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- Dec 5, 2013
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#57
किसी ने मुझे पुकारा, “देव ”
खेतो से एक साया निकल कर मेरे पास आया , मैंने देखा ये सरोज थी .
“तुम यहाँ कैसे ” मैंने कहा
सरोज- तुम्हे ढूंढते ढूंढते आ गयी , मुझे तुमसे बेहद जरुरी बात करनी थी .
मैं- जब्बर को मेरी मौत की सुपारी देने से ज्यादा जरुरी क्या बात है अब .
सरोज- मैं जानती थी ऐसा ही होगा. ये सब एक साजिश है हम दोनों के बीच दरार डालने की देव, मुझे मालूम हो गया है तुमने घर क्यों छोड़ा विक्रम उस शकुन्तला के साथ मिल कर जो भी कर रहा है उसमे मेरा उसका कोई साथ नहीं है देव, और जब्बर तो उनका ही मोहरा है .
मैं- जो भी हो मैं इस हालात में नहीं हूँ की किसी पर भी भरोसा कर सकू. मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो.
सरोज- तुम्हे मेरी बात सुननी ही होगी,
मैं- मैंने कहा न जाओ तुम यहाँ से.
सरोज- इतना कठोर मत बनो देव, मुझ पर भरोसा नहीं कर सकते और मेरे पास ऐसा कोई सबूत नहीं है जो तुम्हे भरोसा दिला सके. बस मेरी जान है जो तुम ले लो शायद तब तुम्हे यकीन आये.
मैं- मैंने कहा न मेरे हालात ऐसे नहीं है , और तुम्हे अगर मेरी फ़िक्र है तो फिर मत आना मेरे पास.
मैंने कहा और आगे बढ़ गया . सरोज मुझे आवाज देती रह गयी .समझ नहीं आ रहा था की क्या करू क्या न करू. रिश्तो की ऐसी भूलभुलैया में उलझा था मैं की अपने पराये सच्चे झूठे का भेद समाप्त हो गया था .
रूपा के घर जब तक मैं पंहुचा , वो मेरी ही राह देख रही थी .
रूपा- बड़ी देर लगाई कब से राह देख रही हूँ मैं .
मैं- बस देर हो गयी .
रूपा- ये कैसा बक्सा है हाथ में .
मैं- रख ले तेरे पास , मुझे भूख लगी है बाद में देखेंगे इसे , हिफाजत से रख दे.
रूपा- जो हुकुम सरकार.
रूपा खाना बनाने लगी मैं वही दिवार का सहारा लेकर बैठ गया .
मैं- तू जादू करना जानती है
रूपा- कितनी बार तुझे बताऊ ,
मैं- कोई ऐसी तरकीब है की मैं अतीत देख पाउँगा
रूपा- बाबा सुलतान से पूछ , वैसे जादू में ऐसा होता है कुछ जादूगर अपनी यादो को कही छुपा देते है . वैसे तुझे किसका अतीत देखना है .
मैं- नागेश का
रूपा- जानता है तू क्या कह रहा है .
मैं- तू शायद जानती नहीं पर मुझे लगता है उसका मुझसे कोई नाता है .
रूपा- नागेश किवंदिती के सिवा कुछ भी नहीं . उसे मरे जमाना हुआ .
मैं- बाबा को लगता है की वो लौट आया है . चरवाहों का तिबारा शायद उसने ही तोडा है .
रूपा- नहीं ऐसा नहीं है .
मैं- क्यों
रूपा- वो तिबारा मैंने तोडा है .
मुझे जैसे रूपा ने झटका सा दिया.
मैं- पर क्यों
रूपा- जब तुझे चोट लगी तो मेरा दिमाग भन्ना सा गया था . मैं इलाज के लिए उपचार तलाश कर रही थी , तुझे मालूम नहीं उसे चरवाहों का तिबारा क्यों कहा जाता था क्योंकि वहां पर ये जादूगर लोग अपने सफ़र के दौरान अक्सर रुकते थे , एक तरह का गुप्त ठिकाना था ये लोगो को मालूम न हो की जादूगर है तो वो चरवाहों का भेस ले लेते थे .
मैं- पर तूने तोडा क्यों
रूपा- बता तो रही हूँ , उस रात जब मैं वहां पर पहुंची . तो मुझे कटोरे की तलाश थी जो मन्नते पूरी करता था .
मैं- कैसा कटोरा .
रूपा- तिबारे में हमेशा से एक कटोरा रखा होता था जिसमे से जो मांगो मिल जाता था , मतलब कुछ जरुरत की चीजे .
मैं- तो तुझे क्या जरुरत थी
रूपा- कितने सवाल करता है तू
मैं- बस उत्सुकता .
