Adultery हवेली - Page 5 - SexBaba
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Adultery हवेली

#36



चंदा के शब्दों ने मुझे हिला कर रख दिया, बहनचोद शौर्य सिंह के परिवार में चुदाई के आलावा और कुछ भी होता था क्या जिसे देखो कहीं न कहीं लगा हुआ था . पर यदि कामिनी भी चुदाई के खेल में शामिल थी तो मेरे लिए अजीब सी दुविधा हो गयी थी क्योंकि फिर मेरे नाजायज संतान होने की प्रबलता और बढ़ जाती. कहीं मैं कामिनी और इन्दर सिंह की संतान तो नहीं. और ऐसा हो भी सकता था क्योंकि बापू भला ऐसे ही तो नहीं पालेगा मुझे.

“कमरे में कामिनी चुदने आती थी मेरे आदमी को ये बात मालूम हो गयी थी , अक्सर मेरे साथ सोते हुए वो मुझे बताता था और यही मेरी चिंता का कारण था. तेज ठाकुर की वजह से हवेली में उसका इतना आना-जाना था की वो अंदरूनी बाते भी जानने लगा था और शायद इसीलिए पुरुषोत्तम को वो नहीं सुहाता था . ” चंदा ने कहा

मैं- तेज भी शायद जानता था की कमरे में कौन चुदने जाती थी

चंदा- तेज चूतिये का बच्चा था उसको होश ही कहा रहता था उसकी जिन्दगी में बस दो ही बाते थी एक तो दारू और दूसरा अपने बाप से लड़ाई करते रहना

चंदा के बात सही थी तेज के कमरे में सैकड़ो बोतले पड़ी थी शराब की .

मैं- अपने बाप से लड़ाई

चंदा- हाँ, तेज और उसके बाप की तल्खी किसी से भी नहीं छिपी थी .

मैं- पर मंदिर में चोरी और तेरे पति की फांसी इसका क्या झोल था

चंदा- मंदिर में चोरी मेरे पति ने नहीं बल्कि तेज ने की थी मेरा आदमी तो बस उसकी गाडी चला रहा था . तेज जुए में बहुत बड़ी रकम हार गया था उसे अपना कर्जा चुकाना था . उसने चोरी की और जब वो गाडी के पास आया तो उसकी हालत बहुत ज्यादा गंभीर थी बदन पर बहुत घाव थे , मेरे आदमी ने उस से ये पाप नहीं करने को कहा उसे समझाया, तेज मान गया , चूँकि उसकी हालत बहुत गंभीर थी तो मेरे आदमी ने सोचा की मंदिर का सामान जल्दी से वापिस रख देता हु और फिर तेज को डाक्टर के पास ले जाऊंगा पर जब वो मंदिर का सामान वापिस रख रहा था तो तभी वहां पर पुरुषोत्तम आ गया और उसे चोर समझ लिया . मेरे आदमी ने लाख दुहाई दी पर किसी ने उसकी बात नहीं सुनी .

मैं- पर मंदिर का सामान कभी भी वापिस नहीं पहुंचा

चंदा- हाँ क्योंकि पुरुषोत्तम चुरा ले गया था उसको

मैं- मान लेता हूँ पर फिर पुरुषोत्तम को किसने मार दिया उसे ही नहीं बल्कि उसके दो भाइयो को भी और सिर्फ तुम ही हो जिसके पास पर्याप्त कारण था ठाकुरों के घर के दिए बुझाने का .

चंदा-कहना बहुत आसान है और करना उतना ही मुश्किल . तुमने वो दौर नहीं देखा हर तरफ शौर्य सिंह और उसके बेटो का ही राज था, मैं फरियाद लेकर जाती भी कहाँ, हवेली में बस रुपाली ही थी जो मेरे पास आई.

मैं- तेज तो गवाही दे सकता था न पुरुषोत्तम उसकी बात मान जाता

चंदा-वो खुद घायल पड़ा था , सबने तो यही समझा की मेरे आदमी ने ही उसे जखम दिए.

मैं- क्या तेरे पति ने कामिनी को चोद दिया था

चंदा- उसकी हसियत इतनी भी नहीं थी .

मैं- और डाकू मंगल उसका क्या रोल हुआ इस कहानी में

चंदा- ये कोई नहीं जानता, हाँ इतना जरुर है की एक ज़माने में ठाकुर और डाकू की उठा-बैठ थी , ठाकुर अक्सर डेरे में जाता था .

मैं- अजीब है न

चंदा- उस से भी अजीब तुम हो जो अतीत को वर्तमान से मिलाने पर तुले हुए हो .

चंदा अकेली तो नहीं मार सकती थी सबको , उसे कोई दमदार साथी चाहिए था और वो साथी कोई हो सकता था तो ठाकुर का भतीजा जिसकी गांड पर ठाकुर ने लात मार दी थी . पर क्यों ये भी एक सवाल था जिसका जवाब मुझे चाहिए था . ठाकुर के भतीजे का ख्याल मुझे इसलिए आया की उस समय वो ही एक ऐसा किरदार था जो चंदा जितना बेताब रहा होगा.

पर ऐसी कैसी साजिशे जिसमे सबको छिप का रहना पड़े, कामिनी, रुपाली और चांदनी का बाप . मैंने पक्का निर्णय कर लिया था की सबसे पहले ठाकुर के भतीजे वाले एंगल ही पकड़ना है . रात बहुत हो गयी थी मैंने चंदा की झोपडी में ही सोने का निर्णय लिया पर बिस्तर पर पड़े भी चैन कहा दिमाग में ये बात ही घूम रही थी की आखिर तेज अपनी ही बहन की जासूसी क्यों कर रहा था जब उसे मालूम था की कामिनी किसी से चुदती है तो क्यों उसने ये सबूत जुटाने शुरू किये

मेरी नजर चंदा पर पड़ी जिसने अपने नंगे जिस्म को ढकने की जरा भी जरुरत नहीं समझी थी उसकी गांड पर मेरी नजर ठहर सी गयी थी . जवानी में तो आग ही लगा दी होगी न जाने क्यों मैं चंदा की कहानी पर यकीं नहीं कर पा रहा था क्योंकि वो खुद ठाकुरों का बिस्तर गर्म करती थी तो उस से इमानदारी की अपेक्षा कैसे की जाये.

तभी मेरे दिमाग में वो ख़याल आया जिसने अब तक के मेरे अनुमान को गलत साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी, तेज , तेज वो तो ज्यादातर हवेली से बाहर ही रहता था , और जो इन्सान घर में इतना कम समय बिताये उसको क्या ख़ाक घर की बातो की जानकारी होगी . पुरुषोत्तम या कुलदीप इन दोनों में से कोई एक रहा होगा पर कुलदीप के होने की सम्भावना जायदा थी क्योंकि उसके कमरे से मुझे जो ब्रा मिली थी वैसी ही ब्रा कामिनी के कमरे में मोजूद थी और दूसरी बात की वो बाहर से पढ़ कर आया था उसके पास ये टेप जैसी चीजे हो सकती थी और तेज के कमरे से जायदा सुरक्षित भला कौन सी चीज हो सकती थी ऐसे सामान को छिपाने के लिए. पर क्या एक भाई अपनी ही बहन को चोदना चाहता था या फिर कुलदीप की कोई और मंशा थी सोचते सोचते न जाने कब मेरी आँख लग गयी .

सुबह उठा तो चंदा चाय बना रही थी , उसने मुझे चाय का कप दिया और अपने काम में लग गयी .

“कुछ मजदुर लेकर आउंगी हवेली में . ” उसने कहा

मैं- साफ़ सफाई जितना जल्दी हो जाये उतना अच्छा

चंदा- एक बार फिर सोच लो , हवेली की आग को जो सुलगा रहे हो कहीं जल न जाओ

मैं- किसे परवाह है .

वहां से मैं निकला ही था की मुझे पद्मिनी मिल गयी . मैं दौड़ कर उसके पास गया .

मैं- कैसी है तू, और हॉस्पिटल से कहाँ गायब हो गयी थी

पद्मिनी- ठीक हूँ

मैं- तो तुझे भी सोने का नशा हो गया जान जा सकती थी तेरी

पद्मिनी- डेरे की बेटी हूँ ये सब तो सामान्य है मेरे लिए दूसरी बात सोने की चाह नहीं मुझे

मैं- तो किस चीज की चाहत है तुझे



पद्मिनी- जान जायेगा तू मान जायेगा तू
 
#37



मैं - तो फिर अभी जान लेते है

पद्मिनी- तुझ पर विस्वास कैसे कर लू मैं

मैंने उसका हाथ अपने सीने पर रखा और बोला- मेरा मत कर इन धडकनों का विस्वास तो कर ये तो झूठी नहीं .

पद्मिनी- दूर क्यों नहीं चला जाता तू मुझसे

मैं- पास भी तो नहीं आने देती हु

पद्मिनी- समझता क्यों नहीं तू

मैं- समझाती क्यों नहीं फिर तू

पद्मिनी- कितनी बार कहूँ तुझसे की तेरा मेरा साथ नहीं दुश्मनी है

मैं- तो फिर इस दुश्मनी की आग पर पानी क्यों नहीं डाल देती तू . अब हवेली का वारिस मैं हूँ मुझे मार कर तेरा बदला पूरा हो सकता है .

पद्मिनी- जरुर मारूंगी पर अभी तू मेरा पीछा छोड़ मुझे कहीं जाना है

मैं- फिर लाल मनदिर जा रही है न तू तालाब में गोता लगाने

पद्मिनी- सुन अर्जुन एक बात का ध्यान रखना पानी में जो भी है उसका किसी से जिक्र नहीं करना बरसो से वो दबा हुआ था तूने तालाब बना कर ठीक नहीं किया गाँव के लोग जब जब पानी में जायेंगे उनका लालच उनको मौत की तरफ ले जायेगा और उन मौतों का जिम्मेदार तू रहेगा.

