Tumhaare Liye- Ek Prem Kahaani - Page 6 - SexBaba
  • From this section you can read all the hindi sex stories in hindi font. These are collected from the various sources which make your cock rock hard in the night. All are having the collections of like maa beta, devar bhabhi, indian aunty, college girl. All these are the amazing chudai stories for you guys in these forum.

    If You are unable to access the site then try to access the site via VPN Try these are vpn App Click Here

Tumhaare Liye- Ek Prem Kahaani

बहुत बहुत धन्यवाद इस खूबसूरत समीक्षा के लिए।।

दहेज़ प्रथा वो चाहे उच्च वर्ग हो, माध्यम वर्ग हो या निम्न वर्ग हो, हर जगह विराजमान हैजो देखा जाए तो एक तरह से समाज को खोखला कर रही है। जिसके पास जितना ज्यादा पैसा है वो उतना ज्यादा पैसे के लिए हाइ तौबा मचाता है। इसमें सबसे ज्यादा निम्न और मध्यम वर्ग को परेशानी होती है, क्योंकि उन्हें दहेज़ के लिए पैसा इकट्ठा करने में बहुत दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।।

सरिता ने खुद रिश्ता तोड़ दिया क्योंकि ऐसे लालची लोगों के यहाँ शादी करने के बाद शायद सरिता को रोज प्रताड़ित किया जा सकता था, साथ ही वो स्वाभिमानी लड़की थी जिसे अपने पापा की बेइज्जती बर्दास्त नहीं थी इसलिए उसने ऐसा किया।

आज सरिता जो कुछ भी बनी है उसमें कहीं न कहीं अप्रत्यक्ष रूप से इंस्पेक्टर की पत्नी और बेटी का हाथ है इसलिए श्रेय उन्हें भी मिलना चाहिए सरिता की कामयाबी का। अभिषेक जहां भी है कुछ न कुछ तो जरूर उसके साथ हो रहा होगा।।

इंस्पेक्टर की पत्नी की बातें वो भूली नहीं है इसलिए सरिता ने त्वरित और धांसू प्रतिक्रिया दी निश्छल को। सरिता को एक बार जरूर पूछना चाहिए था निश्चल से उसके बाद ही कोई कदम उठाना चाहिए था, लेकिन उस समय सरिता का पारा गर्म था इसलिए उसने निश्चल की नहीं सुनी।।

समय आने पर निश्चल का पिछवाड़ा भी लाल होगा ।🤣🤣

साथ बने रहिए।।
 
अपडेट-13

उधर दोनों बहाने लॉज में पहुँचती हैं और अपने कमरे में जाकर सामान रखकर फ्रेश होती हैं सरिता का मूढ़ अभी भी उसी बात को लेकर उखाड़ा हुवा था. मनीषा उससे बात कर रही थी और वो हाँ हूँ में hi जवाब दे रही थी. जिसे देखकर मनीषा जान गयी की उसकी बहन का मूड अभी भी ख़राब है तो वो हंसी मजाक करने लगी लेकिन सरिता का मूड वैसे hi रहा. जिसे देखकर मनीषा ने कहा.

मनीषा- ये क्या है दिदिया. कब से देख रही हूँ की आप उसी बात को लेकर अभी तक बैठी हुई हैं. जो हो आज्ञा सो हो गया. वैसे भी गलती आपकी hi थी. उस बेचारे को थप्पड़ मरने से पहले एक बार सोचना चाहिए था की मार्किट में कितनी भीड़ थी, गलती से हाँथ लग गया होगा, लेकिन नहीं उसे थप्पड़ भी मारा आपने. फिर भी आपका मन नहीं भरा अभी तक.

सरिता- तू ज्यादा उसकी वकील मत बन. तूने मुझे रोका न होता तो आज मैं उसका वो हाल करती की वो किसी लड़की की तरफ आँख उठाकर भी न देखता दोबारा.

मनीषा- अच्छा बाबा. मुझे माफ़ कर दो. अब तो चिल करो न दिदिया. आप उसे इतनी सिद्दत से याद कर रही हैं कही वो बेचारा हिचकी से hi न मर जाये. आपकी ये आदत बहुत hi ख़राब है. किसी एक चीज़ के पीछे पद गयी तो उसका पीछा hi नहीं छोड़ती आप.

मनीषा ने ये बात मुस्कुराते हुवे कही थी. जिसे sun-ne के बाद सरिता ने उसे गुस्से से देखते हुवे कहा.

सरिता- उसी याद करे मेरी जुटी. अब तू ज्यादा अपनी बक बक मत कर. और चुपचाप बैठ जा.

मनीषा- ठीक है मेरी माँ. आप से तो बात करना hi बेकार है.

सरिता- मुझसे बात मत कर. अपनी किताब निकल कर पढाई कर पहले.

इसके बाद मनीषा कुछ नहीं बोली और अपनी किताब निकल कर पढ़ाई करना लगी. रात में दोनों ने खाना खाया और सो गए. अगले दिन सुबह तड़के सरिता उठी. आज उसके ऑफिस का पहला दिन था और आज उसे ऑफिस ज्वाइन भी करना था तो वो अपने ऑफिस के पहले hi दिन लेट नहीं होना चाहती थी, इसलिए वो उठाने के बाद जल्दी जल्दी बाथ लेकर तैयार होने लगी. मनीषा उसके लिए नाश्ता लेकर आयी और बोली.

मनीषा- बहुत hi प्यारी लग रही हो दिदिया. आज तुम्हारे ऑफिस का पहला दिन है तो जल्दी से नाश्ता करके ऑफिस के लिए निकल जाओ. पहले दिन hi मेरी इंस्पेक्टर दिदिया लेट नहीं होनी चाहिए.

सरिता- हाँ सही कह रही है तू मनीषा. मैं पहले दिन hi ऑफिस में लेट नहीं होना चाहती हूँ. ला जल्दी से मुझे नाश्ता दे.

सरिता जल्दी जल्दी नाश्ता करके मनीषा को अच्छे से रहने की हिदायत देखर अपने ऑफिस के लिए चली गयी. जब सरिता वह पहुंची तो उसका जोरदार स्वागत किया गया. उसके जोइनिंग की खबर किसी को नहीं थी की वो किस दिन आकर ज्वाइन करने वाली है. इसलिए कोई खास तयारी नहीं की गयी थी, लेकिन उसके ऑफिस पहुंचने पर उसका जैसा स्वागत किया गया था.

उसे देखकर उसे ऐसा लग रहा था की वो इस जगह पर पहली बार नहीं आयी है. सरिता को ऑफिस के सभी लोगो से इंट्रोडस करवाया गया. सरिता से सीनियर बस एक hi अफसर थे, रावत सर. बाकि सभी officers/officials उससे जूनियर hi थे. ये अलग बात है की उम्र के हिसाब से बहुत सरे officer/official उससे बड़े थे, लेकिन जॉब में उम्र नहीं पोस्ट बड़ी होती है.

सरिता के निचे काम करने वाले जो स्टाफ थे उसमे sub-inspector मोहित शर्मा, रंजना, विकास कुमार और जावेद अख्तर थे. और असिस्टेंट सुब- इंस्पेक्टर जान्हवी, कुशल और अमित थे. सरिता ने सभी स्टाफ से प्रेम पूर्वक मुलाकात की और अपने काम में लग गयी. पूरा दिन वो अपने केबिन में काम करती रही. छुट्टी होने पर वह लॉज चली गई.

इसी तरह दो दिन गुजर गया. पुलिस स्टेशन में सरिता पूरा मन लगाकर अपना काम करती थी. उसका मन भी पुलिस स्टेशन में लगने लगा. पुलिस स्टेशन (पस) में सभी उसके साथ ाचा बर्ताव करते थे और वह भी सभी के साथ अच्छा व्यवहार करती थी.

दो दिनों में सरिता ने सब के मन में अपनी एक अलग पहचान बना ली थी. सरिता को ऑफिस की तरफ दे उसका यूनिफार्म और रहने के लिए क्वार्टर दे दिया गया. सरिता ने छूती होने के बाद लॉज से अपना सारा सामान अपने क्वार्टर में सिफत किया और अपने क्वार्टर में आ गयी. क्वार्टर पर आने के बाद सरिता ने मनीषा से कहा.

सरिता- मनीषा. अब तुम अपना सामान पैक कर लो. कल तुम घर के लिए निकल रही हो न.

मनीषा- अभी कहाँ दिदिया. काम से काम 2-3 दिन तो और रहने दो.

सरिता- नहीं बहुत रह लिया तुमने मेरे साथ. अब चुपचाप घर जाओ और मन लगाकर पढ़ाई करो. तुम्हे इंडियन एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस (आईएएस) की तयारी करनी है. जिसके लिए बहुत म्हणत करनी पड़ेगी. लेकिन तुम हो की पढाई में ध्यान hi नहीं देती हो.

मनीषा- इतनी म्हणत का काम मुझसे नहीं होगा दिदिया. ये पढाई लिखे मेरे बस की बात नहीं है. मैं तो बस एक क्लेअरक की भी नौकरी प् जाउंगी तो उसी में खुश हो जाउंगी. मेरा इतना बड़ा सपना नहीं है दिदिया तुम्हारी तरह.

सरिता- बस बस. तुमसे जब भी पढाई लिखे की बात करो तो तुम्हारी बक बक शुरू हो जाती है. तुम्हारे इसी नेगेटिव थॉट की वजह से तुम्हारा कुछ नहीं होने वाला. कभी तो मेरी बातो को सीरियसली ले लिया करो. हर समय मस्ती मजाक करना सही नहीं होता. कभी तो मेरी बात मन जाया कर.

मनीषा- अरे मेरी प्यारी दिदिया. ये आईएएस, पचस, डॉक्टर, इंजीनियर की पढ़ाई मेरे लिए नहीं बानी है. मैं तो एक अच्छी टीचर ban-na चाहती हूँ. ताकि तुम जैसे कितने लोगो को आईएएस, पचस, डॉक्टर और इंजीनियर बना सकू. बस मैं उठी hi पढाई करुँगी.

मनीषा की बात सुनकर सरिता ने अपना माता पिट लिया और बोली.

सरिता- तुमसे तो बात करना hi बेकार है. तुमसे बात करने का मतलब है पत्थर पर अपना सर पटकना. तुम्हारा इस जनम में कुछ भी नहीं हो सकता है.

मनीषा- मैं तो सोने जा रही हूँ अब तुम भी सो जाओ दिदिया. तुम भी दिन भर काम करके थक्क गयी होगी न.

सरिता- नहीं तुम सो जाओ. मुझे अभी कुछ देर पढाई करनी है. उसके बाद मैं भी सो जाउंगी

मनीषा- ओफ्फोऊ दिदिया. तुम और तुम्हारी पढ़ाई. कितनी ज्यादा पढाई करती हो तुम. चाचा चौधरी ban-na है क्या तुमको.

सरिता- अब ये कौन सी बाला है यार.

मनीषा- क्या. आपको चाचा चौधरी के बारे में नहीं पता. उसे तो सब जानते हैं. इसीलिए मैं कहती हूँ आपसे की कभी अपनी पढाई की किताबो को छोड़ कर कुछ और किताबे पढ़ लिया करो.

सरिता- अपनी बकवास बंद कर और ये बता ये चाचा चौधरी कौन है.

मनीषा- अरे दिदिया. वो कॉमिक्स के चाचा चौधरी और सबु हैं न. जिनका दिमाग कंप्यूटर से भी तेज़ चलता है. मैं उन्ही चाचा चौधरी की बात कर रही थी.

सरिता- बस तुम्हारा दिमाग इन्ही सब में लगता है. अगर इतनी ध्यान से तुम अपने सब्जेक्ट की पढाई करो तो आईएएस, पचस क्लियर कर सकती हो.

मनीषा- मुझसे ये सब नहीं होगा. आप hi पढ़िए अपने विषय की किताब को. मैं जा रही हूँ सोने. गुड नाईट दिदिया.

सरिता भी उसे गुड नाईट विश करती है और पढ़ने बैठ जाती है. लगभग 1 हॉर्स पढाई करने के बाद वो अपनी किताब बंद करती है और सो जाती है.

सुबह उठकर फिर से वही रूटीन फॉलो करती है. आज सरिता ने अपनी पुलिस की ड्रेस पहनी थी. मनीषा जब नाश्ता लेकर आती है तो अपनी दिदिया को खाकी रंग में देखकर कहती है.

मनीषा- दिदिया. ये खाकी रंग तुम पर बहुत जांच रहा है. तुम बहुत hi प्यारी इंस्पेक्टर साहिबा लग रही हो. कहीं तुमको मेरी नजर न लग जाये.

सरिता मनीषा की बात सुनकर आत्मविश्वास के साथ कहती है.

सरिता- इस खाकी को पहनकर मुझे गर्व का अनुभव हो रहा रहा है. इसे पहन कर मुझे अपनी जिम्मेदारी का बखूबी अनुभव हो रहा है. मैं भगवन से यही प्रार्थना करती हूँ की मैं अपने काम को पूरी ईमानदारी और निष्ठां के साथ करू. मुझसे न्याय करने में कभी कोई गलती न हो. मैं हर उस इंसान की मदद कर सकू जो सही हो. जो मेरे पास अपनी समस्याए लेकर आये. तुम भी मेरे लिए प्रार्थना करना मनीषा.

मनीषा- ये भी कोई कहने की बात है दिदिया. मैं तो तुम्हारे लिए हमेशा प्रार्थना करती हूँ. और मुझे अचे से पता है की तुम अपनी जिम्मेदारी बहुत अचे से निभाओगी और सबके साथ न्याय करोगी. अब चलो जल्दी से नाश्ता करके ऑफिस जाओ नहीं तो देर हो जाएगी.

मनीषा के कहने के बाद सरिता ने मनीषा के साथ मिलकर नाश्ता किया और उसे फिर से पढ़ने की हिदायत देखर अपने ऑफिस चली गयी. सारा दिन ऑफिस का काम करती रही. जो भी उससे बात करता उनसे प्रेम से बात करती और शाम को ऑफिस से अपने कमरे पर वापस आ गयी. अगले दिन सरिता की छुट्टी थी और मनीषा को भी घर वापस लौटना था.

सुबह सरिता न मनीषा को स्टेशन पर अल्लाहाबाद जाने वाली ट्रैन पर बैठा दिया. दोनों बहनो की आँखों में आँशु थे. आज पहली बार वो इतने दिनों के लिए एक दुसरे से बिछड़ रही थी. मनीषा ने डबडबाई हुई आँखों से सरिता से कहा.

मनीषा- दिदिया. मुझे नहीं जाना घर. मुझे तुम्हारी बहुत याद आएगी.

सरिता- तुझे क्या लगता है मैं तुम्हारे बिना यहाँ पर रह पाऊँगी, मुझे भी तुम्हारी बहुत याद आएगी, लेकिन तुम्हे घर जाना होगा. क्योंकि वह पर मम्मी पापा अकेले हैं. तुम्हे उनके साथ रहकर उनका हौसला बढ़ाना है.

मनीषा- मुझे रोज फ़ोन करना दिदिया. मुझसे रोज़ बात करना. अगर तुमने मुझसे रोज़ बात नहीं की तो मैं चली आउंगी यहाँ पर तुम्हारे पास.

सरिता- ठिक्क हैई. मैं तुझसे रोज़ बात करुँगी. अब अपने आँशु साफ कर ले. तू रट हुवे बिलकुल भी अछहि नहीं लगती.

तभी ट्रैन ने दूसरी सिटी बजे और प्लेटफार्म से रवाना होने लगी. मनीषा ने खिडके से कहा.