रूपा- मैं प्रतिकृति पत्थर को तलाश रही थी .
मैं- क्या होता है ये .
रूपा- एक तरह का छलावा .
मैं- समझा नहीं
रूपा- तेरा घाव तेरे कलेजे को खा रहा था , यदि जल्दी से उपचार न होता तो जहर तेरे कलेजे को भेद देता. चूँकि मुझे उपचारों का ज्ञान है तो मैंने एक रिस्क लेने का सोचा, मैं तेरे कलेजे की नकल बनाती और उस तंत्र वार के असर को उस पर उतार लेती बाद में कलेजा वापिस कर देती.
पर ये पत्थर मिलना दुर्लभ है तो बस मैं अपनी हताशा को रोक नहीं पाई.
मैं- मैं कैसे ठीक हुआ तुमने उस रात क्या किया था .
रूपा- कुछ भी नहीं किया मैंने .
मैं- रूपा, मुझे सच बता तुझे मेरी कसम है सच बता.
रूपा- मैंने कुछ नहीं किया सिवाय तेरे जख्म को सिलने के. जो किया उस नागिन ने किया उसने ....
रूपा ने एक आह भरी
मैं- क्या किया था उसने बताती क्यों नहीं .
रूपा- उसने तेरी जान के बदले खुद की जान रख दी. वो कोई मामूली नागिन नहीं है वो अलग है , हम सब जानते थे की नागेश के वार का कोई भी तोड़ नहीं है . तो उसने एक ऐसा फैसला किया जो बस काम कर गया . उसने तेरी जान के बदले अपनी जान रख दी. नागो की अपनी शक्तिया होती है , उसने रक्तभ्स्म तुझे दी .
मैं- क्या होती है ये .
रूपा- जैसे इंसानों के लिए शरीर में रक्त जरुरी होता है , नागो के लिए रक्त्भास्म होती है . वार उतारने के कुछ नियम होते है हर चीज का मूल्य होता है उसने तेरे कलेजे के बदले अपना कलेजा रख दिया. उसने सोचा था की उसका जहर नागेश के वार को झेल लेगा पर ऐसा हुआ नहीं .
मैं- मतलब
रूपा- मतलब ये की नागिन पल पल मर रही है , उसके पास समय बहुत कम है इस श्राप ने हम तीनो को आपस में जोड़ दिया है . उसका कलेजा गल रहा है , हर रात तेरी भारी होगी दर्द से, और मेरी पीठ का ये जख्म सदा ताजा रहेगा कभी भरेगा नहीं .
मैं- तू सब जानती थी तो तूने क्यों किया ऐसा.
रूपा- आशिकी इम्तेहान लेती है मेरे सरकार. और जब तुझसे नाता जोड़ा है तो फिर मैं कैसे कदम पीछे हटाती, जब सुख में तेरी साथी हूँ तो तेरा दर्द भी मेरा हुआ न .
मैं- पर नागिन ने मेरे लिए अपनी जान की बाजी क्यों लगाई,
रूपा- मुझे भी इंतजार है इस सवाल के जवाब का .
हम दोनों के दरमियान कुछ देर के लिए एक ख़ामोशी छा गयी. जिसे मैं इतना भला बुरा कह आया था वो मौत के करीब थी सिर्फ मेरी वजह से सिर्फ मेरी वजह से. अब मुझे समझ आया की मेरे खून से उसकी हालात क्यों ठीक हो रही थी क्योंकि मेरे खून में रक्त भस्म भी थी .
“रक्त भस्म कहा मिलेगी रूपा ” मैंने पूछा
रूपा- परचून की दुकान पर तो नहीं मिलेगी.
मैं- बता न .
रूपा- मैं नागो के बारे में गहराई से नहीं जानती मुसाफिर, बाबा से पूछ .
मैं- ठीक है उनके पास ही जाता हूँ ,
रूपा- खाना तो खा ले पहले
मैं- मुझे जाना होगा.
रूपा- बेशक पर पहले खाना खा, बड़ा सकून होता है जब मैं तेरे साथ रोटी खाती हूँ , इस थोड़े से सुख पर तो मेरा अधिकार रहने दे सरकार.
रूपा ने साग, चूरमा परोसा मुझे . और कुछ पालो के लिए मैं सब कुछ भूल गया . खाने के बाद मैं वहां से निकल कर चल दिया मुझे मालूम था की कहाँ जाना है , आधे रस्ते में मुझे सुलतान बाबा मिल गए.
बाबा- कहाँ था तू, तुझे ही तलाश रहा था मैं .
मैं- मैं भी तुम्हारे पास ही रहा था बाबा , मुझे मालूम हो गया इस झोले में क्या है
बाबा के चेहरे पर हवाइया उड़ने लगी.
