अपडेट:-50
मैं:- आरव इसकी सकल तो देखेलि लग रही हैना :डी
आरव ने उसे गौर से देखा और फिर बोलै.
आरव:- अरे ये तो वही है :हिंट:
अब आगे:-
विवेक:- अबे किसकी बात कर रहे हो तुम दोनों.
मैं:- अबे तू देख hi लियो दिमाग न चाट.
आरव:- अब तुम दोनों लड़ने मत लग जाना, नेहा जल्दी से कार निकालो.
मैं:- आदित्य को बोलो हमारे पीछे रह के बैकअप दे.
नेहा ने जल्दी से सब को इन्फॉर्म की आरव ने जानवी के पास भी कॉल कर दिया था तो वो भी आ गयी थी, अब हमारे पास सही 75 मिनट बची थी. हम सब गाड़ियों में बैठे.
स्वाति:- लेकिन जाना कहा है.
मैं:- ोोोप्पस! वो गुंडों की कॉलोनी है न यहाँ से 15 की दूरी पे **** इस जगह पे वह चलो जल्दी.
नेहा ने कार दौड़ा दी.
स्वाति:- अरे यू आउट ऑफ़ योर मंद, वह पुलिस वालो को देखते hi मार देते है या गायब कर देते है.
मैं:- हां लेकिन जब एक साथ न हो.
जानवी:- डीएलओगे बाज़ी छोड़ और काम पे फोकस कर, अगर तूने मला को बचा लिया तो प्रीती वापिस से तुझसे बात करने लगे.
मैं इसके बाद कुछ नहीं बोलै, मेरा चेरा सख्त हो गया एक दम से दरिंदगी तो कूट कूट के दिख रही थी मेरे फेस पे, अब बस किसी भी तरह बुड्ढे को बचाना था प्रीती के लिए न सही तो हर्ष की तरफ एक स्टेप बढ़ने के लिए.
हम सही 15 मिनट में उस कॉलोनी के बहार रुके क्युकी अंदर कार तो जा नहीं सकती थी. और रात हो रही थी तो ये जगह खतरे से खाली नहीं थी. खैर हम लोगो ने अपनी अपनी गन्स निकली और तेज़ी से आगे बढ़ने लगे क्युकी 59 मिनट बची थी ( 15 मिनट यहाँ पहुंचने की और 1 मिनट गन वगैरह लोड करके बढ़ने की :स्मार्त्य: )
आगे मैं और आरव चल रहे थे और हम उसी चाय की टापरी जैसी जगह पे जा रहे थे जहा मैंने उस कालू के चाकर में उनके बॉस को मार दिया था और जो बाँदा मला पे नज़र रखे हुए था, (जिससे मैंने और आरव ने पहचान लिया था क्युकी वो उस दिन यही कालू के साथ hi बैठा था)
हम लोग जल्दी से उस चाय की टापरी के पास पहुंचे, और हमारी किस्मत अछि थी जो वो वही बैठा था लेकिन जैसे hi हम आगे बढ़ने को हुए तो उसने हमे देख लिया और उसकी आँखे मेरी आँखों से मिली और वो वह से खड़ा होक भागने लगा और उसके भागते hi हम भी उसके पीछे भागने लगे, लेकिन अब प्रॉब्लम ये थी को गालिया बहुत पतली थी और वो अकेला आराम से भाग पा रहा था और हम झुण्ड में थे इसलिए प्रॉब्लम हो रही थी लेकिन विवेक और मेरी रनिंग अछि थी इसलिए हम दोनों तेज़ भाग रहे थे बाकी सब से स्वाति और नेहा भी बहुत फ़ास्ट थी.
वो भसदक़ा बहुत तेज़ भाग रहा था और मुझे अब गुस्सा आने लगा था इसलिए मैंने एक बार घडी की तरफ देखा और फिर पूरी गांड का जोर लगा के भगा और विवेक से भी आगे निकला hi था की किसी भड़वे ने घर की विंडो खोल दी और वो सीधा मेरे मुँह पे बाज़ी, भें का लौड़ा पूरा दिमाग hi हिल गया वो तो लकड़ी की खिड़की थी अगर लोहे की होती तो मेरा सर hi खुल जाता.
