Adultery हवेली - SexBaba
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Adultery हवेली

#1



आँख खुली तो बदन पसीने से भीगा था , मुह से निकली लार तकिये को भिगोये हुए थी. पास रखे रेडियो पर अभी भी कुमार सानु के गाने बज रहे थे. गानों में धुन कम सुर सुर की आवाज ज्यादा थी जो बता रही थी की सिग्नल ठीक नहीं है . बनियान पहनते हुए मैं उठा और पानी के धोरे की तरफ बढ़ गया . झुक कर मैंने हथेली भरी . पानी को होंठो से लगाया ठन्डे पानी ने लू चलती रात में करार दिया . वापिस से सोने जा ही रहा था की खेतो के दूसरी तरफ मुझे कुछ सुलगता सा दिखाई दिया. मैं उसी तरफ बढ़ा जाकर देखा तो लखन चोकीदार बीडी सुलगाये हुए था , पास में ही देसी का पव्वा रखा था जिसे अभी तक खोला नहीं गया था .

मैं- क्या लखन भाई, इतनी रात को यहाँ खेतो पर नींद नहीं आई क्या

लखन- नींद क्या हमारा तो चैन भी गया यार .

मैं- ऐसा क्या हो गया भाई

लखन- कल रात यार

मैं- क्या हुआ कल रात को

लखन ने पव्वा खोला और कडवे पानी से अपना गला तर किया .

लखन- कल सुबह जब मैं बैंक से चोकिदारी करके आया तो

मैं- तो क्या

लखन - देख तू मेरा अपना है इसलिए तुझे बता रहा हूँ वैसे बात तो बताने लायक नहीं है

लखन ने फिर से पव्वे को मुह से लगाया और इस बार लगभग आधे पव्वे को गटक गया .

लखन- कल मैं चोकिदारी छोड़ कर जल्दी ही घर आ गया . रात के करीब तीन बज रहे होंगे , मैंने देखा की मेरी बीवी पर कोई और चढ़ा हुआ है . दोनों नंगे ऊपर निचे हो रहे थे . लुगाई की दोनों टाँगे ऊपर उठी हुई थी और उसके हाथ आदमी की पीठ पर चल रहे थे .

लखन की ये बात सुनकर मेरे कान खड़े हो गये. मैंने तो चुदाई की बाते इधर उधार से ही सुनी थी , यहाँ पर तो एक पति खुद अपनी पत्नी की बेवफाई मुझे बता रहा था . थोडा अजीब भी लग रहा था पर चस्का सा जाग उठा .

मैं- तुझे गुस्सा न आया , लट्ठ उठा कर दो दो बार मारता और पूछता और उस आदमी की गांड तोड़ता .

लखन- ना तोड़ सकू भाई .

मैं- क्यों कौन था वो .

लखन- तुझे यकीन न होगा . तू ना मानेगा मेरी बात की मैं सच कह रहा हूँ

मैं- लखन तू भाई है अपना

लखन- जिन्दगी बर्बाद हो गयी यार.

इस बार लखन की आवाज टूटी सी लगी , दर्द था उसमे .

मैं- कौन था वो बता मैं साले की गांड तोड़ दूंगा . पर तूने तेरी लुगाई से सवाल ना किया , ना पूछा की के कमी रह गयी थी .

लखन ने बाकी बची दारु भी पी ली और रोने लगा . मेरे लिए अजीब हालात हो गए थे , अच्छा भला सो रहा था और अब ये चोकीदार पल्ले पड़ गया था .

मैं- रो मत यार . अच्छा एक काम करते है तुझे घर छोड़ आता हूँ सुबह फिर बात करेंगे चल मेरे साथ .

मैंने बैटरी और लट्ठ उठाया , लखन को साथ लेकर उसके घर पहुँच गया .

“किवाड़ खोल भाभी ” मैंने दरवाजे पर दस्तक दी.

“कौन आ मरा इतनी रात को ” अन्दर से किवाड़ खोलने के साथ ही ये आवाज आई .

मुझे देखते ही निर्मला थोडा होश में आई और बोली- माफ़ करना , गलती हो गयी ना मालूम था दरवाजे पर आप हो .

मैं- माफ़ी की जरुरत ना है भाभी .संभाल अपने पति को , ध्यान रखा कर इसका

मैंने कमरे में लखन को बिस्तर पर पटकते हुए कहा . नशे की वजह से उसने करवट ली और सो गया .

मैं- निर्मला भाभी, मैं ना जानता तू सही कर रही है या गलत . पर इसकी पीठ पीछे जो भी कर रही है न इसे मालुम हो चूका है . मैं न जानता जो तू कर रही है तेरी राजी से हैं नाराजी से हैं पर ये तेरा पति है जैसा है ठीक है ना लायक है पर तेरा पति है . मान कर इसका ये है तो तू है .

मैंने निर्मला को नजरो को झुकते हुए देखा .

मैं- नजरे न झुका, माफ़ी मांग लिए इस से इसकी नजरो में उठ .

कच्ची नींद उठ गया था तो आँखे भारी सी हो रही थी अब हिम्मत ना थी वापिस खेत में जाने की . मैने अपने कदम घर की तरफ बढ़ा दिए. आँगन में पड़ी चारपाई पर पड़ा और चद्दर तान ली . सुबह उठने का बिलकुल भी मन नही था पर बाप के तानो से ही मेरे दिन की शुरुआत होती थी .

“रे नालायक हमारी नहीं तो सूरज की ही शर्म कर लिया कर . दोपहर होने को आई तू अब तक सोये जा रहा है ” बाप ने पानी की बाल्टी मुझ पर फेंकी तो मैं उठा . इस घर में ऐसे नाटक रोज ही चलते थे , हमें लगता था की बाप हमारा दुश्मन है , बाप को लगता था की उसकी औलाद ना लायक है .

“चुनाव् सर पर आया हुआ है , लाट साहब की आवारगी ना थम रही , थोड़ी मेहनत कर ले. कल रात भी तू दारु बांटने ना गया ” बाप ने ताना मारा .

मैं- बापू , दारू नोटों से वोट न मिलते कब समझ आएगी ये बात . राज करे तो ऐसे करो की दुनिया दिल से चाहे, आगे सलाम और पीठ पीछे गाली बके ये तो ठीक ना है न .

बापू- रे नालायक , तू क्या जाने राज के चीज होवे है , राजे-महाराजो के ज़माने से हमारा परिवार इस गाँव पर मालिकाना हक़ रखता है , रियासते गए ,सरकारे बदली पर हम न बदले .

मैं जानता था बाप से बहस करने का कोई नतीजा नहीं है . मैं घर से निकल गया .

“फिर चला ना लायक आज शाम दारू बाँटने ना गया तो तेरी खैर नहीं ” बाप के ताने मेरे कानो में पड़े पर किसे परवाह थी . जब से होश संभाला था मैंने मेरे बाप को ही सरपंच देखा था , उस से पहले उसके बाप दादा थे, मेरा बाप ठाकुर रणबीर सिंह. दिन रात मुझमे कमिया निकालना मुझे कोसना पर मैं जानता था की प्यार भी बहुत करता है वो मुझसे, वर्ना जिस रणबीर सिंह की मर्जी के बिना पत्ता तक न हिल पाए गाँव में मैं उसकी बात कैसे काट सकता था . मेरे होश सँभालने के बाद ये दूसरा इलेक्शन था जिसमे वो दारू बाँट रहा था और मेरा मानना था की लोग अगर हमें दिल से अपना नेता मानते है तो फिर दारू, पैसो की क्या जरुरत हमें लोगो के दिल जीतने चाहिए, इलेक्शन लोग ही जीता देंगे.

