Adultery मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #02 Running - Page 18 - SexBaba
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Adultery मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #02 Running

मोनू से काबू नहीं होता वो जल्दी से अपना हाथ आगे बड़ा क सविता क कंधे पे रखने की कोशिश करता है ताकि उसकी चूचियों को और अपने लुंड का पूर्ण मिलान करवा सके.. पर समय रहते सविता पीछे हो जाती है, मानो मोनू की हालत का भरपूर आनंद उठा रही हो

"बढम्याश.."

सविता धीरे से अपने hi निप्पल्स को अपनी उँगलियों क बीच भरके उसे मोनू को दिखते हुए मसलते हुए ये बात कहती है

मोनू तोह किसी बचे क जैसे बस मुंह बना क रह जाता है, जिसपे सविता क अधरों पे मुस्कान खिल उठती है

"हैईईईई.. मेरा बचा.."

सविता मुस्कुराते हुए

"तैयार हो जा.. आज तुझे बहुत कुछ चूसना है.."

मोनू को एक पल क लिए तोह अपनी बड़ी माँ की बात समझ नहीं आयी थी, पर जैसे hi वो उनकी बात को समझता है उसका लुंड ख़ुशी से झूम उठता है.. मोनू का हाल इस समय ठीक वैसा hi था जैसे एक बचे का उसके पसंदीदा खिलौना मिलने पे होता है

सविता पूर्ण रूप से नंगी अवस्था में अपने जवान भतीजे क सामने कड़ी अपनी गीली छूट का रास बहते हुए मुस्कुरा रही थी और फिर उसी अवस्था मैं आगे बढ़ती है और एक बार फिर से मालती क बेटे क ऊपर झुक जाती है, पर इस बार वो ऐसे झुकी हुई थी की उसकी बड़ी बड़ी भरी भरकम चूचिया ठीक मोनू क मुंह क ऊपर लटक रही थी.. मानो एक मोती भैंस अपने थान दिखा रही हो

कुंदन जैसे जानवर का बीटा मोनू भला ऐसा मौका कैसे हाथ से जाने देता.. आखिर कुछ असर तोह हुआ hi होगा उसके ऊपर भी उसके बाप का.. वो तुरंत hi अपना मुंह ऊपर उठा क अपने दाँतों से 'बड़ी माँ' का एक मोटा थान यानि उनकी चुकी का निप्पल्स जकड लेता है और जोर से काट लेता है, जिससे सविता क पुरे जिस्म में तीव्र पीड़ा ुप्तां हो जाती है पर वो चिक्ति नहीं

"Aaaaaaaaaahhhhh...... कमीनाआआआ…. काटने की नहीं.. आआआअह्ह्ह्ह.. चूसने की चीज़ है.. ये…… आआआआहहह”

मोनू भी जनता था की अब उसे आगे किया करना है.. इसलिए वो वैसे hi लेते लेते अपना मुंह ऊपर करके अपनी बड़ी माँ की बड़ी चुकी को मुंह में पूरा भरने की भरकश कोशिश करता है, जिससे महेंद्र की पत्नी का एक दूध अब ाचा खासा मोनू क मुंह में भर चूका था और वो बिना समय नस्ट किये उसे ऐसे चूसने लगता है जैसे एक बचा अपनी माँ का स्तनपान कर रहा हो

"Aaaaaaaaaahhhhhhhhhhh… essssssssssssssssshhhhhhhhhhhh.. ऐसे hi………. Uffffffffffffffff…."

एक जवान लड़के से अपनी चुकी चुसवाने क कारन सविता का पुरे सरीर में एक अलग सी उत्तेजना सी भरने लगती है.. और उसकी सिसकारियां उसकी कामुकता का सबूत बनने लगती है

"Aaaaaaaaaahhh.. सब्ब्ब्बैस्सस्स्स्सह्ह्ह.. मेरे laaaaalllllllllll.. Aaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhhh.. ऐसे hi………. Uffffffffffffff… जोर से चूस… पूरा दूध पि जा अपनी रखेल kaaaaaaaaaaaaaa… Aaaaaaaaaaaaaahhhh"

मोनू भी अब अपनी बड़ी माँ की आज्ञा का पूर्ण पालन करते हुए अपना मुंह ऊपर उठाये हुए जोर जोर से उनकी चुकी को ऐसे चूस रहा था, जैसे सच में एक बचा अपनी माँ का दूध निचोड़ रहा हो, पर साथ hi वो अब अपने हाथों पे भी काबू बनाये हुए था

सविता भी उसी प्रकार अपनी बड़ी बड़ी चूचियों को मोनू क मुंह क ऊपर झुकाये हुए उसे स्तनपान करवा रही थी.. मोनू का अंदाज़ इतना अनोखा था की सविता खुद hi अपने एक हाथ से उसके बालों में उंगलिया फिरने लगती है और दूसरे हाथ से अपनी गीली योनि को मसलने लगती है, मोनू क जोर से चुकी चूसे जाने पे सविता क पुरे सरीर में अजीब सी गुदगुदी महसूस हो रही थी जिस कारन उसकी योनि से बहने वाला रास कई गुना ज्यादा गदा होता जा रहा था

"Aaaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhh…. Monuuuuuuuuuuuuuuuuuuuuuuu.. Uffffffffffffffffff… आईसीएएएएए.. Hiiiiiiiiiiiiiiiii… Aaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaahhh… Maaaaaaaaaaaaaa"

तभी मोनू मस्ती में अपने दाँतों से अपनी बड़ी माँ क निप्पल्स को अपने दाँतों क बीच लेके इस बार पहले से भी जोर से काट लेता है.. जिससे एक बार फिर से सविता को जोर का झटका लगता था साथ hi पीड़ा का कामुक रूप भी महसूस होता है, पर इस कारन उसकी मोनू क बालों में चलने वाली ऊँगली ने जोर से उसके बाल को जकड लिया था और इस कारन मोनू का मुंह भी खुल गया था और सविता मौका पाके तुरंत hi पीछे हो जाती है.. और अपने निप्पल्स को सहलाते हुए

"बदमाश… पुरे जानवर है"

सविता की इस बात पे मोनू भी मुस्कुरा पड़ता है और हस्ते हुए कहता है

"दूसरा वाला भी दो न.. वो भी चूसना है"

सविता अपने निप्पल्स को सहलाते हुए जो काफी हद तक लाल हो चूका था

"बस अब नहीं मिलेगा.."

मोनू- (बुरा सा मुंह बना क) ऐसे थोड़ी होता है.. और आपने तोह कहा था आप मेरी..

सविता, मोनू की बात पे मुस्कुरा पड़ती है

"है मैं तेरी रखेल हु.. इसलिए तेरी ये रखेल अब तुझे दूध से ज्यादा अछि चीज़ चूसने को देगी.."

सविता की इस बात का पूरा असर मोनू क तने हुए लुंड पे नज़र आने लगता है

सविता अब पूरी सावधानी से अपना एक पेअर बिस्तर पे रखती है जिससे उसकी योनि की फाकें पूरी खुल जाती है और मोनू को एक गदराई औरत क अंदर की असली जवानी नज़र आती है, जो उम्र बढ़ने क साथ साथ और जवान होती जाती है.. फिर सविता धीरे से बिस्तर पे चढ़ जाती है और अब वो ऐसे कड़ी थी की उसके दोनों पेअर बिस्तर पे लेते हुए मोनू क दोनों और थे और उसकी गीली रास टपकती योनि ठीक मोनू क तने हुए लुंड क ऊपर अपनी इज्जत उठवाने को तैयार थी

अपनी गदराई 'बड़ी माँ' को ऐसे पूर्ण नंगी हालत में अपने ऊपर खड़ा देख मोनू का हाल किया था, ये में समझा भी नहीं सकता, पर उसका लुंड जैसे झटके खा रहा था उससे तोह यही लग रहा था की काश बड़ी माँ जोर से उछाल क उसके लुंड पे गिर पड़े

सविता धीरे से थोड़ा आगे की और सरकती है और फिर अपना संतुलन बनाए हुए धीरे धीरे मोनू क ऊपर बैठने लगती है पर अब उसकी गीली छूट मोनू क तने हुए लुंड क ऊपर नहीं उसकी नाभि क ऊपर थी.. और जल्दी hi सत्तू की गरम माँ अपनी जलती हुई गीली योनि को मोनू की नाभि पे रख क बैठ जाती है

"Aaaaaaaaaahhhhhhhhhhhh… Badddddddiiiiiiiiiiiii… माआआआ"

मोनू की इस कामुक सिसकारी का कारन था, उसकी नाभि को महसूस होने वाली वो गर्माहट जो उसे पागल कर रही थी, उसे तोह ये भी लगता है जैसे उसकी गहरी नाभि में उसकी बड़ी माँ की योनि से बहने वाला कॉमर्स भर रहा हो.. और इसीलिए मोनू अपने दोनों हाथों को उठा क अपनी गदराई बड़ी माँ की बड़ी बड़ी चूचियों को जकड़ने की कोषसिंह करता है, पर सविता बीच में hi उसके हाथों को पकड़ लेती है और मुस्कुराते हुए कहती है

"कहा न.. आज सब कुछ तेरी ये रैंड करेगी.."

और ये कहते हुए अपनी कमर को धीरे से आगे पीछे करते हुए अपनी खुली योनि को अपने जवान भतीजे की नाभि पे रगड़ते हुए धीरे धीरे ऊपर की और सरक रही थी, और ऐसा करने क कारन उसे काफी ज्यादा झुकना पद रहा था जिस कारन उसकी बड़ी बड़ी चूचिया भी हलकी लटक क मोनू क पेट से रगड़ रही थी.. अब ये दोहरा हमला सहना हर किसी क बस की बात कहा और ऐसी कारणवस मोनू क लुंड से कॉमर्स की और ज्यादा हलकी बूंदें उसके मोठे लाल सुपडे पे नज़र आणि सुरु हो जाती है

"Aaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhh.. बड़ी Maaaaaaaaaaaaaaaaa…. आप सच में असली चिनार हो……… ufffffffffffff…."

अपने जवान भतीजे क मुंह से ऐसी कामुक तारीफ पाके सविता का जिस्म और ख़ुशी से झूम उठा था इसलिए वो अब दोनों हाथों को अपने भतीजे क सीने पे जमा लेती और पूरी तरह झुक क अपनी बड़ी बड़ी चूचियों क काले जामुन सामान निप्पल्स और अपनी गीली रास चोरटी योनि को मोनू क जिस्म पे रादगति हुई ऊपर की और बढ़ने लगती है

सविता- (अपनी कामुकता का परचम लहराती हुई) आआआअह्ह्ह्हह.. अब बता कैसी लगी तुझे तेरी ये रखेल.. आआआअह्ह

मोनू- (अपनी बड़ी माँ की बड़ी बड़ी चूचियों का छुवन और योनि की रगड़ से कामुकता की गहरी खाई में गिरते हुए अपनी आँखों को बंद कर चूक था) Aaaaaaaaaaaahhhh.. बहुत मस्त है मेरी रखेल…. हीी.. मेरी रैंड.. Uffffffffff…. कितना तड़पती हो अपपपप.. Aaaaaaaaaaaahhhh..

