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- Dec 5, 2013
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प्रीवियस अपडेट ों पेज No.
390
अपडेट #20
सन
#02
मेरी पत्नी चुद रही है..
सुंदरपुर की सुंदरता इस समय पहले से कही गुना बड़ी हुई थी, बारिश ने कुछ पलों क लिए मानो विराम सा लिया था और आस्मां में एक खूबसूरत सा इंद्रधनुष बना हुआ था.. जिससे दूर दूर तक फैले खेतों क खूबसूरती मानो कई गुना बाद गयी हो
पर ऐसा ज्यादा दिएर तक रहता नहीं.. ककी तभी बिन बुलाये मेहमान की तरह बारिश ने एक बार फिर से अपनी ठंडी दस्तक दे दी थी, ये ठंडी बूंदों वाली बारिश फिर से सुंदरपुर क हरे भरे खेतों की हरियाली को और बढ़ने लगी थी
बारिश की मोती बूंदें पत्तों पे गिरते हुए जब नीचे की और बहती तोह इंद्रधनुष की हलकी सी रौशनी की चाप सी उनमें नज़र आती है और मानो जैसे वो बंधे कुछ पलों क लिए नन्ही नन्ही मोतियों में बदल जाती हो
आसान सब्दो में लिखू तोह इस गाओं की खूबसूरती को सब्दो में समां पाना मेरे लिए संभव नहीं हो प् रहा है
पर तभी लगातार अपनी रफ़्तार को बढ़ती हुई बारिश क बीच कही से वो खनकती हुई आवाज़ उस खेत क पत्तों क बीच से गुजर पड़ती है
“रुकिए जी.. अब खेल को और रंगीन बनाने का समय है, आज आपको मुझे पूर्ण ख़ुशी देनी है, इतना प्रेम करना है की मेरी योनि से ख़ुशी क आंसू फुट पड़े”
ये कामुक और मासूम की ध्वनि खेत क बीच दौड़ती हुई उस खेत क बिलकुल अंत में बानी उस झोपडी तक पहुंच जाती है जहा उसे सुनने वाला वो तीसरा इन्शान उपस्तिथ था.. और वो इन्शान था सोनू का बाप 'वीरू'
झोपडी क अंदर उस पुराणी और टूटी हुई चारपाई पे लेते हुए वीरेंदर यानि वीरू क कानो में जब ये सब्द पड़ते है तोह मानो उसकी नींद की खुमारी उसका साथ चोरते हुए उसे आज़ाद करती जाती है और वो धीरे से अपनी आँखों को खोलते हुए उस आवाज़ पे धियान देने लगता है जो उसने अभी अभी सुनी है और ये आवाज़ वो हज़ारों की भीड़ में भी पहचान सकता था.. सायद इसीलिए एक भी पल नस्ट हुए बिना hi उसके अधरों से वो नाम फुट पड़ता है
“हर्षिता..”
ये नाम उसने इतने hi स्वर में लिया था की वो खुद hi सुन पाटा, वैसे अगर वो चिल्लाता भी तोह सायद कोई सुन न पाटा ककी बारिश का शोर लगातार बढ़ता जा रहा था
तभी अचानक से उस झोपडी में लगा वो पुराण और जगह जगह से टूट चूका बांस का दरवाजा तेज हवा और बारिश की भीसड़ता से लड़ते हुए अचानक से एक पल क लिए खुल पड़ता है.. पर ये एक पल hi काफी था ये देखने क लिए की इस समय खेत में उस झोपडी क ठीक सामने उसकी धर्मपत्नी किसी मर्द क साथ उपस्तिथ है
वीरू क होंठों से फिर से दबी हुई आवाज़ फुट पड़ती है
“हर्षिता यहाँ.. इतनी बारिश में, और ये किसके साथ है”
पर अब तक झोपडी का वो दरवाजा फिर से बंद हो चूका था, मानो जैसे आज ठंडी हवाओं क साथ hi वो बांस का दरवाजा खुलता बंद होता रहना च रहा हो.. या सायद आज वो द्वार भी वीरू क साथ छुपन छुपाई खेलने का मौका ढूंढ रहा हो
वीरू अपने स्थान से उठाने की चैस्ता करता है तोह मानो उसका सरीर उसका साथ नहीं देता.. ऐसा लगता है जो अगली आवाज़ उसके कानो में पड़ी, उसने उसके सरीर से पूरी ताक़त चीन ली हो
“तुम्हारे इस सलोने और सावले सरीर से प्रेम करने का बहुत इन्तिज़ार किया है, अब और मत रोको.. मुझे तुम्हारी सवाली योनि से मन भर क प्रेम करना है.. आज मुझे मत रोको बहु..”
