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- Dec 5, 2013
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Abb..takk...
मीरा और रचना ने कबीर को समझने की बहुत कोसिस की, की इस तरह अचानक घर छोड़ना ठीक नहीं....
लेकिन कबीर अपने फैसले पर अडिग रहा...
मज़बूरन दोनों को कबीर की बात माननी पड़ी...
अपडेट No..14
Abb...Aage....
दोपहर हो चुकी थी
कबीर किसी भी वक़्त आने वाला था,
मीरा और रचना ने सारा जरुरी सामान पैक कर लिए the...jitna हो सका उनसे...
तभी कबीर और शंकर चाचा आते हुए दिखे....
कबीर - माँ जी सारा सामान बांध गया क्या...??
रचना - है लल्ला जितना बन सका हमने बांध लिया,
अब सब थोड़े न ले जा सकते है....
कबीर - शकर चाचा,
हम अब ये गांव छोड़कर जा रहे है,
ये लीजिये इस घर की चाभी आपको रहना हो तो रहो या फिर किसी और को दे dena....Ab ये सब आपका है...
हम लोग kabhi-Kabhar घूमने आते रहेंगे.....
शंकर - पर बीटा ऐसे कैसे गांव छोड़ रहे ,
तुम रहोगे कहा,
पहले जाकर घर खोज लेते फिर सामान लेकर जाते,
कबीर - चाचा जी बहुत मुश्किल से मई राज़ी हुआ हु,
यह गांव छोड़ने के लिए,
अब और रुका तो सायद मई नहीं जा पाउँगा...
""मुझे माफ़ करना चाचा जी!!""
शंकर - ठीक है बीटा जैसी तुम्हारी मर्जी !!
बस आते rahna...Apna और मीरा बिटिया का ख्याल रखें !!
घर के बहार भीड़ जमा thi....Kabeer के गांव छोड़ने खबर फ़ैल चुकी थी,
कबीर, मीरा और रचना सभी लोगों से mel-milap करने लगे...
कबीर कुछ लोगों की मदद से सामान को गुफा के बहार तक ले गया जहा एक गाड़ी कड़ी थी उसी में लाड दिया...
गाडी में बैठ गए...
गाडी चल पड़ी....
""मई अपनी यादों में खो gaya....har बीता हुआ पल याद आने लगा..""
""शहर की उस भीड़ में जा तो रहा हूँ....
ज़ेहन में, पर गांव का नक़्शा छुपाये रखा है..!!""
गाडी dhire-dhire आगे बढ़ रही थी और गांव, लोग, घर सब पीछे छूटा जा रहा था..... मई अपनी उधेड़बुन में खाया हुआ था, तभी....
""हम कहाँ जा रहे है Kabeer"",Meera बोली,
कबीर - मुझे नहीं पता, समझ नहीं आ रहा कहा जॉन,
कैसे करेंगे शुरुआत...
मीरा - एक रे दू,
कबीर - क्या..??
मीरा - देहरादून चलते है, रश्मि दीदी के पास,
सुर किसी शहर में तो कोई पहचान का भी नहीं,
रचना - है लल्ला, मीरा सही कह रही,
रश्मि के यहाँ रुक कर ठन्डे दीमक से रास्ता निकल आएगा....
अभी सब jaldi-Jaldi से बूढी काम नहीं कर रही होगी...
कबीर - ठीक है माँ जी देहरादून hi चलते है,
वहीँ से शुरुआत करेंगे...
""भाई गाड़ी को देहरादून की तरफ राजपुर रोड ले चलो""
ड्राइवर ने गाड़ी को देहरादून की ओर ले चला.... हम 1.30हरष बाद पहुँच gaye..aur गाडी राजपुर रोड की तरफ बढ़ती चली जा रही thi.....Shaam ढल चुकी थी..
सड़क के दोनों किनारे सुन्दर पेड़ और बगीचे
चौड़े बरामदे और सुन्दर ढालदार छतों वाले बंगले,
घंटाघर से आगे तक फैला हुआ रंगीन पल्टन बाजार,
घंटाघर...
मेरे ध्यान को आकर्षित कर रहे थे,
मई वह की नयी खूबसूरती को निहार रहा था,
तभी मीरा बोल पड़ी,
""बस भैया गाड़ी यहीं साइड में लगा दो,
गाड़ी राजपुर रोड स्थित एक छोटे से बंगले सामने रुक चुकी थी,
हम सब गाड़ी से उतारकर उस बंगले की तरफ बढ़ गए,
मीरा ने जाकर दूर बेल्ल बजायी....
