफ़ेद मलाई जैसा लग चूका था ये देखते hi मालती की हैरानी से आँखें फैलती चाय जाती है.. ककी वो उस chipchipe-pan और उसकी गरमाहट को अचे से पहचानती थी और जो चीज़ उसके दिमाग में आती है उसे सोचते hi उसकी योनि में अचानक से कामुकता की ऊर्जा भर उठी है और एक hi पल में उसका दिल जोरो से dhak-dhak करना सुरु हो जाता है

"ये तोह………"

वो बस इतना hi बोलती है और जल्दी से टॉवल को अपने चेहरे क दोनों हाथों से पूरा फैला लेती है ये पक्का करने क लिए की किया ये वही है जो वो सोच रही है..

और उसका सक सही निकला ककी उसे टॉवल क ठीक ऊपरी हिस्से और बीच क हिस्से में सफ़ेद गाढ़ापन नज़र आता है जो धीरे धीरे नीचे की और ृष्ण च रहा था.. वैसे उसने अभी अभी इससे अपना सरीर पोछा था तोह टॉवल खासा गीली हो चुकी थी पर वो गाडी मलाई तोह अलग से hi प्रतीत हो रही थी और उसे देखते hi मालती की साँसों ने एक hi पल में रफ़्तार पकड़ ली और उसकी योनि में वैसी hi थिरकन होने लगी है जैसे सत्यम क उसे गौड़ में उठाने पे हुई थी पर वो खेल किस हद तक गया था हम जानते है.. आसान भासा में कहु तोह उसकी कामवासना उसपे हावी होना सुरु हो चुकी थी

"ये… ये तोह… सच में गाड़ा वीर्य है.. वो भी बिलकुल ताज़ा"

उसके मुंह से धीमी सी आवाज़ निकली जो उस स्नानघर से बहार नहीं जा सकीय

मालती कभी भी मर्द की मलाई यानि उसके वीर्य को पहचानने में गलती नहीं कर सकती थी, बल्कि वो किया कोई भी औरत ऐसी गलती नहीं कर सकती थी.. वैसे भी आज यानि वीर्य 3 बार उसकी योनि में भरा गया है तोह भला उसके लिए गलती का कोई सवाल hi नहीं था.. पर वह उस समय सिर्फ एक hi इन्शान उपस्थित था और वो था उसका जवान होता भतीजा.. 'सोनू..'

मालती का पूरा सरीर मानो थरथरा सा जाता है ये सोचते hi और उसके मुख से धीरे से वो सब्द फूटना सुरु हो जाते है

"किया सोनू ने ये किया.. पर वो क्यू करेगा… एक मं.."

तभी उसका धियान उस नन्हे से छेद पे आके टिक जाता है जिसके बारे में उसे कुछ दिन पहले hi पता चला था और उसने सविता क साथ उसके लिए बात भी की थी पर सविता ने ये कहकर ताल दिया था की हमारे घर में भला कोई taaka-jhanki क्यू करेगा

मालती का गाला सुखना सुरु हो जाता है और योनि में अजीब सा खिचाव महसूस होने लगता है, चूचियों क निप्पल्स पुरे तने हुए महसूस होने लगते है.. एक hi पल में पुरे सरीर में वही कामुकता की उरझा भर्ती हुई महसूस होती है जो उसे सत्यम क साथ होने पे महसूस हो रही थी

"यानि सोनू.. पर वो तोह अभी बचा है.."

मालती ये कहते हुए वापस से उस टॉवल की और देखती है, जहा वीर्य की मात्रा देख क एक बार फिर से उसकी गरम होती साँसों क बीच वो सब्द बहार आते है

"नहीं.. अब बचा कहा रहा.."

मालती को अब पूरा यकीन हो गया था की सोनू उसे नहाते हुए इतने दिएर से देख रहा होगा और ये बात उसके अंदर ग़ुस्सा भरने की जगह उसकी योनि में कॉमर्स उप्टन कर रही थी, मालती की वासना उसके ऊपर फिर से हावी होनी सुरु हो चुकी थी जिसके चलते हुए अपनी चूचियों पे लगे उस गरम वीर्य का एहसास बड़ा hi अनोखा और खूबसूरत प्रतीत हो रहा था.. पर फिर भी वो अपने आप पे काबू बनाने की पूरी कोशिश करती है

"नहीं नहीं.. ये गलत है.. पर सोनू… वो तोह अभी बचा है.."

