Antarvasna kahani वक्त का तमाशा - Page 8 - SexBaba
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Antarvasna kahani वक्त का तमाशा

क्रिकेट अब सिर्फ़ एक खेल नहीं रहा, क्रिकेट अब एक बिज़्नेस बन चुका है.. ए प्यूर कमर्षियल बिज़्नेस, टीवी राइट्स, मीडीया राइट्स, ब्रॉडकॅस्टिंग राइट्स से लेके कौनसा प्लेयर कौनसी एड साइन करेगा, कितने में साइन करेगा, उसमे से कितना BCCई को मिलेगा, कितना नहीं.. कौनसा प्लेयर बात पे कौनसा स्टिकर लगाएगा, कौनसा स्पॉन्सर टी-शर्ट के स्लीव पे रहेगा, कौनसा साइड में, यह सब बातें अब ज़्यादा देखी जाती है.. यह तो हुई बिज़्नेस की बात, अब अगर बात की जाए खेल की, तो क्रिकेट अब एक मज़ाक बन चुका है... लोगों को लगता है क्रिकेट मैदान पे खड़े हुए 11 प्लेयर्स खेल रहे हैं, लेकिन असलियत कोई नहीं जानता... एक फोन पे सब तय होता है.. कौनसा प्लेयर कब बॅटिंग करने आएगा, कौनसा प्लेयर इंजूर्ड होके आउट रहेगा, कौनसा प्लेयर कितने रन पे आउट होगा, कैसे आउट होगा, कौनसा बोलर ओवर डालेगा, कौनसा नहीं... यह सब तय होता है, और यह सब डिसाइड होता है किसपे कितने पैसे लगे हैं उस हिसाब से.. जिसपे जितने ज़्यादा पैसे, उसको उतनी जल्दी आउट होने को कहा जाता है... काफ़ी बार हमे सामने वाले को जीतवाना भी पड़ता है,

इसलिए जिस दिन जुआरी जीते, समझ लो उसके अगले 10 दिन तक वो आपको पैसे देता रहेगा.... हारा हुआ जुआरी डबल खेलता है यह बात हमेशा याद रखी जाती है....... राजवीर और रिकी विक्रम के ऑफीस में बैठे थे, जो नाम के लिए तो एक कन्स्ट्रक्षन कंपनी थी, लेकिन बस नाम की ही थी... रिकी राजवीर की बातों को ध्यान से सुन रहा था, समझने की कोशिश कर रहा था, लेकिन राजवीर की बात ख़तम होते ही रिकी को शायद कुछ समझ नहीं आया, तभी जैसे उसकी आँखें पढ़ के राजवीर ने फिर कहा



"तुम्हे क्या लगता है, हर वर्ल्ड कप में इंडिया पाकिस्तान की मॅच सनडे को ही क्यूँ होती है, क्यूँ कि उस दिन देश का हर क्रिकेट प्रेमी जो अब हद्द पार करके चूतिया बन चुका है, वो 10 घंटे टीवी के सामने बैठा रहेगा, जितने ज़्यादा लोग टीवी देखेंगे, उतनी ज़्यादा ऐड्स बिकेगी. जितनी ज़्यादा व्यूअरशिप उतने ज़्यादा एड के पैसे, जितने ज़्यादा एड के पैसे, उतना ज़्यादा चॅनेल की कमाई और उतना ही मुनाफ़ा BCCई का.. हां दिखाने के लिए शेड्यूल इक रिलीस करेगी, लेकिन ईCC में जब अपना ही बंदा चेर्मन बन के बैठे, तब और क्या उम्मीद कर सकते हैं आप.... " राजवीर ने अपने लिए एक सिगरेट जला के कहा



"लेकिन चाचू, यह सब कैसे.. आइ मीन कोई खिलाड़ी ऐसे कैसे करेगा... " रिकी अभी भी कन्विन्स्ड नहीं लग रहा था...



"रिकी, कभी भी तुम मॅच अब्ज़र्व करना... जब भी बॅटिंग वाला प्लेयर बहुत अच्छा खेल रहा हो, और ऐसा लगे मॅच जिता देगा, उस वक़्त किसी भी बहाने , ग्लव्स चेंज करने या बात बदलने के बहाने या पानी के बहाने ड्रेसिंग रूम की ओर इशारा करता है... उस वक़्त से लेके सिर्फ़ दो ओवर्स वेट करो, वो सेट बॅट्स्मन आउट होके ही रहेगा...." राजवीर ने रिकी से कहा और उसे कन्विन्स करने के लिए एक सीडी दिखाई जिसमे कुछ साल पहले की इंडिया पाक मॅच थी , जिसमे राजवीर ने जैसे कहा वैसे ही हुआ... ऐसी कयि सारी रेकॉर्डिंग्स थी राजवीर के पास..



"देख लो, यह सब तुम्हे कन्विन्स करने के लिए काफ़ी है.." राजवीर ने उसके हाथ में एक बंड्ल पकड़ाते हुए कहा.. सीडी'स लेके जब रिकी कुछ नहीं बोला तब राजवीर ने फिर कहा



"एशियन टीम्स की मॅचस लाइक इंड पाक लंका और बांग्ला... और आफ्रिका की मॅचस, इन सब में सबसे ज़्यादा पैसा लगता है.. हां काफ़ी चीज़ें पहले तय होती है वैसे ही करनी पड़ती है, लेकिन कई बार सिचुयेशन के हिसाब से डिसिशन बदलने भी पड़ते हैं, उसमे हमे टीम मॅनेजर और कोच काम आता है..." राजवीर ने जैसे ही मॅनेजर और कोच का नाम लिया वैसे रिकी की आँखें बड़ी हो गयी.. रिकी को यकीन नहीं हो रहा था कि यह लेवेल तक टीम के बन्दो का इन्वॉल्व्मेंट है....