जहा कुछ दिएर पहले मोनू अपनी बड़ी माँ को रैंड, रखेल जैसे कामुक शब्दों से सम्बोधित करने से दर रहा था, वही अब धीरे धीरे ये सब सविता की दूसरी पहचान बनते जा रहे थे

सविता जोर जोर से अपनी योनि को मोनू क पेट और अब उसके सीने पे रगड़ते हुए इतना ऊपर आ चुकी थी की मोनू को उनकी योनि की कामुक खुसबू आणि सुरु हो चुकी थी.. इसलिए वो धीरे से अपनी आँखों को खोलता है तोह उसके सामने दुनिया की सबसे खूबसूरत चीज़ थी.. एक गदराई औरत की 'बुर'

"आआआआअह्ह्ह.. Saalliiiiiiiiiiiiii.. चिनार.. कितनी मस्त खुसबू आ रही है.. आपकी छूट सी……. Aaaaaaaaaaaaaahhhh"

मोनू अब धीरे धीरे खुलने लगा था, और नए नए शब्दों से अपनी बड़ी माँ को सम्भोधित करने लगा था

सविता- (आज कुछ अलग और नया करते हुए अपने जवान भतीजे क लुंड को बेताब करते हुए) आआआआअह्ह्ह.. यही तोह वो असली चीज़ है तोह तुझे अपनी इस रखेल.. अपनी रैंड.. अपनी कुटिया.. की चुसनी है.. Aaaaaaaaaahhhhh.. बता चूसेगा न.. आआआआअह्ह्ह

मोनू जो अब कामुकता क बहुपस में पूरी तरह बांध चूका था, और अब वो कुछ भी करने को पूरी तरह तैयार था.. और यहाँ बात तोह एक गदराई औरत की योनि चूसने की थी, कोई पागल hi होगा जो मन करेगा

"ऐसे.. तोह मैं पुरे जीवन भर चूस सकता हु.. आआआआअह्ह"

मोनू की इस बात ने सविता की योनि को और गीला कर दिया था पर वो कुछ कहती नहीं बस मुस्कुराते हुए इस बार पूरी तरह ऊपर की और हलकी सी उठ जाती है और मोनू क सीने से ऊपर की तरफ खिसकते हुए अपनी गीली गदराई छूट को कुंदन क जवान बेटे क मुंह क ऊपर रख देती है

"Aaaaaaaaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhhhhh… Maaaaaaaaaaaaaaaaaaaaa……………. Monuuuuuuuuuuuuuuuuuuuuuuuuuu…."

जैसे hi सविता ये क्रिया करती है, उसे अपनी गीली योनि क होंठों पे उसके जवान भतीजे क होंठ महसूस होते है और असली स्वर्ग का द्वार नज़र आता है, ककी इस एक पल क लिए उसकी आँखें भी बंद हो जाती है

मोनू भी समय नस्ट नहीं करता और सत्यम की माँ की योनि से प्रेम करना सुरु कर देता है और जैसे hi पहेली बार उसकी जीभ सत्यम और सत्तू की जन्मभूमि को चुटी है सविता की आठ फिर से फुट पड़ती है

"Aaaaaaaaaahhhhh....... ेस्स्स्सह्ह्ह्ह.... माआआआ.... हैईईईई"

वही अपनी जीभ की शक्ति प्रदशन देख क मोनू का लुंड भी जोरो से हिलते हुए अपनी ख़ुशी की सुचना दे देता है.. मोनू अपने मुंह क ऊपर अपनी गीली छूट लेके बैठ चुकी अपनी बड़ी माँ की गहरी योनि की फाकों को फैलते हुए अपनी जीभ को उस कामुक गलियारे में घुसते हुए जोर से अपनी जीभ किसी कुत्ते की तरह चलना सुरु कर देता है

"Sssssssssslllllllllllllllllllllllllllluuuuuuuurrrrrrrrrrppppppppp……… Sssssssssllllllllllllllluuuuuuuuuuuppppppppppppp…….. Sssssssrrrrrrrrrrrrppppppppppp… Slllllllllllllluuuuuuuuuuuuppppppppppp…."

सविता ऐसे एक जवान लड़के की जीभ को अपनी योनि की गहराई तक घुसने से मिलने वाले आनंद से पूरी की पूरी पागल हो उठती है

"Aaaaaaaaaaaahhhhhhhhh.. Kamineeeeeeeeeeeeee… uffffffffffffffffff… Haiiiiiiiiiiiiiiiiiii…Maaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaa.. Aaaaaaaaaaaaahhh… haiiiiiiiiiiiii.. ऐसे……… ऐसईईईई…. ऐसे hi chussssssssss…. Aaaaaaaaaaahhhh… खा जा अपनी बड़ी माँ की योनि को……. Aaaaaaaaaahhhh…. Maaaaaaaaaaaaaaaa"

मोनू ऐसी हालत में तोह नहीं था की वो कुछ भी बोल पाटा ककी उसकी लम्बी लपलपाती हुई जीभ 'मुरली दस' की 'बड़ी बहु' की गहरी योनि में पूरी अंदर घुसी हुई अपना कामुक खेल दिखा रही थी.. वैसे यहाँ अंदर कमरे में अंगीठी की लाल रौशनी में सविता की हवस से भरी हुई कामुक सिसकारियां जितनी तेज़ हो रही थी.. बहार बारिश का शोर भी उतना hi बढ़ता जा रहा था, मानो सुंदरपुर की इस वर्षा ने भी तय कर लिया था की वो खेल का राज़ इस कमरे से बहार नहीं जाने देगी

देखते hi देखते अगले कुछ पलों क अंदर ये खेल इतना कामुक हो चूका था की 2 जवान बच्चों की माँ भी अपनी योनि क गाड़े रास को टपकने से खुद को रोक नहीं प् रही थी.. मानो आज सच में वो एक रैंड या रखेल बनने की अपनी बात को पूर्ण सत्य साबित करने पे उतारू हो चुकी थी..

"आआआआह्ह्ह्हह्ह्ह्ह.. कहाआआआ.. Jaaaaaaaaaa.. कुटटटटटटटटी…. Aaaaaaaaaahhhhhhh.. खा जा मेरी छूट को……… Aaaaaaaaaaaaaahhhhh… Maaaaaaaaaaaaaa…. आआआआअह्ह्ह… ufffffffffffffff… कितनी खुरदुरी जीभ है तेरी……. Aaaaaaaaaaaaahhh…….. Maaaaaaaaaaaaa… खा jaaaaaaaaaaaaa…. मेरी योनि को………. Aaaaaaaaaaaaahhh… ufffffffffffffffff…. कामिनी मालती ने बड़ा ताकतवाला दूध पिलाया है.. तुझे.. Aaaaaaaaaahhhh.. तू तोह सच में तेरी छूट खा hi जाएगाआआआआ…….. आआआआहहह……….. Maaaaaaaaaaaaaa…"

महेंद्र क घर क अंदर का ये गन्दा पर कामुक खेल ऐसा सुरु हो चूका था की.. सविता अपनी आअह्ह्ह्ह और कामुक सिसकारियों को रोक नहीं प् रही थी.. वैसे भी मोनू की जीभ कुछ ऐसे कार्य करते हुए अंदर तक प्रवेश करती की सविता आआअह्ह्ह भरते हुए कुछ इंच ऊपर उठ जा रही थी और उनके अंदर की हवस कामुक शब्दों का रूप लेके बहार आती

"आआआआअह्ह्ह्ह.... Maaaaaaaaaaaaaaa… कुटटटटटीईईई…. Aaaaaaaaaaaaahhhhhh… कमीनेईईईई… आआआआहहहहह… कितना अंदर तक घुसायेगा अपनी जीभ.. Aaaaaaaaaaaahhhhh… स्स्स्सस्शह्ह्ह... माआआआ.... हैईईई"

सविता, मोनू की कामुक हरकत से खुद को सँभालने की पूर्ण कोशिश करते हुए बीच बीच में अपनी गांड को जोर से मोनू क मुंह पे पूरी तरह दबा देती.. जिससे उसकी भरी भरकम गांड क दोनों पाटों क बीच मोनू का मुंह एक पल क लिए पूरी तरह चुप सा जाता.. पर वो उतने में hi नहीं रूकती, वो जोर जोर से अपनी गांड को मोनू क मुंह पे घूमते हुए रगड़ भी दे रही थी

"Aaaaaaaaaaaaaaahhhhh… लेईईईई… कहाआआआ.. लीईईई… kutttteeeeeeeeeeeee…. खा ले……… मेरी छूट… गांड भी खा ले कुत्त्तीीी… पि जा मेरे मुठ…. Aaaaaaaaaaaaaaahhhhh"

मोनू भी अपनी बड़ी भरी भरकम गदराई भैंस जैसी बड़ी माँ की योनि को चूसते हुए जब जोर से अपनी जीभ को नुकीला करके अंदर घुसता तोह सविता कामुकता क चलते ऐसे उछाल पड़ती मानो जैसे एक पल क लिए वो हवा में उड़ने लगी हो.. पर वो भी एक गदराई गाओं की देसी औरत थी जिसके लिए न जाने मोनू जैसे कितने लड़कों ने मुठ मार मार क अपने लुंड को सुजय होगा.. इसलिए वो ऐसा होने पे तुरंत hi अपनी कमान वापस से संभालती और जोर से अपनी छूट को कुंदन क जवान बेटे क मुंह पे रख क कसके रगड़ना सुरु कर देती है.. और मुस्कुरा क कहती है

"छूट चाटेगा अपनी रखेल की.. ये ले.. .और ली… आआआह्ह्ह्ह… खा… खा ले… ये लिए… कुट्ट्टीीीे… खा जा अपनी बड़ी माँ की बड़ी छूट को… देख कितना रास भरा है तेरी इस चिनार बड़ी माँ की छूट में… Aaaaaaaaaaahhhhh…."

महेंद्र क घर में घनघोर वर्षा क बीच ये कामुक खेल धीरे धीरे और गहराता जा रहा था.. मानो असली वर्षा तोह आज 'सुरीली देवी' की बड़ी बहु की योनि से होनी हो

मोनू का मन तोह वैसे था की वो अपनी बड़ी माँ की हिलोरे कहती बड़ी बड़ी चूचियों को जोर से अपनी हथेली क बीच भर ले, और उन्हें ऐसे मसल दे की उनका दूध निकलना सुरु हो जाये.. पर वो अपनी इस नयी रखेल का आदेश मान रहा था की आज जो करेगी वो खुद करेगी

पर उसकी जवान खुरदुरी और नुकीली जीभ इस समय सत्यम की माँ की योनि की गहराई मैं घुस क अपना पूरा जादू दिखने से पीछे नहीं रह रही थी

"उम्मम्मम्मम... सललललररररररपपपप..... सररररलललपपपपप..... Srrrrrrrrrrrrrrrr......... सललललररररररपपपप.... उम्मम्मम्मम.... Laaaaalllpppppp...srrrrlllpp.. सररररलललपपपपप... आआआहहहहह"

सविता कामुकता की अधिकता क चलते हुए खुद hi अपनी दोनों बड़ी बड़ी दुधारू चूचियों को जोर से अपने hi हाथों से बेहरहमी से दबोच लेती है और ऐसे उनका मर्दन करने लगती है जैसे किसी भी पल उसके निप्पल्स से दूध की धरा बह उठाएगी

"आआअह्हह्ह्ह्ह..... Haiiiiiiiiiiiii.. reeeeeeeeeee… मोनू…………. kuttttttttttteeeeeeeeeee… Aaaaaaaaaaaaahhhh.. Aiseeeeeeeeeeeeee.. Hiiiiiiiiiiiiii… uffffffffffffff… Aaaaaaaaaaaaaaaaahhhh… ेस्शह्ह्ह्हह्ह्ह्ह.... मेरी छूट का पूरा रास चूस ले कुट्टी…… चूस ले अपनी इस चिनार की छूट का गाड़ा कॉमर्स… आआअह्हह्ह्ह्ह… मेरी जैसी कुटिया चिनार तुझे पूरी दुनिया में नहीं मिलेगी… आआआआहहहहह… खा जा मेरी योनि को…… आआआहहह"