मालती ये कहते हुए फिर से अपनी चूचियों की और देखती है और फिर से बोल उठती है

"नहीं नहीं.. बचा तोह नहीं है…"



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मालती क पुरे सरीर में इतने hi समय में कामुकता की सिरहन दौड़ चुकी थी, न जाने उसे किया होता है वो उस टॉवल को अपने चेहरे क बिलकुल करीब ले आती है इतना की जरा भी और आगे लायी तोह वो गाड़ा हिस्सा उसकी तान और होंठो से मिल जायेगा.. और फिर एक पल रुक क अपने dhak-dhak करते हुए दिल को शांत करने की कोषसिंह करती है पर इसमें वो सफल नहीं है और अपनी कामुकता क आगे हार मानते हुए धीरे से एक लम्बी सांस भर लेती है जिसके चलते उसके अंदर उस ताज़े वीर्य की खुसबू भर्ती चल जाती है

"आआआआह्ह्ह्ह.. कितनी अछि खुसबू है… uffffffffffffff…. कितना कमीना है सोनू.. मैं तोह बचा hi समझती थी.."

मालती क होंठ फड़फड़ाने लगते है और उसपे न जाने कैसा नशा हावी होता है वो धीरे से अपनी जीभ निकल क उस गाड़ा वीर्य को चख लेती है

"आआह्ह्ह.. इसका स्वाद कितना ाचा है.."

पर तभी उसकी बंद आँखें फैलती चली जाती है ककी उसने ये स्वाद पहले भी चखा हुआ था.. उसे एक hi पल में वो दिन याद आने लगता है जब वो सो क उठी थी और उसने अपने पैरों पे वीर्य पाया था, उसकी पूरी पायल तक उस वीर्य से सनी हुई थी.. उसे पूरा यकीन हो गया था की ये वही स्वाद है पर पक्का करने क लिए उसके पास एक hi विकल्प था और उसने वही किया..

मालती ने इस बार अपने होंठों को खोला और टॉवल क उस हिस्से को अपने मुंह पे ले आयी और उसने टॉवल क उस गाड़े हिस्से पे अपने होंठ चला दिए जिसके चलते इस बार उस गरम वीर्य का ज्यादा से ज्यादा हिस्से उसके मुंह में पहुंच गया फिर देखते hi देखते वो उसे जातक गयी.. और अब उसे पूरा यकीन था

"यानि उस दिन भी सोनू ने hi वो हरकत की थी.. कमीना कही का.."

आज एक राज़ खुल चूका था.. वैसे आप लोग बताना की आपको पैरों पे वीर्य वाला ये अपडेट याद है की नहीं 🫡

मालती की कामुकता उसपे इस कदर हावी होती जा रही थी की धीरे धीरे उसकी योनि से रास की धार बहना सुरु हो चुकी थी और आँखें पूरी तरह नशीली होती जा रही थी.. उसके पेअर कांपने लगे थे और छूट क होंठ फड़फड़ाने सुरु हो चुके थे, न जाने कैसे उसने एक हाथ से टॉवल को आज़ाद किया और नीचे अपनी योनि पे लेके चली गयी जहा जैसे hi उसकी उँगलियों ने उसकी योनि को चुवा उसकी आँखें फैलती चली गयी ककी उसकी योनि तोह कॉमर्स की धरा चोर्ने लगी थी

"मुझे किया होता जा रहा है.. इतनी जल्दी में कैसे.. गीली हो गयी… कुछ तोह अजीब हो रहा है मेरे साथ.. मैं अपनी कामवासना क आगे बार बार कैसे हार रही हु"

मालती खुद से सवाल जरूर कर रही थी पर कामवासना क बहुपस में कैद होक वो धीरे से अपनी छूट की पंखुड़ियों पे अपनी उंगलिया इतने जोर से फिर देती है उसकी बीच वाली ऊँगली छूट क द्वार को फैलाती हुई थोड़ी सी अंदर पहुंच जाती है और इसके चलते हुए एक मीठा मीठा दर्द महसूस होता है

"आआआअह्ह्ह…"

मालती की आठ फुट पड़ी पर इस बार आवाज़ थोड़ी ज्यादा तेज़ थी जो बहार खड़े सोनू ने भी हलकी सुन ली थी.. वैसे मालती को तोह यही लग रहा था जैसे वो जा चूका है

"कुछ कहा किया चची.. ?"

