Antarvasna kahani वक्त का तमाशा - Page 10 - SexBaba
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Antarvasna kahani वक्त का तमाशा

अगली सुबह रिकी और ज्योति दोनो काफ़ी टेन्स्ड थे, दोनो के एग्ज़ॅम्स आज से थे, कॉलेज से दोनो को पर्मिशन मिल चुकी थी ऑनलाइन एग्ज़ॅम देने की.. जहाँ रिकी के कॉलेज में यह फ्लेक्सिबिलिटी थी विज़िटिंग स्टूडेंट्स के लिए, वहीं ज्योति को भी ज़्यादा दिक्कत नहीं हुई, कॉलेज के ट्रस्टी राजवीर के दोस्त थे, तो ज्योति की यह रिक्वेस्ट सामने आते ही उसे एक मिनिट में अप्रूवल मिल गया..



"गुड मॉर्निंग स्वीटहार्ट..." रिकी ने शीना के कमरे में जाके कहा



"मॉर्निंग भाई, ऑल दा बेस्ट फॉर युवर एग्ज़ॅम्स.." शीना ने हँस के जवाब दिया और जैसे देखा कि कमरे में कोई नहीं आ रहा, रिकी ने झुक के उसके होंठों को हल्के से चूमा



"तो एग्ज़ॅम सेंटर जाके मेसेज करना ओके, आंड जैसे ही वहाँ से निकलो उस वक़्त भी ओके.." शीना ने माँ के जैसे इन्स्ट्रक्षन देते हुए कहा



"हां बाबा, यू डॉन'ट वरी, आंड कल से इन्ही कपड़ो में हो, कैसे फ्रेश होगी तुम.." रिकी ने चिंता जताते हुए कहा



"कोई दिक्कत नहीं है, देअर विल बी आ नर्स हियर, वो यहीं रहेगी मेरे ध्यान के लिए, शी विल हेल्प मी इन ऑल थिंग्स.. आंड बिसाइड्स माँ है ना, वो भी यहीं है.. आप चिंता ना करो, बस एग्ज़ॅम अच्छे से करना ओके.. आंड कल का क्या करोगे, कल तो महाबालेश्वर जाओगे ना.. फिर एग्ज़ॅम कैसे दोगे" शीना ने फिर उससे सवाल पूछा



"अब आज तो जाने दो, कल का बाद में बताता हूँ.." रिकी ने शीना से कहा और फिर दोनो बातें ही कर रहे थे तभी ज्योति भी वहाँ आ गयी



"उः, गुड मॉर्निंग शीना... भैया, चलें एग्ज़ॅम के लिए" ज्योति ने रिकी से पूछा, शीना से आँख नहीं मिला पा रही थी वो



"हां चलो, चलो बाइ शीना, सी यू सून"



"ओके भाई, बाइ, आंड ज्योति... ऑल दा बेस्ट, डू वेल..." शीना ने हँस के ज्योति से कहा, जिससे ज्योति को भी अच्छा लगा और दोनो वहाँ से एग्ज़ॅम देने चले गये


"ज्योति तो गयी तेरे हाथ से..अब तू क्या करेगा, हाहहहहा." सुहसनी ने सामने बैठे राजवीर से कहा....अमर के होते हुए एक दूसरे से कमरे में तो मिल नहीं सकते थे, अमर को दिखाने के लिए देवर और भाभी घर के ही गार्डेन में बैठे थे... वैसे तो तीनो सुबह सुबह एक साथ ही नाश्ता करके उठे थे, क्यूँ कि ज्योति और रिकी थे नहीं, और शीना ऐसी हालत में नीचे नहीं आती, स्नेहा सुबह से गायब थी पर उसके बारे में शायद किसी को चिंता ही नहीं थी...



"और तू हँस रही है भाभी, कैसी माशूका है, तेरे साथ भी कुछ किए हुए काफ़ी वक़्त हो गया, उपर से ज्योति बस आने ही वाली थी बिस्तर पे, पर अचानक पता नहीं क्या हो गया, अब नज़र उठा के देख ही नहीं रही.. और उपर से अब रिज़ॉर्ट के प्रॉजेक्ट में जा रही है, तो आधा दिन तो महाबालेश्वर में रहेगी, और मैं वहाँ भी नहीं जा पाउन्गा, तो क्या बैठ के अपने हाथ से ही हिलाऊ...." राजवीर ने झल्ला के सुहसनी को जवाब दिया



"हाहहाहा, हां अहाहहाअ... अपने हाथ से ही हिला ले खेखेखी.." सुहसनी राजवीर के मज़े लेने पे आ गयी थी आज और राजवीर बस उसकी बातें सुन के लाल होता जा रहा था



"अब मुझ पे क्यूँ लाल हो रहा है राज्ज्जाआ... किस्मत की बात है, एक तरफ रिकी है जो ज्योति और शीना दोनो से घिरा हुआ है, और तू है, सब पे चान्स मार रहा है लेकिन कोई फ़ायदा नहीं... अब तो तू उस रात वाली ज्योति को ही बुला ले और क्या... बाद की बाद में सोचना, और रही हमारी बात, अमर घर पे है तो कैसे आउ..." सुहसनी भी खामोश हो गयी थी उसकी हँसी उड़ा के



"भाभी... नहीं वो लड़की नहीं, मतलब , अब किसी रांड़ के साथ नहीं.. अब तो...." राजवीर सुहसनी से कह ही रहा था कि उसकी नज़र सामने से आती हुई स्नेहा पे पड़ी... स्नेहा को सामने से आते देख राजवीर एक मिनट के लिए खामोश हो गया..



"अरे स्नेहा, किधर से भाई सुबह सुबह..." राजवीर ने सामने से आती हुई स्नेहा को इशारा कर के कहा



"नमस्ते... बस यूँ ही थोड़ा फ्रेश हवा खाने गयी थी बाहर..." स्नेहा ने राजवीर के पास आके कहा











स्नेहा के पास आते ही, राजवीर की सबसे पहली नज़र उसके होंठों पे और फिर अगले ही पल नीचे उसके ब्लाउस से दिख रहे चुचों पे गयी, जैसे ही राजवीर की नज़र उसकी क्लीवेज पे गयी उसके मूह में पानी आ गया और एक अजीब ही तरीके से अपनी जीभ अपने होंठों पे फेर दी.. उसकी यह हरकत स्नेहा और सुहसनी दोनो ने ही देखी, सुहसनी का तो पता नहीं पर स्नेहा ने रिक्षन में बस एक स्माइल दी और अपनी क्लीवेज को यूँ खुला छोड़ राजवीर के मंसूबों को हवा दे दी...
 