क्रिकेट खेलते हुए प्यास के मारे बुरा हाल था ऊपर से गर्मियों की ढलती शाम , मैंने गेंद दुसरे खिलाड़ी को दी और पानी पीने के लिए कुंवे पर बनी टंकी की तरफ चल दिया. प्यास से गला इतना सूख गया था की मैंने ये ध्यान न दिया की टंकी पर किसका मटका रखा है मैंने उस आधे भरे मटके को अपने होंठो से लगाया और अपनी प्यास बुझाने लगा.



“हाथ लगाने से पहले देख तो लेता किसका मटका है, तेरी जुर्रत कैसे हुई इसे छूने की, गन्दा कर दिया न इसे ” मेरे कानो में किसी की आवाज आई और मैंने पलट कर देखा. ...............
 
कहने को ये कहानिया मात्र है पर मैं समझता हूं ये माध्यम मुझे आपसे जोड़ता है, परिवार बनता है जब आप सब लोग इस माध्यम से साथ होते है. केवल कहानी ही नहीं हम सब इस फोरम पर एक दूसरे से अपनी हँसी अपने गम भी सांझा करते है.

किसी ने मुझसे एक दफा कहा था कि अच्छे वक़्त की एक बुराई होती है कि वो खत्म हो जाता है पर बुरे वक्त की भी एक अच्छाई होती है कि वो भी खत्म हो जाता है. जब तक जिवन है परेशानियों से सामना होता रहेगा बस कोशिश रहनी चाहिए कि दो पल अपने लिए सकून पा सके.

स्नेह :hug:
 
#2



पलट कर जो देखा बस देखता ही रह गया. ढलती शाम में डूबते सूरज की लाली में मैंने चाँद को देखा . नीला दुपट्टा, पीला सूट कानो में झुमके, हाथो में चांदी के कड़े, पांवो में मुरकी वाली जुतिया . उमस भरी गर्मी में ठंडी हवा का झोंका उतर सा गया सीने में .

“तेरी जुर्रत कैसे हुई मेरे मटके को छूने की , गन्दा कर दिया न इसे ” इस बार उसकी आवाज में तल्खी थोड़ी और बढ़ गयी थी .

मैं- प्यास लगी थी , पानी पिलाना तो धर्म होता है ,समझ ले थोडा पुन्य तेरे भाग में भी था .

“जुबान को लगाम दे ,देख कर बोल किसके सामने खड़ा है ” उसने अपनी आवाज ऊँची की .

मैं- रे लाडली, ऐसी बोली ठीक ना है . अगर मेरे छूने से तेरा मटका ख़राब हो गया तो जा कुम्हार से मेरा नाम ले दिए नया मटका दे देगा तुझे

“”तू मुझे खरीद कर देगा “ उसने कहा

मैंने एक नजर उसके झुमको पर डाली जो बड़ी नजाकत से उसके गाल चूम रहे थे .

मै- तो तू ही बता कैसे मानेगी तू. पानी तो मैंने पी लिया कहे तो मैं भर दू तेरा मटका

उसने मुझे घूर कर देखा और फिर उस मटके को धरती पर दे मारा. गुस्से में हसिनाये और भी हसीन लगती है ये मैंने उस लम्हे में महसूस किया . उफ्फ्फ इतना घमंड, इतना गुरुर भला किस चीज का .मैने गहरी मुस्कान से उसे देखा उसका चेहरा और लाल हो गया . उसने अपना हाथ उठाया मुझे मारने को मैंने कलाई पकड़ ली उसकी.

“ना लाडली ना, ऐसा मत करिए, गाँव में थोड़ी बहुत इज्जत तो मेरी भी है , रही तेरी बात मटके को तोड़ कर तूने बता दिया की क्या है तू, रही जुर्रत की बात तो गुस्ताखिया खून में दौड़ती है मेरी उड़ने को बेताब मेरा मन और ये खुला आसमान ,यहाँ से जाने के बाद याद तो आएगी तुझे मेरी , ” गोरी कलाई को मैंने जोर से मसला तो गुलाबी हो गयी . वो कसमसाई

मैं- तू जिस भी घर की है , वहां उजाला कर दिया होगा तूने . पर मेरी कही एक बात याद रखिये लोगो के दिल जीतना बड़ी बात होती है , ये तुनकमिजाजी तेरी अदा तो हो सकती है पर इसे स्वभाव मत बनाना कभी .

वो- हाथ छोड़ मेरा

मैं- अभी तो पकड़ा भी नहीं लाडली तू छोड़ने की बात करती है .

मैंने हँसते हुए उसकी कलाई छोड़ दी.

वो- देख लुंगी तुझे

मैं- खुशकिस्मती हमारी जो दुबारा दीदार होंगे आपके

गुस्से में तमतमाती हुई वो जाने लगी कुछ दूर जाकर वो मुड़ी और बोली- भूलूंगी नहीं मैं

मैं- अगर हमें भूल गयी तो क्या ख़ाक असर हुआ हमारा लाडली.

मैंने उसे जाते हुए देखा , मैंने सूरज को डूबते हुए देखा . जिस हाथ से से उसकी कलाई पकड़ी थी , उसे हलके से ना जाने क्यों चूम लिया मैंने.

अब खेलने में मन नहीं था मेरा , घर पहुन्चा तो देखा की तैयारिया हो रही थी गाँव में दारु बांटने की , कुछ पेटिया मैंने जीप में पटकी और गाँव की तरफ चल दिया.

हर घर दो दो बोतल पकड़ाते हुए मैंने लखन के घर पर दस्तक दी. निर्मला ने दरवाजा खोला ,

मैं- लखन है क्या

निर्मला- नहीं सुबह ही आएगा वो

मैं- ले आये तो ये दे दियो ,

मैंने एक नजर निर्मला पर डाली, लगती तो कंटाप ही थी , भारी भारी छातिया, थोड़ी सी चौड़ी कमर और गदरायी जांघे . ब्लाउज के दो बटन तो बस छात्तियो के बोझ को इस उम्मीद में थामे हुए थे की कब वो टूटे और उनका काम खत्म हो .

“इतना भी मत देखो हुकुम ” निर्मला ने हँसते हुए कहा तो मैं झेंप गया.

मैं- लखन से कहना मुझे खेत पर मिले

वहां से निकल कर चलते हुए मैं जीप की तरफ बढ़ ही रहा था की मुझे रुक जाना पड़ा

“कितनी भी दारु बाँट ले अर्जुन इस बार सरपंची हाथ ना आने वाली ” अजीत सिंह की आवाज ने मेरे कदमो को रोक लिया .

मैं- राज के लिए पंची सरपंची की जरुरत ना पड़ती अजित सिंह, पर क्या करू बाप का दिल रखने के लिए करना पड़ता है वर्ना इस दारू से हद नफरत है , दारू का नशा गाँव को बर्बाद कर रहा है मुझसे जायदा कौन जानता है . रही बात हार जीत की तो क्या फर्क पड़ता है मेरा बाप जीते या तेरा बाप . बाप तो बाप हो होता है , तेरा बाप जीत जाए तो तेरी ख़ुशी में शामिल हो जायेंगे मेरा बाप जीता तो तू बधाई दे देना. क्या फर्क पड़ता है

अजीत- फर्क तो पड़ता है अर्जुन, तुम लोग समझते हो की सरपंची तुम्हारी जागीर है .

मैं- ये गाँव मेरी जागीर है , यहाँ का हर एक घर मेरा है , हर चूल्हे में पकती रोटी मेरी है , हर बुजुर्ग मेरा अपना है हर जवान मेरा अपना है . मैं इस मिटटी का और ये मिटटी मेरी है .

अजित- तभी तो तेरी कोई हसियत नहीं गाँव में, पैरो की जूतों को तूने सर पर रखा हुआ है , तेरी वजह से ठाकुरों की पहले जैसी बात नहीं रही .