मैं- मैंने तो बस तेरी इच्छा पूरी करी थी तुझे तालाब चाहिए था मैंने बना दिया

पद्मिनी - नियति के इसी इशारे को मैं समझ नहीं पा रही हूँ ,

मैं- तो फिर सब कुछ नियति पर क्यों नहीं छोड़ देती

पद्मिनी- मैं अपनी नियति खुद लिखूंगी

मैं- चल न मेरे साथ हवेली

पद्मिनी- मुझे काम है

मैं चाह कर भी उसे नहीं रोक पाया और हवेली की तरफ चल दिया, चंदा मुझसे पहले वहां पहुँच चुकी थी कुछ मजदुर बगीचे को साफ़ कर रहे थे . मैंने उसे अन्दर आने को इशारा किया और आगे बढ़ गया कुछ देर बाद वो भी अन्दर आ गयी .

चंदा - क्यों बुलाया

मैं- तू रुपाली को कितना जानती थी

चंदा- कितनी बार पूछना है तुमको ये

मैं- जब तक तू मुझे सच नहीं बता देती

चंदा- सच जैसा कुछ नहीं होता दुनिया में हमारी आँखे जो देखती है वो ही सच होता है

मैं- तो तेरी आँखों ने क्या देखा था . रुपाली के इस घर में किस से अवैध सम्बन्ध थे

चंदा- सब को पता है फिर मुझसे क्यों पूछता है

मैं- क्योंकि तू पूरी बात नहीं बताती मुझे, मैं तुझसे पूछ रहा हूँ की रुपाली के ठाकुर शौर्य सिंह के आलावा और किस से सम्बन्ध थे .

मेरी बात सुन कर रुपाली का मुह खुला का खुला रह गया

चंदा- ये क्या कह रहे हो तुम

मैं- क्यों तुझे नहीं पता

चंदा- कसम से नहीं पता. ठाकुर के आलावा वो किसी और के साथ भी थी

मैं- क्या रुपाली जानती थी की कामिनी और इन्दर सिंह एक दुसरे से प्यार करते थे

चंदा- कह नहीं सकती , कामिनी बहुत अजीब लड़की थी ,हमेशा गुमसुम रहती थी बहुत कम बात करती थी कमरे से बहुत कम निकलती थी पर जब भी निकलती तो खेतो पर ही जाती थी

मैं- कहीं ऐसा तो नहीं था की उसके भाई लोग ही पेल रहे थे उसको

मेरी बात सुन कर चंदा ने मुह पर हाथ रख लिया और बोली- हाई दैया ये क्या कह रहे हो तुम

मैं- क्यों ऐसा नहीं हो सकता क्या , हवस कोई रिश्ते नहीं देखती चूत बस चूत होती है चाहे किसी की भी हो तूने ही तो कहा था न हो सकता है की कामिनी के भाई ही उसका शोषण करते हो इसलिए वो गुमसुम रहती हो

चंदा- अगर ऐसा होता तो ठाकुर साहब अपने बेटो को कब का मार देते उनके लिए इज्जत से बढ़ कर कुछ नहीं था

मैं- वो इज्जत जिसे इन चारदीवारियो में तार तार किया जा रहा था . वैसे तेरी एक बेटी थी न चंदा ,कहाँ है वो आजकल

चंदा- तुझे क्या लेना देना मेरी बेटी से

मैं- इस हवेली से तो लेना देना था न तेरी बेटी का .तू लाख छिपा इस बात को पर इस हवेली को छोड़ने की वजह कोई और नहीं बल्कि तेरी बेटी थी न .

चंदा के चेहरे पर असमंजस के भाव उभर आये .

मैं- उस रात का सच तू जानती है चंदा अपनी बेटी की वजह से तू छुपा कर रखे हुए है पर एक बात समझ की सोलह साल बीत गए है तेरे सिवा इस दुनिया में एक भी ऐसा इन्सान नहीं जिसे इस बात से कोई फर्क पड़ा हो की तेरी बेटी जिन्दा है या मर गयी उसके साथ क्या हुआ किसने चोद दिया उसे एक ने दो ने या फिर ...........

“मैं नहीं जानती वो कहाँ है उसके साथ क्या हुआ जिन्दा है भी या मर गयी उस शाम जब मैं घर पहुंची तो वो वहां नहीं थी ” चंदा ने गहरी साँस लेकर कहा .

मैं- गायब हो गयी

चंदा- हाँ, गायब हो गयी .जैसे वो कभी थी ही नहीं आखिरी बार उसको किसने देखा कोई नहीं जानता कोई बताने वाला नहीं की वो किस रस्ते गयी जमीं खा गयी या फिर आसमान जश्न की काली रात में उधर हवेली के दिए बुझ गए और इधर मेरे घर की रौशनी चली गयी.

मैं- कहीं ऐसा तो नहीं की तेरी बेटी और ठाकुर के बेटो का कुछ लफड़ा हो

चंदा- होता तो भी क्या कर लेती मैं

मैं- बातो को घुमाने से कोई फायदा नहीं होता चंदा , मैं बहुत अच्छे से जानता हूँ की तेरे दिल में बदले की ऐसी आग लगी है जिसमे तू इस दुनिया को झुलसा दे तो भी तुझे चैन नहीं आएगा. मैं तेरी मद्दद करना चाहता हूँ पर अफोसोस है की तुझे भरोसा नहीं मुझ पर

चंदा- भरोसा बहुत खोखला शब्द है अर्जुन

मैं- खोखला भरोसा ही कर के तो देख

चंदा ने पीठ मोड़ी और अपने कदम हवेली से बाहर की तरफ बढ़ा दिए

“तेरी बेटी को बर्बाद करने वाला कोई और नहीं बल्कि भूषण था ”



चंदा के कदम अचानक से रुक गये
 
#38



“भूषण ही था न वो ” मैंने फिर से कहा

चंदा मेरे पास आई और बोली- तुम्हे कैसे पता

मैं-भूषण के जले हुए सामान में से एक तस्वीर बच गयी थी जिसमे वो तेरी बेटी के साथ है और उस तस्वीर को देख कर कोई भी समझ सकता है पर उसमे भूषण अकेला नहीं था

चंदा- और कौन था

मैंने अपनी जेब से वो पुरानी तस्वीर निकाल कर चंदा के हाथ में रख दी और चंदा की आँखे अविश्वास से फट गयी .

चंदा- नहीं नहीं नहीं

मैं- तस्वीरे झूठ नहीं बोलती इन्सान बोलते है . हवेली में चुदाई का खेल खुले आम चल रहा था और उसमे तुम और तुम्हारा पति भी शामिल हो गए बात जब बिगड़ी जब तुम्हारी बेटी को भी इस खेल में उतरना पड़ा

पर मेरी दिलचस्पी अब ये है की भूषण किसे चोदता था .

चंदा- किसी को नहीं वो तो नफरत करता था हवेली के लोगो से

चंदा की बात सामने पड़ी तस्वीर को झुठला रही थी क्योंकि तस्वीर में चंदा की लड़की नंगी पुरुषोत्तम की गोद में बैठी थी और उसके हाथ में भूषण का लंड था .

“अक्सर आँखों देखा भी झूठ हो जाता है भूषण की बीवी को खूब रगड़ते थे ये लोग , कुलदीप तो घंटो अपने कमरे में रखता था उसे. कहते है की एक दिन अत्याचार से तंग होकर वो कहीं चली गयी पर सच ये है की जब इन लोगो का उस से जी भर गया तो उन्होंने उसे मार कर दफना दिया ” चंदा ने कहा

मैं-तू इतने विस्वास से क्यों कह रही है ये

चंदा- क्योंकि जिस रात भूषण की बीवी को मारा गया उस रात मैं हवेली में थी , भूषण उस रात सरिता देवी के साथ उसके मायके गया हुआ था . मैं ये सच कभी नहीं जान पाती अगर उस रात मैं रुपाली के साथ न होती .

मैं- रुपाली के साथ .

चंदा- रुपाली की वजह से ही तो मैं हवेली में आई थी. कुलदीप ने भूषण की बीवी के सर पर वार किया था

मैं- रुपाली ने कुछ नहीं किया

चंदा- वो बहुत गुस्से में थी उसने कुलदीप पर हाथ भी उठा दिया था बात बहुत बढ़ गयी थी. ठाकुर को बीच बचाव करना पड़ा था . उस रात के बाद रुपाली और कुलदीप में कभी कोई बात नहीं हुई. तीनो भाइयो में सबसे ज्यादा मादरचोद अगर कोई था तो वो कुलदीप ही था .

मैं- ऐसा भी तो हो सकता है की भूषण ने ही अपनी बीवी की मौत का बदला लेने के लिए सबको मार दिया हो .

चंदा- शुरू में तो मैंने भी ऐसा ही सोचा था पर अफ़सोस की भूषण उस रात हवेली में नहीं था .

मैं- तो कहा था वो

चंदा- लाल मंदिर में

चंदा की बात ने मेरे होश उड़ा दिए.

मैं- पर वो वहां क्या कर रहा था .

चंदा- अपने बेटो की लम्बी उम्र के लिए ठाकुर ने पूजा रखवाई थी भूषण उसकी तैयारियों में ही लगा था .

पूरी दोपहर मैं कड़ीयो को जोड़ने की कोशिश करता रहा , कैसी पूजा थी वो. अवश्य ही पुरुषोत्तम और चंदा के पति की तकरार की वजह चंदा की बेटी रही होगी या फिर मामला यूँ हो सकता था की चंदा का पति हवेली की किसी औरत को चोद रहा हो उसे मालूम था की तीनो औरतो में से कोई तो चुदक्कड है और उसी का बदला लेने के लिए पुरुषोत्तम ने चंदा की बेटी को रगडा हो .

