Adultery मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #02 Running - Page 17 - SexBaba
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Adultery मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #02 Running

🆕 Update 👇 II Page No. 418 II

⭐ Update #20

Scene 🖼️ #05

Sahab.. jara dhire dhire ⭐

मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #02 Running

 
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मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #02 Running




 
“Aaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhh…………. Maaaaaaaaaaaaaaaa”

सविता को सायद पता hi नहीं चला था की कब वो अपनी उस कामुक हरकत को करते हुए अपने होंठों को काटने लगी थी, और सायद वो वही दरवाजे क बहार अभी अपनी योनि क साथ और कुछ दिएर ये kaam-krida का खेल खेलती पर उसे वास्तविकता में लौटने का कार्य बादलों की उस भीसाद आवाज़ ने किया जिसे सुनते hi सविता की आँखें खुल जाती है पर उसके होंठों पे च चुकी हसी उन बादलों क गर्जन की डरावनी आवाज़ भी नहीं चुरा पाती

सविता एक लम्बी सी सांस लेती है.. वैसे इस समय उसके होंठों से निकलने वाली उसकी साँसें इतनी गरम हो चुकी थी की अगर कोई उसके सामने खड़ा होता तोह सायद उसकी कामुकता की अग्नि में झुलस सा जाता

पर जल्दी hi सविता क कदम भी उसी रसोई की और बाद पड़ते है जहा इस समय...


-फ्रॉम नष्ट अपकमिंग अपडेट
 
प्रीवियस अपडेट ों पेज No. 📃 418



अपडेट #21




सन 🖼️ #01


एहसास...

नोट ⭐

इस अपडेट में.. मैं जान क कोई भी पिछ या Gif नहीं ऐड कर रहा हु, मैं चाहता हुए आप ऐसे बस फील करे 🙏

दिन का पहला पहर पूरा हो चूका था और अगर घडी की सुइयों की और देखा जाये तोह सायद वो 12:01 की और इशारा कर रही होगी

सुंदरपुर जैसे खूबसूरत गाओं में मुश्किलों से गुजरता हुआ महेंद्र का वो घर पूरी घनघोर बारिश से लिप्त हुआ था.. पानी की मोती बूँदें छप्पर से होती हुई जब जमीन पे गिरती तोह हर बार एक नया संगीत बनती और पुरे वातावरण में भरी हुई ठण्ड को और ज्यादा बड़ा देती

ऐसे में परिवार का सबसे बड़ा और जवान बीटा 'सत्तू' इस समय लगभग बारिश में भीगता हुआ और उस बारिश से बचता हुआ तेज़ी से घर क पीछे से लौट रहा था.. जहा ठण्ड क कारन पेशाब क तीव्र प्रहार ने उसे कुछ ज्यादा hi परेशां कर दिया था

सत्तू क कपडे इस समय जगह जगह से भीगे हुए नज़र आ रहे थे.. पर वो पूरी तरह नहीं भीगा था, वो लगभग भागता हुआ सा पिछले हिस्से से निकल क वापस छप्पर क नीचे की और बाद चला था

पर तभी उसके बढ़ते हुए कंदो में मानो रुकावट सी आ गयी थी, जिसका कारन था सालों से बंद उस कमरे से आती हुई वो अजीब सी आवाज़.. सत्तू क दिल की धड़कनें अचानक से तेज़ हो गयी ककी वैसे भी आज कल उसके परिवार क साथ कुछ भी ाचा नहीं हो रहा था

सत्तू इस समय उस कमरे क पास था जो सालों से बंद था, और वो घर क बिलकुल पिछले हिस्से से वापस आने पे सबसे पहले पड़ता था.. पर इस समय उसे एक पल क लिए ऐसा लगा जैसे उस कमरे में पानी क छलकने की आवाज़ आयी हो, पर ये कैसे संभव था वो तोह सालों से बंद है ?

सत्तू अपने आस पास देखता है पर उसे हतियार की तरह प्रयोग करने लायक कोई भी चीज़ नहीं नज़र आती, वैसे भी इस समय घर में सिर्फ 3 मर्द hi उपस्तिथ थे.. अगर इन जवान बच्चों को मर्द समझा जाये toh..Monu, सोनू और वो खुद

बाकि भानु और कुंदन तोह आज सुबह बारिश की आहात से पहले hi कही जा चूका थे और अभी तक लौटे नहीं थे.. और इस समय महेंद्र और वीरू कहा थे ये आगे बदातुंगा (किया करू आदत से मजबूर हु 😅)

सत्तू पूरी हिम्मत जुटाता हुआ धीरे से उस कमरे क मुख्या दरवाजे की और अपना पहला कदम बढ़ाता है पर वो पूरा धियान रख रहा था की उसके कंदो से कोई भी आहत उत्पन्न न हो.. सत्तू पूरा मन बना चूका था की जो भी होगा देखा जायेगा, वो किसी भी हालत में अपने रहते अपने परिवार पे कोई नयी मुश्किल नहीं आने देगा

सत्तू इस समय मोनू की मदद नहीं ले सकता था ककी वो खुद 3 महीने बाद एक ऐसी बेहोशी से उठा था जिसने पुरे परिवार में दुःख की रेखा खींच राखी थी, वही सोनू तोह अभी बचा hi था.. कमसेकम सत्तू तोह अभी यही मान क चल रहा था

सत्तू का मन पूरी तरह सचेत हो चूका था, और वो आने वाले खतरे से लड़ने क लिए पूरी तरह खुद को तैयार कर चूका..

'कोण हो सकता है अंदर.. वो तोह सुबह से बहार hi बैठा था,

फिर यहाँ तक कोई कैसे आ गया ?'

सत्तू क दिमाग में इस समय ऐसे hi सवाल घूम रहे थे, और हर कदम में ऐसे ख़ामोशी थी जैसे कोई चीता बिना आवाज़ किये अपने सिखर की और आगे बाद रहा हो

बारिश से टकरा क आती हुई ठंडी हवा उसके चेहरे को छूती जा रही थी, पर ठण्ड किया होती है ये तोह वो पूरी तरह भूल hi चूका था.. वो पूरी सावधानी से dheere-dheere आगे बढ़ते हुए कमरे के दरवाज़े क सामने पहुंच चूका था

दरवाज़ा वैसे तोह भिड़ा हुआ था पर उसके पाटों क बीच हलकी सी जगह नज़र आ रही थी.. वो धीरे से उस जगह से अंदर देखने की कोशिश करता hi है की उससे पहले hi उसके कानो में अंदर से आता हुआ वो स्वर पड़ता है

"ये चुटकी भाभी भी न जाने कहा रह गयी..

गयी तोह पानी लेने क लिए थी.. पर लगता है वही बड़की भौजाई क साथ गप्पे लड़ने लगी"

ये वो मधुर और खूबसूरत आवाज़ थी जिसे सत्तू लाखों की भीड़ में भी पहचान सकता था.. इसलिए बिना कोई समय नस्ट हुए उसके अधरों से वो नाम निकल hi जाता है

"शीला बुआ.."

शीला.. वो नाम जिसे लेते hi सत्तू क दिल में अजीब सी उमंग उठाना सुरु हो जाती है

शीला.. वह खूबसूरत हसीं औरत जिसे वह अपने दिल की गहराईयों से चाहता है

सत्तू के लिए शीला सिर्फ उसकी खूबसूरत बुआ नहीं है.. वह उसकी कल्पनाओं की वो एकलउटि रानी है जिसके सपने वो हर पल खुली आँखों से भी देखता है

सत्तू जब भी अपनी खूबसूरत बुआ 'शीला' को देखता, तोह उसके दिल का हाल चल बिगड़ना सुरु हो जाता.. मानो जैसे कोई तूफ़ान अंदर उठना सुरु हो जाता पर वो इस तूफान क बारे में किसी को कुछ कह भी तोह नहीं सकता

कितनी हैरानी की बात है न.. जहा एक और सत्यम जैसा लड़का अपनी सगी चची 'मालती' को एक रैंड बनाने पे उतारू है वही उसका बड़ा भाई 'सत्तू' अपने दिल का हाल तक उसे नहीं बता सकता जिसे वो दिल से अपना बनाना चाहता है

सत्तू धीरे से अपने दिल की बढ़ती हुई धड़कन क साथ दरवाज़े की दरार क बीच से अंदर झांकता है तोह उसे दुनिया की सबसे खूबसूरत औरत एक नए और कामुक अवतार में नज़र आती है.. ककी सामने जमीन पर एक खूबसूरत औरत बैठी हुई थी और वो थी खूबसूरत.. 'शीला'

इस समय शीला क हाथों में एक बड़ा सा झाड़ू थमा हुआ था और उसके पास hi एक छोटी सी बाल्टी राखी हुई थी, जिसमें पानी भरा हुआ था.. और उस बाल्टी में एक छोटा सा जग भी पड़ा हुआ था

तभी शीला उस जग से पानी निकालती है और अपने आगे वाली फर्श पे दाल देती है, और फिर अपने दूसरे हाथ में थामे झाड़ू से उस जगह को ragad-ragad कर साफ़ करने लगती है

"कितनी गन्दी हो गयी है ये जमीन, लगता है सालों से यहाँ झाड़ू भी नहीं लगा था"

शीला क मुंह से निकलते हर एक सब्द क साथ साथ सत्तू को फूलों का झड़ना भी नज़र आ रहा था.. वो तोह सायद ये भी नहीं सुन रहा था की शीला कह किया रही थी, उसे तोह बस खूबसूरत शीला क गुलाबी खूबसूरत होंठों का हिलना hi नज़र आ रहा था जिसमें वो पूरी तरह खोता चला जा रहा था

वही अंदर शीला न जाने कबसे उस कमरे को साफ़ करने में लगी हुई थी ककी ऐसी कड़ाके की ठण्ड क बाद भी उसके चेहरे पे पसीने की नन्ही नन्ही बूंदें नज़र आ रही थी.. साथ hi साथ उसके कपडे भी हलके भीग चुके थे जो अब कुछ ज्यादा hi उसके यौवन पे चिपके हुए नज़र आ रहे थे

शीला का दुपट्टा इस समय उसी कमरे में एक और टेंगा हुआ था यानि इस समय उसके बैठे होने क कारन उसके दोनों फड़फड़ाते हुए कबूतर जो बस ुध hi जाना च रहे थे.. उनकी खूबसूरती कुछ ज्यादा hi साफ़ साफ़ नज़र आ रही थी

शीला ने हमेशा की तरह आज भी सलवार सूट hi पेहेन रखा था, जो इतना कैसा हुआ था की उसके यौवन की हर नाप बस आँखों से नापी जा सकती थी और अभी तोह वो बैठी हुई थी जिस कारन उसके घुटनो से टकराते हुए यौवन कुछ ज्यादा hi हिलोरे खा रहा था.. और न च क भी सत्तू उस गहरी गहराई में गिरने से खुद को रोक नहीं प् रहा था

शीला जैसे hi झाड़ू से जमीन को साफ़ करने क लिए अपने हाथों को चलती तोह उसके यौवन में ऐसी थिरकन आती की उसे चुपके देखते हुए सत्तू क जिस्म में खून उबाल मरने लगता.. शीला क बड़े गले वाले सूट से लगभग बहार आने को उतारू उसकी badi-badi और यकीनन कासी हुई चूचियां ऐसे हिल रही थी जैसे बस किसी भी पल वो बहार निकल hi पड़ेगी, और ये नज़ारा देखते हुए सत्तू का गाला पूरी तरह सुख चूका था और उसके खून में आये उबाल का असर उसके पैरों क बीच नज़र आने लगा था

जहा शीला की खूबसूरती को सलामी देने क लिए उसकी मर्दानगी पुरे सम्मान से कड़ी हो चुकी थी.. सत्तू को शीला की खूबसूरत चूचियों की गहराई क बीच पानी की कुछ छोटी और नन्ही बूंदें नज़र आती है और अगर में सच लिखू तोह पक्के तौर पे कह सकता हु की इस समय सत्तू को पानी की उन बूंदों से जलन हो रही होगी

वह चूचियां इतनी बड़ी थी की कुर्ती उन्हें सँभालने में पूरी तरह सफल नहीं हो प् रही थी.. हर रगड़ के साथ वह ऐसे हिलती, थिरकती.. जैसे कोई मधुर लहर पानी में उठ रही हो

सत्तू क आँखों क सामने इस समय दुनिया की सबसे खूबसूरत 2 चीज़े थी.. जिनकी गोलाई और मजबूती कुछ ऐसी थी जैसे 2 ुचे पर्वत सूरज की रौशनी में चमक रहे हो

हर बार जब शीला झाड़ू रगड़ती तोह उसके साथ hi उसका जिस्म भी हिलता और जिससे उसकी चूचियां ऐसे हिलोरे कहती की बस बहार निकल क अपनी खूबसूरत का बखान सुरु कर देंगी

एक पल क लिए तोह सत्तू को ऐसा भी लगा जैसे शीला की एक दूध जैसी चुकी क गुलाबी निप्पल की ऊपरी रेखा नज़र आयी हो.. और बस इतने से उसके पैरों क बीच जो तूफान उठा उसने उसकी साँसों की रफ़्तार कई गुना कर दी थी

ये शीला की खूबसूरती और उसके यौवन की गर्मी hi थी की ऐसी ठण्ड में भी सत्तू का गाला पूरी तरह सुख चूका था.. शीला क खूबसूरत काले बालों की एक लत जब उसके कानो क पास से निकल क उसके खूबसूरत चेहरे पे झूलने लगती तोह सत्तू का दिल करता काश उसे वो अपने हाथों से हटा सकता

शीप की वह badi-badi गहरी आँखें, जो थकन से भरी थी लेकिन खूबसूरती से अब भी चमक रही थी..

उसके वो लाल गुलाब की पंखुड़ियों सामान होंठ, जो सांस लेते हुए khulte-band होते हुए इतने खूबसूरत लग रहे थे की मन हो रहा था की काश उनपे अपने होंठो को भी रख दू

और वह बेहद खूबसूरत गाला, जो पसीने से चमक रहा था.. जिससे पसीने की एक नन्ही बून्द बहते हुए उसके यौवन की गहरी खायी की और आगे बाद रही थी

शीला की कुर्ती उसकी कमर में फांसी हुई थी और उसके कमर क नीचे का हिस्सा बस उसकी सलवार ने छुपा रखा था.. जिससे शीला जब बैठे बैठे अपना एक पेअर आगे करके आगे की और सरकती तोह कुछ पलों क लिए उसके पैरों क बीच उसकी सलवार क अंदर छुपा हुआ उसके यौवन का तिकोना आकर सा उभर आता जिसके चलते ऐसा लगता जैसे बस सांस आणि hi बंद हो जायेगी

सत्तू तोह जैसे सब कुछ भूल चूका था, वो किया करने आया था और करना था उसे कुछ भी याद नहीं था.. और होगा भी कैसे, सामने 'शीला' जो थी.. और सायद ये पहली बार hi था जब उसे प्रेम क अलावा एक अलग गरम अनुभूति भी हो रही थी, जिसके चलते वो शीला को न जाने क्यू बिना कपड़ों क देखने क बारे में भी सोचने पे मजबूर हो रहा था

सत्तू का दिल अब zor-zor से धड़क रहा था.. यह प्रेम था.. या कुछ और ?