"और चाचू आइपीएल..." रिकी ने बस इतना ही पूछा



"हाहः, मज़ाक करने के लिए BCCई के अपने बंदे ने अपना दिमाग़ चलाया, लंडन में पढ़ा लिखा बिज़्नेस टिकून का लड़का, एक दिन शाम को मॅनचेस्टर सिटी के स्टेडियम के बाहर से जा रहा था, कि तभी उसकी नज़र सामने बोर्ड पे गयी.... एपीएल मॅच मॅन युनाइटेड स्ट्रीट आस्टन विला.... कुछ देर वहीं खड़े रहके कुछ सोचा, घर आके एपीएल के कॉन्सेप्ट को क्रिकेट में डाला, और उसे आइपीएल का नाम दे दिया... आइपीएल सिर्फ़ स्पॉन्सरशिप पे चलती है, ओनर्स के दो नंबर के पैसों का हिसाब रखना मुश्किल है , इसलिए वो लोग आइपीएल में आए हैं.... आइपीएल में टॉस के विन्नर से लेके, कौनसा प्लेयर कौनसी जर्ज़ी पहनेगा इन सब पे पैसा लगता है.. यह कोयिन्सिडेन्स नहीं हो सकता रिकी, कि पूरे सीज़न में एक वेस्ट इंडीस का हप्सी प्लेयर 100-100 रन बनाता है, अपने नाम से स्टोर्म लाता है, और हर बड़ी क्रूशियल मॅच में वो फैल होता है.. पूरा सीज़न उसका पैसा बढ़ता है, पूरी सीज़न हम उसको खेलने के लिए कहते हैं, और फाइनल में जब सबसे ज़्यादा पैसा उसपे लगता है, तब हम अपना काम शुरू करते हैं... यह रही इस बात को साबित करने वाली सीडी'स" राजवीर ने दूसरी सीडी'स का बॉक्स देके कहा



"पर चाचू, हम इनसे मिलते कैसे हैं... आइ मीन हमारा नंबर या ऐसा कुछ कभी ट्रेस नहीं होता.." रिकी ने फिर सीडी लेके सवाल पूछा



"हां कई बार हुआ है, इसलिए हमें और इपल् ओनर्स को सिम कार्ड्स BCCई देती है, जब मैं किसी ओनर से बात कर रहा हूँ, तब रेकॉर्ड्स के हिसाब से BCCई ऑफीसर दूसरे BCCई ऑफीसर से बात कर रहा है... ड्रेसिंग रूम के आस पास तक नहीं जाते और हमारा काम हो जाता है, और हर इपल् से पहले इंडिया की एक विदेशी टूर रहती है, वहाँ मीटिंग भी करते हैं, वहाँ मीडीया थोड़ा सा लो रहता है तो हमे अच्छा चान्स मिलता है..." राजवीर की बातें सुन रिकी खामोश हो गया था... उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या करे, अमर को दी हुई ज़बान उसे बार बार याद आ रही थी, लेकिन यह काम में ख़तरा ही ख़तरा था



"ज़्यादा सोचो नहीं रिकी, यूआर एनीवे शॉर्ट ऑफ ऑप्षन्स.. आइ मीन नो ऑप्षन्स, अब भाई साब से कह चुके हो तुम यह काम करोगे, सो वेलकम टू दा क्लब..." राजवीर ने उसे एक फोन पकड़ते हुए कहा, रिकी ने चुपचाप वो फोन ले लिया और उसे जेब में रख दिया... तुम जब कहो तब से शुरू कर सकते हो, अब से मेरे साथ बात करने के लिए इस फोन से कॉल करना..." राजवीर ने अपना फ़ैसला सुनाया और वहाँ से निकल गया रिकी को पीछे छोड़, जिसके मन में कई सवाल थे, लेकिन सवालों से ज़्यादा था यह ख़याल के वो अब ग़लत काम करने वाला है.. ऐसा काम जिसे हराम कहाँ जाता है बाहर की दुनिया में, जुआरी... जुआरी शब्द से बार बार रिकी के दिल में एक नफ़रत की आँधी आ जाती , लेकिन अब वो कुछ नहीं कर सकता था.. अगर वो अमर से मना करेगा तो अमर का दिल दुख सकता है और अगर नहीं करेगा तो रोज़ घुट घुट के जाएगा, रोज़ खुद को जुआरी बना देख जीएगा... कॅबिन में विकी की फोटो देख रिकी ने अपने कालजे को मज़बूत किया और फ़ैसला कर लिया...




"करना तो पड़ेगा ही, अब अगर मैं नहीं करूँगा तो शीना थोड़ी करेगी.." रिकी ने खुद से कहा और तुरंत ही उसे ख़याल आया के शीना से बात करनी चाहिए इस मामले में.. वो तुरंत वहाँ से निकला और शीना को फोन करके कोलाबा स्टार बक्स बुला लिया...



"इतना अर्जेंट क्या आ गया अब... आप इतने परेशान क्यूँ हैं..." शीना ने रिकी के पास बैठ के कहा



"पहले तुम बताओ, क्या था सुबह को जो इतनी परेशान थी.." रिकी ने शीना का हाथ पकड़ के कहा...