"चलिए, मैं चलती हूँ.. फिर मिलेंगे.." स्नेहा ने हँस के राजवीर से कहा और जाते जाते उसने भी अपनी जीभ अपने होंठों पे फेर दी... उसकी यह हरकत देख राजवीर के दिमाग़ में एक नयी सोच ने जनम ले लिया



"राजवीर, इसके बारे में सोच रहे हो..." सुहसनी के यह सवाल कम, राजवीर को एक वाक्य ज़्यादा लगा



"ह्म्म्मे....." राजवीर ने बस सुहसनी को इतना ही जवाब दिया और फिर वहीं बैठे बैठे कुछ सोचने लगा..



राजवीर का जवाब सुन सुहसनी कुछ नहीं बोली, कुछ देर दोनो खामोश बैठे बैठे कुछ सोचते रहे और फिर दोनो बिना कुछ कहे या सुने अपने अपने काम पे लग गये... राजवीर की नज़रों के आगे सिर्फ़ स्नेहा की क्लीवेज का दृश्य ही घूम रहा था, अंदर आया तो स्नेहा को पीछे से देख उसकी हलक फिर सूखने लगी, ठुमक ठुमक के चलती स्नेहा के हिलते चूतड़ राजवीर को अंदर तक पागल कर रहे थे...



"प्सस्सिईईई.... यार इस्पे पहले नज़र क्यूँ नहीं गयी मेरी... विक्रम मेरा भतीजा था, उसकी हर चीज़ का ध्यान मुझे ही रखना है उसके बाद तो फिर इसको कैसे चोद दूं..." राजवीर ने एक पल के लिए सोचा, लेकिन फिर उसका दिमाग़ मानने को रेडी नहीं था, "बहू को कैसे..." पर फिर पहले वाला ख़याल हावी होने लगा.. "क्यू नहीं, देखा नहीं, कैसे उसने भी मुझे देख के अपनी जीभ पे होंठ फेरी, और आख़िर उसको भी तो लंड लिए काफ़ी दिन हुए हैं, प्यासी है, विधवा है, आराम से फस जाएगी.." राजवीर अपने मन से लड़ रहा था के फिर उसका ध्यान एक आवाज़ से टूटा



"क्या हुआ अंकल...क्या सोच रहे हैं.." स्नेहा ने उसे लिविंग रूम के बीचों बीच खड़ा पाया,



"हान्न्न...उः हाआँ, हां, नही ऐसे ही... मतलब, ऐसे ही, कुछ नही सोच रहा, कुछ नही...कुछ भी तो नही.." राजवीर हकला के बोल रहा था, डर रहा था कि शायद उसकी चोरी पकड़ी गयी



"ओह्ह्ह, आपने नाश्ता किया अंकल..." स्नेहा ने फिर एक कातिलाना मुस्कान देके पूछा



"यह बार बार अंकल क्या बोल रही हो.. अब मैं क्या इतना बूढ़ा हूँ जो अंकल बोल रही हो.." राजवीर को बस एक पॉइंट चाहिए थी बात करने के लिए और वो उसे मिल गयी



"बिल्कुल नहीं, आप तो एक दम जवान दिखते हैं, स्मार्ट हैं.... आंड....... मस्क्युलर भी..." स्नेहा ने एक ठंडी आह भर के मस्क्युलर शब्द कहा



"तो फिर, यार कुछ और बोलो, यह अंकल वंक्ल नहीं जचेगा मुझ पे... हां बाकियों के आगे बोलो, लेकिन अकेले में तो कुछ और ही बोलो.." राजवीर जानता था कि वो कॅषुयल होके ही स्नेहा को अपने नीचे ला पाएगा इसलिए यार जैसे शब्द का प्रयोग करने लगा



"जो आप बोलें मैं तो करने के लिए रेडी ही हूँ...." स्नेहा ने फिर एक लंबी साँस लेके राजवीर को जवाब दिया, जिसे सुन राजवीर एक पल के लिए होश गँवा बैठा



"आइ मीन, जो आप बोलें, आप को वो कह दूँगी मैं.." स्नेहा ने फिर एक कॅटिली मुस्कान देके कहा



"अब वो तो तुम सोच लो, मैं तो बस यही जानता हूँ अंकल नहीं कहोगी... और यह क्या, इतनी खूबसूरत हो तुम, जानता हूँ अभी जो हादसा हुआ है, लेकिन उसका मतलब यह नहीं कि तुम इस उमर में अपनी ज़िंदगी जीना छोड़ दो.." राजवीर ने अपनी बातों का जाल बुनना शुरू करने का सोचा



"मतलब, मैं कुछ समझी नहीं.." स्नेहा ने अंजान बनते हुए कहा



"मतलब यह है स्नेहा कि यह सफेद साड़ी बार बार हमे भतीजे की याद दिलाती रहेगी, बार बार हमें इस बात का अफ़सोस होगा के वो हमारे बीच नहीं है, अब जो होना था वो हो गया, लेकिन उसे पकड़ के वहीं रुकने के बदले, उसकी हसीन यादों के साथ आगे बढ़ो, इसी का नाम ज़िंदगी है.." यह कहते कहते राजवीर ने स्नेहा के कंधों पे हाथ रखा और उसके साथ बातें करते करते आगे चलने लगा



"जी, मैं आपकी बात समझ रही हूँ..पर यह तो शुरू से ही चलता आता है, और फिर घर पे बड़े भी तो हैं..उनके हिसाब से भी कुछ चीज़ें करनी पड़ती हैं मुझे, किसी की भावनाओ को ठेस ना पहुँचे, इसका ध्यान भी मुझे ही रखना है.." स्नेहा और राजवीर चलते चलते अब फिर गार्डेन में आ गये थे



"अरे भाई, क्या बातें हो रही हैं बहू के साथ, ज़रा हमे भी बताओ..." अमर ने उन्हे टोकते हुए कहा, अमर की आवाज़ सुनते ही स्नेहा ने अपनी साड़ी से बदन को कवर करने की कोशिश की... "मर गये, यह घर पे है मुझे पता ही नहीं था.." स्नेहा अंदर ही अंदर खुद को कोसने लगी



"भाई साब, अच्छा हुआ आप आ गये..बैठिए, कुछ बात करनी है आपसे.." राजवीर ने अमर को बिठाया



"मैं आप लोगों के लिए कुछ चाइ और कुकीस लेके आती हूँ" स्नेहा ने वहाँ से खिसकने का सोचा



"नहीं स्नेहा, बैठो, तुम भी..." राजवीर ने अपने पास रखी चेर पे उसे बैठने का इशारा किया और ना चाहते हुए भी स्नेहा को वहाँ बैठना पड़ा



