Hindi Sex Story कुछ अनकही कहानियां - SexBaba

Hindi Sex Story कुछ अनकही कहानियां

hotaks

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कहानी 1 : ट्रेन यात्रा

साल 1976

यह कहनी है एक खूबसूरत औरत की जिसका नाम कीर्ति है। कीर्ति की उम्र उस वक्त 24 साल को थी और वो इतनी खूबसूरत कि जो देखे बस उसका होना चाहे।

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यह कहानी है कीर्ति की। कीर्ति वैसे बैंक में काम करती है। तनख्वा बहुत अच्छी और जीवन शैली भी बहुत ऊंची। वैसे कीर्ति की शादी एक रहीस घराने से हुई। लेकिन उसका पति एक घटिया और लफ़ड़ेबाज़ था। अपनी ऑफिस को लड़कियों के साथ शारीरिक संबंध बनाता। उसने कीर्ति के साथ जिस्मानी संबंध बहुत कम बनाया। कीर्ति जैसे खूबसूरत बीवी को देखता तक नहीं और लड़ाई बहुत करता । कीर्ति इन साब से तंग आ गई और घर छोड़कर अपने घर पुणे चली गई। वहां बैंक में नौकरी पा गई और तनख्वाह अच्छी होने से वो आजाद रहती लेकिन उसके घर में भी समस्या है। उसके मां बाप अच्छे पद पर सरकारी नौकरी करते है लेकिन विचार बहुत पिछड़ा। वो कीर्ति को बार बार ससुराल वापिस जाने को कहते लेकिन एक दिन गुस्से से कीर्ति ने तलाक दे दिया अपने पति को और अलग से घर में रहने लगी। वो अपने शर्तों पर जीने लगी। कीर्ति के मां बाप ने उससे बात करना बंद कर दिया।

एक दिन जुलाई 1976, कीर्ति को बैंक के का से दिल्ली जाना था। दिल्ली के लिए पुणे से ट्रेन direct नहीं था तो उसने मुंबई से दिल्ली की ट्रेन का टिकट लिया। बारिश का मौसम था और ट्रेन 13 घंटे लेट था। कीर्ति स्लीवलेस ब्लाउज और सुंदर साड़ी में अप्सरा लग रही थी।

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पूरा स्टेशन रात के समय खाली था। कीर्ति घबरा गई क्योंकि इतनी रात वो अकेली थी और आस पास आवारा लड़के उसे छेड़ रहे थे।

एक आदमी उसके पास आया और बोला " आए चलती है क्या ?"

कीर्ति ने जवाब न दिया। वो आदमी ने उसका हाथ पकड़ा और बोला "चल मेरे साथ।"

कीर्ति ने कहा "ये मत करो मुझे परेशान मत करो।

आदमी : अबे रांडी इतनी रात अकेली ग्राहक के इंतजार में होगी। चल मेरे आदमी भी तेरी गांड़ मरेंगे।

कीर्ति रोने लगी लेकिन कोई भी आस पास नहीं था। वो आदमी कीर्ति का अपहरण कर रहा था। उसे स्टेशन के किनारे तक लेने में सफल हुआ। कीर्ति को अपनी इज्जत लुटते हुए दिख रही थी कि अचानक से उस आदमी से सिर पर किसी ने जोर से पत्थर मारा। वो आदमी बेहोश हो गया। जिस आदमी ने पत्थर मारा वो एक दुबला पतला और काला बुड्ढा था। उसकी उम्र 65 साल की थी। उसका नाम गंगू था।

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बेहोश पड़े आदमी को बूढ़े ने घसीटते हुए एक कूड़े कचरे में डाल दिया। कीर्ति ने उस बूढ़े आदमी को शुक्रिया अदा किया।

कीर्ति : आपने मेरी मदद की इसकेंलिए बहुत बहुत शुक्रिया।

उस बूढ़े गंगू ने जैसे ही कीर्ति को देखा तो बस देखता रह गया। एक बला की खूबसूरत और दिलकश चेहरा। बूढ़ा तो पहली नजर में कीर्ति को दिल दे बैठा।

गंगू : इसमें कोई शुक्रिया कहने की जरूरत नहीं लेकिन एक बात बताओ इतनी रात अकेली यहां क्या कर रही हो बेटी ?