मैं-ये गाँव वाले हमारे टुकडो पर पलने वाले गुलाम नहीं है अजित, ये हमारी जमीन जोतते है अपनी मेहनत करते है तो इनकी मेहनताना इनको पसीना सूख जाने से पहले मिल जाना चाहिए, तेरी बात ऊपर रख ली अगर ये हमारी प्रजा है तो अगर प्रजा दुखी तो क्या ख़ाक राज किया तुमने .

अजित- तू नहीं सुधर सकता



अजित के जाने के बाद मैंने बची खुची दारु बांटी और जीप को खेतो वाले रस्ते पर मोड़ दिया. रेडियो चालु किया , मोटर चला कर पानी हौदी में छोड़ा पेट में मरोड़ सी थी हल्का होने का विचार किये मैं पगडण्डी पर चले जा रहा था की मैंने तभी किसी को पड़े देखा, और जब मैं उसके पास गया तो बदन में झुरझुरी सी दौड़ गयी .
 
#3



लखन खेतो के डोले पर बेसुध पड़ा था . मैंने उसके गाल थपथपाए पर होश कहा था . मैंने नब्ज़ चेक की मंदी थी . आव देखा न ताव मैंने लखन को कंधे पर उठाया और चिकित्सालय की तरफ दौड़ पड़ा .

“रे डाक्टर , देख इसे जरा क्या हुआ है इसे ” मैंने लखन को मरीजो वाली बेंच पर पटकते हुए कहा .

डॉक्टर ने उसे देखा और बताया की दो तीन मेल की दारू पीने से बेसुध हो गया है , पेट में इन्फेक्शन हो गया है . इलाज कर देंगे . मैंने राहत की साँस ली पर दो पल की राहत थी . मैंने उसी लड़की को अपनी तरफ आते देखा अपनी किसी सहेली संग, हमारी नजरे एक पल को मिली और वो जोर जोर से हंसने लगी , इतना जोर से की कोई उसे देखता तो पागल ही समझता . हँसते हुए वो मेरे पास आई और बोली- टंकी पे तो बहुत बढ़ के बाते कर रहा था और यहाँ देखो , बस यही औकात है तेरी .

उसने इशारा किया तो मैंने खुद को देखा लखन के चक्कर में मैं कच्छे में ही दौड़ा आया था चिकित्सालय में .

“ले रख ले तू भी के याद करेगा किसी दिलदार से पाला पड़ा था ,और हाँ कपडे अच्छे खरीदना ”उसने अपने पर्स से नोटों की गड्डी निकाली और मेरे सीने पर फेंक दी.

कहने को तो ये अपमान था पर पी लिया .

“ये आपने क्या किया आप जानती भी है इनको ” डॉक्टर ने बीच में टोका उसे

“मैं जान पहचान करके गरीबो का भला नहीं करती ” उसने डॉक्टर की बात काट दी. मैंने डॉक्टर को इशारा किया चुप रहने का और पांवो में पड़ी नोटों की गड्डी उठाई .

मैं- तेरी मीठी बोली पर ही हार बैठे है लाडली , नोटों की तो औकात ही क्या

मैंने गड्डी उसके सर से वारी और उसके हाथ में रख दी .

“फेर मिलेंगे लाडली ” मैंने उसकी चुन्नी खींची और उसे तौलिये की तरह कमर से लपेट कर चल दिया. कुछ तो बात थी इस छोरी में , मैंने सोचा की मालूम करेंगे किसके घर का उजाला थी ये . खेत पर पहुंचा तो बापू पहले से ही मोजूद था वहां पर .

मैं- बापू यहाँ

बापू- तू घर ना आया तो मैं ही चला आया . दिन में कहीं भी रहा कर सांझ होते ही घर आ जाया कर .

मैं- चिकित्सालय में देरी हो गयी , चुनाव की दारू लोगो का नाश कर रही है , लखन को दाखिल करवा के आया हूँ .

बापू ने कुछ नहीं कहा

मैं- बापू ये लोग तेरे ही है , इतने सालो से तुझे ही जिताते आये है . इनकी मदद करनी है तो और भी तरीके है दारू ही क्यों

बापू- अभी ना हुआ है तू मुझसे जवाब मांगने वाला . सुना आज अजित सिंह ने रास्ता रोका तेरा .

मैं- रास्ता तो सबका होवे है बापू .

बापू- फ़िक्र है तेरी . तू तो जाने है रंजिश है उनसे, विस्वास ना करिए के बेरा कित वार कर दे.

मैं- चिंता न कर बापू

बापू- कुछ काम से बहार जा रहा हूँ दो तीन दिन में लौट आऊंगा. चुनाव की जिमीदारी तुझे देकर जा रहा हूँ .

मैं- ठीक है .

बापू के जाने के बाद मैंने खाना खाया और चारपाई बिछा कर सोने की कोशिश करने लगा.

“arjunnnnnnnnnnnn ” झटके से मेरी आँख खुल गयी . बदन पसीने से भीगा पड़ा था . तकिया एक बार फिर लार से सना था . उठ कर मैंने मुह धोया और साँसों को संभालने की कोशिश करने लगा. कानो में अभी तक वो चीख गूँज रही थी . अब जी लगना मुश्किल था , मैं घर आया. इतना बड़ा घर , इसका सूनापन इसका सन्नाटा कहने को तो आदत सी थी पर ये रात भी मुश्किल से कटेगी जानता था मैं. संदूक खोली , पुरानी तस्वीरे मेरे कांपते हाथो में थी . न जाने कब आँखों से बूंदे टप टप कागज को भिगोने लगी. दिल में बहुत कुछ था ,जो कहने से रह गया . जो कहना था पर कोई सुनने वाला नहीं था .

सुबह मैं लखन को देखने जा रहा था की मैं देखा अजीत सिंह एक आदमी को मार रहा था

मैं- हाथो को रोक ले अजीत . ये भी इन्सान है दर्द उसको भी होता है .

अजित- ये तेरा मामला नहीं है अर्जुन मत पड़ बीच में . इसने कर्जा लिया है जब इसकी जरुरत थी मैंने इसकी मदद की अब ये चूका नहीं रहा है .

मैं- कब लिया था तूने कर्जा

मैंने उस आदमी से पूछा

आदमी- मैंने नहीं मेरे दादा ने लिया था , मेरे बाप का बुढ़ापा आ गया , आधी उम्र बीत गयी पर कर्जा चुकता ही नहीं हो पा रहा मूल से न जाने कितना ब्याज चूका चुके है पर ठाकुर साहब कहते है की अभी बकाया है .

मैं- मामूली रकम के लिए अगर तीन पीढ़िया बर्बाद हो जाये तो शर्म से डूब मरने की बात है अजित

अजित- मैं वो सब नहीं जानता , तू इसकी तरफदारी मत कर , ये मेरा और इसके बीच का मामला है

मैं- इस गाँव का हर मामला मेरा है

अजित- तो ठीक है फिर अर्जुन इस से कह की इसकी नहर वाली जमीं मेरे नाम कर दे अंगूठा लगा दे कागजो पर

आदमी- ये अन्याय मत करो ठाकुर वो जमीन ही रोजी-रोटी का सहारा है वो गयी तो परिवार भूखा मर जाएगा

“तो फिर आज के आज ही कर्जा चूका दे ” अजित ने ठोकर मारी उस आदमी को .

मैं- अजित अपने हाथ पांवो को लगाम दे, ये मत भूल की ये गाँव जागीर नहीं है तेरी

अजित- जागीर तो तेरी भी नहीं है. अपने गुरुर को काबू में रख . इस बार हवा हमारी तरफ है एक बार सरपंची हाथ आने दे फिर देख लेंगे

मैं- हवाओ के साथ वो बहते है जिनकी रीढ़ नहीं होती अर्जुन हवाओ के रुख को मोड़ देता है . बेशक मैं दिल से चाहता था की इस बार सरपंची तेरा बाप जीते पर अब जब तूने दिल पर ही ले लिया है तोतेरी कसम दिल तोड़ने में मजा बहुत आएगा. और जितनी भी तेरी रकम बनती है घर आ जाना पूरा हिसाब कर दूंगा.