"भाई साब, दरअसल बात यह है..." राजवीर ने शुरू किया और सारी बात उसे बता दी, तब तक स्नेहा वहाँ बैठे बैठे मासूम होने की आक्टिंग करके बैठी रही



"राजवीर सही कह रहा है बहू, हम ने कभी तुम्हे नहीं रोका और ना ही हम चाहते हैं कि पल पल तुम विक्रम की यादों को साथ लेके चलो, तुम्हारी ज़िंदगी तुम अपनी मर्ज़ी से जी सकती हो, घर पे बडो के मान करने के दूसरे तरीके हैं जो तुम बखुबी निभाती हो.." उमेर ने राजवीर की बात से सहमति जताते हुए कहा



"देखा, मैने कहा था ना स्नेहा, अब ध्यान रखना इस बात का.." राजवीर ने स्नेहा से कहा और स्नेहा ने बस हां में इशारा किया और वहाँ से चली गयी



"राजवीर, वो बोरीवली वाले सेठ का फोन आया था, कह रहे थे कुछ 5 से उपर करोड़ का नुकसान हुआ उन्हे अभी वाली मॅच में, " अमर ने इतना ही कहा के राजवीर ने उसे टोकते हुए कहा



"क्या.. क्यूँ, प्लॅनिंग तो हमारी 6 करोड़ की थी, यह 5+ क्यूँ हुआ, मतलब जितना सोचा उतना नहीं मिला हमें..."राजवीर ने हैरान होके कहा और अपने मोबाइल में कुछ देखने लगा, जब तक अमर कुछ समझता तब तक फिर राजवीर बोल पड़ा



"ओह, हां यह, एक बॅट्स्मन ने स्कोर कम किया जितना कहा गया था उससे.." राजवीर ने मोबाइल टेबल पे रख कहा



"क्या मतलब, समझाओ मुझे.." अमर ने उसे कहा और राजवीर ने उसे रिकी वाली की हुई सेट्टिंग के बारे में बताया



"क्याअ.... यह सब रिकी ने सेट किया था, वो 2 दिन में इतना सब सीख गया ?" अमर ने हैरान होते हुए राजवीर से पूछा
 
"भाई साब, इसने भी पहली चीज़ वोही सीखी जो विकी ने सीखी थी.. नेटवर्क, और आप तो जानते हैं, एक बार आपने नेटवर्क समझ लिया तो फिर कोई बड़ी बात नहीं है पैसा निकालना.. हैरानी की बात यह है, कि जिस बेट को हम कभी नहीं लेते थे यह सोच के कि उसमे कुछ पैसा नहीं है, रिकी ने एका एक उसकी कीमत बढ़ा दी.. एक रन पे एक लाख, आज कल हर मॅच में 300+ तो स्कोर होता ही है, उसमे भी आपके टॉप के 5 बल्लेबाज़ कम से कम 150 का स्कोर तो करते हैं, काफ़ी कम मॅचस में पुछल्ले बल्लेबाज़ खेलते हैं.. तो 2 इन्निंग्स के हिसाब से 300 रन जिसकी कीमत 3 करोड़... रिकी ने आते ही एक पुराना दरवाज़ा खोल दिया है, लेकिन एक अलग ही अंदाज़ से... दाद देनी पड़ेगी उसके दिमाग़ की.." राजवीर ने रिकी की तारीफ़ करते हुए अमर से कहा, उसकी बात सुन अमर खुश था कि रिकी जल्दी चीज़ें सीख रहा है, लेकिन फिर काम के बारे में सोच के उसे दुख था के उसका दूसरा बेटा भी इसी काम में आया



"क्या हुआ भाई साब, क्या सोच रहे हैं.." राजवीर ने अमर को यूँ खामोश देख कहा



"कुछ नहीं राजवीर, जो हो रहा है उसे वैसे ही चलने देना चाहिए, रिकी को उसकी पहली कमाई का कुछ हिस्सा तो मिलना चाहिए.." अमर ने अपनी जेब से फोन निकाला और किसी से बात करने लगा.. कुछ देर तक दोनो कुछ काम की बातें करने लगे और अमर वहाँ से बाहर की तरफ चल पड़ा.. अमर के जाते ही राजवीर फिर स्नेहा की तरफ चल पड़ा, जब नीचे नहीं दिखी तो वो उसके कमरे की तरफ बढ़ गया



"क्या मैं अंदर आ सकता हूँ स्नेहा.." राजवीर ने बाहर से नॉक करते हुए कहा जिसका जवाब स्नेहा ने हां में दिया



"देखा स्नेहा, मैं ना कहता था कि......." दरवाज़ा खोलते ही राजवीर ने जितने उत्साह में यह कहा, सामने का नज़ारा देख के उसका मूह खुला और ज़बान बाहर ही लटकी रह गयी.. जैसे कुत्ता बोटी को देख के अपनी ज़बान बाहर निकाल लेता है, वैसे स्नेहा के शरीर को बोटी के रूप में देख के राजवीर कुत्ते की तरह खड़ा उसे ही देख रहा था..



अंदर स्नेहा साड़ी ही बदल रही थी कि राजवीर ने दरवाज़ा नॉक किया था, राजवीर की आवाज़ सुन के, कुछ सेकेंड्स पहले बँधी हुई साड़ी को स्नेहा ने अपने शरीर से अलग कर दिया और उसे ऐसी अदा में पकड़ा जैसे वो साड़ी बाँध ही रही हो... स्नेहा के चुचों को उसके ब्लाउस से देख राजवीर की सिट्टी पिटी गुल हो चुकी थी










स्नेहा के आधे नंगे चुचे , उसका सपाट पेट , गहरी नाभि .... राजवीर एक एक चीज़ को घूर्ने लगा, ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो अभी का अभी किसी शिकारी कुत्ते की तरह उसपे टूट पड़ेगा और उसे नोच खाएगा..



"ओह, आइएम सॉरी अंकल, लेकिन साड़ी बाँध रही थी तो आपको बाहर खड़े रखना मुनसिफ़ नहीं लगा..., प्लीज़ एक मिनिट दें.." कहके स्नेहा ने फिर अपने बदन को साड़ी से ढका और सारी ठीक करने की आक्टिंग करने लगी...



"हां जी, बताइए, आप कुछ कह रहे थे.." स्नेहा ने राजवीर से कहा जो अब तक उसके शरीर के करेंट से सकपकाया हुआ खड़ा था..



