Adultery मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #02 Running - Page 21 - SexBaba
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Adultery मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #02 Running

प्रीवियस अपडेट ों पेज No. 📃 481-482



अपडेट #21

Chapter 👉 कामुक वर्षा..

सन 🖼️ #06

हर्षिता की शरारत

नोट👉 अपडेट #21, सन 01 से आगे..

हर्षिता वापस सफाई क लिए शीला की और आगे बढ़ते हुए जब मोनू वाले कमरे क समीप से होक गुजरती है और अंदर जो देखती है उसने उसके पुरे सरीर में कामुकता की लहर सी दौड़ा दी थी, वही कामुकता की ये बौछार इतने पे hi कहा रुकी ककी आज तोह उसने अपने जवान हो चुके बड़े भतीजे यानि 'सत्तू' को एक बार फिर से घर की एकलौती शादीशुदा बेटी यानि अपनी बुआ 'शीला' क यौवन क दर्शन करते हुए भी तोह पकड़ा था.. और इन सभी चीज़ों ने उसके अंदर जो आग भड़काई थी वो च क भी उसकी तपिश से बच नहीं प् रही थी

पर फिर हर्षिता खुद पे पूरा काबू बनाये हुए वापस उसी कमरे में अंदर पहुंच चुकी थी जहा अब भी उसकी नानन्द यानि शीला अपने काम में पूरी मेहनत से लगी पड़ी थी, जहा अंदर आते hi हर्षिता क सामने जो नज़ारा था उसे देख क किसी मर्द का औजार तोह खड़ा होता hi होता.. पर इस समय तोह हर्षिता जैसी कामुक नारी की योनि में भी खुजली का कारन बन गयी थी दूध जैसी गोरी 'शीला' का वो भीगा हुआ यौवन

पानी की मोती बूँदें अब भी छप्पर से होती हुई जब जमीन पे गिरती तोह हर बार एक नया संगीत बना रही थी और साथ hi वो बूँदें पुरे वातावरण में भरी हुई ठण्ड को और ज्यादा बढ़ती जा रही थी

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हर्षिता इस समय उस सालों से बंद पड़े कमरे में अंदर प्रवेश कर चुकी थी पर ऐसा नज़ारा देख क उसके पैरों ने मानो अपनी गति hi खो दी थी, पर तभी शीला को वह किसी क आने का आभास हो जाता है और वो घूमती हुई अपना सर उठा क हर्षिता को देखती है तोह थोड़ा मुंह बना क सिखयात भरे स्वर में कहती है

"किया भाभी कहा बार बार भाग जा रही हो, अभी देखो न कितना सारा काम पड़ा है"

फिर वो ऊपर चाट और कोनों में लगे जालों की और इशारा करते हुए कहती है

"ये जले हमसे साफ़ होंगे भला.. वह तक तोह हमारे हाथ भी नहीं पहुंचेंगे.. ?"

पर शीला अपने सवाल का जवाब भी खुद hi दे देती है, वो भी बिना रुके हुए

"सत्तू से जले साफ़ करवा लेंगे.. है न भाभी?"

हर्षिता बस धीरे से 'है' में अपना सर हिला देती है, असल में उसकी नज़रें तोह उस यौवन पे अटकी पड़ी थी जिसके लिए घर का सबसे जवान लड़का भी आज कल पागल हुआ पड़ा था.. पर शीला की बात सुनकर न जाने क्यों हर्षिता का सर जहा 'है' में हिला था वही उसके अधरों में मुस्कान भी खिल उठी थी और वो मुस्कुरा क धीरे से कहती है

"है सत्तू सही रहेगा.. वैसे भी वो तेरी कोई बात नहीं ताल सकता"

शीला को सही से मानो समझ नहीं आता, वो अपने काम में लगी हुई अपनी बात कहती है

"मतलब भाभी.. उसने आपकी कोई बात नहीं मणि किया ?

..मुझे बताओ कान खींचती हु उसके ?"

शीला हस्ते हुए अपनी बात कहती है

जिसपे हर्षिता भी वही एक और पानी की बाल्टी क पास बैठे हुए उसमें से जग भर क पानी निकलती है और फर्श पे दाल क वही पड़े अपने वाले झाड़ू से फर्श को रगड़ रगड़ क साफ़ करते हुए मुस्कुरा क कहती है

"मेरी चोरर मैं तोह अपनी बात उससे आज नहीं तोह कल मनवा hi लुंगी.. पर है तेरी बात तोह अलग hi है"

असल में हर्षिता जब अंदर आयी थी उस समय शीला क एक हाथ में बड़ा सा झाड़ू थमा हुआ था और उसके पास hi एक छोटी सी बाल्टी राखी हुई थी, पर जो बात अलग थी वो ये की उस समय उसका मुंह दूसरी और था यानि शीला की कामुक गांड हर्षिता की तरह थी और जिस बात ने 'वीरू की पत्नी' की धड़कन अचानक से तेज़ कर दी थी वो थी शीला की पूरी भीगी हुई सलवार को पीछे से इतनी पारदर्शी हो चुकी थी उसने द्वारा अंदर पहनी हुई लाल पेंटी पूरी तरह नज़र आ रही थी, पर इससे पहले hi हर्षिता ऐसा कामुक नज़ारा और अचे से देख पाती शीला काम करते हुए उसकी और मुद जाती है और फिर पता hi है वो किया सिखयात करते हुए किया कहती है

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शीला अपनी भाभी की बात सुनकर थोड़ी उलझन से भरी हुई आवाज़ में कहती है

"मेरी बात अलग है.. वो कैसे भाभी ?"

हर्षिता उसकी बात पे मुस्कुरा पड़ती है और फिर एक पल रुकने क बात कहती है

"रहने दे वर्ण तू मुझपे hi ग़ुस्सा करेगी"

हर्षिता की बात सुनकर शीला है सी पड़ती है और अपने पास वाली बाल्टी क अंदर से जग भर क पानी निकालती है और अपने आगे वाली फर्श पे दाल देती है, और फिर अपने दूसरे हाथ में थामे झाड़ू से उस जगह को ragad-ragad कर साफ़ करते हुए कहती है

"कैसी बात करती हो भाभी.. भला मैं कभी अपनी पियरी भाभी ने नज़र हो सकती हु किया.. ?

.. बताओ न किया बात है ?"

हर्षिता फर्श की सफाई करते हुए धीरे धीरे आगे की और खिसकते हुए अपनी बात कहती है

"सोच ले फिर मुझे उल्टा सीधा न बोलना"

शीला जिसके चेहरे पे पसीने की नन्ही नन्ही बूंदें नज़र आ रही थी.. साथ hi साथ उसके कपडे अब लगभग पूरी तरह भीग चुके थे, इतने की पूरा जिस्म धीरे धीरे किसी दुपट्टे में लिप्त हुआ सा प्रतीत होना सुरु हो चूका था, वो अपनी भाभी की बात सुनकर पुरे बरोशे से अपनी बात कहती है

"मैं आपको उल्टा सीधा बोलने क बारे में सोच भी नहीं सकती भाभी.. अब बताओ भी, मेरी बात कैसे अलग है ?"

हर्षिता की इस छोटी सी बात ने शीला को किसी नन्ही बच्ची जैसे उत्सुकता से भर दिया था, आखिर बात उसके सबसे पियरे भतीजे सत्तू की थी जिसे लेके हमेशा से उसका अंदर ज्यादा hi लाड पियर था.. हर्षिता कुछ पलों तक बस मुस्कुराती है और अपने काम में लगी रहती है इधर शीला बार बार काम करते हुए उसे hi देख रही थी की वो अब कुछ कहेगी, पर हर्षिता तोह उसके मन की इस्तिथि का भरपूर आनंद लेती जा रही थी

जल्दी hi हर्षिता काम करते हुए शीला क पीछे पहुंच चुकी थी, जहा शीला अब भी वैसे भी आगे सरकते हुए दरवाजे की और बढ़ती हुई फर्श की सफाई में लगी पड़ी थी.. इधर हर्षिता जैसे hi शीला क पीछे पहुँचती है एक बार फिर से उसे शीला की भीगी हुई सलवार नज़र आती है जहा अंदर पहनी हुई लाल पेंटी अब पूरी तरह नज़र आ रही थी, वैसे इसका एक कारन ये भी था की शीला ने अपनी कमीज को पानी में भीगने से बचने क लिए अपने घुटनो क बीच दबा राखी थी जिसके चलते उसकी सलवार और उसने अंदर कैद गोरी गांड पूरी तरह खुल गयी थी

तभी शीला फर्श को जोर से रगड़ रगड़ क साफ़ करते हुए हल्का से आगे की और झुक सी जाती है जिसके चलते उसकी गोरी गांड पूरी तरह उसकी सावली सलोनी भाभी हर्षिता क आँखों क आगे थोड़ी सी ऊपर की और उठ जाती है.. और ऐसा नज़ारा देख क बेचारी हर्षिता का rom-rom कामुकता से भर उठा था, तभी न जाने उसके मन में किया आता है की वो मुस्कुरा पड़ती है और धीरे से अपना काम चोर क अपनी एक ऊँगली मुंह में रख क उसे ऐसे चुस्ती है जैसे उसमें सेहद लगा रखा हो

फिर जब वो ऊँगली उसके मुंह से बहार आती है तोह वो पूरी तरह उसके थूक से भीगी हुई थी.. फिर वो अपने शरारत भरे चेहरे और अपने होंठों पे अपनी चमक बढ़ती हुई धीरे से वो ऊँगली बिलकुल सीढ़ी करती है और एक hi पल में पूरी गति से शीला की सलवार क बीच वाली दरार जो इस समय पूरी खुली हुई थी उसमें घुसा देती है..

शीला बुरी तरह तड़प पड़ती है ककी उसकी पतली और पूरी तरह पारदर्शी सलवार में हर्षिता की ऊँगली ने बिलकुल सही जगह निशाना ढूंढा था ककी अगले hi पल हर्षिता को अपनी ऊँगली किसी गरम छेद में अंदर जाती हुई महसूस होती है पर वो ज्यादा अंदर नहीं जा पाती ककी सलवार क कपडे क साथ साथ पेंटी का पतला कपडे भी उस छेद की रक्षा में ऐडा हुआ था

वही शीला बुरी तरह काँप सी पड़ी थी, ककी उसे ऐसा प्रतीत होता है जिसे कोई गीली चीज़ उसकी सलवार और पेंटी क ऊपर से hi उसके गांड क छेद क अंदर प्रवेश कर गयी हो

"आआआह्ह्ह्ह..... Maaaaaaaaaaaaaaaaaaa..... माआरररररररर...... गयीईइ............"