"नतिंग, मेरी फरन्ड है, मैने उससे काफ़ी टाइम से बात नहीं की थी, लेकिन अब उसका फोन नहीं लग रहा काफ़ी टाइम से, उसके घर पे देख के आई, लेकिन कहीं कोई पता नहीं, इसलिए थोड़ी सी परेशान थी.. लेकिन अभी मेरी बात हुई, तो आइएम फीलिंग बेटर.." शीना ने बड़े ही नॉर्मल लिहाज़ में जवाब दिया और झूठ बोली, लेकिन रिकी जानता था कि वो झूठ बोल रही है क्यूँ कि इस बात के लिए शीना परेशान हो वो ऐसी नहीं थी.. फिलहाल बहेस करने के मूड में नहीं था रिकी इसलिए उसने उसकी बात मान ली



"अब आप बताइए, क्या हुआ..." शीना ने अपने हाथ को उपर लाके रिकी पे रखा.. रिकी ने उसे सब बातें बता दी, जो सुबह से उसने देखा था, जो राजवीर ने कही... रिकी की बात सुन पहले तो शीना को समझ नही आया, लेकिन जब धीरे धीरे बात उसके भेजे में उतरी, तब उसकी आँखें बड़ी होती चली गयी और मूह धीरे धीरे खुलने लगा




"ओह माइ गॉड... यू मीन,... ऑल दिस मनी.." शीना ने बस इतना ही कहा के रिकी ने उसे टोक दिया



"यस, ऑल दिस ईज़ ब्लॅक..." रिकी ने इतना कहा और दोनो कुछ देर वहीं बैठे रहे



"क्या बात है आज कल रिकी को खूब अब्ज़र्व कर रही हो हाँ.." स्नेहा ने ज्योति से कहा, दोनो इस वक़्त स्नेहा के कमरे में बैठे थे और बातें कर रहे थे



"नहीं भाभी ऐसी कोई बात नहीं है, इट वाज़ जस्ट..." ज्योति ने इतना ही कहा कि फिर स्नेहा टोक के बोली



"या या आइ नो यूआर जस्ट.... खैर, फिलहाल चुप रहो, तुम्हे तुम्हारे इस सवाल का जवाब मिलेगा, अभी दिमाग़ में कुछ भी ख़याल नहीं लाना, अभी बस दिमाग़ को ठंडा रखो, जितना ज़्यादा चलाओगी, उतनी ज़्यादा तक जाओगी.. बेहतर रहेगा तुम चिल मारो, तुम्हारे हर सवाल का जवाब तुम्हे ज़रूर मिलेगा, बस सही वक़्त आने दो..." स्नेहा ने जवाब में कहा और ज्योति फिर खामोश रही... अपने दिमाग़ को काबू करने की कोशिश कर रही थी और काफ़ी हद तक इसमे कामयाब भी हो रही थी, जब से स्नेहा ने उसे समझाया था, तब से ज्योति जैसे बच्चों की तरह उसकी बात को मानती...



"अच्छा अब यह तो बता, गोआ में क्या मज़े किए मेरी बिल्लो रानी..." स्नेहा ने एक ही पल में अपने हाथ को आगे बढ़ाया और शीना के चुचों को हल्के से मसल के वापस हाथ खींच लिया, स्नेहा की इस हरकत से ज्योति अचंभित रह गयी लेकिन गोआ के ख़यालों में चली गयी



"ज्योति.. ज्योति, व्हेअर आर यू..." कहके राजवीर जैसे ही बाथरूम का दरवाज़ा खोल के बाहर निकला , सामने ज्योति को देख उसकी आँखें दंग रह गयी, दिमाग़ जैसे फटने को था... उसे विश्वास नहीं हो रहा था सामने ज्योति को देख



"सॉरी डॅड, स्विम्मिंग करके काफ़ी थक चुकी थी... इसलिए ऐसे ही सोफा पे लेट गयी, जस्ट तो स्ट्रेच आउट.."











ज्योति ने राजवीर की आँखों में देखा और उसी पल नज़र नीची करके राजवीर के बाथिंग गाउन में दिख रहे तंबू को घूर्ने लगी और हल्के से निचले होंठ पे आनी ज़बान फेरने लगी.. राजवीर को समझ नहीं आ रहा था के यह सब वो ऐसा क्यूँ कर रही है... लेकिन उसने कुछ नहीं कहा और सामने जाके बैठ गया जिससे ज्योति को ना दिखे के उसका लंड अपनी ही बेटी को देख के तूफान मचा रहा है....



"डॅड... क्या मैं आपके साथ स्कॉच ले सकती हूँ..." ज्योति ने सोफे पर से खड़े होके कहा और अपने नंगे जिस्म के हिस्सों के दर्शन करवाने लगी राजवीर को, राजवीर बेचारा कुछ नहीं बोला और बस हां में गर्दन हिला दी... सोफे से लेके बार तक ज्योति गान्ड थिरका थिरका के गयी और राजवीर की नज़रें उसके चुतड़ों पे ही जमी रही...



"चियर्स डॅड...." ज्योति ने अपने और अपने बाप के लिए पेग बनाते हुए कहा.. राजवीर को लगा दो स्कॉच जाएगी अंदर और उसे थोड़ी हिम्मत आएगी ज्योति से बात करने की.. इसलिए एक ही झटके में अपने पेग को ख़तम किया और दूसरे का इशारा कर दिया ज्योति से... दो, तीन चार... चार पेग नीट लेने के बाद राजवीर का कलेजा जल रहा था, लेकिन अब उसे वो हिम्मत आ गयी थी जो उसे चाहिए थी ज्योति से बात करने के लिए



"ज्योति... यह जो भी कर रही हो तुम ग़लत कर रही हो... आंड आइ आम नोट अप्रूविंग दिस ओके.." राजवीर ने सीधी मुद्दे की बात कही, ज्योति समझ गयी कि वो क्या कह रहा है लेकिन फिर भी उसने अंजान बनने की कोशिश की