मनीषा- अपना ख्याल रखना दिदिया और मुझे रोज़ फ़ोन करना.

सरिता- तुम भी अपना और मम्मी पापा का ख्याल रखना.

ट्रैन के चले जाने के बाद सरिता अपने कमरे पर वापस आयी और खाना खाकर सो गयी. आज का दिन सरिता का उदासी भरा गुजरा मनीषा के चले जाने के बाद. रात में खाना खाना खाने के बाद जब सरिता लेती तो उसे ठिक्क से नींद नहीं आ रही थी. आधी रात तक करवाते बदलती रही. जब उसे नींद नहीं आई तो उसने मनीषा को फ़ोन कर दिया. इतनी रत को मनीषा सरिता का फ़ोन देखकर हड़बड़ा गयी और जल्दी से फ़ोन उठाकर बोली.

मनीषा- Hello. दिदिया. क्या बात है तुम ठीक तो हो न. कुछ हुवा तो नहीं है न तुमको.

सरिता- अरे नहीं. मैं बिलकुल ठीक हूँ. मुझे कुछ भी नहीं हुवा है. बस नींद नहीं आ रही थी तो सोचा तुमसे थोड़ा बात कर लून.

मनीषा- मैं तो दर गयी थी दिदिया. इतनी रात में तुम्हारा फ़ोन देखकर.

इसके बाद दोनों बहाने कुछ देर ऐसे hi बात करती रही. सरिता को अब अच्छा महसूस हो रहा था. थोड़ी देर बात करने के बाद सरिता ने फ़ोन रख दिया और सोने को कोशिश करने लगी. थोड़ी देर में hi उसे नींद आ गयी. देर रात सोने के कारन उसकी नींद देर से खुली.

वो रात में अलार्म लगाना भूल गयी थी. वो जल्दी से बाथरूम में घुस गयी और जल्दी जल्दी नहाधोकर बहार आयी. थोड़ा बहुत नाश्ता बनाया. खाया और पुलिस स्टेशन (पस) का लिए निकल गयी. जब वो पस पहुंची तो वह का माहौल सब कुछ शांत शांत था. पूरे पस में सन्नाटा पसरा हुवा था. सभी अपनी अपनी टेबल पर चुपचाप बैठकर काम कर रहे थे. सरिता ने जान्हवी से पूछा.

सरिता- क्या बात है जान्हवी. आज पस का महुअल बहुत शांत है. सब लोग इतने चुपचाप हैं कोई बात हो गयी है क्या.

जान्हवी (फुसफुसाते हुवे). वो दसप (सर्किल अफसर सिटी) सर ने आज इधर का राउंड लगा दिया है. कितने लोगो की क्लास लगा दी है उन्होंने आज. वो आपके बारे में कई बार पूछ चुके हैं.

सरिता- अच्छा ये बताओ दसप सर का स्वाभाव कैसा हैं. मतलब वो गुस्से वाले तो नहीं हैं न.

जान्हवी- मैडम. दसप सर गुस्से वाले तो नहीं हैं. सबसे अच्छे से बात करते हैं, लेकिन वो अनुशाशन प्रिय हैं. अगर किसी से गलती होती है तो वो उसे छोड़ते नहीं हैं. मुझे तो लगता है की आज आपकी भी खैर नहीं है मैडम आप बहुत लेट ऑफिस आयी हैं. वो तो हम लोगो के आने से पहले hi पस आ गए थे. और आपके केबिन मैं बैठकर आपका इंतज़ार कर रहे हैं.

जान्हवी की बात सुनकर सरिता को ये एहसास हो गया की आज दन्त तो पक्का पड़ेगी. उसने मन में सोचा की मेरी तो किस्मत hi ख़राब है. रोज समय से ऑफिस आती थी तो कोई हाई रैंक अफसर नहीं आता था और आज थोड़ी सी देर हो गयी तो दसप को आज hi आना था. वो अपना कलेजा मज़बूत करते हुवे अपने केबिन की तरफ कदम बढ़ा दिए. अपने केबिन का दरवाज़ा खोलकर देखा तो एक सख्स उसकी चेयर पर बैठा था. उसकी पीठ दरवाज़े की तरफ थी. सरिता ने पूछा.

सरिता- क्या मैं अंदर आ सकती हूँ सर.

सीओ सिटी- जी जरूर आपका hi केबिन है. आ जाइये.

इतना कहकर वो सख्स सरिता की तरफ घूम गया. जिसे देख कर सरिता का मुंह खुला का खुला रह गया. सरिता की आँखे बड़ी बड़ी हो गयी. सरिता का चेहरा देखकर उस सख्स के होंठो पर एक कातिल मुस्कान आ गयी. उस सख्स को देखकर सरिता के मुंह से अनायास hi निकल गया.

सरिता- तुम.........



इसके आगे की कहानी अगले भाग में..
 
धन्यवाद आपका महोदय।

सरिता ने बचपन से जिन कठिनाइयों में अपना जीवन गुजार दिया है उससे वो सिमट सी गई है ऊपर से जब से अभिषेक गया है वो अलग थलग रहने लगी है सबसे।

तो एकाएक उसके साथ ऐसी घटना हो गई यो उसके समझ मे कुछ नहीं आया और जो समझ आया उसने वही किया।

निश्चल का चरित्र बहुत अच्छा है जो कहानी में आगे पता चलेगा।

साथ बने रहिए।।
 
अपडेट- 14

इतना कहकर वो सख्स सरिता की तरफ घूम गया. जिसे देख कर सरिता का मुंह खुला का खुला रह गया. सरिता की आँखे बड़ी बड़ी हो गयी. सरिता का चेहरा देखकर उस सख्स के होंठो पर एक कातिल मुस्कान आ गयी. उस सख्स को देखकर सरिता के मुंह से अनायास hi निकल गया.

सरिता- तुम...

क्योंकि सामने बैठा साक्ष कोई और नहीं ये वही नौजवान था जिसके गाल सरिता ने भरी मार्किट में लाल कर दिए थे. सिटी सर्किल अफसर निश्छल सिंह राठोड. जिसे देख कर सरिता ने अपने होंठो को kat-te हुवे अपनी एक ऊँगली अपने दांतो से दबा ली और दर के कारन अपने नाख़ून को कुटुरने लगी. जिसे देखकर निश्छल ने कहा.

निश्छल- क्या कहा आपने, तुम....

सरिता- सोर्रीयययययय.....


निश्छल- नहीं नहीं ये नहीं. आपने कुछ और कहा था.

सरिता- नहीं तो... सोररीयय...




इतना कहकर सरिता अपने मन में सोचने लगी.

सरिता- (मन में) आज तो सच में मेरी किस्मत बहुत ख़राब है. एक तो आज पहली बार मुझे पस पहुंचने में देर हुई. उस पर आज hi दसप ने पस का विजिट भी किया. उसपर भी जब मन नहीं भरा तो विजिट करने वाला दसप वही निकला जिसको मैंने थप्पड़ मारा था. हाय मेरी किस्मत. ये बोल रहा था की ये पुलिस वाला है, लेकिन मैंने hi इसकी बात का भरोषा नहीं किया और एक थप्पड़ और मर दिया था. ये पक्का मुझे अपना दुसमन मैंने लगा होगा कही इसने अपनी पर्सनल दुश्मनी निकलने के लिए मुझे ससपेंड तो नहीं कर देगा. हे भगवान् मैं क्या करू.

सरिता अभी भी अपना नखों चबा रही थी. सरिता को नाखून चबाते देख निश्छल ने कहा.

निश्छल- खाना खा कर नहीं आई हो क्या. जो नाखून खा रही हो. कुछ मांगों क्या खाने के लिए.

सरिता- (घबराहट में) यस वो. No. वो वो मैं वो……….

सरिता इतनी ज्यादा शॉक थी की उसके मुंह से ठिक्क से आवाज़ नहीं निकल रही थी. जिसे देखकर निश्छल मुस्कुराते हुवे बोलै.

निश्छल- तुम्हारा नाम क्या है मिस्स्स.

सरिता- वो.. वो.. मेरा ना.. नाम.. हाँ मेरा नम्म सरिता जोशी ही

सरिता हकलाती हुई बोली. जिसे सुनकर निश्छल मुस्कुरात्ता हुवा बोलै.

निश्छल- तो आप hi हैं इस पुलिस स्टेशन की इंचार्ज. स्टेशन हेड अफसर आप को hi बनाया गया है न.

सरिता- जीई. हाँ वो मैं……… हाँ

सरिता किसी भी बात का सही से जवाब नहीं दे प् रही थी. उसके डिल की धड़कन बहुत तेज़ चल रही थी. निश्छल सिंह अपनी मुस्कान दबाते हुवे कहा.

निश्छल- तो मिस जोशी. ये समय है आपका पस में आने का. इसका मतलब आप रोज पस इसी समय पर आती हैं.

निश्छल की बात सुनकर सरिता की हालत और ख़राब हो गयी. वो हकलाते हुवे बोली.

सरिता- वो…… मैं… नाहीइ…..

निश्छल- आप हकलाती भी हैं क्या मिस जोशी. (फिर अपने माथे पर अपनी ऊँगली रखकर कुछ सोचने का नाटक करने के बाद). लेकिन मुझे जहा तक लगता है ऐसा बिलकुल भी नहीं है. जिस तरह से आपकी जुबान कल मार्किट में कैची की तरह चल रही थी. उससे तो ये नहीं लगता की आप हकलाती हैं. तो फिर आज क्या हो गया है आपको. आपकी जुबान hi बंद हो गयी मुझे देखकर. आपकी तबियत तो ठीक है न.

सरिता निश्छल की बात का कोई जवाब नहीं देती तो वो सख्ती से सरिता से कहता है.

निश्छल- मैंने आपसे कुछ पुछा है उसका जवाब चाहिए मुझे.

सरिता- (हकलाते हुवे) वो… doo..bara ऐसा.. नाहीइ होगा..

निश्छल- अच्छा. तो आप क्या चाहती हैं की मैं अब रोज यहाँ का विजिट करू कर ये देखने आऊं की आप समय पर पस आ रही हैं या नहीं. क्या आप ये चाहती हैं मिस जोशी.

सरिता- मेरा वो मतलब नहीं था.

निश्छल- एक बात और आपको बता देना चाहता हूँ की मैं आपका सीनियर अफसर हूँ और जब से मैं आपसे बात रहा हूँ तब से आपने मुझे एक बार भी सर कहकर सम्बोधित नहीं है तो क्या आप अपने सीनियर से ऐसे hi बात करती हैं. अगर आप ऐसे hi बात करती हैं तो उसके लिए भी आपको पनिशमेंट मिलेगी और अगर सर बोलती हैं तो मेरे पिछले सवाल का जवाब दीजिये मिस जोशी.

सरिता- मेरा वो मतलब नहीं था सर.

निश्छल- गुड गर्ल. आप ऑफिस लेट आयी हो. ये देखकर आपके जूनियर officers/officials भी ऑफिस लेट आने लगेंगे. जो मैं कभी होने नहीं दूंगा. आपने गलती की है. बहुत बड़ी गलती. जिसकी सजा आपको मिलेगी. बरोबर मिलेगी. ताकि फिर आप कभी भी पस लेट न आये.

सरिता निश्छल की लास्ट लाइन सुनकर खिसिया जाती है, लेकिन वो मजबूर थी इसलिए कुछ कर नहीं सकती थी. उसने निश्छल से कहा.

सरिता- सर ये मेरी पहली गलती थी. इसलिए मुझे माफ़ कर दीजिये और मुझे एक मौका और दे दीजिये. मैं आगे से कभी भी लेट नहीं होउंगी. वो मेरी बहन साथ आयी थी तो मुझे उसकी आदत हो गयी थी. वो चली गयी तो मुझे कोई जगाने वाला नहीं था. इसलिए मुझे उठने में देर हो गयी. आगे से ऐसा नहीं होगा.

निश्छल- तो आप क्या चाहती हैं की मैं अब आपके यहाँ रुकू और आपको ऑफिस आने के लिए रोज जगाऊँ.

सरिता निश्छल की बातो से खिसिया रही थी. जो निश्छल को भी पता थी लेकिन वो सरिता को परेशां कर रहा था. उस दिन के मार्किट वाले हादसे का बदला ले रहा था. निश्छल ने सरिता से कहा.

निश्छल- तुम सजा भुगतने के लिए तैयार हो न मिस जोशी.

सरिता- प्ल्ज़ सर मुझे दूसरा मौका दे दीजिये. मैं आगे से कभी लेट नहीं होउंगी.

निश्छल- तुमने मुझे बोलने का मौका दिया था क्या जो मुझसे दूसरा मौका मांग रही हो. वैसे सीनियर मैं हूँ या आप.

सरिता- सीनियर आप हैं सर.

निश्छल- तो आपको सजा देनी है या नहीं देनी है इसका डिसिशन कौन लेगा. आप या मैं.

सरिता- आप लेंगे सर.

निश्छल- तो ठीक है फिर. आपकी सजा ये है की आप मेरी दी के सामने मुझसे अपने कल की बदतमीज़ी के लिए माफ़ी मांगेंगी. और उनसे कहेंगी की आपने मुझ पर गलती से हाँथ उठा दिया. क्योंकि आप थोड़ी सनकी टाइप की लड़की हैं और आपको बात बात पर गुस्सा आ जाता है. वैसे भी उस दिन पूरी गलती आपकी hi थी.

सरिता निश्छल की बात सुनकर उसे गुर कर देखने लगी. और निश्छल से बोली.

सरिता- आप मुझसे ये सब क्यों करवाना चाहते हैं. मैं ये सब नहीं करुँगी सर.

निश्छल- मैं इसलिए तुमसे ये करवाना चाहता हूँ की जब से तुमने मुझे बिना बात के थप्पड़ मारा है. दी मुझे देख देख कर हंसती रहती हैं मुझे चिढ़ाती रहती हैं. बोलती हैं जिस निश्छल सिंह राठोड को देखकर अचे अचे गुंडों के पसीने छूट जाते हैं वो एक लड़की से मार खाकर आ गया. मुझे अपनी ये बेइज़्ज़ती बर्दास्त नहीं होती. लेकिन वो मेरी दी हैं. इसलिए मैं उन्हें कुछ कह नहीं पता हूँ. आप एक बार उनके सामने मुझसे माफ़ी मांग लेंगी तो वो मुझे परेशां नहीं करेंगी.

सरिता- जी बिलकुल नहीं सर. मैं ये कभी नहीं करुँगी. आप मुझसे अपनी पर्सनल दुश्मनी निकल रहे हैं.

निश्छल- सीनियर अफसर की बात न man-ne के लिए तुम्हे एक और सजा देता हूँ मैं की कल से एक महीने तक तुम लगातार 12 घंटे काम करोगी. तुमको काम के डरुअन एक मिनट भी आराम नहीं करना है. अगर मेरी बार नहीं मणि तो इससे भी कड़ी सजा मिलेगी तुम्हे.

सरिता- आपको जितनी भी सजा देनी है दे दीजिये. मुझे सब मंजूर है. मैं कल से एक महीने तक 12 घंटे काम करुँगी. लेकिन आप की पहली सजा को मैं कभी भी नहीं मानूंगी. मैं आपसे माफ़ी मांग रही हूँ की उस दिन मुझसे गलती हो गयी थी जो मैंने आपके ऊपर हाथ उठा दिया. इसलिए मुझे उस गलती के लिए माफ़ कर दीजिये. बाकि आपकी जो मर्जी हो वो करिये.