शीला जल्दी से हड़बड़ा क आगे की और खिसक जाती है, वो भी इतनी तेज़ की वो बस गिरते गिरते hi बची थी.. वही उसकी हालत और चीख पे हर्षिता वही पूरी तरह फ़ैल क बैठ जाती है और खिलखिलाहट से भर उठती है

शीला एक पल क लिए तोह समझ hi नहीं पाती की आखिर किया हुआ है, पर अपनी भाभी को ऐसे जोर जोर से हस्ते हुए देख क उसे समझते दिएर नहीं लगता की अभी अभी उसके साथ किया हुआ था.. वो तोह शीला दर्द से चिल्लाते हुए जल्दी से आगे खिसक गयी थी वर्ण अब भी उसकी भाभी की वो ऊँगली न जाने कहा तक अंदर प्रवेश कर चुकी होती, शीला बुरा क मुंह मन क

"किया भाभी.. आप भी पूरी पागल हो, किया उलटी सीधी हरकतें करती रहती हो"

शीला की बात सुनकर हर्षिता अब भी हस्ते हुए कहती है

"अरे अब तू ऐसी मस्तानी गांड लेके घूमेगी तोह कोई भी अंदर घुसना चाहेगा न.. ाचा है वो तोह में थी तोह बस ऊँगली डाली है

..कही सत्तू होता तोह... ?"

हर्षिता को आगे कुछ बोलने की जरुरत hi नहीं पड़ती पर शीला समझ जाती है की आगे क सब्द किया हो सकते है.. और जो सब्द उसके दिमाग में आते है उसने उसके पुरे अस्तित्व पे प्रहार सा कर दिया था

"किया भाभी जो भी मन में आता है बोल देती हो.. सत्तू कभी भी ऐसा कुछ नहीं कर सकता

आपको पता नहीं की वो कितना ाचा लड़का है, मेरा कितना सम्मान करता है"

हर्षिता उसकी बात सुनकर बस मन hi मन है पड़ती है और खुद से कहती है

'अब तुझे कैसे बताऊ मेरी पियरी नानन्द.. की वही सत्तू सम्मान क अलावा भी बहुत कुछ करना चाहता है तेरे साथ'

दोनों एक बार फिर से अपने अपने कार्य में लग जाते है की तभी हर्षिता आज पुरे दिन जो जो हुआ उस बारे में सोचने लगती है जहा उसकी योनि तब सबसे ज्यादा गीली होती है जब वो मोनू द्वारा सविता क लिए कहे गए उन शब्दों को याद करती है

"आआअह्ह्ह... हैईईई... साली.... मेरी रखेल हरामजादी.. कुटिया... बता भरवाएगी अपनी छूट को मेरे बीज से... आआआआहहहहह"

इन सब्दो में न जाने कैसी ताक़त थी की हर्षिता का बचा खुचा मन भी काम करने में लगने से मन कर देता है, वो धीरे से अपनी जगह से उठे हुए कहती है

"मैं बस 5 मं में आती हु..."

और इतने कहते hi वो बिना किसी बात को सुने दरवाजे से बहार निकलने hi वाली थी की तभी शीला क सब्द उसके कानो में पड़ते है

"भाभी आपने बताया नहीं.. सत्तू क लिए मेरी बात कैसे अलग है.. ?"

हर्षिता बस मुस्कुरा क रह जाती है और फिर एक पल क लिए कुछ सोचने क बाद कहती है

"1-2 दिन में खेत चलना मेरे साथ.. फिर पुरे प्रमाण क साथ बताउंगी भी और दिखाउंगी भी"

शीला को समझ नहीं अत की उसकी भाभी की इस बात का किया मतलब हुआ भला, पर अब वो आगे कोई सवाल नहीं करती.. पर हर्षिता क जाते hi उसके काम करते हुए हाथ अचानक से रुक से जाते है और वो अपनी भाभी की करि गयी हरकत को सोचते हुए खुद से कहती है

"किया यहाँ सत्तू होता और मुझे ऐसे देखता.. तोह किया सच में अपना दाल...."

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शीला आगे क सब्द भी नहीं बोल पाती ककी उसका पूरा सरीर ऐसे कैंप उठता है जैसे ठण्ड की रात में उसे नेहला क तेज़ हवा क बीच किसी खेत में पूरा नंगा खड़ा कर दिया गया हो

"छी.. हर्षिता भाभी ने मेरा भी दिमाग ख़राब कर दिया है"

शीला एक बार फिर से अपने सर को झटक क अपने कार्य में लग चुकी थी, पर ये पहली बार था जब उसने सत्तू क लिए ऐसा कुछ गलती से भी सोचा था या सायद हर्षिता ने अनजाने में उसे ऐसा सोचने पे मजबूर कर दिया था

इधर यहाँ मोनू अभी भी अपने बिस्तर पे लेता हुआ अपने जिस्म से आती हुई अपनी बड़ी माँ की खुसबू को महसूस कर रहा था जिसके चलते बार बार उसके लुंड में वैसा hi उछाल उमड़ जा रहा था जैसे पहली बार हुआ था जब उसकी बड़ी बड़ी चूचियों वाली बड़ी माँ ने पहली बार घर पे उसका लुंड अपने गरम मुंह में लिया था..

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मोनू धीरे से अपना एक हाथ रज़ाई क अंदर घुसता है जहा जल्दी hi उसका हाथ उसके जोशीले लुंड पे पहुंच चूका था और वो एक बार फिर से अपनी बड़ी माँ की छूट की गर्मी को याद करते हुए पहले से hi खड़े और अकड़ क फिर से किसी योनि की याद में तने हुए अपने लुंड को सहलाते हुए खुद से कहता है

"साले तुझे आज इतनी गरम छूट मिल चुकी थी तब भी सर उठा रहा है, न खुद आराम कर रहा है न मुझे करने दे रहा है.."

मोनू जबसे होश में आया है वो इस बात को लेके सोचने पे बार बार मजबूर हो रहा है की आज कल अचानक से उसके लुंड में ऐसा जोश कैसे आ रहा है

पहले भी उसका लुंड खड़ा होता था पर तब ऐसी अकड़ नहीं होती थी क्युकी अब तोह हाल कुछ ऐसा होता जा रहा है जैसे उसका लुंड सर झुकाने क लिए तैयार hi नहीं होना च रहा है.. मोनू अपना हाथ अपने मोठे लाल सुपडे पे ले जाते हुए उसके छेद और उसकी गर्माहट महसूस करते हुए उसपे अपनी उंगलिया फिरते हुए खुद से आगे कहता है

"साले तुझे हो किया गया है, अब किया फिर से छूट चाहिए.. ?"

तभी मोनू को उसके लुंड पे उछलती हुई उसकी बड़ी माँ क वो सब्द याद आ जाते है जिसके चलते एक hi पल में उसके मोठे सुपडे पे कामुकता क चिपचिपे आंसू निकल आते है.. और उसके कानो में वही सब्द गूंजने लगते है जब उसकी बड़ी माँ अपना पूरा दम लगा क जोर से अपनी गांड उठा क अपनी योनि को उसके जवान और जोशीले लुंड क मुहाने तक बहार लाती और फिर पूरी ताक़त से वापस नीचे बैठते हुए उसके लुंड को पूरा निगल ले रही थी

"Aaaaaaaaaaahhhh… कुट्ट्टीीीीे… leeeeeeeeee… छोड़… अपनी इस रखेल को…. पहाड़ मेरी छूट.. कुट्ट्टीीी…. दिखा अपने लुंड का दम… छोड़.. जोर से छोड़.. छोड़ इस चिनार को.. फड़ड़ड़ड़… क रख दे.. मेरी छूट…. आआआआहहहहह…."

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मोनू क कानो में ये सब्द किसी कोयल की मधुर आवाज़ जैसे गूंज रहे थे की तभी अचानक से दरवाजा खुलता है और अंदर प्रवेश करने वाली उसकी सलोनी सूरत की मलिका 'हर्षिता' चची थी.. मोनू जल्दी से अपने लुंड से अपना हाथ तोह खींच लेता है पर उस बड़े से तम्बू का किया करे जो उस रज़ाई में नज़र आ रहा था

हर्षिता भी जैसे hi अंदर प्रवेश करती है उसकी नज़र एक पल क लिए उसी कमरे में कोने में जल्दी उस अंगेठी पे पड़ती है जिसकी लाल रौशनी से पूरा कमरा न सिर्फ गरम था बल्कि अंदर प्रवेश करते hi उसे एक भीनी भीनी सुगंध भी मिलती है जिसे वो किया कोई भी औरत अचे से पहचान सकती है.. ककी उस सुगंध में वीर्य का नमकीन स्वाद था और उसमें 2 जिस्म क मिले हुए पसीने की कामुक खुसबू भी थी

हर्षिता जैसे hi अंगेठी से अपनी नज़र हटा क सामने बिस्तर पे मोनू की और देखती है तोह उसके अधरों पे पहले से विराजमान मुस्कान और ज्यादा गहरी होती चली जाती है ककी वो जैसे hi मोनू की दिशा में अपना चेहरा घूमती है उसे मोनू की छड़ी हुई आँखें और रज़ाई क अंदर उसका हिलता हुआ हाथ hi नज़र आता है.. उसपे उसका सक तब और पक्का हो जाता है जब मोनू जैसे hi उसे देखता है वो अपना हाथ रज़ाई क बहार खींच लेता है जिसे देख क हर्षिता मुस्कुराती हुई उसकी और बाद चलती है और उसके ठीक समीप जेक कड़ी हो जाती है

"किया हुआ बीटा.. तेरे चेहरे पे ये पसीना कैसे, सब ठीक है न.. ?"

मोनू क चेहरा का ये पसीना उसकी बड़ी माँ की बड़ी बड़ी चूचियों को याद करने क कारन आया था उसके उसका हाथ जो उसके दहकते हुए लुंड पे चल रहा था इन दोनों चीज़ों ने ऐसी ठण्ड में भी उसके चेहरे को पसीने से भर दिया था पर ये बात उसे खुद उसकी सलोनी चची क बताने क बाद hi पता चली थी.. मोनू जल्दी से अपनी इस्तिथि को सँभालते हुए किसी डरे हुए बचे सामान अपनी बात कहता है

"नहीं.. नहीं.. कहा चची.. कहा.. ?..

…मुझे कहा पसीना आ रहा है.. ?"

हर्षिता उसकी बात सुनकर मुस्कुरा उठती है सायद उसे मोनू का ऐसे डरना अनंदीद कर रहा था, वो मोनू क ठीक सर क समीप आ जाती है और एक पल क लिए उसे देखती है तोह उसे वो दृश्य याद आता है जो उसने वापसी में जाते हुए खिड़की से देखा था जहा..