कुलदीप के कमरे में मिली ब्रा से इतना तो तय था की वो बुरी नजर रखता था कामिनी या फिर रुपाली पर . पर ये लाल मंदिर का क्या पंगा था ठाकुर और डेरे वाला मंगल दोनों जुड़े थे उस जगह से पर क्यों. क्या दोनों को मंदिर से एक ही चीज चाहिए थी और वो चीज क्या रही होगी जिसके लिए दोनों खून की नदिया बहाने से नहीं घबराये. और भूषण को इतने साल बाद कोई क्यों मारेगा. इतने साल का इन्तजार जबकि हवेली के ढहने के बाद कातिल जब चाहे उसे मार सकता था, मतलब भूषण कुछ तो ऐसा जान गया था जो कातिल भी उस से जानना चाहता हो.

आँख जब खुली तो चारो तरफ घोर अँधेरा छाया हुआ था . एक बार तो मैं घबरा गया सन्नाटे को देख कर पर सांसे दुरुस्त हुई तो समझा की मैं हवेली में हु और रात को मैं यहाँ नहीं रहना चाहता था. चंदा की झोपडी की तरफ जाते हुए मैं लाल मंदिर के पास से गुजरा तो देखा वहां से धुआ निकल रहा है इतनी रात को यहाँ धुआ कौन होगा सोचते हुए मैं सीढिया चढ़ कर मंदिर के प्रांगन में पहुँच गया . खंडित मूर्ति सुलगी हुई थी और आग वहां से तालाब की तरफ जा रही थी मैं वहा गया तो मैंने जो देखा मैं देखता ही रह गया .

पद्मिनी को गले से पकड़ कर उठाया हुआ था उअर जिसने उसे उठाया था वो क्या था उसे देख कर मेरी आँखों ने उसे देखने मानने से मना कर दिया . आधा घोडा और आधा इन्सान ,एक हाथ से पद्मिनी को उठाये हुए और दुसरे हाथ से उस से कुछ छीनने की कोशिश कर रहा था .

छलांग लगाते हुए मैं वहां तक पहुंचा उस अजीब जानवर , क्या मालूम वो क्या था उस पर वार किया उसने जलती आँखों से मुझे देखा अपने खुरो से दुल्ल्त्ती मारी मुझे . इतने में पद्मिनी को मौका मिल गया उसने अपने पैरो से सीने पर वार किया और पकड़ से आजाद हो गयी .

“पद्मिनी तू ठीक है न ” मैंने पूछा

उसने आँखों से इशारा किया पर दिख रहा था की वो ठीक नहीं है उसकी हालत वैसी ही थी जैसा कुछ दिन पहले वो मुझे इन्ही सीढियों पर पड़ी मिली थी .

मैं- तू जो भी है पद्मिनी से दूर हट जा वर्ना अच्छा नहीं होगा तेरे लिए

वो-मैंने तो नहीं बुलाया तुम लोगो को , तुम खुद आये उसे लेने जो तुम्हारी नहीं है. दुसरो की अमानत में खयानत करना चोरी होती है और चोरी की सजा जरुर मिलती है .

मैं- नहीं जानता तुम क्या कह रहे हो पर पद्मिनी को जरा भी खरोंच लगी तो मैं न जाने क्या कर बैठूँगा तुम्हारे साथ

वो- पद्मिनी के पास मौके थे लौट जाने के पर ये नहीं मानी इसने चुनोती का आह्वान किया और अब या तो ये चुनोती को पूरा करे या फिर सजा पाए.

मैं- कैसी चुनोती

वो- अमानत में खयानत को रोकने के लिए हम यहाँ मोजूद है तब तक रहेंगे जब तक की असली मालिक आकर हमें दायित्व से मुक्त नहीं कर देता .

मैं- कैसा दायित्व

वो- हम नहारवीर महान रक्षक होते है तंत्र में कोई भी साधक जिसने हमें जीता हो वो अपने किसी भी सामान की सुरक्षा में हमें तैनात कर सकता है जब तक वो हमें मुक्त नहीं करता हम अपना काम करते रहेंगे

पद्मिनी- मैं वारिस हूँ , बाबा मंगल की

वो- अफ़सोस पर मंगल ने हमें कभी नहीं कहा की पद्मिनी उसकी वारिस होगी .

पद्मिनी- नहीं कहा तो कोई बात नहीं , आज रात मैं खुद को वारिस साबित करुँगी और उस मिथ को तोड़ दूंगी की नहारवीर से बढ़िया सुरक्षा पंक्ति कोई नहीं

वो- तुम्हारी चुनोती पहले से स्वीकार कर ली गयी है सामर्थ्य है तो उसका प्रदर्शन करो. वर्ना अपने प्राणों का त्याग कर दो

पद्मिनी- आओ फिर

मेरी ये बाते समझ से परे थी ऊपर से पद्मिनी का अहंकार इतनी घायल होने के बाद भी लड़ाई चाहती थी . एक बार फिर वो दोनों उलझ गए मैं अपनी तरफ से बहुत कोशिश कर रहा था पर मेरी कहाँ कोई कहानी थी उन दोनों के बीच में और फिर एक पल ऐसा आया जब सब कुछ थम गया पद्मिनी इतना जोर से सीढियों से टकराई की करीब चार-पांच सीढिया ऐसे बिखर गयी की जैसे वो कभी थी ही नहीं

नाह्र्विर आगे बढ़ा और उसने पद्मिनी के सीने पर अपना हाथ रख दिया उसकी सशक्त उंगलिया पद्मिनी के सीने में उतरने लगी माना की वो उसका कलेजा ही निकालना चाहता हो .

“रुको नाह्र्विर रुको विनती सुनो ” मेरी करुना भरी पुकार सुन कर वो रुका और मेरी तरफ देखा

मैं- दया करो क्रपालु, इस मुर्ख के प्राण बक्शो मैं वादा करता हूँ की आज के बाद ये तो क्या कोई भी इस तालाब की गहराई में नहीं उतरेगा , ये मेरी भूल थी जो मैंने इस तालाब को बनाया मैं अभी के अभी पाट दूंगा इसे.

वो- अर्जुन, नियम बड़े जटिल होते है या तो उन्हें ऐसे तोड़ो की फिर कभी वो नियम बन ही न पाये अधुरा छोड़ा तो बात बिगड़ेगी.

मैं- पद्मिनी के प्राण कैसे बचे

वो- या तो कोई और इस चुनोती को पूरा करे या फिर इसके प्राणों की जगह अपने प्राण दे अब मुझे तो तंत्र का क भी नहीं आता था और मैं हरगिज नहीं चाहता था की पद्मिनी की जान जाये तो मैंने वो फैसला लिया जो लेने से कोई भी दो बार सोचता

“तुम मेरे प्राण ले लो पर पद्मिनी को कुछ नहीं होना चाहिए ” मैंने कहा

नाहर्वीर - इतना बड़ा बलिदान किसलिए

मैं- तुम नहीं समझोगे , श्याद मैं प्रेम करता हु इस से और प्रेम से बड़ी शक्ति क्या है इस जहाँ में .



“जैसी इच्छा तेरी, ” नहार्वीर ने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे अपने साथ तालाब की गहराई में ले कर चल दिया.
 
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#39

दुनिया अपने आप में अजीब न जाने क्या क्या छिपाया हुए है ये , आँखों के सामने सब कुछ होकर भी मैं अनजान उस दुनिया से जो यही कही तो थी . तालाब की सीढियों पर खड़े मैं तालाब को ही देख रहा था जिसके अन्दर से मैं कुछ पल पहले ही निकल कर आया था मेरे हाथ में चांदी की एक मूर्त जिसे लेकर मैं वहां पहुंचा जहाँ इसकी जगह थी , मूर्त को मैंने उसकी जगह पर रखा और कटार से अपने बदन का मांस काटने लगा . रक्त और मांस से भोग लगा कर ज्यो ही मैं पीछे हुआ मूर्त में आग लग गयी पर मैं डिगा नहीं मैं बस उसे देखते रहा

“अर्जुन क्या किया ये तूने ” मेरी तरफ आती पद्मिनी के स्वर में घबराहट थी

मैं- जब तू जानती ही है तो पूछती क्यों है

“क्या जरुरत थी इस त्याग की ” उसकी आँखे डबडबाई

मैं- तुझे मरता हुआ भी तो नहीं देख सकता था न

पद्मिनी- जी भी तो नहीं पाउंगी अब

मैं- जियेगी मेरे साथ ही जियेगी

पद्मिनी- मेरे बदले अपनी जान क्यों गिरवी रखी तूने क्या लगता है तू मेरा

मैं- आज तो पता नहीं पर एक दिन तू जरुर जान जाएगी

पद्मिनी- जख्म दिखा तेरा

मैं- वो कभी नहीं भरेगा अब

पद्मिनी- जानती हु मैं तोड़ तलाश कर लाऊँगी

मैं- जानता हूँ तू ले आएगी . और रो मत तेरे चेहरे पर आंसू देखे तो फिर क्या ख़ाक जिए हम

मैंने पद्मिनी का हाथ पकड़ और उसे अपनी तरफ खींचा और उसके होंठो को अपने होंठो से जोड़ दिया. ऐसा लगा की सुलगते दर्द पर किसी ने बरफ रख दी हो . ये बस एक चुम्बन ही नहीं था ये इकरार था आने वाली जिन्दगी का .

अगली सुबह मैंने तय कर लिया था की जल्दी से जल्दी मुझे रुपाली को तलाश करना है एक वो ही थी जो इस हवेली की कहानी को सही मायने में सुना सकती थी . वो ही बता सकती थी की कामिनी कहा है उसके साथ क्या हुआ था . हवेली में घूमते हुए मेरी नजर उस कमरे पर पड़ी जिसके ताले पर मेरा ध्यान कभी गया ही नहीं था वो कमरा औरो से जायदा बड़ा था बड़ी मस्श्क्त करनी पड़ी मुझे ताला तोड़ने में . कमरे की धुल हटा कर देखा कमरे के बीचोबीच एक बड़ा सा पलंग था . एक तरफ अलमारी थी ये ठाकुर शौर्य सिंह का कमरा था .