ये वो सवाल था, जिसका जवाब आ भी किसी को नहीं पता

"कोई इतना खूबसूरत कैसे हो सकता है"

सत्तू क होंठ हलके से हिलते है और ये सब्द निकलते है, पर इनमें इतना दम नहीं की ये उसके अलावा किसी और से सुने जाते

सत्तू क दोनों हाथ जो कबके दरवाजे की चौखट पे जैम चुके थे.. उनमें कंपकपाहट सी नज़र आने लगी थी, पर ये ठण्ड की वजह से नहीं था पर इस कंपकपाहट को अभी और बढ़ना था

सत्तू इस समय दरवाजे की दरार से अंदर अपनी खूबसूरत दूध जैसी काय वाली बुआ को काम करते हुए देख रहा था और पूरी तरह उसकी खूबसूरती में खो चूका था.. इस समय उसका हाल कुछ ऐसा था जैसे पूरी दुनिया सिर्फ उस एक पल में सिमट क रह गयी हो

पर तभी जैसे आसमान की जगह बिजली सत्तू पे गिरी हो, जो हुआ उसके चलते उसकी साँसे पूरी तरह अटक सी गयी थी और दिल तोह जैसे बस रुक hi गया था.. ककी उसके कंधे पे एक हाथ आके रुका था

उसके दिमाग ने पूरी तरह काम करना बंद कर दिया था और हाथों की थरथराहट उसके पूरी जिस्म में फ़ैल गयी हो.. और तभी उसके कान की लौ पे एक गरम सांस का झोंका आकर टकराया, वह सांस इतनी गरम थी जैसे मानो उसमें आग क अंश हो

फिर वो फैले लोहे क सामान कामुकता से सराबोर सब्द उसके कानो क अंदर प्रवेश करते है

"बस कर बदमाश..

बेचारी अपनी बुआ को किया आँखों से hi नंगा करके मानेगा"

सत्तू तोह ऐसे काँप उठा ठीक जैसे पतझड़ में हलकी हवा से भी सूखे पत्ते सिहर उठते है, पूरा जिस्म मानो पसीने से भीगने लगा हो और पैरों क नीचे की डरा मानो घूमने लगी हो.. पर ठीक अपनी बुआ की आवाज़ की तरह वो इस आवाज़ को भी पहचानता था ककी ये आवाज़ थी उसकी चुटकी सलोनी.. 'हर्षिता चची' की

सत्तू बुरी तरह कांपते हुए जल्दी से पीछे घूम क खड़ा हो जाता है.. पर इससे पहले की वो कुछ भी बोल पाटा उसके सामने कड़ी मुस्कुराती हुए हर्षिता बिना समय नस्ट किये अपना एक पेअर आगे करके उसके इतने करीब आ जाती है, या यु कहे की चिपक hi जाती है की सत्तू की बची खुची हिम्मत भी उसका साथ चोर देती है

वही हर्षिता जो अभी थोड़ी भीगी हुई थी और इस कारन उसकी साड़ी उसके कामुक बदन से लगभग पूरी तरह चिपकी हुई थी.. हर्षिता सत्तू की आँखों में देखते हुए मुस्कुरा उठी थी

वही सत्तू की तोह जैसे जान hi उसके सरीर से निकल गयी हो, ये दूसरी बार था जब वो ऐसा कुछ करते हुए पकड़ा गया था

(पहली बार का तोह आपको याद hi होगा 😉)

जहा एक और सत्तू का चेहरा पूरी तरह सफ़ेद पड़ता जा रहा था, वही दूसरी और उससे चिपकने की चैस्ता करती हुई हर्षिता क चेहरे पे कुछ अलग प्रकार की मुस्कान चाय हुई थी.. पर उसके आँखें लाल थी मगर ग़ुस्से से नहीं

हर्षिता धीरे से अपनी बड़ी बड़ी जिन चूचियों से कभी सोनू दूध पीटा था उन्हें सत्तू क मरदाना सीने से ऐसे दबती है मानो उनकी रगड़ का कामुक एहसास सत्तू को दे रही हो.. ऐसा लग रहा था जैसे हर्षिता इस पूरी परिस्तिति का भरपूर मज़ा ले रही हो

हर्षिता ने इस समय एक खूबसूरत सी साड़ी पेहेन रख थी, जो बारिश क कारन लगभग भीगी हुई प्रतीत हो रही थी और उसकी ठंडक इस समय सत्तू को अपनी रिड की हड्डी तक महसूस हो रही थी

वही हर्षिता का हाल भी कुछ अलग सा था, ऐसा लग रहा था जैसे वो कही आग क सामने बैठी हो और वह से सीधा चली आ रही हो.. ककी उसके जिस्म से एक अलग hi प्रकार की गर्मी निकल रही थी, जो उसके पुरे जिस्म में फैली हुई थी

उसकी बड़ी बड़ी मदहोश करने का दम रखने वाली चूचिया कुछ ज्यादा hi उसके ब्लाउज क गले से बहार नज़र आ रही थी और उनमें होता उतर चढ़ाव सत्तू को अपने सीने पे महसूस हो रहा था.. जिस कारन उसे दर तोह लगा था पर न जाने क्यू उसके पैरों क बीच ुघे उसके खीरे में ज्यादा hi हलचल सुरु हो गयी थी

सत्तू ऐसी हालत में भी ये बात साफ़ साफ़ महसूस कर प् रहा था की उसकी चची क निप्पल्स कुछ ज्यादा hi खड़े और शक्ति से तने हुए है.. जैसे वो उसके सीने में 2 छोटे छोटे छेद करने पे उतारू हो

वही हर्षिता की गरम साँसे और उसकी ज्यादा hi तानी हुई चूचियां शीला क कारन गरम हो चुके सत्तू क पैरो क बीच आग लगा रही थी.. पर शीला को लेके दिल से सोचने वाले सत्तू क लिए ऐसे अपनी चुटकी चची को लेके इस नए एहसास को समझना इतना आसान नहीं था

पर वो चाहे जितनी भी कोशिश कर रहा हो खुद को रोकने की.. पर अनायास hi उसकी नज़रें बार बार हर्षिता क ब्लाउज क ऊपरी हिस्से से लगभग पूरी बहार आती उसकी मोती तानी चूचियों का पूरा नज़ारा और उसकी गहराई सत्तू को अजीब सी दुविधा में दाल hi दे रही थी

सत्तू का हाल कुछ ऐसा हो चूका था की वो शर्म से अपनी नज़रें नीचे करता तोह उसे हर्षिता क ब्लाउज का वो दृश्य दीखता जो उसके होश ुधा रहा था.. और अगर अपनी नज़रों को उठता तोह उसे हर्षिता की उन निगाहों का सामना करना पड़ता जिनमे उसके लिए एक अलग hi भूक उसे नज़र आ रही थी

सत्तू मुश्किल से अपने सूखे गले को तर करते हुए, अपनी आवाज़ को धीमी रखते हुए धीरे से कहता है

"चची.. वो मैं.. वो.."

पर हर्षिता ने तुरंत hi उसके होंठो पे अपनी ऊँगली रख दी थी, और अपने भतीजे क होंठो पे अपनी ऊँगली का दबाव और ज्यादा बढ़ाते हुए उसकी आँखों में देखते हुए धीरे से अपनी कमर को उसकी कमर वाले पे जोर से दबाते हुए

"स्स्स्सस्स्स्सह्ह्ह..."

हर्षिता ऐसे सत्तू को शांत करवाती है जैसे कोई गहरा राज़ खोलने की तैयारी कर रही हो

"शर्म नहीं आती अपनी सगी बुआ की चूचियों को देखते हुए

मुझे तोह तू बड़ा शरीफ लगता था, पर आज कल देख रही हु.. कभी तू शीला को नहाते हुए ताड़ता है तोह आज उसे काम करते हुए देख क उसकी चूचियों को गहराई नाप रहा है

.. तू तोह बड़ा बदमाश होता जा रहा है"

सत्तू का गाला तोह बुरी तरह सुख चूका था, वो भला और किया hi कहता.. तोह आगे बोलने का काम हर्षिता hi करती है

"शीला को अगर पता चला की उसका सीधा साधा भतीजा उसे ऐसे देख रहा था तोह किया जवाब देगा उसे.. हम्म.. ?"

हर्षिता अपनी बात कहते हुए ऐसे आँखों को नाचती है मानो सत्तू की हालत का भरपूर मज़ा उठा रही हो

हर्षिता की शीला को बताने वाली बात का ऐसा असर हो रहा था सत्तू पे की उसका पूरा सरीर बुरी तरह कंपकपा उठा था.. जिसकी कंपकपाहट को हर्षिता अपनी योनि स्टाल को सत्तू क खड़े लुंड पे पूरी ताक़त से दबा क साफ़ साफ़ महसूस कर प् रही थी

"आआह्ह्ह्ह... किया कर रहा है, तू तोह ऐसे hi अपनी चची का पानी निकल देगा"

सत्तू बुरी तरह दर क पीछे होने की कोशिश करता है तोह हर्षिता तुरंत hi अपने दोनों हाथों से बाहों का हार बना क उसके गाल में दाल देती है और उसे पीछे जाने से रोकते हुए

"अरे अरे.. किया चाहता है, शीला को सब पता चल जाये ?"

सत्तू का जिस्म तोह वही क वही पत्थर में बदल जाता है और वो सांस रोके हुए वही जैम सा जाता है

वही सत्तू की हालत पे हर्षिता मुस्कुरा उठती है और अब भी उसकी आँखें सत्तू क चेहरे पे जमी हुई थी..

हर्षिता अब पूरी तरह अपनी बाहों का हार सत्तू क गले में डाले हुए अपनी कमर को उसकी कमर से ऐसे मिला देती है.. या लिखू की चिपका देती है की उसे खुद hi एक मोती भीमकाय चीज़ साड़ी को चीरते हुए उसकी योनि क अंदर प्रवेश करती हुई सी महसूस होने लगती है, और ये एहसास इतना खूबसूरत था की हर्षिता की साँसे एक hi पल में दुगनी रफ़्तार से भागने लगी थी

"हैई ये तोह लगता है.. अंदर घुस क hi मानेगा"

सत्तू बुरी तरह फास चूका था, पर न जाने क्यू उसे कुछ कुछ मज़ा सा भी आ रहा था.. पर वो अपनी hi इस्तिथि को समझ नहीं प् रहा था

सत्तू का मोटा लिंग जिसका अनुमान लगाने की हर्षिता पूरी कोशिश कर रही थी.. और जैसे जैसे उसका अनुमान सही बैठ रहा था उसकी साँसे मानो रूकती सी जा रही थी, वो जोर से अपनी कमर को सत्तू क पूरी तरह तने हुए लुंड पे दबाते हुए बड़ी मुश्किल से अपनी सिसकारियां रोक प् रही थी पर वो पीछे भी नहीं हैट रही थी

वही सत्तू तोह पूरी तरह बेबस हो चूका था, उसके दिल में शीला क लिए वह अमर प्रेम अभी भी उपस्तिथ था.. लेकिन हर्षिता की यह नज़दीकी और उसकी ये कामुक हरकत उसके अंदर एक नया तूफ़ान पैदा कर रही थी

तभी हर्षिता जो करती है उसकी सत्तू ने कल्पना मात्र भी नहीं की होगी.. वो धीरे से सत्तू क होंठों से अपनी ऊँगली को हटती है पर इससे पहले की सत्तू कुछ कर पाटा 'सोनू की माँ' अपने पैरों क पंजों पे धीरे से ऊपर की और उठती है और अपने सुलगते हुए होंठों को उस जवान लड़के क होंठों से ऐसे मिला देती है जैसे दोनों बस एक दूसरे क लिए बने हो.. मानो जैसे वो एक दूसरे क पूरक हो

सत्तू जिसने ऐसी किसी चीज़ की कोई कल्पना भी नहीं की थी ये उसके लिए कुछ अलग था.. कुछ ऐसा जो हर जवान होता लड़का चाहता है पर सत्तू को ऐसे मिलेगा और अपनी hi सगी चची से.. ऐसा उसने तोह कभी नहीं सोचा होगा, उसका पूरा सरीर तोह ऐसे काँप उठा था जैसे उसके अस्तित्व की लड़ाई सुरु हो गयी हो

पर हर्षिता ने उसे पूरी तरह चूमा नहीं था, बस उसके होंठों से अपने होंठों को मिला क अलग कर लिया था.. मानो जैसे उसे यौवन का मतलब समझने क पहले उसकी झलक दिखा रही हो, वही सत्तू तोह जैसे बस सांस लेना hi भूल चूका था वो एकटुक अपनी सगी चची 'हर्षिता' को निहारता जा रहा था पर कुछ बोलने क लिए उसके पास सब्द नहीं थे..

पर जिस पल हर्षिता ने जवानी क जोश से भरे हुए सत्तू क होंठों पे पहली छुवन दी थी, उसी पल उसका हाथ हल्का सा पीछे हो गया था और ठीक उसके पीछे क दरवाजे से टकरा गया था.. जिसका कोई भी अनुमान हर्षिता या सत्तू को नहीं हुआ था

इधर अपने जवान मरदाना भतीजे क गले में अपनी बाहें डाले हुए हर्षिता उसकी आँखों में पूरी हवस क साथ देख रही थी.. की तभी अंदर से शीला की खनकती हुई आवाज़ दोनों को सुनाई पड़ती है

"आप हो न चुकती भाभी.. कहा रह गयी थी

पक्का बड़की भौजाई क साथ गप्पे लड़ने लगी होगी"

शीला की ये आवाज़ सुनकर जहा हर्षिता धीरे से शत्तु क लगे से अपनी बाहों का हार निकल लेती है और वापस से अपने पैरों पे लौट आती है.. वही सत्तू तोह ऐसे दर गया था कैसे उसकी कोई चोरी पकड़ी जाने वाली हो

"मन करे तोह बता देना.. तुझे अचे से होंठों की चासनी चुसवा दूंगी"

हर्षिता मुस्कुराते हुए धीरे से आँख मर क सत्तू को आगे क लिए भी निमंत्रण दे देती है, वही सत्तू जल्दी से अपनी साँसों को रोक क धीरे से हर्षिता क सरीर से बचते हुए बिना सांस लिए घर क बहार की और दौड़ लगा देता है

जहा वो इतनी जल्दी में था की उसे मोनू वाले कमरे की खुली खिड़की से अंदर का नज़ारा देखने तक का भी समय नहीं मिला

सत्तू अपनी उखड़ती हुई साँसों क साथ सीधा घर क बहार छप्पर क नीचे आके hi रुकता है और वह पहुंचते hi लम्बी लम्बी सांसे लेने लगता है.. वही सत्तू को ऐसे लगभग हफ्ता हुआ सा देख क अब भी चारपाई पे लेता हुआ सोनू सवाल करता है

"अरे हुआ भैया.. आपको किया हो गया ?"