मैं निचे गिरा और बाकी सब मेरे पास रुके लेकिन विवेक और आरव भागते रहे और मैं पीछे से चिल्लाया.
मैं:- विवेक पकड़ भें के लौड़े को मैं बनाऊ इसे मिल्खा सिंह. आआह्ह्ह्ह भेनचोद ये खिड़की किसने खोली उसकी माँ की छूट.
जानवी:- हे वाच योर टोँगे, और ज्यादा तो नहीं लगी.
मैं:- अरे टोँगे की माँ की आँख बस पूरा थोबड़ा हिल गया.
ये रास्ता लम्बा था इसलिए वो हमे अभी भागते हुए दिख रहे थे, हम लोग भी खड़े होक उनके पीछे भागने लगे वापिस से लेकिन विवेक को पता नहीं क्या हुआ सायद गुस्सा आ गया होगा और उसकी स्पीड तेज़ हुयी और उस आदमी की धीरे क्युकी थक गया था वो भी बेचारा है तो इंसान hi :सिघ:
विवेक ने उछाल के उसपे झपटा मारा तो वो दोनों एक साथ निचे गिर गए, वो आदमी फिर से खड़े होक भागने को हुआ लेकिन अब क्या फायदा अब विवेक जैसे जानवर के हाथ में आ चूका था इसलिए उसके खड़े होते hi विवेक ने दिया उसेक थोबड़े पे बहुत भयानक पंच.
विवेक:- भेनचोद रुक मैं बनाऊ तुझे मिल्खा सिंह, लौड़े आ जा गोल्ड मैडल ले ले.
हम सब भी उनके पास पहुंचे, मैं उस आदमी को उठाया और उसके खिचके रैप्टा दिया, वो निचे गिर गया, एक तो विवेक के पंच से उसका पूरा थोबड़ा खून का हो चूका था दूसरा एक थप्पड़ से उसके कानो में चिड़िया उड़ने लगी थी.
मैं:- सुन मला पे नज़र किसके कहने पे रख रहा था एड्रेस दे दे, नहीं तो कुत्ते की मौत मार दूंगा, तू जनता hi है मुझे.
वो:- देख,, देखो,,, मैंनं कुचछह नाहठी जनता.
स्वाति:- ये ऐसे नहीं बोलेगा, हमारे पास सिर्फ 30 मिनट बचे है.
मैंने विवेक को इशारा किया और उसने इशारा मिलते hi उसके पेट में एक पंच दिया तो उसकी आँखे बहार आने को हो गयी और वो झुक गया लेकिन विवेक ने उसे खड़ा किया और उसके फेस पे बहुत से पंच मारे खींच खींच के, बहुत ज्यादा ताकत से उसका पूरा फेस पिचक गया, जानवी और आकाश ने तो मुँह फेर लिया ऐसा सन देख के.
वो:- बताता हु बताता हु छोड़ दो मुझे.
विवेक:- न न तू मत बता.
और एक पंच और दिया उसको, मैं विवेक को साइड किया और उस आदमी का कलर पकड़ा.
मैं:- चल जल्दी भूख.
वो:- शःह्हब्ब्ब मूउज्ज्झी ज्यादा ंणआह्ही पट्टा लेकककिननं एई काम्म्म सूयंनीय भहहभाई ने कार्रवाया है वो ुस्स्समान भाआईई की खाससस है, ोूँकक्का नंमंब्बीरर मेरी पासस हैई. लिक्खकींनन वोऊ इस्सस व्वाककट पासस म्मीीिन्न जोऊ जापपन्नेस्सी जोनी है उसस्कीई जो बंद खाँड़ररर बिलडिंग्ज मेऐईंण हैई.