उस समय हर्षिता बाल्टी उठाये हुए आगे बढ़ती जा रही की तभी मोनू वाले कमरे क पास से गुजरते समय अनायाश hi उसकी नज़रें कमरे क अंदर घूम जाती है, और उस छोटी सी खिड़की क कपड़ क बीच से उसे जो दीखता है उसके चलते उसके हाथ से बाल्टी बस गिरते गिरते बची थी.. पर अंदर चलता वो नज़ारा कुछ ऐसा था की एक hi पल में उसके हाथों में कामुकता की कंपकपाहट भर आयी थी की.. वो जल्दी से बाल्टी को नीचे रखती है और अंदर चलते हुए उस दृस्य को देखने पे मजबूर हो गयी थी साथ hi उसके जवान भतीजे 'मोनू' क उन शब्दों ने उसके पुरे अस्तित्व को कंपकपी से भर दिया था

"आआअह्ह्ह... हैईईई... साली.... मेरी रखेल हरामजादी.. कुटिया... बता भरवाएगी अपनी छूट को मेरे बीज से... आआआआहहहहह"

ये वो सब्द थे जो उसका जवान इतनी दिनों से बीमारी क चलते बिस्तर पे पड़ा हुआ भतीजे अपनी तै जी यानि घर से सबसे बड़ी बहु की छूट में अपना लुंड डाले हुए बोल रहा था

एक पल क लिए तोह हर्षिता को अपने कानो पे यकीन hi नहीं होता की उसने जो सुना है वो सत्य है, पर फिर जब वो अपने जवान भतीजे क ऊपर बैठी हुई तेज़ी से उछलती अपनी बड़की भावजी को देखती है और उसकी हालत पहले से भी ज्यादा बुरी हो जाती है वो ये यकीन hi नहीं कर प् रही थी मोनू जैसा अभी अभी जवान हुआ लड़का सविता जैसी भरी भरकम औरत की ऐसी हालत बना सकता है..


फिर जब उसे मोनू क वो बीज वाले सब्द याद आते है तोहि हर्षिता की बुर क होंठ बुरी तरह फड़फड़ाने पे मजदुर हो जाते है.. हर्षिता उस सोच से वापस वर्तमान में लौटते हुए मोनू क पसीने से भरे चेहरे को एक बार फिर देखती है और फिर उसके चेहरे से होती हुई उसकी नज़रें नीचे की और सरकने लगती है जहा वो जब रज़ाई क ऊपर से hi उसके पैरों वाले हिस्से पे आती है तोह उसे फिर से वही बड़ा सा तम्बू नज़र आता है और उसे देखते हुए मुस्कुरा पड़ती है और मन hi मन खुद से कहती है

'हैरानी की बात है.. बड़की भौजाई को ऐसे छोड़ने क बाद भी इसका खड़ा हो रहा है'

पर फिर वो अपने शब्दों में सवार भरते हुए उस तम्बू की और इशारा करते हुए कहती है

"ये किया है.. ?,

रज़ाई क अंदर कुछ रखा है किया तूने.. ?"

मोनू जैसे hi ये सुनता है उसका पूरा बदन काँप उठता है और बुरी तरह डरते हुए कहता है

"नहीं… नहीं.. चची… कुछ… कुछ नहीं है.. वो.."

हर्षिता उसकी हड़बड़ाहट और उसकी हालत पे मंद मंद मुस्कुरा उठती है और फिर उसका चेहरा देखते हुए धीरे से कहती है

"अरे इतना दर क्यों रहा है.. मैं कोनसा हाथ से पकड़ लुंगी.."

मोनू को समझ नहीं आता की उसकी चची आखिर किया कहना च रही है, पर इस समय तोह उसकी हालत ऐसी नहीं थी की वो कुछ भी बोल पता.. वो बस अपना सूखा हुआ गाला अपने hi थूक से गीला करने की चैस्ता करता रहता है

पर हर्षिता इतनी आसानी से उसका पीछे कहा चोर्ने वाली थी

"तू सच में ठीक है न.. इतना पसीना क्यों आ रहा है तुझे.."

और ये कहती हुए उसके सर क बिलकुल समीप कड़ी हुई वो पूरी तरह झुक सी जाती है और अब उसका चेहरा अपनी गरम साँसे चोरते हुए उसके बालों क ऊपर था वो बिना रुके अपना एक हाथ आगे बड़ा क उसके बालोने में फिरते हुए कहती है..

"कह रहा है की पसीना नहीं है.. पुरे बाल तक भीगे हुए है ?"

पर बेचारे मोनू का जो पसीना अब उसके लुंड से निकलने को उतारू हो चूका था उसका किया.. ककी हर्षिता जिस प्रकार से झुकी हुई थी उस कारन उसके ब्लाउज क बड़े गले से नज़र आती उसकी चूचियों क बीच की गहरी घाटी और वो उसके दोनों कैसे यौवन ठीक मोनू क होंठों क ऊपर लटक रहे थे, हाल कुछ ऐसा था की अगर मोनू जरा सा भी अपना सर ऊपर उठा ले तोह अपनी जीभ की नोक को उन गहरी घाटियों क बीच चला सकता था.. मोनू की तोह जैसे सांस hi अटक गयी थी वो बेचारा सांस तक लेना भूल सा गया था, वही हर्षिता अचे से उसके बालों में अपना हाथ फिरने क बाद सीधी खड़ी होती और लाल पद चुके चेहरा को देखते हुए मन hi मन है पड़ती है और फिर मुस्कुरा क कहती है

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"अरे तुझे किया हो गया.. चेहरा तोह ऐसे लाल हो गया है जैसे मिर्ची खा ली हो"

मोनू जल्दी hi अपने पूरी तरह सुख चुके गले को तर करते हुए कहता है

"नहीं नहीं.. वो… चची.. बस.. वो गर्मी ज्यादा है न.."

हर्षिता को तोह जैसे ऐसी बात की प्रतीक्षा थी, वो रज़ाई का एक सिरा पकड़ते हुए कहती है

"ला फिर में रज़ाई हटा देती है.."

मोनू तोह बेचारा सूखे पत्ते सामान काँप पड़ा था, वो जल्दी से रज़ाई को दोनों हाथों से पकड़ क हकलाते हुए कहता है

"नहीं नहीं.. चची… ऐसे.. ऐसे… hi रहने दो… अब.. अब.. गर्मी.. गर्मी.. नहीं लग रही है.."

हर्षिता मुस्कुरा क हर पल का आनंद लेते हुए कहती है

"चल ठीक है.. बाकि अगर ज्यादा गर्मी लगे तोह मुझे बताना.. तेरी चची गर्मी निकलना भी जानती है.."

जवानी क उन्माद से भरा हुआ मोनू अब भी बात की गहरी को समझ नहीं पता, और हर्षिता वापस से अपनी मादक गांड को लहरती हुई वह से निकल जाती है ककी अपनी hi इस छोटी की कामुक हरकत से वो खुद hi पूरी गीली हो चुकी थी, और कॉमर्स उसकी साड़ी क अंदर उसकी योनि से बेहटा हुआ उसकी छोटी सी वीरू द्वारा लायी गयी उस अंग्रेजी बनवत वाली पेंटी से बेहटा हुआ उसकी जाँघों तक पहुंचने लगा था, पर वो दरवाजे से बहार निकलने से पहले एक अंतिम बार वापस रज़ाई में तने हुए उस बड़े से तम्बू को देख क धीरे से खुद से कह पड़ती है

"ेस्स्स्सस्स्ष्ह.. ये तोह मेरी गांड का छेद फैला देगा.. "

हर्षिता फिर वह और नहीं रूकती, ककी अभी शीला क साथ मिलकर उस कमरे की सफाई का कार्य पूरा नहीं हुआ था, वो तोह बस बीच में थोड़ा मोनू से मिलने और उसकी इस्तिथि का आनंद लेने चली आयी थी

करीब 15 मं बाद, वैसे इस समय दिन क 1 बज रहे होंगे…

** * **

नष्ट सन

👉 गांड का दर्द...

मिलता हु फ्राइडे (27-03-27) मॉर्निंग में


🙏🙏🙏🙏
 
🆕 अपडेट - पेज 📄 492

अपडेट #21

Chapter 👉 कामुक वर्षा..

सन 🖼️ #06

हर्षिता की शरारत


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भविष्य में कही.. आगे..



सलोनी सूरत वाली कामुक हर्षिता इस समय टूबवेल क पास hi एक सीसम क मोठे तने को पकडे हुए कड़ी थी.. उसका पूरा भीगा हुआ सरीर ठण्ड क चलते हौले हौले काँप रहा था, उसकी गेहुआ रंग की चमकती त्वचा पर पानी की उड़ती हुई बूँदें बार बार गिर रही थी और हर बून्द उसके सरीर पे रुकते हुए किसी मोती सामान आकर लेती जा रही थी

हर्षिता क दोनों पेअर इस समय टूबवेल से गिरते हुए पानी क चलते वह बने उस छोटे से तालाब जैसे गद्दे में भीग रहे थे, असल में वो पूरी भीगी हुई वह घुटनो तक पानी में झुक क कड़ी हुई थी और अपने दोनों हाथों को उसने पूरी मजबूती से उस मोठे पेड पे जमाये रखा था

वही पीछे उसकी बहार को निकली हुई सलोनी गांड क दोनों कामुक चूतड़ों के बीच वो मोटा लुंड घुसा हुआ था जो इस समय उसके गरम छेद के द्वार को अपने मोठे सुपडे से चुम रहा था.. जिस कारन हर्षिता की काली योनि पूरी तरह रास चोरते हुए कामुकता से काँप रही थी, पानी की तेज़ धार नीचे गिरने क बाद ऊपर बौछार क रूप में उड़ते हुए उसके सलोने यौवन पर जब पद रही थी तोह वो उसके निखार को और ज्यादा बढ़ती जा रही थी

इस समय 'वीरू की पत्नी' का पूरा सरीर पानी से भीगा हुआ था और उसके कारन हर्षिता haule-haule काँप भी रही थी, वो अपने दोनों हाथों को उसी पेड़ के मोठे तने पे जमाये हुए अपना चेहरा पीछे की और घूमती है और उस लुंड क मालिक को देखते हुए मन hi मन सोचने पे विवस हो जाती है


'मैंने कभी सोचा भी नहीं था… की सत्तू से पहले ये मेरी गांड का हक़दार बन जायेगा...'
 
नोटिस

मित्रों मैंने अगले अपडेट क लिए कल सुबह कहा था, पर आने वाला अपडेट मेरी सोच से ज्यादा बड़ा हो गया है, जिसे पूरी तरह फाइनल करने में थोड़ा समय लगेगा तोह अपडेट कल सुबह की जगह रात या सैटरडे मॉर्निंग में आएगा

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प्रीवियस अपडेट ों पेज No. 492



अपडेट #21

Chapter 👉 कामुक वर्षा..

सन 🖼️ #07

गांड का दर्द...

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✍️ सन 06 (लास्ट अपडेट) से आगे...

करीब 15 मं बाद, वैसे इस समय दिन क 1 बज रहे होंगे…

इस समय तक ज्यादातर लोग खाना चक चुके थे और घनघोर बारिश क चलते सभी घर में hi जमे हुए थे, बाकि अभी भी सविता और हर्षिता ने खाना नहीं खाया था.. हर्षिता वापस से उसी कमरे में पहुंच क शीला क साथ कार्य में लग जाती है जहा कुछ दिएर पहले hi सविता ने आके उसे चलके खाने क लिए बोलै हुआ था

सविता वह से वापस आके सीधा रसोईघर में hi चली आयी थी और अब उसके एक हाथ में एक मोती काली वाली गाजर थमी हुई थी जिसे वो एक प्लेट में छोटे छोटे टुकड़ों में काट रही थी.. बाकि उस गाजर की लम्बी और मोती कुछ खास hi थी वैसे भी सुंदरपुर में भी कुछ कमजोर नहीं होता फिर चाहे यहाँ उगाही जाने वाली ये खास काली गाजर hi क्यों न हो

सविता अपने में hi पूरी मस्त हुई पड़ी थी और एक पुराण गाओं का गीत गुनगुनाये जा रही थी

"अँधेरी रात में देवर ने दिया भौजाई क हाथ में..