निश्छल- (थोड़ा गुस्से से)- मैं तुमसे इतने अचे से बात कर रहा हों और तुम अच्छे का फायदा उठा रही हो. अगर मेरी बात नहीं मानी तो इसका अंजाम बहुत बुरा होगा. तुम्हे पता है तुम मेरे अंदर में हो. मैं तुम्हारा रिकॉर्ड ख़राब कर दूंगा इस पस का. फिर देखता हूँ की तुम क्या करती हो.

निश्छल की धमकी भरी बात सुनकर सरिता को बही गुस्सा आ गया. उसे अपनी उस दिन की गलती का एह्साह था की उसने कुछ ज्यादा hi ओवर रियेक्ट किया. लेकिन निश्छल उस बात को पर्सनल इशू बना लेगा. उसे नहीं पता था. इसलिए निश्छल की बात sun-ne के बाद सरिता ने भी थोड़ा गुस्से से कहा.

सरिता- जो भी करना हो कर लीजियेगा सर. मैं भी देखती हूँ आप क्या करते हैं. लेकिन आप ये बात अपने दिमाग से निकल दीजिये की मैं आपकी पहली शर्त मानूंगी और किसी के सामने आपसे माफ़ी मांगूंगी.

अभी उन दोनों की बात चल hi रही थी की तभी रावत सर ने दरवाज़ा खटखटाया और बोले.

रावत- मैं अंदर आ जॉन सर.

निश्छल- अरे सर जी. आइये आइये.

निश्छल के कहने पर रावत सर अंदर आ जाते हैं. वो आते hi निश्छल से बोलते हैं.

रावत- सर ये वही अफसर है जिसने कुछ दिन पहले hi अफसर ज्वाइन किया है. बहु hi होनहार हैं ये सर.

निश्छल- आपसे मैंने कितनी बार कहा है की मुझे आप सर मत बोलै करिये. मैं आपसे उम्र में बहुत छोटा हूँ और आपके बेटे की उम्र का होऊंगा मैं. मुझे अच्छा नहीं लगता की आप मुझे सर बोले. किसी सीनियर अफसर के सामने ठीक है, लेकिन जब सीनियर नहीं हैं तो सर बोलने की जरूरत नहीं है. और इनसे तो मैं बहुत पहले hi मिल चूका हूँ.

रावत- अब क्या करे सर. आप भले hi मेरे बेटे की उम्र के हैं लेकिन आपको पोस्ट तो मुझसे बड़ी है न तो इसलिए आप तो मेरे सर hi रहेंगे.

निश्छल- वो सब मैं कुछ नहीं जनता. मैंने आपको कितनी बार कहा है या तो आप मेरा नाम लेकर बुलाया करिया या मुझे बीटा कहकर hi बुला लिया कीजिये. लेकिन ये सर कहकर मत बुलाया करिये. मुझे बिलकुल भी अच्छा नहीं लगता.

निश्छल सिंह की बात सुनकर रावत सर मुस्कुराने लगे और सरिता की तरफ देखकर बोले.

रावत- ठीक है. अब मैं तुम्हे बीटा hi कहूंगा. आपने अभी कुछ देर पहले कहा था की आप इनसे पहले भी मिल चुके हैं. क्या आप इनको पहले से hi जानते हैं क्या.

निश्छल- नहीं सर जी. पहले से तो नहीं जनता, लेकिन हाँ इनसे मेरी एक यादगार और धमाकेदार मुलाकात कुछ दिन पहले हो चुकी है. जो न मैं कभी भूल सकता हूँ और न मिस जोशी कभी भूल सकती हैं और ये कितनी होनहार हैं मुझे उसी दिन पता चल गया था. क्यों मिस जोशी सही कह रहा हूँ मैं न.

सरिता- जीई सर.

निश्छल- सर एक बात कहनी है आपसे. क्या आपको ऐसा नहीं लगता की मिस जोशी बहुत hi लापरवाह और सनकी किसम की हैं. मुझे तो ऐसा hi लगता है.

निश्छल की बात सुनकर सरिता को बहुत गुस्सा आ रहा था. उसका बस चलता तो वो निश्छल का मुंह नोच लेती, लेकिन वो मजबूर थी. रावत सर ने निश्छल की बात सुनकर कहा.

रावत- ऐसा नहीं है बीटा. वो क्या है न अभी अभी पोस्टिंग हुई है तो इसके लिए ये जगह बिलकुल भी नयी है. इसलिए अपने आपको एडजस्ट करने में इन्हे समय लग रहा है. काम करने का इतना अनुभव भी नहीं है. फिर भी मैं देख रहा हूँ की जब से आयी है तब से पूरी म्हणत से काम कर रही है. सिख रही है. बढ़ते समय के साथ सब कुछ सीख जाएगी ये.

निश्छल- सब कुछ सीखना जरूरी भी है. (सरिता से मुखातिब होते हुवे) तो मिस जोशी क्या आप सजा भुगतने के लिए तैयार हैं.

सरिता- hhhhhhhhhmmmmmmmmmmmm सिररर.

रावत- किस बात की सज़ा बीटा.

निश्छल- अआप ने देखा नहीं. ये पस कितनी देर से आयी है इसलिए सजा देना जरूरी ही नहीं तो डिसिप्लिन कैसे मेन्टेन होगा. क्यों मिस्स्स जोशी.

सरिता- जीईई सिर्र.

रावत- एक बात कहु बीटा. ये इसकी पहली गलती है. वो भी इतनी बड़ी गलती नहीं है. तो इसको छोड़ दो. एक मौका और दे दो. मुझे विश्वाश है की ये फिर से ऐसी गलती नहीं करेगी.

निश्छल- ठीक है सर जी. अब आप कह रहे हैं तो मैं एक मौका और दे देता हूँ इसको, लेकिन अगली बार अगर इसने ऐसी गलती की तो इसे सजा जरूर मिलेगी.

रावत- ठीक है बीटा अब मैं चलता हूँ.

इतना कहकर रावत सर सरिता के केबिन से बहार चले गए. उनके जाने के बाद निश्छल सिंह राठोड ने सरिता को देखते हुवे कहा.

निश्छल- मैं रावत सर के कहने पर इस बार तुम्हे माफ़ कर रहा हूँ, लेकिन ये बात याद रखना की ये माफ़ी मैं तुम्हे लेट आने पर मिलने वाली सजा की दे रहा हूँ. लेकिन तुमने मुझे जो बिना गलती के थप्पड़ मारा था उसके लिए मैंने तुम्हे अभी माफ़ नहीं किया है और न hi करूँगा. उसकी तुम्हे सजा मिलेगी. ये बात याद रखना. अब तुम भी अपना काम करो.

इतना कहकर निश्छल सरिता के केबिन से बहार निकल गया. सरिता निश्छल के जाते हुवे घूरकर देखती रही. निश्छल के जाने के बाद सरिता अपने मन में कहती है.

सरिता- क्या यार मैं किन चक्करो में पद गयी. मुझे थोड़ी hi पता था की ये सीओ है नहीं तो मैं इसके ऊपर हाँथ hi न उठती. पता नहीं ये मुसीबत मेरे सर से कब हटेगी. पता नहीं ये क्या करने वाला है मेरे साथ.

यही सब सोचते हुवे वो अपना काम करने लगी. काम करते हुवे सरिता को शाम हो गयी तो वो अपने कमरे पर वापस आ गयी. फिर उसकी दिनचर्या ऐसे hi चलने लगी. पस का काम करते हुवे सरित को लगभग 3 हफ्ते से ज्यादा का समय हो गया था. इस बिच वो रावत सर के परमिशन से फील्ड पर भी जाने लगी.

सरिता का किरदार और व्यक्तित्व ऐसा था की वो अपने काम की वजह से फेमस होने लगी. उसकी प्रसिद्धि की खबर जब कलुवा को मिली तो वो तिलमिला गया, क्योंकि मार्किट में तोड़फोड़ करते हुवे कलुवा के कुछ गुंडों को सरिता न अच्छा सबक सिखाया था.



इसके आगे की कहानी अगले भाग में..
 
अपडेट- 15

कलुवा, सहर का नामी गुंडा था. उसका मैं बॉस कौन था ये उसे नहीं पता था. बस वो बच्चा सिंह के कहने पर हफ्ता वसूली और हवाला का काम उस एरिया में करता था. कलुवा 40 साल का हत्ता कट्टा मर्द था. देखने में hi बड़ा डरावना था. लोग उसकी शकल और शरीर देखकर hi दर जाते थे. वो एकदम रौबदार बात करता था सामने वाले से, लेकिन था इसके बिलकुल उलट.

उसका शरीर hi हत्ता कट्टा था, वो दीखता hi डरावना था. लेकिन उसमे एक कमी ये थी की अगर उसके साथी उसके साथ नहीं रहते थे. मतलब अगर वो अकेले रहता था और उसे रात में कही जाने के लिए बोल दिया जाये तो दर के मरे उसकी शुशु निकल जाती थी. वो थोड़ा डरपोक किस्म का इंसान था. लेकिन कुछ खास साथियों को छोड़कर उसकी ये बात कोई नहीं जनता था.

तो जब उसने सरिता के बारे में सुना तो वो सरिता से कुछ डील करने के लिए सोचने लगा, क्योंकि जब से सरिता ने फील्ड का काम शुरू किया था कलुवा का वसूली का धंधा मंदा पड़ने लगा था. ऐसे hi एकदिन सरिता अपनी केबिन में बैठी काम कर रही थी. तभी कलुवा अपने तीन आदमियों के साथ पस आता है. पस आने के बाद उसने बड़े रोबदार आवाज़ में हवलदार से कहा.

कलुवा- सुन बे. हमका तोहरे इंस्पेक्टर माडंवा से मिलने का है. जा बोल दे उसको की कलुवा आया है.

कलुवा की रौबदार आवाज़ सुनकर हवलदार दर गया. क्योंकि कलुवा को पस में लगभग सभी जानते थे. उसके ऊपर बहुत से केस थे, लेकिन कोई सुबूत hi नहीं था. इसलिए उसे किसी ने अरेस्ट नहीं किया था और अरेस्ट करता भी कौन. अभी तक कोई दिलेर पोलिसवाले आया hi नहीं था इस ठाणे में. और अगर किसी ने उसे एक दो बार गलती से अरेस्ट कर भी लिया तो वो कुछ hi देर में छूट जाता था. इसलिए उसके कहने पर हवलदार सरिता के केबिन में चला गया और उसे बताया की कलुवा उससे मिलना चाहता है.

सरिता ने फाइल में कलुवा का नाम पढ़ा था, इसलिए उसने अंदाज़ा लगा लिया की ये कलुवा फाइल वाला hi इंसान है. सरिता ने उसे अंदर भेजने के लिए कहा. हवलदार ने कलुवा को अंदर जाने के लिए बोल दिया. कलुवा गेट के पास जाकर बिना पूछे अंदर चला गया और कुर्सी पर बैठ गया. ये देखकर सरिता का पारा हाई हो गया. उसने कलुवा को गुस्से से देखते हुवे कहा.

सरिता- ये क्या बदतमीज़ी है तुम्हारी. बिना पूछे मेरे केबिन में आ गए और बिना मेरी इज़ाज़त के तुमने बीअतने की हिम्मत कैसे की. तुम बहार जाओ और मुझसे परमिशन लेकर अंदर आओ और जब तक मैं न कहु तब तक बैठना भी मत.

कलुवा को सरिता की बात पर बहुत गुस्सा आया, लेकिन वो गुस्से को काबू करते हुवे कुर्सी से उठकर बहार चला गया, वो यहाँ पर काम बनाने आये था न की काम बिगड़ने. इसलिए वो कुछ नहीं बोलै. केबिन से बहार जाने के बाद कलुवा ने दरवाज़ा खोलकर सरिता से पुछा.

कलुवा- का हम अंदर आई सकीय थी.

सरिता- हाँ आ जाओ अंदर.

कलुवा अपने साथियो के साथ सरिता के केबिन में चला गया. सरिता अपनी फाइल देख रही थी तो कलुवा जाकर कुर्सी के पास खड़ा हो गया. सरिता ने हाँथ के इशारे से उसे बैठने के लिए कहा तो कलुवा बैठ गया. बैठने के कुछ देर बाद जब सरिता फाइल से फ्री हुई तो उसने कलुवा को देखते हुवे कहा.

सरिता- तो हाँ मिस्टर…

कलुवा- (बिच में hi) जी कलुवा, हमका कलुवा कहते हैं.

सरिता- हाँ तो मर. कलुवा. आपने यहाँ आने का कष्ट क्यों किया. कुछ काम था क्या.

कलुवा- ु का है मैडम. ाप्प इतना दिन से इस पस में हैं. ससुरा हमका ताऊ पता hi नहीं चला. और जैसे hi पता चला है भागते हुवे आ गए आपके पास. ु का है न मैडम. इस पस में जब कउनो नवा इंस्पेक्टर आता है तो हम उससे मिलाने जरूर जाता है. आखिर आप hi लोगन की छात्र छाया में तो रहना है हम लोगन के.

सरिता- तो यही कहने आये थे क्या आप.

कलुवा- अरे नहीं मैडम. इ ताऊ बात के शुरुआत रहे. असल बात तो इ है की जो भी नवा इंस्पेक्टर हिय आता है. हम ओकरा के प्रसाद चढाने आता है. हम आपके लिए भी प्रसाद लाया है. ो संभु जरा ू डब्बा तो देना.

कलुवा की बात सुनकर उसका एक साथी जिसका नाम संभु था उसने एक बॉक्स कलुवा को दे दिया. कलुवा ने उस बॉक्स को खोलकर सरिता के सामने रख दिया. उस बॉक्स में पैसे थे. जिसे देखकर सरिता ने कहा.

सरिता- ये सब क्या है कलुवा. तुम मुझे घूस देने की कोशिश कर रहे हो.

कलुवा- न मैडम जी ना. इ घुस न है. इ प्रसाद है. जिसे हम आपको चढ़ाने आया हूँ. अभी ये 2 लाख आप रखिये. हर महिनवा आपको 2 लाख रुपैया पंहुचा देंगे. हम सब मिल बात कर खावा करेंगे. बस आप हमारे कउनो काम में दखल न दे मैडम. नहीं तो आपकी तबीयतवो ख़राब होइ जाई.

सरिता- तुम्हारी इतनी हिम्मत की तुम मुझे मेरे hi पस में धमकी दे रहे हो.

कलुवा- इ धमकी न है मैडम. ये ताऊ हमारे सभी इंस्पेक्टर को समझने का अंदाज़ है. कउनो जल्दी समझ जाता है तो कउनो देर में समझता है. लेकिन समझता जरूर है मैडम.


सरिता- और जो नहीं समझता है वो.

कलुवा- ताऊ ू इस दुनिया को छोड़कर चला जाता है.


कलुवा की बात सुनकर सरिता को बहुत गुस्सा आता है और वो गुस्से से लाल पिली हो गयी और उसने अपनी कुर्सी से उठकर कलुवा को कालर पकड़ा और दो झन्नाटेदार थप्पड़ कलुवा को गलो पर रसीद कर दिया. सरिता चिल्लाते हुवे बोली.