किसी ने मुझे पुकारा, “देव ”
खेतो से एक साया निकल कर मेरे पास आया , मैंने देखा ये सरोज थी .
“तुम यहाँ कैसे ” मैंने कहा
सरोज- तुम्हे ढूंढते ढूंढते आ गयी , मुझे तुमसे बेहद जरुरी बात करनी थी .
मैं- जब्बर को मेरी मौत की सुपारी देने से ज्यादा जरुरी क्या बात है अब .
सरोज- मैं जानती थी ऐसा ही होगा. ये सब एक साजिश है हम दोनों के बीच दरार डालने की देव, मुझे मालूम हो गया है तुमने घर क्यों छोड़ा विक्रम उस शकुन्तला के साथ मिल कर जो भी कर रहा है उसमे मेरा उसका कोई साथ नहीं है देव, और जब्बर तो उनका ही मोहरा है .
मैं- जो भी हो मैं इस हालात में नहीं हूँ की किसी पर भी भरोसा कर सकू. मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो.
सरोज- तुम्हे मेरी बात सुननी ही होगी,
मैं- मैंने कहा न जाओ तुम यहाँ से.
सरोज- इतना कठोर मत बनो देव, मुझ पर भरोसा नहीं कर सकते और मेरे पास ऐसा कोई सबूत नहीं है जो तुम्हे भरोसा दिला सके. बस मेरी जान है जो तुम ले लो शायद तब तुम्हे यकीन आये.
मैं- मैंने कहा न मेरे हालात ऐसे नहीं है , और तुम्हे अगर मेरी फ़िक्र है तो फिर मत आना मेरे पास.
मैंने कहा और आगे बढ़ गया . सरोज मुझे आवाज देती रह गयी .समझ नहीं आ रहा था की क्या करू क्या न करू. रिश्तो की ऐसी भूलभुलैया में उलझा था मैं की अपने पराये सच्चे झूठे का भेद समाप्त हो गया था .
रूपा के घर जब तक मैं पंहुचा , वो मेरी ही राह देख रही थी .
रूपा- बड़ी देर लगाई कब से राह देख रही हूँ मैं .
मैं- बस देर हो गयी .
रूपा- ये कैसा बक्सा है हाथ में .
मैं- रख ले तेरे पास , मुझे भूख लगी है बाद में देखेंगे इसे , हिफाजत से रख दे.
रूपा- जो हुकुम सरकार.
रूपा खाना बनाने लगी मैं वही दिवार का सहारा लेकर बैठ गया .
मैं- तू जादू करना जानती है
रूपा- कितनी बार तुझे बताऊ ,
मैं- कोई ऐसी तरकीब है की मैं अतीत देख पाउँगा
रूपा- बाबा सुलतान से पूछ , वैसे जादू में ऐसा होता है कुछ जादूगर अपनी यादो को कही छुपा देते है . वैसे तुझे किसका अतीत देखना है .
मैं- नागेश का
रूपा- जानता है तू क्या कह रहा है .
मैं- तू शायद जानती नहीं पर मुझे लगता है उसका मुझसे कोई नाता है .
रूपा- नागेश किवंदिती के सिवा कुछ भी नहीं . उसे मरे जमाना हुआ .
मैं- बाबा को लगता है की वो लौट आया है . चरवाहों का तिबारा शायद उसने ही तोडा है .
रूपा- नहीं ऐसा नहीं है .
मैं- क्यों
रूपा- वो तिबारा मैंने तोडा है .
मुझे जैसे रूपा ने झटका सा दिया.
मैं- पर क्यों
रूपा- जब तुझे चोट लगी तो मेरा दिमाग भन्ना सा गया था . मैं इलाज के लिए उपचार तलाश कर रही थी , तुझे मालूम नहीं उसे चरवाहों का तिबारा क्यों कहा जाता था क्योंकि वहां पर ये जादूगर लोग अपने सफ़र के दौरान अक्सर रुकते थे , एक तरह का गुप्त ठिकाना था ये लोगो को मालूम न हो की जादूगर है तो वो चरवाहों का भेस ले लेते थे .
मैं- पर तूने तोडा क्यों
रूपा- बता तो रही हूँ , उस रात जब मैं वहां पर पहुंची . तो मुझे कटोरे की तलाश थी जो मन्नते पूरी करता था .
मैं- कैसा कटोरा .
रूपा- तिबारे में हमेशा से एक कटोरा रखा होता था जिसमे से जो मांगो मिल जाता था , मतलब कुछ जरुरत की चीजे .
मैं- तो तुझे क्या जरुरत थी
रूपा- कितने सवाल करता है तू
मैं- बस उत्सुकता .