कीर्ति : वो दरअसल मुझे दिल्ली जाना है। वहां बैंक के काम से। मैं पुणे के सरकारी बैंक में काम करती हूं।

गंगू : सुनो। अगर इस आदमी को होश आया तो वो अपने आदमियों को लेकर तुम्हे उठाने के लिए आएगा। उसे पता है कि तुम दिल्ली जा रही हो और ट्रेन लेट है।

कीर्ति : अभी रात के 9 बजे है और ट्रेन 5 बजे सुबह आयेगा। क्या करूं ?

गंगू : मै तुम्हारे साथ हूं। तुम्हारी रक्षा के लिए।

कीर्ति : माफ करना चाचा लेकिन आप बूढ़े और उसके पास पूरी फौज होगी।

गंगू : तो क्या हुआ ? अकेले लडूंगा। तुम्हे बचाऊंगा। कायर की तरह जीने से अच्छा एक शेर की मौत मारूंगा।

गंगू की ये बात कीर्ति के दिल को छू गया। वो जैसे भावुक हो गई और बोलो "हम एक दूसरे को जानते नहीं फिर भी मेरे लिए जान को दाव पर लगाएंगे आप ?"

गंगू : अब हमारा रिश्ता बन गया। एक दोस्ती का। मेरे लिए अब तुम एक खास बन गई हो।

कीर्ति को गंगू की बातें अच्छी लगी। दोनों में फिर पहचान हो गई। कीर्ति को अब गंगू के भिखारी होने से कोई फर्क नहीं पड़ रहा। बातों बातों में उसे पता चला कि गंगू मुंबई की झोपडी में रहता और भीख मांगता। उसका परिवार इलाहाबाद के जमुरा गांव में रहता। उसके घर में एक विधवा बहु, 3 छोटे छोटे पोते और एक बड़ा भाई रहते। गंगू उनका पेट पलता भीख मांगकर या मजदूरी करके। वो भी इलाहाबाद जा रहा था। उसका भी यहीं था। वो एक सामान्य कक्षा में रिजर्वेशन लिया था। सुबह 5 बजे लेकिन बारिश न रुकी। बदल घना और अंधेरा भी था। गंगू ने देखा कि कुछ गुंडे स्टेशन में आ गए। उसने कीर्ति को छुपाकर भागने लगा। दोनों चुप छुपाते हुए भागने लगें। आखिर सुबह 9 बजे ट्रेन आई। दोनों ट्रेन पर चढ़ गए।

ज्यादा लेट होने को वजह से ज्यादातर लोगों ने टिकट कैंसिल करवा दीं। बारिश लगातार चल रही थी। सुबह 9 बजे ट्रेन आई और कीर्ति तुरंत ट्रेन पर चढ़ गई लेकिन मुश्किल यह थी कि पूरे डब्बे में कोई नहीं था। मुश्किल और बढ़ी। गुंडों ने तीन पर चढ़ना शुरू किया अलग अलग डब्बे पर चढ़े। गंगू को पता था कि कोई नहीं आनेवाले बचाने जो करना है खुद ही को करना होगा। उसने डब्बे का दरवाजा बंद कर दिया। लेखी। डब्बे एक दूसरे से जुड़े हुए थे ये बात दोनों को पता थी।

गंगू : तुम तैयार रहो। वो आते हो होंगे। तुम उनके सामने खड़ी रहो।

कीर्ति : ये क्या कह रहे है आप ? मुझे छुपना चाहिए और आप...