सरिता- सेल. तेरी हिम्मत कैसी हुई मुझे धमकी देने की. मुझे घूस देने की कोशिश करता है तू. मैंने ये पुलिस की वर्दी तुम जैसे गुंडों मवालियो से हाँथ मिलाने के लिए नहीं पहनी है बल्कि तुम जैसो का हाथ पेअर तोड़ने के लिए पहनी है. अगर अपनी सलामती चाहता है तो तुरंत यहाँ से भाग ja.nahi तो ऐसा चार्ज लगाकर अंदर करुँगी की साडी जिंदगी जेल में सड़ता रहेगा. चल उठा अपना प्रसाद और दफा हो जा यहाँ से और दवा करना की मेरे साथ तेरा दोबारा सामना न हो. नहीं तो वो दिन तेरी आज़ादी का आखिरी दिन होगा. समझा.

कलुवा थप्पड़ खाकर अपने गाल पर हाथ रखकर सरिता को गुस्से से देखते हुवे कहा.

कलुवा- ऐ लौंडिया. तेरी इतनी हिम्मत की तू मुझपर हाँथ उठती है. कल की आई छोकरी कलुवा पर हाथ उठती है. तेरी तो मैं…….

सरिता- (बात बिच में काटकर) चुप बिलकुल चुप. तू समझता क्या है मुझे. ये वर्दी मैंने तुझ जैसे कुत्ते की गुलामी और तलवे चाटने के लिए नहीं पहनी है. वो कोई और रहे होंगे जो तेरे टुकड़ो पर पहलते रहे होंगे. लेकिन सरिता जोशी का जमीर इतना सस्ता नहीं है की तुझ जैसा दो टेक का गुंडा मावली उसे खरीद सके. अब तेरी भलाई इसी में है की तू जितनी जल्दी हो सके निकल ले यहाँ से. नहीं तो तुझपर ऐसे ऐसे चार्ज लगाकर अंदर डालूंगी की जिंदगी भर जेल में सड़ता रहेगा.

सरिता ने ये बात गुस्से में दन्त पिस्टे हुवे कही थी. जिसे देखकर कलुवा के साथ आये हुए उसके साथी दर गए. उन्होंने वह से खिसकने में hi अपनी भलाई समझी. वो सब कलुवा को सरिता के केबिन से खींचते हुवे बहार लेकर जाने लगे. कलुवा बहार जाते हुवे सरिता को धमकी देना नहीं भूला.

कलुवा- ऐ लौंडिया. तूने मुझपर हाँथ उठाकर अच्छा नहीं किया. तुझे इसकी बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी. याद रखना मैं तुझे छोडूंगा नहीं. तेरी ज़िन्दगी नर्क बना दूंगा. तुझे पता नहीं है की तुमने किससे पन्गा लिया है.

सरिता को धमकी देता हुवा कलुवा पस से बहार जाता रहा. पस में उपस्थित सभी जूनियर केबिन के अंदर से आती आवाज़ सुनकर समझ गए थे की केबिन के अंदर गहमा गहमी हो रही है. सरिता भी अपने केबिन के गेट पर आकर कड़ी हो गयी और कलुवा से बोली.

सरिता- तुझको जो उठाकड़ना होगा उखड लेना. मैं किसी के बाप से डर्टी नहीं हूँ. और अपने बाप से भी कह देना की उससे जो बन पड़े वो कर ले. लेकिन मेरे रहते तेरी ये गुंदगढ़री इस एरिया में चलने नहीं दूँगी. याद रखना.

इतना कहकर सरिता अपने केबिन में चली गयी और कलुवा अपनी बेइज़्ज़ती करवाकर पस से बहार चला गया. कुछ देर बाद रावत सर ने सयरता को अपने पास बुलाया और कहा.

रावत सर- ये सब क्या था सरिता बिटिया. तुम्हे नहीं पता की वो कितने खतरनाक गुंडे हैं. अभी तुम्हे ऑफिस ज्वाइन किया हुवे कितने दिन हुवे हैं और आते hi तुमने कलुवा से दुश्मनी मोल ले ली.

सरिता- तो आप ये कहना चाहते हैं की मुझे चुपचाप उसकी बात मन लेनी चाहिए थी और वो जो भी करता उसमे मुझे उसका साथ देना चाहिए था.

रावत सर- देखो सरिता तुम मेरी बेटी जैसी हो. इसलिए मैं तुम्हे कोई गलत सलाह नहीं दूंगा. मैं ये नहीं कह रहा हूँ की तुमको उसकी बात मन लेनी चाहिए थी या उसका साथ देना चाहिए था. मैं तो बस ये कह रहा था की वो बहुत खतरनाक लोग हैं. बिना उनके बारे में जाने तुम्हे उनसे दुश्मनी नहीं करनी चाहिए थी. मैं मंटा हूँ की तुम बहादुर हो. होशियार हो, लेकिन हमेशा बहादुरी hi काम नहीं देती बेटी. कभी कभी बहादुरी के साथ दिमाग भी लगाना पड़ता है. और अभी समय की मांग ये है की तुम्हे उससे दुश्मनी नहीं करनी चाहिए थी. आगे से तुम इस बात का ध्यान रखना.

सरिता- ठीक है सर. आगे से मैं सोचूंगी इस बारे में. लेकिन अगर किसी ने मुझे खरीदने की कोशिश की तो मैं उसे छोडूंगी नहीं.

इतना कहकर सरिता अपने केबिन में चली गयी और अपनी फिलो में व्यस्त हो गयी. शाम को पस से घर आ गयी. इसी तरह सरिता की दिनचर्या चलती रही. सरिता के काम और तेज़ तर्रार मिज़ाज़ के उसके जूनियर कायल हो चुके थे. धीरे धीरे करके 25 दिन का समय बिट गया कलुवा को पस में आये हुवे. सरिता ने फील्ड पर अपने कार्य करने की एक्टिविटीज तेज़ कर दी.

एक दिन किसी मुखबिर से सरिता को खबर मिली की कलुवा किसी बड़े बिज़नेस मन के साथ करोड़ो रुपयों की डील करने वाला है. ये खबर मिलते hi सरिता बिना सीनियर्स को बताये जावेद, मोहित, अमित और जान्हवी और 4-5 हवलदार को लेकर मुखबिर की बताई हुई जगह पर पहुंच गयी. वो जगह कुछ खंडहरनुमा थी. हवलदारों को बहार छोड़कर सरिता ने कमान संभाली और सभी ने अपनी गन में सीलेंसर लगाया और छुपते छुपाते मैं गेट पर पहुंच गयी.

मैं गेट पर दो गुंडे अपनी गन के साथ तैनात खड़े थे. सरिता सबसे आगे थी. उसीने मोहित को इशारा किया. मोहित ने तुरंत आगे आकर एक गुंडे पर गोली चला दी, गोली लगने से गुंडा जमीन पर गिर पड़ा. ये देखकर उसका साथी मोहित पर गोली चलने hi वाला था की सरिता ने दुसरे गुंडे को गोली मार दी और आगे बढ़ गयी. आगे बढ़ते हुवे उसकी नजर अमित पर पड़ी तो वो मोबाइल में कुछ कर रहा था. ये देखकर सरिता ने गुस्से से मगर धीमी आवाज़ में कहा.

सरिता- अमित. ये क्या कर रहे हो तुम. हम यहाँ दुश्मनो के इलाके में आये हैं और तुम मोबाइल चला रहे हो. तुम अपने साथ साथ सबको मरवाना चाहते हो क्या. चुपचाप अपना मोबाइल स्विचऑफ करो और मिशन पर ध्यान दो.

सरिता के ऐसा कहने पर अमित ने मोबाइल अपनी जेब में रख लिया और उनके साथ आगे बढ़ गया. कुछ आगे जाने के बाद दो और गुंडे एक दरवाज़े के पास खड़े पहरा दे रहे थे. जान्हवी ने एक को निशाना बनाकर गोली चला दी. जो सीधे उसके भेजे के पार हो गयी. लेकिन इस डरुअन उसका पेअर एक पत्थर से टकरा गया. जिसके कारन वो गिर पड़ी.

जब तक दूसरा गुंडा कोई हरकत करता. जावेद की गोली उसके सर को फोड़ते हुवे बहार निकल गयी. दोनों गुंडों के निचे गिरन्ते hi उसभी ने पोजीशन ली और जावेद ने एक जोर की लत दरवाज़े पर मरी. जिससे दरवाज़ा भड़ाम से खुल गया और पांचो दनदनाते हुवे अंदर घुस गए. अंदर किसी को कुछ समझ आता उससे पहले hi जावेद और मोहित ने अपनी गन कलुवा और उस बिजनेसमैन के एजेंट के सर पर तन दी. सरिता ने कलुवा से कहा.

सरिता- ख़बरदार. हिलने की कोशिश भी मत करना. नहीं तो भेजा उदा दूंगी तुम सबका. अपने आदमियों से कहो को हथियार दाल दे चुपचाप.

कमरे के अंदर दो हट्टे काटते आदमी हथियार लिए खड़े थे. कलुवा और वो एजेंट और एजेंट के साथ एक और आदमी बैठा हुवे था. कलुवा के इशारे पर दोनों आदमियों ने अपनी गन निचे जमीन पर रख दी. जिसे जान्हवी और अमित ने उठा लिया और दोनों आदमियों को अपने निशाने पर ले लिया. सरिता ने कलुवा के पास आकर उसे एक थप्पड़ खींचकर मारा और कहा.

सरिता- मैंने तुझसे उस दिन कहा था न की जब तक मैं हूँ. मैं तेरी कोई भी गुंडा गर्दी नहीं चलने दूँगी. अब तू चल अपनी ससुराल में और वही बैठ कर तुम दोनों हवाला का काम करना. तुम दोनों को तो ऐसी सजा दिलवाऊंगी की तुम भी क्या याद रखोगे की किससे पला पड़ा था.

कलुवा- (गुस्से से). ऐ लौंडिया……

सरिता- सरिता. सरिता जोशी नाम है मेरे. और बहुत जल्द ये नाम तेरे नस नस में बस जायेगा, क्योंकि मैं तेरी ऐसी खातिरदारी करुँगी की तू उठाते बैठते मेरा hi नाम लेगा.

कलुवा- तू मुझे जानती न है लड़की. मैं कौन हूँ. और मेरी पहुंच कहा तक है तुझे अंदाज़ा भी नहीं है. हम खड़े खड़े तेरी वर्दी उतरवा सकता हूँ.

सरिता- आवाज़ निचे. तू कौन है बे. कोई टॉप है तू. सेल गन्दी नाली के कीड़े. तू एक सड़कछाप गुंडा है जो अपने कुत्तों के डैम पर उछलता है. अब चुपचाप अपनी ससुराल चल. अगर ज्यादा छू चपड़ की न तो यही थोक दूँगी तुझे मैं. और कोई मेरा कुछ भी नहीं बिगड़ पायेगा. मामला फायरिंग का दिखाकर फाइल बंद कर दूंगी मैं. समझा. इसलिए तेरी भलाई इसी में है की तू चुपचाप मेरे साथ चल और निचे वैन में बैठ जा. मुझे कानून अपने हाँथ में लेने पर विवश मत कर.

सरिता की बात सुनकर कलुवा के मन में भय आ गया और वो. उसके आदमी और एजेंट और उसके साथ का आदमी जाकर बहार कड़ी वैन में बैठ गए. सारतीता ने कलुवा को लेजाकर लॉकअप में पटक दिया. कलुवा सरिता को धमकी देते हुवे बोलै.

कलुवा- ऐ लौंडिया. तू ज्यादा दिन मुझे इस lock-up में नहीं रख पायेगी. बहुत जल्द मैं यहाँ से छूट जाऊंगा फिर देखना मैं तेरा क्या हाल करता हूँ.

सरिता- चुप कर कुत्ते. मैं भी देखती हूँ की तू कैसे chhut-ta है. अगर छूट भी जाता है तो उसके पहले तेरी इतनी खातिरदारी करुँगी की तुझे अपने पैदा होने पर अफ़सोस होगा. अभी मुझे ये भी तो jan-na है की तेरा बाप कौन है.

कलुवा- वो तू कभी नहीं जान पायेगी. और मेरा बाप तुझे छोड़ेगा नहीं.

कलुवा के इतना कहने के बाद सरिता के इशारे पर मोहित और जावेद लॉकअप में चले गए और उसकी खातिरदारी करने लगे. बहुत मार खाने के बाद भी कलुवा ने अपना मुंह नहीं खोला.



इसके आगे की कहानी अगले भाग में..
 
धन्यवाद आपका महोदय।।

निश्चल ने उससे किसलिए ऐसे बात की वो आपको आगे आने वाले भागों में पता चल जाएगा।

वैसे आपने बिल्कुल सही कहा कि एक वरिष्ठ अधिकारी होने के नाते निश्चल का सरिता के साथ बातचीत करने का तरीका बहुत ही साधारण था।।

अभी नई नई नौकरी लगी है वो भी पुलिस की तो ऐसा जोश आना स्वाभाविक भी है, लेकिन जैसे जैसे समय बीतता जाएगा उसके अंदर थोड़ी बहुत समझ आती जाएगी।

कलुवा से दुश्मनी लेकर उसने मगरमच्छ के मुंह में हाथ डाला है जो उसे बहुत भारी पड़ने वाला है।।

सरिता के प्रशिक्षण के संबंध में विस्तार से नहीं लिखा है मैंने, बस एक लाइन में लिख दिया है कि प्रशिक्षण के बाद वो नौकरी करने जा रही है।

दोनों का सामना बहुत जल्द होगा और फिर से सहित युद्ध होगा दोनों में।।

साथ बने रहिए।।
 
अपडेट- 16

कलुवा- वो तू कभी नहीं जान पायेगी. और मेरा बाप तुझे छोड़ेगा नहीं.

कलुवा के इतना कहने के बाद सरिता के इशारे पर मोहित और जावेद लॉकअप में चले गए और उसकी खातिरदारी करने लगे. बहुत मार खाने के बाद भी कलुवा ने अपना मुंह नहीं खोला.


****************

उसी समय वही थोड़ी दूर एक खंडहर में बच्चा सिंह, उम्र 35-36 के करीब थी. एक रिवॉल्विंग चेयर पर बैठा हुवा था. शरीर से एकदम हत्ता कट्टा इंसान था बच्चा सिंह. वही पास में उसके आदमी बैठे हुवे पैसा गईं रहे थे. बच्चा सिंह ने अपने आदमियों में से एक से कहा.

बच्चा सिंह- क्यों बे रखा. कितना कलेक्शन हुवा है आज का.

रखा- 10 लाख रस. हुवे हैं माई बाप.

बच्चा सिंह गुस्से से कुर्सी से उठ खड़ा हुवा और बोलै.

बच्चा सिंह- क्या बोलता है बे. सिर्फ 10 लाख. सैलून दिन भर में 50 लाख से ज्यादा कलेक्शन होता है और तुम बोल रहे हो की 10 लाख hi हुए हैं. मैं पिछले कुछ दिनों से देख रहा हूँ की कलेक्शन में रोज कमी आती जा रही है. तुम सब निठल्ले हो गए हो या तुम लोग मेरे साथ धोखा कर रहे हो.

रखा- नहीं माई बाप. आपके साथ धोखा करके हमें मरना थोड़ी है. कलेक्शन काम होने का कारन वो इंस्पेक्टर है जो नवा नवा इस ठाणे में आया है.

बच्चा सिंह- (हँसते हुवे) का बोलै बे. एक अदने से इंस्पेक्टर को वजह से कलेक्शन काम हो गया है. तूने आज दिन में भी चढ़ा राखी है क्या.

रखा- नहीं माई बाप. वो इस्पेक्टर बहुत खतरनाक है. जब से आई है उसने हमारी नाक में डैम करके रखा हुवा है. बहुत कड़क इंस्पेक्टर है वो.

बच्चा सिंह- का बोलै बे तुमने. आई है.