"नो, डॉन'ट आक्ट ओके.. यू वेरी वेल नो व्हाट आइ मीन... मैं ऐसे कुछ ख़यालों को हवा नहीं देने वाला समझी, बेटर यू गेट इट स्ट्रेट आंड स्टॉप दिस नॉनसेन्स राइट नाउ..." राजवीर ने गुस्से में कहा और इस बार अपने लिए एक और पेग बनाया और फिर एक ही झटके में गटक गया.. ज्योति समझ गयी अब कोई फ़ायदा नहीं है अंजान बनने का इसलिए वो भी सीधी बैठी और जवाब दिया



"क्यू नहीं कर सकते, इसमे ग़लत क्या है... अगर घर के बाहर भी मैं अपनी जवानी के मज़े नहीं ले सकती, और घर के अंदर भी नहीं. तो फिर क्या करूँ, जाने दूं ऐसे ही मेरी जवानी को, शादी कर के बैठ जाउ किसी की बहू बन के, ताके फिर किसी के भी कहने पे एक रिमोट कंट्रोल की तरह चलूं.. नहीं डॅड, मैं ऐसा नहीं करूँगी... मुझे जवानी के मज़े लूटने हैं, समझे आप... मैं यूही यह वक़्त ज़ाया नहीं करना चाहती, आइ वॉंट टू हॅव सम फन इन लाइफ नाउ.. बहुत जी ली मैं घर की चार दीवारों में, आप फ़ैसला कीजिए, अब घर की चार दीवारों के अंदर मुझे मज़े मिलेंगे या घर के बाहर.. मैं अब नहीं रहने वाली किसी और के हिसाब से.." ज्योति ने भी एक ही साँस में अपनी भडास निकालना शुरू की और अपने लिए खुद एक पेग बनाया और नीट मार दिया... ज्योति की बात सुन राजवीर को यकीन नहीं हो रहा था वो क्या कह रही है, कभी उसने ऐसा नहीं सोचा था कि ज्योति के अंदर ऐसे ख़याल पैदा होंगे, लेकिन उसने बात को संभालने की कोशिश की, क्यूँ कि वो जानता था गुस्से से बात और बिगड़ सकती है..



"देखो बच्चे, यह चीज़ सही है तुम्हारी, मैं जानता हूँ काफ़ी पाबंदी है तुम पे, लेकिन उसका मतलब यह नहीं कि तुम ऐसी बातें दिल में लाओ, और बाप बेटी की मर्यादा का उलंघन करो.." राजवीर ने ठंडे स्वाभाव में कहा



"यह मर्यादा उस वक़्त कहाँ थी डॅड जब आपने अपने ही भाई की बीवी के साथ संबंध बनाया था, यह मर्यादा उस वक़्त कहाँ थी जब अपनी भाभी के साथ बिस्तर गरम किया था, यह मर्यादा उस वक़्त कहाँ थी जब आप उस रात को अपनी ही भाभी की फोटो देख के लंड हिला रहे थे, यह मर्यादा उस वक़्त कहाँ थी जब उस रात को भाभी को उन्ही के कमरे में चोदने गये थे... कहाँ थी यह मर्यादा डॅड जब आपने यह सब किया था..." ज्योति अब जितनी अंदर से जल रही थी, उतनी ही आग अपने मूह से उगल रही थी.. राजवीर के पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गयी थी, उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि ज्योति ऐसे शब्दो का प्रयोग भी कर सकती है, लेकिन साथ ही साथ वो यह सोचने लग गया कि उसे सुहसनी के बारे में कैसे पता चला.... राजवीर ने सोचा ही था कि वो ज्योति को ग़लत कह के बात को दबाने की कोशिश करे, उसी वक़्त ज्योति ने फिर ऐसी बात कही जिससे सुन राजवीर के शरीर से
जैसे जान ही निकल गयी, वो बैठे बैठे वहीं मर गया हो..




"वैसे भी क्या फरक पड़ेगा डॅड, कौनसी मैं आपकी सग़ी बेटी हूँ... एक अनाथ ही तो हूँ, खून का रिश्ता ना आपका अपनी भाभी से है, ना ही मुझसे.. जब अपनी भाभी के साथ बिस्तर गरम कर सकते हो तो मेरे साथ क्यूँ नहीं, वो भी मेरी मर्ज़ी के होते हुए भी.." ज्योति की यह बात सुन राजवीर बिना कुछ सोच के खड़ा हुआ और जाके एक तमाचा रिस दिया ज्योति के गालों पे... तमाचा इतना ज़ोर का था के ज्योति के सफेद चेहरे पे राजवीर की पाँचों उंगलियों के निशान देखे जा सकते था....



"स्टे इन युवर लिमिट्स... वी आर गोयिंग बॅक नाउ..." कहके राजवीर वहाँ से अपना समान पॅक करने निकल गया
 
पहला दिन काम का... या पहले दिन अपनी ज़िंदगी के पहले जुए का... रिकी अमर को निराश नहीं करना चाहता था, इसलिए पहले दिन से ही अपने नेटवर्क को समझने में लग गया, राजवीर ने जब यह देखा कि वो नेटवर्क देखना चाहता था तो उसे काफ़ी खुशी हुई, क्यूँ कि जब अमर ने विक्रम को पहली बार बताया था, तब विक्रम भी सबसे पहले नेटवर्क समझने में लगा था.. बेट्टिंग का भाव कहाँ से आता है, कैसे आता है, उसमे रिकी और उसके साथियों का क्या रोल रहेगा, उनका क्या मार्जिन, क्या कमिशन, यह सब काफ़ी मुश्किल चीज़ें थी, इसलिए रिकी ने इन्हे पहले चुना...