गंगू : कितना कहीं उतना करो।

कीर्ति सामने खड़ी थी और एक आदमी ने उसे देखा। वो मुस्कुराते हुए उसके पास आया और बोला " आज तू हम 10 लोगो के साथ रात गुजरेगी। मानजा नहीं तो बलात्कार करेंगे मैं अब्दुल, सलीम, करीम और पूरे गैंग के लोग और तुझसे निकाह करके अपने साथ अरब देश के जायेंगे। पहले तेरा बलात्कार होगा और फिर सलीम तुझसे निकाह करके अपने साथ ले जाएगा।"

इतना सुनकर कीर्ति डर से कांप गईं। गंगू डब्बे में फैले अंधेरे का फायदा उठकर पीछे आया और चाकू से रफीक 0आर वार किया। उनके रफीक के पैर पर वार किया। दर्द से चिल्लाया रफीक और फिर बड़े डंडे से उसके सिर पर वार किया गंगू ने और रफीक को बेहोश किया। उसके शरीर को छुपाकर गंगू ने ऐसे ही तीन और लोगों को ठिकाने लगाया। आखिर में ट्रेन चल दी और बाकी के आदमी समझ गए कि लड़की भाग गई। ट्रेन को चलता देख और लोगों को जाता देख गंगू और कीर्ति ने राहत की सासें ली।

चार गुंडे अभी भी बेहोश पड़े थे। गंगू ने सबसे पहले उन्हें नंगा किया, उनके कपड़े जलाकर बाहर फेंका और सारे पैसे अपने पास रख लिया। 2 घंटे बाद उन चार नंगे गुंडों को अगले स्टेशन में फेक दिया। स्टेशन सुनसान था। अब कोई खतरा नहीं। ट्रेन चल पड़ी।

कीर्ति ने अचानक से गंगू को गले लगा लिया और रोते हुए कहा " आप न होते तो ये लोग मेरी जिंदगी बर्बाद कर देतें।"

गंगू ने कीर्ति को बाहों में कस लिया और कहा "अब मैं हूं न। कोई तुम्हे हाथ नहीं लगा सकता।"

रोते हुए कीर्ति ने गंगू को कहा "आप मेरे साथ रहना। मुझे आपकी जरूरत है "

गंगू अभी भी कीर्ति को बाहों में कसा हुआ था और कहा "तुम आराम करो। अभी सफर बहुत लंबा है। 40 घंटे का सफर है।"

वहां उन दोनों को पता चला कि ट्रेन खाली हो रहेगी। और स्टेशन पर ज्यादा नहीं रुकेगी। दोनों अब आराम से ट्रेन में घूमने लगे और बातें करने लगे। गंगू बातों बातों में कीर्ति का हाथ पकड़ लेता तो कभी खिड़की से नज़ारे देख रही कीर्ति की गोदी पर सिर रख लेता। कीर्ति की मुकुराहट के साथ उस गंदे भिखारी के बालों को सहलातीं।

गंगू मीठी नींद को अघोष में था। सामने कुदरत का करिश्मा। मूसलधार बारिश को देखते देखते कीर्ति मौसम को देखती रह गई। उसने साड़ी के पल्लू को गिराया और ट्रेन के दरवाजे पर खड़ी उस सुंदरता को देख रही थी। जब गंगू को आँखें खुली तो घबरा गया। वो कीर्ति को ढूंढने के लिए आगे बढ़ा तो कीर्ति की आँखें उसको आंखों से मिली। गंगू को प्यार हो गया कीर्ति के इस मनमोहक अदा से। सिर्फ ब्लाउज पेटीकोट में खड़ी कीर्ति उसके अंदर प्यार को ज्वाला भड़का रही थी।

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To be continued.....
 
कीर्ति की मुस्कुराहट में गुम हो गया गंगू। कीर्ति को फिर याद आया कि उसके बदन से पल्लू हट गया। वो अपने आपको ढकते हुए नजरे झुककर दूसरे डब्बे में चली गई। गंगू अब पूरी तरह से कीर्ति के प्यार में पड़ गया। उसे बस कीर्ति को हंसिल करना था। ये काम इतना भी मुश्किल नहीं था। कारण यह था कि कीर्ति को गंगू के गुण अच्छे लगे। गंगू की अजनबी था लेकिन उसके लिए जान पर खेल गया। किसी भी पुरुष ने उसके लिए इतना कुछ न किया। न पति ने प पिता ने। बचपन में लड़के ने छेड़ा तो बाप ने कहा रास्ता बदलो और जब जवानी में छेड़ा तो पति ने कहा घर से कम निकला करो। और आज गंगू ने कोई नसीहत न दी सिर्फ इतना ही पूछा तुम ठीक तो हो न। और बस लड़ पड़ा दुश्मनों की झुंड से।