ोये भौजाई..

देवरवा चलाये जीभ लपलप.. फिर ठोके अपन भौजिया गपागप..

भौजी कहे धीरे धीरे दालों.. फिर चिल्लाये, कहे तेज़ तेज़ मारो..

ोये भौजाई.."

सविता अपनी hi मस्ती में गीत गुनगुनाते हुए उसी रसोईघर की शेल्फ पे हलकी सी झुकी थी और ऐसे मस्ती क चलते उसकी कमर खुद hi हिलोरे कहती जा रही थी, वैसे भी जबसे उसे आज मोनू का जोशीला लुंड मिला है तबसे उसके चेहरा का निखार मानो कई गुना बाद गया था, ऐसा लग रहा था जैसे एक जवान लड़के का वीर्य लेते hi उसकी उम्र कुछ साल काम हो गयी हो

सविता अपने में इतनी अधिक मगन थी की उसे पता hi नहीं चला था की हर्षिता से मिलकर आने क बाद कब उसकी साड़ी का पल्लू उसके कंधे से सरक कर नीचे लटक चूका था.. वही ब्लाउज क अंदर उसकी badi-badi भरी हुई मोठे पपीते सामान चूचिया ख़ुशी से ऐसे हिलोरे खा रही थी जैसे उनपे अब भी मोनू क हाथों का दबाव महसूस कर रही हो

मोनू से छुड़वाने क बाद बस कुछ पल hi उसने आराम किया था और फिर से काम में व्यस्त हो गयी थी, बल्कि उसने तोह अपने भोसड़े में अपने जवान भतीजे का वीर्य लेने क बाद नहाना तक जरुरी नहीं समझा था और अभी भी उसी अवस्थी में थी..

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वैसे लगातार इतनी म्हणत करने क कारन उसके गेहुआ माथे पे पसीने की कुछ नन्ही नन्ही बूँदें नज़र आ रही थी, बाकि रसोईघर का चूल्हा इस समय पूरी तरह ठंडा था और बाकि बर्तन भी पूरी तरह साफ़ और धुले हुए रखे थे

सविता इतनी मगन थी की उसे पता hi नहीं चलता की मोनू कब वह आ चूका था और वो तोह अपनी बड़ी माँ क मुख से निकलते हुए गीत को सुनकर है रहा था, वैसे उसके यहाँ अचानक आने का कारन था.. हर्षिता की वो हरकत जिसने उसके लुंड में भूचाल सा ला दिया था और उसकी चची क वह से जाते hi वो तुरंत रज़ाई से बहार निकलता है और जल्दी से कमरे को अंदर से बंद करने क बाद लगातार अपने लुंड को हिलाये जा रहा था पर न जाने उसके सरीर में कैसे बदलाव होते जा रहे है ककी उसके हाथ दर्द करने लगे पर लुंड से वीर्य की वर्षा नहीं हुई थी और ऐसी क चलते वो इकलोते उपाय यानि अपनी बड़ी माँ क पास आया था.. जहा पहुंच क वो ये गीत सुनता है और ऐसा कुछ वो पहली बार hi सुन रहा था

उसकी हवस क दौरों से लाल नज़रें कभी उसकी बड़ी माँ की बड़ी की गांड पे दौड़ती तोह कभी उसकी पीछे से नज़र आती गेहुआ नंगी कमर पे जहा पसीने की नन्ही नन्ही बूँदें इतनी कामुक लग रही थी की उसे लिखने क लिए मेरे पास शब्दों की कमी सी है, यहाँ तक मोनू क लुंड ने भी ये नज़ारा देख क हुंकार भर दी और उसके मुख से सब्द निकल पड़ते है

"आआआआहहह… किया गांड है.. बड़ी माआ…"

सविता जैसे hi इन शब्दों को सुनती है उसके काम करते हुए हाथ तुरंत hi रुक जाते है पर जब वो अपना चेहरा घुमा क मोनू को देखती है तोह उसके चेहरे पे भी चमक दौड़ पड़ती है

"यहाँ किया कर रहा है.. कुछ चाहिए किया.. ?"

सविता जान क अपनी बात कहते हुए धीरे से अपनी गांड को पीछे की और ज्यादा hi निकल क हिला देती है, जैसे वो जानती हो की उसके जवान भतीजे को किया चाहिए

सविता, मोनू को देखते हुए अपनी नज़रें नीचे करती है तोह उसे उसके लोअर में बड़ा सा तम्बू नज़र आते है जिसे देख क उसे अपनी लाल पद चुके भोषड़े की याद आती है और उसके चेहरे की चमक दुगनी हो जाती है

"बोल न.. कुछ चाहिए.. ?"

इस बार मोनू अपनी बड़ी माँ की बात सुनकर अपना चेहरा पीछे की और घुमा क बहार की और देखता है जहा घनघोर वर्षा क चलते वह कोई भी उपस्थित नहीं था

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और उसे यही तोह चाहिए था ककी वो यहाँ आया hi शरारत करने क लिए था.. पूरी तरह अस्वसखत होने क बाद वो आगे बढ़ता है और एक hi बार में अपनी कामुक बड़ी माँ की कमर में दोनों हाथों को दाल क उन्हें हल्का सा पीछे की और खींच लेता है और बिना समय नस्ट किये अपने जोशीले तम्बू वाले लुंड को उसकी साड़ी क ऊपर से hi उसकी गांड की ठीक बीच की दरार में लगा क अपने होंठों को उसकी गर्दन पे जमा देता है

"Ummmmmmmmmmmmmm…………….."

वैसे तोह सविता जैसी औरत मोनू जैसे जवान मर्दो की नज़रों को देख क hi भांप जाती है फिर भला आज कैसे पीछे रहती, पर उसे इस बात की उम्मीद नहीं थी की मोनू इतनी हिम्मत करेगा

"Aaaaaaaaaaahhh.. किया कर रहा है कमीने.. कोई आ जायेगा.."

थोड़ी दिएर पहले जिस मोनू क लुंड पे बैठ क सविता उछाल रही थी अब उसकी इतनी छोटी सी कामुक हरकत पे वो ऐसे शर्म से लाल पद गयी थी जैसे किसी नवयुवती को उसका पति अकेले में जकड ले रहा हो

मोनू अपना पूरा मुंह खोल क धीरे से अपनी बड़ी माँ की गर्दन पे जमा लेता है और ऐसे उसके पसीने को चाट लेता है जैसे वह सेहद लगाया गया हो.. वही उसके तम्बू बने हुए लुंड का मोटा सूपड़ा उस साड़ी क ऊपर से hi अंदर घुस जाने की कोषसिंह में लग जाता है.. सविता अपनी कमर को पीछे करते हुए उसे धीरे से अलग करती है वैसे मोनू ने भी उसे आज़ाद कर दिया था पर अब सविता की गर्दन पे उसके दाँतों क निशान और थूक नज़र आने लगा था

"आआआआअह्ह्ह.. ीामिने.. चबा jayega….kiya ?"

असल में मोनू जोश में आके उसकी गर्दन पे अपने दाँतों को इतने जोर से दबा देता है की सविता क पुरे सरीर में दर्द की सिहरन दौड़ उठती थी

मोनू भी अपनी बड़ी माँ से कोई जबरदस्ती नहीं करता और एक कदम पीछे होक खड़ा हो जाता है, पर इसका ये मतलब नहीं की वो कुछ नहीं करने वाला था.. वो अपना एक हाथ आगे बड़ा क पीछे से अपनी बड़ी माँ की बड़ी गांड क एक पैट यानि चूतड़ पे रख देता है और उसकी गोलाई और भारीपन का अनुमान लगते हुए अपने हाथ को उस चूतड़ पे फिरने लगता है, सविता ने भले hi मोनू को खुद से अलग कर दिया था पर उसके जवान और जोशीले भतीजे की बंद न होती ये हरकते उसकी चूड़ी हुई छूट में फिर से कम्पन भर रही थी.. वो मुस्कुरा क धीरे से अपना चेहरा घुमा क मोनू की और देखते हुए कहती है

"लगता है अपनी इस रैंड को छोड़ कर अभी भी तेरा मन नहीं भरा है…"

सविता ऐसे खुले शब्दों का प्रयोग जरूर करती है पर उसके चेहरे की लालिमा बता रही थी की उसने अंदर शर्म का गहना अब भी है

वही मोनू जैसे hi इन शब्दों को सुनता है उसका हतियार उसके लोअर को पहाड़ क बहार आने क लिए उतावला हो उठत है और अपने जिस हाथ से अपने 'ताऊजी की पत्नी' की गांड को सेहला रहा था उससे उनके उस बड़े से चूतड़ को जोर से दबोच लेता है और मुस्कुरा क कहता है

"आप जैसी गरम औरत को कोई बस एक बार छोड़ क कैसे रुक सकता है… आप तोह एक दिन में कमसेकम 4-5 बार छोड़ने वाली चीज़ हो…"

सविता अपनी ऐसी कामुक तारीफ सुनकर ख़ुशी से झूम उठी है, कोई भी औरत यही तारीफ तोह सुन्ना चाहती है बस

सविता अपने जवान भतीजे की बात पे सिर्फ मुस्कुराती है पर कुछ कहती नहीं, वो वापस से अपने कार्य में लीं हो जाती है पर उसे अचे से पता था की उसका बीटा सामान भतीजा कुछ तोह करने आया है.. और ये चीज़ उसे अंदर से गरम करने लगी थी, कभी कभी किसी चीज़ की प्रतीक्षा भी उस चीज़ क मिलने से ज्यादा खूबसूरत होती है

सविता क कुछ न कहने पे मोनू की हिम्मत पहले से दुगनी होती चली जाती है और इस बार वो अपने दोनों हाथों को एक साथ अपनी बड़ी माँ की बड़ी गांड पे ले जेक उन्हें पूरी ताक़त से जकड लेता है वो भी इतनी जोर से की उसकी जवान उंगलियां उस मोती गद्देदार गांड क दोनों चूतड़ों क मार्श में पूरी अंदर तक धंसती चली जाती है

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और अब मोनू को 'महेंद्र की पत्नी' की कामुक गांड का भरपूर एहसास मिलने लगा था जहा वो उसके भारीपन और कोमलता को एक साथ महसूस कर प् रहा था.. वही गदराई मोती भैंस जैसी सविता एक जवान लड़के की ऐसी हरकत पे पूरी तरह सिरहन से भर उठी थी

"Aaaaaaaaaaaaaahhh.. किया कर रहा है कमीने.. कोई आ जायेगा, चोर न… Esssssssssssshhhh"

पर मोनू तोह और जोर जोर से अपनी बड़ी माँ की गांड को गूंधने लगता है जैसे मानो उसकी कोमलता में अपनी पूरी उँगलियों को अंदर तक घुसा देना च रहा हो, वो बड़ी सी गांड इतनी गद्देदार और मुलायम थी मोनू च क भी वह से अपना हाथ हटाने में खुद को सक्षम नहीं प् रहा था

"Aaaaaaaaaaaaahhh.. बड़ी माआ…. आपकी गांड कितनी मस्त है, बिलकुल सख्त पर एक अजीब सा मुलायमपन भी है"

सविता वैसे तोह अपना मुंह मोनू को मन करने क लिए खोलती है पर उसके हाथों का जादू और वो ताक़तवर मर्दन उसके मुख से कामुकता की ाःह निकल देती है

"Aaaaaaaaaaaahhh.. किया कर रहा है कमीने.. कोई आ जायेगा… Esssssssssshhhh"

इस बार मोनू फिर से दोनों हाथों से अपनी बड़ी माँ की गांड का भरपूर मर्दन करते हुए उसके बिलकुल समीप आके अपने होंठों को उसकी गर्दन पे जमाये हुए पियर से चुम लेती है और कहता है

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"Ummmmmmmmmmmmmmmmm……… मैं तोह अपनी रखेल की गांड मसल रहा हु.."