अजित- तूने सोचा भी कैसे की मैं तेरे घर आऊंगा, पैर की जुती गन्दी करनी है क्या मुझे .

मैं-कोई बात नहीं मैं पंहुचा दूंगा तू बड़ा रह ले.

मैंने अजित के कंधे पर हाथ रखा और आगे बढ़ा ही था की अजित का व्यंग्य मेरे कानो में पड़ा , “”मनहूस कही का “ मेरे पैर रुक गए .

मैं- क्या बोला तू फिर से बोल जरा

अजित- तूने सुन लिया न अब निकल यहाँ से सुबह सुबह तुझे देख लिया ना जाने दिन कैसा बीतेगा मेरा .

मैंने अजित का कालर पकड़ लिया . आस पास खड़े तमाम लोग सहम गए . एक पल में उसकी गर्दन मेरे हाथ में थी . पर मैंने अपनी पकड़ ढीली कर दी .

मैं- दुबारा इसे परेशान मत करना , रकम पहुंचा दूंगा मैं .



मैं वहां से आगे बढ़ा ही था की मेरी नजर भीड़ में खड़ी उसी लड़की पर पड़ी जो बस मुझे ही देखे जा रही थी . ......................
 
#4



घर आया तो देखा की वहां पर निर्मला पहले से ही मोजूद थी ,

निर्मला- कहाँ गायब थे सुबह से, कब से राह देख रही थी सरपंच जी को मालूम हुआ की समय पर खाना पीना न हो रहा तो मेरी खैर नहीं होगी.

मैं- भूख नहीं है .

निर्मला- कुछ चीजो के लिए खुद को दोष नहीं देना चाहिए मैं तो इतना कहूँगी

मैंने उसकी तरफ देखा , वो बोली- अजित सिंह से हुई झड़प का सबको मालूम हो गया है . वैसे भी गाँव में हवाओ से तेज बाते उडती है .

न जाने क्यों मुझे लगा की निर्मला मुझे ताना सा दे रही है .

मैं- ठीक है जो दिल करे बना दो .

मैंने निर्मला की भारी छातियो को देखते हुए कहा . ना जाने क्यों जबसे लखन ने मुझे वो बात बताई थी मेरा ध्यान बार बार निर्मला की छातियो पर ही जाता था . मैं चारपाई पर बैठ गया निर्मला आंगन में बने चूल्हे के पास बैठ कर आटा गूंथने लगी. उसकी खनकती चुडिया, ब्लाउज से बहार झांकती चुचिया, मैंने लखन को सोचा, दुबला-पतला शराब के नशे में चूर रहने वाला चोकीदार जो रात भर घर से बाहर रहता था , इतनी गदराई लुगाई रात को बिस्तर पर अकेले करवट बदलती होगी, ठीक ही किया इसने जो और किसी से चुदवा लिया

“किस सोच में खोये हो ” निर्मला ने कहा

मैं- कुछ नहीं तुमको क्या लगता है इस बार सरपंची कौन जीतेगा

निर्मला- सरपंच जी के आलावा और कौन .हमेशा की तरह इस बार भी वोट उनको ही पड़ेगा.

मैं- हवा तो कुछ और कहती है , अजित का बाप भी जीत सकता है

निर्मला- ये तो सपने है उनके , खैर, मैं दोपहर को जंगल में जाउंगी यहाँ पर लकडिया कम हो गयी है .

मैं- रहने देना मैं काट लाऊंगा तुम बस घर का ध्यान रखना और बापू आये तो कहना की मैं घर पर ही था .

मैंने खाना खाया, भोजन परोसते समय एक दो बार उसका आंचल सरका कसम से मैंने अपने बदन में इतनी कम्पन महसूस नहीं की थी पहले कभी, जबसे लखन ने वो बात बताई थी निर्मला के लिए मेरी नजरे बदली बदली सी हो गयी थी . खैर मैं फिर कुल्हाड़ी लेकर जंगल की तरफ निकल गया. जेठ की गर्मी में सब कुछ तप रहा था , एक दो जगह देख कर मैंने लकडिया काटनी शुरू की . कुछ गर्मी का असर कुछ मेरे कानो में अजित की आवाज अभी तक गूँज रही थी .”मनहूस कहीं का ” . मैंने पेड़ पर जोर जोर से कुल्हाड़ी मारी . लकड़ी को जैसे चीर देना चाहता था मैं . अजित का गुस्सा पेड़ पर उतारा जा रहा था .

मैंने दो चार दिन जितनी लकडिया इकठ्ठा की और चल दिया पुल के पास पहुंचा तो देखा की वो ही लड़की पानी में पैर डाले बैठी थी , जैसे ही उसकी नजर मुझ पर पड़ी वो उठी और मेरी तरफ आई .

मैं- इस तरह रास्ता रोकना ठीक नहीं लाडली

वो-सुबह झगडा क्यों कर रहे थे

मैं- सुबह की बात सुबह गयी , तू बता अकेली इस बियाबान में क्यों भटक रही है

वो- घर पर मन नहीं लग रहा था सोचा घूम लू

मैं- जंगल में अकेले आना ठीक नहीं जानवरों का डर है, किसी को साथ ले आती .

वो- अब कहाँ अकेली हूँ तुम साथ हो न मेरे

मैं-ये भी सही है थोड़ी परे हट इस बोझ को रख दू फिर बात करेंगे

वो- तुमको ये सब छोटे काम करने की क्या जरुरत है , लोग है न इन कामो के लिए

मैं- काम तो काम है लाडली, जब कोई और कर सकता है इस काम को तो मैं क्यों नहीं फर्क नहीं पड़े की किसने किया बस समय पर काम हो जाना चाहिए .

वो- मैं समझ नही पा रही तुमको

मैं- गणित का सवाल तो हूँ नहीं जो समझ ना आऊ

वो मुस्कुरा पड़ी मैं भी हंस दिया

वो- रोज शाम को आती हूँ मैं पानी भरने के लिए

मैं- तेरा कुछ न बिगड़ेगा बेचारे कुम्हार की मेहनत बढ़ जाएगी

वो- तुम भी ना . भूल हुई माफ़ करो उस बात के लिए

मैं- कौन सी बात

उसने त्योरिया चढ़ाई , “शाम को आओगे न ” पूछा उसने

मैं- आ जाऊंगा.

थोड़ी देर और बतियाने के बाद मैं वापिस घर आ गया . दरवाजे को हल्का सा धक्का दिया अन्दर आकर मैंने लकडिया रखी और हाथ मुह धोने के लिए नलके के पास जा ही रहा था की मेरी नजर निर्मला पर पड़ी जो नलके पर नंगी नहा रही थी उसकी पीठ मेरी तरफ थी . गोरी चमड़ी धुप में चमक रही थी , उसके मांस से भरे चुतड उफ्फ्फ्फ़. जीवन में पहली बार मैंने किसी भी औरत को ऐसे देखा था .तभी वो घुटनों पर साबुन लगाने के लिए झुकी और कसम से मेरा बदन ऐंठ गया , मांसल जांघो के बीच जो नजारा था मैं तो बस देखता ही रह गया . उसकी चूत को बेशक मैं दूर से देख रहा था पर जो दीदार था न क्या ही कहे.

“मैं लखन की जगह होता तो लात मार देता चोकिदारी को ” मैंने अपने लंड को मसलते हुए कहा . पर तभी मुझे वहां से हट जाना पड़ा क्योंकि वो पलट रही थी . बाकि फिर पुरे दिन मुझे चैन नहीं मिला शाम को मैं मंदिर पर गया . बाबे के दरबार में बैठा मैं सोच रहा था की तभी किसी की आवाज ने मुझे पुकारा

“अर्जुन जानता था तुम यही पर मिलोगे उस आदमी ने कहा ”

मैंने उस को पहले कभी नहीं देखा था .