वहीं शाम से रात हुई और कीर्ति वापिस डिब्बे में आई।

गंगू : कहां चली गई थी तुम ? कब से रह देख रहा था।

कीर्ति : बस वो थोड़ा अकेले में थी।

गंगू : मेरे रहते हुए अकेले ? क्यों ? ये तो अच्छी बात नहीं।

कीर्ति : बचपन से लेकर आज तक अकेले ही तो रही। कहां कोई साथ दिया। न पिता ने न दोस्त और न पति ने।

गंगू : तो तुम ज़िंदगी से चाहती क्या हो ?

कीर्ति : अपनो का साथ और ढेर सारी खुशियां।

गंगू : वो खुशी तुम्हे कैसे मिलेगी ?

कीर्ति : न कोई चिंता, न कोई दबाव उससे मिलेगी खुशी।

गंगू : तो फिर चिंता और दबाव तुम्हे किस बात का है ?

कीर्ति : अब अकेली रहती हूं तो खुद के लिए कमाना ये दबाव है और जिंदगीभर अकेली रह जाऊं उसकी चिंता।

गंगू जोर से हंस दिया।

कीर्ति (थोड़ा हैरान होकर ): आप हंस रहे है ?

गंगू : क्यों न हसीं आये मुझे। सोचो इतना अच्छा कमाती हो और उम्र भी कितनी कम है तुम्हारी। सारी जिंदगी अकेली रहोगी ? क्या कोई होगा ही तुम्हारा भविष्य में ? और मुझे देखो। गरीबी, मजदूरी और परिवार को जिम्मेदारी। अकेलापन तो जैसे मेरा साथी है। पूरे बड़े मायानगरी शहर में मेरा कोई नहीं फिर भी जिंदगी से कोई शिकायत नहीं और तुम इतनी कम उम्र में उम्र से ज्यादा जिंदगी से शिकायत। ये तो सही नहीं।

कीर्ति: बातें तो आप काफी अच्छी करते है लेकिन मेरा साथ देनेवाला अभी तो मुझे नहीं दिख रहा है।

गंगू : नजर की जरूरत है तुम्हें। क्या मैं तुम्हें साथ देनेवाला नहीं दिख रहा ? (गंगू ने भावनाओ मे बहकर कह दिया )

कीर्ति : कैसा साथ ? ये संभव नहीं ।

गंगू : सही कहा तुमने। संभव नहीं। क्योंकि तुम जवान खूबसूरत और पैसेवाली। मैं गरीब बदसूरत और बुड्ढा। हमारा मेल नहीं हो सकता।

कीर्ति : आप थोड़ा गलत समझ रहे है। मेरा वो मतलब नहीं। मेरा मलब है कि कल तो आप अपनी मंजिल चले जाएंगे और मैं भी फिर शायद हम कभी मिल भी नहीं पाएंगे

गंगू: तुम चाहो तो मैं तुम्हारा साथ दे सकता हूँ और तुम्हें ज़िंदाई की खुशी भी दे सकता हूँ। तनाव, चिंता और अकेलेपन से दूर भी कर सकता हूँ। लेकिन तुम शायद से मन कर दोगी।

कीर्ति (थोड़ा खुश होकर ): क्यों मैं खुशिया नहीं चाहूँगी ? क्यों आजादी और बेफिक्र की ज़िंदगी न चाहूँ ?

गंगू : क्या सच मे तुम ये सब चाहती हो ?

कीर्ति : हाँ ।

गंगू : लेकन यह सब आसान नहीं।

कीर्ति : क्या करना होगा मुझे ?

