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फाइनली लखन ने अपना मन मजबूत कर लिया और विनीता का साथ देने का निश्चय कर लिया. उसने भी मिटटी को अपने हाथो में भरा और अपने हाथो को विनीता के चेहरे पर रख दिया और उसके चेहरे गालो होंठो बालो को आगे से पीछे ऊपर से नीचे तक उस मिटटी से सराबोर कर दिया. चेहरे गर्दन पर मिटटी मलने के बाद उसकी बहो से होते हुए उसके कंधो पर रख दिया. और विनीता के कंधो और उसकी बहो पर मिटटी का लेपन करने लगा. लखन सिंह के साथ बिताए गए कामुक पालो ने पहले भी विनीता को उत्तेजित करा था पर इस बार की बात कुछ अलग था मन के प्रेम भाव की वजह से आज उनके खुरदुरे हाथो का स्पर्श उसे अलग hi आनंद दे रहा था. पर वो ये बात लखन जी पर ज़ाहिर नहीं करना चाहती थी क्युकी लखन जी की झिझक देख कर उसे तो यही लग रहा था की लखन जी के मन में उसके लिए वैसा कोई भाव नहीं इसलिए वो अपने भावो को उनपर ज़ाहिर करके उन्हें ऐम्बर्रास फील नहीं करना चाहती थी.
विनीता: देखा लाख जी कितना आसान है. आप दिमाग से ये बात निकल दीजिये की आप मुझे कहा छू रहे है, बस यु सोचिये की आप किसी वास्तु पर पेंटिंग कर रहे है. आप जितना ये सोचेंगे की आप मुझे कहा सचहु रहे है उतना आप ज्यादा उनकंफर्टबले फील करेंगे इसलिए ज्यादा सोचिये मत.
लखन: जी
विनीता की गर्दन पर मिटटी को मलते मलते लखन धीमे धीमे अपने हाथो को सरकता हुआ नीचे को लेन लगा. विनीता की सासे सासे तेज़ ते चल रही थी उसका सीना ऊपर नीचे हो रहा था. और वो छह कर भी इस उत्तेजना को काबू नहीं कर सकती थी क्युकी जीवन में पहली बार कोई मर्द उसके नग्न स्तनों को अपने हाथो से स्पर्श करने जा रहा था. नीचे आते आते लखन सिंह ने अपने हाथो को विनीता के स्तनों से दूर रखने का भरसक प्रयत्न करा पर उनके हाथ की उंगलिया विनीता के स्तनों के किनारो से स्पर्श हो hi गई. इस हलके से स्पर्श ने विनीता के पुरे बदन में करंट की एक लेहेर दौड़ा दी. और सिर्फ विनीता hi नहीं लखन जी के हाथ भी काँप गए और उन्होंने अपने हाथो को पीछे खींच लिया.
पर विनीता भी अंदर से काफी उत्तेजित हो चुकी थी और वो जल्द से जल्द इस उत्तेजना को महसूस करना चाहती थी और इससे बेहतर अवसर उसे नहीं मिल सकता था जहा बिना उसके चरित्र पर दाग लगे वो इसे महसूस कर सकती थी. इसलिए विनीता ने लखन के पीछे हेट हाथो को बीच में hi थाम लिया और उनके हाथो को नीचे ज़मीन में रख कर उन्हें ढेर साडी मिटटी से सराबोर कर दिया. और दुबारा उनके हाथो को अपने स्तनों के समीप लेकर छोड़ दिया क्युकी वो खुद उनके हाथो को अपने स्तनों पर रखकर उनके सामने अपनी कामुकता को ज़ाहिर नहीं करना चाहती थी.
विनीता: लखन जी आप फिर सोच रहे है मैंने आपसे कहा न कुछ सोचिये मत जिन अंगो को छूने में आपको ज्यादा झिझक हो रही है वह पहले hi मृदा लेपन करके इस झिझक को दूर कर लीजिये ताकि आगे की पूजा आसान हो जाए.
विनीता ने लखन को हिम्मत देने के लिए उनके कंधो को थम लिया. और उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करा और विनीता का प्रोत्साहन पाकर लखन ने जैसे hi अपने हाथो को आगे बढ़ाया उनकी हथेलिए सीधा विनीता के स्तनों से जा मिली. विनीता के तन बदन में करंट दौड़ गया और लखन सिंह भी कुछ पल को स्तब्ध रह गए उनसे न हाथ चलाया जा रहा था न हटाया वो बस जड़ से विनीता के स्तनों पर अपनी हथेली रखे बैठे थे. पर अपने स्तनों पर उन खुरदुरे हाथो के स्पर्श ने विनीता को बेहद उत्तेजित कर दिया और इस उत्तेजना में उसने लखन सिंह के काढ़ो को कुस कर पकड़ लिया. विनीता के चेहरे के भाव से साफ़ ज़ाहिर था की वो किस कदर उत्तेजित थी पर लखन सिंह की आँखों पर पट्टी थी इसलिए वो उन भावो को देख hi नहीं सकते थे यदि देखते तो समझ जाते की आग दोनों तरफ बराबर लगी है. इसलिए वो तो इस पकड़ को बेचैनी की पकड़ hi समझ रहे थे की विनीता किस कदर बेचैन है उसे कितना अजीब लग रहा होगा ये सब करवाते हुए पर मजबूरी वश वो पीछे भी नहीं हैट सकती इसलिए जल्द से जल्द इस पूजा को ख़तम करना hi होगा.