सविता का पूरा जिस्म ऐसे गंगना उठता है की उसकी योनि क होंठ खुद hi खुलने क लिए बुरी तरह फड़फड़ा पड़ते है, वैसे तोह उसने खुद hi मोनू से उसे रखेल.. रैंड और न जाने किया किया खुद को कहने क लिए कहा था, पर अब जब मोनू कह रहा है तोह उसका सरीर इस बात से गरम हो रहा है की एक जवान लड़का जो उसके दोनों बेटों से भी छोटा है वो उसकी गांड को मसलते हुए उसे ऐसी कामुक गाली दे रहा है.. ये एहसास सिर्फ एक गरम और गदराई औरत की समझ सकती है, और सायद ऐसी कारन खुद सविता की आँखें बंद होती चली जाती है और उसके मुख से निकलती गरम साँसों क बीच बस इतना hi वो बोल पाती है

"Aaaaaaaaaaaaaahhhh.. कमीने.. तोह में तेरी रखेल हु… है.."

मोनू अपनी बड़ी माँ की बात सुनकर धीरे से मुस्कुरा पड़ता है, और एक हाथ की चारो उँगलियों को धीरे से दोनों चूतड़ों क बीच की गहराई में घुसाने की कोशिश सी करते हुए

"क्यों.. नहीं वो मेरी रखेल.. ?"

मोनू की बात पे सविता बस मुस्कुरा क अपना चेहरा पीछे की और घूमती है और उसका जवान जोशीला भतीजा बिना किसी देरी क अपने होंठों को उसके होंठों से जोड़ देता है

"Ummmmmmmmmmmm… ummmmmmmmmmmmmmmmmm…."

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बहार घनघोर बारिश हो रही थी तोह यहाँ अंदर रसोई में सविता और उसके जवान भतीजे की कामवर्षा सुरु हो चुकी थी, मोनू अपनी उँगलियों को उसकी साड़ी क ऊपर से hi गांड की दरार में घुसाने की चैस्ता करते हुए अपनी बड़ी माँ क होंठों का भरपूर रसपान करने लगा था

"Ummmmmmmmmmmmmm… ummmmmmmmmm… uuuuuuuummmmmmmmmmmmm… Slllllllllluuuuuuuuuuuuurrrrrrrpp…."

मोनू धीरे से अपनी जीभ को होंठों क द्वार पे टकराता है तोह सविता खुद hi अपने होंठों को खोल क उसकी जीभ क अंदर आने का निमंत्रण दे देती है, और अब एक जवान लड़का जो सविता क दोनों बेटों से भी उम्र में काम था वो उसके मुंह में अपनी जीभ चलते हुए उसकी जीभ से कामुक लड़ाई करते हुए उसका रसपान करने लगा था

"उम्मम्मम्मम्मम… Srrrrrrrrrrrrrrllllllllllluuuuuuuupp… Sssssssrrrrrrrrrrrrrruuuuu…… Ssssssssllllllllllluuuuuuuuuppp………."

दोनों hi बिना रुके एक दूसरे क होंठों से कामुकता का सारा रास चूस लेना च रहे थे, पर ऐसे पीछे की और सर घुमाये हुए अपने जवान भतीजे को अपने होंठों चुसवाते और अपनी गांड की गहराई में उसकी उँगलियों क चलने का सुकून भरा आनंद लेते हुए सविता की गर्दन में भी हल्का दर्द होने लगा था, इसलिए जल्दी hi वो उससे अलग हो जाती है और ऐसा होते है सविता एक बार फिर से दोनों हाथों को रसोईघर की शेल्फ पे रख क लम्बी लम्बी सांस लेने लगती है.. पर उसके अधरों की मुस्कान बता रही थी की उसे ऐसी kaam-kriya में कितना आनंद आया था

"कमीने.. पूरी बुर पनिया दी मेरी.."

अपनी गदराई भरी भरकम बड़ी माँ क मुख से ऐसी बात सुनकर मोनू का लुंड भी ख़ुशी से उसके लोअर क अंदर उछाल मरने लगता है

सविता एक पल तक खुद को संभालती रहती है और फिर मुस्कुरा क अपने होंठों पे मोनू क थूक को अपनी जीभ से साफ़ करते हुए कहती है

"बदमाश कही का.. चल जा यहाँ से वर्ण कोई आ जायेगा… वैसे हैरानी की बात है की तेरा लुंड अभी तक थका नहीं है, मुझे तोह लगा था की थकन क मरे 1-2 दिन सायद खड़ा भी न हो पर ये तोह मेरी गांड का रास्ता ढूंढ़ने की फ़िक्र में लग रहा है"

सविता ये बात हल्का सा पीची की और मुड़ते हुए कहती है जहा वो मोनू का पूरी तरह उस लोअर में सीधा खड़ा हुआ लुंड देख क थोड़ा हैरान भी थी.. जिसके चलते वो मन hi मन सोचने पे विवस हो जाती है

'मुझे ऐसा क्यों लग रहा है जैसे इसका लुंड ज्यादा hi जोश में रह रहा है.. वो भी ऐसी हालत और बीमारी से उठने क बाद भी.. ?'

पर सविता अपने मन क विचारों को अधरों पे नहीं लाती और मुस्कुरा क पियर से डटे हुए कहती है

"चल जा यहाँ से.. तेरी सेहत अभी इतनी सही नहीं है की इतनी जल्दी फिर से मेरा भोज उठा सके…"

पर मोनू क लुंड में खून की जो दौडान चल रही थी वो उसके चलते विवस था वो फिर से अपने दोनों हाथों को अपनी बड़ी माँ की बड़ी और मोती गांड पे रख क गोल गोल घूमते हुए अपनी उँगलियों से उस यौवन का आनंद लेते हुए कहता है

"जाना तोह चाहता हु.. पर न जाने आपकी इस गांड ने मेरे ऊपर कोनसा जादू कर दिया है, मैं च क भी अपने हाथों को इससे जाता नहीं प् रहा हु

.. देखो न ये कितनी मोती और मुलायम है, मन करता है बस पूरा दिन इससे खेलता राहु"

कोनसी सविता जैसी गरम और गदराई औरत भला अपनी गांड क लिए ऐसे सैंड सुनकर खुस नहीं होगी.. आखिर हर औरत को अपने यौवन की तारीफ सुन्ना पसंद हॉट है, और यही हाल सत्तू की माँ का भी था.. उसकी भोसड़ा बन चुकी योनि भी पूरी तरह पनिया चुकी थी और इस समय उससे कॉमर्स की धार बहते हुए उसकी जाँघों तक पहुंच रही थी, बाकि साड़ी क नीचे तोह निवस्त्र वो थी hi

"बदमाश.. आआआआअह्ह्ह्ह.. Essssssssssssshhhh… आआह… जरा जोर से दबा न अपनी रखेल की गांड.. आआआहहह"

मोनू उसी पल जोर से दोनों चूतड़ों का मर्दन सुरु कर देता है जिससे सविता एक पल क लिए भूल hi जाती है की कहा कड़ी है और उसने हर्षिता को खाने क लिए बोलै हुआ है, और सायद अब तक हर्षिता कमरे में पहुंच क उसका इन्तिज़ार भी करने लगी होगी



कंटिन्यू.. 👇
 
"ेस्स्स्सस्स्स्सह्ह्ह.. बदमाश चोर न.. किया कर रहा है.. आआआअह्ह्ह्ह… मुझे काम है, जा अभी.. Aaaaaaaaaaaahhh.."

पर मोनू तोह दोनों हाथों से अपनी बड़ी माँ क बड़े बड़े चूतड़ इतनी जोर से दबाने लगा था की उसकी उंगलिया तक उस मुलायम गांड क गोष्त में धस सी जा रही थी

"आआआआहहह… कितनी मस्त गांड है.. बड़ी माँ आपकी, न जाने वो कोण खुशकिस्मत होगा जिसे ये पहली बार मिली होगी"

सविता जब ये बात सुनती है तोह एक पल क लिए एक चेहरा उसकी आँखों क आगे से गुजरता चला जाता है पर वो अपना काबू बनाये रखती है और उसे फिर से मन करती है

"चल भाग बदमाश यहाँ से.. कुछ भी बोलता है.. आआआअह्ह्ह्ह.. Esssssssssshhh… Maaaaaaaaaaa.."

वैसे इतनी दिएर से अपनी बड़ी माँ की बड़ी गांड का मंथन करने क कारन मोनू क लाल सुपडे पे भी कामुकता की कुछ बंधे निकल आयी थी, वो थोड़ी सी ज्यादा हिम्मत दिखते हुए धीरे से दोनों चूतड़ों क ऊपर साड़ी को मुठी में पकड़ क धीरे धीरे ऊपर की और खींचने लगता है, और इस कारन उसका दिल जोरो से dhak-dhak करने लगा था की कही सविता उसे डाट न दे.. पर इस बार सविता की साँसे भी उसकी हरकत से इतनी तीव्र हो जाती है की वो कुछ कहती नहीं बल्कि जो लड़का 3 महीने पहले उसके आगे रोने लगा था आज उसमें इतनी हिम्मत आ चुकी थी की वो ऐसे खुलेआम उसकी साड़ी उठा रहा है, ये बात कही न कही सविता की बुर को और ज्यादा गीला करती जा रही थी

जल्दी hi साड़ी ऊपर उठते हुए कमर तक आ चुकी थी जिसका एहसास सविता को अपनी जाँघों पे लगने वाली ठंडी हवा से होता है, अब मादक और भरी जांघें पूरी तरह उसके जवान भतीजे क आगे नंगी हो चुकी थी.. सविता एक बार फिर से अपनी गरम होती साँसों को काबू में करने का प्रयास करती हुए बोलती है

"आआआहहह.. किया कर रहा है कुत्ते, किया फिर से नंगा करेगा अपनी इस कुटिया को.."