गंगू: इस संसार को छोड़ मेरे साथ मेरे घर चलो। मेरी दुनिया मे रहकर देखो। खुशियां तुम्हारे पास आ जाएगी।

कीर्ति : लेकिन..

गंगू : अगर ये सब चाहती हो तो छोड़ दो दुनिया, नौकरी और लोगों का दर और मेरा हाथ पकड़कर चलो मेरे साथ मेरे गाँव।

कीर्ति गंगू का हाथ पकड़कर बोली "ले चलो मुझे अपने साथ। मैं दुनिया छोड़कर तुम्हारे साथ रहने आना चाहती हूँ।

गंगू ने कीर्ति को गले से लगा लिया और कहा "दो घंटे मे मेरा गाँव आएगा उसके बाद पूरी दुनिया से तुम अगयाब और मेरे साथ मेरी दुनिया मे आ जाओगी।

कीर्ति गंगू कॉकसकर गले लगाकर बोली "नहीं चाहिए वो दुनिया जिसमे स्वार्थ, गंदगी और परायापन हो। मुझे जाना है उस दुनिया मे जहां अपनापन और खुशियां हो। मुझे पैसे नहीं चाहिए न कोई ऐशों आराम। मुझे काम पैसे और सादगी से भारी जीवन चाहिए जहां मेरा कोई अपना हो और मुझे खुश रखें।

कुछ घंटे बाद यानि रात को 3 बजे बाद गंगू ने चैन खींच लिया। दोनों समान लेकर भागे और दो किलोमीटर तक चले और पहुंच गए गंगू के जमुरा गांव में। गांव बहुत ही प्यारा था। नदी और जंगल का संगम। वहां ज्यादातर बूढ़े और औरतें ही रहते क्योंकि मर्द तो शहर चले जाते कमाने। गंगू ने दरवाजे पर दस्तक दी और सभी घर के सदस्य उसके स्वागत में आ गए।

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गंगू की बहु माला जिसकी उम्र 35 साल है वो उसके 3 बच्चे और गंगू का बड़ा भाई हरिया जिसकी उम्र 73 साल है वो भी थे। सभी ने जब खूबसूरत और पारी जैसी दिखनेवाली कीर्ति को देखा तो हैरान रह गए।

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सभी ने पूछा कि ये कौन है। गंगू ने पूरी कहनी विस्तार से समझाया और कीर्ति को यहां लाने का कारण बताया। खुशी से फूली न समाई माला ने कीर्ति को गले लगाया और कहा "जितने दिन रहना है रहो यहां लेकिन एक शर्त है।"

कीर्ति : कैसी शर्त ?

माला : यही कि तुम्हे मेरे साथ काम में हाथ बताना पड़ेगा।

सभी हंसने लगे। कीर्ति को तो तीनों बच्चे जैसे पसंद आ गए। तीनों बच्चे उसके पीछे पीछे रहते और प्यार करते। कीर्ति और माला एक कमरे में सो गए। बच्चे आंगन में और गंगू हरिया बाजार खटिया में ।

गंगू और हरिया रात के अंधेरे में बातें करने लगे।

हरिया : भाई क्या तुझे कीर्ति पसंद आई ?

गंगू : हां मुझे ये बहुत पसंद है।

हरिया : लेकिन मुझे भी ये पसंद है। मुझे लगा कि तू इसे बेटी की तरह लाया है।

गंगू : नहीं भाई साहब मुझे इससे प्यार है। लेकिन आपको ?

हरिया : रहने से भाई। जब तुझे पसंद है तो मैं क्या करूं ?

गंगू को अपने भाई पर तरस आया। आए भी तो क्यों न। सारी जिंदगी हरिया ने उसे संभाला, खुद शादी भी न किया और बुढ़ापे में घर भी चल रहा है। गंगू ने हरिया से कहा ,"अगर तुम्हे ये पसंद है तो तुम भी इसके मोहब्बत को पाने में लग जाओ। देखते है कौन इसका प्रेमी बनेगा।"

हरिया हैरानी से पूछा "लेकिन ऐसा क्यों कर रहे हो तुम ?"