मालती का हाथ जल्दी से उसकी योनि से हाथ जाता है और आँखें पूरी सजग इस्तिथि में खुल जाती है

"तू.. तू यही है अभी.."

सोनू- (बहार छाता लिए हुए स्नानघर से थोड़ा दूर खड़ा था) है.. मैंने छाता ले रखा है, ताकि आप भीग न जाये.. जल्दी करिये न चची, बारिश बढ़ती hi जा रही और में खड़े खड़े थक गया हु

सोनू की बात पे मालती धीरे से इतना hi कहती है

"मुझे पता है तू क्यू थका है.."

पर इतने धीमे की सिर्फ वही सुन सकती थी.. पर तभी उसके मन में ये विचार आता है की किया उसे सोनू क सामने ऐसे इस टॉवल में जाना चाहिए पर ये सोचते hi उसके कॉमर्स की धार योनि से निकल क उसकी जाँघों पे बह उठी है और उसे असीम कामुक आनंद मिलने लगता है

मालती जल्दी से खुद को संभालती है और.. उस टॉवल से सबसे पहले अपनी जाँघों पे बहे कॉमर्स को साफ़ करती है और वापस से उस गाड़े वीर्य को देखती है जो टॉवल में लगा हुआ था फिर न जाने क्यू hi उसके अधरों पे मुस्कान खिल उठाई है और वो उसी हालत में उस टॉवल को अपने जिस्म पे बंधा सुरु कर देती है, पर ये किया ?

टॉवल तोह उसकी सोच से भी ज्यादा छोटी थी.. और उसे बस एक hi बार सरीर पे लपेटा जा सकता था जिसके चलते उसके खुल जाने का दर कई गुना बाद गया था, पर इस समय और कोई रास्ता hi कहा था इसलिए उसे अभी ऐसी टॉवल से काम चलना था वो न जाने क्यू जान क उस वीर्य रास वाले hi हिस्से को अपनी चूचियों पे रखती है वैसे भी टॉवल में सबसे ज्यादा वीर्य की मात्रा ऊपरी हिस्से में hi थी.. जिसके चलते उसे एक गरम एहसास मिलता है और एक बार फिर से उसकी योनि में कॉमर्स की अति होने लगती है और फिर धीरे से उसे अपने हाथों क नीचे बांध लेती है और जब खुद को देखती है तोह पानी पानी हो जाती है ककी उस टॉवल का कोई फायदा hi नहीं था उसकी काली काली झांटें पूरी तरह बहार थी इसलिए जल्दी से टॉवल को हल्का नीचे करती है उन कामुक झांटों को छुपाने क लिए तोह अब उससे बड़ी मुश्किल सामने थी.. उसकी दोनों चूचिया नंगी हो चुकी थी मालती बुरी तरह फास चुकी थी की तभी बहार से सोनू की आवाज़ फिर से आती है

"निकलो न चची.. कितना समय लगेगा ठण्ड लग रही है.."

मालती झुंझुला सी जाती है, मन तोह करता है उसे डाट क कहे की तूने जो हरकत की है उसके लिए एक थप्पड़ लागू आके.. पर उसकी कामुकता उसे ऐसा कुछ करने नहीं देती, इसलिए मालती धीरे से इतना hi कहती है

"आयी……."

मालती जल्दी से उस टॉवल को किसी मध्य रस्ते पे लाने की कोशिश में लग जाती है और इतने छोटी सी टॉवल क साथ वो बस एक hi निष्कर्ष पे पहुंची थी.. जहा अब उसकी काली काली झांटें हलकी सी hi नज़र आ रही पर चूचिया थोड़ी धक् गयी थी पर सिर्फ इतनी की णीप्पस क चारो और का काला ठप्पा हल्का हल्का बहार नज़र आ रहा था, मालती जब खुद को ऐसे देखती है तोह वो खुद hi शर्म से लाल हो जाती है पर और कोई रास्ता भी नहीं था..