"अंकल, आप ठीक हैं.." स्नेहा ने आगे बढ़ के उसके कंधे पे हाथ रख के कहा



"जी जीई आआहहा हजी ... उहह हान्ं.. मैं तो बस यीः यीहह यहह.. कककक कह रहा था कि....." राजवीर को कुछ होश नहीं था कि वो यहाँ क्यूँ आया था



"अंकल, एक सेकेंड, आप पानी पी लीजिए, आप ऐसे हकला क्यूँ रहे हैं.." स्नेहा ने राजवीर से कहा और उसे पानी दे दिया... पानी की कुछ बूँदें अंदर उतार के राजवीर को थोड़ा ठीक महसूस हुआ और स्नेहा के शरीर के जादू से बाहर आया



"फीलिंग बेटर... वैसे बहू में यहाँ ऐसे ही आया था, सोचा इतने दिन से बहू के साथ बैठ के बातें नहीं की, आज आराम से बैठ के बातें करते हैं... अगर तुम फ्री हो तो..." राजवीर ने उसके नंगे कंधे पे हाथ रख के कहा, उसके शरीर को महसूस करके, उसकी इतनी नरम और गरम चमड़ी पे हाथ रख के मानो राजवीर सब कुछ भूल गया, इतनी सुंदर और नरम त्वचा, इतनी बढ़िया खुश्बू, बालों से लेके पेर तक स्नेहा महक रही थी... राजवीर का ऐसे खोना लाज़मी था



"सही कह रहे हैं अंकल, आज आपको वक़्त मिल ही गया मेरे लिए" स्नेहा ने उसके हाथ को हटाने की कोशिश भी नहीं की, बल्कि और उससे सटके खड़ी हो गयी



"यही तो मैं सोच रहा हूँ, इतना वक़्त तुम्हे कैसे नहीं देखा मैने.... उम्म्म , मेरा मतलब है, मैने सोचा तुम्हे कुछ टाइम अकेला दूं ताकि तुम सँभाल सको खुद को.. खैर, अब तो वक़्त तुम्हारी ही है.. बताओ कहाँ चलें इतमीनान से बातें करने..." राजवीर ने अपने हाथ पीछे खींच के कहा



"जहाँ चलिए, मैं तो आपके साथ कहीं भी जाने को रेडी हूँ राजवीर..." स्नेहा ने इस बार आगे आकर राजवीर की आँखों में देख के कहा और ठीक उसके होंठों के पास अपने होंठ लाके उनपे बहुत ही कातिल अदा से अपनी जीभ फेर दी



"आइ होप यू डॉन'ट माइंड मी कॉलिंग यू... राजवीर..." स्नेहा के चेहरे पे फिर वोही जान लेवा मुस्कान आ गयी
 
"नो शीना, सच डीटेल्स आर नोट अवेलबल विद अस.. आइ मीन मेरे पास आक्सेस नहीं है इसका, आंड जो नंबर तूने दिया मुझे दट ईज़ स्विच्ड ऑफ सिन्स लास्ट 10-12 डेज़, लास्ट कॉल

डीटेल्स भी नहीं निकल सकता, क्यूँ कि वीआइपी नंबर था, अगर मैं वीआइपी नंबर की डीटेल्स निकालता हूँ तो मेरी नौकरी पे बन आएगी.." शीना को फोन पे जवाब मिला



"बट ए.वी... नौकरी की चिंता ना कर यार, तू मेरी यह हेल्प कर दे प्लीज़... आइ विल सी कि तू कोई ट्रबल में ना आए प्लीज़.." शीना मिन्नत करने लगी, पता नहीं कौनसी इन्फो निकाल रही थी



"सॉरी एसआर, मैं नहीं कर पाउन्गी, नौकरी की बात नहीं है, बट अगर कुछ हुआ तो नोन कंप्लाइयेन्स स्टेटस से निकाला जाएगा विच मीन्स एंड ऑफ माइ करियर... इसके अलावा इफ़ यू नीड

एनितिंग टेल मी, " फिर उसकी फरन्ड ने एक सीधा जवाब दिया



"फ्यू.व... लेट इट बी, बाइ.." शीना ने निराश होके फोन कट कर दिया और फोन को हाथ में घुमा घुमा के कुछ सोचने लगी


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"राजवीर.. अंकल से सीधे राजवीर...बड़ी तरक्की कर ली तुमने बहू.." राजवीर ने स्नेहा की कमर में हाथ डालकर खुद के पास खींच के कहा



"बेसब्र आदमी की यही तकलीफ़ है, गरम खाने से मूह भी जला देता है और ठीक से ख़ाता भी नहीं.." स्नेहा ने उसकी आँखों में देख के कहा. राजवीर उसकी बात को समझते ही उससे थोड़ा दूर हुआ और कमर से हाथ खींच लिया



"और तरक्की क्या, आप की और विक्रम की उमर में इतना ज़्यादा गॅप दिखता नहीं है, तो फिर जब मैं उसे नाम से बुलाती थी तो आप को भी तो बुला सकती हूँ...क्यूँ, आपको अच्छा नहीं लगा.." स्नेहा ने बहुत ही मादक तरीके से पूछा



"नये खिलाड़ी के साथ खेलने में यही तकलीफ़ है, खेलो को ठीक से समझना भी नहीं है और साथी खिलाड़ी में ग़लतियाँ भी काफ़ी निकालनी हैं .." राजवीर ने पलट के जवाब दिया जिसे सुन स्नेहा सिर्फ़ मुस्कुराती रह गयी



"अब चलें कहीं या यूही खड़े खड़े बातें करनी हैं.." राजवीर ने अपनी आँखें बड़ी करके कहा



"खड़ी हुई चीज़ें तो मुझे काफ़ी पसंद हैं राजवीर..." इस बार स्नेहा उसके पास आई और आँख मार के उसे जवाब दिया....



"चीज़ तो तुम हो, और तुम मुझे खड़ी हुई पोज़िशन में बिल्कुल भी पसंद नहीं आ रही..." राजवीर ने अपने होंठ उसके होंठों के पास ले जाके कहा



"तो कौनसी पोज़िशन में पसंद आउन्गि मैं आपको..मैं आपको निराश नहीं करना चाहती.." स्नेहा मूह से आग उगल रही थी, यह जिस्म की आग थी जो राजवीर के बदन की आग में घी का काम कर रही थी



"हर चीज़ सिर्फ़ कही नहीं जाती, कुछ चीज़ें करके दिखानी पड़ती हैं..फिलहाल तो आप यहाँ से चलिए, मैं अपनी गाड़ी में आती हूँ, तुम ओबेरोई पहुँचो अपनी गाड़ी में..