इसलिए अपनी उत्तेजना को काबू करते हुए लखन ने धीमे धीमे अपने हाथो में भरी मिटटी विनीता के स्तनों पर मलना शुरू करदी. पर उत्तेजना पर किसका वश चला है कुछ पल तो लखन विनीता के स्तनों को एक पूजन क्रिया की तरह छूटे रहे थे पर धीमे धीमे उनके अंदर की काम उत्तेजना उन पर हावी होने hi लगी और वो विनीता के उभारो की सुडौलता को स्पर्श करके उसके आवेग में बह चले. उनके दिलो दिमाग पर विनीता के स्तनों का सुडौल अकार हावी होता जा रहा था. वो विनीता के स्तनों के हर हिस्से को सेहला रहे थे उसे अच्छे से छू कर महसूस कर रहे थे. शायद आँख पर बंधी पट्टी ने इस उत्तेजना के अग्नि में घी का काम करा था. क्युकी जब हमारी कोई एक ज्ञानेंद्री सुप्तावस्था में चली जाती है तो बाकि ज्ञानेन्द्रिय ज्यादा एक्टिव हो जाती है. इसलिए आँखों के बंद हो जाने से उनका ध्यान पूरी तरह से केवल स्पर्श पर केंद्रित था ऐसे में उत्तेजना का बढ़ना स्वाभाविक था. और ये उत्तजेना उनके लिंग पर हावी हो रही थी और वो झटके पे झाकतके खा रहा और उसका अकार पल प्रतिपल बढ़ता जा रहा था.
विनीता के स्तन के हर हिस्से पर मीठी लग चुकी थी पर शायद लखन भावावेश में इतने खो गए थे की उन्हें इसका ध्यान hi नहीं था. एक घंटे की इस पूजा में वो 15 मं से ज्यादा समय से विनीता के स्तनों को सेहला रहे थे. उनका लिंग पूरी तरह खड़ा हो गया था. कुछ पल बाद जब उन्हें ये एहसास हुआ की वो काफी देर से कामुकता में बहकर विनीता के स्तन दबा रहे तो उन्होंने तुरंत अपने हाथ पीछे खींच लिए. अचानक से उनके यु हाथ पीछे खींच लेने से विनीता का आनंद भी अचानक से रुक गया. लखन को खुद पर काफी गुस्सा आ रहा था की कैसे वो इस कदर उत्तेजित हो गए की उन्हें याद hi नहीं रहा की वो कबसे विनीता के स्तन सहलाने के साथ दबाने भी लगे. क्या सोच रही होगी वो उनके बारे में बेचारी मजबूरीवश मन भी नहीं कर प् रही होगी. और इधर विनीता ये सोच रही थी की काश ये पल यही तुम जाता और लखन जी यही उसके स्तनों के साथ खेलते रहते. दोनों hi एक दुसरे की मनोदशा से पूरी तरह अनजान इस प्रक्रिया को संपन्न कर रहे थे.
लखन को विनीता की बात याद आई की जितनी जल्दी वो ये पूजा पूरी कर लेंगे उतना अच्छा होगा तो उन्होंने दुबारा अपनी मुट्ठी में वो मिटटी भरी. और अपने हाथ विनीता के मखमली पेट की तरफ बड़ा दिए. ज्योही उन मिटटी से साणे गंदे खुरदुरे हाथो का स्पर्श उस रेशम से ज्यादा मुलायम पेट से हुआ विनीता सिसकारी लेने को मजबूर हो गई, ये सिसकारी लखन सिंह ने भी सुनी पर इसे भी वो विनीता की मजबूरी मि निकली आह hi समझे. वो अपने हाथो को विनीता के पेट पर ऊपर से नीचे तक चला रहे थे. क्या पतला मुलायम पेट था विनीता के शरीर के रोए रोए खड़े हो गए थे वो किस तरह अपनी उत्तेजना कल काबू करे थी वो hi जानती थी.
अपने पेट पर घूमती लखन सिंह की उंगलियों ने उसकी छूट को भी अंदर से पानी पानी कर दिया था. जब पेट पर स्पर्श ने उसका ये हाल जार दिया था तो जब उसकी जाएंगे के बीचे उसकी छूट को छुएंगे वह मिटटी लगाएंगे तब क्या हाल होगा कही लखन जी को उसके छूट के गीलेपन का एहसास तो नहीं हो जाएगा अगर ये पानी बह कर बहार आ गया और उन्हें एहसास हो गया तो वो क्या सोचेंगे मेरे बारे में.