गंगू : सारी जिंदगी सिर्फ परिवार को ही संभालोगे ? या खुद भी अपने लिए कुछ करोगे ?

हरिया : तू एक बार सोचों मान ले अगर कीर्ति मेरी होंगयो तो तुझे बुरा नहीं लगेगा ?

गंगू : खुशी होगी बड़े भाई। अगर हुई तो खुशी। न ही तोड़ने ज्यादा खुशी। कम से कम किसी को बाहों में सुकून से जी सकेंगे आप।

हरिया और गंगू में एक दूसरे के प्रति भक्तृप्रेम से भरे हुए थे। अब देखना ये है कि कीर्ति किसकी होगी।

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सुबह सुबह चिड़िया चहकने लगी, मोर मधुर आवाज़ से दिन का आगाज कर रहा था। बारिश के मौसम होने की वजह से धूप निकली न थीं घर के अगासी पर खटिया पर लेटी कीर्ति ने देखा गांव के सुंदरता का दृश्य।

नीचे आंगन में माला नहा धोकर तैयार हुई। 3 बच्चे बाहर खेल रहे थे। कीर्ति नीचे उतरी तो माला ने उसे देखकर मुस्कुराते हुए कहा "बहन तुम उठ गई। चलो जल्दी से नहा लो और चलो। मैं तुम्हारे लिए नाश्ता बना रही हूँ।"

कीर्ति ने पूछा "अरे सुनो गंगू कहाँ है ?"

माला "वो तो गये नौकरी पर।

कीर्ति "नौकरी पर ?"

"हां। मुंबई में भीख मांगते मांगते उन्हें लगने लगा कि वो कब तक गलत कमाई पर जियेंगे इसीलिए सब कुछ छोड़कर हमेशा के लिए यहां पर आ गए। यहां से 1 किलोमीटर दूर उन्होंने बड़े ससुरजी के साथ दुकान खोला अब से वहां दुकान चलाएंगे और फिर यहां रहेंगे।"

कीर्ति खुश होकर "वाह यह तो अच्छी बात है। तो कब तक वहां रहेंगे ?"

"सुबह 6 बजे से दोपहर 12 बजे फिर दोपहर 3 बजे से 6 बजे।"

"क्या मैं दुकान जाऊं ?"

"हां हां क्यों नहीं। पहले नाश्ता कर लो और उसके बाद जाना।"

कीर्ति बहुत खुश थी कि वो गंगू को खुद्दार के रूप में देखेगी। उन दिनों घर में बाथरूम न था। आंगन में औरतें नहाती थी। कीर्ति को थोड़ा अजीब लगा लेकिन गांव के ठंडे पानी जब कोमल और दूध से गोरे शरीर पर पड़े तो आनंद की लहर उसके जिस्म पर दौड़ पड़ी। कीर्ति को बहुत अच्छा लग रहा था। कीर्ति ने रोज दिन की तरफ स्लीवलेस साड़ी पहनी थी। कीर्ति बहुत खूबसूरत लग रही थी। ऐसा लग रहा था कि गांव का पानी उसपर जच रहा था। कीर्ति ने नाश्ता किया और फिर गंगू से मिलने दुकान गई। दुकान घर एक किलोमीटर से भी कम दूर था। रस्ते में नदी और छोटा सा जंगल पड़ता है। कीर्ति दुकान के नजदीक पहुंची। दूर से कीर्ति ने देखा कि गंगू पांच ग्राहकों के साथ व्यस्त था और समान बचकर पैसे गैल में रख रहा था। दुकान अच्छा था। पहले दिन ही ग्राहकों ने गंगू को व्यस्त कर दिया था। सुबह के 10 बजे थे और गंगू बहुत खुश था कि उसकी नदुकन पहले दिन ही चल पड़ी। तभी गंगू और कीर्ति की नज़र एक दूसरे से मिली।

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"आओ कीर्ति आओ। अंदर आओ।"

कीर्ति ने खुश होकर कहा "आज बहुत व्यस्त हो। पहले दिन से ग्राहकों का आना जाना हो गया ?"