रूपा- मैं प्रतिकृति पत्थर को तलाश रही थी .
मैं- क्या होता है ये .
रूपा- एक तरह का छलावा .
मैं- समझा नहीं
रूपा- तेरा घाव तेरे कलेजे को खा रहा था , यदि जल्दी से उपचार न होता तो जहर तेरे कलेजे को भेद देता. चूँकि मुझे उपचारों का ज्ञान है तो मैंने एक रिस्क लेने का सोचा, मैं तेरे कलेजे की नकल बनाती और उस तंत्र वार के असर को उस पर उतार लेती बाद में कलेजा वापिस कर देती.
पर ये पत्थर मिलना दुर्लभ है तो बस मैं अपनी हताशा को रोक नहीं पाई.
मैं- मैं कैसे ठीक हुआ तुमने उस रात क्या किया था .
रूपा- कुछ भी नहीं किया मैंने .
मैं- रूपा, मुझे सच बता तुझे मेरी कसम है सच बता.
रूपा- मैंने कुछ नहीं किया सिवाय तेरे जख्म को सिलने के. जो किया उस नागिन ने किया उसने ....
रूपा ने एक आह भरी
मैं- क्या किया था उसने बताती क्यों नहीं .
रूपा- उसने तेरी जान के बदले खुद की जान रख दी. वो कोई मामूली नागिन नहीं है वो अलग है , हम सब जानते थे की नागेश के वार का कोई भी तोड़ नहीं है . तो उसने एक ऐसा फैसला किया जो बस काम कर गया . उसने तेरी जान के बदले अपनी जान रख दी. नागो की अपनी शक्तिया होती है , उसने रक्तभ्स्म तुझे दी .
मैं- क्या होती है ये .
रूपा- जैसे इंसानों के लिए शरीर में रक्त जरुरी होता है , नागो के लिए रक्त्भास्म होती है . वार उतारने के कुछ नियम होते है हर चीज का मूल्य होता है उसने तेरे कलेजे के बदले अपना कलेजा रख दिया. उसने सोचा था की उसका जहर नागेश के वार को झेल लेगा पर ऐसा हुआ नहीं .
मैं- मतलब
रूपा- मतलब ये की नागिन पल पल मर रही है , उसके पास समय बहुत कम है इस श्राप ने हम तीनो को आपस में जोड़ दिया है . उसका कलेजा गल रहा है , हर रात तेरी भारी होगी दर्द से, और मेरी पीठ का ये जख्म सदा ताजा रहेगा कभी भरेगा नहीं .
मैं- तू सब जानती थी तो तूने क्यों किया ऐसा.
रूपा- आशिकी इम्तेहान लेती है मेरे सरकार. और जब तुझसे नाता जोड़ा है तो फिर मैं कैसे कदम पीछे हटाती, जब सुख में तेरी साथी हूँ तो तेरा दर्द भी मेरा हुआ न .
मैं- पर नागिन ने मेरे लिए अपनी जान की बाजी क्यों लगाई,
रूपा- मुझे भी इंतजार है इस सवाल के जवाब का .
हम दोनों के दरमियान कुछ देर के लिए एक ख़ामोशी छा गयी. जिसे मैं इतना भला बुरा कह आया था वो मौत के करीब थी सिर्फ मेरी वजह से सिर्फ मेरी वजह से. अब मुझे समझ आया की मेरे खून से उसकी हालात क्यों ठीक हो रही थी क्योंकि मेरे खून में रक्त भस्म भी थी .
“रक्त भस्म कहा मिलेगी रूपा ” मैंने पूछा
रूपा- परचून की दुकान पर तो नहीं मिलेगी.
मैं- बता न .
रूपा- मैं नागो के बारे में गहराई से नहीं जानती मुसाफिर, बाबा से पूछ .
मैं- ठीक है उनके पास ही जाता हूँ ,
रूपा- खाना तो खा ले पहले
मैं- मुझे जाना होगा.
रूपा- बेशक पर पहले खाना खा, बड़ा सकून होता है जब मैं तेरे साथ रोटी खाती हूँ , इस थोड़े से सुख पर तो मेरा अधिकार रहने दे सरकार.
रूपा ने साग, चूरमा परोसा मुझे . और कुछ पालो के लिए मैं सब कुछ भूल गया . खाने के बाद मैं वहां से निकल कर चल दिया मुझे मालूम था की कहाँ जाना है , आधे रस्ते में मुझे सुलतान बाबा मिल गए.
बाबा- कहाँ था तू, तुझे ही तलाश रहा था मैं .
मैं- मैं भी तुम्हारे पास ही रहा था बाबा , मुझे मालूम हो गया इस झोले में क्या है
बाबा के चेहरे पर हवाइया उड़ने लगी.