अलमारी खोली ठाकुर के कपड़ो के आलावा वहां पर कुछ पिस्तौल थी और पैसे बस इसके सिवा कुछ भी नहीं . जाहिर था ताला लगाने वाले ने जमीनों के कागज पार कर ही लिए होंगे.

सोच ही रहा था की बाहर से मजदूरो की आवाजो ने मेरा ध्यान खींचा , पता लगा की बगीचे के पास कंकाल मिला है . जाहिर है मजदुर डरने ही थे. मैंने उनको शांत रहने को कहा और सोचने लगा की ये किसका हो सकता है क्या ये कामिनी थी या फिर भूषण की बीवी चंदा ने कहा ही था की उसे यही कही गाड दिया गया था . पर ये कामिनी थी तो इसे मारा किसने . कंकाल को वापिस से खुर्द बुर्द करने के बाद मैं एक बार फिर से अन्दर आ गया और सोच ने लगा. ठाकुर आखिर किस तबियत का आदमी था .सोलह साल पुराणी इस गुत्थी को कैसे सुलझाई जाये सोचते सोचते मैं पागल ही तो होने लगा था .

दूसरी बात मंगल डाकू को मारा गया मंदिर में और मुझे पूरा यकीन था की एक तीर से दो शिकार किये थे मंगल को सिर्फ इसलिए ही नहीं मारा गया था की उसने सरिता देवी का अपहरण किया था उसे इसलिए मारा गया था की वो भी जानता था की तालाब में क्या है और अगर वो जानता था तो उसे मारने वाला पुरुषोत्तम भी जानता था उस बारे में . काश मैं अतीत में झाँक सकता , अतीत, अतीत. उसी समय मैं चांदनी से मिलने के लिए चल दिया और किस्मत देखो जय सिंह घर पर नहीं था

“तुम्हे यहाँ नहीं आना चाहिए था अर्जुन भैया को मालूम हुआ तो बात और बिगड़ेगी ” उसने कहा

मैं- जरुरी था मैं बस एक बात जानना चाहता हूँ की तुम्हारे पिता को हवेली से क्यों निकाला था ठाकुर ने .

चांदनी- दादा ने मेरे पिता का हिस्सा हड़पने की साजिश की थी इसीलिए

मैं- चांदनी, तेरे पिता का कमरा देखना चाहता हूँ मैं

चांदनी- क्यों किसलिए

मैं- भरोसा रख मुझ पर

चांदनी- ठीक है पर जल्दी करना भैया आ गये तो मुसीबत होनी ही होनी है

चांदनी मुझे अपने पिता के कमरे में ले गयी और मैंने अन्दर से दरवाजा बंद कर लिया जैसा उसने मुझसे करने को कहा था . कमरे में मुझे कुछ भी नहीं मिला जिस से जरा भी मदद हो सके निराशा भरे कदम लिए मैं वापिस से हवेली आ रहा था की मैं भूषण की झोपडी के पास रुका यहाँ का हर किरदार एक दुसरे से गेम खेल रहा था ,सबके अपने अपने राज थे और सब एक दुसरे से जुड़े थे

चंदा की बेटी को भूषण ने भी चोदा था पर पुरुषोत्तम क्यों दिलाएगा भूषण को जवान लड़की की चूत . और भूषण पुरुषोत्तम से क्या इतना खुला हुआ था . चंदा के पति को पुरुषोत्तम खास पसंद नहीं करता था तो क्या उसी खुन्नस में उसने चंदा की बेटी को चोदा या फिर चूत के बदले चूत वाली बात यहाँ भी लागु हो रही थी . पर बात घूम कर फिर वही अटक गयी की आखिर एक नौकर से इतनी नफरत क्यों थी पुरुषोत्तम को



गहने चुराए तेज ने मारा गया चंदा का पति पर तेजको घायल किसने किया जुर्म के सबूत अक्सर घटनास्थल पर ही रह जाते है पर मेरे लिए दिक्कत ये थी की सोलह साल बीत गए थे इस राज को दो लोग जानते थे ठाकुर या रुपाली . हवेली से अभी अभी एक कंकाल मिला था जो कामिनी का भी हो सकता था , कुवे पर बने कमरे में प्रसव के निशान मिले थे दो चाबिया छोड़ी गयी थी कुछ तो मुझ से छूट रहा था कुछ तो था जो समझ नही आ रहा था कहाँ थी वो कड़ी जो इस कहानी को जोड़ पाए. चाबी इतनी महत्वपूर्ण क्यों थी मैं तुरंत उसी वक्त खेतो पर बने कमरे की तरफ निकला और कमरे को खोदने लगा और कुछ घंटो की मेहनत के बाद मुझे जो मिला मैं समझ गया की मामला इतना सीधा भी नहीं था ...........
 
#40



मेरे हाथो में वो तस्वीरे थी जिन्होंने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया .कुछ तस्वीरों में ठाकुर किसी पग्गड़ धारी के साथ था और मैंने अनुमान लगाया की हो न हो ये मंगल सिंह ही होगा. जाहिर था की तस्वीरे लाल मनदिर की ही थी . देख कर लगता ही नहीं की इन दोनों में कभी कोई रार हुई होगी. उसके बाद वो ढेर जवाहरात का जिसमे मुझे जरा भी दिलचस्पी नही थी मैं जानता था ये वो ही अमानत रही होगी जिसे लाल मंदिर से चुराया गया था . पर मुझे कोतुहल था उस चमड़े के दस्तावेज में जिस पर कुछ किर्या लिखी हुई थी और अजीब से निशाँ बने हुए थे .

यहाँ पर मेरा एक अनुमान बहुत स्ट्रोंग था की ये माल यहाँ पर कोई लेकर आया होगा तो वो पुरुषोत्तम ही रहा होगा क्योंकि चंदा के पति को इस सामान के साथ उसी ने पकड़ा था और अगर ऐसा था तो यक़ीनन पुरुषोत्तम जानता था की पानी के निचे क्या था . और ये राज शायद इन्दर सिंह भी जानता था क्योंकि चाबी उसके पास थी . सोलह साल पहले की घटी घटनाओ का राज वक्त की धुल में ऐसे दब गया था की उस रेत को हटाने में मुझे बहुत जोर पड़ रहा था

.

मैंने चमड़े के दस्तावेज को जेब में रखा और बाकि सामान को वापिस स जमा कर ही रहा था मेरे हाथ से वो तस्वीरे गिर गयी और उनको उठाते हुए मैंने वो तस्वीर देखि जिसे थोड़ी देर पहले नहीं देख पाया और उस तस्वीर ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया ये बड़े घरानों में बहनचोद कौन किसका साथी संगी हो कौन जाने. ये तस्वीर बहुत कुछ कह तो रही थी पर क्या कह रही थी ये समझने के लिए मेहनत बहुत करनी थी .

लाल मंदिर के प्रांगन में बैठा मैं सोच रहा था की अतीत में यहाँ पर क्या ही घटा होगा, इन्सान अपनी आँखों पर भौतिकता के इतने चश्मे चढ़ाये होता है की उसे सच दिखता ही नहीं अपने लालच, अहम् में वो उस सुख से वंचित हो जाता है जिसकी तलाश में जीवन खत्म हो जाता है , मेरे पास वो वजह थी जिसकी वजह से मंगल और ठाकुर में पंगा हुआ पर मेरा मन कह रहा था की बात इतनी ही तो नहीं थी अभी तक मैंने कहानी का वो सिरा थाम रखा था जिसमे रुपाली थी कामिनी थी पर अभी कुछ देर पहले मिली तस्वीर ने कहानी के तमाम धागे ही तोड़ दिए थे लालच और हवस आपस में कहीं न कहीं जरुर मिले हुए थे , कहा मिले थे बस ये मालूम हो जाये तो कहानी खुल जाये.

चमड़े का दस्तावेज मुझे इतना तो बता रहा था की पुरुषोत्तम और इन्दर जब जंगल में जाते थे तो वो शिकार नहीं करते थे वो तलाश करते थे किसी चीज की और संभवत आँखों के धोखे में उस चीज को वो तलाश नहीं कर पाए होंगे या फिर उस चीज की तलाश में इन्दर सिंह को कुछ और ही मिल गया जिसकी वजह से पुरुषोत्तम और उसके बीच दुरिया आ गयी होंगी. पर अब न पुरुषोत्तम था और न ही इन्दर सिंह तो कौन मादरचोद खेल रहा था ये समझ से परे थे.

खेल बड़ा रोचक था दरअसल यहाँ पर कुछ लोगो की दोहरी कहानी चल रही थी एक में लालच था तो दूसरी में हवस लालच के बारे में मैं लगभग जान गया था पर हवस की तलाश अभी बाकी थी, जब मैं लाल मंदिर में पहुच गया तो मैंने देखा की पद्मिनी भी वहीँ पर मोजूद थी

मैं-अच्छा हुआ तू यही मिल गयी मैं तुझसे मिलना चाहता था

पद्मिनी- क्यों

मैंने जेब से चमड़े का दस्तावेज निकाला और उसे दिखाया

मैं- ये ही जड़ है इस सब की

पद्मिनी- असंभव है ये

मैं- तेरे सामने ही है जो भी है पर मुझे लगता है की तेरे बाबा मंगल जानते होंगे इसके बारे में

पद्मिनी - हो सकता है पर

मैं- पर असली बात ये है की सोने का लालच था ही नहीं कभी सोना तो बस एक माध्यम था उस चीज को पाने का जिसके बारे में हम नहीं जानते

पद्मिनी- मंदिर का इतिहास और उसके बारे में कोई गहराई से जानने वाला कोई बचा है तो वो है ठाकुर

मैं- हमें उसे नींद से जगाना होगा

पद्मिनी- कैसे

मैं- कोई है जो चोरी छिपे चंदा से मिलता है अगर हम उसे पकड़ सके तो बहुत कुछ हासिल हो सकता है

पद्मिनी- चंदा का क्या लेना देना इस सब से

मैं- पता नहीं पर कोई तो बात है जो उसे इस सब से जोड़ रही है.