सी यू अट दा बार..." राजवीर ने उसके गालों पे अपने गाल रखे और वहाँ से अपने रूम की तरफ निकल गया



राजवीर इतना आसानी से जाल में फस जाएगा स्नेहा कभी नहीं जानती थी, राजवीर को इतना उतावला देख स्नेहा के दिमाग़ में फिर लालच ने जनम ले लिया



"2-3 करोड़ तो इससे भी आसानी से निकाले जा सकते हैं....ह्म्म्म, अब क्या कहूँ..सोचती हूँ चलो, " स्नेहा ने खुद से कहा और छुपते छुपाते अपनी गाड़ी के पास पहुँच गयी और नरीमन पॉइंट ओबेरोई के लिए निकल गयी



"धीरे धीरे राजवीर.. बहुत दिनो के बाद कोई नया शिकार मिला है, उफफफ्फ़...क्या गर्मी है साली में, देखो तो अपने चाचा ससुर के नीचे लेटने के लिए कितना जल्दी मान गयी...हाअययईई, उसके बदन की खुश्बू उम्म्म्म..... साली जो लंड पे वार करे जा रही है, कसम से, इसे तो रगड़ने में दुगना मज़ा आएगा..." राजवीर ने अपने कमरे में घुसते हुए खुद से कहा



"चलो, अभी तैयार हो जाते हैं..कहके राजवीर ने जैसे ही अपनी पॅंट उतारी, लंड की अकड़न देख अस्चर्य में आ गया, आज तक सिर्फ़ बातों से राजवीर को अकड़न कभी नहीं हुई,

लेकिन स्नेहा कुछ चीज़ ही अलग थी, जिस लड़की ने बातों से राजवीर जैसे मर्द के लंड का पारा बढ़ा दिया, वो बिस्तर पे तो कितनी गरम होगी.. यह सोच सोच के राजवीर का लंड और ज़्यादा फूल गया...



"आहहहा, मेरी बहू स्नेहा असईईईईई..." राजवीर ने एक पल लंड को हाथ में पकड़ा और चमड़ी धीरे धीरे पीछे की ओर लंड के टोपे को नाख़ून से रगड़ने लगा



"आआहः... धीरे धीरे राजवीर, कहीं यह भी ना निकल जाए हाथ से.." राजवीर ने फिर खुद से कहा और तैयार होने लगा स्नेहा के पास जाने के लिए



"हाई.. कॅन यू प्लीज़ बुक आ सूयीट फॉर आ डे.." स्नेहा ने रिसेप्षन पे पहुँच के रिसेप्षनिस्ट से पूछा, स्नेहा इस वक़्त नरीमन पॉइंट वाले ओबेरोइस में थी



"शुवर मॅम, सी फेसिंग ?" रिसेप्षनिस्ट ने पूछा



"यस, मेक दट..हियर'स दा आइडेंटिटी आंड कार्ड फॉर पेमेंट.." स्नेहा ने रिसेप्षनिस्ट के हाथ में देते हुए कहा



"ओके.. सो वी आर डन मॅम, थॅंक यू, एंजाय युवर स्टे." रिसेप्षनिस्ट ने उसके हाथ में आक्सेस कार्ड पकड़ाते हुए कहा



"आंड व्हेयर'स दा बार.." स्नेहा ने फिर पूछा और रिसेप्षनिस्ट के बताए हुए फ्लोर पे चली गयी



ओबेरोई'स में अमूमन फॉरिन टूरिस्ट्स ज़्यादा रहते थे और जो भी लोकल्स रहते थे, या तो वो बड़े कॉर्पोरेट्स होते थे या तो हाइ क्लास एस्कोर्ट्स वहाँ रातें रंगीन करने आती

और सुबह होते निकल जाती.. स्नेहा को ऐसी सारी में देख रिसेप्षनिस्ट के साथ वहाँ मौजूद टूरिस्ट्स सभी उसके शरीर के कटाव को देख के लार टपकाने लगे थे, उसके हर बढ़ते कदम के साथ लोगों के दिल पे एक खंजर सा चलता



"औछ्ह.. जस्ट लुक अट दोज़ स्वेयिंग हिप्स मॅन... शी ईज़ स्मोकीनन्न...." एक फिरंगी ने अपने पास वाले दोस्त से कहा सामने से स्नेहा को आते देख.. स्नेहा जब उसके पास से गुज़री तो उसने भी नोट किया उनकी नज़रों को और अपने हुस्न के दीदार करवा के उसके चेहरे पे भी एक दबी हुई मुस्कान आ गयी..



"उम्म्म, शी स्मेल्स नाइस.." फिर उस फिरंगी ने कहा जब स्नेहा उनके पास से गुज़र के बार की तरफ बढ़ी



"गुड आफ्टरनून मॅम... व्हाट वुड यू लाइक टू हॅव, स्कॉच, बर्बन ऑर वोड्का...." बारटेंडर ने स्नेहा से पूछा जब उसने अपनी मखमल जैसी गान्ड को बार के सीट पर टिकाया



"माल्ट... सिंगल माल्ट..." पीछे से मर्द की आवाज़ सुन स्नेहा पलटी तो राजवीर को अपने पास आता हुआ पाया... राजवीर को अपने पास आते देख स्नेहा एक पल के लिए उसके चेहरे को देख कहीं खो सी गयी... बला की खूबसूरती वाली स्नेहा, लेकिन राजवीर भी कुछ कम नहीं था.. डार्क ब्लू ब्लेज़र के नीचे वाइट शर्ट और ब्लू जीन्स, दाढ़ी बिल्कुल सॉफ और बाल गेल
से एक दम पीछे सटे हुए, आँखों पे डार्क ग्लासस..



"हेलो डार्लिंग..हाउ आर यू.." राजवीर ने स्नेहा के पास आके कहा और उसके हाथ को अपने हाथ में लेके चूम दिया



"उम्म्म, आर्मॅनी.. आइ लाइक इट..." स्नेहा ने उसके पर्फ्यूम की तारीफ़ करके कहा और तब तक दोनो की ड्रिंक भी आ चुकी थी



"तुम तो बड़ी एक्सपर्ट हो, स्मेल करके ही बता सकती हो पर्फ्यूम के बारे में.." राजवीर ने अपने होंठों से अपने ग्लास को लगाते हुए कहा



"राय बदलने में ज़रा वक़्त भी नहीं लिया आपने, अभी थोड़ी देर पहले मैं नयी खिलाड़ी थी और अभी एक्सपर्ट...ह्म्म्म, आइ आम इंप्रेस्ड.." स्नेहा के लाल होंठों ने भी उसके ग्लास को छुआ और जाम का मज़ा लेने लगी.. दोनो पास बैठे बैठे एक दूसरे की आँखों में देखते रहते और जाम पे जाम पीते जाते..



