Adultery सज्जनपुर की कहानी - SexBaba
  • From this section you can read all the hindi sex stories in hindi font. These are collected from the various sources which make your cock rock hard in the night. All are having the collections of like maa beta, devar bhabhi, indian aunty, college girl. All these are the amazing chudai stories for you guys in these forum.

    If You are unable to access the site then try to access the site via VPN Try these are vpn App Click Here

Adultery सज्जनपुर की कहानी

hotaks

Administrator
Staff member
Joined
Dec 5, 2013
Messages
147,276
मित्रगण कहानी का नया अध्याय नंबर 17 पेज संख्या 30 पर पोस्ट कर दिया है।

लगातार अपडेट दे रहा हूं दोनों ही कहानियों पर उस अनुसार प्रतिक्रिया नहीं मिल रही है, फिर मेरी इच्छा भी नहीं होती है लिखने की तो अच्छे से रिव्यू दें लाइक करें।

।।बहुत बहुत धन्यवाद।।
 
एक नई और दिलचस्प कहानी आपके सामने परोस रहा हूं आशा है कि आप सब को स्वाद पसंद आयेगा। अपनी प्रतिक्रियाएं अवश्य दें तो आगे लिखने में मदद मिलेगी।

।।धन्यवाद।।
 
1980 का दशक, उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव में, जहां पास बहती नदी की लहरें खेतों को सींचती थीं, और हवा में मिट्टी की सौंधी खुशबू बसी रहती थी। यह गांव, सज्जनपुर, अपने किसानों के लिए जाना जाता था। यहां के लोग मेहनतकश थे, जिनके दिन खेतों में और रातें आंगन में तारों तले बीतती थीं। गरीबी थी, मगर सम्मान और संस्कारों की धनी थी यह बस्ती। गांव की गलियां मिट्टी की थीं, घर कच्चे, और दिल पक्के। यहीं बसा था फूल सिंह और अजीत का परिवार, जो अपने खेतों की फसल और आपसी प्यार से जीवन की गाड़ी खींच रहा था।

गांव के बीचों-बीच एक बड़ा-सा कच्चा मकान था, जिसमें फूल सिंह और अजीत का संयुक्त परिवार रहता था। घर का आंगन विशाल था, जहां सुबह-शाम सुमन और कुसुम की चूड़ियों की खनक गूंजती, और बच्चे क्रिकेट खेलते। आंगन के एक कोने में तुलसी का पौधा था, जिसकी पूजा हर सुबह होती। घर के बाहर खेतों की हरियाली फैली थी।





परिचय

कम्मू (कमल): एक किशोर, जो जवानी की दहलीज पर कदम रख रहा था। बदन पतला, मगर कमजोर नहीं—खेतों और क्रिकेट के मैदान की मेहनत ने उसे चुस्त-दुरुस्त बनाया था। चेहरे पर हल्के-हल्के रूंए उग आए थे, जो उसकी नई-नवेली जवानी का सबूत थे। उसकी आंखों में शरारत और सपने दोनों झलकते थे, और क्रिकेट के प्रति उसका जुनून उसे गांव का चहेता बनाता था।

सुमन: कम्मू की मां, 35 साल की एक देसी गांव की औरत, जिसका गदराया हुआ बदन और गेहूंआ रंग गांव की मिट्टी से मेल खाता था। उसके चेहरे पर एक अनोखी चमक थी, और उसकी मुस्कान इतनी सुंदर कि हर किसी का दिल जीत ले। सुमन का भरा हुआ बदन, खासकर उसकी बड़ी-बड़ी चूचियां, जो हर ब्लाउज को तान देती थीं, और उसका मांसल पेट, जिसमें गहरी, कामुक नाभि छिपी रहती थी, उसकी देह को और आकर्षक बनाते थे। कमर में पड़ी सिलवटें उसकी शोभा बढ़ाती थीं, और नीचे तरबूज जैसे चूतड़, जो हर कदम पर थिरकते, साथ में मोटी, केले के तने-सी जांघें—सुमन की देह गांव की हर नजर का ध्यान खींचती थी। फिर भी, उसकी सादगी और ममता ही उसकी असली पहचान थी।