मोनू भी बड़ी बड़ी चूचियों वाली बड़ी माँ की ऐसी गन्दी पर कामुक बातों से और ज्यादा पागल होता जा रहा था.. इसलिए वो बिना समय व्यर्थ किये और ज्यादा बेहरमी से 'सत्तू की माँ' की छूट चूसे जा रहा था

"सललललररररररपपपप.... सरररर.... लाहालललपपपपपप... लाहालललपपपपपप..... सररररलललपपपपप.... उम्मम्मम.... आआअह्ह्ह.... उम्मम्मम्मम... सररररलललपपपपप"

इस नए अनुभव से अनभिग मोनू इस खेल में धीरे धीरे पूर्ण निपूर्ण होता जा रहा था.. और ऐसा होता भी कैसे नहीं

जीवन की पहली छूट का आनंद उसे सेहर की कामुक 'अनोखी' ने दिया और फिर अपनी hi सगी माँ ‘मालती’ की योनि का छेद बड़ा करके उसने इस खेल में और अधिक निपुन्डा हासिल की और आज उसे इस खेल में माहिर बनाने का कार्य 'स्वर्गवासी मुरली दस' क घर की सबसे अनुभवी औरत सविता खुद कर रही थी

सविता अपने जवान भतीजे क मुंह पे अपनी योनि को फैलाये हुए बैठी हुई उसी हालत में hi अपना चेहरा घुमा क जब देखती है तोह उसे मोनू क तगड़ा लुंड नज़र आता है जो जोरो से हिलोरे खा रहा था.. और उसे देख क जो आग सविता क अंदर अचानक से बाद गयी थी उसके लिए मेरे पास शब्दों की पूर्ण कमी है, और ऐसा जवान लुंड जब एक गदराई औरत देखती है तोह उससे रुक पाना संभव नहीं हो पता है.. इसलिए वो अब मोनू को इस चिनार की चिनपन्ति दिखने का तय कर लेती है..

सविता धीरे से अपनी रास चोरटी छूट को मोनू क मुंह से उठती है तोह मोनू ऐसे लम्बी लम्बी साँसे लेने लगता है जैसे मानो उस वातावरण की अंतिम वायु बची हो, पर तब भी उसके चेहरा की मुस्कान और होंठों और चेहरे पे नज़र आने वाला सविता की योनि का कॉमर्स बता रहा था की उसे इस खेल में कितना मज़ा आया

सविता अपनी मोनू द्वारा जैम क चूसी गयी योनि को उसके मुंह से हटती है और उसी अवस्था मैं हल्का उठते हुए पूरा संतुलन बनाये रखे एक गदराई औरत की कामुकता का पूरा परचम लहराते हुए मोनू क नंगे सरीर क ऊपर अपनी योनि लहराते हुए आगे की और बढ़ती है साथ hi साथ मोनू क सरीर क ऊपर उसकी बड़ी माँ की योनि से टपकते हुए रास की कुछ बुँदे जब गिरती है तोह ऐसा प्रतीत होता है मानो मोमबत्ती की गरम मोम उसके जिस्म पे गिरायी जा रही हो.. अब ये नज़ारा कितना कामुक होगा ये आप सोच hi सकते है

सविता जब मोनू क खड़े लुंड क ऊपर पूरी तरह हवा में पहुंच जाती है, तोह मुस्कुराते हुए अपनी कामुक हसी की छठा बिखेरते हुए अपनी योनि की गीली दीवारों को मोनू क तने हुए लुंड क टोपे पे लगाती हुई उसे तड़पना सुरु कर देती है और उसकी आँखों में देखते हुए कहती है

"बता छोड़ेगा न अपनी रखेल को…"



✨ कंटिन्यू... 👇 ✨
 
मोनू भी अपने लुंड क टोपे पे ऐसी गरमा गरम योनि का एहसास पाके पूरी तरह कामुकता की अग्नि में जल उठा था, पर वो अपनी बड़ी माँ की आज्ञा मानते हुए बड़ी मुश्किल से खुद से hi लड़ाई लड़ते हुए अपने हाथों को काबू में रखते हुए बोल पड़ता है

"है सालियी.. मादरचोद एक बार अपनी छूट मेरे लुंड पे रख तोह बहनचोद तू.. फिर देख कुटिया कैसे तेरी छूट फाड़ता हु.."

मोनू ये कहते हुए जोर से नीचे से एक दक्का मरता है, पर मोनू जैसे न जाने कितने जवान लड़कों का पानी निकलने का दम रखने वाली सविता को इस बात का पहले से hi अंदेशा था इसलिए वो तुरंत hi और ऊपर को उठ जाती है जिससे बेचारे मोनू का लुंड बस हवा की छूट मार क रह जाता है.. और मोनू को कुछ न मिलता देख उसकी हालत पे हसी फुट पड़ती है सविता की

"किया हुआ मेरे लाल.. तेरी ये रैंड छूट तोह देगी, पर खुद से.. तुझे बस मजे लेने है इस गर्दै छूट क.. बोल तैयार है"

"है.. मेरी चिनार.. तुझे छोड़ने क लिए मैं और मेरा लुंड दोनों तैयार है.."

मोनू क मुख से ऐसे फूल झड़ते हुए देख सविता की योनि में एक अलग सी सुकून देनी वाली खुजली सुरु हो जाती है और वो खुद भी मरी जा रही थी एक जवान लड़के से अपनी चुदाई करवाने को

सविता एक बार फिर से अपना संतुलन बनाये हुए धीरे से अपने दोनों हाथों को जवान मोनू क सीने पे जमा लेती है और वापस से अपनी भट्टी जैसी गरम योनि का द्वार उसके दहकते हुए लुंड पे प्रेम भरा स्पर्श देते हुए मोनू की आँखों में देखते हुए धीरे से कहती है

"ले अब छोड़ इस चिनार को.."

और फिर किया था, अपने भरी भरकम सरीर का पूरा भार एक hi बार में उस जवान लड़के क लुंड पे दाल देती है, जिसके कारन अपने hi कॉमर्स की बूंदों से गीला मोनू का लुंड उस कामुक गरम गुफा का रास्ता चौदह करते हुए उसके अंतिम बिंदु तक पहली hi बार में प्रवेश कर जाता है.. और ऐसी क साथ बहार भी आसमान में एक जोर की बिजली कही गुनी थी

जहा घर क बहार छप्पर नीचे बैठा हुआ महेंद्र आसमान की और ऊपर देखते हुए कहने पे मजबूर हो जाता है

"लगता है आज तूफान आ क hi रहेगा.."

पर उसे किया पता था की तूफान तोह आ चूका है

बड़ी बड़ी चूचियों की स्वामिनी सविता जब अपने कामुक सरीर का पूरा भार एक जवान लोडे पे डालती है तोह उसकी चूचिया ऐसे हिलोरे कहती है मानो जीत का झासँ मन रही हो.. वही सविता की चूड़ी चुदाई छूट एक hi बार मैं मालती क जवान बेटे क कैसे और तने हुए खूबसूरत लुंड को अपने अंदर समाती चली जाती है.. सविता को एक नया और सबसे सुकून देने वाला एहसास मिलता है जिसके चलते उसकी आँखें खुद hi बंद होती चली जाती है

"Aaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhhhhhhhhhh………. Maaaaaaaaaaaa…. आआअह्ह्ह"

ये तोह हमारी सविता hi की हिम्मत थी जो इतनी आसानी से इतना गरम भट्टी जैसा लुंड निगल गयी थी वर्ण कोई जवान योनि वाली होती तोह चीख मार क रोना सुरु कर देती.. पर सविता तोह बस सविता है

मोनू को अपने गरम लुंड क चारो और एक भट्टी जैसी सुलगती हुई महसूस होती है तोह वही सविता को भी इस नए लुंड में कुछ ज्यादा hi अकड़ और सख्ती महसूस होती है.. जो इस बात का सबूत था की ये लुंड आगे कई छूटों का मुरब्बा बनाने वाला है..

सविता को मिलने वाले इस नए आनंद ने उसके जिस्म को ख़ुशी से भर दिया था, वही एक hi बार में पूरा लुंड निगल लेने क चलते उसे एक भीसाद दर्द भी प्रतीत हुआ था

"Aaaaaaaaaahhhhhh.... माआआआ........ कामिनीईईई… haiiiiiiiiii रीई तेरा लुंड तोह बड़ा जल रहा है….. Aaaaaaaaaaaahhhhhh.. आआआहहह.. Maaaaaaaaaaa.. ऐसा लग रहा है जैसे ये मेरी छूट को जला डालेगा…. Ufffffffffff"

मोनू भी ऐसी जलती हुई छूट में अपना लुंड पाके उसके एहसास शब्दों का रूप ले लेते है

"Aaaaaaaaaahh.. बड़ी Maaaaaaaaaaaaaaaaa…. कितनी गीली छूट है.. आपकी… उफ्फ्फ्फफ्फ्फ़…. कामिनी साली एक hi बार में पूरा लुंड खा गयी… कुटियाआ……… तू तोह सच में पूरी चिनार औरत है… आआआआह्ह्ह्ह"

Sabhya-sushil मोनू क ऊपर भी गाओं और सविता की गरम योनि का पूरा असर दिखने लगा था, थोड़ी दिएर पहले तक जो जवान लड़का चिनार जैसे शब्दों क बारे में सोच भी नहीं रहा था अब वो खुलके ऐसे hi शब्दों से अपनी बड़ी माँ को सम्बोधित कर रहा था.. ये साली छूट कुछ भी करवा देती है 😅

"आआआहहहहह.. कमीने… तेरा लुंड तोह जैसे पत्थर का बन गया हो… uffffffffff…. पहले तोह इतना मजबूत नहीं था.. haiiiiiiiiii.. रईईईईई… ऐसा लग रहा है जिसे ये मेरी योनि को पहाड़ क hi रख देगा.. Haiiiiiiiiiiii.."

सविता ऐसे शब्दों से गरम प्रहार करते हुए धीरे धीरे अपनी योनि को पूरी तरह मोनू क लुंड पे जमाये हुए अपनी गांड को गोल गोल घूमने लगती है जिससे मोनू को असीम आनंद प्राप्त होने लगता है.. और यही है एक अनुभवी औरत की ताक़त

सविता कुछ पलों तक पूरा आनंद देने क बाद धीरे से अपनी गांड उठाये हुए अपनी योनि को मोनू क लुंड से आज़ाद करते हुए अलग करने लगती है.. यानि वो बारिश क बीच चलते हुए इस खेल को और आगे बढ़ाने का कार्य कर रही थी, पर जवान मोनू को भला अभी इतनी समझ कहा थी की वो तोह जवानी क जोश में बिना कुछ सोचे समझे नीचे से अपनी कमर को पूरा जोश देते हुए जोर से ऊपर की और उछाल देता है जिससे एक बार फिर से उसका तना हुआ मजबूत लुंड जो अभी योनि से आधा hi बहार आया था वापस से 'सत्यम की माँ' की योनि में अंदर प्रवेश करता चला जाता है.. और इस अनचाहे प्रहार से अनजान सविता को जब अपनी योनि में एक तेज़ ताक़तवर धक्का महसूस होता है तोह उसके पुरे सरीर में दर्द की एक नयी लहर दौड़ जाती है और ऐसी गदराई औरत का चेहरा भी दर्द से लाल पद जाता है, उसकी आँखें तोह मानो बहार को hi निकलने को आ जाती है

"आआअह्हह्ह्ह्ह... माआआआ............ kutttttttttttttttteeeeeeeeeeeeeeee….. रुक नहीं सकता था.. मादरचोद.. छूट पहाड़ क मानेगा किया………. haiiiiiiiiiiiiiiii….. reeeeeeeeeeeeeee….. Kutttteeeeeeeeeeeeee…. माआररररर daaalaaaaaaaaaaa.... रईईई...... हरामी मेरी छूट से खून निकल क hi मानेगा कियाआआआ……"

मोनू बुरी तरह दर सा जाता है, यानि उसे अभी भी बहुत कुछ सीखना था इस खेल में

"बड़ी माआआआ… वो मैं…………….."