"समझ नहीं आ रहा ये माल्ट का नशा है या तुम्हारी आँखों का.." राजवीर ने अपना तीसरा पेग ख़तम करते हुए कहा



"बहू से फ्लर्टिंग कर रहे हैं..." स्नेहा ने यह बात ज़रा धीरे कही ताकि आस पास मौजूद कुछ लोग सुन ना सकें



"वैसे जब ससुर पीने बैठता है तो बहू शरम के मारे बाइटिंग सर्व करने में भी हिचकिचाती है, पर तुम जैसी बहू जब ससुर को पीने में कंपनी दे रही है तो शरम को भी शर्मिंदा होना पड़ेगा.." राजवीर ने दोनो के लिए फिर पेग रिपीट करवाते हुए कहा



"ससुर बहू की तो दूर की बात है, अब जब लोग देवर भाभी के रिश्ते के बारे में भी नहीं सोचते, तो इसमे हमारी क्या ग़लती" स्नेहा ने अपने चुचों को हल्के से तान के कहा



"ह्म्‍म्म, जब देवर भाभी के बारे में जानती हो तो फिर ससुर बहू को भी कैसी शरम.." राजवीर अपने पूरे शबाब पे था, स्नेहा के मूह से अपने और सुहसनी के बारे में सुन उसे झटका लगा था लेकिन माहॉल ऐसा बन गया था के वो उसे इग्नोर करके आगे ध्यान देना चाहता था



"शरम तो औरत का गहना है... हमें तो पहनना ही पड़ेगा" स्नेहा भी पीछे हटने को तैयार नहीं थी



"तुम्हारे बदन पे तो मुझे एक भी गहना नहीं दिख रहा.. पहनना भूल गयी हो या जान बुझ के नहीं पहना.." राजवीर ने अपनी नज़र उसके बदन पे उपर से लेके नीचे तक फिरा के कहा



राजवीर की इस बात का जवाब स्नेहा के पास नहीं था, शब्द कम पड़ने लगे, सोचते सोचते खामोश हो गयी और अपनी ड्रिंक ख़तम करने लगी.. मानसिक तोर से राजवीर की जीत थी

ये, बिना कुछ ज़्यादा कहे वो भी अपनी ड्रिंक पीने लगा और आगे के बारे में सोच रहा था, ड्रिंक्स के बाद वो क्या करेगा या क्या कहेगा स्नेहा से



"बारटेंडर.. प्लीज़ पुट दिस ऑन माइ टॅब...." स्नेहा ने उसे रूम का कार्ड देते हुए कहा और राजवीर की आँखों में देखने लगी



"रूम नंबर 3007..." स्नेहा ने राजवीर की आँखों में देखते हुए कहा और बारटेंडर से कार्ड लेके चली गयी...



"भैनचोद, रूम भी लेके बैठी है और मैं चूतिया बैठे बैठे आगे क्या करना है वो सोच रहा था.. सावधानी से खेलना पड़ेगा अब राजवीर..अब अगर यहाँ से भी बाज़ी फिसली तो समझ ले, तू चूतिया ही है.." राजवीर ने अंदर ही अंदर खुद से कहा और घड़ी में वक़्त देखा..



"ह्म्‍म्म, अभी 15 मीं के बाद जाता हूँ, बारटेंडर, वन लार्ज प्लीज़, ऑन दा रॉक्स.." राजवीर ने पहले खुद से कहा और फिर अपने लिए एक जाम और मंगवा दिया



जैसे जैसे वक़्त बीत रहा था वैसे वैसे राजवीर की नज़र घड़ी पे पड़ती और साथ उसके दिल धड़कने की गति भी बढ़ जाती, धीरे धीरे चढ़ रहे माल्ट के सुरूर की वजह से अंत वक़्त पे जाके उसके दिल की स्थिति नॉर्मल हुई, ग्लास रख के एक बार लंबी साँस ली और खुद को ठीक तक कर के स्नेहा के कमरे की तरफ बढ़ गया.. जैसे जैसे कमरा नज़दीक आता, वैसे वैसे फिर उसका दिल ज़ोरों से धड़कने लगता...



"3007..." राजवीर ने खुद से कहा और दरवाज़े की बेल पे हाथ रख दिया



"कम इन प्लीज़.." स्नेहा ने अंदर से आवाज़ दी, राजवीर ने एक बार फिर लंबी साँस छोड़ी और अंदर चला गया



"आइए आइए हुज़ूर... आप के लिए तो हमारे दरवाज़े कभी बंद थे ही नहीं.." स्नेहा ने सोफे पे बैठे बैठे राजवीर से कहा... सोफे पे बैठी हुई स्नेहा की सारी उसके बदन से अलग हो चुकी थी, उसकी सफेद चमकती चमड़ी को देख राजवीर से रहा नहीं गया और उसने भी अपना ब्लेज़र उतार ज़मीन पे ही फेंक दिया.. कुछ कदम राजवीर आगे बढ़ा और स्नेहा
भी उठ उसके पास बढ़ी, आमने सामने आते ही दोनो बिना कुछ कहे या किया एक दूसरे के होंठों पे टूट पड़े

 
"उम्म्म्म, अया सक मी अहाहहाआहा यस चाचा जी अहहहहा....उम्म्म्म स्लूर्र्रप्प्प आहाहहाः...." स्नेहा सिसकती हुई बोलने लगी




सुबह से दोनो एक दूसरे के बदन की गर्मी को हवा दे रहे थे और अपने अपने बदन की गर्मी को काबू किए हुए थे, इसलिए इस वक़्त दोनो के अंदर एक लावा फुट पड़ा और दोनो से अब एक सेकेंड भी रुका नहीं गया, चूस चूस के दोनो एक दूसरे की जीभ को चाटने में लगे हुए थे



"अहहहहा , बहू रानी उफफफ्फ़ अहहहौमम्म्मम, इतना अच्छा किस कहाँ से सीखा अहहाहा उफफफफूम्म्म्ममम ओह्ह्ह एयेए यीहह.." राजवीर भी उसका साथ देने लगा



"उफ़फफूफम्म्म्मम यस चाचा सक अहहहा...सीखने की क्या ज़रुआाहहा रत्त्त है..... हम तो खानदानी रंडियों में से हैं अहहहा येस्स्स्स्स सक मी ना अहहहहा..." स्नेहा अपने नीचे गीलापन महसूस करने लगी थी, यह भी पहली बार था कि किसी मर्द के हाथ लगाए बिना वो नीचे से पहली बार गीली हुई थी




"उम्म्म स्लूर्र्रप्प अहहह... हमें तो पता ही नही था आहहहहा..धीरे काटो मेरी रानी आआाहम्‍म्म्मम...बहुत मीठी हो सस्सिईइ... खानदानी रंडी आहहहूऊओ...और कौन कौन है तेरे खानदान में रंडी अहहहहाअओई,,,..." राजवीर भी अपनी शर्ट उतारते हुए बोलने लगा



"फिलहाल तो मैं ही हूँ अहहहओमम्म्म हहहहीए..."स्नेहा ने अपनी जीभ को उसकी जीभ से अलग किया और उसके नंगे सीने पे हाथ फेरने लगी



"अहहहा मैं जानती थी कि आप असली मर्द हो....उम्म्म्ममम, क्या सीना है.... क्या तो आहहह... हिहिहीही.." स्नेहा उंगली फेरते हुए उसके पेट पे आई और धीरे धीरे कर उसके खड़े लंड पे जीन्स के उपर से हाथ रख दिया..