रश्मि दीदी
थोड़ी देर बाद एक 28 साल की लेडी ने दरवाजा खोला,
जिसे देखते hi मीरा दौड़कर जेक गले लग गयी...
""मीरा तू यहाँ, अचानक"" लड़की बोली,
""अरे मौसी आप भी मुझे तो सच में विश्वास नहीं हो रहा""
""आइये सभी अंदर चलिए...""
मई भी उनके साथ अंदर चल दिया....
""आप लोग बैठो मई अभी आती hu,""itna बोलकर वो दूसरे कमरे में चली गयी,
मई घर को देखने लगा, पक्का माकन था, घर में सजावट की हुयी थी, ज्यादा बड़ा तो नहीं, लेकिन 10 लोग आराम से रह सकते है""
मई सब देख hi रहा था की....
""चलिए सब फ्रेश हो जाओ मई नाश्ता लगाती हु,""
हम चरों नाश्ता करने लगे,
मीरा ने baton-Baton में सब बता दिया, मेरी भी पहचान करवा दी,
रश्मि - चलिए बहार के रूम में गाड़ी से सामान उतारकर रख देते है,
हम सबने मिलकर सामान को बहार बने एक रूम में रख दिया,
मैं गाडी वाले को किराया दिया जाने को कहा और वो चला गया,
हम अंदर चल दिए,
रचना - रश्मि बेटी, विजय नहीं दिख रहा,
रश्मि - अभी वो ऑफिस से नहीं आये,
रात 10 बजे के बाद आएंगे,
मैंने आज छुट्टी कर राखी थी,
रात के 9 बज चुके थे हम सबने मिलकर खाना खाया
अच्छा मीरा तुम लोग उस कमरे में जाओ और रेस्ट करो कल सुबह सब मिलकर बात करते है..
कमरे में दो बीएड लगे थे,
एक बीएड में मई लेट गया और दूसरे में मीरा और माजी लेट गयी,
अनजान शहर, नया घर,
सफर में थके होने के कारन नींद आ गयी और हम सो गए.....
अभी के लिए बस इतना hi...
गिव में योर सुग्गेस्टिव एंड वैल्युएबल रिव्यु.....
मीरा और रचना ने कबीर को समझने की बहुत कोसिस की, की इस तरह अचानक घर छोड़ना ठीक नहीं....
लेकिन कबीर अपने फैसले पर अडिग रहा...
मज़बूरन दोनों को कबीर की बात माननी पड़ी...
अपडेट No..14
Abb...Aage....
दोपहर हो चुकी थी
कबीर किसी भी वक़्त आने वाला था,
मीरा और रचना ने सारा जरुरी सामान पैक कर लिए the...jitna हो सका उनसे...
तभी कबीर और शंकर चाचा आते हुए दिखे....
कबीर - माँ जी सारा सामान बांध गया क्या...??
रचना - है लल्ला जितना बन सका हमने बांध लिया,
अब सब थोड़े न ले जा सकते है....
कबीर - शकर चाचा,
हम अब ये गांव छोड़कर जा रहे है,
ये लीजिये इस घर की चाभी आपको रहना हो तो रहो या फिर किसी और को दे dena....Ab ये सब आपका है...
हम लोग kabhi-Kabhar घूमने आते रहेंगे.....
शंकर - पर बीटा ऐसे कैसे गांव छोड़ रहे ,
तुम रहोगे कहा,
पहले जाकर घर खोज लेते फिर सामान लेकर जाते,
कबीर - चाचा जी बहुत मुश्किल से मई राज़ी हुआ हु,
यह गांव छोड़ने के लिए,
अब और रुका तो सायद मई नहीं जा पाउँगा...
""मुझे माफ़ करना चाचा जी!!""
शंकर - ठीक है बीटा जैसी तुम्हारी मर्जी !!
बस आते rahna...Apna और मीरा बिटिया का ख्याल रखें !!
घर के बहार भीड़ जमा thi....Kabeer के गांव छोड़ने खबर फ़ैल चुकी थी,
कबीर, मीरा और रचना सभी लोगों से mel-milap करने लगे...
कबीर कुछ लोगों की मदद से सामान को गुफा के बहार तक ले गया जहा एक गाड़ी कड़ी थी उसी में लाड दिया...
गाडी में बैठ गए...
गाडी चल पड़ी....
""मई अपनी यादों में खो gaya....har बीता हुआ पल याद आने लगा..""