पद्मिनी- मैं आज से ही चंदा की निगरानी शुरू करती हूँ

थोडा समय पद्मिनी के साथ बिताने के बाद मैं हवेली की तरफ चल दिया की तभी मैंने जय सिंह और चांदनी को गाड़ी में कही जाते हुए देखा न जाने क्यों मेरे दिमाग में अजीब सा ख्याल आया और मैं हवेली के बजाय चांदनी के घर पहुँच गया. घर में अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था नौकरानी उंह रही थी मैंने अपने कदम ठाकुर के कमरे की तरफ बढ़ाये और दरवाजे को बंद कर लिया. बड़े से बिस्तर पर ठाकुर गहरी नींद में पड़ा था उसका बदन किसी पहलवान जैसा था . मैंने उसके कमरे की तलाशी लेनी शुरू की .

“क्या छिपाया हुआ है तुमने शौर्य सिंह मैं जानता हूँ जो दिख रहा है वो वैसा नहीं है पर मैं तलाश ही लूँगा उस वजह को ” मैंने झल्लाते हुए कहा .

कमरे में कुछ भी तो ऐसा नहीं था जो मेरी मदद कर सके अतीत के निशानों को इतनी शिद्दत से मिटाया गया था की वर्तमान नाक रगड़ रहा था एक सुराग को ,लाशो का ऐसा चक्रव्यूह मेरे आस पास था जिसकी सड़ांध में न जाने क्या छिपा हुआ था . ठाकुर का भतीजा जिसकी गांड पर लात मार कर ठाकुर ने हवेली से बाहर फेंक दिया था उसकी ऐसी क्या मज़बूरी रही होगी की वो कोमा में पड़े ठाकुर की तीमारदारी करेगा जबकि वो खुद गायब हो गया था .

कुछ नही मिला जो मदद कर सके , गला सूख रहा था मैंने पास रखे जग को उठाया और अपना गला तर किया जब मैं वापिस से जग को रख रहा था तो मेरी नजर उस तस्वीर पर पड़ी जो जग के पास रखी थी और उस तस्वीर को जब मैंने गौर से देखा तो मेरे कदमो से जमीं खिसक गयी .

 
#41



“ये तस्वीर यहाँ पर क्या कर रही है , इसे तो हवेली में होना चाहिए था ” मैने खुद से कहा .

कामिनी के ये तस्वीर जिसमे वो किसी बाग़ में हैंडपंप के पास खड़ी थी और तस्वीरको ध्यान से देखने पर मैंने उसमे मंगल सिंह को देखा . कामिनी का भला क्या लेना देना मंगल सिंह से इस बात ने मेरे दिमाग के घोड़ो को दौड़ने पर मजबूर कर दिया . मैंने वो तस्वीर भी जेब में डाल ली और मैंने चांदनी के घर से एक फ़ोन किया और हवेली में आ गया .

कामिनी के कमरे में उसका तमाम सामान छान मारा पर कुछ नहीं मिला और फिर मुझे सीढियों के निचे वाले कमरे का ध्यान आया मैंने एक बार फिर से तलाशी शुरू की सब कुछ देख चूका था , पर भला हो इस घर के उस इन्सान का जिसे तस्वीरों का शौक था मुझे एक तस्वीर और मिली जिसमे कामिनी भूषण के साथ खड़ी थी बस इस बार जगह कुवे पर बने कमरे की थी और इस बात ने मुझे चंदा के पति की कही बातो पर ध्यान देने को मजबूर कर दिया.

वापिस ऊपर आकर मैंने एक के बाद एक कड़ीयो को जोड़ना शुरू किया कुलदीप के कमरे से मिली ब्रा , कामिनी की ब्रा दोनों में अंतर था . सरिता देवी का अपहरण होना ठाकुर की दुश्मनी मंगल से होनी तस्वीर में कामिनी का भूषण और मंगल सिंह के साथ होना . ओह तेरी की , नजर कामिनी के सीने पर थी और मेरे होंठो पर मुस्कान आ गयी तो ये माजरा था . दरअसल वो तस्वीरे जिन्हें मैं कामिनी की समझ रहा था वो कामिनी की नहीं उसकी माँ सरिता देवी की थी , दोनों माँ बेटी की शकल लगभग हमशक्ल ही थी इसलिए मैं समझ नहीं पाया था. चंदा के पति ने कमरे में चुदते हुए कामिनी नहीं सरिता को देखा होगा. सरिता देवी के अवैध सम्बन्ध भूषण से रहे होंगे और मंगल भूषण का दोस्त था तो जाहिर है की उसने भी ले ली होगी. ये बात कुलदीप को मालूम हो गयी होगी चूँकि सारे भाइयो में सबसे घटिया कुलदीप ही था हवस में अँधा होकर उसने जरुर अपनी माँ पर ही हाथ साफ किया होगा ब्लेकमेल करके पर यहाँ एक बात और थी मेरा शक इंद्र सिंह पर भी था क्या मालूम वो भी सरिता देवी के साथ हो . या फिर वो सच में कामिनी से मोहब्बत करता था . पुरुषोत्तम और उसके बीच हुए झगडे की वजह कहीं सरिता देवी तो नहीं थी . ठाकुर को ये बात मालूम हुई इसलिए ही उसने सरिता को रस्ते से हटाने की साजिश रची हो

भूषण लगभग हर समय हवेली में रहता था सरिता देवी के साथ उसके सम्बन्ध बनना मुमकिन था क्योंकि ठाकुर ज्यादातर खुद अपनी रंगरेलियो में व्यस्त रहता था , चूँकि चंदा के पति को सरिता देवी के संबंधो की जानकारी थी इसलिए मौका मिलने पर पुरुषोत्तम ने उसे अपने रस्ते से हटा दिया.

मैंने इस थ्योरी पर चलने का सोचा पर अभी भी कुछ सवाल बाकि थी की सारे भाइयो को किसने मारा और लाल मंदिर में क्या करना चाहता था ठाकुर. शाम को मैं घर जा रहा था तो पुलिए के पास मुझे चांदनी की गाड़ी खड़ी दिखी पर वो नहीं थी . मैं इधर उधर देखने लगा तो जंगल में कुछ दुरी पर पेड़ो के साए में मैंने जो देखा मुझे यकीं नहीं हुआ चांदनी घुटनों के बल झुकी हुई थी और उसके पीछे अजित सिंह था जो उसे चोद रहा था . दिल को धक्का सा लगा बेशक मैं जानता था की वो मुझे प्यार नहीं करती बल्कि मैं उसे प्यार नहीं करता था मेरा दिल पद्मिनी के लिए धडकता था पर बुरा बहुत लगा .

चुदाई के बाद अजित ने उसके होंठो को चूमा और बोला- “चांदनी,अभी तक तू अर्जुन को रिझा नहीं पाई है तू जानती है न वो ही एक है जो हमे हमारी मंजिल तक लेकर जायेगा ”

चांदनी- कोशिश कर तो रही हूँ पर उसे हुस्न के जाल में फंसाना मुश्किल है वो औरो से अलग है मैने रुपाली के साइन करके उसके पास नकली वसीयत भी पहुंचा दी है पर उसे फर्क नहीं पड़ा. चंदा अर्जुन के करीब कुछ ज्यादा ही है वो उस पर भरोसा करने लगा है कहीं वो .......

अजित- फ़िक्र मत कर चंदा खुद हवेली को बर्बाद देखना चाहती है वो अर्जुन का साथ नहीं देगी वैसे भी हवेली की अब किसी को परवाह नहीं है बस हमें वो चीज मिल जाये तो फिर देखना हम क्या से क्या हो जायेंगे

चांदनी- और रुपाली उसका क्या

अजित- वो बीता हुआ कल है और कल बस कल होता है .एक बार हमारा काम हो जाये फिर उस साले अर्जुन को तो मैं ऐसी मौत मारूंगा की किसी की हिम्मत नहीं होगी मेरे सामने सर उठाने की .

तो ये सब साजिश शुरू से ही थी चांदनी का मेरे पास यूँ आना प्लान था पर मैं इन मादरचोद लोगो का उस्ताद था किस्मत से मैंने इनकी सच्चाई जान ली थी चाहता तो अभी इनको सजा दे सकता था पर फिर आगे की राह मुश्किल हो जाती ये मुझे मोहरा बनाने चले थे अब बारी मेरी थी . मैं वहां से चंदा को मिलने पहुंचा और जैसे ही झोपडी के अन्दर गया मैने देखा ..................
 
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कच्चा फर्श रक्त से नहाया हुआ था चंदा की लाश पड़ी थी छाती को चीर दिया गया था पर उसकी आंखे खुली थी और उनमे हैरत अभी भी मोजूद थी . जाहिर था कातिल को खूब जानती थी वो और अजित या चांदनी कातिल हो नहीं सकते थे क्योंकि वो कहीं और थे. मैंने चंदा के बदन को छू कर देखा उसमे ताप नहीं था उसे काफी समय पहले मार दिया गया था पर किसलिए ..... सोचते सोचते मैं पागल होने लगा था .

वक्त बहुत भारी हो गया था मेरे लिए मैंने चंदा की लाश को समेटा, लकडिया इकठ्ठा की और उसे नए सफ़र के लिए विदा किया बेशक कुछ भी तो नहीं लगती थी वो मेरी पर फिर भी आँखों में आंसू थे . एक बार फिर मैं लाल मंदिर पहुँच गया पर वहां भी चैन नहीं मिला मुझे क्योंकि एक नया तमाशा मेरा इंतज़ार कर रहा था पद्मिनी खून से लथपथ मंदिर में बैठी थी और बहुत सारे नाहार्वीर घायल अवस्था में पड़े थे क्या मालूम उनमे कितनी सांसे बची हुई थी .