"हेलो स्वीटहार्ट..." रिकी पहले दिन ही अपने नेटवर्क के काफ़ी बुक्कीस से मिला, सब से उनका रोल समझा... दिन 11 बजे शुरू होके शाम के 6 बजे ख़तम हुआ था, लेकिन रिकी दिमागी टॉर पे काफ़ी तक चुका था, पहले दिन ही वो धंधे की नब्ज़ पकड़ना चाहता था तो यह तो होना ही था...



"हाई..." शीना ने बस इतना ही कहा और अपनी बाल्कनी से समंदर की लहरों को देखने लगी.. रिकी को थोड़ा अजीब लगा शीना का ऐसा मूड देख



"क्या हुआ जी मेरी स्वीटहार्ट को..." रिकी ने अपनी बाहें शीना के पीछे से गले में डालने की कोशिश की, लेकिन शीना ने तुरंत उसका हाथ हटाया



"डॉन'ट टच मी... पूरा दिन कोई फोन नहीं, कोई मेसेज नहीं... एक ही दिन हुआ है और यह हाल है, और काम भी कौनसा फिज़िकल है जो बिज़ी थे इतने, मुझे पता है, बस सब काम फोन पे हो जाता है, फिर इसमे क्या टाइम नहीं मिला जो मुझसे बात तक नहीं की पूरे दिन..." शीना ने अपनी नाराज़गी जताते हुए कहा और आँखें सामने ही रखी



"ओह हो... तो तुम इसलिए नाराज़ हो... अच्छा चलो, क्या करूँ ऐसा जो तुम मुझे माफ़ कर दोगि मेरी इस खता के लिए.." रिकी ने एक दम मासूम सा चेहरा बना के हाथ जोड़ के शीना को देखते हुए कहा



"पता नही... यह भी मैं सोचूँ... एक दिन में आदमी बदल जाता है, पहले सुना था आज दिख भी गया..." शीना ने एक नज़र रिकी को देखा और फिर नज़रें सामने कर दी



"ओके.. लेट मी डू इट माइ वे देन.." कहके रिकी ने अपनी पॉकेट से एक सिल्क ब्लॅक कपड़ा निकाला और धीरे धीरे उससे शीना की आँखें बंद करने लगा... शीना समझ गयी कि रिकी क्यूँ ऐसा कर रहा है, इसलिए उसने ज़्यादा ना नुकुर नही की



"इट बेटर बी दा बेस्ट ओके... ऑर एल्स फर्गेट माफी वाफी.." शीना को कुछ दिख नहीं रहा था इसलिए अपने चेहरे को गोल गोल घुमा के उंगली दिखाते हुए रिकी से कहा



"सस्शह... साइलेन्स..." रिकी ने अपनी उंगली शीना के होंठों पे रखी और उसका एक हाथ अपने हाथों में ले लिया... धीरे धीरे उसके हाथों के साथ खेल के, उसकी उंगलियों को धीरे धीरे रब करके शीना को अपने पास खींचा



"ओके हनी.. ओपन युवर आइज़.." कहके रिकी थोड़ा दूर हो गया और अपनी एक उंगली उपर कर दी... जैसे ही शीना ने अपनी पट्टी खोली, उसका ध्यान सबे पहले अपने राइट हॅंड की इंडेक्स फिंगर पे गया...



"अवववववववव..... दिस ईज़ दा ब्यूटिफुल थिंग आइ हॅव एवर सीन.." शीना ने अपने हाथ में प्लॅटिनम लव बॅंड देख के कहा, और जब अपनी नज़रें सीधी रिकी के सामने की, तो उसके हाथों में भी सेम रिंग पहनी हुई थी



"यू बॉट दिस... फॉर अस..... अववववव, आइ लव यू आ लॉट...." शीना की आँखों से हल्के हल्के आँसू बहने लगे और दौड़ के रिकी से गले लग गयी... गले लगते ही शीना का रोना थोड़ा तेज़ हो गया, खुशी के आँसू... छोटी से छोटी बात पे भी आँखों में आ जाते हैं, शीना के लिए इससे ज़्यादा खुशी क्या हो सकती थी कि उसके प्रेमी ने उसे पहले तन से स्वीकारा ही था, लेकिन आज मन से भी स्वीकार लिया... यह दोनो रिंग्स गवाही दे रही थी इस बात की, कि यह दोनो अब एक दूजे के हो चुके हैं... पहले शरीर और आज आत्मा का भी मिलन संपूर्ण हो गया था...



"अब रोना ही है तो मुझसे दूर हटो, शर्ट खराब करोगी..." रिकी ने चिढ़ाते हुए कहा जिससे शीना ने गुस्से में आके तीन चार मुक्के रिकी को मारे, लेकिन उससे लिपटी ही रही..



"दूर कभी नहीं जाउन्गी आपसे.... अगर अब दूर गयी तो हमेशा के लिए जाउन्गी, उससे पहले नहीं.." शीना ने रिकी के गले से लिपट के ही यह बात कही



"वो कभी नहीं होने दूँगा मैं... कभी भी नहीं.." रिकी ने शीना से हल्की आवाज़ में कहा और उसके साथ बाल्कनी में ही बैठ गया



"इतना अच्छा सर्प्राइज़ दिया, बदले में मुझे तो कुछ दो.." रिकी ने फिर मज़ाक में शीना को देख के कहा



"ओके...कम वित मी... लेट मी शो इट टू यू.." शीना ने रिकी का हाथ पकड़ा और खीच के उसे अपने कमरे के बाहर ले गयी...