सविता क मुख से निकलते हुए ये सब्द मोनू क लुंड में ऊर्जा बढ़ाने का कार्य कर रहे थे, पर मोनू उसकी बात का कोई उत्तर नहीं देता ककी वो तोह जैसे और hi कुछ सोच चूका था.. उसने साड़ी को कमर क ऊपर एक हाथ से पकड़ क दबा दिया और बिना किसी विलम्ब क दूसरे हाथ से अपनी बड़ी माँ की बड़ी गांड जो अब पूरी नंगी थी उसे जोर जोर से मसलना सुरु कर दिया, वही सविता ने भी जब अपने जवान और जोशीले भतीजे क हाथों को उसकी नंगी हो चुकी गांड पे महसूस किया तोह एक बार फिर से उसकी आँखें बंद होती चली गयी

"Aaaaaaaaaahhh… मत कर कुत्तेईईईई… कोई आ जायेगा.. यहाँ……… ेशसश्च… Maaaaaaaaaaaaaa.. हरामी चोर दे मुझे… Aaaaaaaaaaaaahhh"

पर Monu(main) अपने काम में पूरी म्हणत से लगा रहता हुआ.. बड़ी माँ की वो बड़े बड़े खरबूजे जैसे दोनों गेहुआ चूतड़ इतने मुलायम और मज़ेदार था की 'मालती क बेटे' की सभी उंगलियां उन चूतड़ों में पूरी धस सी जा रही थी और जवान मोनू पूरी ताक़त और म्हणत से उस गांड को मसले जा रहा था

"Aaaaaaaaaaahhh.. बड़ी माआआआ… किया कमल की गांड है आपकी.. आआआअह्ह्ह.. नान करता है ऐसे पूरा खा जाऊ.. Aaaaaaaaaaahhhhh"

सुबह से लेके अब तक 2 बार चुद चुकी गदराई सविता, एक बार फिर से एक जवान लड़के क हाथों अपनी गांड का ऐसा मर्दन पाके पुरे कामुकता क नसे में डूबने लगी थी.. उसकी आवाज़ कमजोर हो चुकी थी पर फिर भी वो कहती है

"आआआआअह्ह्ह्ह.. मत कर kutteeeeeeeeeeeeee… हर्षिता खाने क लिए मेरा इंतज़ार का रही है.. कही यहाँ आ गयी तोह मुश्किल हो जाएगी.. आआआआअह्ह्ह्ह"

पर सविता क शब्दों को कंपकपा देने का काम मोनू की अचानक से उसके चूतड़ों क भींच घुसी उंगलिया थी जो सीधा उसके गांड क छेद से जेक टकराई थी

"Aaaaaaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhh.. हरामजादे रुक जा Jaaaaaaaaaaaa….."

पर सविता क हर एक सभ मोनू को सिर्फ और ज्यादा उक्षा रहे थे, मानो जैसे वो मन नहीं बल्कि उसे और आगे बढ़ने क लिए कह रही हो

"मत काट kutteeeeeeeeee… बाद में कभी कर lenaaaaaaaaaaaaaa… Aaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaahhh.. Kuttttttttttttteeeeeeeeeeeee… हरमजदे… ungli…….nikalllllllllllllllllllll…."

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सत्यम की माँ क ऐसे अचानक से तड़प पड़ने का कारन तोह आप जानते hi है.. असल में मोनू ने जैसे hi अपनी बड़ी माँ की गांड तक अपनी उंगलिया पहुंचे थी उसके अंदर का जोश अचानक से दुगना हो गया था और ऐसी जोश में खोया हुआ वो अपनी बीच वाली ऊँगली को बिना गीला किये ऐसे hi सुखी की सुखी पूरी अंदर घुसा देता है, जहा एक hi पल में मोनू को ऐसा प्रतीत होता है जिसे उसकी ऊँगली किसी आग की भट्टी में दाल दी हो उसने.. वह इतनी ज्यादा गर्मी थी उससे सहना मुश्किल हो रहा था

"Aaaaaaaaaaahhhh… बड़ी माँ.. अंदर किया भट्टी लगा राखी है……"

वही सविता भी अचानक अपनी गांड क छेद में ऐसे सुखी ऊँगली घुसने क कारन पूरी तरह तड़प पड़ी थी, उसकी आँखें तेज़ी से बंद होती चली गयी थी और फिर जानते hi है की उसने किया कहा था.. पर तभी मोनू अपनी अंदर घुस चुकी ऊँगली को गांड क अंदर की थोड़ा सा घूमता है तोह सविता का पूरा सरीर जैसे अकड़ सा जाता है और उसकी साँसे मानो बस रुक hi गयी थी

"Aaaaaaaaaaaaaaaaaaahhh… मादरचोद.. निकल.. किया कर रहा है.. कुटटटटटीईईई.."

ऐसे शब्दों को सुनकर किस नौजवान क लुंड को सुकून नहीं आएगा किया.. और ठीक ऐसा hi कुछ हाल हमारे मोनू का भी हो रहा था

पर सविता, अनोखी और फिर अपने सगी माँ से कामुकता की शिक्षा लेने वाला मोनू अब धीरे धीरे इस खेल में ज्यादा hi निपुण होता जा रहा था, इसलिए वो अपनी ऊँगली को पीछे खींचता है और फिर पहले से भी ज्यादा अंदर तक घुसते हुए 'सत्यम की माँ' क कानो क पास अपनी गरम गरम साँसे चोरते हुए कहता है

"Ufffffffffff.. बड़ी Maaaaaaaaaa.. तुम्हारी गांड क अंदर तोह इतनी गर्मी है की मेरी ऊँगली जाली जा रही है… जरा अपनी साड़ी को तोह पकड़ना.."

मोनू धीरे धीरे अपनी ऊँगली को अंदर बहार करने का खेल खेलते हुए अपनी hi बड़ी माँ को उनकी साड़ी पकड़ने क लिए कह देता है ताकि वो ये खेल खुल क खेल सके.. सविता भले hi बार बार मोनू को मन कर रही थी पर अपनी गांड में उसकी अंदर बहार होती ऊँगली ने न जाने कोनसा जादू कर दिया था उसपे की वो अपने एक हाथ को उस रसोईघर की शेल्फ पे टिकाये रहती है और दूसरे हाथ को पीछे ले जेक खुद hi अपनी साड़ी पकड़ लेती है, ताकि उसका जोशीला भतीजा अपने काम अचे से कर सके.. वैसे वो गाजर काटने का कार्य कबका बंद हो चूका था ये तोह आप समझ hi गए होंगे, और फिर इतने सब क बाद भी सविता धीरे से कहती है

"मत कर कुटीऐईईए.. हर्षिता मेरी प्रतीक्षा कर रही होगी खाने पे.. Aaaaaaaaaahhhhhhh.."

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अब सविता ने अपने एक हाथ से अपनी साड़ी पकड़ ली थी और उसे ऊपर hi रोक दिया था जहा उसकी गेहुआ गांड अब पूरी नंगी हो चुकी थी और उसके चूतड़ों क बीच मोनू क हाथ की ऊँगली धीरे धीरे अपनी रफ़्तार और जगह बनाने लगी थी.. सविता द्वारा साड़ी रोकने क कारन मोनू का अब दूसरा हाथ भी खली हो चूका था इसलिए वो एक हाथ की ऊँगली को जोर जोर से अपनी बड़ी माँ की गांड में घुसा क अंदर बहार करते हुए उन्हें छोड़ने का कार्य कर रहा था तोह वही उस खली हो चुके हाथ से कभी उनके एक चूतड़ को बेहरमी से मसल देता तोह कभी दूसरे चूतड़ पे फिरते हुए पियर से थप्पड़ जड़ देता है

"Chatttttttttaaaaaaaaaaaaaaaaaaaakkkkkkkk…"

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धीरे धीरे सविता को भी इस खेल में आनंद आने लगा था, इसलिए वो भी अपनी आँखों को बंद किये हुए अपनी गांड को ज्यादा hi पीछे की और निकल क उसमें अपने भतीजे की अंदर बहार होती ऊँगली से मिलने वाला असीम आनंद लेने लगती है, वो तोह भूल hi चुकी थी प्लेट में अब भी एक मोती काली गाजर बची हुई है जिसे काटना है और वह हर्षिता भी उसके खाने क लिए इंतज़ार का रही है.. आखिर एक गरम औरत ऐसे आनंद से कैसे खुद को रोक सकती थी

"आआआआअह्ह्ह.. kuttteeeeeeeeee.. हरामजादे… आआआआअह्ह्ह्ह.. अपनी माँ की गांड समझ ली है किया… Aaaaaaaaaahhh.. मार मार क लाल कर देना च रहा है… Aaaaaaaaaaaaahhh.. कुत्त्तीीीी… घुसा दे पूरी ऊँगली अंदर तक.. Aaaaaaahhhhhhhhhh.. Kutttttttteeeeeeeeee… हरामजादे किया कर रहा है…….. Aaaaaaaaaaaahhh.. Maaaaaaaaaaaaaaaaaaa…….."

सविता क कामुक शब्दों को सुनते हुए मोनू अपनी पूरी ऊँगली को पूरा अंदर तक घुसा क वही गांड क अंदर hi धीरे धीरे हिलने डुलने लगता है जिससे सविता क बुरा हाल होते जा रहा था

"आआआह्ह्ह्ह.. बहनचोद बड़ी माआआआ… आपकी गांड कितनी गरम है.. कुटिया साली किया कहती हो… ऐसा लग रहा है जैसे गरम भट्टी में ऊँगली घुसा राखी हो मैंने.. Aaaaaaaaaahhh"

सविता भी उसके शब्दों को सुनकर पूरा आनंदित होते हुए अपनी नशीली आँखों को धीरे से खोलते हुए कहती है

"Aaaaaaaaaaahhh.. Kuttteeeeeeeeeee… सिर्फ ऊँगली डाली है तोह गर्मी नहीं सेह प् रहा है.. लुंड डालेगा तोह एक पल में पानी निकल जायेगा तेरा.. Aaaaaaaaaaahhhh…… बहनचोद.. Kuttteeeeeeeeeeee… थापड़ कहेगा… आआआआअह्ह्ह्हह…"

सविता क ऐसे अचानक से तड़प पड़ने का कारन था की मोनू अपनी ऊँगली को अचानक से बहार खींच लेता है, पर इससे पहले की सविता अपनी बात कहते हुए एक पल क लिए भी ठहर पाती मोनू इस बार एक साथ अपनी 2 उंगलिया अंदर घुसा देता है जिसके उसके जबड़े बिछते चल जाते है

"Aaaaaaaaaahhhh… निकल हरामजादे.. Kuttteeeeeeeeeeeee… ऊँगली से hi गांड पहाड़ डालेगा किया मेरी…….. Aaaaaaaaaaaaaaaahhhh… Maaaaaaaaaaaaaaaaaa…….. निकल kuttteeeeeeeeeeeeee…"

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सविता जहा दर्द और कामुकता से भरी हुई गालिया देती जा रही थी, वही उन गालियों को सुनता हुआ मोनू और अधिक जोश से भरते हुए मुस्कुराता और जोर जोर से अपनी दोनों उंगलिया बहार खींच क वापस अंदर उतर देता है.. और हमारी गरम सविता एक हाथ उस शेल्फ पे टिकाये और दूसरे हाथ से अपनी साड़ी को थामे हुए जोर जोर से अपनी गांड में अपने जवान भतीजे की उँगलियों क घुसने का पूरा आनंद लेती जा रही थी

"Aaaaaaaaaahhhh.. हरमदे.. बस कर…. Aaaaaaaaaahhhh.. हर्षिता.. इन्तिज़ार कर रही होगी.. वह.. Aaaaaaaaaaaahhhhh… निकल अपनी उंगलिया.. कुत्त्तीीीी.. वर्ण कही हर्षिता आ गयी तोह तेरी गांड पहाड़ देगी वो.."