कीर्ति ने देखा कि गंगू के साथ 65 साल का बूढ़ा भी था जो दुकान में नौकरी कर रहा था। गंगू ने उसका परिचय कीर्ति से करवाते हुए कहा "कीर्ति ये है रामू मेरे दुकान में नौकरी करेगा।"

कीर्ति ने मुस्कुराते हुए रामू से कहा "आपके मालिक आपसे अच्छे से बात तो करते है न ?"

रामू ने जवाब दिया, "अगर नहीं करते तो आपके जैसे खूबसूरत मेमसाब से मिला1अत थोड़ी न करवाते ?"

गंगू थोड़ा मजाक में बोला,"अबे ओ चुप कर। पहली मुलाकात में इनको मस्का लगाने लगा।"

रामू बोला "मस्का नहीं सच कह रहा हूं। शहर से आई एक परी है मेमसाब।"

गंगू हंसते हुए कहा "आप दोनों बात करो मैं दूसरे कमरे में आज का हिसाब करने जा रहा हूं। और हां रामू दुकान का ख्याल रखना और मेमसाब से ज्यादा बात में उलझ न जाना।"

"मैं मेमसाब से बात करूं तो कहीं जल न जाना।" रामू ने कीर्ति को आँख मारके कहा। कीर्ति हँस पड़ी।

"मैं क्यों जलूं। तू जान और कीर्ति जाने। है न कीर्ति।"

कीर्ति ने कहा, "हां आप जाइये गंगू मुझे एक नया दोस्त मिल गया। रामू दुकान के साथ मेरा ख्याल रखेगा। क्यों रामू ?"

तभी गंगू बोला, "सामने देख रामू 2 ग्राहक आ रहे है। यू को सामान दे और मै थोड़ी देर बाद आता हूं।"

रामू तुरंत ग्राहकों का काम किया और फिर कीर्ति के साथ बात करने लगा।

"तों मेमसाब ........."

कीर्ति ने बात काटते हुए कहा "मुझे कीर्ति के नाम से बुलाओ। मेमसाब नहीं। "

"आपका दिल आपके चेहरे जितना खूबसूरत है। मुझे इतना सम्मान देने के लिए शुक्रिया।"

"वैसे एक बात बताओ रामू। यहां देखने लायक क्या क्या है ?"

"वैसे कीर्ति ये गांव छोटा जरूर है लेकिन इधर नदी और झील बहुत सुंदर है। झील यहां से 2 किलोमीटर दूर है लेकिन वहां कोई आता जाता नहीं।"

"वो क्यों ?" कीर्ति ने पूछा।

"ये गांव पिछड़े और गरीब लोगों का है। गरीब लोगों की खूबसूरत चीजें कहां लोगों को आकर्षित करती है। अब सब अपनीनतरह नहीं होते जो सुकून ढूंढने के लिए यहां आते हो।"

"आपको मेरे बारे में पता है ?"

"हां गंगू ने बताया आपके बारे में।"

"फिर तो उन्होंने ये भी बताया होगा कि कैसे उन्होंने मेरी जान बचाई।"

"हां। इसमें कोई नई बात नहीं। हमारे गांव के लोग औरतों की जान बचाने के लिए कभी भी देर नहीं करते।"

"ये बहुत अच्छी बात है। लेकिन क्या आपके गांव में कोई बाहर से आई हो तो उसे कही अच्छी जगह दिखाने का गुण है ?"

"हां क्यों नहीं। बताइए कहां चलना है आपको ?"

"बहुत जल्द बताऊँगी। लेकिन अभी मुझे चलना होगा। आपसे जब अगर मुझे मिलना हो तो कहां मिलूं ?"

"बस बगल में मेरा घर है। आप आ जाना।"

"वाह तो पक्का मिलेंगे तो बताइए आपके घर कौन कौन है ?"

"कोई नहीं मैं अकेला हूं। बच्चे दूर शहर में काम करते है और पत्नी परलोक सुधार गई।"

"माफ़ करना लेकिन मैं जब भी चाहूं आपके घर आ सकती हूं आपसे मिलने ?"