"वेट वेट, दरवाज़ा मत खोलो, पहले यह बाँध लो, नो चीटिंग ओके..." शीना ने रिकी से कहा और उसके हाथ में सेम ब्लॅक कपड़ा दे दिया



"ओके, बट मेरे रूम में क्या सर्प्राइज़ होगा... चलो लो इट्स डन" रिकी ने कहा और एक बार फिर शीना ने उसका हाथ पकड़ा, और धीरे से उसके कमरे में उसके साथ चलने लगी.... कुछ सेकेंड्स हुए के शीना ने रूम की लाइट्स ऑन कर दी और रिकी की आँखों की पट्टी भी उतार दी



"ओपन युवर आइज़ आंड टेल मी हाउ ईज़ इट.." शीना ने धीरे से रिकी के कानो में कहा... रिकी ने जैसे जैसे अपनी आँखें खोली, उसकी आँखों का धुँधलापन कम हुआ और सामे का नज़ारा देख शॉक और सर्प्राइज़ उसकी आँखें बड़ी हो गयी...



"अब आप जब भी आँखें खॉलोगे, मैं रहूं या ना रहूं.. मुझे हमेशा अपने नज़दीक महसूस करोगे, जब भी आँखें बंद करोगे, हमेशा यह आश्वासन रहेगा कि आप अकेले नहीं हो.. जब भी कभी मेरी ज़रूरत पड़ेगी, मैं आपके सामने ही मौजूद हूँ.. मेरे जीते जी और कभी अगर मुझे कुछ हो भी गया उसके बाद भी... मैं हमेशा इधर आपके पास ही रहूंगी.." शीना ने रिकी का हाथ पकड़ के उसकी आँखों में देखते हुए कहा... दरअसल शीना ने अपनी आर्किटेक्ट फ्रेंड की मदद से रिकी के रूम की दीवारों को बदल दिया था, वॉलपेपर लगाए गये थे चारों और, हर वॉलपेपर में बस शीना और रिकी की तस्वीरें ही थी.. बचपन से लेके उन्होने जो अब तक साथ खीची थी, वो सब
तस्वीरें एक कॉलेज के रूप में रिकी के रूम में वॉलपेपर्स बन चुकी थी.. रिकी बस हर दीवार को देख रहा था, हर फोटो के नज़दीक जाके उसपे हाथ रख के जैसे वो लम्हे फिर से महसूस कर रहा था..



"आंड डॅड को कन्विन्स करना आसान था, इन केस इफ़ यूआर वंडरिंग..." शीना ने रिकी के हाव भाव देख के कहा, यह सुन रिकी कुछ कहता इससे पहले शीना बोल पड़ी



"कल मेरे रूम में भी ऐसा हो जाएगा... वी आर इनसेपरबल नाउ मिस्टर राइचंद.."शीना ने अपने कदम रिकी की तरफ बढ़ाए और रिकी को कॉलर से खींच के कहा



"वी आर इनसेपरबल... अगर कभी अलग हुए ना याद रखना, पहले तुम्हे मारूँगी, और फिर खुद को..." शीना ने बस इतना ही कहा के रिकी ने उसे टोकते हुए कहा



"हां, फिर भूत बनके भी मेरा पीछा करना...हाहहहा, ओके सॉरी सॉरी... बट दिस ईज़ वेरी वेरी प्रेटी... बियॉंड माइ थॉट्स, कभी कभी सोचता हूँ कि तुम वोही शीना हो जो कभी कोई एमोशन्स नहीं दिखाती थी और हमेशा अपने दोस्तों के इर्द गिर्द रहती थी.." रिकी ने शीना के बाल सहलाते हुए कहा



"मैं तो हमेशा से अपनी फीलिंग्स आपके साथ शेर करती थी, आप नहीं समझते थे, लेकिन अच्छा हुआ... जितना देर से आपने इस बात को समझा, मेरा प्यार आपके लिए उतना ही मज़बूत होता गया.. आज मैं जो भी हूँ इसलिए हू क्यूँ कि आपने मुझे अपनाया, मेरे प्यार को अपनाया.. अगर वैसा ना होता तो मैं शायद टूट चुकी होती, ज़िंदा रहती लेकिन बिना ज़िंदगी के होती... रंग होते मेरी ज़िंदगी में लेकिन वो खुशी के नहीं होते, साँस होती, लेकिन उस साँस में आपका नाम नहीं होता....हर वक़्त हर कदम मैं और सिर्फ़ मेरी तन्हाई.. मैं बहुत खुश किस्मत हूँ के आप आए मेरी ज़िंदगी में... अभी थोड़ी देर पहले जो मैने कहा वो झूठ था, अगर आप कभी मुझसे दूर हुए तो मैं आपको नहीं करूँगी कुछ... क्यूँ कि आपको देख देख के ही तो साँसें लेती हूँ, आपको देख के ही तो रोज़ जीवन में नयी उमंग आती है, आप हो तो सब कुछ है... लेकिन आप से दूर होके मैं खुद नहीं जी पाउन्गी, और आपसे दूर हो जाउन्गी.. हमेशा हमेशा के लिए... लेकिन जहाँ भी जाउन्गी, वहाँ से भी बस आपको देख के ही खुश रहूंगी..." शीना ने नम
आँखों के साथ कहा



"शीना... शीना, लुक अट मी प्लीज़.." रिकी ने शीना के चेहरे को अपने हाथों में थामा और उसकी नम आँखों में देखने लगा, प्यार से उन्हे अपने हाथों से सॉफ किया



"आज क्यूँ ऐसी बातें कर रही हो... मैं कही नहीं जा रहा.." रिकी ने धीरे से शीना की आँखों में देख के कहा



"आज मुझे बहुत डर लग रहा है... पता नही क्यूँ ऐसा लग रहा है कि आप मुझसे दूर चले जाओगे... मैं ऐसे नहीं रह पाउन्गी..." शीना ने अपनी आँखें नीची कर के कहा और रिकी से गले लग गयी



"हे हे... कुछ नहीं होगा, मैं यहीं हूँ.. तुम्हारे साथ.. तुम्हारे पास... तुम्हारे लिए.... हमेशा के लिए... " रिकी ने हल्के से शीना को फिर अपनी ओर खींचा और उसके मस्तक पे चूम लिया.. दोनो कुछ देर यूही खड़े रहे, एक दूसरे के गले लगे हुए थे..