पर सबसे बड़ी चीज़ जिसपे वो धियान नहीं दे पायी थी वो उसकी गांड जो पूरी तरह hi नंगी थी इसमें उसकी भी गलती नहीं थी ककी उसका पूरा धियान तोह बस अपनी छूट और चूचियों को छुपाने पे hi लगा हुआ था

इधर सोनू थोड़ा डरा हुआ बहार अपनी मंझली चची का इंतज़ार कर रहा था.. उसे अपने वीर्य वाली हरकत क लिए दर तोह लग रहा था पर साथ hi साथ ये सोच क की उसकी चची पे वो टॉवल कैसी लगेगी और ये सोच क एक बार फिर से उसका लुंड तन चूका था

तभी धीरे से दरवाजा खुलता है..


कंटिन्यू... 👇
 
सोनू को ऐसा लगता है की उस दरवाजे क खुलते hi एक गरम हवा क झौंका उसके चेहरे से आके टकराया हो और जैसे hi वो बहार आती हुई अपनी खूबसूरत मालती चची को देखता है तोह मुंह hi खुलता चला जाता है.. वो बेचारा तोह ये तय नहीं कर पाटा की देख किया



अपनी खूबसूरत चची का सबसे हसीं चेहरा.. या टॉवल से लगभग पूरी बहार नज़र आती उनकी विशाल कामुक चूचिया और निप्पल्स क चारो और का वो काला घेरा.. या फिर टॉवल क नीचे का वो हिस्सा जहा से उनकी काली काली कामुक झांटें हलकी हलकी बहार आते हुए उसे अपनी और खींच रही थी

"Uffffffffffff.. चची आप कितनी खूबसूरत हो.."

सोनू क मुंह से न जाने कैसे ये निकल hi पड़ता है वो भी तेज़ आवाज़ में.. जिसके चलते मालती पानी पानी हो जाती है ऐसा लगता है जैसे वो पूरी नंगी कड़ी हो अपने जवान होते भतीजे क सामने

यहाँ मालती को बारिश क बीच चलती ठंडी हवा का झौंका अपने लगभग नंगे जिस्म पे तेज़ी से महसूस हो रहा था, वो बेचारी तोह बस शर्म से लाल होती जा रही थी पर ऐसे एक जवान लड़के को अपनी और देखना और उसके मुख से इतनी खूबसूरत तारीफ सुनकर उसका चेहरा भी एक पल क लिए लाल पद गया था, वो जल्दी से खुद पे काबू रखते हुए धीरे से कहती है

"वहां क्या खड़ा hai…jaldi से इधर आ.. वर्ण भीग जाउंगी.."

मालती क मुख से निकलने वाले एक एक सब्द उसके जिस्म को और ज्यादा गरम करने लगे थे और बारिश की बंधे उसके जिस्म पे पड़ते हुए उसकी लगभग नंगी चूचियों पे रुकते हुए धीरे धीरे चूचियों की पूरी नंगी घाटी की और बहना सुरु हो गयी थी.. तभी सोनू को जैसे होश आता है और लपक क छाता लेके मालती क पास पहुंच जाता है और उनके सर पे कर लेता है पर उसका किया जहा उसकी नज़रें उसकी चची क यौवन से हैट hi नहीं रही थी

मालती- (ऐसे अपने लगभग नंगे सरीर को अपने जवान बेटे सामान भतीजे द्वारा निहारने पे उसे बहुत hi कामुक एहसास मिल रहा था) चलेगा.. या यही खड़े रहना है..

सोनू को जैसे होश आता है और अपनी नज़रों को जल्दी से हटा लेता, वैसे ऐसी खूबसूरती और ऐसे जिस्म से नज़रें हटाना कोई आसान काम तोह नहीं था.. पर फिर भी उसके मुख से ये बात निकल hi पड़ती है

"चची कितनी अछि खुसबू आ रही है आपसे.."

सोनू ये पहला कदम बढ़ाते हुए धीरे से कहता है.. जिसे सुनकर मालती का चेहरा शर्म से लाल हो जाता है और छूट में एक ज़ोर की गुदगुदी सी दौड़ पड़ती है

दोनों hi धीरे धीरे अब घर क अंदर की और कदम बड़ा चुके थे.. जहा एक कहते क नीचे दोनों होने क कारन उन्हें लगभग चिपक क चलने पे मजबूर होना पद रहा था, वैसे सोनू को तोह इसमें मज़ा hi आ रहा था पर मालती की योनि तोह पूरी पागल होती जा रही थी उसे ऐसा लग रहा था जैसे किसी भी पल उसकी योनि एक बार फिर से भरभरा क अपने कॉमर्स की वर्षा न करने लगे.. इसलिए वो अपना काबू बनाने की पूरी कोशिश कर रही थी पर लग नहीं रहा था वो इसमें सफल होगी

चलते हुए बार बार मालती को किनारे से अपनी चूचियों क ऊपरी नंगे हिस्से में उसके जवान होते भतीजे की ब्याह की रगड़ का एहसास मिल रहा था और ये भी लग रहा था जैसे सोनू ये जान क कर रहा हो जिसके चलते उसके मन में यही एक बात चल रही थी

'किया सच में.. में इतनी खूबसूरत हु.. की सोनू जैसा लड़का भी मुझसे दूर नहीं हो प् रहा है..'