मैं - कौन हो भाई , क्या काम है

वो- काम तो तुमसे ही है जनाब. मेरा नाम रमेश चंद है पेशे से वकील हूँ

मैं- मुझसे भला क्या काम

वो- एक मिनट दो बस मुझे,

उसने अपने झोले से कुछ निकाला और मेरी तरफ कर दिया.

मैं- क्या है ये



वो- तुम्हारी अमानत
 
#5



“भाई तू जो भी है मैं तुझे जानता भी नहीं और तू है की मेरी अमानत लिए घूम रहा है .मजाक करने के लिए तूने सही आदमी नहीं चुना ” मैंने उस से कहा .

वकील- मैं भला तुमसे क्यों मजाक करने लगा. मेरा काम था ये मैंने कर दिया, वैसे तो मैं ये देने दो महीने बाद आता पर क्या है न की मेरी बेटी की शादी होने वाली है और फिर मुझे समय नहीं मिलता सोचा पहले ये काम निपटा दू .

उसने एक पार्सल सा मुझे दिया और मुड गया . कांपते हाथो से उस पार्सल को पकडे मैं सोचता रहा की खोलू या नहीं . एक कोना फाड़ा ही था की तभी गाँव का एक लड़का दौड़ते हुए मेरे पास आया और हांफते हुए बोला- अर्जुन भैया , अभी चलना होगा मेरे साथ

मैं- क्या हुआ और तू घबराया हुआ क्यों है

लड़का- भैया, चलो मेरे साथ

उसके हाव भाव से मेरा मन आशंकित हो उठा . वो मुझे चिकित्सालय लाया जहाँ पर बापू था , खून से लथपथ आधा बदन जला हुआ , दर्द से तडपता हुआ . मेरे तो होश ही उड़ गए . धरती आसमान एक हो गए .समझ ही नहीं आया की हो क्या गया .

“बापूऊऊउ ” दहाड़ मार कर मैं रो पड़ा. उसे अपने सीने से लगाना चाहता था पर डॉक्टर ने मना किया .

“रे बाप है मेरा . कर कुछ डॉक्टर ” सुबकते हुए बोला मैं .

बापू की आँखे मुझे ही देख रही थी , उसने इशारे से मुझे पास आने को कहा .

“किसने किया ये बापू, तू नाम बता बस मैं साली दुनिया जला दूंगा तू इशारा कर ”

बापू ने कस कर मेरा हाथ पकड़ लिया और उठने की कोसिस करने लगा मैंने उसे सहारा दिया .

“हवेली ” बस इतना ही कह सका वो और साँस टूट गयी उसकी . कस कर आँखे मूँद ली मिअने परबहते आंसुओ को रोकने का जोर नहीं था मुझ पर . दहाड़े मार कर रोता रहा मैं अपनी बेबसी पर ये जानते हुए भी वो छोड़ कर जा चूका है मुझे. डॉक्टर को गाली बकते हुए मैं इलाज के लिए कहता रहा रोता रहा.

“संभाल खुद को अर्जुन ” निर्मला ने मुझे अपने आगोश में भरते हुए कहा .

“देख भाभी बापू गया छोड़ कर मुझे , कह न इस से बात करे मुझसे ”मैंने रोते हुए कहा

“शांत हो जा अर्जुन ” निर्मला ने मेरी पीठ थाप्थापते हुए कहा.

पर मैं कैसे शांत हो जाता , ले देकर एक ये ही तो था मेरी दुनिया के नाम पर , कह कर गया था ध्यान रखना जल्दी ही लौट आऊंगा और आया तो ऐसे, इस हाल में .जबसे होश संभाला था बस इसे ही तो देखा था . कहे तो क्या कहे . दिल साला इतना भारी हो गया था की टूट कर बिखर गया था ये अर्जुन.

“सरपंच जी नहीं रहे, अर्जुन नहीं रहे वो ” डॉक्टर की आवाज मेरे कानो में गर्म तेल सी पिघल गयी.

“किसने किया , कौन था वो ” मैंने गुस्से के उस लड़के का कालर पकड़ लिया जो मुझे बुलाने गया था .

लड़का- मैं नहीं जानता भैया, गाँव से थोड़ी दूर पर सरपंच जी की गाड़ी में आग लग गयी. गाड़ी में दो लोग जिन्दा जल गए, सरपंच जी की जीवटता थी की वो इस हालत में खुद यहाँ तक पहुँच सके.

आग की तरह गाँव में खबर फ़ैल गयी की सरपंच जी नहीं रहे. चिता की तैयारी होने लगी.

“अर्जुन, उठ चलना होगा ” लखन ने मेरे काँधे पर हाथ रखते हुए कहा .

कहने को तो मैं पेड़ को उखाड़ सकता था पर अर्थी उठाते समय मेरे हाथ थाम नहीं पाए उसे. कांपते पाँव से बापू को लेकर मैं शमशान की तरफ चल दिया. ढलती शाम की केसरिया रौशनी में बापू की चिता ध्हू धू करके जल उठी. धीरे धीरे करके गाँव वाले अपने अपने घर चले गए . आंच राख में बदलने लगी पर मैं वही बैठा उस तपत को अपने सीने में महसूस करने लगा. उस शाम बापू की चिता ही नहीं जली थी मेरा दिल भी जल गया था . पूरी रात मैं शमशान में बैठा रहा .

“कब तक बैठा रहेगा अर्जुन, जाने वालो के पीछे नहीं जाया जाता. जो रह जाते है उनको तो जीना पड़ता है चल घर चल ” निर्मला ने सुबह मेरा हाथ पकड़ कर वहां से उठाया और मुझे घर ले आई. लोग आते सान्तवना देने लोग जाते . पर जीना तो अकेले को पड़ता है न , इस घर में अब कोई मुझे नालायक कहने वाला नहीं था , अब कोई रोक टोक करने वाला नहीं था .

“कब तक गुमसुम बैठा रहेगा, थोडा बहुत तो खा ले ” निर्मला ने कहा

मैं- भूख नहीं है

निर्मला- ये दुनिया बड़ी जालिम होती है , इसमें जीना बड़ा मुश्किल है . जीने के लिए खाना भी पड़ता है .

मैंने रोटी के टुकड़े तोड़ तो लिए पर गले से निचे उतारना मुश्किल हो गया. लखन और निर्मला दिन रात मेरे साथ रहते पर फिर भी समय मुश्किल था मेरे लिए. कुछ दिन बीत गए थे इस घर का सन्नाटा खाए जा रहा था मुझे. जब बर्दाश्त से बाहर हो गया तो मैं बाबे के दरबार में जाके बैठ गया.

उस से कहना तो बहुत चाहता था, कहा भी बहुत था पर उसने कभी सुनी नहीं मेरी. वो मुझे देख रहा था मैं उसे.

“सुनता क्यों नहीं मेरी तू ” मैंने कहा

“वो जरुर सुनेगा तेरी ” मेरे पास बैठते हुए उसने कहा.

मैंने उसे देखा , उसने मेरा हाथ अपने हाथ में लिया और बोली- दुःख हुआ जो हुआ सुनकर, कुछ चीजो पर हमारा बस नहीं चलता लाडले . जो चले जाते है फिर लौट कर नहीं आते पर जो रह जाते है उनको तो जीना पड़ता है न यही नियम है . तुझे भी जीना होगा.

हाथ आगे करके उसने मेरे आंसू पोंछे और बोली- कभी खुद को अकेला मत समझना . बाबे ने दुःख दिया है सुख भी ये ही देगा.

मैंने अपना सर उसके काँधे पर टिका दिया और आँखे मूँद ली. तभी मुझे कुछ ध्यान आया............
 