अजीत: कम्मू के पिता, 36 वर्ष का गठीला किसान, जिसका बदन खेतों की मेहनत का गवाह था। बाहर से देखने में वह एक आम गांव का किसान था, मगर अंदर से रंगीन मिजाज। सुमन जैसी खूबसूरत पत्नी के साथ वह अपनी जवानी का भरपूर लुत्फ उठाता था। उनकी अंतरंग जिंदगी में जोश और जुनून की कमी नहीं थी, और अजीत अपनी पत्नी के साथ खुलकर प्रेम का आनंद लेता था।

अनामिका: कम्मू की बड़ी बहन, 19 वर्ष की, जो बदन के मामले में अपनी मां सुमन की कार्बन कॉपी थी। गोरा रंग, जवानी की गर्मी से कसा हुआ बदन, और छाती पर संतरों के आकार की चूचियां, जो उसके कसे हुए सूट में साफ उभरती थीं। उसके गोल-मटोल चूतड़ों की थिरकन और कामुक कमर का मटकना गांव की गलियों में नजरें खींचता था।





फूल सिंह: कम्मू के दाऊ (ताऊजी), अजीत के बड़े भाई, 40 वर्ष के, और घर में सबसे बड़े। एकदम देसी किसान, जो अपने बाप-दादा से सीखे तौर-तरीकों पर चलता था। मान-सम्मान की उसे बहुत फिक्र थी।

कुसुम: कम्मू की ताई, फूल सिंह की पत्नी, 38 वर्ष की, और सुमन की जेठानी। बदन के मामले में वह सुमन से भी दो कदम आगे थी। उसका भरा हुआ बदन, कमर में पड़ी सिलवटें, और गेहूंआ रंग उसकी कामुकता को और बढ़ाता था। उसकी छाती पर बड़ी-बड़ी चूचियां और मांसल पेट थे, और चूतड़ तो ऐसे कि सुमन के तरबूजों को भी मात दे दें—जैसे दो बड़े पतीले। जब वह साड़ी पहनकर गांव में निकलती, तो उसकी थिरकन किसी का भी ध्यान खींच लेती। कुसुम का अंदाज बेबाक और मजाकिया था,





अंजू: फूल सिंह और कुसुम की बेटी, 20 वर्ष की, गोरे रंग की, और बदन में जवानी का पूरा जोश। उसका बदन अनामिका की तरह भरा हुआ नहीं, बल्कि जहां भरा होना चाहिए, वहीं भरा था। पतली कमर, पूरे आकार की चूचियां और चूतड़, जो उसकी पतली कमर के कारण और उभरकर नजर आते। सूट में जब वह गांव में निकलती, तो लोगों की नजरें उसके ऊपर से नीचे तक फिसलती रहतीं।





धीरज: फूल सिंह और कुसुम का बड़ा बेटा, 21 वर्ष का, जिसकी जवानी फूट रही थी। काला रंग, अपने पिता और चाचा के साथ खेतों में मेहनत करता था। उसका ब्याह होने वाला था।

जतन: फूल सिंह और कुसुम का छोटा बेटा, 19 वर्ष का, थोड़ा मंदबुद्धि। जल्दी चिढ़ जाता और हर समय रोने जैसी शकल बनाए रखता। अपनी गलतियों के कारण अक्सर पिटाई खाता, मगर परिवार का हिस्सा होने के नाते उसे सब प्यार भी करते थे।

फूल सिंह और अजीत के परिवार के साथ-साथ उनके पड़ोस में दो और परिवार थे—तेजपाल और दिलीप का। ये परिवार भी गांव की मिट्टी और संस्कारों से जुड़े थे, मगर हर घर की अपनी कहानी थी, अपनी रंगत थी।

तेजपाल का घर फूल सिंह के मकान से कुछ गज दूर था। उनका कच्चा मकान पुराना था, मगर आंगन में नीम का पेड़ और तुलसी का चबूतरा इसे जीवंत बनाता था। तेजपाल, 58 साल के, गांव के सबसे बुजुर्गों में से एक थे। उनका बदन अभी भी चुस्त था, और चेहरे पर सख्ती के साथ-साथ अनुभव की गहराई झलकती थी। मान-सम्मान उनके लिए सब कुछ था।