वो:- ाब्ब छ्हूदड़ ड्डूओ मुझही.
मैं:- ठीक है
और मैं उसकी कलर छोड़ी और उसका सर पकड़ के दिवार में इतना तेज़ी से बजाय की उसकी ों थे स्पॉट डेथ हो गयी, उसके खून के चित्ते हुम्म्म सब पे भी आजके गिरे.
स्वाति:- व्हाट थे फ़क, उसको मार क्यों दिया.
जानवी :- एक! व्हाट इस थिस.
मैं:- लिसेन! वे हैवे ओनली 30 मिनट्स तो ये बाते छोड़ो और जल्दी निकलो, वैसे भी यहाँ इसका कोई पुलिस केस नहीं करेगा.
हम लोग तेज़ी से भागते हुए hi कार्स की तरफ आये क्युकी 1 -1 मिनट हमारे लिए बहुत कीमती था, और मेरे दिमाग में एक चीज़ बहुत तेज़ी से चल रही थी, लेकिन मैंने इस बारे में ज्यादा ध्यान न दिया और जल्दी से कार्स के पास आये और कार में बैठ के जापानी जोन ( जो की एक इंडस्ट्रियल एरिया है और वह दो तीन बिल्डिंग का काम चालू है तो वह ज्यादा रश नहीं होता और वो बहुत पास थी लिखे 10 मिनट की दूरी पे)
एक कार में ड्राइव कर रहा था दूसरी स्वाति और हम दोनों काफी स्पीड से ड्राइव कर रहे थे, हमारे पास सिर्फ 25 मिनट बचे थे और रात के टाइम में थोड़ा ट्रैफिक भी होता है लेकिन हम दोनों कार्स को भगाये जा रहे थे ठीक 10 मिनट में हमने उस जोन का फाटक तोड़ कर एंट्री ली. हममे कार रोकी और मैं घडी की तरफ देखा तो सिर्फ 15 मिनट थे लेकिन असली प्रॉब्लम यहाँ थी क्युकी यहाँ 3 बिल्डिंग्स थी और तीनो 6-6 फ्लोर की थी और एक सेण्टर वाली 10 फ्लोर की टाइम सिर्फ 15 मिनट मेरे पे बहुत ज्यादा प्रेशर था और इस टाइम मुझे एक दम क्विक डिसिशन लेना था और जोकि मैंने लिया भी.
मैं:- लिसेन गाइस, टाइम काम है 3 ग्रुप में बात जाओ और 3 बिल्डिंग छान मारो जो सामने आये उदा दो, बस मला को छोड़ के.
सब:- ोककक.
Main:-aarav, जानवी, विवेक तुम लेफ्ट वाली में जाओ, neha,aakash और आदित्य और ये 2 हवलदार तुम राइट वाली में जाओ, मैं और स्वाति सामने वाली में जा रहे है. लेटस जो.
मेरे इतना बोलते hi सब अपनी अपनी बुलिडिंग्स की तरफ भागे, मैं और स्वाति बिल्डिंग में घुसे.
Main:-swati सीधा ऊपर से चेक करते है, चलो लिफ्ट में.
हम दोनों भाग के लिफ्ट के पास आये और जैसे hi स्वाति उसमे एंटर हुयी, वैसे hi सटक से लिफ्ट बंद हो गयी और धड़ धड़ धड़ की आवाज़ के साथ उप्पेर की तरफ चली गयी. व्हाट थे फ़क भेनचोद ये क्या हो रहा है, और मेरे दिमाग की घंटी एक दम से जाली.
मैं:- ओह माय गॉड, इतस ा ट्रैप.