"अच्छा, चलो बताओ.. कुछ बात हुई जकार्ता में, कब आ रहे हैं वो लोग.." रिकी ने शीना से पूछा, लेकिन उसे अपने से अलग नहीं किया



"3 दिन में.. मैने पापा से कहा, ही सेड ओक लॅंड वाली डील क्लोस्ड है... तो ऐज सून ऐज दे कम, हम काम शुरू करेंगे, मेरी फरन्ड भी इन्वॉल्व्ड रहेगी ऐज आइ हॅव कमिटेड टू हर, और हां आपके मॅनेज्मेंट की बात रही, तो मंडे टू फ्राइडे यू स्टे हियर, सॅटर्डे वहाँ चलना और काम देखते रहना.. आपको बस अब्ज़र्व ही करना है, मैं वहाँ 5 दिन आक्टिव रहूंगी... लाइक, वहाँ जाके सुबह सुबह सब काम देख के बॅक हियर बाइ 9 पीएम डेली ओके.. आंड वीकेंड्स पे साथ चलेंगे दोनो, फिर आप भी देखना सब काम... अब अगर यह फॉलो नहीं किया ना, तो याद रखना..." शीना ने इस बार थोड़ा सा अलग होके जवाब दिया लेकिन उसके हाथ रिकी के कंधों पे ही थे



"बाप रे... सब सोच लिया है, चलो ठीक है, अब यह हो जाएगा, नो टफ हाँ" रिकी ने जवाब दिया और दोनो फिर वहीं बैठ के दिन भर की बातें करने लगे




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राजवीर का चाँटा ज्योति के दिल पे लगा था, एक पल के लिए ज्योति रुकी ज़रूर थी यह सोच के शायद राजवीर सही था, वो रास्ता भटक रही है, लेकिन फिर रिकी को खोने का एहसास आया और फिर उसका दिल उन रास्तों पे चल दिया जो उसे ग़लत दिशा में ले जाने को थे.. अपने कमरे में बैठे बैठे ज्योति बस आगे के बारे में सोच रही थी , वो सोच रही थी कि कौन है वो जो स्नेहा को हुकुम देता है, और कैसे वो उसे रिज़ॉर्ट का प्रॉजेक्ट दिलाएगा... फिलहाल अपने दिमाग़ पे काबू रखने के लिए सिगरेट छोड़ने की कोशिश में थी ज्योति, इसलिए बस बाल्कनी में खड़े रह के सामने की ओर देख रही थी के तभी राजवीर की आवाज़ से वो पीछे मूडी



"ज्योति... क्या देख रही हो सामने..." राजवीर की आवाज़ से चोंक के पीछे मूडी और फिर अपनी नज़रें सामने कर दी... यह शरम की वजह से था या गुस्सा, वो खुद नहीं जानती थी, वो बस खामोश ही रही



"तुमने जो सोचा, तुमने जो कोशिश की, मुझे उसकी उम्मीद बिल्कुल नहीं थी.. मुझे हमेशा लगा था कि तुम मेरा गुरूर बनोगी... मैं पाबंदी हमेशा इसलिए रखता था ताकि तुम कभी किसी ग़लत इंसान के साथ ना मिलो, लेकिन मुझे क्या पता था, मेरा तरीका ही मेरा दुश्मन बनेगा... खैर मैं नहीं जानता यह सब करने का ख़याल क्यूँ आया तुम्हारे ज़हेन में, और मुझे यकीन है कि तुम खुद भी इस असमंजस में फसि हो के तुम सही हो या ग़लत, लेकिन बच्चे.. मर्यादा की दीवारों को तोड़ने की कोशिश नहीं करो, वो हमारे लिए अच्छा है..." राजवीर ज्योति से कह रहा था जो अभी भी अपनी नज़रें सामने करे हुई थी



"इससे ज़्यादा तुम खुद समझदार हो, लेकिन मैं उम्मीद करता हूँ कि शायद तुम होश में आओ, और अपनी पढ़ाई पे ध्यान दो.. जिसके लिए तुम यहाँ रुकी हो... और रही बात मेरी और भाभी के बीच में, ग़लती जान बुझ के नहीं करता कोई, जो तुम कर रही हो वो ग़लती नहीं है, जो हम से हुआ वो ग़लती थी.." कहके राजवीर पीछे मूड के जाने लगा



"आख़िर क्यूँ डॅड...." ज्योति ने इस बार पीछे मूड के जवाब दिया जिसे सुन राजवीर रुक गया और मूड के ज्योति की आँखों में देखा..



"क्यूँ प्यार कर रहे हैं आख़िर इतना मुझे, मैं तो आपकी अपनी बेटी भी नहीं हूँ... फिर क्यूँ, मुझे कोई फरक नही पड़ेगा इन सब से तो आप को क्या प्राब्लम है.." ज्योति ने एक दम ठंडी आवाज़ में कहा, मानो एक दम एमोशनलेस्स..