“ये ठीक नहीं , ये नहीं करना था तुझे ” मैंने कहा

पद्मिनी- अर्जुन मैंने जीत लिया मैंने साध लिया इनको

पद्मिनी की आवाज में खनक थी पर मुझे वो वेदना लगी

मैं-क्या मिला तुझे ये करके पगली

पद्मिनी- आ मेरे साथ और देख खुद

पद्मिनी ने मेरा हाथ पकड़ा और पानी की गहराई में उतर गयी . मैं समझ नहीं पा रहा था उसकी मुर्खता को , वो मुझे सोने का अकूत भंडार दिखा रही थी. मैंने उसे खींचा और वापिस धरा पर ले आया .

मैं- तो मोह के लालच में फंस गयी तू भी

पद्मिनी- मेरे बाबा ने जान दी इसके लिए

मैं- इसे पा भी लिया तो क्या पाया

पद्मिनी- समझी नहीं

मैं- सोच तेरे बाबा ने इस मोह को यहाँ छिपाया , ये पुख्ता किया की कोई भी इसे न पा सके तो कोई कारन जरुर रहा होगा उनके मन में वो चाहते तो डेरे में भी रख सकते थे इसे इसलिए नहीं छपाया गया की भविष्य में उनका कोई वारिस इस सोने को प्राप्त करे दरसल वो चाहते थे की इसकी वजह से आगे और कोई खून खराबा न हो . मैं तुझे बता दू की तेरे बाबा कभी भी इस सोने को नहीं छिपा रहे थे उनका मकसद तो था ही नहीं ये सब

पद्मिनी- तो क्या था उनका मकसद

मैं- खुद को उनका वारिस मानती है न तो अपनी आँखों से मोह की पट्टी हटा मुझे यकीं है तू उनके दिखाए रास्ते पर जरुर चल पड़ेगी

पद्मिनी- ऐसा क्या है तुझमे जो तू उस रस्ते पर चल दिया और मैं नहीं

मैं- शायद तू कभी उनकी वारिस थी ही नहीं

पद्मिनी- तो क्या तू है वो वारिस

मैं- नहीं, मैं तो खुद अपने अस्तित्व की तलाश में हु पर इस तलाश में मैंने इतना जरुर जान लिया है की दुनिया में सबसे बड़ी कोई शक्ति है तो वो है विस्वास , इस दुनिया में सब कुछ है बस आँखों से मोह की पट्टी हटाने की जरुरत है , ये सोना मोह की वो ही पट्टी है .

मैंने नाहर वीरो के जख्मो को सहलाया , उनकी आँखे खुली मैंने अपने हाथ उनके आगे जोड़ दिए

“हे वीरो बेशक इस लड़की ने अपने कौशल से आपको पराजित कर दिया हो पर इस भूल के लिए मैं आपसे क्षमा मांगता हूँ , अपनी दृष्टि सदैव हम पर रखना माफ़ी स्वीकार करे ”

उनमे से एक ने अपना हाथ मेरे सर पर रखा और बोला- बेशक हम अपनी सीमओं में बंधे है पर हमें पूर्ण विश्वास है जब तक तुम जैसे है हमारा विश्वास अटल रहेगा पर चूँकि हम आगे के विधान को देख सकते है अर्जुन तुम्हारी और पद्मिनी की संतान को वारिस का हक़ जरुर मिलेगा बेशक तुम दोनों वारिस नहीं हो

ये सुन कर मैं और पद्मिनी हैरान रह गए एक दुसरे का मुह ताकने लगे.

नाहर वीर मुस्कुराये और जल में उतर गए . रह गए हम दोनों

पद्मिनी- ये क्या कहा इन्होने

मैं- सच हो तो कहा जब तू मेरी लुगाई बनेगी तो हमारी औलाद होगी ही

पद्मिनी के कान लाल हो गए मैंने उसे अपनी बाँहों में भर लिया और उसके होंठो को चूम लिया . लाज से दोहरी हो गयी वो. मैंने पद्मिनी को चंदा की मौत से लेकर अजित-चांदनी की साजिश तक सब बता दिया

पद्मिनी- पर वो तुझे क्यों मारना चाहते है और क्या जानते है वो

मैं- यही तो मालूम करना है इसके लिए मुझे कोई योजना बनानी होगी पर फ़िलहाल तुझे मेरे साथ चलना होगा मेरा एक काम कर तू

पद्मिनी- क्या काम

मैं- तुझे एक फ़ोन करना है

पद्मिनी- किसे

मैं- जान जाएगी

पद्मिनी पर इस हाल में मुझे कपडे बदलने होंगे

मैं-ठीक है पहले तेरे डेरे चलते है

पद्मिनी ने नहा कर कपडे बदले और हम लोग मेरे घर आ गए , हमेशा की तरह घर अँधेरे में डूबा तो निर्मला नहीं थी वहां पर . मैंने पद्मिनी को फ़ोन दिया और उसने ठीक वो शब्द कहे जो मैंने उसे बताये थे , “वो जो बरसो से खोया हुआ है मिल गया है ”.

पद्मिनी- अर्जुन क्या है वो जो बरसो से खोया हुआ है

मैं-सोना पगली

सुबह जब मेरी आँख खुली तो मैंने निर्मला को देखा जो नहा कर ही निकली थी उसके बदन पर बस ब्लाउज और पेटीकोट था , पेटीकोट उसकी जांघो से चिपका हुआ था और मुझे पूरा यकीन था की उसने कच्छी नहीं पहनी थी. उसकी फूली हुई चूत जांघो के जोड़ से साफ़ नुमाया हो रही थी , ब्लाउज के बटनों में इतनी शक्ति नहीं थी की उसकी छातियो के बोझ को संभाल सके, मैंने अपने पायजामे में कुछ फूलता हुआ महसूस किया कमर तक आते उसके लम्बे बाल हलकी सी चौड़ी कमर को चूम रहे थे इस से पहले की मैं पिघल जाता मैंने अपनी नजर उसके मादक बदन से हटाई और वापिस कमरे में घुस गया .

कुछ देर बाद वो तैयार होकर मेरे कमरे में आई

“आजकल न जाने कहाँ गायब रहने लगे हो ” उसने कहा

मैं- ये बात तुम पर भी लागु होती है

निर्मला- मैं कहा गायब हु, या तो इस घर या परले घर

मैं- पर आज तुम मेरे साथ कहीं चल रही हो

निर्मला- कहाँ



मैं- खुद ही देख लेना
 
#43



निर्मला की आँखों में हैरानी थी पर होंठो पर कोई बात नहीं थी , खाना पीना करके मैंने गाड़ी निकाली और हम उस मंजिल की तरफ चल दिए जहाँ बरसो से इंतज़ार करते करते खुद इंतज़ार भी थक गया . मैंने देखा की निर्मला साइड में लगे शीशे से बाहर निहार रही थी .

मैं- ठीक हो

उसने हाँ में सर हिलाया और जल्दी ही हम हवेली के सामने थे .

“ये तो ,,,,,,, ”

मैंने उसकी बात काटी और बोला- ये , मेरा नया घर है ये हवेली अब मेरी है

निर्मला मुस्कुराई .

मैं -अन्दर चलते है

गाड़ी से उतरने के बाद मैंने उसका हाथ पकड़ा और हवेली में ले आया उसे ,खामोश हवेली में निर्मला की पायल शोर मचा रही थी . वो हवेली को घुर घुर कर देख रही थी . कभी आबाद रही हवेली अपनी बिखरी हुई दास्ताँ वक्त के थपेड़ो से झुझते हुए शायद निर्मला को बताना चाहती थी . मैं उसे रुपाली के कमरे में ले आया . कुछ देर हम एक दुसरे को देखते रहे और फिर मैंने निर्मला के होंठो को अपने होंठो से सटा दिया, जीवन में शायद ये पहली बार था जब मैंने इतनी हिम्मत की थी . सुर्ख लबो को जी भर कर चूमा मैंने

“माफ करना पर मैं तुमको देखते ही आपा खोने लगता हूँ.बहुत कोशिश करता हूँ तुमसे दूर रहने की पर जिस पल तुम मेरे सामने आती हो इस हुस्न की तपिश में खुद को जलता हुआ महसूस करता हूँ सुबह भी जब तुम्हे आते देखा , रश्क होने लगा था मुझे तुम्हारे गालो से टपकती पानी की बूंदों से . पता नहीं ये सही या गलत है पर भाभी मैं तुम्हे पसंद करने लगा हूँ मैं तुम्हारे आगोश में समाना चाहता हूँ ” निर्मला से ये शब्द कहते हुए मेरे होंठ बहुत कांप रहे थे .

उसने मुझसे कुछ नहीं कहा वो मेरे पास आई और उसने अपने लब मेरे लबो से जोड़ लिए. जैसे किसी ने पिघलता हुआ मक्खन मेरे होंठो पर घोल दिया हो उफ़ इतनी मादकता लबो में इतना जादू था तो जांघो के बीच क्या ही होगा मैंने सोचते हुए अपने दोनों हाथ निर्मला के नितम्बो पर रख दिए और उनको सहलाने लगा. निर्मला एक हाथ से मेरी गर्दन को सहला रही थी और दुसरे हाथ से मेरी पीठ को रगड़ रही थी . जैसे ही होंठो ने एक दुसरे को आजाद किया मैंने उसे पलट दिया अब उसकी गर्दन को चूमते हुए मैं अपने हाथो में उसके उभारो को थामे हुए था उफ्फ्फ इतनी नरमी जैसे की रुई के गोले हो ब्लाउज को उतारते ही मेरे हाथो ने ब्रा को छुआ और मेरे तन में आग लग गयी

“सीईई ” निर्मला के मांसल कंधे पर अपने दांत गडाते हुए मैंने उसकी ब्रा की डोरी खोलते हुए बेहद शानदार चुचियो को आजाद कर दिया . अपनी छातियो को मसलवाते हुए निर्मला अपना हाथ पीछे ले गयी और मेरी पेंट के ऊपर से ही मेरे लंड को रगड़ने लगी, हवस की आग हम दोनों को झुलसाने लगी थी शायद ये इस हवेली का ही असर था जिसकी हवाओ तक में काम वासना दौड़ती थी . मेरे हाथ अब निचे को चलने लगे थे उंगलिया निर्मला की नाभि से छेड़खानी कर रही थी तभी मैंने निर्मला को बेड के सिराहने झुकाया और उसके पेटीकोट को कमर तक चढ़ा दिया यकीन मानिए उसके बेहद खूबसूरत नितम्बो में फंसी वो नीले रंग की कच्छी जिस पर मछली बनी हुई थी क्या ही शानदार लग रही थी घुटनों के बल बैठते हुए मैंने हलके से दोनों नितम्बो को चौड़ा किया और चूम लिया