"जो बंद खण्डार बिल्डिंग है उसमे है" यही बोलै था उस आदमी ने और इन तीनो बिल्डिंग्स में यही एक बंद बिल्डिंग थी बाकी दोनों ओपन थी, और एक बात उस आदमी से सिर्फ मैं पूछा था की कोण है इसके पीछे लेकिन उसने एड्रेस बता दिया मतलब वो सनी मुझे यहाँ लाना चाहता था लेकिन ये सनी है कोण :माध1:
मैंने अपनी घडी में देखा तो सिर्फ 7 मिनट बचे थे लिफ्ट थी नहीं इसलिए मैं गाँडफाँड तेज़ भगा स्टैर्स से रस्ते में मैंने भागते हुए फ़ोन निकल के बाकियो को इन्फॉर्म करने की कोसिस की लेकिन गांड तब मरी जब सिग्नल hi नहीं थे फ़ोन, हाउ इस थिस पॉसिबल इन दिल्ली, जरूर कोई गेम खेल रहा है. मैंने फ़ोन वापिस पॉकेट में डाला और फिर और तेज़ भागने लगा.
मैं 8तह फ्लोर पे आया तो लिफ्ट से स्वाति की आवाज़ आ रही थी " कोई है" "एक कहा हो तुम" "बहार निकालो कोई मुझे" . मैंने एक बार उसको बहार निकलने की सोची लेकिन फिर अपनी घडी पे देखा तो सिर्फ 2 मिनट बचे थे इसलिए मैं वापिस उप्पेर की और भगा 9तह एंड थें आया 10तह पे तो सामने गेट बंद था जोकि वुडेन का था इसलिए मैं थोड़ा सा पीछे आया और खींच के उसपे लात मारी और मैं सीधा अंदर, और अंदर का सन देखके मेरी गांड hi फैट गयी. क्युकी मेरे जस्ट सामने वो मला चेयर पे बंधा हुआ था और उसकी चेयर पे एक बम फिट था, दिक्कत एक थी और वो ये की वो बंधा हुआ था बुरी तरह से और उसके ठीक पीछे एक लेद लगी थी जिसपे दो बन्दे बैठे थे, और उनमे से एक बोलने लगा.
वो:- सॉरी एक लेट हो गए, अब इस बुड्ढे के साथ साथ तुम भी मरोगे और फिर पूरी दिल्ली जान जाएगी की उस्मान से पन्गा लेने का नतीजा क्या होता है. टिक टिक टिक.
और फिर वो दोनों जानवरो जैसे हसने लगे. लेकिन मैंने उनसे ध्यान हटके उस बुड्ढे के पास गया तो उस बम में 40 सेकंड बचे थे और 24 घंटे पुरे होने में भी. मैं इन जैसे चुतियो से हार नहीं मान सकता था और हार मान लेता तो मेरा ईगो सटिस्फी नहीं होता और अब मुझे गुस्सा आ रहा था और मुझे गुस्सा आता है तो मेरा दिमाग बहुत तेज़ काम करने लगता है और उस रस्सी को खोलने के लिए अभी के लिए दिमाग hi चाहिए था. मैं भाग के बुद्धि के पास आया और पुरे दिमाग के साथ उस रस्सी को खोलने लगा. लेकिन बुड्ढे की गांड में चुल्ल थी.
मला:- बीटा चले जाओ यहाँ से क्युकी अपनी जान खतरे में दाल रहे हो, तुम तो जवान हो अभी मेरी तो उम्र हो चुकी, बीटा तुम जाओ यहाँ से सिर्फ 20 सेकंड बची है.
मैंने लगभग रस्सी खोल hi दी थी लेकिन इस बुड्ढे के रंडी रोने ने मेरा कंसंट्रेशन बिगड़ दिया और मेरा दिमाग फिर से घूम गया और मैंने अपनी गन निकल के बुड्ढे के माथे पे रख दी.
मैं:- सुन भसडक अब मुँह से एक वर्ड न निकल दियो नहीं तो मैं खुद hi पेल दूंगा तुझे.
उसने हाँ में गार्डन हिल्लायी और मैंने अपनी गन वापिस दाल के रस्सी की तरफ देखा तो लौड़ा कुछ समझ नहीं आया और तभी वो बम आवाज़ करने लगा टिक टिक.