सविता- (बीच में hi उसकी बात काटते हुए) चुप कर kuttteeeeeeeeeeeeeee…. मेरी छूट सुजा दी… और अब बड़ी माआआआआ.. कर रहा है…. हरामी कही क सच में चिनार बना डाला… kutttteeeeeeeeeeee… Aaaaaaaaaaahhhh

मोनू- वो…. मैं समझ नहीं paaya…Aaaaahhh... पर आपकी छूट सच में बहुत गरम है बड़ी मा… किसी रैंड जैसी… उफ्फफ्फ्फ्फफ्फ्फ़… मेरा लुंड निचोड़ लेंगी आप तोह अपनी योनि से……. आआआआह

सविता को भेसड दर्द महसूस हुआ था पर मोनू की बातों से उसके चेहरे पे भी दर्द क साथ साथ मुस्कान खिल गयी थी

"आआह्ह्ह्हह.. है क्यू नहीं अब तोह मैं तेरी रैंड hi हु… छूट तोह सुजा hi दी अपनी इस रैंड की तूने तोह.. अब छोड़ भी इस चिनार को जोर जोर से.. Aaaaaaaaaahhhhhh.. हरामी ने अंदर पूरी छूट चिल डाली… आआआआअह्ह्ह"

सविता ये कहती हुई धीरे से मोनू क तने और जोशीले लुंड से अपनी छूट धीरे से ऊपर की और उठती है, और फिर वापस से पूरी योनि को मोनू क लुंड पे जमा क बैठ जाती है.. उसके भरी सरीर क कारन मोनू का लुंड उसे पूरा अंदर तक घुसता हुआ महसूस हो रहा था… जो उसे अगल hi खूबसूरत एहसास दे रहा था

"बस मेरी चिनार… हो hi गया समझो.."

मोनू भी अब इस इस्तिथि का आनंद लेते हुए धीरे से हस्ते हुए कहता है

सविता जो मोनू की बात पे मुस्कुरा पड़ी थी.. वो अपने दोनों हाथों को उसके सीने पे रख क अपनी भरी कमर गांड को जोर जोर से हिलना सुरु कर देती है.. सविता अब पूरी तरह इस खेल को खेलने का मन बना चुकी थी, वैसे ये तोह होना hi था

इसलिए वो पूरा दम लगा क जोर से अपनी गांड उठती है और जैसे hi मोनू का मस्त जवान लुंड उसकी योनि क मुहाने तक बहार अत है.. वो तुरंत hi अपना पूरा भार वापस डालते हुए पुरे लुंड को वापस से अपनी योनि से हजम कर जाती है और एक कामुक ाःह भरते हुए मानो जैसे भीसाद वर्षा क बीच दहाड़ सी पड़ती है और कहती है

"Aaaaaaaaaaahhhh… कुट्ट्टीीीीे… leeeeeeeeee… छोड़… अपनी इस रखेल को…. पहाड़ मेरी छूट.. कुट्ट्टीीी…. दिखा अपने लुंड का लुंड… छोड़.. जोर से छोड़.. छोड़ इस चिनार को.. फड़ड़ड़ड़… क रख दे.. मेरी छूट…. आआआआहहहहह…."

एक जवान लड़के क लिए किसी गदराई औरत क ऐसे सब्द शक्तिवर्धक होते है, उसके खून का उबाल कई गुना बाद जाता है और लुंड का जोश दुगना तिगुना हो जाता है.. और ऐसी क असर क चलते मोनू नीचे से अपनी कमर को उठाते हुए और ज्यादा जोश से जोर जोर से दकके जड़ना सुरु कर देता है.. उसके धक्कों में इतनी ताक़त भर आयी थी की हर दकके क चलते सविता जैसी भरी भरकम गांड वाली औरत भी हवा में ऐसे उछाल जाती की लुंड का टोपा तक बहार हल्का नज़र आने लगता, पर तुरंत hi सविता भी खेल में हार न मानते हुए वापस से जोर लगा क उस जोशीली लुंड पे ऐसे बैठ जाती hi वापस से वो लुंड उसकी बच्चेदानी पे सीधा टोखर मरते हुए रुकता

"Aaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhh… kutttttttttttttteeeeeeeeeeeeeee…. कितनी बेहरहमी से छोड़ रहा है……… Aaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhhh…. Maaaaaaaaaaaaaaaaaa…. इतना ताक़तवर लुंड कैसे हो गया तेरा.. तू तोह मेरी योनि को भी ढीला कर दे रहा है… Aaaaaaaaaaaahhhhhhhh… uffffffffffffffff… ऐसे hi phaddddddddddddd… पहाड़ दे अपनी इस नयी रैंड की छूट.. Aaaaaaaaaaaahhhh.. मेरे जैसी चिनार नहीं मिलेगी तुझे… पूरा दम लगा क पहाड़ दे मेरी छूट…. जोर से छोड़ कुत्त्तीीीे…. छोड़… छोड़…. और जोर से छोड़…. Aaaaaaaaaaaahhh"

तेज़ बारिश और उसके घनघोर शोर क बीच एक गदराई औरत और एक जवान लड़का अब इस खेल में धीरे धीरे माहिर होते हुए पुरे आनंद से ये खेल खेलना सुरु कर चुके थे

"Aaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhhhhh…. Kuttttttttttttteeeeeeeee… आज तोह मेरी छूट.. लाललललललललल करके hi रहेगा तू…. आआआआहहह.. ऐसे hi………. Aaaaaaaaaaahhhh… ऐसे hi ले मेरी छूट… पहाड़ दे… अपनी माँ सामान औरत की छूट को… पुरे सुंदरपुर में तुझे कभी भी मेरी जैसी चिनार नहीं मिलेगी.. Aaaaaaaaaahhhh… Aaaaaaaaaaahhhh… haiiiiiiiiii reeeeeeeeeee… कुटटी… जोर सीए…. मार मेरी छूट…… आआअह्ह्ह"

मोनू क दुमदार धक्के कभी कभी 'सत्यम की माँ' की योनि पे इतने जोरदार पड़ते की उसकी मोती गांड हवा में उछाल पड़ती और योनि में घुसा हुआ वो जोशीला लुंड योनि की दीवारों क बीच घुसा हुआ नज़र आने लगता...

पर इस खेल में सविता भी अपना पूरा अनुभव दिखा रही थी.. वो खुद भी अपनी कमर को इतना ऊपर तक उठा लेती की उसकी गीली रास चोरटी योनि में मोनू का घुसा हुआ लुंड तोह कभी बस उसका टोपा hi अंदर बचता, पर वो बिना समय नस्ट किये वापस से अपने गदराये और भरी भरकम जिस्म का पूरा भार लुंड पे डालते हुए जोर से बैठ जाती जिससे उसके वो जोशीला गरम लुंड छूट में पूरा भरता हुआ महसूस होता है और उसकी आँखें कामुकता क चलते खुद hi बंद हो जाती

"Aaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhh.. Sabbasssshhhhhhhhhhhh.. मेरे लाआआलल्ल.. ऐसे hi छोड़ अपनी इस चिनार को……… Aaaaaaaaaaaaaaaaaahhh…… Maaaaaaaaaaa…. पहाड़ daaallllllllllllll kuttteeeeeeeeeee… मेरी छूट को…. ऐसे hi छोड़ अपने 'ताऊ की पत्नी' को.. Aaaaaaaaaaaaaaahhh"

सविता क मुंह से निकलने वाले हर एक सब्द में मोनू क जोश को बढ़ाने का भरपूर दम था.. और इसका असर भी साफ़ साफ़ नज़र आ रहा था, दोनों चची भतीजा भरपूर दम दिखते हुए योनि और लुंड का खेल खूब अचे से खेल रहे थे.. ऐसा लग रहा था की उस कमरे में अंगीठी की गर्मी से ज्यादा इस समय गर्मी उन दोनों क जिस्मों की थी और ये सत्य भी था

इस समय महेंद्र क घर क उस कमरे में इस कामुक प्रक्रिया क चलते सविता को जितना मज़ा मिल रहा था उससे ज्यादा सुकून और मज़ा लुंड वाले मोनू को मिल रहा था, और ऐसा होना भी पूर्णतः स्वभाबिक था ककी एक जवान लड़का एक गर्दै औरत की योनि को बेहरमी से चोदे जा रहा था.. वैसे छोड़ने का असली कार्य तोह सविता खुद hi कर रही थी ककी वो खुद hi जवान मोनू क लुंड पे विराजमान थी और जोरो से अपनी बड़ी भरी भरकम गांड को उठा उठा क वो जोशीला लुंड अपनी योनि की गहराई तक घुसा रही थी और अपने कामुकता से भरे शब्दों से मोनू क जोश को लगातार बढाती जा रही थी.. वैसे सविता क ऐसे जोरो से उछलने क कारन उसके पतिव्रता होने की निशानी यानि उसका मंगलसूत्र जोरो से उछलते हुए बार बार उसकी चूचियों को निशाना बना रहा था

"आआआअह्ह्ह.. ऐसे.. hi…. आआअह्ह्ह्ह.. ऐसे hi छोड़ कुटीऐई.. ऐसे hi छोड़ छोड़ क अपनी इस रैंड की छूट का भोसड़ा बना दे… पहाड़ दे अपनी इस मोती दुधारू चूचियों वाली चिनार की छूट को… आआह्ह्ह्ह…. हैईईई… मेरी गहराई छूट.. और उसमें तेरा मोटा घुसता हुआ लुंड… आआह्ह्ह्हह…. पहाड़… क रख दे मेरी छूट….. जोर जोर से छोड़ अपनी इस कुटिया को…"

मोनू भी नीचे से पूरा दम लगते हुए अपने लुंड पे बैठी गदराये जिस्म वाली सविता की योनि में नीचे से जोरदार दकके मरते हुए.. इस खेल में पीछे नहीं था

"आआआह्ह्ह्हह्ह… साली…. कुटिया…. तेरी तोह छूट पहाड़ दूंगा… मैं आज.. हा… सआईईई.. मेरी रखेल… कुटिया…. रंडी साली…. पहाड़… दूंगा तेरी छूट… आआह्ह्ह्ह…."