बहु.. यही वो सब्द थे जिसने वीरू से उसके सरीर की पूर्ण इच्छाशक्ति चीन ली पर साथ hi एक अजीब सी गुदगुदी उसके सरीर में भर दी थी, उसका सरीर भले hi उस चारपाई से उठ न प् रहा हो पर उसके हिलते होंठों से वो सब्द जरूर निकले
“बड़े भैया और मेरी पत्नी.. मतलब”
वीरू का दिमाग भी इसके आगे क लिए तैयार नहीं था, पर उसके सरीर का कोई और हिस्सा जरूर जो होने वाला था उसे लेके ख़ुशी से उछलने की तैयारी करने लगा था और उसका उठान वीरू की लेगी लुंगी से नज़र आने लगा था.. जो इस बात का प्रमाण था की जो होने वाला है वो वीरू को काफी पसंद आने वाला है
वीरू क दिल की धड़कन अपनी रफ़्तार बढ़ाने लगा था साँसों में गर्माहट भरने लगी थी, तभी हवा क झोंके से वो बांस का दरवाजा एक hi बार में कई बार खुलता बंद होता चला जाता है.. पर वो रुकता भी है, और अब वो पहले से ज्यादा खुला हुआ था
मानो वीरू चोरी छुपे कुछ देखने की चैस्ता कर रहा हो.. और फिर आता है सामने का वो हसीं नज़ारा
पर अब सब कुछ बदल चूका था, ककी अब उसकी संस्कारी पत्नी पूर्ण नंगी थी.. इतनी जल्दी कैसे, बस यही एक बात आयी थी वीरू क दिमाग में यु अपनी पत्नी को अपने बड़े भाई क लिए पूर्ण निवस्त्र देख क
पर फिर उसे नज़र आता है उसके बड़े भाई का वो 8.7” का काला हथोड़े जैसा लुंड जो उसकी नंगी पत्नी को देख कैसे किसी हैवान की तरह तन क खड़ा था मानो बस किसी गरम चीज़ पे अपना वार करने को उतारू हो
‘आआह्ह्ह्हह्ह्ह्हह.. कितनी गरम है मेरी छोटी बहु”
ये वो सब्द थे जो निकले तोह महेंद्र क मुख से थे पर उसका असर वीरू क सरीर पे हुआ था ककी न जाने कैसे उसका एक हाथ धीरे धीरे उसके hi पैरों क मध्य पहुंचने लगा था जहा एक 7” का तम्बू धीरे धीरे अपना आकर लेने लगा था.. पर ऐसी क साथ हवा ने फिर से वीरू क साथ शरारत कर दी थी ककी एक बार फिर से हलकी सी आवाज़ क साथ वो दरवाजा फिर से बंद हो गया था, मानो जैसे वो दरवाजा और हवा दोनों एक साथ मिलकर आज वीरू की परीक्षा लेने वाले हो
“आज आपको अपनी इस गरम बहु की पूरी गर्मी निकालनी होगी जेठ जी.. बोलो निकल डोज न”
वीरू ये तोह नहीं देख पता की बहार उस खुले खेत और ऐसी ठंडी बूंदों वाली बारिश में अब किया हो रहा है पर उसकी पत्नी क वो सब्द उसके अंदर एक अंजनी सी ऊर्जा और अग्नि पैदा कर रहे थे.. पर वीरू को ज्यादा इन्तिज़ार नहीं करना पड़ता ककी जल्दी hi वापस से हवा अपना खेल खेलती है और जैसे तेज़ आंधी में खिड़की क कपड़ खुलते बंद होते है अब ठीक वही हाल उस झोपडी क उस पुराने और जगह जगह से टूट चुके द्वार क साथ होने लगा था.. जो रह रह क सामने का नज़ारा दिखने लगा था और अब सामने का नज़ारा कुछ ऐसा था जो किसी भी मर्द क लुंड का पानी निकल देने की पूरी हिम्मत रखता था ककी सामने उस खेत में उसकी सलोनी सूरत वाली कासी और उन्नत उरोजों वाली कामुक पत्नी पूर्ण नंगी हालत में अपने जेठ का मोटा खड़ा हाथ अपने कोमल हाथों में पड़के हुए उनकी आँखों में ऐसे देख रही थी मानो अपनी वासना का ेस्टर समझा रही हो
ये नज़ारा कुछ ऐसा था की वीरू को ऐसी ठण्ड और ऐसे मौसम में भी अपना गाला सूखता हुआ सा महसूस हो प् रहा था, वही तेज़ वर्षा क बीच बरसती उन बड़ी बड़ी बूंदों से उस खेत में पूरी तरह पानी भर चूका था.. और अब पानी में गिरती बूंदों क कारन होने वाली आवाज़ क उपरांत भी वो अपने दिल की धकधक साफ़ साफ़ सुन प् रहा था.. उसे अब सिर्फ इस बात का इन्तिज़ार था अब आगे किया होने वाला है ?