“श्ह्ह्ह ” निर्मला अपने होंठो पर आई कामुक आहो को रोक नहीं पा रही थी बड़ी नाजुकता से मैंने उसकी कच्छी को उतारा और मैं एक पल में समझ गया की क्यों लोग चूत के इतने दीवाने होते है गुदा का संकरा छेद और उस से आध या इंच भर निचे गहरी काली रंगत लिए चूत की वो फांके जो किसी चिपचिपे रस से सनी हुई थी . मैंने उसकी गांड को फैलाया और न जाने क्यों मैंने चूत को चूम लिया

“अर्जुन्न्न्नन्न ” निर्मला का पूरा बदन कांप गया

“”सुरूप मैंने अपनी जीभ को चूत पर फिराना शुरू किया निर्मला के पैर अपने आप चौड़े होते गए और मैं कामरस को पीने लगा निर्मला के तन में इतनी आग चढ़ गयी थी की उसका पूरा बदन कांप रहा था , उत्तेजना में मेरी जीभ उसकी गांड के छेद तक पहुँच गयी थी और कांपते होंठो से मैंने उस छेद को चूमा तो निर्मला के साथ साथ मैं भी पागल हो गया . मैंने तुरंत अपना लंड बाहर निकाला और निर्मला की गर्म चूत से सटा दिया अगले ही पल चूत के छेद को खोलते हुए मेरा लंड अन्दर बाहर होने लगा निर्मला थोड़ी और झुक गयी जिस से उसके नितम्ब ऊपर उठ गए उसके कंधो को सहलाते हुए , पूरी पीठ को मसलते हुए मैं अपने धक्को की रफ़्तार बढ़ाने लगा था . मेरी गोलिया उसकी चूत के बहते रस से भीगने लगी थी की मैंने अपने लंड को बाहर खींचा और निर्मला को लेकर बेड पर चढ़ गया . उसकी जांघो को फैलाया और एक बार फिर से हम एक हो गए. एक दुसरे के होंठो में होंठ फ़साये हुए जिस्मो को रोंद रहे थे निर्मला ने अपने बाहुपाश में मुझे जकड़ लिया था बार बार वो अपने कुल्हे ऊपर उठा कर सम्भोग का आनंद ले रही थी और फिर एक पल ऐसा आया की मुझे लगा वो खा जाएगी मुझे , उसके बदन की गर्मी को मैं झेल नहीं पाऊंगा इस से पहले की मैं ठंडा हो जाता उसने अपने नाखून मेरी पीठ पर इतनी तेजी से रगड़े की मैं कराह उठा. उसकी चूत में चिकनाई बहुत बढ़ गयी और वो किसी टूटे पेड़ सी ढह गयी इतनी गर्मी को मैं बर्दाश्त नहीं कर पाया और मेरे बदन से बहता लावा उसकी चूत में गिरने लगा. अचानक से ही बदन बहुत हल्का लगने लगा था और आँखे भारी . उसने मुझे ऊपर से हटाया और उठ कर बैठ गयी पर कपडे पहनने की चेष्टा नहीं की . चुदाई का दौर आकर गुजर गया था और अब मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी उस से नजरे मिलाने को

“अब इस ख़ामोशी की जरुरत नहीं अर्जुन हर पर्दा गिर चूका है हमारे बीच का ” उसने बिना मेरी तरफ देखे कहा



मैं बिस्तर से उठा और खिड़की से बाहर देखने लगा की तभी निर्मला पीछे से आकार मुझसे चिपक गयी उसके गर्म बदन से छूते ही न जाने मुझे क्या होने लगा उसकी उंगलिया मेरी गोलियों को मसलने लगी और तुंरत ही एक बार फिर से मैं तनाव से भर चूका था . निर्मला अब आगे को आई और निचे बैठते हुए मेरी आँखों में देखते हुए मेरे लंड को अपने होंठो में दबा कर बैठ गयी, जैसे ही उसने अपनी गर्म जीभ मेरे सुपाडे पर फिराई कसम से मैंने अपने घुटनों को कांपते हुए महसूस किया . मैंने आँखे मूँद ली और खुद को हुस्न के तूफ़ान के हवाले कर दिया. शाम तक मैंने और निर्मला ने चार बार चुदाई की और जब मेरी आँख खुली तो मैंने पाया की वो बिस्तर पर नहीं थी .......................
 
#44



खिड़की से आती धुप मेरी आँखों पर पड़ रही थी कपडे पहन कर मैं निचे आया तो देखा की निर्मला बाहर सीढियों पर बैठी थी .

मैं- यहाँ क्यों बैठी हो

निर्मला- अजीब सी घुटन है और अब जब यही रहना है तो क्यों न कुछ सामान ले लिया जाए

मैं- पहले ही सारी व्यस्व्था कर चूका हूँ मैं रसोई में जाकर तो देखो

निर्मला- मेरे पास दुसरे कपडे नहीं है

मैं- यहाँ पर बहुत से कपडे है जो भी पसंद आये पहन लो उसमे क्या है फिलहाल मुझे कुछ काम है मैं थोड़ी ही देर में लौट आऊंगा

निर्मला- अर्जुन मैं अकेली नहीं रह पाउंगी यहाँ पर

मैं- बस थोड़ी देर में लौट आऊंगा तक़रीबन आधे घंटे में वैसे भी हवेली में कोई आता जाता नहीं तब तक तुम खाना बना लेना

मैंने निर्मला को समझाया और लाल मंदिर के लिए निकल गया . एक बार फिर मैंने अपने मांस से भोग लगाया और गाँव की तरफ मुड गया चंदा कुछ मजदुर ले आई थी पर उसकी मौत के बाद से कोई आया नहीं था ,और जैसा की मुझे उम्मीद थी मजदूरो ने मना ही किया बाज़ार से निर्मला के लिए कुछ ले ही रहा था की चांदनी ने मुझे आवाज दी .

“अर्जुन ”

मैंने उसकी तरफ देखा और अपने कदम आगे बढ़ा दिए

“अर्जुन रुक तो सही ” उसने मेरे पास आते हुए कहा

मैं- काश रुक पाता

वो- ऐसे क्यों बोल रहा है तू

मैं- थोडा सा जल्दी में हूँ लाडली, तुझसे फिर मिलूँगा

चांदनी- थोड़ी देर तो रुक ऐसी भी क्या जल्दी जो अपनी लाडली के लिए समय नहीं तेरे पास

मैं- तेरे लिए तो पूरी जिन्दगी है लाडली पर मुझे ऐसा कुछ मिला है जो तेरी मेरी जिन्दगी बदल देगा

चांदनी की आँखों में चमक सी आ गयी बड़ी धूर्तता से उसने अपने उत्साह को रोका और बोली- ऐसा क्या है अर्जुन

मैं- मुझे मालूम हो गया है की ठाकुर शौर्य सिंह का सोना कहाँ पर है

चांदनि- कहाँ है अर्जुन

मैं- तुझे ले चलूँगा वहां पर जल्दी ही

मैंने चांदनी को असमंजस में छोड़ा और वहां से निकल कर हवेली आ गया . निर्मला नए कपड़ो में बड़ी प्यारी लग रही थी इतनी प्यारी की एक बार फिर से वो मेरे बिस्तर पर थी. चांदनी को मैंने जान बूझ कर वो डोर पकड़ाई थी जिस पर उसका चलना जरुरी था . बेशक निर्मला मेरे साथ थी पर दिमाग में चांदनी का धोखा ही चल रहा था दो बार की घमासान चुदाई ने मेरी हड्डियों को हिला दिया थाकुछ देर के लिए नींद सी आ गयी . आँख खुली तो मैंने एक बार फिर से निर्मला को बिस्तर पर नहीं पाया .उठ ही रहा था की मेरे पैर में ब्रा उलझ गयी मैं उसे उठा कर बेड पर फेंक ही रहा था की मेरे हाथ रुक गए मेरी नजर ब्रा के साथ में लगी पट्टी पर पड़ी जिस पर ब्रांड का नाम लिखा था और न जाने क्यों मेरी आँखों में चमक सी आ गयी मैंने तुरंत अलमारी खोली और मुझे इसी ब्रांड के ढेरो कच्छी ब्रा के जोड़ी मिली. मैंने अपना माथा पीट लिया

“हवेली के राज हवेली में ही छिपे है ” चंदा की कही बात मेरे दिमाग में गूंजने लगी . मैं निचे आया इधर उधर देखा कहीं पर भी कोई नहीं था पूरी हवेली को छान मारा सिवाय मेरे वहां पर कोई भी नहीं था . और ये ख़ामोशी मुझे खटक रही थी क्योंकि इस ख़ामोशी के निचे वो शोर दबा था जो शायद इस हवेली की चूले हिला देने वाला था .

मैं हवेली से निकलने ही वाला था की मेरी नजर तहखाने वाले कमरे पर पड़ी उसका दरवाजा खुला था जबकि मुझे याद था की जाते समय मैंने ठीक से बंद कर दिया था किसने खोला होगा सीढिया उतरते हुए निचे पंहुचा तो जो देखा देख कर मैं हैरान रह गया आँखे फटी की फटी ही रह गयी उस लम्बी सी मेज पर निर्मला लेटी हुई थी और उस पर जो चढ़ा हुआ था यकीन तो नहीं था पर आँखों को झूठा भी तो नहीं कहा जा सकता था था .