मोनू अपनी बड़ी माँ 'सविता' को गन्दी गन्दी गालियां देते हुए अब खुद को और नहीं रोक पाटा और अपने दोनों हाथों को आगे बड़ा क उनके आदेश की अंदेशी करते हुए उन भरी भरकम चूचियों को जकड लेता है.. और ऐसे मसल देता है की एक hi पल में सविता की तानी बड़े और मोठे जामुन जैसे निप्पल्स में लाली नज़र आ जाती थी

"आआह्ह्ह्हह्ह्ह्हह…. कुत्त्तीीीी…. उखड hi लेगा किया मेरी चूचियों को…. आआह्ह्ह्हह्ह्ह्हह… धीरे से मसल हरामी… आआअह्ह्ह्हह्ह्ह्हह….. धीरे… मोनू… आआअह्हह्ह्ह्ह…. हैईईई… माआआआ…. धीरे…. धीरे… मसल अपनी रखेल की चूचियों को… आआआअह्ह्ह"

पर मोनू क हाथ तोह जैसे कामुकता की गोलियां लग चुकी थी, वो अब कहा पीछे रहने वाला था.. अपनी कामुक बड़ी माँ की आँखों में देखते हुए उनकी दोनों बड़ी बड़ी चूचियों को जोरो से अपने दोनों हाथों से मसलते हुए नीचे से अपनी कमर उठा उठा क उनकी छूट की गहराई का पूरा नाप ले रहा था

"आआअह्ह्ह्हह.... कैसा लग रहा है बीटा... अपनी रखेल को छोड़ क.. उसकी बड़ी बड़ी चूचियों को मसल क… ेस्शह्ह्ह्हह्ह्ह्ह... माआआ... आआअह्हह्ह्ह्ह"

मोनू- (नीचे से अपनी कमर का जोरदार वार करते हुए, जिससे उसका जोशीला लुंड गपागप करते हुए 'महेंद्र की पत्नी' की छूट की नाप ले रहा था) बहुत मज़ा आ रहा है.. आअह्हह्ह्ह्ह…. कितनी गरम छूट है साली कुटिया तेरी… मेरा लुंड निचोड़ ले रही है.. Aaaaaaaaaahhhhhhhhh… वैसे एक चीज़ बता साली रखेल.. तेरी छूट ऐसी इतनी गरम है तोह गांड कैसी है.. ?

अपनी दोनों चूचियों को अपने जवान भतीजे से मर्दन करवाते हुए और उसके सीने पे अपने हाथों को जमाये हुए उसके लुंड पे उछलते हुए अपनी बात कहती है

"आआह्ह्ह्ह… साले.. अब तोह तेरी रखेल हु.. जब चाहे गांड भी देख लेना… और उसमें भी अपना तगड़ा लुंड घुसा क अपनी इस कुटिया की गांड की गहराई नाप लेना… Aaaaaaaaaahhhhhhhhh… उफ्फ्फ्फफ्फ्फ़.. कितना जोशीला है तेरा ये लुंड… Aaaaaaaaaaaaaaahhhhh"

महेंद्र क घर में इस समय उसकी hi गदराई पत्नी एक रैंड क जैसे उसके hi जवान भतीजे क लुंड पे उछलते हुए पुरे जोश से अपनी छूट मरवा रही है.. और उन दोनों की कामुक सिसकारियां और कामुक बातों को उस कमरे से बहार रोकने का कार्य वो वर्षा कर रही है जो लगातार बढ़ती hi जा रही थी, और भीसाद शोर क चलते अंदर चलता ये कामुक और गन्दा खेल बहार किसी को सुनाई नहीं पद रहा था

दोनों hi इस खेल मैं भरपूर साथ दे रहे थे.. जहा सविता एक और अपनी भरी गांड को पूरी तरह ऊपर की तरफ उठती और फिर गपक से मालती क बेटे क लुंड पे अपनी छूट दबाते हुए नीचे बैठ जाती, वही मोनू खुद भी नीचे से अपनी कमर क जोरदार दक्का देने मैं पीछे नहीं हैट रहा था.. इसका साथ hi वो दोनों हाथों से सत्यम की माँ की उन चूचियों को मसले जा रहा था जिससे कभी उसने दूध पिया होगा

सविता- (जो सायद इस खेल क अंतिम बिंदु की और बढ़नी सुरु हो चुकी थी.. ककी कामुकता की अधिकता क चलते उसकी आँखें पूरी तरह बंद होती जा रही थी) Aaaaaaaaaahhhhhhhhh... माआआ.... ेस्शह्ह्ह्हह्ह्ह्ह... उफ्फ्फ्फ़... हैईईई... रईईईई..... ऐसे hi छोड़ अपनी इस रैंड को... आअह्हह्ह्ह्ह... पहाड़ दे अपनी रखेल की छूट को... आआह्ह्ह्ह.. भोषड़ा बना दे अपनी कुटिया की बुर का... आआह्ह्हह्ह्ह्ह... ऐसे hi मेरे लाल.. ऐसे hi... आआअह्हह्ह्ह्ह.. ऐसे hi एक दिन तुझे अपनी इस रैंड की गांड भी लाल करनी है... आअह्ह्ह.. जोर से छोड़ अपनी रखेल को... आआह्ह्ह्हह्ह्ह्हह

कामुकता का ये खेल न जाने और कितनी hi दिएर ऐसे चलता रहता है, ककी बहार होती भीसाद वर्षा क चलते किसी को भी इसका ज्ञान नहीं हो रहा था की यहाँ कमरे में कैसा कामुक पाप हो रहा है.. एक गर्दै औरत खुद hi एक जवान लुंड क लिए उसकी रैंड.. चिनार.. कुटिया.. रखेल बन चुकी है

सविता की कामुकता का हाल तोह कुछ ऐसा हो चूका था की अब वो खुद hi उछाले जा रही थी.. मोनू को पहले जैसी म्हणत भी नहीं करनी पद रही थी

सविता अब पूरा दम लगा क जोशीले लुंड पे उछलती hi जा रही थी, जिसके चलते उसकी बड़ी बड़ी चूचिया जो मोनू क हाथों में जकड़ी हुई थी उन्हें मोनू बेहरहमी से मसाले जा रहा था.. यहाँ तक उन चूचियों पे हलके हाथों क निशान तक सायद नज़र आने सुरु हो चुके होंगे

अगले कुछ और पलों तक चलने वाले इस खेल में मोनू फिर से शामिल हो चूका था ककी वो एक बार फिर से अपनी कमर को नीचे से चलते हुए अपनी माँ की जेठानी की छूट मारने का पुण्य भरा कार्य करने लगा था.. सायद इस खेल में वो भी अंतिम बिंदु को चुने वाला था

"आआअह्ह्ह... हैईईई... साली.... मेरी रखेल हरामजादी.. कुटिया... बता भरवाएगी अपनी छूट को मेरे बीज से... आआआआहहहहह"

सविता जैसे hi अपने लिए ऐसे कामुक सब्द और ये बात सुनती है वो अपना भरी भरकम सरीर मोनू क ऊपर झुकाते हुए अपनी बड़ी बड़ी चूचियों को उसके सीने पे दबाते हुए उसके होंठो को फिर से चूमना सुरु कर देती है.. वही जैसे hi मोनू ने देखा की उसकी 'बड़ी माँ' उसके ऊपर झुक रही थी उसने उसी पल अपने हाथों को उनकी भरी और गेहुआ चूचियों से हटा लिया था

सविता अब पूरी तरह अपने सरीर का संपूर्ण भार अपने जवान भतीजे क ऊपर डालते हुए उसके होंठों को बेहरहमी से चूसते हुए जोर जोर से अब भी अपनी कमर को उसके लुंड पे मरे जा रही थी, जितने वेग से लुंड उसकी योनि क मुहाने तक आ रहा था.. ठीक उसी वेग से वो वापस भी अंदर घुसता जा रहा था

पर जल्दी hi ऐसा समय भी आता है जब सविता पूरी तरह अपनी योनि को मोनू क लुंड से भर क उसके ऊपर अपनी योनि को ऐसे दबा लेती है की लुंड और छूट क बीच हवा गुजरने तक की जगह नहीं बचती

मोनू तोह वैसे भी जवान खून था, वो किया hi करता.. और उसी पल उसके लुंड से सफ़ेद गाडी बारिश होनी सुरु हो जाती है, जो सत्यम और सत्तू की माँ की सुखी भूमि को हरा भरा करने का पुण्य करने लगती है

दोनों क होंठ अब भी आपस में जुड़े हुए hi थे.. इसलिए उसकी कामुकता से भरी सिसकारियां भी एक दूसरे क मुंह की गहराई में दफ़न हो जाती है, पर जिस प्रकार से सविता का जिस्म थरथराहट से भर उठा था उससे ये तोह साफ़ था की उसकी योनि ने एक बार फिर से मोनू की गाडी वर्ष क साथ साथ अपनी भी कॉमर्स की वर्षा सुरु कर दी थी

मोनू भी अपने बीज को अचे से अपनी बड़ी माँ की खूख में बो hi देता है.. और खुद सविता भी इस नयी फैसला क चलते बुरी तरह मोनू क होंठो को आज़ाद करके जल्दी hi उसके सीने पे अपना सर रख क हाफ रही थी, वैसे हाल तोह खुद मोनू का भी अलग नहीं था.. वैसे दोनों hi क चेहरों पे संतुस्ती की ख़ुशी साफ़ साफ़ देखि जा सकती थी

पर उन दोनों को hi नहीं पता था की उस कमरे की खिड़की पे कोई ऐसा भी खड़ा था जो न जाने कबसे वह खड़ा ये नज़ारा देखे जा रहा था.. चलिए ये भी साफ़ कर देता हु की ये और कोई नहीं अपितु हमारी सलोनी सूरत वाली हर्षिता है, जो की बहार सभी को छप्पर नीचे गरम दूध पिलाने क बाद जब रसोईघर में वापस लौटती है तोह वह उसे सविता नज़र नहीं आती

"लगता है भौजाई.. कपडे बदलने गयी होंगी, कितनी तोह भीगी हुई थी"

पर एक पल रुकने क बाद हर्षिता क चेहरे पे एक कामुक सी मुस्कान खिल उठती है और वो आगे कहती है

"वैसे आज भौजाई कैसे अजीब तरह से देख रही है.. ऐसा लग रहा था जैसे मेरी चूचियों को चूस..."

हर्षिता अपनी hi बात कहते हुए रुक पड़ती है और हसने लगती है

"मैं भी पागल हु..."

पर कही न कही इस नए एहसास ने उसके छोटे जामुन जैसे निप्पल्स में तनाव भर दिया था

इसके बाद वो वही रसोईघर में रखे हुए पीने क पानी की बाल्टी उठा लेती है.. ये सोचते हुए की

'अभी इससे hi काम चला लेती हु.. बारिश थोड़ी काम होगी तोह पीछे से दूसरी बाल्टी भर क यहाँ रख दूंगी'

और फिर वो बाल्टी उठाये हुए सावधानी से आगे बढ़ते हुए जब मोनू वाले कमरे क पास से गुजरती है तोह अनायाश hi उसकी नज़रें कमरे क अंदर घूम जाती है, और उस छोटी सी खिड़की क कपड़ क बीच से उसे जो दीखता है उसके चलते उसके हाथ से बाल्टी बस गिरते गिरते बचती है.. पर हाथों में ऐसी कंपकपाहट भर आयी थी की वो बाल्टी को नीचे रखने पे विवस हो जाती है और जब फिर से अंदर का नज़ारा देखती है तोह उसका पूरा अस्तित्व काँप उठता है और ऐसी बारिश में भी उसे वो सब्द सुनाई पड़ते है

"आआअह्ह्ह... हैईईई... साली.... मेरी रखेल हरामजादी.. कुटिया... बता भरवाएगी अपनी छूट को मेरे बीज से... आआआआहहहहह"

हर्षिता का तोह जिस्म कामुकता से काँप hi पड़ा था, उसे यकीन नहीं होता की जवान मोनू में इतना दम है की वो उसकी बड़की भौजाई की छूट में अपना भीज भरने वाला था.. और इस सोच मात्र ने खुद हर्षिता की बुर क होंठों को फड़फड़ाने पे मजदुर कर दिया था

अनायाश hi उसका एक हाथ उसकी साड़ी क ऊपर से उसकी योनि पे पाउच जाता है और अंदर बचा हुआ खेल देखते हुए वो पूरी बेहरहमी से अपनी योनि मसलती रहती है.. और जब खेल पूरी तरह पूर्ण हो जाता है तोह वो धीरे से अपनी बाल्टी उठती है और सुकून से संतुष्ट होक लेते हुए मोनू को देखते हुए धीरे से खुद से कहती है

"ये तोह मेरी गांड का छेद फैला देगा.. haiiiiiiiiiiiiiiii"

हर्षिता फिर वह और नहीं रूकती, ककी उसे वह ज्यादा दिएर खड़े रहना सुरक्षित नहीं लगता, वैसे भी अंदर का कामुक खेल तोह पूरा हो hi चूका था.. तोह वह और रुक क करती भी किया वो

अब, आप सभी को ये समझने की जरुरत तोह बची नहीं.. की ठीक यही से हर्षिता जब वापस उस सफाई वाले कमरे क पास पहुँचती है तोह उसे सत्तू उसकी बुआ का यौवन ताड़ते हुए मिलता है और फिर किया हुआ था ये आप bhali-bhanti जानते hi है

✨ ✨ ✨

आशा करता हु, इतने दिनों से जिन परिस्थितियों को रचते हुए यहाँ तक पहुंचा हु.. उसका परिणाम आप सभी को पसंद आया होगा 🙏


और साथ hi साथ सभी कड़ियाँ भी जुड़ गयी होंगी..