सत्तू एक पल क लिए तोह बुरी तरह दर सा लगा था पर फिर अपने पिता वाली खली चारपाई पे बैठे हुए धीरे से कहता है

"बहुत कुछ..."

** * **


आशा है ये कुछ अलग प्रकार का अपडेट आप सभी को पसंद आएगा

बाकि जिस मेगा अपडेट की बात कर रहा हु.. उसे लेके कल फिर मिलता हु

आपका मित्र- मोनू


🙏



नष्ट अपडेट 👉 मुझे रखेल बना ले...
 
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अपडेट #21


सन 🖼️ #01

एहसास...


मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #02 Running



Adultery - मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #02 Running

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अपडेट #21


सन 🖼️ #02

मुझे रखेल बना ले...

नोट ✔️

समय की कमी क चलते इस अपडेट में कोई भी 'पिछ या Gif' नहीं ऐड कर पाया हु 🙏

कमरे में जलती हुई अंगीठी की गर्मी क बीच मोनू अब भी उसी प्रकार रज़ाई को अपने सीने तक चढ़ाये हुए लेता हुआ था.. पर अब कुछ बदलाव जरूर था ककी अब वो रज़ाई क अंदर अपने लोअर को नीचे की और सरका चूका था और उसके हाथों में उसका मोटा और जरुरत से ज्यादा शाक्त खड़ा और तना हुआ लुंड थमा हुआ था, जो उसे बाकि दिनों क मुकाबले कुछ ज्यादा से परेशां कर रहा था और इसकी वजह भी थी

एक तोह पहले hi दिन की शुरुवात होते hi अपनी कामुक माँ से वो अनोखा Maa-Bete वाला प्रेम जो उसकी बड़ी माँ क स्वर क कारन पूरा hi नहीं हो पाया.. और फिर कमरे में उसकी बड़ी माँ की वो कामुक बातें और उनके ब्लाउज को पहाड़ क बहार आने को उतारू उनके बड़े बड़े मोठे दुधारू दूध.. जिसके सेवन से ताक़त मिलने की बात ने hi उसके लुंड में हुंकार भर दी थी

मोनू अपनी आँखों को बंद किये हुए चेहरे पे मुस्कान जमाये हुए धीरे धीरे अपनी बड़ी माँ क मोठे मोठे दूध को याद करते हुए अपने लुंड की स्वयं hi मालिश किये जा रहा था.. उसकी बंद आँखों क आगे इस समय सायद महेंद्र की पत्नी अपनी बड़ी बड़ी चूचियों को लहरा रही थी, कमसेकम मोनू क चेहरे पे चाय वो मुस्कान तोह कुछ ऐसा hi बता रही थी

"इन्हे याद कर रहा है किया.. ?"

तभी मोनू क रंग में भांग डाले का कार्य वो सब्द करते है जिसे सुनकर एक पल क लिए तोह वो बुरी तरह दर गया था, और जल्दी से अपने लुंड से अपना हाथ खींच लेता है.. पर जैसे hi उसकी दरी हुई आँखें खुलती है और सामने जो नज़ारा दीखता है उसे देख क उसे यकीन hi नहीं होता की दुनिया की सबसे खूबसूरत और कामुक चीज़ यु उसके सामने ऐसे दर्शन भी दे सकती है

जहा एक और बहार बारिश अपना उग्र रूप धारण कर चुकी थी, वही अंदर कमरे में जलती हुई अंगीठी की लाल रौशनी में नज़र आती उन कामुक बड़ी बड़ी चीज़ को देख क जहा Main(Monu) एक पल को उस इस्तिथि को समझ hi नहीं प् रहा था वही मेरे लुंड का हाल अलग सा होता जा रहा था, वो तोह जैसे ख़ुशी से किसी शेर जैसे दहाड़ लगाना च रहा था

"बड़ी…….. Maaaaaaaaaaaaaaaaa… वो………. ये Aaaaaaaaaaaapp…."

तभी अनायास hi मेरी नज़रें कमरे क दरवाजे की और घूम जाती है जिसकी सिटकनी इस समय अंदर से लगी हुई थी, यानि बड़ी माँ को आये हुए कुछ पल तोह गुजर hi चुके थे

पर उनकी उनकी चूचियों की याद में ऐसे खोया हुआ था की मेरा दिमाग एक पल क लिए मानो काम करना बंद कर चूका था.. वो अलग बात है की जिसकी कामना करते हुए मैं अभी अभी अपने शाक्त लुंड की मालिश कर रहा था वही चीज़ ठीक मेरी आँखों क सामने लहरा रही थी.. यानि मेरी 'बड़ी माँ' की बड़ी बड़ी नंगी चूचिया

सविता मुस्कुराते हुए अपना एक कदम और आएगी बढ़ती है जिससे उसकी बड़ी बड़ी चूचियों में एक अलग hi कामुक सी थिरकन नज़र आती है, जिसे देख क जिस्म में दौड़ते हुए खून में मानो उबाल सा आने लगा हो

यानि अब आप भी समझ चुके होंगे की सविता की बड़ी और भरी चूचिया इस समय उसके ब्लाउज से पूरी तरह आज़ाद थी और खुली हवा में खुलके सांस ले रही थी

सविता का ब्लाउज आगे से खुला हुआ था और उसके नीचे उसकी पूरी तरह गीली ब्रा ऊपर को उठी हुई थी जिससे 'सत्तू की माँ' का भरी यौवन पूर्ण नंगा होक एक जवान लड़के को उसकी जवानी की ताक़त दिखने क लिए ललकार सा रहा था.. मोनू जल्दी से अपने सूखते हुए गले को अपने थूक से तर करते हुए उठने की कोशिश सी करता है तोह सविता अपने होंठों पे ऊँगली रखते हुए ऐसा न करने का इशारा कर देती है

"Ssssssssssshhhhhhhhhhhhhhhhhh….."

और साथ hi कोई स्वर उत्त्पन करने से भी साफ़ मन कर देती है, मानो अब पूरा खेल वो खेलेगी वो भी अपने हिसाब से

सविता मुस्कुराते हुए धीरे से अपने खुले हुए ब्लाउज को दोनों हाथों की कोमल उँगलियों क बीच थामती है और धीरे धीरे अपना कन्धा उठाते हुए उसे अपने जिस्म से अलग करके मोनू क चेहरे की और उछाल देती है जो ठीक मोनू क चेहरे पे आकर गिरता है.. अब ऐसी भरी भरकम गदराई भैंस जैसी औरत अपने यौवन को कैद करने वाले कपडे का तौफा आपको देगी तोह आप उसकी खुसबू लेने से खुद को कैसे hi रोक सकते है, और यही हाल इस समय कुंडा क बेटे का था

"Snnnnnnnnnnnnnnnffffffffffffffffffffffffffffff… ufffffffffffffffffffffffff किया खुसबू haiiiiiiiiiiiiiiii.."

ये सुनते hi सविता क चेहरे पे कामुकता सी लालिमा सी च जाती है और वो मुस्कुरा क मोनू क सब्द और उसकी हरकत को देखते हुए धीरे से कहती है

"बदमाश……………"

पर सविता इतने पे कहा रूकती है ककी अब अगली बारी थी उसकी उस भीगी हुई ब्रा की जो नाम क लिए उसके सरीर पे अटकी हुई ककी उसकी भरी भरकम चूचिया तोह यही नंगी हवा में लहरा रही थी, इसलिए और अधिक समय नस्ट न करते हुए उसे भी बड़े पियर से अपने सरीर से जुड़ा करके एक बार फिर से उसे मोनू की और उछाल देती है पर इस बार उसके चेहरे की और नहीं अपितु उसके पैरों की और जो इस समय रज़ाई क अंदर थे

मोनू जो अब खुदको संभल चूका था और अपनी बड़ी माँ की चूचियों की खुसबू लेते हुए अपने पैरों क ऊपर आके गिरी उस ब्रा को देखता है तोह मुस्कुरा क कहता है

"इसकी जगह तोह मेरे दिल मैं है बड़ी माँ…"

सविता जो अब ऊपर से पूरी तरह नंगी हो चुकी थी और उसकी कामुकता की निशानी थी उसकी तानी हुई चूचियों क कड़े निप्पल, उन्हें हल्का सा हिलाते हुए पुरे पक्के इरादे क साथ कहती है

"बड़ी माँ नहीं… चिनार मिलेगी आज तुझे.. बोल चाहिए…"

मोनू को तोह समझ hi नहीं आया था की ये कह सुन रहा है

"मैं कुछ समझा नहीं बड़ी माँ…"

सविता अपनी गीली साड़ी क ऊपर से hi अपनी योनि वाले ेस्थान पे अपना हाथ ले जेक वह जोर से मसलते हुए कहती है

"बड़ी माँ मान क तोह, तू बचपन से प्रेम करता आ रहा है मुझे.. पर आज तुझे मुझे ऐसे प्रेम करना होगा जैसे एक मर्द एक चिनार औरत से करता है, बोल कर पायेगा ?"

मोनू को अब भी कुछ समझ नहीं आता की ये उसकी बड़ी माँ कैसी बात कर रही है.. पर वही सामने सविता धीरे से अपनी साड़ी उठा क उसके अंदर हाथ दाल देती है और थोड़ी दिएर बाद वो हल्का सा झुक सी जाती है और पहले एक पेअर उठती है और फिर दूसरा, और अब उसके हाथ में उसकी गीली पेंटी थी जो पूरी तरह उसके चिपचिपे कॉमर्स से भीगी भीगी हुई थी

मोनू तोह बस आवक सा अपनी बड़ी माँ और उनके हाथ में थमी पेंटी को hi देखे जा रहा था.. सविता मुस्कुराते हुए उस भीगी हुई पेंटी को अंगीठी क पास फेक देती है, मानो उस अपनी गीली पेंटी को सुखना हो.. और एक बार फिर से सविता कहती है

"तोह बोल.. छोड़ पायेगा मेरी जैसी गर्दै रैंड.. चिनार.. रखेल औरत को..."

मोनू क कान कामुकता क चलते पूरी तरह गरम हो चुके थे.. वो एक बार फिरसे पुरे सम्मान क साथ

"ये कैसी बात कर रही हो आप…. मैं आपको ये कैसे………?"

मोनू क मुख से निकलने वाला एक एक सब्द उसके गले में अटकता हुआ बहार आ रहा था

वैसे अगर आप ये सोच रहे है की सविता ये कैसी बात कर रही है तोह आगे बढ़ने से पहले.. पहले थोड़ा पीछे चलते है

(किया करू आदत से मजबूर हु 😅)

अपनी बड़ी बड़ी दुधारू चूचियों और उनमें कभी भरने वाले अपने शक्तिशाली दूध की बातों से मोनू को पागल बनाने और खुद भी पूरी तरह अपनी योनि को गीला करने क बाद जब सविता कमरे से बहार निकलती है..

[[ ये पूरा दृश्य आपने पड़ा था.. और आशा है पसंद भी आया होगा


अब आगे... ]]

मोनू क साथ हुई कामुक वार्तालाप ने सविता की साड़ी क अंदर उसके पेटीकोट क नीचे नंगी उसकी गेहुआ रंग की बालों से भरी गहराई kheli-khai योनि में chipchipa-pan लाना सुरु कर दिया था.. पर समय रहते सविता ने अपनी योनि की बात न सुनकर खुदपे काबू रखते हुए वह से बहार आ जाना hi सही समझा

पर उस सब क कारन.. बहार आते hi 'सत्तू की माँ' की कामुक साँसे उसके अंदर की गर्मी का प्रमाण दे रही थी

सविता मुस्कुराते हुए अगला कदम hi बढ़ती है की उसे अपने योनि ेस्थल पे एक दबाव सा महसूस होता है और उसके अधरों से सब्द खुद hi फुट पड़ते है

"जरा सी ठण्ड हुई नहीं की ये निगोड़ी छूट का बार बार मूतने का कार्यकरण सुरु हो जाता है"

सायद ये पेशाब की ीचा ठण्ड से ज्यादा मोनू क कामुक सब्दो क कारन हुई थी.. पर अब जाना तोह था hi

वर्ण इस उम्र में एक गदराई कामुक औरत खड़े खड़े hi अपना गरम मूत बहाना सुरु कर देती.. इसलिए लगभग भागते हुए हमारी सविता घर क पिछले हिस्से में बने शौचालय की और चल पड़ती है, मानो जरा सी भी देरी की तोह सारा कार्यक्रम बीच रस्ते में hi सुरु हो जायेगा

वैसे ठीक ऐसी पल फिर से रफ़्तार पकड़ चुकी वर्षा और उसकी मधुर आवाज़ भी सविता की योनि से उसके गरम मूत को बहार लाने का पूरा भार खुद पे ले चुकी थी.. ऐसे में भागते हुए सविता का एक एक कदम उसपे भरी पद रहा था

जैसे जैसे सविता घर क आँगन को पार करते हुए पिछले हिस्से की और बाद रही थी वैसे वैसे घर क खुले हिस्से क कारन वो भीगना भी सुरु हो चुकी थी.. पर उसे अपने भीगने की परवा कहा थी

वही सविता क भागने क कारन उसकी बड़ी बड़ी दूध से भरी हुई चटिया ऐसे उछाल रही थी मानो किसी भी पल वो उस ब्लाउज को पहाड़ क अपनी गेहुआ जवानी को प्रदर्शित करना सुरु कर देंगे.. पर ये तोह 'खालिद क बाप' क हाथों से सिले हुए ब्लाउज का कमल था जो ऐसी भरी भरकम चीज़ को अब भी अपने अंदर समेटे हुए थे

सविता को ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे किसी भी पल उसकी योनि से गरम धार बेहनी सुरु हो जाएगी, जहा कुछ दिएर पहले तक वो मुस्कुराते हुए मोनू को ताकतवाला दूध पीने की सलाह दे रही थी वही अब इस समय उसे उन बातों की तनिक भी परवा नहीं होगी.. जल्दी hi सविता घर क पिछले हिस्से में पहुंच चुकी थी, जहा अब खुला आसमान उसे पूरी तरह भिगोने लगा था और उसकी कामुक गर्दै जवानी को निखारने का कार्य करने लगा था

बारिश की तेज़ गति क साथ साथ हवाओं का भी तेज़ी से चलना सुरु हो चूका था, जो घर क पिछले खुले हिस्से में लगभग भागती हुई सी सविता क जिस्म में सिरहर सी दौड़ा रही थी.. और तीव्र मूत्र विसर्जन की ीचा क चलते उसके जिस्म में कंपकपी सी उठ रही और ठीक उसके उन्नत खड़े मोठे काले जामुन सामान निप्पल्स की hi तरह उसके जिस्म क सभी रोये भी खड़े भी चुके था, पर जो चीज़ सबसे ज्यादा कामुक लग रही थी वो थी उसके बड़े बड़े उन्नत उरोजों पे उसका उछलता हुआ मंगलसूत्र.. जो उसके पतिव्रता होने का साबुत बन रहा था