"अहहाहा,,, असली माल तो यहाँ है मेरे चोदु ससुर जी...आहमम्म..."स्नेहा ने अपने होंठों पे जीभ फेरते हुए कहा और राजवीर की जींस के बटन को खोलने लगी.. बटन खोलते ही राजीव के बॉक्सर्स में उसके लंड की साइज़ को भाँप लिया



"उम्म्म, जैसा भतीजा, वैसे ही चाचा... उफ़फ्फ़ हाअई.ए..."स्नेहा ने राजवीर की आँखों में देखते हुए कहा और देखते ही देखते उसके बॉक्सर्स को भी उसके शरीर से अलग कर दिया और राजवीर का लंड उसकी आँखों के सामने आ गया



"हाए, आहहाहा कितना प्यरा तगड़ा लंड है आपका चाचा जी.....उम्म्म्ममम" स्नेहा रंडीपने की हदो को पार करना चाहती थी.. उसने एक बार फिर अपनी आँख उठाई और राजवीर की आँखों में देखते ही देखते अपनी जीभ को राजवीर के लंड के टोपे पे रख दिया..



"आआहहह बहुउऊुुुुउउ..." राजवीर ने एक लंबी सिसकारी छोड़ी


"हिहीही...बोलिए ना ससुर जी, आपकी सेवा ही तो कर रही हूँ...." स्नेहा ने जीभ फेरते हुए कहा, और अजवीर की तड़प को अपनी आँखों से देखने लगी



"उहह येस्स्स्सह्ह्ह्ह फकक्क्क्क....ओह्ह्ह्ह एआहह.." राजवीर मज़े लेते हुए बोला और एक हाथ उसकले माथे पे रख के अपने लंड को उसकी हलक के नीचे उतारने की कोशिश करने लगा,

स्नेहा भी काफ़ी गरम हो चुकी थी इसलिए बिना किसी ज़िद्द के राजवीर के लंड को अपनी हलक के नीचे उतार दिया और उसे बड़े प्यार से चूसने लगी



"उम्म्मममुंम्म्माहहहाहा स्लूरप्प्पाहाहहा.... यस पापा, अहहहा, फक युवर डॉटर अहहाहा.....पापा चोदिये अपनी बहू को अहहहौमम्म्मम..स्लूरप्प्प अहहाहा..... अहहाहा स्लूरप्रप्प्प

अहहहाहा.." स्नेहा राजवीर के लंड को चुस्ती और दूसरे हाथ से उसके टट्टों को सहलाने लगी.... जैसे जैसे स्नेहा अपनी तेज़ी बढ़ाती, वैसे वैसे राजवीर भी अपने पेर आगे पीछे करता और स्नेहा के मूह को चोदने लगता...



"अहहाहा बहू रानी अहहहाइईइ..ऐसे ही सेवा कर अपने ससुर की उईईयाहहहह...खुश कर दूँगा मेरी रानी तुझे अहहहा......" राजवीर ने आख़िर वो कह दिया जिसके लिए स्नेहा यहाँ आई थी, इसलिए बड़े चाव से लंड को चुस्ती और चाटती रही



"हाए बाबू जी अहहाहा, इतने दिन तो हम से दूर थे, अब बहू पे प्यार आ रहा है अहहाहा... जाइए हम नहीं चूस्ते आपके लंड को...हिहिहीही" स्नेहा ने एक रंडी हँसी छोड़ी और राजवीर के लंड को मूह से निकाल के सोफे की तरफ भागी और हवा में अपनी गान्ड हिलाने लगी...





राजवीर अब बिल्कुल भी मूड खराब करना नहीं चाहता था अपना, इसलिए वो भी उसके पीछे गया और उसकी नंगी गान्ड को देख के कस्के एक थप्पड़ जड़ दिया




"ओह हो अहाहहा बाबू जी, अभी तो अपनी बहू को खुश करना चाहते थे, अभी मार रहे हैं अहहहा.." स्नेहा ने तड़प से कहा



"बोल ना मेरी बहू रानी क्या चाहिए तुझे..तेरी गान्ड हमे भी दे दे ना..." कहके राजवीर ने अपनी जीभ से उसकी गान्ड को चाटना शुरू किया और दूसरा हाथ पीछे से उसकी चूत में डाल के उसे उंगली से चोदने लगा, और एक अंगूठा उसकी गान्ड के छेद में घुसा दिया



"अहहाहा पापा...उईईइ नूऊ, खुश कीजिए ना पापा, आप को जैसे ठीक लगी...अहहाहा, हां और ज़ोर से अहहहहा.." स्नेहा ने यह कहके अपनी गान्ड को पीछे धकेला, जिससे राजवीर समझा और अपनी जीभ स्नेहा की गान्ड में घुसा के उसे चाटने लगा और उसके अंदर थूक थूक के उसे गीला करने लगा





"अहहाहईए पापा..... कैसे खुश करेंगे बताइए नाअ हाहहह.....हां और ज़ोर से चोदिये ना पापा जीभ से अहहहा... मेरे ससुर आहहहा आज बहू चोद बन गये आअहहु..."

स्नेहा चिल्ला चिल्ला के चुदने के मज़े लेने लगी



"बोल ना मेरी आहहाः राणिीई अहाहा..स्लूर्रप्प्प्प स्लूर्रप्प्प अहहहहाआ...क्या चाहिए तुझे अहाहहाअ...मेरी रखैल है तू अब से अहहहाहा .." राजवीर बीच बीच में गान्ड चाट के बोलता





"रखैल कहाँ मूह खोलती है पापा अहाहा... आप लगाइए ना कीमत अहहहा..."स्नेहा उछल उछल के अपनी गान्ड चटवा रही थी



"जो तू बोल रानी अहहहा.... घर चल के चेक बुक ले लेना, 1 करोड़, 5 करोड़, 10 करोड़ जितना भरना है भर ले..अहाहा, राजस्थान की कोठी ले ले तेरे नाम से अहाहाआ, ऐसी रखैल के लिए तो मैं मर भी जाउ तो गम नहीं अहाहहा...." राजवीर ने उसकी गान्ड को काफ़ी गीला किया और अपने लंड को उसकी गान्ड के छेद पे सेट किया और एक ही झटके में अंदर डाल दिया