रखा- हाँ माई बाप. वो इंस्पेक्टर एक औरत है. जिसे हमारी नाक में डैम कर रखा है.

बच्चा सिंह- का बोलै बे. औरत है वो. सालो तुम लोगो ने बचा सिंह का नाम मिटटी में मिला दियो. एक औरत से दर गए. थू है तुम लोगन पर. साला मैं तुम लोगो को फालतू में पाल रहा हूँ. एक औरत से डरकर कलेक्शन काम कर दिया तुम सब ने. कलुवा कहाँ है. उसे बोलो की उस इंस्पेक्टर को उसका परसादी पंहुचा दे.

रखा- कलुवा बॉस गया था माई बाप, लेकिंन………..

बच्चा सिंह- लेकिन क्या.. तेरी जुबान तालु में अटक गयी है क्या जो बोल नहीं निकल रहे हैं.

रखा- कलुवा गया था उस इंस्पेक्टर को उसकी परसादी देने. लेकिन उसने कलुवा बॉस को hi परसादी दे कर ठाणे से निकल दिया. बहुत इंसल्ट किया उसने कलुवा बॉस का. थापड़ भी मारा उसने बॉस को. वो बहुत hi तेज़ तर्रार है माई बाप. सीधे केस बनाकर जेल में डालने की धमकी देती है.

बच्चा- क्या. और ये तुम मुझे अब बता रहे हो निकम्मो. लगता है उस इंस्पेक्टर से मिलना hi पड़ेगा. तुम सब सेल एक औरत से डरते हो. हम तो पुलिस को अपनी जेब में लेकर घुमते हैं तो ये तो एक औरत है. इसे तो मैं चुटकियो में मसल दूंगा अगर ज्यादा छू चपड़ की उसने तो. मीटिंग फिक्स करवाओ उससे मेरी.

अभी बच्चा सिंह ने इतना hi कहा था की उसका फ़ोन बजने लगा. उसने सबको चुप रहने का इशारा किया और फ़ोन उठा लिया.

(नोट- बच्चा और उसका भाई रघु इस पूरे एरिया को सँभालते हैं. इन दोनों के ऊपर 2 बॉस हैं इनके. जिनको इन दोनों के आलावा आज तक किसी ने देखा नहीं था उन दोनों से बात करने के बाद रघु और बच्चा सिंह को जो दिशा निदेश मिलते रहते थे ये उसी निदेश पर अपना काम करते रहते हैं. सबसे बड़े बॉस को ये लोग सर्कार कहते हैं और उससे निचे वाले को बॉस बोलते हैं. तो मैं भी एक को सर्कार और एक को बॉस कहकर hi सम्बोधित करुँगी.)

बच्चा सिंह- नमस्ते बॉस.

बॉस- नमस्ते को मार गोली. तुम सब ये कर क्या रहे हो. तुम लोग एकदम निकम्मे हो गए हो क्या. तुम्हे पता भी है, कलुवा को आज वो कल की आयी लौंडिया ने पकड़कर जेल में दाल दिया है और उसकी अचे से खातिरदारी कर रही है. मुझे लगता है की तुम लोग अब किसी काम के नहीं रह गए हो.

बच्चा सिंह- क्या. कलुवा को उस इंस्पेक्टर ने पकड़ लिया. कब, कहाँ, कैसे, मुझे तो पता hi नहीं है इसके बारे में बॉस.

बॉस- इसीलिए तो कह रहा हूँ की तुम सब किसी काम के नहीं रह गए हो. तुम्हे अपने साथी के बारे में कोई जानकारी नहीं है. अगर सर्कार को पता चला तो वो कितने नाराज़ हो जायेंगे. ये तो तुम्हे पता hi होगा. पिछली बार रघु के पकडे जाने पर वो कितना नाराज हो गए थे. वो अलग बात है की रघु कुछ hi घंटो में छूट गया था. तुम जल्दी से कलुवा को छुड़वाने के इंतेज़ाम करो सर्कार को पता होने से पहले hi. और जितनी जल्दी हो सके उस इंस्पेक्टर का कुछ सोचो. नहीं तो हाँथ में कटोरा लेकर भीख मांगनी पड़ेगी तुम लोगो को.

बच्चा सिंह- ठीक है बॉस मैं कुछ करता हूँ. आप चिंता मत करिये. और अगर सर्कार का फ़ोन आये तो आप उन्हें संभल लेना.

इतना कहकर बच्चा सींघ ने फ़ोन रख दिया. फ़ोन रखते hi रखा ने उससे पुछा.

रखा- क्या हुवा माई बाप. आप बहुत टेंशन में लग रहे हैं.

बच्चा सिंह- कलुवा को उस इंस्पेक्टर ने पकड़ लिया है. बॉस बहुत नाराज़ हो रहे हैं. सर्कार को पता चलेगा तो पता नहीं क्या होगा.

रखा- अब क्या करेंगे हम लोग माई बाप.

बच्चा सिंह- तुम लोगो से कुछ नहीं होगा. अब जो भी करूँगा मैं hi करूँगा वो भी रघु के आने से पहले. तुम्हे तो पता है की वो बहार गया है कुछ काम से. अगर वो यहाँ पर आ गया तो बहुत बवाल मचाएगा. उसकी नाक पर गुस्सा जो रहता है हमेशा. लगता है एक बार उस इंस्पेक्टर से मिलना hi पड़ेगा. अभी सब यहाँ से अपने अपने घर के लिए निकल जाओ बाद में मिलता हूँ मैं.

उसके बाद सब अपने अपने घर को निकल गए. आज का दिन ऐसे hi बीत गया. Do-teen दिन तक कलुवा को छुड़ाने का बहुत प्रयत्न किया बच्चा सिंह ने लेकिन सरिता ने उसे नहीं छोड़ा. आख़िरकार सर्कार ने अपनी पोलिटिकल पावर का इस्तेमाल करके कलुवा को छुड़वा hi लिया

*******

इस मामले में सीओ निस्चल सिंह राठोड को भी अपने सीनियर अफसर की दन्त sun-ne को मिली. क्योंकि सरिता ने ये सब बिना उसकी परमिशन के किया था और सरिता उसी के अंदर में थी.

एक सुबह सरिता अपने केबिन में बैठी फाइल में अपना सर खपा रही थी तभी सीओ निस्चल सिंह राठोड सरिता के केबिन में आये. सरिता ने अपनी कुर्सी से उठकर निस्चल को सलूट किया. निस्चल सिंह राठोड ने उसके सलूट का जवाब दिए बिना गुस्से में उससे कहा.

निस्चल- तुम समझती क्या हो अपने आपको. तुम्हारा जो मन करेगा तुम वो करोगी. ये तुम्हारा गांव नहीं है की जो मन में आये वो करो समझी तुम.

सरिता- सर. आप मुझसे ऐसे कैसे बात कर सकते हैं. मैंने ऐसा क्या कर दिया जो आप बिना मतलब मुझे दन्त रहे हैं.

निस्चल- क्या किया तुमने. किसकी परमिशन से तुमने वह पर राइड डाली और कलुवा को पकड़ा था. चलो ये भी ठीक है की तुमने उसे पकड़ा. लेकिन तुमने एक बार भी मुझे बताना जरूरी नहीं समझा. मैं तुम्हारा बॉस हूँ तुम मेरी नहीं. तो तुम्हे मुझे बताना चाहिए था.

सरिता- लेकिन मैंने कोई गलत काम नहीं किया. हाँ ये सही है की मैंने आपसे परमिशन लेना जरूरी नहीं समझा, लेकिन उस समय सेतुएशन ऐसी थी की अगर मैं परमिशन का वेट करती तो कलुवा और उसके साथी अपना काम करके जा चुके होते. फिर उस परमिशन का कोई मतलब नहीं निकलता. लेकिन मुझे ये समझ नहीं आता की आप मेरी तारीफ करने के बजाय मुझे सुना रहे हैं.

निस्चल- सुनौ नहीं तो और क्या करू मैं. तुम्हारे इस कारनामे से मुझे अपने ाला अधिकारियो की दन्त sun-ni पड़ी. की मैं अपने जूनियर को कण्ट्रोल नहीं कर सकता. तुमने कोई गलत काम नहीं किया, क्योंकि अपराधियों को पकड़ना और उन पर कण्ट्रोल करना hi हमारा फ़र्ज़ है. तुमने परमिशन नहीं ली थी तो काम से काम एक बार मुझे बताना था तुम्हे इस बारे मैं. मैं तुम्हारा बॉस हूँ तो मुझे हर बात की जानकारी होनी चाहिए. तुम ऐसे किसी काम में अपनी मनमानी नहीं कर सकती हो.

सरिता- मैं इस बारे में आपको बताना जरूरी नहीं समझा. और आगे भी अगर मुझे कुछ गलत लगा तो उसके खिलाफ मैं एक्शन लेने में कोई कोताही नहीं बरतूँगी.

निस्चल- जरूरी नहीं समझा से क्या मतलब है तुम्हारा. तुम्हारी वजह से मुझे बहुत sun-na पड़ा है ाला अधिकारियो से. इसका बदला मैं तुमसे लेकर रहूँगा. अब तो तुमसे मेरी दूसरी बार दुश्मनी हो गयी है. सावधान रहना तुम. मेरी नजर हमेशा तुमपर hi रहेगी. तुम्हे अपनी गलतियों के लिए सजा जरूर मिलेगी और वो सजा मैं खुद तुम्हे दूंगा.

सरिता- आपको जो करना हो कर लीजियेगा. लेकिन मैं अपना फ़र्ज़ निभाने के लिए आपके सामने नहीं झुकूँगी.

निस्चल ये बात सुनकर दन्त पिस्ता रह गया और सरिता के केबिन से बहार आ गया और ठाणे से बहार निकल गया.

निस्चल के जाने के कुछ देर बाद hi बच्चा सिंह पस में आया और उसने सरिता से मिलने के लिए हवलदार से अनुमति मांगी. क्योंकि बच्चा सिंह के सारा काम कलुवा hi करता था. इसलिए बच्चा सिंह को ज्यादा कोई पोलिसवाले जनता नहीं था. हवलदार ने उससे पुछा.

हवलदार- क्या काम है आपको मैडम से.

बच्चा- मुझे एक बहुत जरूरी सुचना मैडम को देनी है.

हवलदार ने ये सुनकर बच्चा को सरिता के केबिन की तरफ इशारा कर दिया. बच्चा सरिता की केबिन के पास पहुंचकर दरवाज़ा खोला और कहा.

बच्चा- क्या मैं अंदर आ सकता हूँ मैडम.

सरिता- एस के इन.

सरिता की बात सुनकर बचा केबिन के अंदर आ गया और बोलै.

बच्चा- नमस्ते मैडम.

सरिता- नमस्ते. बैठिये. कुछ काम था आपको.

बच्चा- जी मेरा नाम बच्चा सिंह है. आपके बारे में बहुत सुना है मैंने. आप अपना काम बहुत ईमानदारी से कर रही है. बहुत चर्चे हैं आपके.

सरिता- अगर आपको यही सब कहना है तो आप जा सकते हैं. मुझे अपनी तारीफ sun-ne में कोई इंट्रेस्ट नहीं है. अगर आप को मुझसे कुछ मदद चाहिए तो आप बोलिये. नहीं तो आप जाइये मुझे बहुत से काम पूरे करने हैं जो पेंडिंग में हैं.

बच्चा सिंह- (लम्बी साँस लेकर) ठीक है मैडम जब आप कह रही हैं तो मैं मुद्दे पर आता हूँ. वो क्या है न मैडम. जब से आप आई हैं आपके कारनामे बहुत सुने हैं मैंने तो मैंने सोचा की आपसे थोड़ी जान पहचान बढ़ा ली जाये. और वैसे भी इस कुर्सी से मुझे बहुत प्यार है. आखिर इस कुर्सी पर बैठने वाला अपना बहुत ख़ास हो जाता है. इस कुर्सी पर बैठने वाले के साथ अपना गहरा याराना हो जाता है. बस वही यारी निभाने के लिए मैं यहाँ आया हूँ.

सरिता- मतलब क्या है तुम्हारा साफ़ साफ़ कहो.

बच्चा सिंह ने सरिता की बात सुनकर हजार हजार की दो गद्दी निकलकर सरिता के सामने रख दी और बोलै.

बच्चा सिंह- वो क्या है न मैडम. मेरा काम hi ऐसा है की पुलिस वालों को साथ में मिलकर चलना पड़ता है. तो मैं ये चाहता हूँ की आप मेरे काम के बिच में दखल न दिया कीजिये. जिसकी कीमत आपको हमेशा मिलती रहेगी.

सरिता एक तो निस्चल की बातो से पहले से hi थोड़ा गुस्से में थी. बच्चा सिंह की बात सुनकर उसके गुस्से का पारा सातवे आसमान पर पहुंच गया. उसने गुस्से से चिल्लाते हुवे कहा.

सरिता- अपने पैसे उठाओ और दफा हो जाओ यहाँ से अभी के अभी.

बछ्ह- अरे मैडम आप तो हमसे नाराज़ हो गयी. हम यहाँ आपको नाराज करने थोड़ी hi आये हैं. हम तो आपके साथ दोस्ती करना चाहते हैं. आखिर चोर चोर मौसेरा भाई होता हैं. लेकिन आप औरत हैं तो आप भाई की जगह मेरी बहन बन जाना. मैं खली हाँथ थोड़ी hi आपसे दोस्ती करने के लिए आया हूँ. मैं अपनी दोस्ती की शुरुआत आपको तोहफा देखर करना चाहता हूँ. ये तो एक नंगी है. असली तोहफा तो अभी बाकि है. मुझे उम्मीद है की मेरा तोहफा देखने के बाद आप इंकार नहीं कर पाएंगी.

इतना कहकर बच्चा सिंह हे हजार हजार के नोटों की 2 गद्दी और एक पार्सल जिसमे सोने के बिस्किट्स थे, निकल कर सरिता के टेबल पर रख दी. पैसा और सोना देखकर सरिता का पारा और चढ़ गया और वो नोटों की गद्दी उठाकर बच्चा सिंह के मुंह पर मर कर फुफकारते हुवे बोली.

सरिता- कमीने मुझे खरीदने की कोशिश करता है. सरिता जोशी का इमां इतना सस्ता नहीं है की चाँद नोटों की गद्दी देखखर बिक जाये. तू दफा हो जा यहाँ से नहीं तो रिश्वत देने के जुर्म में तुझे अंदर कर दूँगी. कौसल. जान्हवी. कहा हो तुम दोनों.

सरिता की आवाज़ सुनकर कौशल और जान्हवी. सरिता के केबिन में पहुंच गए और वह बच्चा को पैसा और विजिट्स जमीन से उठाते देखकर वो समझ गए की क्या माजरा हैं. कौसल ने कहा.

कौशल- जी मैडम आपने बुलाया मुझे.

सरिता- इसे अभी के अभी बहार का रास्ता दिखा दो और इसे बोल दो की ये मेरे पस में दोबारा नहीं दिखना चाहिए.

सरिता की बात सुनकर कौशल बच्चा सिंह की बांह पकड़कर उसे सरिता के केबिन से बहार ले जाता है. उसके जाने के बाद सरिता जान्हवी से कहती है.

सरिता- पता नहीं कहाँ कहाँ से चले आते हैं. इन्हे लगता है की मैं सर्कार के लिए काम नहीं कर रही हूँ बल्कि इनके लिए काम कर रही हूँ. जब मन में आये मुंह उठाकर चले आते हैं. अगली बार से किसी को भी अंदर भेजने से पहले पूरी जाँच पड़ताल करने के बाद hi उसे मेरे पास भेजना.