#6



“क्या हुआ ” उसने कहा

मैं- वो पार्सल

वो-कौन सा पार्सल

मैंने उसका जवाब नहीं दिया बल्कि देखने लगा इधर उधार उस दिन आपाधापी में वो पार्सल इधर ही छूट गया था और फिर पुजारी के कमरे में मुझे वो मिल ही गया. बेसब्री से मैंने उसको खोला और खोल कर कोई खास ख़ुशी हुई नहीं मुझे . पार्सल में एक चाबी थी बस

“क्या है ये ” पूछा लाडली ने

मैं- पता नहीं , एक वकील देकर गया था बोला की अमानत है . एक चाबी भला कैसी अमानत हो सकती है .और मैं तो ये भी नहीं जानता की ये कहाँ की है .

“तुम्हे दी गयी है तो कोई न कोई बात होगी ही इसमें ” उसने कहा

मैं उस से पहले की उसे कुछ कह पाता उसकी सहेली ने उसे पुकारा और तब मुझे मालूम हुआ की उसका नाम चांदनी है . जाते जाते उसने मुड कर मुझे देखा और आगे बढ़ गयी . रह गया मैं अकेला उस चाबी को देखते हुए . बापू ने मरते मरते हवेली कहा था और अब ये चाबी, अजीब इतेफाक था ये की जैसे ही वकील ने चाबी मुझे दी उसके कुछ बाद ही बापू की गाड़ी में आग लग गयी. कुछ न कुछ तो झोल जरुर हुआ था . ऐसा कौन दुश्मन हो गया जो इतना बड़ा काण्ड कर देगा . मेरे मन में ये सवाल भी था की क्या सरपंची के चुनाव के लिए ये सब किया गया , ऐसा करना होता तो कभी भी कर सकते थे . मैंने अपना गणित लगाना शुरू किया , इधर दिन बीत रहे थे चुनाव में अब जायदा समय नहीं था .

जब मैं घर आता तो निर्मला मुझे मिलती, उसका बदन मुझे अपनी तरफ खींचता पर मैं बात नहीं कर पाता था उससे. वो रोज घर आती, खाना बनाती, साफ़ सफाई करती और चली जाती. मैंने खेतो पर जाना भी कम कर दिया था . मैं घंटो शमशान में बापू की बिखरी राख को देखता . हवेली और चाबी दो चीजो ने मुझे उलझा कर रख दिया था . एक दोपहर निर्मला नलके पर कपडे धो रही थी उसने अपना लहंगा घुटनों पर किया हुआ था जिस से मुझे उसकी जांघो का कुछ हिस्सा दिख रहा था . और छातिया तो हमेशा के जैसे ब्लाउज की कैद से आजाद होना चाहती थी . वो भी जानती थी की मैं उसे निहार रहा हूँ.

मैं-तुम बापू को कब से जानती हो .

निरमला- जबसे इस गाँव में आई हूँ पहले मेरी सास यहाँ पर काम करती थी अब मैं करती हूँ . हमारी रोजी-रोटी खेती बाड़ी सब इसी घर की बदोलत है .

मैं- क्या लगता है अजीत का परिवार बापू की हत्या करवा सकता है क्या

निर्मला- नहीं, उस परिवार के साथ सियासी मतभेद ही थे उसके आलावा तो सब ठीक ही था ब्याह-शादियों में भी आना जाना था तो लगता नहीं और फिर इस बार हवा भी उनके पक्ष में थी .

निर्मला कपडे रस्सी पर टांकने के लिए उठी तो मेरी निगाह उसकी मोटी गांड पर पड़ी. क्यों न हो कामुक ये औरत इसका बदन था ही इतना रसीला. मैंने सोचा .

मैं- मुझे तेरी मदद की जरुरत है बदले में तुझे जो चाहिए वो मैं दूंगा.

निर्मला- कैसी मदद और मुझे क्या दोगे.

मैं-जिस दिन बापू वाला हादसा हुआ उसी दिन मुझे एक आदमी मिलने आया था कहता था की वकील हूँ और उसके पास मेरी कोई अमानत है

“वकील ”निर्मला ने शंकित स्वर में कहा

मैं- उसने तो यही कहा था .

निर्मला- पूछा नहीं क्या अमानत थी

मैं- बताऊंगा तो हंसोगी तुम मुझ पर , वो अमानत एक चाबी थी बस एक साधारण सी चाबी.

“तुम्हारी मदद करू क्या कपडे सुखाने में ” मैंने निर्मला से कहा क्योंकि धुप बहुत तेज थी

निर्मला ने मेरी तरफ देखा और कंधे उचकाए. मैंने उसके पीछे खड़ा हो गया और उसे गीले कपडे पकडाने लगा. वो जल्दी जल्दी सुखाने लगी. ऐसा करते हुए बार बार मेरा तन उसे छूने लगा. कुछ वो गीली थी उसके बदन से आती खुसबू किसी नशे से चढने लगी मुझ पर.

“कैसी चाबी थी वो ” उसने कहा

मैं- शायद किसी छोटे ताले की .

तभी उसके हाथ से कपडा फिसल कर निचे गिर गया वो उसे उठाने को झुकी और उसकी गांड की चौड़ाई मेरी आँखों के सामने आ गयी. वो थोडा सा पीछे को होकर उठी और उसकी गांड मेरे अगले हिस्से से रगड खा गयी . जैसे ही उसका बदन मेरे बदन से छुआ, बिजली सी दौड़ गयी बदन में . वो पलटी और मेरे सामने खड़ी हो गयी, करीब इतना थी की उसकी छातिया मेरे सीने से लगभग रगड खाने ही लगी थी .

“मरते वक्त बापू ने किसी हवेली का जिक्र किया था ” मैंने उसके गालो पर अपनी साँस छोड़ते हुए कहा . जैसे ही मैंने हवेली कहा निर्मला दो कदम पीछे हट गयी .

मैं- तुम जानती हो हवेली के बारे में .

निर्मला- नहीं, नहीं जानती.

उसने बाकी कपडे सुखाये और फिर बोली- रात को आउंगी अब

मैं- लखन को भी लाना कुछ जरुरी बात करनी है .

उसने हाँ में सर हिलाया और चली गयी.रह गया मैं अकेला. मैंने कमरा खोला और बापू का सामान देखने लगा. एक तरफ सरपंची का रिकार्ड रखा था, एक संदूक में जमीनों के कागज थे, उसके पास ही हिसाब-किताब था पैसो के लेनदेन का . तिजोरी में नोटों की गड्डी पड़ी थी जिनको गिनने की मैंने जरा भी कोशिश नहीं की . बापू हवेली की बात करता था हम तीन कमरों के घर में रहते थे . बेशक सरपंच था वो , पर ठाठ नहीं था . कुछ तो छिपाया था मुझसे क्या अब यही तलाश करना था .

रात को लखन और निर्मला आये तो मैंने उन्हें अपनी इच्छा बताई की चूँकि अब मैं अकेला था तो मैंने उनसे कहा की वो इस घर में ही रहने को आ जाये, कुछ सुचकाने के बाद आखिर वो मान गए. मेरे लिए ये अच्छा था क्योंकि इनसे मैं घुला-मिला हुआ था और इनके रहने से अकेलापन भी नहीं रहता . जब निर्मला खाना लेकर आई तो मैं छत पर बैठा तारो को देख रहा था . वो मुंडेर पर बैठ गयी और मैं खाना खाने लगा.

मैं- तुमने खाया खाना

निर्मला- बाद में खा लुंगी.

मैं- तुम जानती हो न हवेली के बारे में

निर्मला- मैं दूध लाती हूँ

मैं- तुम जानती हो न हवेली के बारे में

निर्मला- दूध मीठा लोगे या चीनी डालू

मैं- तुम जानती हो न हवेली के बारे में



निर्मला- कोई हवेली नहीं है ........ न थी ना है.
 
#7



निर्मला -कोई हवेली नहीं है..... न थी ना है .