""शहर की उस भीड़ में जा तो रहा हूँ....
ज़ेहन में, पर गांव का नक़्शा छुपाये रखा है..!!""
गाडी dhire-dhire आगे बढ़ रही थी और गांव, लोग, घर सब पीछे छूटा जा रहा था..... मई अपनी उधेड़बुन में खाया हुआ था, तभी....
""हम कहाँ जा रहे है Kabeer"",Meera बोली,
कबीर - मुझे नहीं पता, समझ नहीं आ रहा कहा जॉन,
कैसे करेंगे शुरुआत...
मीरा - एक रे दू,
कबीर - क्या..??
मीरा - देहरादून चलते है, रश्मि दीदी के पास,
सुर किसी शहर में तो कोई पहचान का भी नहीं,
रचना - है लल्ला, मीरा सही कह रही,
रश्मि के यहाँ रुक कर ठन्डे दीमक से रास्ता निकल आएगा....
अभी सब jaldi-Jaldi से बूढी काम नहीं कर रही होगी...
कबीर - ठीक है माँ जी देहरादून hi चलते है,
वहीँ से शुरुआत करेंगे...
""भाई गाड़ी को देहरादून की तरफ राजपुर रोड ले चलो""
ड्राइवर ने गाड़ी को देहरादून की ओर ले चला.... हम 1.30हरष बाद पहुँच gaye..aur गाडी राजपुर रोड की तरफ बढ़ती चली जा रही thi.....Shaam ढल चुकी थी..
सड़क के दोनों किनारे सुन्दर पेड़ और बगीचे
चौड़े बरामदे और सुन्दर ढालदार छतों वाले बंगले,
घंटाघर से आगे तक फैला हुआ रंगीन पल्टन बाजार,
घंटाघर...
मेरे ध्यान को आकर्षित कर रहे थे,
मई वह की नयी खूबसूरती को निहार रहा था,
तभी मीरा बोल पड़ी,
""बस भैया गाड़ी यहीं साइड में लगा दो,
गाड़ी राजपुर रोड स्थित एक छोटे से बंगले सामने रुक चुकी थी,
हम सब गाड़ी से उतारकर उस बंगले की तरफ बढ़ गए,
मीरा ने जाकर दूर बेल्ल बजायी....
रश्मि दीदी
थोड़ी देर बाद एक 28 साल की लेडी ने दरवाजा खोला,
जिसे देखते hi मीरा दौड़कर जेक गले लग गयी...
""मीरा तू यहाँ, अचानक"" लड़की बोली,
""अरे मौसी आप भी मुझे तो सच में विश्वास नहीं हो रहा""
""आइये सभी अंदर चलिए...""
मई भी उनके साथ अंदर चल दिया....
""आप लोग बैठो मई अभी आती hu,""itna बोलकर वो दूसरे कमरे में चली गयी,
मई घर को देखने लगा, पक्का माकन था, घर में सजावट की हुयी थी, ज्यादा बड़ा तो नहीं, लेकिन 10 लोग आराम से रह सकते है""
मई सब देख hi रहा था की....
""चलिए सब फ्रेश हो जाओ मई नाश्ता लगाती हु,""
हम चरों नाश्ता करने लगे,
मीरा ने baton-Baton में सब बता दिया, मेरी भी पहचान करवा दी,
रश्मि - चलिए बहार के रूम में गाड़ी से सामान उतारकर रख देते है,
हम सबने मिलकर सामान को बहार बने एक रूम में रख दिया,
मैं गाडी वाले को किराया दिया जाने को कहा और वो चला गया,
हम अंदर चल दिए,
रचना - रश्मि बेटी, विजय नहीं दिख रहा,
रश्मि - अभी वो ऑफिस से नहीं आये,
रात 10 बजे के बाद आएंगे,
मैंने आज छुट्टी कर राखी थी,
रात के 9 बज चुके थे हम सबने मिलकर खाना खाया
अच्छा मीरा तुम लोग उस कमरे में जाओ और रेस्ट करो कल सुबह सब मिलकर बात करते है..
कमरे में दो बीएड लगे थे,
एक बीएड में मई लेट गया और दूसरे में मीरा और माजी लेट गयी,
अनजान शहर, नया घर,
सफर में थके होने के कारन नींद आ गयी और हम सो गए.....
अभी के लिए बस इतना hi...
गिव में योर सुग्गेस्टिव एंड वैल्युएबल रिव्यु.....