गीली मिट्ठी और उसपे गिरती बारिश की बूंदों की आवाज़ हमारी सविता की हालत और भिगाडती जा रही थी, और हाल तोह और ज्यादा बुरा हो जाता है जब उसे शौचालय का द्वार बंद नज़र आता है

घर क पीछे का वो छोटा सा बगीचे सामान हिस्सा इस समय पूरी तरह बारिश से नहाया हुआ नज़र आ रहा था, hari-hari घास पे पानी की चादर सी जमी हुई दिख रही थी वही तेज़ हवा क चलते फूलों क पौधे ऐसे झुक गए थे मानो समर्पण कर रहे हो.. गुलाब क खूबसूरत खिले हुए लाल फूल बारिश में भीगने क कारन ठीक शीला क गाल जैसे और ज्यादा खिल उठे थे तोह वही पीले पीले गैंडे क पुष्प ठीक हमारी हर्षिता सामान मुस्कुरा रहे थे

स्नानघर और शौचालय क पास लगे हैंडपंप का पूरा हिस्से पानी से भरा हुआ था और उसके समनीप hi शान से खड़े उस छोटे से अमरुद क पेड़ क hare-bhare पत्ते तेज़ हवा से मानो नृत्य सा कर रहे थे

सविता ने जल्दी से अपनी साड़ी क पल्लू को सर पर डाला और बिना देरी क शौचालय क और समीप पहुंच गयी.. मानो वो जाते hi जोर से दरवाजा बजने वाली हो, पर उसके ऐसा कुछ भी कर पाने से पहले hi उस आवाज़ ने उसके दिल की धकड़न को मानो एक पल क लिए रोक सा दिया था.. जो उसके कानो से होती हुई ठीक उसकी योनि की खुली फाकों तक पहुंच गयी थी



✨ कंटिन्यू... 👇 ✨
 
पेशाब की तीव्र ीचा इतनी बढ़ चुकी थी की उसकी टांगों के बीच एक गरम लहर महसूस होने लगी थी, मानो जैसे किसी भी पल एक और वर्षा सुरु हो जाएगी.. पर शौचालय क अंदर से आते उस स्वर ने उसके पैरों की गति न सिर्फ धीमी कर दी थी, बल्कि बारिश में भीगती हुई सविता क कदम अब ऐसे आगे बाद रहे थे मानो वो पेअर कोई भी अतिरिक्त शोर उत्पन करने से डरने लगे हो



तभी एक बार फिर से शौचालय क अंदर से वही शोर उसके कानो तक पहुँचता है

"Aaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhh… Maaaaaaaaaaaaaaaaa…. कितनी मस्त चूचिया है आपकी.. आअह्ह्ह मन तोह किया था आपका ब्लाउज पहाड़ क उन्हें मुंह में बहार लू और चूस लू……… Aaaaaaaaaaaaaaaaaaaaahhhhhh"

महेंद्र क घर में सायद कोई और भी था जो चूचियों में भरे दूध का दीवाना था, सविता क कदम आगे बढ़ने रुके से गए थे.. वैसे भी वो शौचालय क ठीक सामने पहुंच चुकी थी

"आआह्ह्ह माँ... उफ्फफ्फ्फ़ हैईईई... माँ... देखा न तुम्हारा बीटा कितना जवान हो गया है.. आआआअह्ह्ह्हह.. पर मुझे अब भी आपका दूध पीना है.. आआआहहहहह…

कैसे बताऊ आपको की.. आपकी वो कामुक मुस्कान हर बार मेरे लुंड को खड़ा कर देती है..

आआआआह्ह्ह्ह.. न जाने वो दिन कब आएगा जब मैं अपने हाथों से आपके कपडे उतरूंगा और आपको नंगी करने आपसे असली प्रेम करूँगा… Aaaaaaaaaaaaaaaahhhhhh"

सविता जैसी गदराई और कामुक औरत भी अंदर से आती हुई उन कामुक सिसकारियों और उन सड़बों को सुनकर ऐसे गंगना सी गयी थी मानो जैसे आज से लगभग 1 साल पहले उसके और उसके बेटे 'सत्यम' क बीच सुरु हुए उस खेल को कोई फिर दोहराना च रहा हो

फिर सविता क लाल होंठों क बीच से जो नाम फूटता है वो सत्यम नहीं.. वो था

"सोनू….."

और सविता और हमारे लिए ये समझना कोई बड़ी बात तोह है नहीं.. की सोनू जिस औरत को नंगा करने की ीचा रखता है वो और कोई नहीं अपितु उसकी कामुक सलोनु सूरत वाली माँ ‘हर्षिता’ है..

सविता अभी अंदर से आती हुई आवाज़ों को सुन hi रही थी की एक बार फिर से वो आवाज़ थोड़ी तेज़ होने लगती है मानो जैसे सोनू किसी दौड़ क अंतिम पड़ाव पे पहुंचने वाला हो

"Aaaaaaaaaaaaaaahhhhh.. Maaaaaaaaaaaaa… देखना वो दिन भी जल्दी आएगा जब में अपना पूरा लोढ़ा आपके मुंह में दाल क आपको अपनी कुटिया बनाऊंगा.. और दिन रात आपको ऐसे ऐसे छोडूंगा की आपकी छूट का कचूमर बन जायेगा.. तब पता चलेगा आपको की मैं कितना बड़ा हो गया हु... Aaaaaaaaaahhhhhhhhhhhh… Aaaaaaaaaaaaahhh.. मेरी खूबसूरत सलोनी…. मस्त चूचियों वाली मायआ... Aaaaaaaaaaahhhhh"

सविता को इन शब्दों क साथ साथ हलकी थप थप सी आवाज़ भी आ रही थी, जिससे ये तोह साफ़ था की सोनू अंदर अकेला है और खुद से खुद क खिलोने को जोरो से मथने का कार्य कर रहा है.. सविता से रहा नहीं जाता तोह वो धीरे से द्वार क और समीप आती है और धीरे से उस दरवाजे क हत्थे क पास उस पुराने से छेद पे अपनी नज़रें टिका देती है

सविता को यकीन नहीं हो रहा था जिस लड़के को वप अभी बचा समझ रही थी.. वो अब इतना बड़ा हो चूका था की अपनी माँ को नंगा करके उसके मुंह में अपना लुंड घुसाने की बात कर रहा है.. और इतना hi नहीं वो उसकी देवरानी यानि हर्षिता को अपनी कुटिया बनाने की कामुक और गरम ीचा भी रखने लगा है

सविता अपनी उखड़ती हुई साँसों और धधकते हुए दिल क साथ जब अंदर का दृस्य देखती है तोह उसे हलकी निराशा भी मिलती है पर इतनी नहीं की उसकी योनि से गरम मूत की हलकी बुङ्ढों को रोका जा सके

इन्शान की जिज्ञाषा उससे ऐसे ऐसे काम करवा लेती है जिसे वो सायद करना न चाहे सायद ऐसी क चलते सविता अपने पेशाब को रोके हुए अंदर की और आँखें जमा चुकी थी पर इस समय उसे शौचालय क अंदर सोनू पूरा नंगी अवस्था में नज़र आता है पर उसे जो देखना था वो नहीं दीखता ककी सोनू का चेहरे सामने की और था और इस समय 'सत्यम की माँ' को, हर्षिता क बेटे की गोरी गांड hi दिख्रती है.. पर उसके तेज़ी से हिलते हाथ इस बात का प्रमाण था की वो कोनसा खेल, खेल रहा है

"Aaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhhh... Maaaaaaaaaaaaaaa… एक न एक दिन मैं आपको कुटिया बना क आपकी छूट में अपना लुंड भर दूंगा... Aaaaaaaaaaaaahhhhh.. आपकी चूचियों को इतना चूसूंगा की आपको यकीन हो जायेगा की आपका बीटा सच में क्तिना बड़ा हो गया है… Aaaaaaaaaaaaahhhhh"

बारिश की तेज़ और मोती बूंदीन कुंदन की बड़की भौजाई क बदन पे गिरती hi जा रही थी जिससे उसकी साड़ी पूरी तरह भीग क पारदर्शी अवस्था में आने लगी थी ठीक वैसे hi जैसे मोनू क कक्ष में प्रवेश करते हुए कुछ समय पहली थी

सविता क मोठे मोठे दूध एक बार फिर से अपना आकर दिखने लगे थे और उसके सजे उसके मंगलसूत्र में होती हलचल उसकी हालत को बयां कर रही थी.. उसकी गदराई जवानी का प्रणाम उस खुले ामसँ क नीचे फिर से मिलने लगा था, पर अंदर का नज़ारा देखते हुए उसकी योनि में होने वाली सिरहन कई गुना बाद चुकी थी

'ये कमीना.. इतना बाद कब हो गया.. ?

जो मादरचोद बनने की ीचा आ गयी इसके अंदर'

सविता क मन में इस समय यही एक बात आती है, मगर ये उसके सड़बों का रूप नहीं लेती

शौचालय और स्नानघर क जिस द्वार की मरम्मत क लिए सविता इतनी समय से अपने पति से कहती आ रही थी.. आज उसी क चलते हुए उसे ये सब देखने को मिल रहा था, उसके दिल में एक नया सवाल जनम लेने लगता है

'किया.. सोनू सच में इतना बड़ा हो गया है ?'

पर सविता को नहीं पता था की सोनू की ऐसी हालत क पीछे खुद उसकी माँ का वो कामुक यौवन था जो हमारे सोनू ने आँख खुलते hi देखा था..

और उस समय किया किया हुआ था ये तोह हम पहले hi पद चुके है, आशा वो सब याद होगा🍌

वह शौचालय क अंदर सोनू का हाल और बुरा होता जा रहा था, उसकी आँखें बंद थी और उन बंद आँखों क आगे उसकी कामुक सलोनी सूरत वाली माँ 'हरषतीअ' कड़ी उसे अपना नंगा यौवन दिखा रही थी.. जिसे देखते हुए बेचेरे सोनू क हाथों में थकन आने लगी थी पर वो अपने हाथों की रफ़्तार काम नहीं कर प् रहा था

"आआह माँ... haiiiiiiiiiiiii..... कब लोगी मेरा लुंड अपने मुंह में….. Aaaaaaaaaaaaahhhhhh.. आपके कोमल होंठों क बीच लुंड घुसाने की मेरी ये ीचा कब पूरी होगी… आआआआह्ह्ह्ह… कितनी गरम चीज़ हो आप Maaaaaaaaaaaaa… Aaaaaaaaaaaaahhhhhh.. जिस दिन पहली बार आपको नहाते हुए देखा था.. उस दिन से आपके जिस्म पे अपना रास निकलने की मेरी ीचा न जाने कब पूरी होगी.. आआआआह्ह्ह्ह"

सविता को यकीन नहीं होता की सोनू इतना बड़ा हो चूका है की वो अपनी माँ को सायद नंगी अवस्था में भी देख चूका है.. पर सविता क दिल अब भी इस बात पे यकीन नहीं कर प् रहा था की उसकी आँखों क सामने पैदा हुआ छोटा सा सोनू इतना बड़ा हो चूका है ?

"न जाने कब में आपकी कासी कासी चूचियों पे अपने लुंड का गाड़ा रास टपका पाउँगा.. Aaaaaaaaaahhhhh…. मेरी सलोनी गरम Maaaaaaaaaaaaaaaaa…."

सोनू क मुख से निकलते हुए एक एक सब्द बारिश में भीगती हुई सविता क जिस्म पे ऐसे प्रहार कर रहे थे मानो जैसे उसकी योनि की फाकों को कोई दोनों हाथों से फैलने की कोशिश कर रहा हो

हर्षिता क लिए ऐसे शब्दों का कुछ अलग सा झाड़ू हो रहा था.. 'सत्तू की माँ' क ऊपर ककी एक पल क लिए उसे ऐसा लगता है जैसे हर्षिता खुद उसके सामने नंगी अवस्था में अपनी दोनों टंगे फैलाये हुए मुस्कुरा क उससे कह रही हो

'आओ न.. बड़की भौजाई.. अपनी देवरानी से प्रेम नहीं करोगी किया… देखो न मेरी योनि आपके होंठों की छुवन क लिए कितनी बैचैन सी है'

इस नयी सोच ने हमारी सविता का बदन बुरी तरह कंपकपा सा दिया था, मानो जैसे उसके अस्तित्व पे नया प्रहार हुआ हो.. पर वो अंदर देखने से खुद को रोक भी नहीं प् रही थी.. और उसका दिल ये भी मैंने को तैयार नहीं हो रहा था की सोनू सच में इतना बड़ा हो चूका है ?

सविता क अंदर एक अजीब सी बैचनी उठने लगी थी.. उसका दिल बार बार च रहा था की काश सोनू एक बार उसकी और पलट जाये, और वो देख सके की सोनू कितना बड़ा हो गया है ?

सोनू क हाथों की रफ़्तार पहले से दुगनी हो चुकी थी, उसकी साँसे उखाड़ने लगी थी और हाथों की सभी नसे नज़र आणि सुरु हो चुकी थी… जो उसकी म्हणत को दर्शा रही थी

बेचारी सविता पे तोह दोहरा हमला हो रहा था.. एक और पेशाब की प्रबल ीचा और दूसरी और अंदर सोनू क बड़े होने का प्रमाण देखने की ीचा.. उसे एक मजधार में फसा रही थी ?