मैं - तो फिर क्या है क्या छिपाया गया है मुझसे.

निर्मला- कुछ नहीं छिपा रही तुमसे मैं अर्जुन

मैं- बताती भी तो नहीं , तुमको मेरी कसम है भाभी अगर तुमने मुझे ना बताया तो .

निर्मला- ये क्या कह दिया तुमने अर्जुन . कसम दी भी तो ऐसी

मैं- मेरा नहीं तो कसम का ही मान रख लो

निर्मला- तुमसे कुछ नहीं तुम्हे दुनिया से छिपाया गया है अर्जुन .

निर्मला की बात ने हैरानी में डाल दिया गया . मैंने मूर्खो की तरह उसे देखा.

मैं- कैसे

निर्मला- अर्जुन, सरपंच जी तुम्हारे पिता नहीं थे .

निर्मला ने मुझ पर बम सा ही फोड़ दिया था .

मैं- झूठ कहती हो तुम . ये नहीं हो सकता कभी नहीं हो सकता.

निर्मला- कुछ सच आज के आईने को पल भर में तोड़ देते है अर्जुन . आज तुम्हारे भ्रम के आईने को टूटना ही लिखा है . एक रात लहुलुहान अवस्था में सरपंच जी एक नन्ही सी जान को अपनी बाँहों में लेकर आये थे . उस बात को बस तीन लोग जानते थे मैं, सरपंच जी और इस घर की मालकिन जानकी जी, जिस रात तुमको सरपंच जी लाये थे उसी रात जानकी जी ने एक मरी हुई औलाद को जन्म दिया और फिर खुद भी चल बसी. मेरी सहायता से सरपंच जी ने गाँव में कहला दिया की लड़का हुआ है और तुम उनकी जिन्दगी बन गये.

मैं- मैं नहीं मानता

निर्मला- जिस तस्वीर को तुम घंटो देखते हुए रोते हो वो जानकी जी तुम्हारी माँ नहीं थी अर्जुन

मैं- तो फिर कौन थी मेरी माँ और कहाँ है मेरा परिवार.

निर्मला ने एक गहरी साँस ली और बोली- ये राज सरपंच जी के साथ ही चला गया .

निर्मला ने पानी का गिलास मुझे दिया और बोली- सरपंच जी कहते थे तुम सब जान जाओगे .

मैं- कैसे

निर्मला-जिन्दगी से बड़ा कोई शिक्षक नहीं अर्जुन. यहाँ से पन्द्रह कोस दूर लाल मंदिर है , वहां जाकर कोई मिले तो पूछना की हवेली जाना है .

निर्मला ने इतना कहा और बर्तन समेट कर निचे चली गयी. वो तो चली गयी थी पर मन में एक तूफ़ान खड़ा कर गयी. रात आँखों आँखों में काटी मैने.

सुबह गाँव में चुनाव था, कहने को चुनाव था पर मेरे लिए होकर भी नहीं था वो वजह जो मुझे सरपंची से जोडती थी वो खत्म हो गयी थी . अजित के परिवार को मैंने स्कूल के बाहर खड़े देखा जिनके चेहरे पर अपार ख़ुशी थी और होती भी क्यों न बरसो बाद उनका सपना जो पूरा होने जा रहा था . मैंने गाड़ी के शीशे ऊपर किये और लाल मंदिर की तरफ चल दिया .

शीशे से अन्दर आती गर्मी ने तपा दिया था मुझे, जब मैं उस जगह पर पहुंचा तो वहां कुछ भी वैसा नहीं मिला जैसा मैंने उम्मीद की थी . चारो तरफ झाड-झंखाड़ था , कंटीली कीकरो का जाल फैला हुआ था पहली नजर में तो मैं पत्थर की बनी सीढियों को देख ही नहीं पाया था . जैसे तैसे करते हुए मैं ऊपर गया तो पाया की बरसो से शायद इस मंदिर में किसी ने कदम नहीं रखा होगा. पत्थर, धुप-बारिश की मार में तिडक गए थे . मूर्ति खंडित थी

“यहाँ तो कोई नहीं है कौन मदद करेगा मेरी फिर ” मैंने आस पास नजरे घुमाते हुए कहा . उस जगह को घुमते हुए देख ही रहा था की तभी मेरे पाँव में काँटा चुभ गया . मैं उसे निकालने के लिए झुका ही था की “धांय ” की आवाज से कलेजे को झटका सा लगा . ऐसे लगा की आग मेरे पास से गुजर गयी हो . मैं थोडा घबरा सा गया .देखा की सामने मुझ बड़ा एक लड़का खड़ा है . लम्बा कद, पैनी मूंछे, भूरी बिल्लोरी आँखों हाथ में दुनाली लिए.

मैं- पागल है क्या बन्दूक चलाने के लिए होश करना भी जरुरी होता है. गोली लग जाती तो.

वो- मारने के लिए ही चलाई थी पर जिन्दगी में पहली बार निशाना चूक गया.

वो मेरे पास आया और दुनाली मेरे सीने से लगा दी.

मैं- इस बदतमीजी की कीमत क्या होगी सोच कर देख .

वो- तू सोच कर देख, तेरी हिम्मत कैसे हुई यहाँ अपने कदम रखने की ये जानते हुए भी ठाकुर जय सिंह की बहन इस समय पूजा करने आई हुई है.

मैं- पहली बात तो मुझे कोई दिखा नहीं तेरे सिवा और दूसरी बात अगर तेरी बहन है भी यहाँ तो तेरे बाप-दादा की जागीर नहीं है ये जगह . ये मंदिर है तो सब का हुआ न और अगर मंदिर में भी किसी की मर्जी से आना जाना हुआ तो क्या ख़ाक सल्तनत हुई उस ऊपर वाले की.

मैने दुनाली अपने सीने से हटाई और बोला- तुझे जानता नहीं पहचानता नहीं, तूने मुझ पर वार किया फिर भी मैं छोड़ता हु इस बात को . पर कोशिश करना फिर कभी तू उलझ न जाए मुझसे क्योंकि अगली बार मैं भूलूंगा नहीं .

“हरामजादे , तेरी ये हिम्मत जानता भी है तू किसके सामने खड़ा होकर अपनी जुबान चला रहा है इस जुबान को खींच लूँगा मैं ”उस लड़के ने मुझे गाली दी. मैंने उसके घुटने पर लात मारी और उसकी बाहँ मोड़ कर पीठ से लगा दी. बन्दूक उसके हाथ से गिर गयी .

मैं- जब हाथो में ताकत ना हो न तो हथियारों का शौक नहीं रखना चाहिए, तू जो भी है मुझे परवाह नहीं.

“छोड़ मेरा हाथ ” उसने कहा और मैंने बाहँ और मरोड़ दी. वो इस बार थोडा बिलबिलाया पर अगले ही पल मुझे उसका हाथ छोड़ना पड़ा .

“क्या हो रहा है भैया यहाँ पर ” मेरी नजर उस चेहरे पर जम गयी जो न जाने कहाँ से आकर मेरे सामने खड़ा हो गया था . उसे देखा तो बस देखता ही रह गया. फिर मैंने कुछ और देखा ही नहीं. केसरिया कपड़ो में सूरज की धुप में सोने सी दमकती वो हाथो में पूजा की थाली लिए वो मेरे सामने कड़ी थी . मैंने उस लड़के का हाथ छोड़ दिया.

लड़का- कुछ नहीं छोटी, बस ऐसे ही

उस लड़के ने कहा पर मेरा ध्यान मेरे सामने वाली पर था वो मुझे देख रही थी मैं उसे.

“तू चल कर गाडी में बैठ छोटी मैं आता हूँ ” उसने कहा और वो आगे बढ़ गयी .

लड़का- तेरी किस्मत आच्छी थी मैं छोटी के सामने कभी गुस्सा नहीं करता वर्ना आज तू जिन्दा वापिस नहीं जाता.