और जो कुछ चीज़े बची हुई है वो इस प्रकार है


- सविता का सोनू द्वारा मालती क लिए टॉवल लेके भेजना

- खेत पे हर्षिता और महेंद्र की वो दुमदार चुदाई का रहस्य?


इसके अलावा और कुछ सवाल भी चोरे है मैंने.. जिन्हें आप सभी याद दिलाना मुझे 😁

जल्दी hi मिलता हुआ...

-आपका मित्र


मोनू

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सन 🖼️ #02

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मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #02 Running






Adultery - मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #02 Running

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मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #02 Running



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माँ (मालती) ❤️

कही कोई इन्हे भूल तोह नहीं गया ? 😉
 
दुकान से समय नहीं निकल प् रहा हु, पर कोशिश है की 2 दिन क अंदर अपडेट ले औ किसी तरह से 🙏
 
जो लिखना था वो अभी लिखा नहीं जा रहा है.. इसलिए कुछ और hi लिखने लगा 😅

पानी से भरे उस छोटे से गद्दे में छुपे हुए *** क कानो में जब ये सब्द पड़ते है तोह उसका पूरा जिस्म ऐसे काँप उठता है मानो किसी ने उसके पुरे अस्तित्व पे हमला कर दिया हो..


ककी *** भले hi एक बचा हो और वो *** की बात का मतलब न समझ पाया हो पर *** ने दुनिया देखि है, और जो वो सोच रहा है अगर वही होने वाला है तोह यक़ीनन *** ये दिन कभी नहीं भूल पायेगा.. पर किया ऐसा होगा ?

"इसके लिए तोह *** भी तैयार नहीं होती.."

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आज से ठीक 4 दिन पहले.. रात क करीब 9:45 पे



करीब 1 जानते पहले आज फिर से लाइट चली गयी थी, पिछले कुछ दिनों से ये रोज़ का हो गया था.. लाइट का जैसे कोई समय hi न रह गया हो कब आती है कब चली जाती है कुछ पता hi नहीं होता, महेंद्र का पूरा परिवार रात 8:00 hi खाना खा चूका था पर महेंद्र को खाने क बाद त्यागी द्वारा दिया हुआ वो खास चूरन खाने की आदत है जो हर रोज़ सुबह सुबह उसका पेट पूरी तरह खली कर देता था और अभी तब सविता ने उसे वो लेक नहीं दिया था.. असल में इसका कारन था की सविता वो बात पूरी तरह भूल hi गयी थी, काफी दिएर इन्तिज़ार करने क बाद अंततः महेंद्र खुद hi झुंझलाया हुआ सा घर क अंदर की और चल पड़ता है

वैसे घर क सभी मर्द अभी भी वही बहार छप्पर क नीचे आग क सामने बैठे हुए बातें कर रहे थे.. महेंद्र अगर चाहता तोह किसी से भी मंगवा सकता था पर मर्द झुंझलाता है तोह वो ज्यादा सोचता नहीं और ऐसी क चलते महेंद्र भी खुद hi घर क अंदर आ गया था पर ये किया आँगन में पहुंचते hi पुरे घर में ऐसा अंधकार मचा हुआ था जैसे एक भी चिराग न जल रहा हो

"इन औरतों को हो किया गया है.. पुरे घर अँधेरे में डूबा हुआ है, इतनी भी समझ नहीं की काम से काम चिराग तोह जला ले"

पर महेंद्र क यहाँ ये सोचना थोड़ा गलत था, ककी चिराग तोह जलाये गए थे पर हवा क झोंकों को वो पसंद नहीं आये थे इसलिए उन्होंने खुद hi अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हुए उन्हें भुजा दिया था

महेंद्र अँधेरे में डूबा हुआ पूरी तरह ग़ुस्से से भरा हुआ ये तय नहीं कर प् रहा था की वो किस और आगे बड़े ककी इस समय घर में ऐसा अंधकार मचा हुआ था की हाथ को हाथ न सूझे पर तभी उसकी नज़र उसके अपने कमरे की खिड़की की और गयी जहा से एक माध्यम सी लौ की रौशनी उसे नज़र आती है

"ये लो.. लगता है महारानी सो गयी है.."

महेंद्र अपनी hi ढूंढ में बिना समय नस्ट किये धीरे धीरे एक एक कदम को मजबूती से रखते हुए किसी अंधे व्यक्ति की तरह बस उस खिड़की से आती उस हलकी रौशनी की और आगे बढ़ता रहता है जहा जल्दी hi वो पूरी सावधानी क साथ खिड़की क पास पहुंच चूका था पर एक पल क लिए खिड़की से अंदर देखता है तोह उसे कमरे में नीचे एक छोटे से स्टूल पे रखते और जलते हुए उस छोटे से चिराग की हलकी और नाम मात्र की रौशनी में एक सरीर की झलक सी मिलती है पर वो ज्यादा कुछ समझ नहीं पाटा ककी वो काय उस चिराग क आगे की और थी जिस कारन रौशनी पूरी तरह उसके सरीर से टकरा रही थी और महेंद्र को बस एक काली परछाई hi समझ आती है जो इस समय बिस्तर क समीप किसी कारणवस झुकी हुई थी

'ये किया कर रही है.. इतने अँधेरे में'

महेंद्र ने उस काय को अपनी पत्नी 'सविता' मान लिया था और उसे ऐसे झुके हुए देख क उसके मन में यही एक विचार उत्पन होता है.. महेंद्र धियान से उस स्त्री की काय को देखने की कोशिश करता है तोह उसे बस इतना समझ आता है की वो जमीन से कुछ उठा रही है पर किया ये अँधेरे क कारन उसे समझ नहीं आ पाया

महेंद्र एक पल क लिए वही खिड़की से उसे बार बार जमीन से कुछ उठा क बिस्तर पे रखते हुए देखता है तोह अनायास hi उसे हसी आ जाती है

"ये भी अजीब पागल है.. अरे एक बार में जो भी है, उसे उठा क रख ले न.."

महेंद्र क चेहरे पे आयी हसी क कारन उसकी झुंझुलाहट और हल्का सा ग़ुस्सा पूरी तरह हवा हो चूका था और उसकी जगह एक पति क प्रेम ने ले ली थी.. महेंद्र अपने पीछे मुद क देखता है जहा अब भी अंधकार का जहां अधिकार बना हुआ था, और फिर धीरे से वो अपने ज्ञान अनुसार बिना किसी भी प्रकार का शोर पैदा किये हुए धीरे धीरे कमरे क द्वार पे आके ऐसे अंदर प्रवेश करता है जैसे कोई चोर चोरी करने की मंशा से आ रहा हो

महेंद्र जल्दी hi दबे पाऊँ उस स्त्री क पीछे पहुंचने लगे थे की तभी खिड़की क कपड़ तेज़ हवा क कारन आपस में टकरा जाते है और हवा क वेग से कमरे में जलता एकलौता चिराग भी भुज जाता है.. पर इतने दिएर में महेंद्र को इतना तोह ज्ञान हो hi गया था की उसकी पत्नी इस पल कहा पे है और इतनी दिएर से अँधेरे में देखने क कारन उसकी आँखें इतनी अभ्यस्त हो चुकी थी की उसे ये जरूर समझ आ गया था की सविता एक कड़ी हो चुकी है.. सायद ऐसे अचानक से खिड़की क कपाद क band-khulne की आवाज़ क कारन हुआ होगा

सविता का पति अपनी पत्नी से प्रेम रुपी छेड़खानी करने क लिए दबे पाऊँ आगे बाद चला था और कुछ कदम क बाद hi वो अब ठीक उस साये क पीछे थे जो उस अँधेरे कमरे में उपस्थित था

महेंद्र इस उम्र में भी ऐसी हरकत करने की सोच क hi जवानी का संचार अपने अंदर बेहटा हुआ महसूस कर प् रहा था.. वो धीरे से उसके ठीक पीछे पहुंच क पूरी सावधानी दीखते हुए ताकि उसे अचानक से चौका सके, वो उसके हाथों क नीचे से अपने दोनों हाथों को आगे बढ़ाता है और इससे पहले की सविता को कुछ भी ज्ञान हो पाटा वो उसके यौवन की गोलाई पे अपने हाथों की कठोर पकड़ जमा देता है

"तू यहाँ किया कर रही है.... मैं कबसे तेरी बहार प्रक्तिक्षा कर रहा था"

इधर जैसे hi उस स्त्री को अपने यौवन क दबोचे जाने का एहसास मात्र होता है और वो कुछ कर पाती उसके पीछे वाले आदमी यानि हमारे महेंद्र ने उसे पीछे की और खींच क अपनी कमर से इतनी जोर से सत्ता लिया की एक पल क लिए उस बेचारी की साँसे hi अटक गयी थी.. साथ hi साथ महेंद्र क खेतों पे काम करने वाले हाथों की पकड़ इतनी मजबूत थी की उसे ऐसा प्रतीत होता है जैसे उसकी चूचियों को एक hi पल में मरोड़ दिया गया हो.. या उसे पीस क लाल कर दिया जायेगा

"आआआआहहह……… Maaaaaaaaaa… जेठहहहहहहह.. जीईईईई.. मैं हु……. हर्षिता"

अब बताने की जरुरत तोह है नहीं की जैसे hi महेंद्र ने हर्षिता को पीछे से अपनी पत्नी समझ क दबोचा और प्रतीक्षा वाली बात कही थी उसी पल 'सोनू की माँ' ने पहचान लिया था की ये आवाज़ किसकी है.. वही जैसे hi महेंद्र ने हर्षिता की आवाज़ सुनी उसके पुरे जिस्म में शर्म और दर की लहर दौड़ गयी थी पर हट्टे हट्टे भी उसके हाथों की जकड न जाने कैसे एक बार फिर और ज्यादा मजबूत होती चली गयी थी.. ये सब बस एक पल अंदर हो गया था जहा महेंद्र को ाबश होता है की उसकी मर्दानगी भरी उंगलिया उन चूचियों की कोमलता में पूरी दंश सी गयी हो, ये कुछ ऐसा था जैसे वो उन्हें दबा क पक्का कर रहा हो की ये सच में उसकी पत्नी है की नहीं.. वैसे देखा जाये तोह हर्षिता क स्वर क चलते पक्का तोह उसे हो hi चूका था इसलिए बिना विलम्ब क उसने अपनी पकड़ चोर दी और तुरंत पीछे की और हत्ता चला गया

साथ hi महेंद्र ने जब हर्षिता को अपनी पत्नी समझ क उसे जोर से अपनी कमर से चिपका लिया था तोह हर्षिता को जिस चीज़ का आभास सबसे पहले हुआ था वो था उसके जेठ का भीमकाय नाग जो एक hi पल में मानो जैसे उसकी साड़ी को चीरता हुआ अंदर घुस जाना च रहा हो

इधर हटने से पहले जो एक अंतिम पल में महेंद्र ने अपनी बहु की चूचियों का मर्दन किया था उससे हर्षिता को भीसाद दर्द महसूस हुआ था.. पर ये महेंद्र से कैसे हो गया था वो खुद नहीं जनता

"हीी maaaaaaaaaaaaaaaa"

इधर हर्षिता का ये स्वर सुनते hi महेंद्र जो उसे चोर क पीछे हैट चूका था.. अब उसका जिस्म बुरी तरह काँप रहा था की ये उसने कैसा पाप कर दिया

हर्षिता भी बिना देरी क तुरंत पीछे की और मुद जाती है.. वो तोह धन्य था की कमरे में अंधकार का राज़ था इसलिए दोनों hi एक दूसरे का चेहरा नहीं देख प् रहे थे पर वो दोनों hi भली भांति जानते थे की वो कहा पे खड़े है

"जेठ जी.. आप.. मतलब.. आपने…."