पर अब सविता से रुकना मुश्किल हो रहा था और सायद वो वह से इतनी जल्दी हटना भी नहीं च रही थी इसलिए उसने एक नया तैरका निकल लिया

सविता ने धीरे धीरे अपनी साड़ी को उठाना सुरु कर दिया, पर एक पल क लिए भी वो अपनी नज़रों को उस छेद से नहीं हटा रही थी.. उसके हाथ किसी अनदेखे आदेश को मानते हुए कार्य कर रहे थे

धीरे धीरे सविता की साड़ी इतनी ऊपर उठ चुकी थी की उसकी गेहुआ मांसल जांघें नज़र आणि सुरु हो चुकी थी, वैसे जब साड़ी इतनी ऊपर हुई तब ये भी पता लगा की सविता साड़ी क साथ साथ अपने पेटीकोट को भी पड़के हुए ऊपर उठा रही थी और ये सब वो झुकी हुई उस छेद से अंदर सोनू की गोरी हिलती हुई गांड और उसके हाथों की रफ़्तार देखते हुए किये जा रही थी

जल्दी hi वीरू की बड़की भौजाई की दोनों मांसल मोती गदराई जांघें पूरी तरह बारिश में भीगना सुरु हो चुकी थी, यानि पूर्ण निवस्ट अवस्था में आ चुकी थी.. तेज़ वर्षा क चलते उस शौचालय की दीवार पहले से hi पूरी भीगी हुई थी और उसपे शौचालय की छत से बहती हुई पानी की धाराएं उस दीवार से होती हुई नीचे गिर रही थी

जैसे किसी बड़े झरने की छोटी छोटी धाराएं बह रही हो.. सविता ने अपनी नज़रों को वही टिकाये हुए अपने सरीर को उस दिवार से इतना चिपका लिया की शौचालय की छत से नीचे आता हुआ पानी अब उसके सरीर को महसूस होने लगा था, वो एक लम्बी सी सांस लेती है और अपनी दोनों टांगों को पूरा फैला देती है.. और साथ hi साथ अपनी उँगलियों की मदद से अपनी पेंटी को थोड़ा खिसका भी देती है जिसके चलते दुनिया की सबसे खूबसूरत गुफा की झलक दिखना सुरु हो जाती है

और फिर जैसे hi उसकी दोनों टंगे फैलती है एक ठंडी हवा का जिस्म कंपकपा देने वाला झोंका उसे अपनी कोमल बालों से भरी योनि पे महसूस होता है जिससे एक पल क लिए सविता की आअह्ह्ह निकलते निकलते रह जाती है पर वो उसकी आँखें जरूर एक पल में बंद होती चल जाती है

सविता अपनी कमर को आगे की और करते हुए अपनी योनि को उस दिवार से मानो पूरी तरह मिला सी देती है और ऐसी पल उसकी योनि अपना गरम गरम अमृत सामान पीला मूत निकलना सुरु कर देती है.. वैसे उसकी योनि से मूत विसर्जन होते hi एक मधुर सी सीटी भी बजनी सुरु हो गयी थी पर शौचालय की स्टील वाली तीन की चाट पे गिरती तेज़ बुङ्ढों का शोर उसकी इस मदुर ध्वनि को जवान सोनू क कानो तक जाने से रोक लेता है

मूत की मोती धार निकलते hi सविता को असीम सुकून और आनंद की प्राप्ति होती है और वो उसी प्रकार अपनी आँखों को फिर से खोल क शौचालय की दिवार पे मुत्ते हुए अंदर का नज़ारा देखने लगती है जहा सोनू क हाथ रुक चुके थे और उसे शौचालय की दिवार पे एक सफ़ेद चिपचिपी चीज़ उछाल क गिरती हुई नज़र आती है

"Aaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhhhh… Maaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaa… Aaaaaaaaaaaaahhhhhhh.. ये आपके लिए है……….. Aaaaaaaaaaaaaaahhhhh"

सविता की योनि से निकलती उसके मूत की मोती धार शौचालय की छत से नीचे बहकर आते हुए पानी में मिलती जा रही थी और फिर वो नीचे जमीन पे पैरों की उँगलियों को भिगोने की क्षमता रखने वाले पानी में मिलनी सुरु हो चुकी थी..

दीवार की ठंडक और उसका गीलापन उसकी मोती जाँघों को छू रहा था, पर उसकी योनि से निकलने वाले मूत की धार में आज इस ठण्ड से ज्यादा गर्मी नज़र आ रही थी

"इधर घूम न.. एक बार.."

सविता क अधरों से सब्द बहुत धीमी से फुट पड़ते है जो अंदर अपने वीर्य की वर्षा करते हुए सोनू क कानो तक तोह नहीं पहुंच पाते.. पर सविता क मन की ीचा को जरूर jag-jahir कर देते है

जैसे जैसे सोनू का लुंड झटके लेते हुए अपनी जवानी की अंतिम बुँदे चोर रहा था.. ठीक वैसे hi सविता की योनि से निकलने वाली उसकी धार की गति भी पूरी तरह कमजोर होने लगी थी और जल्दी hi उसकी योनि कुछ हलके अंतिम झटके खा क पूरी तरह खली हो चुकी थी.. वैसे इस समय तक सविता पूरी hi भीग चुकी थी

सविता ने अपने जिस हाथ अपनी पेंटी को सरका रखा था उसे अब अपनी टांगों क बीच लाती है और अभी भी पूरी तरह भीगी हुई अपनी योनि को जोर से मसल देती है और फिर समय नस्ट किया बिना तुरंत hi अपनी साड़ी को नीचे करके अपनी इस्तिथि और अपनी उखाडित हुई साँसों को काबू करते हुए जल्दी से ठीक जैसे यहाँ भागते हुए आयी थी.. बिलकुल उसी प्रकार भागते हुए वह से चल पड़ती है

सविता क वह से जाने क करीब 2-3 मं बाद सोनू भी अपनी हवस को पूरी तरह ठंडा करके जैसे hi शौचालय क बहार पहला कदम रखता है उसे एक नयी और कामुक सुगंध सी आती है.. पर उसे समझ नहीं आता ये कामुक खुसबू किस चीज़ की है, पर उस अनोखी सुगंध में कुछ तोह अलग था ककी इतनी दिएर से अपनी सगी माँ क नाम पे अपने जिस लुंड को उसने ठंडा किया था मात्र उस सुगंध क कारन उसमे एक बार फिर से उठान सा आने लगा था

सोनू अपनी इस्तिथि सँभालते हुए जल्दी से घर क बहार छप्पर क नीचे बैठे सभी लोगो क पास चल पड़ता है.. जहा थोड़ी दिएर बाद उसकी माँ उसके और बाकि सभी क लिए वो हल्दी वाला गरम दूध लीक आती है

और वह kiya-kiya हुआ था, ये तोह आप पद hi चुके है*

आशा है अब आपको सभी कड़िया जुड़ती हुई दिख रही होंगी..

नोट ✔️

आगे बढ़ने से पहले में अपने खास मित्र lundbur123 भाई का खास धन्यवाद् करना चाहूंगा, ककी शौचालय वाला ये पूरा आईडिया 💡 एक हिसाब से उन्ही क कारन मुझे आया था



✨ कंटिन्यू... 👇 ✨
 
सविता पूरी भीगी हुई वह से निकल क सीधा रसोईघर की और चल पड़ी थी, सायद अब उसे ठण्ड सी लगने लगी थी और उसे रसोईघर में जलते हुए चूल्हे की गरम लपटों की गर्मी की आवश्यकता थी



पर उससे पहले थोड़ा पीछे चलते है और 'हर्षिता' से मिलते है..

सुबह क करीब 10:15 हुए होंगे और अपने जवान बेटे को उठाने क बाद हर्षिता क जिस्म क अंदर काफी रंगीन तरंगे उठानी सुरु हो चुकी थी, वो मुस्कुराते हुए सीधा रसोईघर की और चल पड़ी थी.. जहा से उसे घर क पीछे वाले सालों से बंद कमरे की सफाई में मदद करती शीला क लिए पीना का और नीचे की जमीन धुलने क लिए और एक बाल्टी पानी लेके जाना था

हर्षिता जैसे hi रसोईघर में पहुँचती है उसे याद आता है की सोनू का बिस्तर तोह उसने चारपाई से हटाया hi नहीं

"पहले इसका बिस्तर हटा देती हु.. वर्ण ये नालायक फिर आके लेत जायेगा"

हर्षिता रसोईघर में कड़ी हुई खुद से ये कह hi रही थी की तभी जोर से बिजली कोंध उठी है.. वो एक लम्बी सांस लेती है और वापस आँगन वाले छप्पर क नीचे पड़ी चारपाई से बिस्तर और रज़ाई उठा क अंदर वाली कोठरी में रखने चल पड़ती है और ठीक ऐसी पल तेज वर्षा ने एक बार फिर से आगमन कर लिया था

"कितनी अजीब बारिश है आज की..

कुछ पल क लिए रूकती है.. तोह कुछ पलों बाद वापस से सुरु हो जाती है..

न जाने आज कहा बिजली गिरने वाली है..."

हर्षिता उस छोटी सी कोठरी से निकल क वापस आँगन में आती है तोह एक बार फिर से घनघोर बारिश ने अपना रूद्र रूप ले लिया था, वो एक बार फिर से पड़ी उस चारपाई की और देखती है जिसपे थोड़ी दिएर पहले उसका बीटा सोया हुआ था, तोह जो अभी अभी हुआ उसे सोच क उसके गालों की लालिमा फिर से लौट आती है..

"वैसे ये नालायक गया कहा है..

सायद स्नान क लिए पीछे गया होगा ?"

पर हर्षिता को किया पता की उसका बीटा वह घर क पीछे स्नानघर की जगह इस समय शौचालय में उपस्तिथ है और उसको hi याद कर रहा है..

और कैसे याद कर रहा है ये तोह हम ऊपर पद hi चुके है 😉

इधर हर्षिता एक बार फिर से रसोई में लौट आयी थी और सुबह सुबह hi पहले अपनी बड़की भौजाई क साथ हुई कामुक वार्तालाप क कारन उसके दिन की कामुक सी सुरुवात हो चुकी थी.. और उन बातों क कारन उसके जिस्म क अंदर एक नयी कामुक खुजली सी उतनी सुरु हो चुकी थी, पर उस खुजली में अभी इतना दम नहीं था की वो उसकी योनि से कॉमर्स की धार बहा सकती

पर अगर आज हर्षिता क साथ सिर्फ इतना hi हुआ होता तोह बात अलग थी.. आज तोह जैसे इस घनघोर वर्षा क साथ साथ उसके कॉमर्स की वर्षा होनी भी तय थी, सायद इसीलिए जब हर्षिता अपनी बड़की भौजाई 'सविता' से हुई उस मस्तानी nauk-jhauk क बाद आगे बढ़ती है और छप्पर क नीचे सुबह क 10 बज बजने क बाद भी सोते हुए अपने जवान बेटे की रज़ाई खींचती है तोह जो चीज़ उसे सबसे पहले नज़र आती है वह था सोनू क पैरों क बीचे उसका फैन उठाये हुआ नाग..

कुछ पलों क लिए तोह जैसे हर्षिता भूल hi गयी थी की आखिर वो यहाँ आयी क्यू थी.. वो तोह एक तुक बस अपने जवान बेटे की उठी हुई जवानी घूरे जा रही थी जिससे अनायास hi उसकी साड़ी क अंदर एक नयी गर्मी का तापमान सा बढ़ने लगा था, मानो जैसे किसी भी पल उसकी साड़ी जो हलकी सी भीगी सी थी उसमें आग की लपटे पकड़ लेंगी

हर्षिता न जाने ऐसे hi और कितनी दिएर अपने जवान बेटे का उठा हुआ फैन देखती रहती.. उसे न समय की परवा थी न सुरु हो चुकी उस घरघोर वर्षा की जो कभी धीमी होती तोह कभी अपनी पूर्ण ताकत क साथ वापस से बरसना सुरु हो जाती

वो तोह सुबह hi ठंडी हवा ने सोनू की नींद तोड़ने का कार्य कर दिया था.. और फिर उसके बाद किया हुआ ये तोह आप bhali-bhanti जानते है

अपने बेटे की जवानी को देखने क बाद हर्षिता सीधा रसोईघर में पहुंच चुकी थी जहा वो आते hi एक किनारे रखे हुए पानी क घड़े की और ऐसे लपकती है मानो ऐसी वर्षा ऋतू में भी उसके अंदर कही आग भड़क गयी हो, वो जल्दी से गिलास भर पानी नीलकलती है और वही खड़े खड़े गिलास उठा क पीना सुरु कर देती है

जहा एक और ठण्ड का प्रहार ऐसा था की लोगो की हड्डिया तक काँप जा रही थी, वही दूसरी और अपने जवान बेटे क जवान होने की निशानी देख क हर्षिता क मन मस्तिक उससे लड़ने पे उतारू होता जा रहा था.. जैसे जैसे ठंडा पानी हर्षिता क गले से होता हुआ उसके अंदर समां रहा था वैसे वैसे उसके अंदर की गर्मी भी हलकी सी भुजनि सुरु हो चुकी थी, पर आज का ये दिन इतनी आसानी से कहा पूर्ण होने वाला है.. जैसे की ये बात मैंने पहले भी कई बार कही है

हर्षिता इस समय घड़े क पास hi कड़ी हुई गिलास ऊपर उठाये हुए पानी पिए जा रही थी, मानो न जाने कोनसी पियास थी जो भुज hi नहीं रही थी उस पानी से..

यहाँ तक हम हर्षिता क मन की इस्तिथि को तोह भली भांति समझ चुकी है

वैसे हर्षिता की योनि क तड़पने क पीछे बहुत hi सीधी सी बात थी की जब से मोनू क साथ वो दुर्घटना हुई है तभी से पूरा परिवार एक hi छत्त क नीचे रह रहा है.. जहा 'मुरली दस' क परिवार की किसी भी कामुक स्त्री को उसकी कामुकता का हल प्राप्त नहीं हो प् रहा है

पर अब मोनू क स्वस्थ होने क बाद चीज़े कैसे तेज़ी से बदल रही है, ये तोह आप खुद hi देख रहे है.. पर अभी तोह ये बस एक सुरुवात है

ऐसे मैं बड़े तूफान से पहले चलने वाली हलकी हवाओं की तरह hi देख रहा हु, ककी असल तूफान तोह अभी आना है जिसकी चपेट में आने से कोण कोण खुद को बचा पायेगा कहना मुश्किल है

जहा एक तरफ हर्षिता का जिस्म ऐसी ठन्डे दिन में भी गरम हुआ पड़ा था, वही अपने विशाल दूध को उछलने वाली सविता का भी हाल कुछ अलग नहीं था... कहने को तोह उसके दिन की सुरुवात hi मालती की कामुक सिसकारियों को सुनने और फिर अपने hi जवान बेटे क लुंड पे उछलने से हुई थी.. पर अभी अभी कमरे क अंदर जो उसके मीठे दूध को लेके बातें हुई, और फिर उसने सोनू क जवान होने का जो दृश्य देखा या देखने की कोशिश की उसके चलते उसके अंदर की अग्नि फिर से भड़क चुकी थी

इधर सविता घर क पिछले हिस्से से वापस लौट रही थी जहा वो अब पूरी तरह भीग चुकी थी और उसे जल्दी से रसोई में जलते चूल्हे तक पहुंचना था.. पर अब हर कदम क साथ उसकी गीली योनि उसे परेशां करने लगी थी

सविता बिना इधर उधर देखे hi जोर से अपने गीले हो चुके योनि स्थल को अपनी मुठी में भींच सी लेती है जिससे उसकी आँखें स्वतः hi बंद होती चली जाती है और उसके मुख से कामुकता की चासनी में लिपटी हुई धीमी सी सिसकारी क साथ वो सब्द फिर से फुट पड़ते है

"Aaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhh…………. Maaaaaaaaaaaaaaaa"

वैसे सविता अब रसोई क बिलकुल पास hi थी

सविता को सायद पता hi नहीं चला था की कब वो अपनी इस कामुक हरकत को करते हुए अपने होंठों को काटने लगी थी, सायद वो वही रसोई क पास अपनी योनि स्थल से और कुछ दिएर ये काम क्रीड़ा का खेल खेलती पर उसे वास्तविकता में लौटने का कार्य बादलों की उस भीसाद आवाज़ ने किया जिसे सुनते hi सविता की आँखें खुल जाती है पर उसके होंठों पे च चुकी हसी वो बादलों क गर्जन की डरावनी आवाज़ भी नहीं चुरा पाती