सविता, हर्षिता को लेके अपनी बात कहते हुए एक पल क लिए खुद hi है पड़ती है.. मोनू की लगातार म्हणत जल्दी hi रंग लाने लगती है और कुंदन की बड़की भौजाई का चेहरा धीरे धीरे कामुकता क चलते लाल पड़ने लगता है.. उसकी आँखें पूरी तरह चढ़ने लगती है, जैसे उनमें नशा भरा हो और उसकी चूचियां तेज़ी से उसके ब्लाउज को पहाड़ क बहार आने क लिए उतारू होक upar-neeche होने लगती है, उसके दोनों जामुन सामान निप्पल्स सख्त हो चुके थे जो उस ब्लाउज क ऊपर से साफ़ साफ़ नज़र आ रहे थे

"आआह्ह्ह… हमरजादे कितनी गहराई तक घुसा रहा है.. आआआहहह.. किया अपनी दोनों उंगलिया मेरी गांड में घुसा क छूट से बहार निकलने का इरादा है.. अअअअअअअ.. रुक जा कुत्त्तेईईईई… मादरचोद रुक जाआआआ… kuttttttteeeeeeeeeeeee…"

तभी मोनू ने गांड क अंदर hi घुसी अपनी दोनों उँगलियों को एक साथ hi उस तंग और गरम भट्टी में ऐसे टेडी कर दी जैसे घी क डिब्बे से घी निकलते हुए करनी पड़ती है, जिस कारन सविता क पूरा सरीर पूरी तरह अकड़ जाता है और आँखें ऐसे तन जाती है जैसे बस बहार hi निकल आएगी.. उसका जिस्म जोरो से फड़फड़ा पड़ता है और योनि से कॉमर्स का भरा हुआ बाँध टूट जाता है

"Aaaaaaaaaaa… Maaaaaaaaaaaaa… kutttttttttttttttteeeeeeeeeee………….. Uffffffffffffffffffffffff…. कितना आनंद है……….. Aaaaaaaaaaaahhhh.."

छूट से रास का बहाव होते hi सविता का पूरा सरीर कंपकपा उठा था और जो मुंह अब तक गालियों की बौछार कर रहा वह फूल झड़ने लगे थे

ऐसी पल बहार से कुछ कदमो की आहत सी पास आती हुई प्रतीत होती है और एक स्वर दोनों चची भतीजे क कानो में आके टकराता है

"कहा रह गयी बड़की भावजी.. मैं कबसे इंतज़ार कर रही हु.."

सविता जैसे hi ये आवाज़ सुनती है, वो बुरी तरह काँप उठती है और अपनी कापति हुई आवाज़ में कहती है.. वैसे अब भी उसकी बड़ी गांड में मोनू की दोनों उंगलिया घुसी hi हुई थी

"मैं.. मैं आती हु.. तू वही रहना.. यहाँ.. यहाँ.. रसोईघर में पूरा पानी आ रहा है, बस 2 मं में आती हु.."

हर्षिता जो सायद रसोईघर क थोड़ा पास hi आ चुकी थी वो वही रुकते हुए

"ाचा.. ठीक है जल्दी आइए.. भूक क मरे पेट में चूहे दौड़ रहे है.."

फिर हर्षिता धीरे से कहती है

"आपको किया.. आप तोह मोनू का लोढ़ा खा क पेट भर चुकी है, यहाँ तोह सब सुना पड़ा है"

पर हर्षिता क ये सब्द ऐसी धीमी थे की बस वही सुन पायी थी, और फिर से बारिश में बचते हुए वापस कमरे की और भाग पड़ती है

हर्षिता क दूर जाते कदमो की आहत पाते हुए सविता रहत की सांस लेती है, वैसे कॉमर्स निकल जाने क कारन उसका पूरा सरीर एक बार फिर से थकन से भर चूका था.. पर उसका जोशीला और जवान भतीजा तोह अब भी उसकी गांड में अपनी दोनों उंगलिया घुसाए हुए उसके पीछे खड़ा था और उसका कारन भी बहुत सीधा था की उसके लुंड ने न बैठने की कसम सी कही हुई थी, सविता अपनी गांड में अपने बेटे सामान भतीजे की अंदर घुसी पर अभी ठहरी हुई उँगलियों का भरपूर आनंद लेते हुए उससे कहती है

"जल्दी निकल.. वर्ण इस बार हर्षिता पक्का यहाँ आ जाएगी.."

मोनू का मन तोह नहीं था पर वो जनता था की उसे अभी क लिए अपनी ीचा को रोकना hi पड़ेगा, पर तभी उसकी नज़रें उस प्लेट में बची उस काली गाजर पे जाती है और उसका मन कुछ शरारत क लिए मचल पड़ता है.. आखिर अभी बचा hi तोह है 😉

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उसने एक हाथ से एक बार फिर अपनी बड़ी माँ की बड़ी सी गांड को जोर से अपने हाथों से दबा दिया जैसे किसी बड़े रसीले आम को दबा क उसका रास निकलने की कोशिश हो.. फिर अपना वो हाथ वह से हटा क आगे ले जाता है और और धीरे से उस गाजर को उठा लेता है, जबकि सविता इस पल अपने में hi लीं थी जिस कारन वो अपने जवान भतीजे की इस हरकत को देख नहीं पाती और जल्दी उसके हाथ में वो गाजर थमी हुई पीछे की और सविता क चूतड़ों क पास पहुंच चुकी थी

"चोर न किया कर रहा है.. कमीने.. निकल अपनी दोनों उंगलिया.."

सविता, मोनू की अगली हरकत से पूरी तरह अंबिग उसे पियर से डाट क उसकी उंगलिया निकलने क लिए कहती है पर वो किया जाने आज उसके साथ और किया होने वाला था

मोनू अब अगले कदम को बढ़ाते हुए मुस्कुरा पड़ता है पर उससे पहले गपक से एक hi झटके में अपनी बड़ी माँ की गांड से अपनी दोनों उँगलियों को बहार खींच लेता है, इतनी दिएर से जिन 2 उँगलियों ने हमारी सविता क अंदर तूफान मचा रखा था उनके निकलते hi 'सत्तू की माँ' बुरी तरह काँप पड़ती है

"Aaaaaaaaaahh… कुटटटटटटटी…. धीरे से नहीं निकल सकता था.."

मोनू मुस्कुराते हुए अपनी उँगलियों को देखता है जो पूरी तरह पीली और गीली थी.. और उन्हें देख क उसके लुंड में भरा कॉमर्स अपने आप hi पहात पड़ता है और आँखें बंद होती चली जाती है, और उसे न जाने कोनसा नासा होता है की वो अपनी hi दोनों गीली और अपनी बड़ी माँ की टट्टी से सनी हुई उँगलियों को अपने मुंह में रख क ऐसे उसका स्वाद लेने लगता है जैसे वो सेहद से ज्यादा स्वादिस्ट हो

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"Aaaaaaaaaaahhhh… किया अनोखा स्वाद है… ummmmmmmmmmmmmmm.."

सविता जैसे hi ये सब्द सुनती है वो पूरी हैरानी से पीछे की और देखती है तोह वह मोनू को अपनी वही दोनों उँगलियों को अपने मुंह में रखे हुए चूसते हुए देख क उसकी योनि जैसे एक hi पल में गंगना जाती है, उसे यकीन नहीं होता की एक जवान लडक उसकी टट्टी चाट रह है

"Aaaaaaaaaahhhh.. kutteeeeeeeeeee… किया कर रहा है… Esssssssssshhh"

सविता को ऐसा प्रतीत होता है जैसे उसकी योनि जिसने अभी अभी कॉमर्स बहाया है वो एक बार फिर से अपना रास चोर्ने क लिए मरी जा रही हो.. वही दूसरी और मोनू जो इतनी दिएर से अपने लुंड क उठान से परेशां था उसने जैसे hi अपनी बड़ी माँ की टट्टी का स्वाद लेना सुरु किया था उसके लुंड ने भी हार मान ली थी और लोअर क अंदर hi बारिश आरम्भ कर दी थी

"Ummmmmmmmmmm… सबसे स्वादिष्ट चीज़ है… ummmmmmmmmmm…"

सविता का पूरा सरीर ऐसे काँप उठता है की उसकी साँसे मानो आग उगलने लगती है, और थरथराहट क चलते वो कुछ कह hi नहीं पाती बस अपने जवान और जोशीले भतीजे की हरकत पे पूरी पागल होती जाती है

"कमीना….."

सविता मुस्कुरा क बस इतना hi कह पायी थी



कंटिन्यू... 👇
 
मोनू तब तक अपनी उंगलिया छत्ता रहता है जब तक उसकी उँगलियों पे लगा वो स्वादिस्ट पीली मलाई पूरी तरह ख़तम नहीं हो जाती, और जब अपनी उंगलिया बहार निकलता है तोह वो बस पूरी तरह उसके थूक से सनी हुई थी.. दोनों चची भतीजे की नज़रें एक पल क लिए एक दूसरे से टकराती है और सविता मुस्कुरा क हस्ते हुए वापस से अपना एक हाथ उसी शेल्फ पे जमाये हुए कड़ी रहती है, इस बार वो कोई जल्दबाजी नहीं करती ककी वो जानती थी की मोनू क लुंड ने भी कॉमर्स की वर्षा कर ली है.. पर उसे इस बात का ज्ञान नहीं था की मोनू अब आगे किया करने वाला है



मोनू ने एक बार फिर से अपने खली हो चुके हाथ को अपनी बड़ी माँ की गांड पे जमा को उसको जोर से फैला दिया बाकि दूसरे हाथ में वो गाजर थमी hi हुई थी.. सविता उसके वापस से उसकी गांड से खेलने पे अंदर hi अंदर कामुकता से भर्ती जा रही थी वो मुस्कुरा क कहती है

"कमीने.. टट्टी तक खा ली मेरी.. अब और किया बचा है.. ?"