कंटिन्यू... 
अपडेट #20
सन
मेरी पत्नी चुद रही है..
सुंदरपुर की सुंदरता इस समय पहले से कही गुना बड़ी हुई थी, बारिश ने कुछ पलों क लिए मानो विराम सा लिया था और आस्मां में एक खूबसूरत सा इंद्रधनुष बना हुआ था.. जिससे दूर दूर तक फैले खेतों क खूबसूरती मानो कई गुना बाद गयी हो
पर ऐसा ज्यादा दिएर तक रहता नहीं.. ककी तभी बिन बुलाये मेहमान की तरह बारिश ने एक बार फिर से अपनी ठंडी दस्तक दे दी थी, ये ठंडी बूंदों वाली बारिश फिर से सुंदरपुर क हरे भरे खेतों की हरियाली को और बढ़ने लगी थी
बारिश की मोती बूंदें पत्तों पे गिरते हुए जब नीचे की और बहती तोह इंद्रधनुष की हलकी सी रौशनी की चाप सी उनमें नज़र आती है और मानो जैसे वो बंधे कुछ पलों क लिए नन्ही नन्ही मोतियों में बदल जाती हो
आसान सब्दो में लिखू तोह इस गाओं की खूबसूरती को सब्दो में समां पाना मेरे लिए संभव नहीं हो प् रहा है
पर तभी लगातार अपनी रफ़्तार को बढ़ती हुई बारिश क बीच कही से वो खनकती हुई आवाज़ उस खेत क पत्तों क बीच से गुजर पड़ती है
“रुकिए जी.. अब खेल को और रंगीन बनाने का समय है, आज आपको मुझे पूर्ण ख़ुशी देनी है, इतना प्रेम करना है की मेरी योनि से ख़ुशी क आंसू फुट पड़े”
ये कामुक और मासूम की ध्वनि खेत क बीच दौड़ती हुई उस खेत क बिलकुल अंत में बानी उस झोपडी तक पहुंच जाती है जहा उसे सुनने वाला वो तीसरा इन्शान उपस्तिथ था.. और वो इन्शान था सोनू का बाप 'वीरू'
झोपडी क अंदर उस पुराणी और टूटी हुई चारपाई पे लेते हुए वीरेंदर यानि वीरू क कानो में जब ये सब्द पड़ते है तोह मानो उसकी नींद की खुमारी उसका साथ चोरते हुए उसे आज़ाद करती जाती है और वो धीरे से अपनी आँखों को खोलते हुए उस आवाज़ पे धियान देने लगता है जो उसने अभी अभी सुनी है और ये आवाज़ वो हज़ारों की भीड़ में भी पहचान सकता था.. सायद इसीलिए एक भी पल नस्ट हुए बिना hi उसके अधरों से वो नाम फुट पड़ता है
“हर्षिता..”
ये नाम उसने इतने hi स्वर में लिया था की वो खुद hi सुन पाटा, वैसे अगर वो चिल्लाता भी तोह सायद कोई सुन न पाटा ककी बारिश का शोर लगातार बढ़ता जा रहा था
तभी अचानक से उस झोपडी में लगा वो पुराण और जगह जगह से टूट चूका बांस का दरवाजा तेज हवा और बारिश की भीसड़ता से लड़ते हुए अचानक से एक पल क लिए खुल पड़ता है.. पर ये एक पल hi काफी था ये देखने क लिए की इस समय खेत में उस झोपडी क ठीक सामने उसकी धर्मपत्नी किसी मर्द क साथ उपस्तिथ है
वीरू क होंठों से फिर से दबी हुई आवाज़ फुट पड़ती है
“हर्षिता यहाँ.. इतनी बारिश में, और ये किसके साथ है”
पर अब तक झोपडी का वो दरवाजा फिर से बंद हो चूका था, मानो जैसे आज ठंडी हवाओं क साथ hi वो बांस का दरवाजा खुलता बंद होता रहना च रहा हो.. या सायद आज वो द्वार भी वीरू क साथ छुपन छुपाई खेलने का मौका ढूंढ रहा हो
वीरू अपने स्थान से उठाने की चैस्ता करता है तोह मानो उसका सरीर उसका साथ नहीं देता.. ऐसा लगता है जो अगली आवाज़ उसके कानो में पड़ी, उसने उसके सरीर से पूरी ताक़त चीन ली हो
“तुम्हारे इस सलोने और सावले सरीर से प्रेम करने का बहुत इन्तिज़ार किया है, अब और मत रोको.. मुझे तुम्हारी सवाली योनि से मन भर क प्रेम करना है.. आज मुझे मत रोको बहु..”