पूरी तरह भीगी हुई सविता एक लम्बी सी सांस लेती है.. वैसे इस समय उसके होंठों से निकलती उसकी साँसें इतनी गरम हो चुकी थी की अगर कोई उसके सामने खड़ा होता तोह सायद उसकी कामुकता की अग्नि में झुलस सा जाता

और एक बार फिर से सविता क कदम उसी रसोई की और बाद पड़ते है जहा इस समय 'सोनू की माँ हर्षिता' पहले से उपस्तिथ है.. वैसे इस समय उसका चेहरा पूरी तरह लाल था, पर ये घुसे वाली लाली नहीं अपितु कामुकता की कोमल लालिमा थी.. जिसका करना आप जान hi चुके है

जल्दी hi अपनी उखाडित साँसों और मोनू की कामुक नज़रों और उसके अनोखे कामुकता की वेश भूषा में लिपटे सब्दो क कारन सविता की पहले hi गुलजार हो चुकी योनि क साथ वो जैसे hi रसोईघर क अंदर पहला कदम रखती है उसे सामने घड़े क पास हर्षिता कड़ी हुई नज़र आती है जो इस समय गिलास को ऊपर उठाये हुए पानी पि रही थी, जिस कारन पानी क कुछ अंश उसके सावले चेहरे को भिगो रहे थे और उसके गले से नीचे उतरता हुआ पानी उसके गले में होने वाली हलचल दिखा रहा था.. और न च क भी उसे उसके कानो में सोनू क वो सब्द एक बार फिर से गूंज पड़ते है

"आआआआह्ह्ह्ह.. न जाने वो दिन कब आएगा जब मैं अपने हाथों से आपके कपडे उतरूंगा और आपको नंगी करने आपसे असली प्रेम करूँगा…"

सोनू क द्वारा कहा एक एक सब्द एक पल क लिए सविता को अपने मुख से निकलता हुआ महसूस होता है.. और न जाने क्यू वो आज हर्षिता को कुछ अलग तरह से देखने पे मजबूर हो रही थी

पानी की वो छोटी सी धार कभी कभी अपनी दिशा बदल लेती और 'वीरू की पत्नी' क मुख में प्रवेश की जगह वो जब होंठों से टकराती तोह पानी की तरल लहर अपना मार्ग बदल लेती और उसके होंठों क पास से बहते हुए हल्का सा उसके चेहरे से बह कर उसके गले क बीच की गहराई की और आगे बाद जाती..

सविता तोह एक पल क लिए बस हर्षिता को ऐसे निहारती hi रही और न जाने क्यू उसकी योनि में एक अजीब सी लहर हिलोरे खाने लगी थी, जबकि वो खुद hi एक स्त्री थी

हर्षिता क खुले हुए खूबसूरत और कामुकता से परिपूर्ण लाल होंठ और उसके सावले गले की वो नक्काशी.. पूरी तरह सविता को उसके यौवन और उसकी खूबसूरती क बहुपस में भरने का कार्य करने लगे थे, वही जो कमी बच रही थी वो उसकी उठी और तानी हुई चूचियों क हिलने का अंदाज़ पूर्ण कर दे रही थी

पर सोनू की माँ इस बात से अभी तक अनभिग थी की उसके योवन को उसकी जेठानी इस अजीब सी नज़रों से निहारे जा रही थी.. वही देवरानी जिससे कुछ दिएर पहले उसने खुद hi मज़ाक में कहा था की..

'आप तोह न मर्द देखो न औरत..'

ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे मोनू क उस कमरे में जलती उस अंगीठी की समूची आग सविता अपने अंदर भर क ले आयी हो, तभी तोह उसकी नज़रों को कुछ अलग सा दिख रहा था.. वैसे इसमें असली भागीदारी तोह खुद हर्षिता का बीटा hi है

सविता बस एकटुक हर्षिता को पानी पीते हुए देखती रहती है जब तक हर्षिता वो गिलास वापस उसकी जगह पे रख नहीं देती और जैसे hi वो पलटती है उसे अपने सामने सविता नज़र आती है.. यु अचानक अपनी बड़की भौजाई को देख क एक पल क लिए तोह हर्षिता बुरी तरह दर hi जाती है

"Areeeeeeeeeee.. Maaaaaaaaaaaaaaa… किया बड़की भौजाई ऐसे कोण आके खड़ा होता है, डरा hi दिया आपने

और आप तोह पूरी भीगी पड़ी है, कपडे पहने पहने hi नहाने चली गयी थी किया.. ?"

सविता अब भी हर्षिता क गले से बहते हुए पानी की कुछ नन्ही नन्ही बूंदों को देख रही थी जो 'सोनू की माँ' की कासी चूचियों की गहरी घाटी की और बाद रही थी, पर वो इस नयी खुमारी को अपने ऊपर हावी नहीं होने देती और मुस्कुरा क कहती है

"मुझसे किया डरना.. मैं कोनसा तुझे खा जाउंगी.."

सविता जब ये कह रही थी तोह अनायास hi उसकी नज़रें हर्षिता क कैसे ब्लाउज में तानी हुई उसकी चूचियों पे जैम सी गयी थी, जिसे खुद हर्षिता ने भी महसूस किया था और उसके चलते उसे एक नए एहसास की अनुभूति होती है.. उसे एक पल क लिए ऐसा लगा जैसे उसकी साँसे भरी होने लगी हो पर वो खुद को सँभालते हुए जल्दी से कहती है

"आपका किया भरोषा.. आपकी नज़र किसी पे अटक गयी तोह किया पता खा hi जाओ"

हर्षिता मुस्कुराते हुए आँख मरते हुए अपने बात कहती है

जिसपे सविता भी इस नए एहसास पे काबू जमाते हुए मुस्कुरा पड़ती है और ठीक पहले जैसे अठखेलियां सी करते हुए मुस्कुरा क कहती है

"बाकियों का नहीं पता.. पर तू मौका दे तोह तुझे जरूर खाना चाहूंगी.."

सविता की इस बात में मज़ाक से ज्यादा कुछ और hi था.. ककी ये पहली बार था जब उसकी किसी बात पे हर्षिता जैसी गाओं की देसी औरत तुरंत कोई जवाब नहीं दे पायी थी उल्टा 'सोनू की माँ' को पहली बार अपनी बड़की भौंए की आँखों में देखने में भी परेशनी हो रही थी.. सायद इसका कारन भी सोनू का वो फैन उठाये हुआ नाग hi था जिसे उसने थोड़ी दिएर पहले hi अपने बेटे क सोते समय देखा था

हर्षिता- (जल्दी से खुद पे काबू जमाते हुए) किया भौजाई आप न सुधरने वाली.. और ये ऐसे किया कड़ी है जेक कपडे बदल लीजिये न, पूरी भीगी हुई है.. इतना कैसे भीग गयी ?

सविता मुस्कुराते हुए मन hi मन कहती है

'अब तुझे kiya-kiya बताऊ.. की कैसे भीग गयी.. और कहा किया देखते हुए भीगी हु मैं'

हर्षिता इशारे से पूछती है की कहा खो गयी तोह सविता बस मुस्कुरा क 'न' में सर हिला देती है

सविता अपनी देवरानी की बातों पे मुस्कुरा रही थी, पर जाने क्यू बार बार उसकी नज़रें हर्षिता की उन्नत चूचियों की और hi भाग रही थी.. और रह रह क उसके कानो में सोनू क सब्द गूंज रहे थे... वैसे सविता पूरी कोशिश कर रही थी की ऐसा न हो पर उसकी नज़रें उसके काबू से बहार होती जा रही थी

हर्षिता को भी कुछ अजीब सा महसूस होने लगा था जिसे वो खुद भी समझ नहीं प् रही थी, उसके मन में एक hi बात आ रही थी

'ये बड़की भौजाई मुझे ऐसे क्यू घर रही है.. जैसे मुझे सच में खा जाएँगी…'

हर्षिता जल्दी से अपना सर को झटक देती है और अपनी चिरपरिच्छित मुस्कान क साथ कहती है

"चलो तोह मैं चलती हु.. शीला इन्तिज़ार कर रही होगी"

हर्षिता अपनी बात कहते हुए एक बार फिर से सविता की और देखती है जो अब भी एकटुक उसके हलके गिरे हुए ब्लाउज को hi घर रही थी, जहा पानी बहके आने क कारन एक बड़ा सा गीला धब्बा सा बन गया था.. आज सविता की नज़रें उसे अजीब सी उलझन में दाल रही थी, इन नज़रों में कुछ अलग था

हर्षिता जल्दी से खूब को सँभालते हुए अपने गिर चुके पल्लू को ऐसे संभालती है मानो जैसे आज उसकी इज्जत को खुद एक नारी से खतरा हो.. पर ये ेशास कुछ तोह नया था और कुछ अलग सा..

हर्षा जल्दी hi रसोई क बहार चल पड़ती है पर जैसे hi रसोई क बहार पहला कदम रखती है सविता का स्वर उसके कानो में पड़ता है

"ाचा सुन न.."

हर्षिता आवाज़ की दिशा में घूमती है और सविता की और देखते हुए अपना सर हिला क मानो पूछती है.. किया हुआ ?

सविता- (अपने अंदर आने वाले इस नए एहसास को दबाते हुए) वो जा पहले सबको अपना दूध.. मेरा मतलब दूध दे आ

सविता की नज़रें एक बार फिर से ये कहते हुए हर्षिता क कैसे यौवन पे अटक सी गयी थी, पर वो पूरी कोशिश कर रही थी की बार बार ऐसा न हो

हर्षजता- (जैसे वो अब भी पूरी बात समझ न पायी हो) मैं समझी नहीं.. दूध.. ?

सविता- (जल्दी से पूरी बात समझने की कोषसिंह करते हुए) अरे वो.. मौसम देख hi रही है कैसा है, ऐसे में हल्दी वाला दूध सबके लिए ाचा रहेगा

हर्षिता को भी सविता की बात सही लगती है और अगले कुछ पलों बाद हर्षिता सविता क बगल कड़ी थी और सामने चूल्हे पे दूध गरम हो रहा था.. पर सविता की गर्मी उसे कुछ नए रस्ते की और मोड़ रही थी वो बार बार चोर नज़रों से हर्षिता को घर रही थी जिसे हर्षिता भी भांप गयी थी

"किया हुआ भौजाई.. कुछ बात है ?"

सविता- (ऐसे सकपका सी जाती है मानो जैसे उसकी चोरी पकड़ ली गयी हो) अरे.. वो.. मैं.. कुछ.. कुछ नहीं

सविता इतना कहते हुए दूध क लिए गिलास ज़माने लगती है, पर उसके हाथ एक पल क लिए रुक से जाते है और वो मुस्कुराते हुए हर्षिता की और घूमती है और ेक्टम उसे देखते हुए कहती है

"तू तोह बड़ी खूबसूरत है.."

हर्षिता क लिए ये कुछ अलग था, मर्दो से तारीफ तोह वो जवान होते hi सुनने लगी थी.. पर एक नारी होक एक दूसरी नारी से उसे ऐसे कुछ पहली बार सुनने को मिल रहा था, उसे समझ नहीं आता की वो इसका किया जवाब दे

आज इस वर्षा ऋतू ने मानो कुछ बदल सा दिया था.. हमेशा पियर भरी nauk-jhauk करने वाली सविता और हर्षिता अगल बगल कड़ी थी पर कुछ अजीब सा खिचाव था जिसके चलते वो दोनों hi शांत थी

जल्दी hi हर्षिता दूध क गिलास एक ट्रे में जमा क रसोई क बहार जाते हुए कहती है

"वो.. मोनू क लिए दूध.. ?"

सविता जैसे नींद से जाएगी हो

"है.. वो.. उसे दूहड में खुद पिलाऊंगी.. मेरा मतलब में दे आउंगी.. तू जा बहार दे आ सबको"

और फिर किया था हर्षिता दूध लेके बहार छप्पर क नीचे विराजमान सभी क पास चल पड़ती है और फिर वह दूध देते समय किया किया हुआ था ये तोह आप पद hi चुके है..

आशा है अब काफी कुछ साफ़ हो गया होगा.. की कोनसा दृश्य कहा पे बैठ रहा है 🙏

इधर यहाँ हर्षिता क जाते hi सविता अपने दोनों हाथों को रसोई की सेल्फ पे जमा क लम्बी सी सांस भरते हुए खुद से कहती है

"Ufffffffffffff…. आज किया हो गया है मुझे.. ऐसा तोह था नहीं की मैंने पहली बार हर्षिता को देखा हो.. पर फिर आज मुझे…"

सविता एक पल क लिए रूकती है और फिर आगे बोलती है

"लगता है सोनू की उन बातों और मोनू क उन शब्दों क असर है.. इसका कुछ तोह करना पड़ेगा वर्ण..."

तभी सविता का हाथ धीरे से हरकत में आता है

"किया करू.. ये दोनों लड़के मुझे पागल कर देंगे...

Essssssssssssssssssssssssshhhhh"

खुद से बात करती हुई सविता क मुख से निकली इस सिसकारी का कारन वो खुद hi थी, ककी उसका एक हाथ उसकी अपनी hi एक बड़ी सी चुकी पे चला गया था जिसे वो बिना विलम्ब क खुद hi मसल देती है

"Aaaaaaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhh… Monnnnnnnnnnnnnnuuuuuuuuuu… बदमाश ने न जाने कोनसा जादू कर दिया है…

हीी... और किया सोनू सच में इतना बड़ा हो गया है ?... आआह्ह्ह्ह...

इन दोनों क कारन hi मेरा ये हाल हो रहा है की..

हर्षिता जो खुद एक स्त्री है.. उसे देख क उसके साथ चिपकने का मन करने लगा मेरा… ufffffffffff… हैई.. कैसी आग जला दी दोनों ने... Ufffffffffffff....."

सविता की हरकतों और उसकी बातों से ये तोह साफ़ था की उसके अंदर की ज्वाला उसपे हाफी होने लगी है.. जिसे जल्दी से उसे बहुजन पड़ेगा, वर्ण अभी तोह बस हर्षिता से अपनी नज़रों को हटा नहीं प् रही है.. इसके बाद आगे न जाने किया होगा ?

सविता अपनी बड़ी सी चुकी पे अपने हाथ का दबाव बढ़ाते हुए अपनी आँखों को बंद करती चली जाती है.. पर उसके अपने हाथों में वो जादू कहा जो एक मर्द की उँगलियों में होता है

"Aaaaaaaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhh…

Badmasssssssssssssshhhhhhhh… मोनू……. किया कर दिया है तूने ये…. ले देख तेरी बड़ी माँ तेरे लिए अपना दूध गरम कर रही है.. तुझे असली ताक़त चाहिए न.. तोह आज पि लेना... आआअह्ह्ह्ह

Essssssssssssssshhhhhhhhhh… Aaaaaaaaaahhhh… कहा है मोनू… aaahhhhhhhhhhhhhhhhh… तेरी बड़ी माँ तैयार है तुझे दूध पिलाने क लिए.. Aaaaaaaaaaaaaaaahhhhhhh"

सविता क हाथ उसकी hi चुकी पे जोरो से चलने लगे थे.. वही उसका दूसरा हाथ उसके पैरों क मध्य पहुंच चूका था जहा Monu-Sonu क कारन आये गीलेपन क कारन वो स्थल पहले से hi ज्वालामुखी क मुहाने जैसा गरम था और अब तोह वह का मर्दन सुरु हो चूका था

"Aaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhhh… कैसी आग भड़का दी है तुम दोनों बच्चों ने.. उफ्फफ्फ्फ़... लगता है मेरे अंदर छुपी रैंड बहार आने क लिए मरी जा रही हो... आह्ह्हह्ह्ह्ह..."