दोनों इसी बात से चिंतित थी की सामने वाला उनके बारे में क्या सोचेगा काश वो एक दुसरे के मन की व्याकुलता एक दुसरे की उत्तेजना को समझ पते तो ये पूजा कितनी आसान और कामुक हो जाती उनके लिए पर शायद अघोरी उनकी मनोदशा समझता था इसीलिए उसने उन्हें आँख में पट्टी बांधने का सुझाव दिया क्युकी वो जनता था की वो इस सुझाव को ज़रूर अपनाएंगे और एक दुसरे के मन के भावो से अनजान बने रहेंगे. विनीता लखन दोनों कमर के ऊपर का सामने का भाग पूरी तरह मिटटी से मॉल गया था पर पीछे पीठ वाला हिस्सा अब भी शेष था और पूजा की शर्त के मुताबिक वो एक दुसरे की तरफ पीठ कर नहीं सकते थे ऐसे में उन्हें एक दुसरे को आलिंगन करके अपने हाथ पीछे लेजाकर एक दुसरे की पीठ पर मृदा लेपन करके hi इस पक्रिया को आगे बढ़ाना था और ऐसा करने पर उनके नग्न शरीरो का स्पर्श होना स्वाभाविक था पर इसके शिव कोई चारा भी नहीं था.
विनीता: लखन जी हम सामंने से तो मिटटी लेपन कर चुके पर हमारी पीठ वाला हिस्सा अब भी बचा है और हम एक दुसरे की तरफ पीठ कर नहीं सकते तो ऐसे में हमे अपने हाथ पीच लेजाकर hi करना होगा और उसके लिए हमे एकदूसरे के करीब आना होगा.
विनीता ये बोल तो गई पर वो hi जानती थी उसे ये बोलते हुए कितनी शर्म आ रही थी. वही लखन सिंह के दिल की धड़कने तेज़ तेज़ चल रही थी की जिस महिला के स्तनों को छूने भर से उनका लुंड खड़ा हो गया जब वो उसके नंगे बदन को अपनी बहो में भरेंगे उसकी चिकनी पीठ को सेहलाएँगे तो कही बहक न जाए कही स्तनों की तरह इस बार उनकी पकड़ इतनी मजबूत न हो जाए की विनीता को उनकंफर्टबले लगने लगे. पर उन्हें सबसे ज्यादा चिंता अपने उत्तेजित लिंग की थी की कही वो विनीता से स्पर्श न कर जाए और उसे उनकी मनोदशा का पता न चल जाए. पर इसके अलावा कोई चारा भी नहीं पीठ पर मिटटी लेपन करने का यही एकमात्र तरीका था. इसलिए लखन ने इसके लिए हामी भर दी.
लखन: जी ठीक है हम जल्द hi य ख़तम कर लेंगे.
विनीता: जी बिलकुल हम दोनों एक साथ एक दुसरे की पीठ पर मिटटी मिलेंगे तो जल्द कर लेंगे.
लखन विनीता ने अपने दोनों हाथो दो मिटटी से भर लिया और एक दुसरे के आमने सामने खड़े हो गए. एक बार फिर विनीता ने अपने हाथ लखन के कंधे पर रखे और हाथो को सरकते हुए उनके पीठ की तरफ ले गई. एक गहरी सास लेते हुए लखन ने भी अपने हाथो को विनीता की बगलो से निकलते हुए उसकी पीठ की तरफ ले चले. दोनों ने एक दुसरे को अपनी बहो में भर लिया. समझ नहीं आ रहा था की उन्हें एक दुसरे की पीठ पर मिटटी मालनी थी इसलिए एक दुसरे को बहो में भरा था या एक दुसरे को बहो में भरना था इसलिए एक दुसरे की पीठ पर मिटटी मॉल रहे थे. पर जो भी बेहद कामुक था और इसका प्रभाव भी उन पर साफ़ दिखाई दे रहा था. लखन सिंह कमर के ऊपर से विनीता के बदन से चिपके थे पर कमर के नीचे विनीता के बदन से दूरी बनाए रखने का भरसक प्रयत्न कर रहे थे ताकि उनका लिंग उसे स्पर्श न करे और उसे उसके तनाव का पता न चले. पर इस कामुक अवस्था की कामुकता उन पर एक बार फिर हावी होती जा रही थी विनीता के स्तन उनके सीने यहाँ वह रगड़ खा रहे थे जो उन्हें उत्तेजित कर रहे थे. विनीता भी खुद पर काबू नहीं कर प् रही थी उसके अंदर की काम वासना उसे लखन जी की बहो में पिघल जाने को मजबूर कर रही थी.