मुझे हंसी आ गयी

मैं-हम फिर मिलेंगे, बार बार मिलेंगे. मेरा नाम अर्जुन है याद रखना क्योंकि ये नाम तू आज के बाद कभी भूल वैसे भी नहीं पायेगा.

मैने बन्दूक उठा कर उसके हाथ में दी और बोला- मर्दों को इसकी जरुरत नहीं पड़ती . वैसे एक सवाल पूछना था तुझसे मुझे हवेली जाना है रास्ता बताएगा क्या



मैंने इतना कहा और उसके चेहरे का रंग उड़ गया.
 
#8

“तू, तुझे क्या लेना देना हवेली से ” जय सिंह ने हौले से कहा

मैं-बड़ी तारीफ सुनी है तो बस देखने चला आया .

“मुझे तो कोई पागल ही लगता है तू ” जय सिंह ने कहा और पीठ मोड़ कर चल दिया.

मैं- अबे, बता तो दे रास्ता

जय सिंह- यहाँ तक आया है तो आगे भी खुद ही पहुँच जायेगा और ख़ूबसूरती कैसी लगी कभी मिले तो बताना जरुर.

जय सिंह ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया खैर मैंने भी गाड़ी आगे की तरफ बढ़ा दी और आगे गाँव में चौपाल के कोने पर बनी चाय की दूकान पर जाकर रोकी.

“एक चाय देना काका “मैंने कहा और वही बैठ गया. चाय वाला मुझे अजीब नजरो से घुर रहा था .

“यहाँ पहली बार आये हो ” उसने पूछा

मैं-हाँ

मैंने चाय की चुसकिया लेते हुए आस पास नजर दौड़ाई. ये जगह किसी छोटे बाजार जैसी दुकाने थी जरूरतों के सामान की एक तरफ बैठने को चबूतरे बने थे .

“ये ठाकुर जय सिंह कौन है ” मैने पूछा

चाय वाला- आफत है इस गाँव की,

मैं- आफत

चाय वाला- आफत तो छोटा शब्द है उसके लिए हर समय गुस्सा चढ़ा रहता है उसके नाक पर न जाने कब कौन उसके हत्थे चढ़ गए.

मैं- ऐसे आदमी को रोकते क्यों नहीं तुम सब

चायवाला-ये गाँव उसके बाप की मिलकियत है अब प्रजा की इतनी हिमत्त कहाँ की राजा के खिलाफ आवाज उठाये वो तो बस जय सिंह से ही गाँव वाले कतराते है बाकी बड़े ठाकुर साहब तो देवता आदमी है

मैं- बड़े ठाकुर ?

चाय वाला- कमाल है यहाँ पर आकर तुम बड़े ठाकुर को नहीं जानते,

मैं- तू बता देना फिर

चाय वाला- ठाकुर शौर्य सिंह का नाम तो सुना ही होगा न वो ही है बड़े ठाकुर साहब

मैं- हम्म , खैर चाय बढ़िया बनाता है सुन मुझे हवेली का रास्ता बता तू

चाय वाले के हाथ से कांच का गिलास छुट गया . उसने अजीब नजरो से देखा मुझे और बोला- तुमको क्या लेना देना हवेली से

मैं- एक मरे हुए आदमी ने मुझसे कहा की हवेली जा मैं आ गया .

चाय वाले ने कुछ भी नहीं कहा अपने कांपते हुए हाथ को उठाया और सामने की तरफ इशारा कर दिया. मैनी चाय पे पैसे रखे और गाड़ी आगे बढ़ा दी. जल्दी ही गाँव पीछे छूट गया . और जंगल शुरू हो गया. पथरीली राह पर गाड़ी झटके खाते हुए चली जा रही थी . मैंने नदी को देखा शांत पानी देख कर मैंने गाड़ी रोक दी. ये जगह बड़ी प्यारी सी थी , रस्ते के एक तरफ जंगल तो दूसरी तरफ नदी अनोखा संगम . पेंट को घुटनों तक मोड़ कर मैं पानी में उतर गया हाथ मुह धोये और जी भर कर पानी पिया. एक पल के लिए मैं भूल सा गया की मैं कहाँ हु, पर शुक्रिया उन आवाजो का जिसने मेरा ध्यान भंग किया.

दबे पाँव मैं उन आवाजो की तरफ गया तो देखा की झाड़ियो में एक औरत घुटनों के बल झुकी हुई है उसकी सलवार निचे पड़ी थी और उसकी कमर को थामे हुए एक आदमी उसे पीछे से चोद रहा है .

“ओह चंदा क्या चूत है तेरी, पुरे गाँव में तुझ सी नशीली कोई औरत नहीं जी तो करता है दिन रात तुझे ऐसे ही झुकाए रहू ” उस आदमी ने कहा.

कमर को तेजी से आगे पीछे करते हुए उस आदमी की सांसे थोड़ी थोड़ी फूलने लगी थी.

“”आह मैं तो गयीईई ” उस चंदा ने गहरी आह भरी और अपनी गांड को और ऊँचा कर लिया . आँखों के सामने चलती चुदाई देख कर मेरे कान तपने लगे.गर्मी की भरी दोपहर में दो बदन पसीने पसीने हुए एक दुसरे में समाये हुए थे .दो मिनट बाद वो आदमी भी शांत हो गया और मैंने पहली बार उस औरत की शक्ल देखि, खूबसूरत तो बहुत थी वो. बिलकुल फ़िल्मी हेरोइन जयप्रदा जैसी. उसके हुस्न का कायल हुए बिना नहीं रह सका मैं.

“तूने वो काम किया नहीं अभी तक ” उस आदमी ने चंदा से कहा

चंदा- कोशिश कर तो रही हूँ पर तुम नहीं जानते ये लोग कितने चतुर है और हाँ आज तो मैं आ गयी आगे से ऐसे नहीं आउंगी.

आदमी- मैं भी क्या करू जो बात तुझमे है वो किसी और में नहीं

चंदा- रहने दो इन बातो को अपना वादा भूल मत जाना तुम

आदमी- कभी नहीं चंदा .

मैं उस आदमी के चेहरे को नहीं देख पा रहा था क्योंकि उसने चेहरे पर साफा लपेटा हुआ था और चेहरा देख भी लेता तो क्या होता मैं कहाँ जानता था उसें. जल्दी ही वो दोनों अलग अलग रस्ते पर हो लिए मैं समझ गया था की जंगल ख़ास तो है पर वो हवेली कहाँ है जो खास थी .

कुछ दूर और आगे गया यहाँ पर बहुत ऊँचे ऊँचे पेड़ कतार में खड़े थे , और उन्ही पेड़ो के पीछे तीन मंजिला वो ईमारत खड़ी थी जिसे दुनिया हवेली के नाम से जानती थी. बनाने वाले ने क्या सोच कर ही इस ईमारत को इस जगह पर बनाया होगा. एक तरफ जंगल , एक तरफ नदी की धारा . रजवाडो की शानो शौकत का जीता जागता प्रमाण रही होगी ये ईमारत किसी जमाने में . हालाँकि आज ये वैसी नहीं थी . लगभग आठ फीट ऊँची दीवारों का चुना कई जगहों से झड़ गया था . कई जगह हरी काली काई चढ़ गयी थी . तो कुछ कब्ज़ा जंगली बेलो ने कर लिया था . चलते हुए मैं उस इमारत के पास आया. आखिरी बार शायद गुलाबी पुताई की गयी होगी इस पर. लोहे का बड़ा सा दरवाजा जंग खा चूका था पर फिर भी खड़ा था .मैंने दरवाजे को पकड़ा और उसे धक्का देना ही चाहा था की मेरे हाथ रुक गए.


“तुम्हे ऐसा नहीं करना चाहिए ” मैंने पलट कर देखा एक बुढा हाथ में लाठी लिए खड़ा था .
 
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