तभी आसमान में चमकने वाली वो बिजली अपनी आवाज़ क साथ सविता क कान में मानो कुछ कहती है

"आआह्ह्ह्हह... तैयार हो जा मोनू... तेरी बड़ी माँ... तेरी रखेल बनने आ रही है... उफ्फ्फफ्फ्फ़... आआआह्ह्ह्हह्ह"

सविता की साँसे इस समय इतनी गरम हो चुकी थी, जैसे उसके अंदर की ज्वाला उसकी साँसों क रस्ते बहार आ रही हो…

"तुम दोनों बच्चों ने जो आग लगाई है.. अब ऐसे बहुजन hi होगा

पर आज उसके लिए मुझे बड़ी माँ नहीं.. एक रैंड बनना होगा.. ककी इस समय मेरे अंदर जो आग धधक रही है वो एक संस्कारी नारी वाली नहीं.. अपितु एक चिनार वाली है..

और इससे भुजने क लिए मुझे भी आज एक चिनार.. एक रैंड… एक कुटिया बनना होगा… और मैं बाउंगी.. मोनू तेरी रखेल...."

सविता ने एक बार फिर से खुद hi अपनी योनि को इतनी जोर से दबा दिया था की उसकी अपनी hi आअह्ह्ह्ह फुट पड़ी थी, एक औरत हवस क चलते किया कुछ कर सकती है.. आज सविता खुद उसका शक्श बन रही थी

"Aaaaaaaaaahhhhhhh… मोनू मैं aaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhh.. रही हु…….

तेरी चिनार आ रही है बीटा… तैयार हो जा अपनी रैंड की गर्मी निकलने क लिए………. आआह्ह्ह्ह

इस कामिनी बारिश ने आज मुझे रैंड बना hi दिया.. आआह्ह्ह्ह"

सविता अपनी कामुकता का दोषी बेचारी गीली बारिश की बूंदों को ठहरा रही थी

पर आज उसे देख क ऐसा लग रहा था जैसे ये hi असली सविता है.. जो सायद कही छुपी हुई थी और आज उभर आयी हो

हवस.. ये हवस का झाड़ू था 🔥

सविता से अब और रुका नहीं जाता.. इसलिए बिना अतिरिक्त समय नस्ट किये तुरंत hi रसोईघर क बहार निकल पड़ती है, और आँगन में बिछी हुई ईटों पे सावधानी से चलते हुए उसकी चूचिया कुछ ज्यादा hi हिल रही थी, मानो उन्हें पता हो की वो जल्दी hi आज़ाद होने वाली है.. मोनू क कमरे क प्रवेश द्वार पे पहुंचते hi सविता एक बार इधर उधर देखती है और बिना किसी विलम्ब क अंदर प्रवेश कर जाट है

जहा पहला कदम रखते hi उसके कानो में मोनू का वो धीमा सा स्वर पड़ता है

"आआआहहहहह.. बड़ी माँ… मुझे आपका दूध पीना है.."

सविता आवाज़ की दिशा में देखती है तोह उसके अधरों पे मुस्कान अब और ज्यादा गहरी हो जाती है और वो धीरे से कमरे का दरवाजा अंदर से बंद कर देती है.. सिटकनी चढ़ाते हुए हल्का सा शोर जरूर होता है पर मोनू तोह अपनी बड़ी माँ क सपनो में इस कदर खोया हुआ था की उसे पता hi नहीं चलता की उसके सपनो को सच करने क लिए सविता खुद वह आ चुकी है

पर सविता ने ये भी तय कर लिया था की आज सब कुछ वही करेगी.. ककी मोनू इतने समय से बीमार था इसलिए उससे ज्यादा म्हणत नहीं करवा सकती थी वो, और ऐसी कारणवस उसने खुद को मोनू की रखेल बनाने का रास्ता चुना था

उम्मीद है अब आप सब कुछ समझ चुके होंगे की क्यू हमारी भरी भरकम जिस्म वाली गदराई सविता खुद को मोनू की रैंड.. रखेल बनाने पे उतारू है, और यहाँ तक वो कैसे आयी और उसकी ऐसी आग का कारन किया था

यहाँ तक लाने क लिए इतने दिनों से जो परिस्थितियां रची और आपने इतना साथ दिया, अब उसका परिणाम आने वाला है



✨ कंटिन्यू... 👇 ✨
 
"तोह बोल.. बनाएगा न मुझे अपनी रैंड.. छोड़ेगा आज अपनी इस चिनार को…"

सविता क ये सब्द एक बार फिर मोनू क कानो में पड़ते है, वही मोनू जिसने आज तक अपनी 'बड़ी माँ' को सिर्फ सम्मान दिया था

उसके लिए ये नयी राह आसान नहीं थी.. वो सत्यम जैसा नहीं है, उसके मन में कोई गंदगी नहीं है पर प्रेम है.. हवस है.. पर ये हवस भी प्रेम रूपी है

मोनू अपनी उलझन से बहार आने की कोशिश करते हुए अब भी उसी प्रकार बिस्तर पे लेता हुआ था, ककी उसे उसकी बड़ी माँ क आदेश मिला था.. ऐसा हु main(Monu)

"बड़ी माँ… मैं आपको ये सब कैसे.. बोल सकता हु… मतलब मैं.. आपको.."

सविता अपनी साड़ी को दोनों हाथों से पकड़ती है, और इस बार भी उसने अपनी साड़ी क साथ साथ अपने पेटीकोट को भी पकड़ रखा था और धीरे धीरे उसे ऊपर सरकने लगती है.. पर उसकी आँखें पूरी तरह मोनू की आँखों से मिली हुई थी

सविता मोनू की आँखों में भर्ती अपने लिए हवस को देखते हुए तब तक अपनी साड़ी और पेटीकोट को ऊपर की और सरकती रहती है जब तक उसकी गीली बालों से भरी योनि उसक कमरे में जलती अंगीठी की लाल रौशनी में चमकना सुरु नहीं हो जाती, और फिर सविता आगे कहती है

"आज मेरे अंदर जो आग जल रही है ऐसे कोई प्रेमी, भतीजा या बीटा नहीं भुजा सकता.. है पति जरूर ऐसे शांत कर सकता है.."

मोनू अब भी उसी प्रकार रज़ाई में लेते हुए अपने उछलते लुंड क साथ अपनी बड़ी माँ की बात को समझने की पूरी कोषसिंह कर रहा था.. सविता आगे बोलती है

"पर अभी मेरा मन पति से ये आग भुजवाने का नहीं है, तोह बस एक hi रास्ता बचा…."

मोनू एकटुक अपनी बड़ी माँ की और ऐसे देखता है जैसे वो उत्तर जानने का उत्सुक्त हो

सविता खुद hi अपनी साड़ी को उठाये हुए अपने एक पेअर को उठा क बिस्तर पे रख देती है.. जिससे उसकी योनि पूरी तरह खुल जाती है और उसकी गीली योनि में एक चिपचिपी लार जैसी नज़र आती है जिसे देख क मोनू का खून मानो उसके लुंड में आके जमना सुरु हो जाता है

"ये आग मुझे तुझसे भुजवानी है.. पर 'पति' तुझे बना नहीं सकती, इसलिए तुझे आज मुझे अपनी रखेल बनाना होगा..

बोल बनाएगा न"

मोनू तोह जैसे एकटुक बस अपनी बड़ी माँ का एक एक सब्द ऐसे सुन रहा था जैसे मन्त्रमुघ्द सा हो गया हो.. पर कुछ तोह बात थी सविता क कामुक शब्दों में जिससे मोनू का सर खुद hi 'है' में हिलता चला जाता है

जिसे देख क सविता क चेहरे पे ऐसी कामुकता भरी ख़ुशी नज़र आने लगती है, जिसका विवरण करना मेरे लिए भी संभव नहीं है

"यानि बनाएगा.. अपनी बड़ी माँ को अपनी रखेल… खुल क बोल बीटा.. किया बनाएगा मुझे ?"

एक तरह एक जवान लड़का अपनी चची को अपनी रखेल बनाने क लिए सडयंत्र और उसकी कामुकता की कमजोरी को हतियार बना रहा है.. और यहाँ खुद उसकी माँ अपने भतीजे की रखेल बनने क लिए सामने से उसे आदेश या आग्रह कर रही है.. यही तोह है किस्मत का खेल 🎡

"आपको अपनी रखेल बनाऊंगा.. अपनी राण……"

मोनू आगे क सब्द नहीं बोल पाटा तोह सविता खुद hi मुस्कुरा क बोल देती है

"बोल.. रैंड बनाऊंगा… बोल बीटा"

मोनू- (अपने सुख चुकी गले को गीला करते हुए) आपको.. आपको अपनी.. अपनी रैंड.. बनाऊंगा.. अपनी रखेल बनाऊंगा… अपनी.. अपनी चिनार बना क.. को…

सविता- (अपने दिल की तेज़ होती धड़कन को सँभालते हुए) है.. है बोल बीटा.. बोल

"अपनी रखेल बना क छोडूंगा… आज आपको.."

मोनू क ये सब्द सविता क कानो में मानो मधुर संगीत जैसे पड़ते है, और वो मुस्कुरा क कहती है

"आप बस तू देख.. कैसे तेरी ये रखेल आज तुझे जीवन का असली मतलब समझती है, तू बस लेता रह.. बाकि सब तेरी ये रखेल खुद करेगा आज"

मोनू तोह बेचारा बस मुश्किल से hi 'है' में अपना सर हिला पाया था

सविता क लिए मोनू का है में हिलने वाला सर आज उसके लिए एक आदेश जैसा था, जिसके बाद वो और नहीं रूकती और अपने पेअर को वापस से नीचे करती है पर अगले hi पल उसके जिस्म पे झूलती उसकी साड़ी उसके hi हाथों से अलग होने लगती है.. जहा पहले साड़ी उसके कामुक और भीगे बदन का साथ चोरटी है पर इस पुरे कार्य क दौरान सविता अपने भतीजे.. या अपने मालिक की आँखों में देखना नहीं चोरटी

"बस बीटा.. थोड़ी दिएर और, तेरी ये रैंड आज तुझे असली मज़ा देगी"

सविता इतना कहते हुए मुस्कुरा पड़ती है, और फिर अपने सरीर पे बचे एकलौते अपने पेटीकोट का नारा खोलते हुए हाथों में कामुकता क चलते दिखने वाली वो कम्पन उस नज़ारे को इतना खूबसूरत बना रही थी की किया hi कहु.. पर mujhe(Monu) को ज्यादा प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती ककी जल्दी hi वो पेटीकोट भी 'सत्यम की माँ' क सरीर का साथ चोरते हुए उन्हें पूर्ण नीवस्थ कर देता है

अब मोनू की बड़ी माँ.. या यु लिखी की उसकी रखेल पूर्ण नंगी हालत में कड़ी थी, सविता खुद hi अपने दोनों हाथों को हवा में उठाये हुए धीरे से घूम जाती है और फिर वापस से मोनू की आँखों में देखते हुए मुस्कुरा क कहती है

"कैसे लगी ये 'देसी रखेल'.."

मोनू- (अपने लुंड को फटने से रोकने की कोशिश करते हुए) बहुत खूबसूरत.. और उससे ज्यादा गरम

सविता क अधरों पे अपनी तारीफ क चलते एक मुस्कान सी खिल उठती है, पर साथ hi साथ उसकी आँखों में हवस क साथ साथ एक प्रेम भाव भी था.. जो ऐसे मोके पे नज़र आना इतना आसान नहीं होता

पूरी तरह नंगी हालत में.. खूबसूरत गेहुआ रंग की भरी भरकम गढरै हुई किसी भैंस जैसी कामुक सविता मुस्कुराते हुए आगे बढ़ती है और ठीक मोनू क पैरों पे पड़ी अपनी ब्रा उठा क पहले उसे नीचे फैक देती है और फिर दोनों हाथों से उसकी रज़ाई खींचते हुए उसे भी नीचे फैक देती है.. और ऐसी क साथ मोनू क लोअर से बहार लहराता हुआ उसका मोटा लुंड सत्यम की माँ की आँखों क सामने था जिसे देखते hi सविता की योनि ख़ुशी का एक आंसू टपका देती है

पर सविता अब कहा रुकने वाली थी, इसलिए वो पहले से hi नीचे खिसके हुए लोअर क दोनों हिस्सों को पकड़ती है और जोर लगा क उसे खींच लेती है.. मोनू भी इस्तिथि को समझते हुए जल्दी से अपनी गांड उठा क अपनी बड़ी माँ का कार्य आसान कर देता है, और कुछ पलों बाद उसका लोअर भी वही जमीन पे उसकी बड़ी माँ.. या उसकी रखेल क पेटीकोट क ऊपर पड़ा हुआ था

बाकि ऊपर से तोह मोनू पहले hi निवस्त्र था, मोनू ने कुछ दिएर पहले खुद hi अपने t-shirt उतर दी थी और अपने लोअर को नीचे सरका क अपनी बड़ी माँ की बड़ी बड़ी चूचियों को याद करते हुए अपने लुंड से खेलते हुए जो सपना देख रहा था.. वो आज इतनी जल्दी पूरा होने वाला था

महेंद्र क घर में.. उस कमरे में इस समय उसकी पत्नी और उसका बेटे सामान भतीजा अब पूर्ण नंगी अवस्था में उपस्थित थे, इस बात से अनभिग की यहाँ अंदर कोनसा खेल सुरु होने जा रहा है

बारिश की रफ़्तार लगातार बढ़ती जा रही थी, आँगन में भर चुके पानी पे गिरती हुई तेज़ वर्षा का शोर इतना अधिक था की उसके आगे कुछ और सुनाई पड़ना भी संभव नहीं लग रहा था.. उसपे सविता और मोनू क शब्दों में इतनी तेज़ी भी नहीं थी की उनका स्वर कमरे से बहार भी जा सकता

सविता पुरे धियान और अपनी हवस से भरी हुई नज़रों से कुंदन क बेटे का मोटा तना हुआ लुंड निहार रही थी.. मानो जैसे उसकी नज़रें वही जैम सी गयी हो

वही मोनू खुद हैरान था की जबसे उसे होश आया है तबसे उसके लुंड की ताक़त उसे पहले से ज्यादा क्यू लग रही है.. उसकी शक्ति पहले से दूंगी प्रतीत होने लगी है, पर वो ये सब बस अपना वहां मान क चोर देता था

सविता देखती है की कैसे उसका जवान भतीजा पूरी तरह नंगी अवस्था मैं उस बिस्तर पर लेता हुआ है, और कैसे उसका लुंड पूरी तरह आसमान को चुनौती दे रहा है.. सविता क मन में खुद ये बात आती है की ये पहले से ज्यादा मजबूत प्रतीत हो रहा है, और अगर आपके मन में ये सवाल आ रहा है की इससे पहले सविता ने इस लुंड को कब और कहा देखा है तोह यही कहूंगा कृपया मित्र कहानी एक बार सुरु से पड़े 🙏

सविता पूर्ण नंगी अवस्था में किसी मादक और कामुकता की बारिश में भीगी हुई देसी गदराई भैंस सामान मोनू क लुंड को इतने गौर से देखती है मानो अपनी नज़रों की तपिस से hi उसके लुंड से गाड़ा वीर्य निकल लेगी.. वही ऐसी कामुक हालत में भी जहा मौ का लुंड किसी ज्वालामुखी सामान पहात जाना च रहा था वो खुद पे पूरी तरह काबू बनाये हुए अपने लुंड को पियासी नज़रों से ताड़ती हुई अपनी बड़ी माँ क नंगे और भीगे कामुक सरीर को ऐसे देखे जा रहा था मानो उसका बस चले तोह टूट hi पड़े उस कामुकता की देवी क सरीर पे और उसकी कामुकता का एक एक ाँस चूस क पि जाये

सविता जितना ज्यादा अपने जवान भतीजे क लुंड को निहार रही थी उतना hi उसकी हवस की आग में घी पड़ने वाला कार्य हो रहा था.. जिसका एक परिणाम उसकी योनि से कॉमर्स की बहती हुई लकीर थी जो उसकी योनि को चोर क उसकी जाँघों की और बाद रही थी, वैसे इसमें उसकी गलती भी नहीं जब आप एक गदराई गरम भैंस जैसी कामुक औरत हो और आपके सामने एक जवान हुआ लड़का ऐसे पूर्ण नंगी अवस्था में अपना लुंड तने हुए लेता हो तोह आपकी योनि का ऐसा हाल होना पूरी तरह स्वाभाविक है

मोनू- (अंततः अपने शब्दों को आज़ाद कर hi देता है) किया हुआ बड़ी माँ.. मेरा मतलब..