मोनू इस बात पे बस मुस्कुराता है पर कहता कुछ नहीं

उसने एक हाथ से सविता क एक चूतड़ को पकड़ क पूरा फैला दिया जिससे उसके दोनों चूतड़ों क बीच अछि कड़ी गली बनती चली गयी और अब सामने का वो कामुक छेद जिसमें इतनी दिएर से वो ऊँगली घुसा रहा था वो उसने सामने था.. उसने धीरे से उस मोती गाजर का मुहाना जो आगे से पतला hi था उस छेद पे लगा दिया तोह सविता का पूरा जिस्म जैसे अकड़ सा लगा

"आआआआहहह.. कुत्तेईईईई… पागल हो गया है किया… सोचना भी नहीं इस समय वह डालने की.. वर्ण तेरा लुंड काट………. Aaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaahhh… kutttttttttttttttttteeeeeeeeeeeeeeee… हरामजादे………… मादरचोद………. निकल अपना lunddddddddddd… निकल कुत्ते क pillleeeeeeeeeeee…….. अभी तोह तेराआआआ.. पनीईई.. निकला था… इतनी जल्दी कैसे khadaaaaaaaaaaaaaa.. आआआआहहह.. निकलललललललल"

सविता अपनी बात कह hi रही थी की तभी उसे ऐसा प्रतीत होता है की कोई मोती चीज़ उसकी गांड का छेद को फैलते हुए अंदर घुसती चली गयी, जो हद से ज्यादा सख्त और मजबूत थी साथ hi साथ वो जैसे जैसे आगे बाद रही थी मोती होती चली जा रही थी.. और ऐसा होते hi उसे यही लगता है की उसके जवान भतीजे ने अपना लुंड घुसा दिया है उसकी गांड में

मोनू जोर से पूरी गाजर को अपनी बड़ी माँ की गांड में इतने अंदर तक उतरता चला जाता है की गाजर क सिर्फ पिछले हिस्से का हल्का सा हरा भाग hi बहार रह जाता है, और फिर मुस्कुराते हुए कहता है

"लुंड तोह बंद में घुसूंगा बड़ी माँ.. अभी ये गाजर से काम चला लो.."

सविता जैसे hi गाजर सब्द सुनती है, वो हड़बड़ा सी जाती है और जब सामने प्लेट की और देखती है तोह वह बची वो एकलौती गाजर अब गायब थी.. उसे समझते दिएर नहीं लगती की मोनू ने लुंड नहीं वही गाजर उतर दी है उसकी गांड में

"Aaaaaaaaaahhh… मादरचोद.. भड़वे… kutttttttteeeeeeeeeeeee… कुछ नहीं मिला तोह गाजर hi घुसा दी…. निकल कुट्टी… उसे… वर्ण तेरी माँ को पुरे घर में हर लुंड से छुडवाउंगी…."

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अपनी माँ क लिए ऐसे शब्दों को सुनते hi मोनू क अभी अभी ठन्डे पड़े लुंड में जैसे एक hi पल में जोश भर आया हो वो मुस्कुराते हुए पूरी गाजर को अंदर तक घुसाने क बाद अपना हाथ अपनी बड़ी क उस हाथ पे ले जाता है जिससे उन्होंने साड़ी पकड़ राखी थी फिर वह से साड़ी को खींच क नीचे करते हुए कहता है

"आआआआअह्ह्ह.. तब तोह माँ को मज़ा hi आ जायेगा.. इतने सरे लुंड खा क.."

सविता भी ये सुनकर दर्द से मचलती हुई अपना सर पीछे घुमा क उसे देखती है और उसकी बात सुनती है तोह उसे भी हसी आ जाती है

"कुट्टी.. यानि तुझे मज़ा आएगा अगर मालती को सब चोदे.."

मोनू मुस्कुराते हुए अपना चेहरा आगे करके अपनी बड़ी माँ क होंठों को चुम लेता है और पियर से कहता है

"माँ की छूट में लुंड सोचने भर से मेरा खड़ा हो जा रहा है.. देख लूंगा तोह न जाने किया होगा मेरा"

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(मेरी माँ.. मालती)

सविता ये सुनती है तोह मुस्कुरा पड़ती है, और हस्ते हुए धीरे से कहती है

"किस्मत वाली है तेरी मा…… वैसे तेरी बात सुनकर लगता है, जल्दी hi कुछ ऐसा करवाना पड़ेगा उसके साथ"

सविता ये कहते हुए दर्द और आनंद को एक साथ महसूस करती हुई धीरे से आँख मार देती है, वही मोनू भी है पड़ता है

तभी फिर से रसोईघर की और कदमो की तेज़ आहात आती हुई महसूस होती है और सविता जल्दी से साड़ी सही करती हुई उस प्लेट को उठा लेती है मानो जैसे बस जाने hi वाली हो वह से.. वैसे तोह वो उसे गाजर को बहार निकलना था अपनी गांड से पर उन कदमो की आहत ने थोड़ा सा विलम्ब पैदा कर दिया था

रसोईघर में इस बार थोड़ी भीगी हुई हर्षिता hi पहुँचती है

"किया भौजाई.. कितना समय.."

पर तभी उसकी नज़रें वही खड़े मोनू पे भी जाती है जहा उसे देख उसके अधरों की मुस्कान कुछ ज्यादा hi गहरी हो जाती है

"तुम भी है यहाँ… तभी समय लग रहा था.."

सविता को ऐसा लगता है जैसे कही हर्षिता को सब पता न चल जाये, वो जल्दी से बोल पड़ती है

"अरे वो.. मोनू मेरी गाजर काटने में मदद कर रहा था न.. तोह.. वो बस वही.. इसलिए.."

सविता की हालत इस पल कुछ ऐसी हो गयी थी जैसे घर की बड़ी वो नहीं अपितु हर्षिता हो

हर्षिता भी अपनी बड़की भौजाई की बात सुनते हुए मसुकुरा क कहती है

"है.. वो तोह मुझे लग hi रहा है, पर पता नहीं ये मोनू मेरी ऐसी मदद कब रहेगा

..ये तोह अपनी हर्षिता चची क साथ कुछ करना hi नहीं चाहता.. मेरा मतलब मेरी मदद hi नहीं करता किसी काम में.."

और कोई समय होता तोह सविता सायद हर्षिता की बातों का सार समझ जाती पर अभी तोह वो खुद पकडे जाने क दर से प्रेरित थी

सविता जल्दी से खुद को संभालती है और गाजर वाली प्लेट हर्षिता की और बढ़ाते हुए कहती है

"ये तू लेके चल.. मैं बस 5 मं आती हु.."

असल में सविता जल्दी से अपनी गांड में पूरी घुसी उस गाजर को निकलना च रही थी, ककी उसे ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे कोई मोटा लुंड उसकी गांड में फसा हुआ हो और ये चीज़ उसकी योनि पे कॉमर्स बहाने का दबाव बना रही थी.. पर हर्षिता उसे ऐसा कुछ करने नहीं देती वो मुस्कुरा क कहती है

"नहीं नहीं.. इस बार तोह साथ hi चलो आप मेरे,

..मेरे पेट में चूहे दौड़ रहे है, आपको न जाने मोनू ने किया खिला दिया है की भूक hi नहीं लग रही आज.."

फिर मोनू की और देखते हुए

"ऐसा किया खिला दिया है रे.. मुझे भी खिला दे न कभी.."

मोनू बेचारा मुश्किल से अपना थूक गटकते हुए

"जी.. जरूर.. जरूर चची.."

वही सविता की तोह हसी hi निकल पड़ती है, ककी उसे लगता है की हर्षिता को कुछ नहीं पता है और अनजाने में hi वो कुछ भी बोले जा रही है

हर्षिता- (वापस सविता की और देखती है और उनके हाथ से वो प्लेट लेते हुए) आप तोह मेरे साथ hi चलो बस.. और ये गाजर इतनी काम क्यों काटी है, काम से काम 1 और काटनी चाहिए थी न ?

सविता इस बार मोनू की और देखती है और अपनी गांड में पूरी अंदर तक घुसी उस गाजर क बारे में सोचते हुए कहती है

"थी तोह एक और भी.. पर इस मोनू ने किसी को खिला दी वो.."

हर्षिता थोड़ी उलझ सी जाती है

"मोनू ने गाजर किसे खिला दे.."

हर्षिता की बात पे न जाने क्यों मोनू की हलकी सी हसी फुट पड़ती है, और सविता भी अपनी गांड में सुरु हो चुके दर्द को महसूस करते हुए कहती है

"अब तू पहले चल यहाँ से.. वर्ण इस बदमाश का कोई भरोषा नहीं.."

हर्षिता समझ नहीं पाती पर रसोईघर क बहार निकल पड़ती और उसके पीछे पीछे hi सविता भी अपने टांगों को फैलते हुए धीरे धीरे चलती जा रही थी.. जिसे देख क मोनू की हसी फुट पद रही थी

करीब 5 मं बाद.. सविता वाले कमरे में

सामने खाना सजा हुआ था और वो गाजर की प्लेट भी वही राखी हुई थी, हर्षिता बैठ चुकी थी पर सविता सबसे पहले एक मुलायम तकिया उठती है और उसे अपने स्तन पे रखने क बाद धीरे से उसपे अपनी गांड टिका क बैठने लगती है.. पर जैसे hi बैठने को होती है, उसके एक भीसाद दर्द की लहर पुरे सरीर में भर्ती हुई महसूस होती है

"Aaaaaaaaaaahhhh… Maaaaaaaaaaa…."

हर्षिता उसे ऐसे देख क हैरानी से भर्ती हुई

"किया हुआ बड़की भौजाई.. सब ठीक है न.. ?"

सविता धीरे से उस तकिये पे बैठते हुए

"है.. है… सब ठीक है, चल खाना कहते है.."

पर हर्षिता अपनी बड़की भौजाई क चेहरे पे दर्द की लहर को साफ़ साफ़ देख प् रही थी

"अरे पर हुआ किया.."

सविता एक पल सोचने क बाद

"अरे इतने समय से खुले खेत में नहीं गयी न.. तोह आज कल सुबह खुल क हग नहीं पाती हु"

सविता की बात पे हर्षिता जोर से है पड़ती है और हस्ते हुए कहती है

"अरे तोह कल से चला जायेगा.. खेत की बात hi अलग होती है"

सविता भी उसकी बात सुनकर मुस्कुरा देती है, पर कही न कही अपनी बड़की भौजाई क चेहरे को पड़ते हुए हर्षिता को लग रहा था की बात सिर्फ इतनी नहीं है

हर्षिता पहला निवाला मुंह में रखते हुए सामने सविता को देख क मन hi मन सोचने पे विवस हो जाती है

'किया.. मोनू ने बड़की भौजाई ने गांड भी…'

*** * ***

ऐसी क साथ ये सन भी पूरा होता है, अब इस कड़ी में सिर्फ 2 और सीन्स बचे है




आशा है ये कुछ अलग और मेरी अपनी फंतासी को पड़के आप सभी को मज़ा आया होगा



जल्दी hi अगले दृश्य को लेके आप सभी से मिलता हु

🙏🙏🙏🙏

नष्ट सन

👉 मालती की चाय

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🆕 अपडेट 👉 पेज No. 500-501

अपडेट #21

Chapter 👉 कामुक वर्षा..

सन 🖼️ #07

गांड का दर्द...

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मालती की चाय से पहले.. आपको मिलना होगा 'कुंदन' से

नष्ट अपडेट 👇

कुंदन
 
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