हर्षिता क इस सवाल ने मानो एक पल क लिए महेंद्र क सरीर से उसकी जान खींच ली थी, एक पल क लिए तोह उसे कुछ सुझा hi नहीं पर फिर हिम्मत करते हुए अपनी लड़खड़ाती हुई आवाज़ में कहता है

"वो… वो… मुझे लगा की सवी.. सविता है… मुझे.. मुझे नहीं पता था की.. तुम.. मतलब मैंने जान क.."

इस पल महेंद्र का पूरा अस्तित्व hi काँप सा रहा था

महेंद्र जैसे आसमान से गिरा हो या किसी नींद से जगाया गया हो, वो तुरंत एक और कदम पीछे होते हुए अपनी उखड़ती साँसों को काबू करते हुए कहता है

"बहु वो.. वो.. सच में.. कस्मा से.. मुझे लगा की सविता है..."

हर्षिता भी एक पल क लिए लम्बी सी सांस लेती है और उसके चेहरा पे जो कामुकता वाली पकड़ क चलते लालिमा चाय थी उसे काबू में करते हुए धीरे से अपनी सुरीली आवाज़ में कहती है

"सविता भौजाई.. तोह शीला क साथ छत्त पे है.. मैं वो उन्ही क सूखे कपडे रखने आयी थी, पर अँधेरे में टकरा गयी तोह सब कपडे गिर गए थे.. वही.. वही उठा रही थी"

हर्षिता ने बहुत hi धीमी सी आवाज़ में अपनी बात पूरी कर दी थी, पर अगर इस समय कमरे में रौशनी होती तोह महेंद्र देख पता की उसकी मजबूत पकड़ क चलते अब भी हर्षिता का चेहरा कामुकता की लालिमा और शर्म क गहने से लड़ा हुआ है

बेचारे महेंद्र को समझ hi नहीं आता की वो किया जवान दे.. आखिर उससे कोई छोटा पाप तोह हुआ नहीं था, पर फिर वो धीरे से अपना सर झुका क कहता है वापस से वही बात दोहराता है

"मैंने ..ये.. वो.. जान क नहीं किया बहु.. वो मुझे सच में लगा.. की.."

इस बार महेंद्र क सब्द पुरे होने से पहले hi उसके कानो में उसकी चुटकी बहु की खनकती हुई आवाज़ पड़ती है

"मैं जानती हु.. आप ऐसा कभी कुछ नहीं करेंगे.. ज्यादा मत सोचिये"

हर्षिता एक पल क लिए रूकती है और फिर आगे कहती है

"जो होना था.. हो गया…"

हर्षिता अपनी बात पूरी करके रुक जाती है, जहा अगले कुछ पलों तक कमरे में पूर्ण शांति चाय रहती है दोनों hi अपनी अपनी जगह खड़े बस अगले कदम क बारे में सोच रहे थे

पर अपनी बहु की समझदारी बात सुनकर महेंद्र की जान में जान जरूर लौट आयी थी.. जैसे उसकी रुकी हुई साँसे वापस लौट आयी हो

"मैं… मैं चलता हुआ.. बहु.."

जिसके हर्षिता बस धीरे से हामी भर देती है

"हम्म…."

महेंद्र पूरी सावधानी बरतते हुए अपनी साँसों को रोके हुए जितना संभव था उतनी दुरी बनाते हुए चुपचाप कमरे से निकल जाता है.. और सायद उसने अगली सांस घर क बहार छप्पर नीचे पहुंच क hi ली थी

इधर महेंद्र को गए हुए कुछ पल बीत चुके थे और हर्षिता उसी अँधेरे कमरे में उस बिस्तर पे बैठ चुकी थी.. पर इस समय उसके चेहरे पे नयी मुस्कान फैली हुई थी, वो धीरे से अपना एक हाथ पहले अपनी एक चुकी क ऊपर रखती है और उसे अपने ब्लाउज क ऊपर से hi सहलाती है और फिर यही कार्य वो दूसरी चुकी क साथ भी दोहराती है.. और फिर वो सब्द उसके मुख से निकल पड़ते है

"हीी.. माआआआआ.. किया पकड़ थी..."

तोह अब आप bhali-bhanti समझ चुके होंगे की महेंद्र क ऐसे व्यव्हार का करना किया था, और क्यू वो दूध लेके आयी अपनी चुटकी बहु से नज़रें नहीं मिला प् रहा था.. आशा है Jeth-Bahu क बीच लगी ये नयी चिरंगी आपको पसंद आयी होगी



कीप रीडिंग 🙏
 
🆕 पेज No. 458 🆕 (24-02-26)

अपडेट #21

Chapter 👉 कामुक वर्षा..

सन 🖼️ #03

नयी चिंगारी..


मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #02 Running

Jawan-boobs-4.jpg


 
प्रीवियस अपडेट ों पेज No. 📃 458



अपडेट #21

Chapter 👉 कामुक वर्षा..

सन 🖼️ #04

नंगी पुंगी.. मालती

इस पुरे अपडेट का आईडिया मुझे lundbur123 & Deepaksoni भाइयों क सुझाव से hi आया था, मैंने इन्ही दोनों क आईडिया को मिक्स करके ऐसे बनाया है

🙏 हैप्पी होली 🫟 🙏

नोट : ये अपडेट सीधे तौर पे अपडेट #19, सन #04 (पेज No. 362) क आगे की कहानी है.. जहा मालती पहलवान क खेत में एक बार फिर से अपनी योनि में अपने जवान भतीजे का वीर्य भरवा क घर लौट चली थी

यहाँ से आगे किया हुआ वो हम माँ (मालती) क शब्दों में जानेंगे...

कंटिन्यू…

"किया हुआ रैंड.. घर नहीं चलना अब तोह बारिश भी बंद हो गयी है

वर्ण बोल तोह फिर से एक बार और...."

सत्यम मुस्कुराते हुए जैसे hi ये बोलता है मैं यानि आपकी कामुक गदराई गोर जिस्म वाले मालती टपक से अपनी आँखों को खोल क देखती हुई तोह बारिश अब लगभग रुक चुकी थी और उसे अपने ऊपर से हटते हुए

"कमीना आज दुरबा तोह सोचना भी नहीं.. एक hi दिन में 3 बार चुदाई करि है मेरी, कमीने अपनी चची को रैंड बना डाला"

अपने जवान भतीजे की इन बातों ने मेरे कामुक पर भयंकर चुदाई से थके हुए चेहरे पे मुस्कान खिला दी थी और फिर पता hi है की हम दोनों घर चल पड़े थे.. आशा है ये सब याद hi होगा, साथ hi ये भी याद होगा की मुझे अपनी पेंटी वही खेत पे चोरनी पड़ी थी और वो किसलिए ये आपमें से कोई मुझे बताना.. मैं आपकी मालती आपके उत्तर की प्रतीक्षा करुँगी ❤️

वैसे आपको याद hi होगा की कैसे मेरे जवान भतीजे सत्यम ने एक hi दिन में 3 बार छोड़ छोड़ क मुझे एक रैंड बना दिया.. बल्कि में अपने सब्द सुधारना चाहूंगी.. एक Maha-Rand

पर में भी एक Maha-Rand बनकर आज बहुत hi खुस थी फिर भले hi चाहे मेरे सरीर का एक एक अंग कामुक और मीठे दर्द से टूट रहा हो

हम दोनों जैसे hi घर पहुंचते है मुझे सभी लोग छप्पर क नीचे hi बैठे नज़र आ जाते है.. जिस कारणवस मैं बुरी तरह दर भी गयी थी की कही किसी को कुछ सक न हो जाये.. इसलिए मैंने जल्दी से एक बड़ा सा घूँघट कर लिया और अपने पल्लू का बाकि कपडा अपनी बड़ी बड़ी चूचियों क ऊपर ले आयी ताकि किसी को मेरी बिना ब्रा वाली चूचियों का पता न चले बाकि पेंटी का पता चलने का तोह सवाल hi नहीं था ककी उसके लिए किसी को मेरी साड़ी उठानी होगी

फिर किया था मैंने बिना समय नष्ट किये हुए जल्दी से घर क अंदर भाग पड़ती हु मानो दर हो की कही कोई रोक क मुझसे सवाल जवाब न करने लगे, बाकि मेरी इस्तिथि तोह आप समझ hi सकते है

मैं घर क अंदर पहुंच क hi अपना लम्बा सा घूँघट हटती हु और अपना पल्लू सही करती हुई चैन की सांस ले hi रही थी की तभी मेरे कानो में वो आवाज़ पड़ती है

"कहा रह गए थे दोनों इतनी दिएर.. हम लोग परेशां हो रहे थे ?"

Main(Maalti) ये आवाज़ सुनते hi बुरी तरह काँप सी पड़ती हु ककी सच में बता नहीं सकती थी और झूठ में अपनी बड़की भौजाई यानि सविता से बोलना नहीं च रही थी.. पर इस समय मेरे पास झूट hi एकलौता विकल्प था

मैं पूरी हिम्मत जुटते हुए अपनी इस्तिथि को सँभालने की कोशिश करते हुए जैसे hi बड़की भौजाई की और मुद क कुछ बोलने को होती हु.. उससे पहले hi सविता भौजाई बोल पड़ती है

"अरे तेरी गर्दन पे ये निशान.... और तेरे निचले होंठ को किया हुआ, किसी चीज़ ने काट लिया था किया.. सूजन जैसी है ?"

फिर किया था सविता भावजी क ये सब्द सुनते hi मेरा हाल तोह ऐसा था की में मन hi मन प्राथना करने लगती हु की काश धरती पहात जाये और में उसमे समां जाऊ.. ककी मारे शर्म क में अपनी जेठानी से आँखें भी नहीं मिला प् रही थी, जबकि वही दूसरी और मेरा हाल देख क मेरी जेठानी बड़े hi रहस्य्मय तरीके से मुस्कुराये जा रही थी जिस कारन मेरी साँसे तोह आणि hi बंद होती जा रही थी

मैं जैसे तैसे अपनी पूरी हिम्मत को समेत क धीरे से बोलती हु

"मैं वो... वो.. आते हुए रस्ते में गिर पद.. गिर पड़ी थी"

मेरी बात पे मेरी जेठानी ऐसे मुस्कुरा पड़ती है जैसे उन्हें मेरी बात पे भरोषा hi न हो, फिर उनके सब्द मेरे झुके हुए सर को और झुकाने क लिए मेरे कानो में पड़ते है

"सही कह रही है.. जरूर गिरी होगी, पर कहा.."