"हाअए पाअपाप्पाआ.... आररर गाइ उफफफफफ्फ़...धीरे चोदिये न आहहहाआ...आप की ही हूँ मैं पापा अहहहाआ...." स्नेहा ने चिल्ला के कहा पर राजवीर पे उसका कोई असर नहीं हुआ

और वो ज़ोर ज़ोर से धक्के देने लगा... जैसे जैसे धक्के बढ़ते गये, वैसे वैसे दर्द के साथ मज़ा घुलने लगा और स्नेहा भी हवा में गान्ड उठा उठा के चुदवाने लगी









"अहाहा पापा.. आहहा फक मी, यस फक युवर डॉटर इन लॉ पापा... अहाहा, यस पापा... आज बहू चोद बन गये ना पापा आहाहहा..." स्नेहा उछल उछल के मज़े लेने लगी



"अहाहाआ हां मेरी बेटी अहाहहाअ... बहू चोद बन गया आहाहहा आज से..... क्या गान्ड है तेरी मेरी बेटी अहहहा.."राजवीर चोदते चोदते बोलने लगा



"बेटी नहीं पापा आहाहहाअ.. बहू हूँ अहाहा, आप की बेटी तो घर पे है ना अहहाअ,, दो रंडिया आपकी उईईइ अहहाहा.... शीना और ज्योति.. हैं ना पापा...अहहा यस फक मी ना

पापा..... ओह्ह माइ ग्ग्गूड्डद.... और ज़ोर से कीजिए ना पापा आहहाआ..." स्नेहा ने आग में पूरा का पूरा घी उडेल दिया.. शीना और ज्योति का नाम सुन के राजवीर की तेज़ी और बढ़ गयी और किसी मशीन की तरह चोदने लगा स्नेहा की गान्ड को..




"अहहाहा हाए पापा, अपनी बेटियों का नाम सुन के बड़े तेज़ हो गये अहाहहाअ..... रुकिये ना पापा... अहहा, अपनी बेटी की चूत मारिए ना अहाहाआ.." स्नेहा ने कहा और राजवीर तुरंत रुक गया.. राजवीर के रुकते ही स्नेहा ने अपनी गान्ड को उसके लंड की गिरफ़्त से आज़ाद किया और राजवीर को सोफे पे लेटा दिया और अपनी चूत को उसके लंड पे रख के उसपे धीरे धीरे कर उछलने लगी










"आहहाहा हां पापा अहाहा, अब बताइए, कौनसी बेटी की आहाहहहा चूत है यह अहाहा...." स्नेहा धीरे धीरे उछल रही थी और राजवीर उसकी कमर को सहला रहा था..




"अहहाहा बोलिए ना पापा, अहहाहा मैं शीना हूँ या ज्योति अहहहा...बेटी चोद बनिये ना पापा..अयीई अहाहा, " स्नेहा ने एक हाथ नीचे ले जाके उसके टटटे को मसल दिया





"कोई भी बेटी बन जा मेरी बहू अहाहा, दोनो ही रंडिया हैन्न अहाहा....." राजवीर ने कहा और अगले ही पल उसकी दिल की बात ज़बान पे आ गयी





"अहाहहा मेरी शीना बेटी अहहाहा...पापा के लंड को लो ना अपनी चूत में अहाहहा.."





"शीना को ज़ोर से चोदिये ना पापा अहहहाहा ह्म्म्म और ज़ोर से प्लीज़ पापा अहहहा...." स्नेहा ने बस इतना ही कहा के राजवीर ने नीचे से धक्के लगाना शुरू किया और उसकी चूत की कुटाई करने लगा




पूरे कमरे में सिर्फ़ चुदाई ही चुदाई की आवाज़ें आ रही थी, लंड से चूत के टकराने की, स्नेहा की सिसकियाँ, बाप बेटी के नाम, शीना ज्योति सब एक पल के लिए राजवीर से चुदवा ही रही थी... "थ्हप्प्प्प थप्प्प्प्प.. अहहहाहा पापा फक मी आआहहः... यस बेटी पापा से चुदवाओ ना अहहहहा..." ऐसी सब आवाज़ों से माहॉल काफ़ी गरम हो उठा, स्नेहा के बाल
बिखर चुके थे, किसी रंडी से कम नहीं लग रही थी वो..




"अहहाहा पापा.... ज्योति की चुदाई कब करेंगे पापा...हाहाहा बताइए ना मेरे भडवे बेटीचोद पापा..." स्नेहा ने बस इतना ही कहा के राजवीर के लंड ने एक हुंकार भरी , जिसे राजवीर ने भी महसूस किया और चूत से लंड निकाल के, स्नेहा को नीचे बिठाया और उसके मूह पे अपना गरम माल छोड़ने लगा






"अहहहाहाः ज्योति अहहहाहा आइएम कमिंग अहहहहहाहा.." राजवीर ने ज़ोर से हुंकार भर के कहा और उसका लंड अपना सारा माल उगलने लगा, नीचे बैठी स्नेहा ने भी रंडी पन कम नहीं किया, मूह खोल के उसके सारे माल को चूसने लगी और तेज़ी से फिर से उसके लंड को खाली करने लगी...





"अहाहहा.... ओह्ह्ह्ह...... फ़फफुऊऊऊउक्ककककक....." राजवीर लंबी साँसें छोड़ता हुआ बेड पे जा लेटा और स्नेहा भी उसकी बाहों में जा सिमटी... दोनो की साँसें बहुत तेज़ चल रही थी, इसलिए बिना कुछ बोले कुछ देर यूही लेटे रहे...





"आप तो अपनी बेटी के नाम से ही निढाल हो गये राजवीर....हूउहह अहहाहा ऊऊ.." स्नेहा ने लंबी साँसें लेते हुए कहा





"आहाहाहा... साली अयाया है ही असी चीज़्ज़....उफ़फ्फ़.फ..कड़क अहहहाआ.." राजवीर ने कुछ ढकने की कोशिश नहीं की, स्नेहा को पता चले तो चले , यह सोच उसने जवाब दिया





"अहहः.... अब बताइए, मुझे क्या देंगे आप खुश करने के लिए..." स्नेहा ने मुद्दे की बात पे आके कहा




"क्या चाहिए, बोल ना मेरी रंडी बहू अहाहा.." राजवीर ने उसे अपने पास खींचा और फिर उसके होंठों को चूसने लगा





"ज्योति तो आपकी सग़ी बेटी नहीं है...आपकी जायदाद कीजिए मेरे नाम, मैं भी मानूं कि आप अपनी ज़बान के मर्द हैं..." स्नेहा ने ऐसी बात कही जिसे सुन राजवीर के होश ही उड़ गये...