“बहुत बढ़िया तो ये सब नाटक था ठाकुर साहब, सोलह साल से कोमा में पड़े रहने का नाटक ” मैंने जोर से कहा . मुझे देखते ही दोनों अलग हो गए ठाकुर ने अपने कपडे पहन लिए और मुझे घूरने लगा. निर्मला ने अपनी सलवार बाँधी और दोनों एक दुसरे को देख कर मुस्कुराए

“तो ये है तुम्हारी सच्चाई निर्मला या फिर रुपाली ठकुराइन देर तो लगी तुम्हे समझने को पर समझ ही गया तो वो सारी बाते सच थी पर मैं ठाकुर साहब आपसे जानना चाहूँगा की ये नाटक किसलिए क्यों एक आदमी सोलह साल से बेहोशी का नाटक कर रहा था जबकि उसे ऐसा करने की कोई खास जरुरत नहीं थी तुम दोनों चाहते तो इसी हवेली में साथ रह सकते थे किस की हिम्मत थी जो रोक सकता ” मैंने कहा

“साँस ले लो अर्जुन . मैं तो हमेशा से ही तुम्हारे आस पास थी हालाँकि मेरी उत्सुकता है की तुमने कैसे पहचाना मुझे क्योंकि ये बिलकुल भी आसान नहीं था ” रुपाली ने अपने गले पर चाकू फेरना शुरू किया मुझे लगा की कहीं वो अपनी गर्दन तो नहीं काटने वाली और फिर उसने अपनी खाल सी उतार दी ये कोई नकाब था जिस से चेहरा बदला था और आज पहली बार मैं रुपाली ठकुराइन को देख रहा था उसके असली चेहरे के साथ .

रुपाली- हैरानी किसलिए अर्जुन

मैं- मुझे पहले ही समझ जाना चाहिए था , रुपाली के लिए सबसे सुरक्षित जगह उसके मायके से ज्यादा कोई नहीं थी जहाँ उसकी पूरी मदद की उसके भाई ने . और इस नकाब के छलावे में कोई भला कैसे ही पहचान पाता बहुत खूब . पहले मुझे कुछ समझ नहीं आया था की क्यों भला घर के फ़ोन से चांदनी के घर बात होती है पर ये बाते तो एक बहु अपने प्रेमी ससुर से करती थी जबकि मैं सोचता रहा की इन्दर सिंह कामिनी से बाते करने के लिए वो नम्बर नोट किया होगा.

रुपाली - तुम्हारी बात सही भी है और गलत भी

मैं- कैसे

रुपाली - बताती हूँ पर तुमने कैसे पहचाना की निर्मला ही रुपाली है

मैं- आदमी कभी कभी चाह कर भी अपनी कुछ आदतों को नहीं छिपा पाता किस्मत देखो मैं तुम्हे यहाँ लाया और तुम्हारी ब्रा ने भेद खोल दिया तुम आज भी उसी ब्रांड की ब्रा पहनती हो जो बरसो पहले पहनती थी

रुपाली मुस्कुरा पड़ी .



मैं- ठाकुर साहब तो वो क्या जरुरत थी जिसकी वजह से आपको बेहोशी का नाटक करना पड़ा.
 
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ठाकुर के चेहरे पर अजीब से भाव थे .

मैं- कुछ जान चूका हूँ कुछ जानना बाकी है ठाकुर साहब , हमाम में हम सब नंगे है आप चाह कर भी हवेली के उस राज को छिपा नहीं सकते मैं सरिता देवी वाली बात भी जानता हूँ और सोने वाली बात भी

ठाकुर- तुम कुछ भी नहीं जानते अर्जुन

मैं- तो बता क्यों नहीं देते .

“खामोशिया अपने निचे शोर को दबाये होती है अर्जुन , ” ठाकुर ने कहा

मैं- उस शोर को दबाये रखने से आपके ही कानो के परदे फटेंगे . मैं जान तो चूका हूँ की सरिता देवी की वेवाफाई ने इस हवेली की नींव हिला दी पर इस राज को अब दिल में दबा कर रखने का कोई भी फायदा नहीं है कम से कम सोलह साल से जो दर्द दबाये बैठे हो वो हल्का कर दीजिये

“मैं बताती हूँ अर्जुन ” रुपाली ने कहा

रुपाली- हवेली की शानो शोकत सबको बाहर से तो खूब दिखती थी पर इसके अन्दर की कहानी कोई नहीं जानता था मेरी सास सरिता देवी परम पूजनीय जिसके सर से कभी आँचल नहीं सरका , कोई नहीं जानता था की जब वो कपडे उतारती है तो क्या कहर ढाती होगी . बात उस समय की है जब किसी बात को लेकर डाकू मंगल सिंह और पिताजी में ठनी हुई थी .

मैं- पर ये दोनों तो दोस्त थे न

ठाकुर- लालच के आगे कोई सम्बन्ध मायने नहीं रखते

मैं- सोने का लालच

ठाकुर- हाँ . पर मैं ये नहीं जानता था की मंगल हमारी इज्जत पर हाथ डालेगा उसे सरिता का अपहरण नहीं करना चाहिए था

मैं- सरिता देवी का कभी अपहरण हुआ ही नहीं था ठाकुर साहब

मेरी बात सुन कर ठाकुर और रुपाली हैरान रह गए मेरा मुह ताकने लगे.

मैं-सरिता देवी के सम्बन्ध सबसे पहले भूषण से हुए , चूँकि मंगल सिंह हवेली में आता था सरिता की नजरो में था वो और भूषण भी मंगल संग दोस्ती बढ़ाने लगा था . उस दोपहर सरिता देवी उन दोनों संग चुदने ही गयी थी पर वो नहीं जानती थी की उसे आपके भतीजे ने देख लिया था .

ठाकुर ने आह भरी, भतीजे ने अपनी चाची को जैसे तैसे चोद दिया . और ये बात जब आपको मालूम हुई तो आपने उसे हवेली से बाहर निकाल दिया .

ठाकुर- मैंने उन दोनों को आम के बाग़ में देख लिया था और उसी दिन से मुझे नफरत हो गयी थी उस नीच से

मैं- पर सरिता देवी को कोई और भी पेल रहा था

ठाकुर -कौन

मैं- चंदा का पति . उसने सरिता देवी को खेतो पर बने कमरे में चुदते हुए देखा था .

रुपाली- यहाँ पर तुम गलत हो अर्जुन .कमरे में सरिता देवी नहीं बल्कि कामिनी जाती थी

ये मेरे लिए एक और नयी बात थी .

रुपाली- हाँ अर्जुन कमरा ही वो जगह था जहाँ पर इंद्र से मिलने जाती थी कामिनी . वहीँ पर चंदा के पति ने उसे देखा . चूँकि वो तेज की वजह से हवेली के अन्दर तक अत था वो कामिनी पर दबाव बनाने लगा था की वो उसके साथ भी सम्बन्ध बनाये . कामिनी ने ये बात पुरुषोत्तम को बताई तो वो आग बबूला हो गया उसने मार पिट कर दी नौकर से साथ पर कहते है न विनाश काले विपरीत बुद्धि , पुरुषोतम ने चंदा की लड़की को चोद दिया .कमजोर आदमी की नीच हरकत . चंदा के पति ने मेरी सास को भूषण के साथ चुदाई करते पकड लिया , उसने भी वही मांग की सरिता देवी को तो लंड चाहिए था औरत वैसे भी एक बार गिर जाये तो उठ नहीं सकती . घर में चुदाई का खेल जारी था दोनों माँ बेटी अपनी चूत की आग बुझाये ले रही थी बिना सोचे समझे की , की जब बात खुलेगी तो क्या होगा . इसी बीच कुलदीप लौट आया . उसने घर में चल रहे तमाशे को पकड़ लिया और सारी शर्म लिहाज भूल कर उसने अपनी ही माँ को साथ सोने के लिए मजबूर किया .

रुपाली की कही इस बात ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया की जिस्मो की आग में इन्सान इतना गिर जाता है की उसे इतना भी होश नहीं रहता की जिस जिस्म को वो भोगना चाहता है खुद उस ही वो अंश है .

“गलती तो ठाकुर साहब आपकी भी है , झूठी शान के चक्कर में परिवार पर ध्यान नहीं दिया . अगर परिवार में सबको साथ लेकर चलते तो क्या मालूम ये नोबत आती ही नहीं ” मैंने कहा

ठाकुर- सबकी अपनी मजबुरिया होती है

मैं- और कामिनी उसका क्या

रुपाली- कामिनी इन्दर को चाहने लगी थी . ये समाज रिश्तो के उस झूठे बंधंनो में पड़ा है की अक्सर चाहते दम तोड़ जाती है , चूँकि इन्दर की बहन यानि मैं इस घर की बहु थी तो कामिनी का ब्याह कभी नहीं हो सकता था इन्दर से . पर मैंने जीवन में एक बात बहुत गहराई से महसुसू की है अर्जुन, की इश्क मोहब्बत से भी कोई चीज बहुत ऊपर है तो वो है हवस . इंद्र भी उसी हवस में डूबा था ये जानते हुए भी की कामिनी की माँ है उसने जरा भी नहीं सोचा सरिता देवी को पेलने में .

मैं- हवस का ही तो सब खेल है तुम देखो , तुम भी तो अपने ससुर के साथ आज तक सो रही हो.

रुपाली- उस आग में मैंने प्रेम तलाश कर लिया . उस घर में हम दोनों ही तो थे जो तनहा थे , अकेले थे अपने आप से जूझ रहे थे . कहने को तो बाते है पर अपने को दुसरो की बाँहों में देखना बहुत कष्टदायक होता है

मैं रुपाली की इस बात से सहमत था .

मैं- क्या कामिनी के इंद्र के आलावा किसी और से भी सम्बन्ध थे .

रुपाली- अब तुमने सही सवाल किया

मैंने देखा ठाकुर की आँखों में अजीब से भाव थे .

रुपाली- अपने तीनो भाइयो के साथ सो रही थी वो .



रुपाली की इस बात ने जैसे धमाका ही कर दिया
 
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