"तुमसे किसने कहा ज्योति कि तुम मेरी बेटी नहीं हो... किसने डाली यह बात तुम्हारे दिमाग़ में..." राजवीर ने आगे बढ़ के कहा



"मैने सुना आपको और ताई जी को बात करते हुए... ताई जी झूठ नही बोलेगी, और ना ही आपने उन्हे कुछ कहा था, ज़ाहिर है वो सही कह रही थी" इस बार ज्योति की आवाज़ में एक ताक़त थी



"हमारी ज़िंदगी में हम जो भी करते हैं, उनमे से आधी चीज़ें इसलिए करते हैं क्यूँ कि हम बस सुनी सुनाई बातों पे यकीन कर लेते हैं... और बाकी की चीज़ें इसलिए होती हैं क्यूँ कि हम कुछ देखते हैं और उसपे विश्वास कर लेते हैं.... दोनो परिस्थितियों में हम सच जानने की कोशिश नहीं करते... खैर यह बात फिर कभी, लेकिन ज्योति अगर मुझपे ज़रा भी विश्वास करती हो तो इस बात को दिल से निकाल दो.. तुम मेरी ही बेटी हो..." राजवीर ने कहा



"तो फिर उस दिन जो आप बात कर रहे थे, उसका सच क्या है डॅड.. बताइए" ज्योति ने फिर ज़ोर से कहा



"सच कोई नहीं जानता ज्योति.... तुम भी नहीं..." राजवीर ने कहा और वहाँ से निकल गया.. जाते जाते ज्योति को फिर दुविधा में डाल गया.... अगर मैं इनकी असली बेटी हूँ तो फिर ताई जी ने ऐसा क्यूँ कहा उस दिन... और डॅड ने भी मना नही किया और फिर आज की यह बात.... आख़िर क्या है यह सब, ज्योति मन में सोचने लगी

राजवीर जैसे ही ज्योति को छोड़ के वहाँ से निकला, सीधा अपने कमरे में घुसा और दरवाज़े को अंदर से लॉक कर के एक लंबी राहत की साँस ली...



"फेवव...... तुम्हारी वजह से मैं क्या क्या कर रहा हूँ, सीधा सीधा चूत मेरे पास आ रही है, लेकिन आक्टिंग करवा दी खमखा.." राजवीर ने सामने बैठी सुहसनी से कहा



"चिंता नहीं करो, जितना ज़्यादा दूर जाओगे, उतना ज़्यादा ही वो तुम्हारे पास आएगी.. एक बार में ही हां कह देते तो क्या अच्छा लगता, उसे लगता उसका बाप तो दुनिया का जैसे सबसे बड़ा ठर्की है..." सुहसनी ने हल्के ठहाके के साथ कहा



"वो सब ठीक है भाभी... अगर नहीं आई तो.. फिर तो शीना के उपर चढ़ुंगा मैं, फिर रोकना नहीं.." राजवीर ने अपने होंठों पे जीभ घुमा के कहा



"शीना के ख्वाब देखना छोड़ो, राइचंद का खून है.. तू इसे पेल ना, जो पता नहीं कौन है, बस अमर ने लाके तुम्हे दे दी और तुमने भी रख दी.. कभी पूछा ही नहीं कि कौन है यह, कहाँ से आई है.." सुहसनी ने मूह बना के कहा



"अरे जानता हूँ भाभी, कहाँ से आई है... लेकिन अब मुद्दे की बात यह नहीं है कि कहाँ से आई है, बात अभी यह है कि यहाँ मेरे पास आएगी कि नहीं.. कसम से कहता हूँ भाभी, गोआ में जो अपना नंगा शरीर दिखा रही थी, दिल किया उसी वक़्त रगड़ डालूं, लेकिन आपके एक फोन ने मेरा पूरा प्लान बदल दिया..." राजवीर ने अपने लिए और सुहसनी के लिए सिगरेट जला के कहा



सुहसनी कुछ कहती उससे पहले उसका फोन बज पड़ा... अमर कहीं बाहर गया था इसलिए शायद वो होगा यह सोच के उसने राजवीर को चुप करने का इशारा किया, लेकिन स्क्रीन पे नाम देखते ही उसके चेहरे पे मुस्कान फेल गयी.. स्क्रीन पहले राजवीर को दिखाई और फिर फोन आन्सर किया



"हां ज्योति बेटा... बताइए" सुहसनी ने सुट्टा मार के कहा



"ताई जी.... आप कहाँ हैं, मुझे कुछ ज़रूरी बात करनी है आपसे.." ज्योति ने बेचेन होके पूछा



"बेटा हम तो तुम्हारे ताऊ जी के साथ बाहर हैं, क्या हुआ, कोई ज़रूरी काम था क्या" सुहसनी ने आक्टिंग करते हुए पूछा और साथ ही राजवीर को फ्लाइयिंग किस देने लगी



"हाँ ताई जी, आप कब तक लौटेंगे..." ज्योति ने फिर थोड़ी सहमी सी आवाज़ में कहा



"बेटी, बहुत बेचेन लग रही हो... हम अभी 15 मिनट में आते हैं, तुम्हारे ताऊ जी से कुछ बहाना बना के आते हैं, और हमारे कमरे में नहीं आना.. एक काम करती हूँ, घर पहुँच के सीधा तुम्हारे पास आती हूँ.. ठीक है बेटी... चलो बाइ.." कहके सुहसनी ने फोन काटा और राजवीर के मूह पे सिगरेट के धुएँ का छल्ला बना दिया



"बस आ गयी, अब और क्या चाहिए तुझे... शीना को भूल जा, अगर कभी उसके बारे में ऐसा सोचा तो याद रखना, मैं कुछ भी कर सकती हूँ.." सुहसनी ने भड़क के कहा जिसे देख एक पल राजवीर भी घबरा गया और खामोश रहा