मोनू फिर से आगे क शब्दों को बोलने से कतराने लगता है, जिसपे सविता मुस्कुरा क अपनी योनि क काले बालों पे उंगलिया फिरते हुए कहती है

"खुल क बोल बीटा.. कोण हु मैं.. या तोह बोल वर्ण मैं जा रही हु ?"

सविता ने मोनू क लिए और कोई रास्ता hi नहीं छोरा था, इसलिए मोनू अपने लुंड क हिलोरे को सँभालते हुए कहता है

"आगे बड़ो.. मेरी कामुक Rakhel..meri पियासी.. पियासी रैंड"

मोनू ने पूरी हिम्मत क साथ ये सब्द बोले थे, जिन्हे सुनकर सविता की कड़ी चूचियों क तने निप्पल्स में और तनाव भर गया था.. वो धीरे से अपनी योनि पे ुघे काले बालों को चीरते हुए उसके पीछे छुपी गुलाबी योनि की फाकों को फैलते हुए अपनी एक ऊँगली अंदर प्रवेश करवा देती है जिसके चलते उसके चेहरे पे उभरने वाले कामुक निशान उसके पुरे सरीर में एक नयी लहर भर देती है

"Aaaaaaaaaaaahhhhhhh.. ऐसे hi बोलै कर मेरे लाल.. अबसे में तेरे लिए एक चिनार… एक रैंड.. एक कुटिया… तेरे लुंड की भुकी तेरी रखेल हु.. हु न.. बीटा"

मोनू, सविता क मुंह से ऐसे शब्दों को सुनकर मानो ख़ुशी से झूम hi उठा था, जिसका असर उसके लुंड क मोठे गुलाबी टोपे पे नज़र आती वो कामुक बून्द थी जो सिर्फ सविता क शब्दों से hi उभर आयी थी

पर तभी मोनू क मन में एक प्रश्न आता है, जो कही न कही हम सभी क मन में भी चल रहा होगा

"यहाँ कोई आ गया तोह.. ?"

सविता जिसकी एक ऊँगली अब भी उसकी योनि की गहराई में घुसी हुई थी और उसका सरीर किसी इंद्रधनुष की तरह अकड़का हुआ था.. वो मोनू की बात सुनते हुए मुस्कुरा क अपनी कामुक और नशीली आँखों से हवस रूपी प्रेम की वर्षा करते हुए कहती है

"तुझे चोर क सभी मर्द बहार बैठे है.. और हर्षिता उन्हें दूध देने गयी है, बाकि शीला तोह पीछे वाला सालों से बंद कमरा साफ़ करने में लगी है

इसलिए हमे कोई दर नहीं.. और अगर किसी ने हमे परेशां भी किया तोह बोल दूंगी मैं.."

सविता एक पल क लिए रूकती है और मुस्कुरा क आँख मरते हुए कहती है

"हम दोनों को किसी का भी कोई विघ्न नहीं चाहिए.. ककी आज मोनू अपनी इस रखेल को बेहरहमी से छोड़ने वाला है.. है ना.."

सविता क है न कहने पे मोनू बड़ी मुश्किल से अपना थूक गटकते हुए अपना सर है में हिला प् रहा था.. अब सामने सविता जैसे यौवन हो तोह ऐसी हालत होना कोई बड़ी बात नहीं

मोनू से अब रहा नहीं जाता तोह वो उठने का जातां करता है.. पर उसके उठ पाने से पहले hi सविता क सब्द उसे रोक देते है

"न न….. बस लेता रह.. आज जो करना है मैं करुँगी.. तू बस अपनी इस रखेल का भोग लगा.. बाकि सब अपनी इस गदराई चिनार पे चोर दे.."

सविता ये कहते हुए मुस्कुरा पड़ती है, पर कही न कही एक शर्म की हलकी सी चादर उसके चेहरे को गुलाबी करती चली जाती है

मोनू खुद को उठाने से रोक तोह लेता है पर अब उससे और ज्यादा काबू नहीं हो रहा था तोह उसका एक हाथ उसके लुंड की और बाद चलता है पर सविता एक बार फिर से उसे रोक देती है

"अपने हाथों को काबू रख बीटा.. आज जो करेगी तेरी ये चिनार करेगी.. तुझे बस मेरी छूट का भरता बनाने का काम करना है"

सामने सविता जैसी गदराई माल कड़ी हो और एक जवान लड़का अपना लुंड भी न पकड़ पाए तोह आप समझ hi सकते है ये उसके लिए किसी सजा से काम नहीं है.. पर मोनू जैसे तैसे खुद पे काबू बनाये हुए अपनी बड़ी माँ की बड़ी बड़ी चूचियों को निहारते हुए उसकी बात का पूरा पालन करता है

सविता अब घूमते हुए मोनू क सिरहाने की और आगे बढ़ती है और ठीक उसके चेहरे क पास पहुंच क अपना चेहरा उसके ऊपर झुकाने लगती है.. जिसपे मोनू तुरंत अपना हाथ आगे बड़ा क अपनी बड़ी माँ का गेहुआ चेहरा थमने की पूरी चैस्ता करता है, पर समय रहते सविता मुस्कुराते हुए हल्का सा पीछे हो जाती है और मोनू की हवस क डोरो से लाल आँखों में देखते हुए कहती है

"न न… तू मुझे हाथ नहीं लगाएगा.. तू कुछ भी नहीं करेगा, सब कुछ आज तेरी ये रखेल hi करेगी.. समझा"

मोनू मुश्किल से अपने हाथों को दूर कर प् रहा था, पर सविता एक बार फिर से उसके होंठों क ऊपर झुकती चली जाती है, यानि अब हमारी गदराई कामुक सविता मुस्कुराते हुए अपने जवान भतीजे पे अपने हुस्न की ज्वाला और उसकी तपिस निछावर करते हुए खुद hi पूरी तरह झुक जाती है, जिससे उसकी बड़ी बड़ी भरी चूचियों की गहरी घाटी का नज़ारा पूरी तरह मोनू को नज़र आना सुरु हो चूका था

पर सविता इसके आगे बढ़ती है और अपने गीले लाल होंठों को मालती क जवान बेटे क कोमल होंठों पे रख देती है.. जहा कुंदन का बीटा भी इस मोके का प्रयोग करने से जरा भी पीछे नहीं रहता और तुरंत hi अपने 'बड़े ताऊजी' की पत्नी क खूबसूरत होंठों को चूसना सुरु कर दिया

"उम्मम्मम्मम...... Ummmmmmmmmmm.... Ummmmmmmmmm.... Ummmmmmmmmmmmmm... सललललररररररपपपप.... उम्मम्मम्मम"

जवानी की उमंग से भरा हुआ मोनू, अपनी बड़ी माँ क होंठों को ऐसे चूस रहा था मानो आज की इस ठण्ड को भागने क लिए उसकी बड़ी माँ क होंठों की गर्मी hi एकलौता रास्ता है.. वही सविता जैसी गदराई औरत क होंठों का रास चूसने क कारन मोनू क अंदर एक जानवर का भी जन्म होने लगा था, ककी वो इतनी बेहरहमी से अपनी बड़ी माँ क होंठों का रास निचोड़ने लगता है की सविता जैसी भरी भरकम जिस्म वाली औरत तक को सांस लेने मैं परेशानी होने लगती है.. पर मोनू चोरता नहीं और न सविता अलग होती है

"उम्मम्मम्मम... Ummmmmmmmmmmm.... Ummmmmmmmmm"

मोनू पूरा दम लगा क सत्यम की माँ क होंठों का रास निचोड़ रहा था, वही सत्तू की माँ भी पीछे नहीं रह रही थी.. अपने जवान भतीजे को अपनी गदराई जवानी की चासनी का पूरा आनंद दे रही थी

पर आज मोनू की गर्मी कुछ ज्यादा hi थी, ककी सविता उसके ऊपर झुकी हुई थी जिस कारन उसकी बड़ी बड़ी नंगी चटिया पूरी तरह मोनू क मजबूत जवान सीने को चुम रही थी.. मानो उसके तने निप्पल्स मोनू क सीने में छेद करने पे उतारू हो, और इसलिए बेचारा जवान लड़का उन बड़ी बड़ी चूचियों को अपने हाथों से दबोचने से खुद को रोक नहीं पाटा

पर जैसे hi महेंद्र की पत्नी को एहसास होता है की उसके यौवन को जकड़ा जा रहा था तोह टपक से हफ्ते हुए जवान मोनू से अलग हो जाती है

"बदमाश कहा था न.. हाथ न लगाना.. आज सब कुछ तेरी ये रैंड सविता करेगी समझा.."

मोनू कामुकता से पूरी तरह गरम हुआ पड़ा था, जिसका परिणाम उसके लाल सुपडे पे चमकी कामुकता की बून्द थी, जिसपे सविता की भी नज़र पद चुकी थी.. इसलिए वो मुस्कुरा क एक बार फिर से अपने जवान भतीजे क पास जाती है और उसके ऊपर झुकते हुए अपने होंठों को एक बार फिर से उसके तपते हुए होंठों से मिल देती है, पर इस बार मोनू अपना काबू बनाये नहीं रख पाटा और अपने एक हाथ से सविता का सर दबोच सा लेता है और उन्हें कसके अपने होंठों क ऊपर दबाके अपनी खुरदुरी जीभ उनके मुंह की गहराई में अंदर दाल उसे उसे वह नृत्य करवाने लगता है

अब सविता क गरम मुंह क अंदर उसकी और उसके जवान भतीजे की जीभ आपस में द्वन्द लड़ रही थी

“उम्मम्मम्मम... Ummmmmmmmmmmm.... Ummmmmmmmmm"

सविता कुछ पलों क लिए तोह अपने भतीजे को उसकी पूरी मनमानी करने देती है पर मोनू क लुंड की गर्मी उसकी हरकतों में नज़र आणि सुरु हो जाती है.. जिससे जल्दी hi 'सत्यम की माँ' छटपटा सी जाती है वो मोनू क मजबूत मरदाना सीने पे अपना एक हाथ रख क उसे कसके दबाते हुए अपने जिस्म को पीछे की तरफ दक्का देती है जिससे उसके लाल गुलाब जैसे होंठ एक जवान लड़के की गिफट से आज़ाद हो जाते है

सविता- (लम्बी लम्बी साँसें लेते हुए.. मानो जैसे मीलो दौड़ लगा क आयी हो) आआआह्ह्ह्ह... उम्मम्मम्मम्म.. कमीने.. मेरी जान hi ले लेगा… हम्म… मैंने.. मैंने कहा था न आज तू मुझे हाथ नहीं लगाए.. आज सब कुछ तेरी ये चिनार करेगी.. मेरी बात नहीं मानेगा तोह मैं चली जाउंगी.. समझा..

सविता ने एक जवान लड़के को योनि का दर दिखाया था, जो हमेशा hi काम करता है

मोनू- (कामुकता की आग में तप्त हुआ सा..) माफ़ करना बड़ी माँ.. पर आपके होंठों में इतना रास भरा है की मैं खुद को रोक नहीं पाया

सविता जैसी गदराई भरी भरकम सरीर वाली औरत भी अपने यौवन की शक्ति की बड़ाई सुनकर मुस्कुरा पड़ती है

"ठीक है.. इस बार जाने दे रही हु.. पर दुबारा नहीं.. समझा.."

मोनू ‘है’ में अपना सर हिला क पूरी हामी भर देता है

सविता मुस्कुराते हुए मोनू क लुंड की और घूमती है अपनी कामुकता से लाबबा मुस्कान क साथ एक जवान तने हुए लुंड को देखते हुए अपनी एक ऊँगली को अपने मुंह मैं रख क अपने थूक से गीली करती है फिर बिस्तर क पास hi खड़े खड़े झुक क उस गीली ऊँगली को मोनू क तने हुए लुंड पे रख क फेरने लगती है.. जिससे मोनू तोह मानो पूरा पागल hi जो जाता है ककी सविता उसके लुंड क मोठे सुपडे क छेद पे hi अपनी ऊँगली फिर रही थी वो भी इतने प्रेम से की मोनू का लुंड ऐसे हिलोरे खाने लगता है जैसे वो सविता को ऐसे देख क अपनी ख़ुशी का इजहार कर रहा हो

"Aaaaaaaaaaaahhhhhhhh.. बडीइइइइ.. Maaaaaaaaaaaaaaa… ufffffffffffffff…"

सविता मोनू की तड़प देख क धीरे से मुस्कुराते हुए थोड़ा और झुकती है जिससे उसकी बड़ी बड़ी तानी हुई चूचिया हलकी सी झुक सी जाती है और मोनू क अपने मोठे सुपडे क छेद पे सविता क निप्पल्स का काला जामुन महसूस होता है.. अब एक जवान लड़के क साथ ऐसी हरकत कोई करेगा तोह आप सोच hi सकते है उस बेचारे का हाल किया हो रहा होगा



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