सविता भौजाई क अभी इस 'कहा' को लेके में उलझन में थी hi की किया उत्तर दू की तभी उनके आगे क सब्द मेरे पुरे सरीर में झुरझुरी सी भर देते है

"लुंड पे...."

अब तोह मेरा हाल कुछ ऐसा हो जाता है जैसे मुझे काटो तोह खून भी न निकले.. मेरा पूरा सरीर थरथराहट से भरता चला जा रहा था, सही मायने में ठण्ड तोह मुझे अब लगनी सुरु हुई थी

पर आगे बोलने का काम भी मेरी जेठानी सविता hi करती है.. वो भी मुस्कराहट क साथ

"जा पहले अचे से नाहा ले.. ककी तेरी हालत बता रही है की आज तू 1 बार से ज्यादा बार गिरी है.. उम्मीद है ज्यादा दर्द नहीं होगा, क्यू नहीं है न.. ?"

सविता जेठानी क एक एक सब्द मेरे कानो में पिघले हुए लोहे जैसे पद रहे थे और में मरे शर्म क लाल होती जा रही थी.. पर जैसे तैसे करके मैंने बड़ी मुश्किल से 'है' में अपना सर हिला दिया

"जा पहले नाहा ले.. तेरे कपडे भिजवाती हु, और है चलते हुए अपनी चाल पे थोड़ा धियान रखना.. तेरी चाल इस बात की चुगली कर रही है की तू कहा गिरी है"

मेरी बड़की भौजाई ने अपने शब्दों से साफ़ कर दिया था की में जिस राज़ को छुपाते हुए अंदर पहुंची थी उन्हें उसका ज्ञान हो चूका था.. आखिर वो खुद एक स्त्री है तोह उनके लिए मेरी हालत देख क मेरे साथ किया हुआ होगा ये अनुमान लगाना कही से भी मुश्किल नहीं हो सकता था

तभी एक पल क लिए मेरी और सविता भौजाई की नज़रें आपस में टकराती है और वो तुरंत hi हस्ते हुए आँख मार देती है.. जिससे में जो पहले hi पानी पानी हु अब पूरा विश्वास हो चला था की उन्हें पता चल चूका है, मैं अब वह और नहीं रुक पाती और लगभग भागते हुए सीधा घर क पीछे वाले स्नानघर की तरफ चल पड़ती हु

इधर मुझे इस बात का ज्ञान नहीं था की मेरे वह से जाते hi सविता भावजी मुस्कुराते हुए खुद से बोल पड़ी थी

"लगता है अचे से रगड़ी गयी है बेचारी"

यहाँ से कलम को वापस मैं (मोनू) अपने हाथों में लेता हु..

फिर ऐसी क साथ hi उनके अधरों पे इस शरारती मुस्कान भी खिल उठी थी जिसके चलते वो कमरे में जेक मेरे कपडे निकलती है पर तभी उन्हें कुछ सूझता है और वो एक छोटी सी टॉवल भी निकल लेती फिर उसे वही बिस्तर पे रख देती और बहार बैठे सोनू की और चल पड़ती है.. जहा वो देखती है की सोनू अभी भी अपने मोबाइल में hi जूता पड़ा था, सविता एक पल क लिए सोनू को देख क मन hi मन मुस्कुराती है और फिर उसे आवाज़ देते हुए कहती है

"सोनू.. बीटा जरा 5 मं बाद अंदर आना, कुछ काम है.."

सविता इतना बोलते hi मुद जाती है जिससे वो जल्दी से कमरे में पहुंच पाए, सायद उसके मन में कुछ और भी चलने लगा था पर आज उसका सोचा सब कुछ होना संभव नहीं था ककी वो जैसे hi वापस जाने को मुड़ती है की तभी उसके पीछे से वो मरदाना गर्जन भरा स्वर उसके कानो में पड़ता है

"सविता.. जरा गरम गरम चाय पीला देना.."

ये आवाज़ देने वाला उसका पति 'महेंद्र' hi था जो कुछ दिएर पहले hi पूरी तरह भीगा हुआ न जाने कहा से आया था और सविता को उनसे सवाल करने का भी समय नहीं मिल था.. 'की आखिर इतनी बारिश में वो गए कहा थे ?'

पर इस समय सविता चाय की बात सुनते hi, थोड़ा खीज सी पड़ती है ककी उसने तोह कुछ और hi सोचा हुआ था और उसके बाद उसे स्नानघर भी पहुंचना था.. पर इससे पहले की वो कुछ बोल पाती उसका देवर 'वीरू' भी बोल पड़ता है

"है भौजाई.. बड़े दिन हो गए आपके हाथ की वो गुड़ वाली चाय पिए हुए"

ये सुनकर तोह सविता मन hi मन अपना सर पीट लेती है, ककी गुड़ वाली चाय तोह उसका ाचा खासा समय लेने वाली थी पर अब वो अपने पियरे वीरू की बात को मन भी नहीं करना च रही थी इसलिए बस मुस्कुरा क 'है' में सर हिला देती है पर एक बार फिर से वो सोनू की और देखते हुए कहती है

"ाचा तू जरा 5 मं बाद अंदर आ.."

सायद सविता ने अपने विचार पूरी तरह बदले नहीं थे या सायद उसमें कुछ बदलाव मात्र किया था

इधर सविता क वह से जाते hi मुश्किल से 5 मं hi बीते होंगे की जवानी में पहला कदम रखने की जल्दी से भरा हुआ सोनू अपने मोबाइल से अपनी आँखें हटाता है और बड़े hi बेमन से सविता क कहे अँसुअर उसके कमरे की और चल पड़ता है पर उसे नहीं पता था की आज उसका ये दिन उसके लिए कितना यादगार होने वाला है

अभी कुछ दिएर क लिए सविता और सोनू को चोर क आप सभी mere(Maalti) पास लौट आइए..

एक बार फिर से मेरी एहसास क साथ आगे बढ़ते है..

आधा दिन पूरा हुए करीब 2 जानते बीत चुके थे यानि इस समय कोई 2:20 हो रहे होंगे, कड़ाके की ठण्ड उसपे हलकी फुहार जैसी बारिश क बीच अचानक से हलकी धुप दिखने लगी थी जो घर क पीछे का पूरा दृस्य किसी सुन्दर खेत जैसा मनोरम बना रह था और मैं यानि आपकी गदराई कामुक मोनू की माँ 'मालती' उसी खूबसूरत दृश्य क बीच चलते हुए जल्दी से स्नानघर क अंदर पहुंच जाना च रही थी.. कारन तोह आप जानते hi है

हलकी हलकी चलती ठंडी हवा जब मेरे जिस्म से टकरा रही थी तोह पुरे सरीर में मानो कंपकपी सी भर जा रही थी उसपे अब भी मेरे दिमाग में रह रह क सविता भौजाई क साथ किसी ढोलक जैसे बज रहे थे.. उनकी वो तीखी हसी मेरे चेहरा की रंगत को ऐसे लाल कर रही थी मानो जैसे किसी ने मेरे खूबसूरत केसर जैसे रंगवत वाले चेहरे पे हल्का गुलाबी गुलाल मॉल दिया हो, मैं पूरी गति से चलते हुए बस स्नानघर में पहुंच जाना च रही थी ककी रह रह क मेरे दिमाग में यही चल रहा था की कही फिर से कोई मिल गया तोह अब किया होगा ?.. ऐसे न जाने कितने hi सवाल इस समय मेरे मन को विचलित किये हुए थे

वही मैं अगर अपने दर से ऊपर उठकर घर क पीछे क फूलों से भरे उस ेस्थान की बात करू तोह उसका दृश्य सच में बड़ा hi खूबसूरत था.. बारिश की हर एक नन्ही बूँद जब ज़मीन पर गिरती तोह अपने अस्स पास की मिटटी को हल्का सा और भिगो देती जिससे एक सोंधी सी खूबसू हर बूँद क साथ फिर से उस खूबसूरत वातावरण में फ़ैल जाती है, पर में उस हवा को भी नहीं भूल सकती थी जो अपनी ठंडी चपेट मरते हुए मेरे जिस्म में बार बार सिहरन दौड़ दे रही थी.. इस समय मौसम का हाल कुछ ऐसा था जैसे इस भीसाद ठण्ड में धीरे धीरे गर्मी रुपी प्रेमी का मिलान हो रहा हो

वैसे तोह मैंने आपको घर क पिछले हिस्से क बारे में कई बार बताया है पर अगर थोड़ी और विवरण करू तोह वो हिस्सा एक खूबसूरत बागीचे जैसा था जिसे सविता भौजाई ने अपनी म्हणत से सींचा था और इस लायक बनाया था.. इस समय घर क इस पिछले हिस्से में उघि हुई हर घास में बारिश की नन्ही नन्ही बुँदे कुछ ऐसे रुकी हुई थी जैसे किसी ने उनपे मोतिया रख दी हो, पिछले हिस्से में प्रवेश करते hi तुलसी का वो खूबसूरत का पौधा इस समय बारिश में भीगा हुआ हवा क हलके झौकों से धीरे धीरे हिलते हुए बड़ा hi अद्भुत प्रतीत हो रहा था.. स्नानघर और शौचालय क ठीक सामने चट्टान क पास जहा घर की औरते खुले में कपडे धुलती थी और वही एक पुराण सा हैंडपंप भी लगा हुआ था, उसी हैंडपम क पास अमरुद का ुचे आकर का वृक्ष बारिश में भीगा हुआ धीरे धीरे हवा क साथ नृत्य करते हुए हरियाली की खूबसूरती का खुद hi भाखन कर रहा था

मैं जैसे जैसे हर कदम बड़ा रही थी वैसे वैसे रह रह क मुझे अपनी योनि में उठने वाले मीठे दर्द की लहर पुरे सरीर में दौड़ती हुई महसूस हो रही थी.. जिसके चलते बार बार मेरे होंठ खुद hi आपस में भींचते चले जा रहे थे, पर एक औरत अचे से जानती है की ये कामुक दर्द का एहसास कितना खूबसूरत होता है.. वैसे अब भी मुझे अपनी योनि का आकर फैला हुआ hi प्रतीत हो रहा था जैसे अब भी उसने अपने होंठों को सत्यम क भीसाद काले लुंड क लिए खोल रखा हो, और मेरे ये निचले होंठ मेरे चलने क कारन बार बार आपस में रगड़ रहे थे और ऐसी क चलते मुझे वो मीठा दर्द महसूस हो रहा था

मैं अब स्नानघर क दरवाजे तक पहुंच चुकी थी की तभी अचानक से आसमान ने फिर से भरी वर्षा की सुचना देते हुए अपनी गर्जन दिखा दी.. और ऐसी क साथ बारिश की बूंदों ने एक बार फिर से आगमन कर लिया था जिसके चलते में किसी मादक हिरणी जैसी भागते हुए सीधा स्नानघर क अंदर hi जेक रुकी थी, जहा अंदर का माहौल भी काम ठंडा नहीं था पर दरवाजा बंद होते hi बहार की सिहरन देने वाली ठंडी हवा से सुरक्षा जरूर मिल गयी थी



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