तभी मालती थोड़ा तेज़ चलने की कोशिश करती है जिसकी बराबरी करने की जल्दी में सोनू की ब्याह जोर से मालती की टॉवल और उसकी नंगी चुकी क हिस्से से रगड़ जाती है

"आआआआअह्ह्ह… किया कर रहा है…….."

मालती को जैसे hi अपनी चुकी क ऊपरी हिस्से पे सोनू क हाथ की जोरदार रगड़ महसूस होती है उसका पूरा बदन कामुकता क चलते काँप उठता है, पर इसमें सोनू की गलती नहीं थी ककी उसने छाते को पकड़ा हुआ था इसलिए उसका हाथ ऊपर उठा हुआ था और साथ में चलने की जल्दी में उसका हाथ इतनी जोर से रगड़ गया था

सोनू- (बुरी तरह दर जाता है.. की कही चची उसपे ग़ुस्सा न हो जाये) वो.. चची.. मैं..

वो इतना hi बोल पता है की मालती आगे बोल देती है

"कोई बात नै बीटा.."

ये सुनते hi सोनू का पूरा दर हवा हो जाता है, अब तक उसने जो जो किया उसे लगता है चची ने सब भुला दिया.. और ये सोचते hi उसके लोअर में कैद उसका लुंड एक बार फिर से उस लोअर को पहाड़ क बहार आने को उतारू हो जाता है.. पर बाकि क रस्ते दोनों बिलकुल शांत hi रहते है पर सोनू की ब्याह अभी भी रह रह क मालती की चूचियों क ऊपरी हिस्से से रगड़ रही थी जिसके चलते मालती की योनि से धीरे धीरे कॉमर्स बहने लगा था, वैसे उसने कोशिश तोह पूरी की थी पर उसकी कामुकता उसपे पूरी तरह हावी हो रही थी

जल्दी hi सविता भौजाई वाला कमरा सामने आ चूका था जिसे देख क न जाने क्यू मालती को ाचा नहीं लगता.. उसे लगता है ये सफर इतनी जल्दी कैसे ख़तम हो गया.. पर वो जल्दी से अपने सर को झटक देती है.. वही सोनू भी सामने कमरे को देख क मन hi मन उदास हो चूका था ककी ये छोटा सा रास्ता उसकी जिंगदी का सबसे खूबसूरत सफर था



कंटिन्यू... 👇
 
कमरे क द्वार पे पहुंचते hi दोनों रुक गए थे.. जैसे दोनों hi नहीं चाहते थे की ये सफर ख़तम हो.. पर हर सफर को पूरा तोह होना hi होता है, मालती धीरे से मुस्कुरा क सोनू की और देखती है जो उसे hi निहार रहा था जिसके चलते मालती जल्दी से अपना चेहरा घुमा लेती है और लगभग भागते हुए कमरे में प्रवेश कर जाती है पर उसे नहीं पता था की इस पल में सोनू को उसकी नंगी गांड क दर्शन भी मिल गए थे जिसके चलते उसके लुंड क सुपडे से कॉमर्स की हलकी हलकी बुँदे निकल पड़ती है

"सच में सबसे खूबसूरत है.. मालती चची.."

ये सब्द इतने तेज़ थे की अंदर पहुंच चुकी मालती भी उन्हें सुन लेती है और उसका चेहरा शर्म से लाल हो उठता है.. वो धीरे से खुद से बोल पड़ती है

"सैतान कही का.."