जान्हवी- सॉरी मैडम. आगे से इस बात का ध्यान रखूंगी मैं. उसने तो हवलदार से आपसे मिलने के लिए पूछा था तो हमें लगा की आपका कोई जानने वाला होगा. इसलिए हमने उसे अंदर आने दिया. आगे से पूरी जाँच पड़ताल करने के बाद hi आपके पास भेजूंगी.

सरिता- ठीक है जान्हवी. अब तुम भी जाकर अपना काम करो.

जान्हवी- ठीक है मैडम. अगर आपको चाय पीना हो तो मैं आपके लिए चाय भिजवाओ मैडम.

सरिता- ठीक है जान्हवी.

सरिता की बात सुनकर जान्हवी उसके केबिन से बहार आ गयी और हवाल दर से सरिता को चाय देने के लिए बोल दिया. थोड़ी देर में हवलदार सरिता को चाय देकर बहार आ गया.

********

पस से निकल कर बच्चा सिंह अपने अड्डे पर पंहुचा. वह पर रखा और उसके कुछ साथी पहले से hi मौजूद थे. बच्चा के जाते hi सभी ने उसे सलाम ठोका. बच्चा अपनी कुर्सी पर बैठ गया और रखा को अपने पास बुलाया और कहा.

बच्चा. तुम सही कहते थे. वो तो साली बड़ा करंट मरती है. बहुत तेज़ तर्रार है वो तो. 2 लाख और सोना देखकर भी नहीं पिघली वो. मुझे जेल में डालने की धमकी भी दे दी उसने. बड़ी कटीली लौंडिया है बे वो तो. लेकिन उसे नहीं पता की उसने किससे पन्गा लिया है. बच्चा सिंह से. बच्चा सिंह से पन्गा लेने के बाद आज तक किसी का भला हुवा है जो उसका होगा. बहुत महंगा पड़ेगा उसे बच्चा सिंह से दुश्मनी मोल लेना.

रखा- वो तो ठीक है सही है माई बाप. लेकिन अब आगे क्या करना है हमें.

बच्चा- अभी तुम लोगो को कुछ नहीं करना है. मेरी मनो तो कुछ दिन तक कही छुप जाओ और ये काम कुछ दिन के लिए रोक दो. वो साली दिमाग से सत्की हुई है कुछ भी कर सकती है. मैं बाद में बताऊंगा तुम लोगो को की क्या करना है. और वो लौंडिया लोगो की बहुत मददगार बन रही है. बहुत सौक है उसे ईमानदारी से नौकरी करने का. उसकी नौकरी उसकी ईमानदारी hi लेगी.

मैं कोई ऐसा चक्कर चलाऊंगा की वो छटपटाती रह जाएगी, लोगो को अपनी ईमानदारी का एहसास करवाती रहेगी, लेकिन उसकी बात पर कोई भरोषा नहीं करेगा. मुझसे दुश्मनी लेती है. बहुत उछाल रही है वो अपनी वर्दी के डैम पर तो अब उसकी वो वर्दी अब मैं hi उतरवाउंगा. फिर देखता हूँ की कितना उछलती है. और सुनो तुम सब. इस बारे में रघु को बिलकुल भी पता नहीं चलना चाहिए.

रखा- क्यों माई बाप. उन्हें भी तो इस बात की जानकारी होना बहुत जरूरी है.

बच्चा- तुम समझ नहीं रहे हो. अगर उसे ये बात पता चल गयी तो वो अपना कामधाम छोड़कर कल hi यहाँ वापस आ जायेगा. और तुम तो उसको जानते hi हो. बात काम करता है और मरता ज्यादा है. पता लगा जो मामला आसानी से सुलझ सकता है वो यहाँ आकर इस लौंडिया को लुढ़का दिया तो बिना मतलब बखेड़ा खड़ा हो जायेगा. मैं अपने तरीके से मामले को सुलझाऊंगा.

रखा- वो तो ठीक है लेकिन बाद में उन्हें पता चला तो वो गुस्सा हो जायेंगे.

बच्चा- उसे मैं बाद में अपने तरीके से हैंडल कर लूंगा. पहले इस लौंडिया का कोई बंदोबस्त तो कर दूँ. इस मामले में मार्केट की जरूरत नहीं है. चलो अब तुम सब निकालो यहाँ से. कुछ दिन सब चुपचाप बैठ जाओ. जैसा भी होगा मैं बताऊंगा तुम सब को.

इसके बाद सभी वह से अपने अपने घर को चले गए.



इसके आगे की कहानी अगले भाग में..
 
🙏👋👏🙏👋👏

ऐसा भी हो सकता है जो आप कह रहे हैं वो सही हो और ऐसा भी हो सकता है कि वो कोई बहुत पहुची हुई हस्ती हो जिसके आगे पुलिस भी बेबस है।।

आपका ये सवाल भी जायज है, लेकिन निश्चल इस कहानी में अभी आया है तो उसने क्या किया है वो पता नहीं। हो सकता है उसने कुछ कदम उठाएं हो उसके खिलाफ, लेकिन अपने वरिष्ठ अधिकारियों के दबाव के कारण वो चुप बैठ गया हो।।🤔🤔

अभी सरिता जोश में है इसलिए ऐसी मूर्खता कर रही है। धीरे धीरे उसे सब समझ में आ जाएगा।।

अब ये तो आगे आने वाले भागों में पता चलेगा कि रघु कौन है। उसका राज क्या है।🤔

धन्यवाद आपका महोदय।

साथ बने रहिए।।
 
अपडेट- 17

ये अलग बात है की कौवा को सर्कार ने अपनी पावर का इस्तेमाल करके छुड़ा लिया था, लेकिन कलुवा को पकड़ने और ईमानदारी से काम करने के कारन सरिता की पॉपुलैरिटी बहुत बढ़ गयी थी. लोगो को एक उम्मीद जग गयी थी की कोई अफसर तो ऐसा है जो ईमानदारी से काम कर रहा है और उनकी समस्याओं को सुलझा रहा है.

इसी पॉपुलैरिटी के चलते एक न्यूज़ चैनल ने अपने एक खास प्रोग्रमम हौंसलो की उड़न के लिए सरिता का इंटरव्यू लेना चाहते थे. लेकिन सरिता ने ये कहकर इंटरव्यू देने से मन कर दिया की उसे ये सब करके कोई सेलिब्रिटी नहीं ban-na. उसे बस ईमानदारी से अपना काम करना है.

उसको जो जिम्मेदारी सौपी गयी है उसे पूरी निष्ठां और पूरे हौंसले के साथ निभाना है. बहुत मिन्नतें करने के बाद सरिता इंटरव्यू देने के लिए मान गयी, लेकिन उसके लिए उसने अपनी मर्जी से टाइम फिक्स करने के लिए कहा.

इसी तरह दिन beet-te रहे. लगभग 10 दिन बाद हो गए थे इस बच्चा सिंह वाले मटर को. एक दिन वो अपने केबिन में बैठकर काम कर रही थी. तभी रावत सर ने उसे अपने पास आने के लिए कहा. सरिता रावत सर के पास चली गयी और उनसे कहा.

सरिता- क्या बात है सर. आपने मुझे बुलाया.

रावत सर ने सरिता के हाँथ में एक पेपर पकड़ते हुवे कहा.

रावत सर- इसे देखो खुद समझ जाओगी की मैंने तुम्हे क्यों बुलाया है.

सरिता रावत सर के हाँथ से वो पेपर लेकर पढ़ने लगी. जैसे जैसे वो पेपर पढ़ती जा रही थी वैसे वैसे उसके चेहरे के भाव बदलते जा रहे थे. सरिता ने पूरा पेपर पढ़ने के बाद रावत सर की तरफ देखते हुवे कहा.

सरिता- ये सब क्या है सर. आपको लगता है की मैं ऐसा कुछ कर सकती हूँ. मैंने कुछ नहीं किया सर. ये किसी ने मेरे खिलाफ गलत अफवाह फ़ैलाने के लिए ऐसा किया है. आप तो मुझे जानते हैं सर. क्या आपक्को लगता है की मैं ऐसा कुछ कर रही हूँ.

रावत- मुझे पता है की तुमने कुछ नहीं किया है. मुझे तुम्हारी ईमानदारी पर पूरा भरोषा है, इसीलिए तो मैंने तुम्हे खुद बुलाकर ये पेपर तुम्हे दिखाया है. अगर ये निस्चल के पास पहुंच गया तो तुम्हारे लिए बहुत समस्या हो सकती है. क्योंकि वो पहले से hi तुमसे किसी बात के लिए नाराज़ चल रहा है.

वो बुरा लड़का नहीं है, लेकिन ड्यूटी के प्रति वो कोई भी लापरवाही बर्दास्त नहीं करता. इसलिए तुम्हे अब पहले से भी ज्यादा सतर्क रहना पड़ेगा और बहुत hi सावधानी से काम करना होगा. तुम्हारी एक गलती तुम्हे इस केस में फंसा सकती है बेटी.

सरिता- ठीक है सर. मैं आगे से बहुत सतर्कता के साथ काम करुँगी.

ये कहकर वो अपने केबिन में आ गयी और अभी जो कुछ भी उसके खिलाफ कम्प्लेन आई थी उसी के बारे में सोचने लगी.

सरिता- (मन में) मैं तो इतनी ईमानदारी से अपनी नौकरी कर रही हूँ. मैंने आज तक किसी से एक पैसा नहीं लिया है तो ये कौन हो सकता है जिसने मेरे खिलाफ ये कम्प्लेन की है. आखिर मैंने किसी का क्या बिगाड़ा है. हद है यार. ईमानदारी से नौकरी करना भी कठिन हो तजा रहा है.

अभी सरिता ये सोच hi रही थी की तभी जावद अख्तर एक केस के सिलसिले में कुछ बात करने उसके पास आ गया. जिसके बाद उसका पूरा दिन इसी में गुझर गया. शाम को वो अपने घर आ गयी. इसी तरह दो दिन और बीत गए.

तीसरे दिन किसी केस में उलझी होने के कारन सरिता को पस से घर जाने के देर हो गयी. तक़रीबन रात के 8 बज गए थे. पस से निकलने के बाद वो अपनी सरकारी गाड़ी से घर जा रही थी. क्योंकि सरिता को कार ड्राइव करना आता था इसलिए वो खुद कार ड्राइव कर रही थी.

अभी वो पस से थोड़ी hi दूर गयी थी की एक बुढ़िया अचानक बिच सड़क पर आ गयी और उसकी गाड़ी से टकरा गयी. सरिता न सही समय पर ब्रेक मर दी थी जिसकी वजह से टक्कट ज्यादा जोर की नहीं लगी थी. सरिता तुरंत अपनी कार से उत्तरी और उस बुढ़िया के पास पहुंच गयी और बोली.

सरिता- अम्मा आपको कही चोट तो नहीं लगी. और आप अचानक बिच सड़क पर कैसे आ गयी. वो तो अच्छा हुवा की मैंने ें मौके पर ब्रेक मार दिया नहीं तो आपको बहुत ज्यादा चोट लग सकती थी.

बुढ़िया. नहीं बिटिया. मुझे ज्यादा चोट नहीं आयी है. बस मेरी गठरी गिर गयी है तुम जरा उसे उठाकर मेरे सर पर रख दो बेटी. मैं अपने घर जा रही हूँ.

सरिता- चलिए मैं ाको आपके घर पर छोड़ देती हूँ. आप कहा पर रहती हैं अम्मा.

बुढ़िया. अरे नहीं बिटिया. तुम क्यों परेशां हो रही हो मैं चली जाउंगी. बस तुम मेरी गठरी मेरे सर पर रख दो.

सरिता उस बुढ़िया की बात नहीं मानती और उसे पकड़कर अपने गाड़ी के पास ले आती है. अपने गाड़ी के पास खड़ा करके सरिता उसकी गठरी लेने जाती है. सरिता ने झुककर वो गठरी उठायी और ले जाकर अपनी कार में रखने लगती है. ठीक उसी समय दो गाड़िया आकर सरिता के गाड़ी के पास रूकती हैं. उसमे से 4 आदमी बहार निकलते हैं. उन्हें देखकर सरिता अपनी कार का दरवाज़ा बंद कर उनकी तरफ देखने लगती है उनमे से एक आदमी सरिता से पूछता है.

आदमी- मिस सरिता जोशी.

सरिता- जी हाँ.

आदमी- मैं सीबीआई अफसर प्रधान हूँ. आपको शर्म नहीं आती. जो किसी गरीब के म्हणत की कमाई को इस तरह से लूट रही हो. एक रिपोर्ट लिखने के लिए उससे रिश्वत मांगती हो. क्या सर्कार की दी हुई सैलरी से आपका गुजरा नहीं होता जो अपने इमां को बेचकर पैसे कमा रही हो. आपको शर्म नहीं आती ऐसा करते हुवे.

सरिता- ये कैसी बात कर रहे हैं आप सर जी. मैंने किसी से रिश्वत नहीं ली है और न hi मैंने कोई ऐसा काम किया है जिससे मुझे शर्म आये. मैं तो बस उस बूढी अम्मा को, जो मेरी गाड़ी से टकरा गयी थी उन्हें घर छोड़ने जा रही हूँ. ये उन्ही की पोटली है.

प्रधान- किसे घर छोड़ने जा रही हो. वह तो कोई नहीं है.

सरिता ने प्रधान की बात सुनकर पीछे मुड़कर देखा तो बुढ़िया वह से गायब थी. सरिता को समझ में आ गया की उसे इन सब में फंसाया गया है. सरिता ने कहा.

सरिता- अभी तो यही थी सर. पता नहीं कहा चली गयी और अपनी गठरी भी भूल गयी.

प्रधान- जरा इस गठरी को थो खोलिये मिस सरिता जोशी. हम भी तो देखे की आपकी बात में कितनी सच्चाई है.

प्रधान की बात सुनकर सरिता ने उस गठरी को अपनी कार से बहार निकला और बोनट पर रखकर उसे खोल दिया. गठरी खुलते hi सरिता और उन ऑफिसर्स की आँखे बड़ी हो गयी. सरिता विस्मित सी होकर प्रधान को देखने लगी. गठरी में एक कपडा और कुछ पैसे और एक मंगलसूत्र था. उसके साथ hi एक लेटर भी उसमे रखा हुवा था. प्रधान ने सरिता से कहा.

प्रधान- इसके बारे में आपके क्या विचार हैं मिस सरिता जोशी. क्या आप अब भी कहेंगी की आपने रिश्वत नहीं ली.

सरिता- जी सर मैं अब भी यही कहूँगी की मैंने किसी से कोई रिश्वत नहीं ली और इसके बारे में मुझे कुछ भी पता नहीं है.

प्रधान- ज्यादा स्मार्ट ban-ne की कोशिश मर करो मिस सरिता. हमने सबकुछ अपनी आँखों से देखा है. इसके पहले भी हमें आपके खिलाफ रिश्वत लेने के लिया कम्प्लेन आई थी. जिसके लिए आपको नोटिस भी दिया गया था, लेकिन आपने ने उस नोटिस को गंभीरता से नहीं लिया और अपनी हरकतों से बाज़ नहीं आयी. आज किसी की कम्प्लेन की जरूरत नहीं है. आज हमने आपको रेंज हांथो पकड़ लिया है.

सरिता- लेकिन मैं सच कह रही हूँ सर मैंने किसी से कोई रिश्वत नहीं ली. मैं तो उस बुद्धि अम्मा की मदद करना चाहती थी और कुछ नहीं. मेरा यकीन कीजिये सर.