"बिल्कुल आइये लेकिन शाम के समय आइए। तब पूरा वक़्त खाली रहूंगा।"

फिर दोनों अलग हुए। कीर्ति घर वापिस आई और माला का रसोई में हाथ बटाया। दोपहर को सभी लोगों ने साथ में खाना खाया। शाम का वक्त हुआ और कीर्ति घर के बाहर मैदान के पास आ पहुंची। वहां हरिया बैठा था। कीर्ति ने हरिया को देखा। हरिया ने कुछ न कहा।

"कैसे है आप ?" कीर्ति ने पूछा।

हरिया ने कोई जवाब न दिया। कीर्ति ने दुबारा पूछा लेकिन फिर भी हरिया ने जवाब न दिया।

"मैने कुछ गलत किया ? आप जवाब क्यों नहीं दे रहे ?"

"क्योंकि मैं तुमसे नाराज़ हूं।"

"क्यों मैने क्या किया ?"

"पूरे दिन में से एक भी बार मेरे पास न आई तूम। बताओ मैं नाराज़ क्यों न हु ?"

कीर्ति मुस्कुराते हुए बोली,"माफ करिए। अब तो आ गई मैं। अच्छा बताइए आपकी नाराजगी कैसे दूर करूं ?"

"तुम्हे मेरे साथ वक्त बिताना होगा।"

"अच्छा बाबा ठीक। अब बताइए कैसे है आप ?"

"मैं ठीक हूं।" हरिया ने मुस्कुराकर कहा।

1 महीने बाद।

कीर्ति को अब गांव पसंद आ गया। उसने अब गांव में ही रहने का फैसला कर लिया। पास के बैंक में उसे मैनेजर की नौकरी मिल गई। वहां सुबह 9 बजे से 1 बजे तक चालू रहता क्योंकि गांव छोटा है और काम कम। तनख्वा अच्छी थीं। कीर्ति रोज सुबह 5 उठती। योगासन करती, तैयार होती और बैंक के लिए निकलती। गंगू का दुकान रास्ते पर पड़ता इसीलिए कीर्ति को छोड़कर चला जाता। बैंक से वापिस आते आते कीर्ति गंगू के दुकान आती और दोनों साथ में घर जाते। दोपहर को गंगू वापिस दुकान जाता और कीर्ति पूरी दोपहर घर में रहती। माला दोपहर को सो जाती और कीर्ति हरिया के साथ रहती। दोनों बातें करते करते एक कमरे में बगल बगल खटिया रख सो जाते। शाम को गंगू वापिस आता तो कीर्ति उसके साथ रहती। दोनों अक्सर घूमने जाते। रात को कीर्ति माला के साथ सोती। शनिवार के दिन दोपहर को बैंक की छुट्टी होती तो कीर्ति रामू के घर जाती और रविवार तक वहां रहती। वापिस गंगू के घर सोमवार की दोपहर को आती। रामू के साथ पूरे दिन रविवार को रहती क्योंकि दुकान बंद रहती। रामू के घर खाना बनती और उसके पास रहती।

अब बात ये हो गई कि तीनों बूढ़ो को कीर्ति की आदत पड़ गई। कीर्ति भी तीनों के साथ खुलकर रहती। पता नहीं कैसा रिश्ता बन गया। कीर्ति तीनों बूढ़ो के बिना रहती नहीं। कीर्ति के इस रवैये से माला को परेशानी न थी। महीने में 4 दिन माला बच्चों के साथ मायके जाती तो कीर्ति गंगू के कमरे में रहती। दोनों एक बिस्तर में सोते बिना किसी परेशानी के। कीर्ति रोज दोपहर अब हरिया के कमरे में उसके साथ रहती। अब तीनों बूढ़े कीर्ति के प्रति आकर्षित होतें। कीर्ति सब जानती थी लेकिन वो तीनों के साथ खुश थी। वो तीनों के करीब रहना चाहती थी।

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