यही वो पल भी था जब उसे फिर से अपनी दोनों चूचियों पे सोनू क गरम वीर्य क फिर से एहसास मिलने लगा था.. जिसके चलते उसकी योनि से कॉमर्स आखिर फिर से बह hi पड़ता है

"ये कैसी कामुकता है मेरी… कुछ भी समझ नहीं आ रहा है मुझे"

सोनू क लिए वह कुछ नहीं बचा था इसलिए वो मायुश होक अपने लुंड को एक बार जोर से मसल देता है और फिर वही घर क बहार छप्पर क नीचे बाद चलता है.. और यहाँ मालती जैसे hi अंदर पहुँचती है उसे सामने hi बिस्तर पे उसके सभी कपडे रखे हुए मिल जाते है जिसके बाद उसे अब पूरा यकीन था की सब कुछ सविता भौजाई ने जान क किया है वर्ण कपडे तोह यहाँ सामने hi रखे है.. (असल में सोनू क जाने क बाद सविता ने बीच में वापस आके वो कपडे वह निकल क रख दिए थे.. ये सब वो जान क मज़े लेने क लिए कर रही थी)

मालती कपड़ों की और आगे बढ़ती है तभी उसे एक पल क लिए वही सीसे पे उसकी नज़र पड़ती है तोह उसके बढ़ते हुए कदम मानो रुक से जाते है ककी उसे अपनी गांड की हलकी सी झलक नज़र आती है वो तुरंत hi सीसे क सामने कड़ी होक हलकी सी तिरछी होक खुद को सीसे में देखती है तोह उसका चेहरा ऐसे लाल पद जाता हिअ मानो किसी ने उसके चेहरे पे गुलाल माला हो

"बाप.. रे यानि सोनू ने ये भी देख लिया होगा.."

और ये सोचते hi एक बार फिर से उसका चेहरा लाल होता चला जाता है.. जिसमें शर्म और कामुकता दोनों का भरपूर संतुलन था

मालती जल्दी से अपने कपड़ों क पास पहुंच क सबसे पहले अपने जिस्म पे नाम मात्र की वो टॉवल को खींच क हटा देती है और अब उसकी नज़र अपनी चूचियों पे पड़ती है जहा उसके काले काले जामुन सामान चूचियों क निप्पल्स और उसके काले गैर पे गरम गरम सफ़ेद वीर्य लगा हुआ था जैसे किसी ने उसकी चूचियों पे अपनी ताज़ी मलाई लगाई हो.. मालती को न जाने किया होता है क्यू उसके अंदर कामुकता की इतनी भीसाद लहर उठती है की वो उसी हालत में नंगी कड़ी हुई अपने दोनों हाथों को अपनी चूचियों पे रख क अपने निप्पल्स पे लाती है और धीरे धीरे उस गाडी सोनू की मलाई को अपने पुरे स्तन पे पियर से मालिश सी करने लगती है.. वो अपनी इस खुद की हरकत से जैसे पागल होती जा रही थी और योनि का हाल तोह ऐसा था जैसे अगर उसपे गलती से भी हाथ लगा दिया गया तोह वो भरभरा क बहना सुरु हो जायेगा, पर उसके इस रंग में भांग डालने का कार्य उस आवाज़ ने किया जो उसके पीछे से आती है

"जरा भी शर्म नहीं है किया.. ऐसे nangi-pungi कड़ी है.. अगर घर का कोई मर्द यहाँ आ गया तोह जानती है न क्या करेगा… वो तेरे साथ.. ?"

मालती जल्दी से डरते हुए पीछे मुड़ती है तोह उसके सामने उसकी बड़की भौजाई कड़ी मुस्कुरा रही थी, सविता ने इस समय पूरी अकड़ से अपने दोनों हाथों को अपनी कमर पे रखा हुआ था.. वो तोह ाचा था की मालती सोनू क वीर्य को अपनी पूरी चूचियों पे अचे से मॉल चुकी थी वर्ण सायद उस मलाई को भी देख लेती

"मैं.. वो भौजाई.. कपडे hi.. पहनने जा रही थी.."