प्रधान- कितनी ढीठ हो तुम. आपने दीं इमां बेचकर भी कैसे बेशर्मो की तरह जुबान लड़ा कर रही हो. आप यकीन की बात कर रही हैं. तो फिर आपके खिलाफ जो शिकायते आती रही हैं उसका क्या. चलो मान लिया की कोई तुम्हारे खिलाफ शाजिश कर रहा है, लेकिन अभी जो हम लोगो ने देखा उसका क्या.

इस लत्तेर को देखो. इसमें साफ़ लिखा हुआ है की मैडम मैंने अपनी पूरी जमा पूंजी आपको दे दी है अब तो मेरी कम्प्लेन लिख लीजिये और मेरे पति को छुड़ा लीजिये. आप कहेंगी तो मैं कही से और पैसे का इंतेज़ाम करके आपको दे दूंगी. लेकिन मेरी मदद कीजिये मैडम. इसके बाद भी आप अपनी सफाई में कुछ कहना चाहती हैं.

सरिता को अनुमान हो गया था की अब वो पूरी तरह से फंस चुकी है अब वो चाहे कितनी भी अपनी बेगुनाही की फ़रियाद करे लेकिन उसका कोई सुनने वाला नहीं है. इसलिए चुप रहने में hi उसने अपनी भलाई समझी. सरिता को चुप देख प्रधान ने कहा.

प्रधान- आपकी चुप्पी इस बात का सुबूत है की आप पर जो भी इलज़ाम लगाए गए हैं वो बेबुनियाद नहीं हैं. आप सच में रिश्वत खोर पुलिस अफसर हैं. जिसने चाँद रुपयों के लिए अपनी इमां बेच दिया है.

सरिता- लिसेन तो में सर.

प्रधान- No. अब आपकी कोई बात नहीं सुनी जाएगी. हम सब आपको दोषी मानते हैं. अब आपके पास 1 वीक का समय है. आपको एक सपटण का समय दिया जाता है अपनी बेगुनाही साबित करने का. अगर इन एक सप्ताह में आपने अपनी बेगुनाही साबित नहीं की तो यू अरे फैरेड और साथ में अपनी वर्दी का गलत इस्तेमाल करने के जुर्म में सजा भी होगी. चलो सभी.

सरिता मेरी बात तो सुनिए सर करती रही. लेकिन उसकी कोई भी बात नहीं सुनी गयी. प्रधान और उसके साथ आये हुवे ऑफिसर्स उस पोटली को अपने साथ लेकर चले गए. सरिता हताश परेशां सी कड़ी अपनी किस्मत के बारे में सोचती रही. जिसने शुरू से उसके साथ देगा किया था.

खुशियों के कुछ पल उसके जीवन में आये थे तो आज वो भी चले गए थे. यही सब सोचकर उनकी आँखों में आँशु आ गए. उसे रावत सर की बात याद आने लगी जब उन्होंने सरिता से कहा था की तुम्हे अब हर कदम संभल कर रखना होगा. मैंने उनकी बात को कैसे भूल गयी.

कुछ देर ऐसे hi सोचते रहने के बाद उसने कमरे पर जाना बेहतर समझा और कार में बैठकर अपने कमरे पर आ गयी. कमरे में आकर अपने बिस्टेर पर लेट गयी और साडी घंटा के बारे में सोचने लगी की आखिर इसके पीछे कौन हो सकता है. तभी सरिता का फ़ोन बजने लगा. सरिता ने देखा की फ़ोन उसकी माँ का है. अपनी माँ का फ़ोन देखकर उसकी आँखों से और तेज़ आँशु बहने लगे. लेकिन उसने तुरंत अपने आपको संयमित किया और फ़ोन उठा लिए. उधर से सरिता की माँ की आवाज़ आयी.

रानी जी- Hello सरिता बिटिया. कैसी हो तुम.

सरिता- प्रणाम माँ. मैं अच्छी हूँ माँ. आप कैसी हैं.

रानी जी- मैं भी अच्छी हूँ बिटिया. पता नहीं सुबह से क्या हो गया है मुझे बहुत बेचैनी सी हो रही है. बार बार मन में बुरे ख्याल आ रहे थे. कही तू किसी मुसीबत में तो नहीं है. मैंने कई बार फ़ोन करने की सोची, लेकिन फिर ये सोचकर नहीं किया फ़ोन की तुम अपने काम में बिजी होगी तो तुम्हे डिस्टर्बेंस होगा. सब ठीक है न बिटिया. तुम्हे कहीं कोई दिक्कत तो नहीं है न.

अपनी मान की बात सुनकर सरिता की आँखों में आँशु बहना फिर से शुरू हो गए. आखिर माँ को भी एहसास हो गया की मैं किसी मुसीबत में हूँ. माँ तुम कैसे जान लेती हो की आपकी बेटी मुसीबत में है. (अक्सर ऐसा होता है की जब हम किसी मुसीबत में होते हैं तो किसी और को तो नहीं लेकिन माँ को अक्सर आभाष हो जाता है की मेरा bachha/bachhi मुसीबत में हैं.) सरिता यही सब सोचकर आंसू बहा रही थी. रानी जी अपनी बात कहती जा रही थी. कुछ पल तक जब सरिता की कोई आवाज़ नहीं आयी तो रानी जी ने फिर से थोड़ी तेज़ आवाज़ में कहा.

रानी- क्या हुवा बिटिया. तुम इतनी चुप चुप क्यों हो. तुम सुन तो रही हो की मैं क्या कह रही हूँ.

सरिता- (सभालते हुवे) मैं बिलकुल ठीक हूँ माँ. वो आज सुबह से 8 बजे तक ऑफिस में बहुत काम था. तो काम करके मेरा सर थोड़ा थोड़ा दर्द कर रहा है और कोई बात नहीं है. मैं अभी सोने जा रही हूँ. कल सुबह बात करती हूँ आपसे.

रानी जी- ठीक है बिटिया. अपना ख्याल रखना और फ़ोन करते रहना.

रानी जी जब फ़ोन रखने लगी तो मनीषा ने रानी जी से फ़ोन छीन लिया और बोल पड़ी.

मनीषा- Hello दिदिया. फ़ोन मत रखना. थोड़ी देर मुझसे भी बात कर लो दिदिया.

सरिता- वही तो मैं सोच रही हूँ की मेरी छिपकिली ने अभी तक फ़ोन लिया क्यों नहीं मम्मी से.

मनीषा- (हंसकर) आप ठीक तो हो न दिदिया. कोई परेशानी हो तो मैं आ जॉन आप के पास.

सरिता- मैं बिलकुल ठीक हूँ. तुझे तो बस बहाना चाहिए घूमने का. तेरा ध्यान पढाई लिखे पर नहीं रहता. इस बार हिस्ट्री और भारत का संविधान खूब अचे से याद कर लेना. मैं बहुत जल्दी घर आ रही हूँ फिर तुझसे इस बारे में बात करुँगी.

मनीषा- क्या दिदिया. जब देखो तब पढाई पढाई और बस पढाई. इस बच्ची को चैन से जीने नहीं देंगी आप. अभी तो मेरे खेलने कूदने के दिन हैं दिदिया. ये पढाई लिखे अपने बस की बात नहीं है.

सरिता- घोड़ी हो गयी है और बोल रही है की अभी खेलने कूदने के दिन हैं. अगर पढाई नहीं करेगी तो टीचर कैसे बनेगी जो तू ban-na चाहती है.

मनीषा- अब मैंने वो विचार भी त्याग दिया है. पढ़ लिख कर कुछ होने वाला नहीं है. वैसे भी जिससे मेरी शादी होगी वो तो मुझे कमा कर खिलायेगा hi. फिर मुझे नौकरी करने की क्या जरूरत है दिदिया.

सरिता- तू न बहुत जुबान चलने लगी है आजकर. मैं आकर तेरी बहुत पिटाई करुँगी.

मनीषा- (भावुक होकर) आप को जितना मरना हो मर लेना दिदिया. आप जो भी पढ़ने के लिए कहेंगी मैं सब पढूंगी. बस आप घर आ जाइये. मुझे आपकी बहुत याद आती है. जब से आप गयी हैं तब से एक बार भी घर नहीं आयी हैं.

सरिता- चल अब ज्यादा इमोशनल मत हो नहीं तो मैं भी रो दूंगी. ाचा ये बता पापा तो ठीक हैं न.

मनीषा- हाँ दिदिया. पापा बिलकुल ठीक हैं. आपको बहुत याद करते हैं.

सरिता- ठीक है मनीषा. मैं बहुत जल्दी घर आती हूँ. अब मैं फ़ोन रख रही हूँ. सुबह जल्दी पस भी जाना है.

घर वालो से बात करने के बाद सरिता को अच्छा महसूस हो रहा था. उसके दिमाग से अभी कुछ देर पहले वाली घंटा निकल गयी थी. उसने अपने लिए कॉफ़ी बनायीं और जाकर बालकनी में बैठकर कॉफी पिने लगी. कॉफ़ी पिटे हुवे फिर से उसके जेहन में आज की घंटा किसी चलचित्र की तरह चलने लगी. आखिर वो भूधिया कौन थी जो मुझे फंसने के लिए वह आई थी. ये सब कौन कर सकता है मेरे साथ. मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है. .

यही सब सोचते हुवे वो अपनी चाय ख़तम करती है और अपने बिस्टेर पर लेट जाती है. आज की साडी घटनाये उसके मस्तिष्क में घूम रही थी. धीरे धीरे वो नींद की आगोश में चली जाती हैं.



इसके आगे की कहानी अगले भाग में..
 
अपडेट- 18

सुबह सरिता 7 बजे सोकर उठी फ्रेश होने के बाद अपने लिए चाय और नास्ता बनाकर बिस्टेर पर बैठ गयी और चाय की चुस्किया लेने लगी और सोचने लगी कल की घंटा के बारे में. पता नहीं सरिता को क्या हुवा था की उसका दिमाग कलुवा और बच्चा की तरफ नहीं जा रहा था. जैसे उसे लग hi नहीं रहा था की वो दोनों भी उसके खिलाफ ऐसा कुछ कर सकते हैं. अचानक चाय पिटे हुवे वो एक झटके से उठ कड़ी हुई. उसे कुछ याद आये. वो बड़बड़ाते हुवे बोली.

सरिता- तो ये सब तुमने किया है निस्चल सिंह राठोड. ये सब तुम hi कर सकते हो. ये तुम hi हो निश्छल जिसने मुझे इस झूठे केस में फंसाया है. तुम hi कहते थे की “तुम्हारा पस का रिकॉर्ड मैं अच्छा नहीं होने दूंगा. मैं तुम्हे ज्यादा दिन यहाँ टिकने नहीं दूंगा. मैं तुमसे अपनी बेइज़्ज़ती का बदला लेकर रहूँगा.” तो तुमने इतनी घटिया हरकत करके मेरे साथ अपनी दुश्मनी निकली है. मैं तुम्हे छोडूंगी नहीं. तुमने बहुत बड़ी गलती कर दी है निस्चल सिंह. इसकी कीमत तुम्हे चुकानी पड़ेगी.

(वो कहते हैं न की जब इंसान पर कोई मुसीबत आती है तो वो अक्सर दिमाग से सोचना बंद कर देता है. यही हाल सरिता का भी था. उसे उलटी सीधी बाते याद आ रही थी जो निश्छल ने उससे कही थी.)

ये सब सोचकर उसका गुस्सा सातवे आसमान पर पहुंच गया था. उसने तुरंत मोहित को फ़ोन किया और निस्चल का एड्रेस सेंड करने को कहा. मोहित के पूछने पर की उन्हें सर के एड्रेस की क्या जरूरत पद गयी. तो सरिता मोहित पर भी भड़क गयी. सरिता का गरम दिमाग देखकर मोहित ने निस्चल का एड्रेस सरिता को टेक्स्ट कर दिया.

सरिता ने कप किचन में रखा और कार की छवि लेकर मोहित के बताये हुवे एड्रेस पर निकल गयी. कुछ hi देर में वो उस एड्रेस पर पहुंच गयी. सरिता ने कार बहार hi कड़ी की. वो अपनी कार से उतर कर दनदनाती हुई अंदर की तरफ जाने लगी. आवास के बहार सुरक्षागार्ड ने सरिता को रोकते हुवे कहा.

S.G. आप कौन हैं और अंदर कहाँ घुसी जा रही हैं.

सरिता ने उसे अपना ईद कार्ड दिखाया तो लग ने उसे सेलुटे किया. सरिता ने कहा.

सरिता- मुझे निश्छल सर से मिलना है.

लग ने सरिता को आगे जाने दिया. सरिता आगे बढ़ गयी और जैसे hi घर में घुसने को हुई उसे एक नौकर दिखाई दिया. सरिता ने उससे निश्छल के बारे में पूछा तो नौकर ने बालकनी की तरफ इशारा करते हुवे बता दिया की निश्छल वह बहिथे हुवे हैं.

सरिता ने उसे थैंक्स बोलकर बालकनी की तरफ चली गयी. जब वो बालकनी पर पहुंची तो उसने देखा की निश्छल शान से कुर्सी पर बैठा चाय पिटे हुवे पेपर पढ़ रहा है. सरिता गुस्से में थी hi उसने उसके नजदीक जाकर चिल्लाते हुवे कहा.

सरिता- आपकी हिम्मत कैसे हुई इस तरह की घटिया नीच और गिरी हुई हरकत करने की.

किसी के अपने ऊपर चिल्लाने की आवाज़ सुनकर उसने निस्चल ने जब आवाज़ की दिशा में देखा तो वो सरिता को वह पर देख कर चौक गया और बोलै.

निश्छल- तुम. तुम यहाँ क्या कर रही हो. और तुम इतना चिल्ला क्यों रही हो.

इतना कहकर निस्चल चाय का कप लिए हुवे hi उसके पास आया. जैसे hi निस्चल सरिता के करीब पंहुचा. सरिता ने दो झन्नाटेदार थप्पड़ उसके गलो पर लगा दिए. थप्पड़ सरिता ने पूरी ताकत के साथ लगाया था. जिसकी गूंझ दूर तक सुनाई दी.

निश्छल भले hi मज़बूत कद काठी का नौजवान था. लेकिन सरिता का थप्पड़ भी बहुत जोरदार था. जिसने निश्छल के जबड़े को हिलाकर रख दिया. चाय का कप हांथो से छूटकर दूर जाकर गिरा और टूट गया. निश्छल की आँखों के सामने पल भर के लिए तो अँधेरा hi छ गया. वह अपने दोनों हाँथ अपने गलो पर रखकर सहलाने लगा.

उसे समझ में नहीं आ रहा था की अब उसने क्या कर दिया जो सरिता ने उसे थप्पड़ मारा. वो भी बिना गलती के दूसरी बार. निश्छल को सरिता के ऊपर बहुत गुस्सा आया. उसने गुस्से में आकर सरिता की बांह पकड़ ली और उसे धकेलते हुवे पीछे की दीवार से सत्ता दिया और गरजते हुवे बोलै.

निश्छल- तुम पागल हो क्या. दिमाग से खिड़की हुई हो क्या. तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझे थप्पड़ मरने की. आखिर तुम्हारी प्रॉब्लम क्या है. जब भी मिलती हो तबला समझकर बजा देती हो. आखिर तुम्हें मुझसे दिक्कत क्या है.