बहु.. यही वो सब्द थे जिसने वीरू से उसके सरीर की पूर्ण इच्छाशक्ति चीन ली पर साथ hi एक अजीब सी गुदगुदी उसके सरीर में भर दी थी, उसका सरीर भले hi उस चारपाई से उठ न प् रहा हो पर उसके हिलते होंठों से वो सब्द जरूर निकले
“बड़े भैया और मेरी पत्नी.. मतलब”
वीरू का दिमाग भी इसके आगे क लिए तैयार नहीं था, पर उसके सरीर का कोई और हिस्सा जरूर जो होने वाला था उसे लेके ख़ुशी से उछलने की तैयारी करने लगा था और उसका उठान वीरू की लेगी लुंगी से नज़र आने लगा था.. जो इस बात का प्रमाण था की जो होने वाला है वो वीरू को काफी पसंद आने वाला है
वीरू क दिल की धड़कन अपनी रफ़्तार बढ़ाने लगा था साँसों में गर्माहट भरने लगी थी, तभी हवा क झोंके से वो बांस का दरवाजा एक hi बार में कई बार खुलता बंद होता चला जाता है.. पर वो रुकता भी है, और अब वो पहले से ज्यादा खुला हुआ था
मानो वीरू चोरी छुपे कुछ देखने की चैस्ता कर रहा हो.. और फिर आता है सामने का वो हसीं नज़ारा
पर अब सब कुछ बदल चूका था, ककी अब उसकी संस्कारी पत्नी पूर्ण नंगी थी.. इतनी जल्दी कैसे, बस यही एक बात आयी थी वीरू क दिमाग में यु अपनी पत्नी को अपने बड़े भाई क लिए पूर्ण निवस्त्र देख क
पर फिर उसे नज़र आता है उसके बड़े भाई का वो 8.7” का काला हथोड़े जैसा लुंड जो उसकी नंगी पत्नी को देख कैसे किसी हैवान की तरह तन क खड़ा था मानो बस किसी गरम चीज़ पे अपना वार करने को उतारू हो
‘आआह्ह्ह्हह्ह्ह्हह.. कितनी गरम है मेरी छोटी बहु”
ये वो सब्द थे जो निकले तोह महेंद्र क मुख से थे पर उसका असर वीरू क सरीर पे हुआ था ककी न जाने कैसे उसका एक हाथ धीरे धीरे उसके hi पैरों क मध्य पहुंचने लगा था जहा एक 7” का तम्बू धीरे धीरे अपना आकर लेने लगा था.. पर ऐसी क साथ हवा ने फिर से वीरू क साथ शरारत कर दी थी ककी एक बार फिर से हलकी सी आवाज़ क साथ वो दरवाजा फिर से बंद हो गया था, मानो जैसे वो दरवाजा और हवा दोनों एक साथ मिलकर आज वीरू की परीक्षा लेने वाले हो
“आज आपको अपनी इस गरम बहु की पूरी गर्मी निकालनी होगी जेठ जी.. बोलो निकल डोज न”
वीरू ये तोह नहीं देख पता की बहार उस खुले खेत और ऐसी ठंडी बूंदों वाली बारिश में अब किया हो रहा है पर उसकी पत्नी क वो सब्द उसके अंदर एक अंजनी सी ऊर्जा और अग्नि पैदा कर रहे थे.. पर वीरू को ज्यादा इन्तिज़ार नहीं करना पड़ता ककी जल्दी hi वापस से हवा अपना खेल खेलती है और जैसे तेज़ आंधी में खिड़की क कपड़ खुलते बंद होते है अब ठीक वही हाल उस झोपडी क उस पुराने और जगह जगह से टूट चुके द्वार क साथ होने लगा था.. जो रह रह क सामने का नज़ारा दिखने लगा था और अब सामने का नज़ारा कुछ ऐसा था जो किसी भी मर्द क लुंड का पानी निकल देने की पूरी हिम्मत रखता था ककी सामने उस खेत में उसकी सलोनी सूरत वाली कासी और उन्नत उरोजों वाली कामुक पत्नी पूर्ण नंगी हालत में अपने जेठ का मोटा खड़ा हाथ अपने कोमल हाथों में पड़के हुए उनकी आँखों में ऐसे देख रही थी मानो अपनी वासना का ेस्टर समझा रही हो
ये नज़ारा कुछ ऐसा था की वीरू को ऐसी ठण्ड और ऐसे मौसम में भी अपना गाला सूखता हुआ सा महसूस हो प् रहा था, वही तेज़ वर्षा क बीच बरसती उन बड़ी बड़ी बूंदों से उस खेत में पूरी तरह पानी भर चूका था.. और अब पानी में गिरती बूंदों क कारन होने वाली आवाज़ क उपरांत भी वो अपने दिल की धकधक साफ़ साफ़ सुन प् रहा था.. उसे अब सिर्फ इस बात का इन्तिज़ार था अब आगे किया होने वाला है ?