मालती लगभग हकलाते हुए अपनी बात कहती है

सविता- (अपनी हसी छुपाते हुए) है तोह पेहेन न.. वर्ण कही सत्यम आ गया तोह.. बेचारा तोह पागल hi हो जायेगा.. अपनी चची को ऐसे देख क

सविता क मुख से सत्यम की बात सुनते hi, मालती ऐसे पानी पानी हो जाती है जैसे किसी ने उसे बीच बाजार चुड़ते हुए पकड़ लिया हो.. उसके मुख से तोह सब्द hi बहार नहीं आ पते आखिर वो बोलती भी किया, वो जिस जवान लड़के से आज 3 बार चूड़ी थी उसकी माँ थी सामने

सविता- (फिर से मज़े लेते हुए.. अपने होंठों पे अपनी जीभ फिरते हुए) अब कड़ी किया है.. कपडे पहनने है या नहीं, वैसे भी तुझे ऐसे देख तोह मेरा भी मन करने लग रहा है

सविता की बात सुनते hi मालती एक बार फिर से paani-paani हो जाती है.. शर्म से चेहरा लाल पद जाता है जैसे किसी ने पुरे चेहरा को लाल रंग से रंग दिया हो, पर तभी सविता आगे बढ़कर मालती को अचे से ऊपर से नीचे तक देखते हुए धीरे से अपना मुंह उसके कान क पास ले जेक अपनी कामुक आवाज़ में कहती है

"वैसे तेरी हालत कुछ अजीब सी लग रही है.. कुछ हुआ है किया.. ?"

मालती की तोह जैसे जान hi उसके सरीर से निकलने को हो रही थी, वो जल्दी से अपने एक हाथ को सीधा करके अपनी बड़ी बड़ी चूचियों को छुपाने की नाकाम सी कोहसिह करती है और अपने दूसरे हाथ का पंजा अपनी योनि पे रख लेती है, पर वो काफी नहीं था ककी उसके हाथ क पंजे से उसकी काली काली झांटें पूरी hi बहार थी

"किया.. किया होगा.. कुछ.. कुछ नहीं हुआ है.. वो मैं.. तोह बस… बस मंदिर गयी.. गयी.. थी.."

मालती अपनी बात कहते हुए सविता क सामने ऐसे काँप रही थी जैसे कोई बची गलती करने क बाद अपनी माँ से डर्टी है

सविता मुस्कुराते हुए थोड़ा से पीछे होते हुए कहती है

"चल तू कह रही है तोह मान लेती है.. वैसे तू जो चाहे मुझे बता सकती है, मैं बुरा नहीं मानूगी"

फिर एक पल रुकने क बाद आगे कहती है

"किया पता कभी दोनों मिलकर एकसाथ मंदिर जाने का सोचे.."

सविता अपनी बात कहते हुए है पड़ती है और पलट क बहार चलने क लिए मुद जाती है, वही माटी को तोह समझ hi नहीं आता की उसने अभी जो सुना है उसका किया मतलब निकले

सविता बहार निकलने को hi होती है की तभी वापस पलट पड़ती है और अब भी अपनी इज्जत को छुपाने की कोशिश करती हुई मालती की और देखती है और मुस्कुरा क कहती है

"कुछ खायेगी.. वैसे सतयम ने जरूर कुछ न कुछ खाने को दिया hi होगा.. और किया पता चूसने को भी.."

सविता का हर एक सब्द मालती का गाला सूखा रहा था, वो किसी अपराधी की तरह बस कांपते हुए नंगी कड़ी थी.. वो बड़ी मुश्किल से शर्म से लाल अपने चेहरे को 'न' में हिलाते हुए बस मन कर देती है

सविता मुस्कुराते हुए

"चल ठीक है.. बहुत थक गयी होगी, पता नहीं कितनी बार म्हणत करि होगी.. थोड़ा सो जा आराम मिलेगा"

सविता की बात सुनकर मालती बस 'है' में सर हिल क रह जाती है और फिर सविता बहार निकल जाती है, उसके जाते hi मालती जल्दी जल्दी कपडे पहनती है और अभी उसकी हालत ऐसी नहीं थी की वो किसी का भी सामना कर पाती इसलिए उसे सविता का hi सुझाव ाचा लगता है और वो वही बिस्तर पे रज़ाई अपने गले तक चढ़ा क लेत जाट है.. जहा थकन की अधिकता और उसके बाद स्नान क सुकून क चलते उसे जल्दी hi नींद आ जाती है

जिसके बाद उसकी नांद सीधा शाम को 7 बजे hi खुलती है.. और अब बारिश पूरी तरह बंद हो चुकी थी

*** आशा है ये अपडेट आप सभी को पसंद आये.. कुछ ज्यादा hi म्हणत लग गयी इसमें ***

🙏🙏🙏🙏



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Chapter 👉 कामुक वर्षा..

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नंगी पुंगी.. मालती

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Adultery - मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #02 Running

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