निश्छल ने सरिता की बांह बहुत कसकर पकड़ी थी. जिससे सरिता को दर्द होने लगा था. तो सरिता ने अपने दोनों हाँथ उसके साइन पर रखा और पूरी ताकत से निश्छल को पीछे की तरफ धकेल दिया और गुस्से में निश्छल से कहा.

सरिता- वही तो मैं jan-na चाहती हूँ. आखिर आपको मुझसे प्रॉब्लम क्या है जो आपने मेरे साथ ऐसी गिरी हुई और घटिया हरकत की है.

सरिता की बात सुनकर निस्चल ने गुस्से से सरिता का हाँथ पकड़ा और उसे मोड़कर उसकी पीठ पर लगा दिया. ऐसा करने से निस्चल को सरिता के और करीब आना पड़ा. जिसके कारन दोनों आपस में लगभग सत्कार खड़े हुवे थे. दोनों की सांसे एक दुसरे के चेहरे पर पद रही थी.

सरिता ने एक बार छूटने की कोशिश की लेकिन निश्छल की पकड़ मज़बूत थी, इसलिए वो अपने आपको छुड़ा न सकीय. दोनों के चेहरे पर गुस्सा साफ दिखाई दे रहा था. सरिता गुस्से से बिना किसी डर के निश्छल की आखो में ांईखे डालकर कड़ी हुई थी. निश्छल ने सरिता की आँखों में देखते हुवे कहा.

निस्चल- तुम अपने आपको समझती क्या हो. तुम कोई टॉप हो. और तुम मुझको क्या समझती हो की मैं कोई सड़क छाप गुंडा हूँ. या कोई सड़क चाप मजनू हूँ. की जब तुम्हारा मन करे आकर मुझे थप्पड़ लगा देती हूँ. तुम्हारे दिमाग का एकाध नट ढीला हो गया है क्या. जो तुम पागलो जैसी हरकत करती रहती हो. उस दिन मार्किट में भी मैंने तुम्हे जानबूझकर नहीं छुवा था. वो गलती से मेरा हाँथ तुम्हारी कमर को लग गया था.

मैं यही तुम्हे बताना छह रहा था, लेकिन तुमने तो मुझे बोलने का मौका hi नहीं दिया. तुमने सही गलत जाने बिना hi मेरे गलो का तबला बजा दिया. मैंने दीदी के कहने पर तुम्हे माफ़ कर दिया था उस गलती के लिए, लेकिन तुम्हे तो मैं hi दीखता हूँ थप्पड़ मरने के लिए. मुझे थप्पड़ मरने के लिए तुम मेरे क्वार्टर पर चली आयी. तुम्हारी आज की गलती के लिए मैं तुम्हे बिलकुल माफ़ नहीं करूँगा. इसकी सजा तो मैं तुम्हे जरूर दूंगा और हर हाल में दूंगा.

सरिता- (निश्छल की आँखों में देखते हुवे) वाह वाह, इतना सबकुछ करने के बाद देखो कैसे अनजान बन रहे हो. आपका ये नाटक मेरे सामने नहीं चलने वाला. मैं अच्छी तरीके से जान गयी हूँ की मुझे आपने फंस्या है और अब ऐसे अनजान बन रहे हो आप जैसे आपने कुछ किया hi नहीं. साडी गलती मेरी hi है जैसे. आप इतनी घटिया हरकत कैसे कर सकते हैं.

निश्छल- अपनी बकवास बंद करो तुम. कब से सुन रहा हूँ की ऐसी घटिया हरकत मैं कैसे कर सकता हूँ. आखिर मैंने किया क्या है. अरे मैं उस दिन तुमसे मिलने के बाद ट्रेनिंग के लिए आगरा चला गया था और आज सुबह तड़के लौटकर आया हूँ. मैं चाय की चुस्की लेकर अपने सफर की थकान मिटा रहा था और आते hi तुमने मेरा स्वागत थप्पड़ से कर दिया. आखिर तुम ये सब करके साबित क्या करना चाहती हो.

इतना कहकर निस्चल ने सरिता का हाँथ और कसकर पकड़ लिया और मोड़ दिया. जिससे सरिता को दर्द होने लगा तो उसने निश्छल को घूरते हुवे कहा.

सरिता- मुझे दर्द हो रहा है. मेरा हाँथ छोडो.

निश्छल- बिलकुल भी नहीं छोडूँगा. बहुत बड़ी लेडी डॉन समझती हो न तुम अपने आपको तो खुद hi छुड़ा लो.

सरिता- मेरा हाँथ छोडो नहीं तो मैं शोर मचा दूंगी और लोगो को बताउंगी की आपने मेरे साथ बदतमीज़ी करने की कोशिश की.

निश्छल- (हाँथ को और मोड़ते हुवे). वाह वाह, उल्टा चोर कोतवाल को डेट. बदतमीज़ी मैंने नहीं की तुम्हारे साथ. बल्कि तुमने की मेरे साथ. अब तो मैं बिलकुल भी तुम्हारा हाँथ नहीं छोडूंगा.

इतना कहकर निस्चल और भी करीब चला गया सरिता के. सरिता ने दर्द के कारन जोर से चिल्लाना शुरू कर दिया तो निस्चल ने सरिता के मुंह पर हाँथ रख दिया. अब सेतुएशन ये थी की. निश्छल का चेहरा सरिता के चेहरे से 6 इंच की दूरी पर था.

निश्छल ने अपने एक हाँथ से सरिता के एक हाथ को पकड़कर उसकी कमर पर लगाया था और एक हाँथ सरिता के मुंह पर था. मुंह पर हाँथ रखें से सरिता निस्चल की आँखों में देखह रही थी और निस्चल सरिता की आँखों में. सरसरी निगाह से देखने पर दोनों को सभी प्रेमी जोड़ा hi समझेंगे.

सरिता की चीख ने अपना काम कर दिया था. अपने घर में लड़की की चीख सुनकर निस्चल की दीदी सविता ( जिसे घरवाले प्यार से सवी कहते हैं) वह पर आ गयी और इन दोनों को इस पोजीशन में देख लिया. सविता ने दोनों को देखते हुवे कहा.

सवी- ये क्या हो रहा है यहाँ पर.

सविता की आवाज़ दोनों वास्तविक स्थिति में आये. वो जिस तरह से खड़े थे उसका एहसास होते hi दोनों असहज हो गए. निश्छल ने एक झटके से सरिता का हाँथ छोड़ दिया और पीछे हैट गया. सरिता अपने हाथ को आगे कर अपने दुसरे हाँथ से उसे सहलाने लगी. सरिता का हाँथ सख्ती से पकडे जाने के कारन वो लाल पद गए थे. दोनों चुपचाप अपनी गर्दन झुकाये हुवे खड़े थे. कोई जवाब न मिलने के कारन सविता ने फिर से कहा.

सवी- मैंने तुम दोनों से कुछ पुछा. यहाँ पर क्या चल रहा था अभी और तुम कौन हो.

निश्छल- मुझे नहीं पापा दी. ये लड़की पागल लगती है. ये पता नहीं किस बात का गुस्सा मेरे ऊपर निकल रही है.

सरिता- मैं कोई पागल नहीं हूँ. आपने जो कुछः किया है मेरे साथ उसके बाद तो गुस्सा नहीं और बहुत कुछ करना चाहिए आपके साथ.

निश्छल- अरे यार मैंने क्या किया है. तुम बार बार मेरे ऊपर ऐसे इलज़ाम नहीं लगा सकती. मैं जब तुमसे बोल रहा हूँ की मैं आगरा गया हुवा था. दो घंटा पहले hi लौट्ककर आया हूँ घर. अगर तुम्हे मेरी बात का भरोषा न हो तो दी से पूछ लो.

निस्चल की बात सुनकर सरिता ने सविता की तरफ देखा तो सविता ने कहा.

सवी- हाँ ये बात सही है. ये 4-5 दिन बाद आगरा से कुछ घंटा पहले hi लौटकर आया है, लेकिन हुवा क्या है पहले मुझे वो तो बताओ.

सरिता- दी. इन्होने मुझे……

निश्छल- (बात बिच में काटकर) वो तुम्हारी दी नहीं हैं मिस जोशी. इसलिए तुम मेरी दी को दी नहीं बोल सकती.

सरिता- क्यों नहीं बोल सकती. आपने कोई पेटेंट नहीं कराया हुवा है दी का. मैं इन्हे दी hi बोलूंगी.

निश्छल- मैंने एक बार बोल दिया न की तुम मेरी दी को दी नहीं बोल सकती. वो सिर्फ मेरी दी हैं. तुम्हारी नहीं.

सरिता- मैं इन्हे दी hi बोलूंगी चाहे कुछ भी हो जाये. आपको जो भी करना है कर लो.

निश्छल- (गुस्से से) तुम्हारी तो मैं……..

सविता दोनों की tu-tu main-main का मज़ा लेती हुई मुस्कुरा रही थी. कुछ देर इनकी tu-tu main-main का चटकारा लेने के बाद सविता ने झूठा गुस्सा दिखते हुवे कहा.

सवी- हो गया तुम दोनों का. मैंने कुछ पूछा है तुम दोनों से. लेकिन मुझे उसका जवाब अभी तक नहीं मिला है

सरिता- दी. इन्होने मेरे खिलाफ रिश्वत लेने की रिपोर्ट दर्ज करवाई है. जिसके बेस पर कल मुझे झूठे केस में रिश्वत लेते हुवे फंसा दिया है इन्होने.

सरिता का बात सुनकर निश्छल उछाल पड़ा. और सरिता को घूरने लगा. निश्छल ने कहा.

निश्छल- क्या. तुम पागल वागल हो गयी हो क्या. तुम्हारा दिमाग तो ठीक है न. तुम क्या बोल रही हो कुछ समझ में आ रहा है तुम्हे. मैं भला ऐसा क्यों कोरंगा तुम्हारे साथ.

सरिता- ये सब आपने मुझसे अपना बदला लेने के लिए किया है. आप hi तो बोल रहे थे की मैं तुम्हारा पस का रिकॉर्ड ख़राब कर दूंगा, मैं तुम्हे ज्यादा दिन पस में टिकने नहीं दूँगा, मैं तुमसे अपना बदला लेकर रहूँगा. और आज आपने वो कर दिया.

निश्छल- (अपने सर पर हाँथ रखकर) हे भगवन. मैं सच कहता हूँ. तुम्हारे दिमाग का नट बोल्ट ढीला हो गया है. तुम सच में पढ़कर hi इस नौकरी में आयी हो या रिश्वत देखा इस नौकरी को पाया है तुमने.

सरिता- (गुस्से से) हाउ डरे यू. आप अपने आपको समझते क्या है. क्या केवल आप पढाई करके आये हैं और सब रिश्वत देखर आये हैं. मैंने इस नौकरी को पाने के लिए अपने जीवन के दो साल समर्पित कर दिए हैं और आप मुझसे ऐसी बात कर रहे हैं.

निश्छल- इसका मतलब तो यही हुवा की सिलेक्शन समिति ने तुम्हारे दिमाग और तुम्हारी काबिलियत देखकर hi तुम्हे इस जॉब के लिए चुना है तो मिस जोशी. अपने उस छोटे से दिमाग का उपयोग कभी कभी सोचने के लिए भी कर लिया करो. जब देखो तब लेडी डॉन बानी फिरती रहती हो. तुम्हे लगता है की मैं इतना चीप काम कर सकता हूँ वो भी तुमसे बदला लेने के लिए. मेरे पास बहुत से रस्ते हैं तुमसे बदला लेने के लिए.

निश्छल की बात सुनकर सविता मुस्कुराने लगी. सरिता उसे घूरकर देखते हुवे बोली.

सरिता- मैं कैसे मान लून की आपने कुछ नहीं किया है. मुझे तो आप के ऊपर hi पूरा शक है.

सवी- तुम दोनों फिर से शुरू हो गए. तुम दोनों तो एकदम टॉम एंड जेरी की तरह लड़ रहे हो. तुम दोनों अब इतने भी बच्चे नहीं हो की इस तरह से लड़ाई करो. दोनों किसी से काम नहीं हैं. अब तुम दोनों अपनी ये tu-tu, main-main बंद करो. वैसे क्या नाम है तुम्हारा मिस जोशी.

सरिता- सरिता जोशी नाम है मेरा दीदी.

सरिता की बात सुनकर सविता उसके पास आई और उसके गलो को सहलाते हुवे बोली.

सवी- बहुत प्यारा नाम है तुम्हारा. चलो मेरे साथ बैठो. मैंने चाय बनायीं है. तुम चाय पीकर जाना. तुम पहली बार हमारे घर आयी हो. और तो और अब तो तुमने मुझे दीदी भी बना लिया है तो चलो कुछ देर मेरे साथ बैठ कर बात hi कर लो.

सरिता सविता की बात सुनकर उसके साथ चली गयी. सविता ने सरिता को अपने कमरे में बैठकर किचन में चली गयी और दो कप चाय लेकर अपने कमरे में आ गयी. एक कप सरिता को दे दिया और उसके बगल में बैठकर चाय की चुस्की लेते हुवे बोली.

सवी- अब बताओ की पूरी बात क्या है.

सरिता ने सविता के पूछने पर साडी बात बता दी रिश्वत की कम्प्लेन से लेकर रात में प्रधान के छापे तक की बात जिसे सुनने बाद सविता ने कहा.

सवी- ये तो सचमुछ बहुत hi बुरा हुवा तुम्हारे साथ. लेकिन यकीं मनो निशु ऐसा नहीं है.

सरिता- (सोचते हुवे) अब ये इस मामले में निशु कहा से आ गया.

सवी- (मुस्कुराती हुई) अरे मैं निश्छल की बात कर रही हूँ. घर में वो मेरा बहुत प्यारा है मैं उसे प्यार से निशु कहती हूँ. तो मैं बोल रही थी की मैं निशु को बहुत अचे से जानती हूँ. वो मुझसे कोई बात नहीं छुपता. उसने ऐसा कुछ नहीं किया है. उसकी बात का नहीं तो काम से काम मेरी बात का तो भरोषा करो तुम.

सरिता- लेकिन अगर सर ने नहीं किया ये सब तो फिर किसने किया ये मेरे साथ. कही मैंने जिसे पकड़कर जेल में डाला था उसने तो नहीं किया ये सब.

सवी- तुम बिलकुल भी परेशां मत हो. मैं निशु से बात करती हूँ. वो मेरी बात नहीं टलेगा. मैं उससे बोलूंगी को वो तुम्हे इस केस से बाइज़्ज़त बरी करवाए. तुम फ़िक्र मत करो.

सरिता- आप रहने दीजिये दीदी. वो मुझसे पहले सी hi गुस्सा हैं और बदला लेना चाहते हैं. कही वो इस केस से मुझे बरी करवाने की जगह फंसा न दे.

सवी- तुम्हारे पास और कोई राष्ट है क्या. जिससे तुम इस केस से बच सकती हो. है तो बताओ और अगर नहीं है तो मेरी बात पर भरोषा करो. मैं तुम्हे विश्वास दिलाते हूँ की तुम्हे कुछ नहीं होगा. मैं निशु से बात करती हूँ.

सरिता- थैंक यू दीदी. अब मैं चलती हूँ. मुझे कुछ जरूरी काम है.

सवी- (मुस्कुराते हुवे) गलत बात है ये सरिता. दीदी को थैंक यौन नहीं बोलते. एक काम करो सरिता. तुम मुझे अपना no. दे दो. मैं तुम्हे इस केस के बारे में अपडेट करती रहूंगी.

सरिता अपना फ़ोन NO. सविता को dek-kar निकल जाती है.



इसके आगे की कहानी अगले भाग में..
 
Back
Top