10 9 भेनचोद ऐसे नहीं मरना मुझे, लेकिन अचानक से मेरे दिमाग में पता नहीं क्या आया मैंने बुड्ढे की छाती में लात मारी जिससे वो कुर्सी समेत गिरा और कुर्सी टूटी और रस्सी हुयी ढीली मैंने और उसने मिलके तेज़ी से रस्सी निकली.
5 4 3 2 1 एंड बुऊममममम बहुत तेज़ धमाका हुआ लेकिन जब 2 सेकंड बचे थे उससे पहले hi मैंने बुड्ढे का हाथ पकड़ा और पास की विंडो का कांच तोड़ते हुए जम्प लगाया लेकिन ब्लास्ट का इम्पैक्ट वैसा hi था जैसा मेरा घर ब्लास्ट हुआ तब था. अब ब्लास्ट के इम्पैक्ट से मैं और बुद्धा और बिल्डिंग से दूर होक निचे गिरने लगे, भेनचोद बम से बचे तो अब 10तह फ्लोर से निचे गिर के मर जाएंगे, हम तेज़ी से निचे जा रहे थे और हम बिलकुल नीचे आ गए तो हमारे निचे मेरी hi कार दिखी मुझे, मैं समझ गया की मरूंगा नहीं तो काम से काम गांड तो ढंग से टूटेगी, लेकिन तभी मुझे बुड्ढे का ख्याल आया और अब मैं इसे तो मरने नहीं दे सकता था इतनी म्हणत के बाद.
इसलिए मैं निचे गिरते हुए hi उसका हाथ पकड़ा और उसको खुद से सत्ता के अपने उप्पेर कर लिया और खुद पीठ के बल निचे जाने लगा. और भायंमममम से कार की रूफ पे मेरी बहुत तेज़ी से टकराई मतलब जान hi निकल गयी हो, मेरी मैं एक दम ब्लेंक हो गया था मेरी आँखे खुल रही थी और बंद हो रही थी, कार के सरे मिर्रो टूट गए थे मैंने अपने राइट साइड में देखा तो बुद्धा एक दम सही सलामत लेता था और लेफ्ट साइड में देखा तो आरव, विवेक और बाकी सब मेरा नाम चिल्लाते हुए मेरी तरफ आ रहे थे लेकिन मेरी गांड फिर से फटी जब पीछे मीडिया को लाइव कवरेज करते हुए देखा, नीस बीटा नीस सही गेम खेल गया उस्मान..
लेकिन अब मेरे अंदर खड़े होने तक की ताकत नहीं थी मेरी आँखे किसी भी टाइम बंद हो सकती थी पूरी बॉडी में बहुत तेज़ पैन था, सर में तीस सी उठ रही थी लेकिन दिमाग में एक ख्याल था की मैंने इस बुढऊ को क्यों बचाया, मुझे तो किसी की परवाह नहीं होती तो मैंने इसे क्यों बचाया, क्या मैं सच में हीरो बनने लगा हु? नहीं नहीं मैं हीरो नहीं बन सकता. तो फिर अपनी जान की परवाह करे बगैर इसको क्यों बचाया?
मेरे को खुदसे कोई जवाब मिलता इससे पहले आरव और आ गए.
आरव:- एक उठ न! भाई उठ न! भाई.
विवेक:- उठ न भसडक.
आकाश:- एक आँखे बंद न करियो एम्बुलेंस आ hi गयी है बस.
अब इन लाडो को कोण बताये की साडी हड्डियों का कीमा बन गया है और मेरी आँखे इनके बाते सुनते सुनते कब बंद हुयी मुझे पता hi नहीं चला. और दिमाग भी मेरा सुन्न हो गया एक सवाल के साथ की " मैंने बुढऊ को क्यों बचाया खुद की जान पे खेल के?" जवाब कुछ मिला नहीं लेकिन आप लोग जरूर देना इसका जवाब :डी
तो बे कॉन्टिनोएड