उनके बेटे रत्नाकर, 40 साल के, अपने पिता की छाया में रहते थे। रत्नाकर का कसा हुआ बदन और गेहूंआ रंग उन्हें एक आम किसान का रूप देता था, मगर उनकी लंबाई थोड़ी कम थी। वह मेहनती थे, मगर दारू का शौक उन्हें कभी-कभी रंगीन मिजाज में ले आता। नशे में वह गीत गुनगुनाते और गांव की गलियों में झुमरी की तारीफों के पुल बांधते।

झुमरी, उनकी 38 साल की पत्नी, एक मादक औरत थी। उसका गोल-मटोल चेहरा, गेहूंआ रंग, और भरा हुआ बदन हर नजर को खींचता था। उसकी साड़ी में तनी हुई मोटी चूचियां, कमर की सिलवटें, गहरी नाभि, और बाहर को निकले चूतड़—झुमरी की देह गांव की गपशप का हिस्सा थी। फिर भी, वह अपने परिवार के लिए समर्पित थी, और उसकी हंसी आंगन को गुलजार रखती थी।



रत्नाकर और झुमरी की बेटी बिंदिया, 22 साल की, अपनी मां की जवानी का छोटा रूप थी। उसकी कसी हुई चूचियां, बलखाती कमर, और गोल-मटोल चूतड़ गांव के लड़कों की धड़कनें बढ़ाते थे। उसका ब्याह तय होने वाला था, और तेजपाल इस बात को लेकर बहुत सजग थे।





मन्नू, 20 साल का, रत्नाकर का बेटा, गांव का शरारती लड़का था। वह कम्मू और सोनू का जिगरी यार था, और क्रिकेट के मैदान में तीनों की तिकड़ी मशहूर थी। मन्नू का गेहूंआ रंग और साधारण बदन उसे आम दिखाता था, मगर उसकी दोस्ती और हंसी उसे खास बनाती थी।

दिलीप का घर तेजपाल के मकान से थोड़ा हटकर था। उनका घर छोटा और जर्जर था, क्योंकि दिलीप की कमाई ज्यादातर दारू और जुए में उड़ जाती थी। दिलीप, 40 साल का, गांव का सबसे बदनाम शख्स था। उसकी हवस भरी नजरें हर औरत पर पड़ती थीं—चाहे वह सुमन हो, कुसुम हो, झुमरी हो, या उसकी अपनी पत्नी रजनी। उसका बदन मेहनत से गठा था, मगर उसकी आदतों ने उसे गांव में नीचा दिखा दिया था।

रजनी, 39 साल की, दिलीप की हरकतों से तंग थी। उसका गदराया बदन गांव में सबसे ज्यादा चर्चा का विषय था। उसकी चूचियां इतनी बड़ी थीं कि सुमन, कुसुम, और झुमरी भी उसके सामने फीकी पड़ जाएं। उसका भरा हुआ पेट, गहरी नाभि, कमर की सिलवटें, और गोल-मटोल चूतड़—रजनी की देह में एक ऐसी कामुकता थी, जो अनायास ही नजरें खींच लेती थी। मगर उसकी आंखों में उदासी थी, क्योंकि दिलीप की हरकतें उसे हर पल तोड़ती थीं। वह अपने बच्चों के लिए जीती थी।





नेहा, 21 साल की, रजनी की बड़ी बेटी, अपनी मां की तरह खूबसूरत थी। उसका गोरा रंग, सुंदर चेहरा, और मौसमी के आकार की चूचियां उसे गांव की सबसे आकर्षक लड़कियों में शुमार करती थीं। उसका छरहरा बदन और गोल-मटोल चूतड़ जब सूट में थिरकते, तो गांव के लड़के ठिठक जाते।





विक्रम, 20 साल का, रजनी का बड़ा बेटा, शहर की फैक्ट्री में काम करता था। उसकी कमाई ही घर को चलाती थी। वह जिम्मेदार और समझदार था, और अपनी मां की परेशानियों को देखकर अक्सर चुपके से आंसू बहाता।

मनीषा, 19 साल की, रजनी की छोटी बेटी, मासूम और प्यारी थी। उसका पतला बदन, नींबू जैसी छोटी चूचियां, और छोटे-छोटे चूतड़ उसे उम्र से छोटा दिखाते थे, मगर उसकी मुस्कान दिल जीत लेती थी।



सोनू, 18 साल का, सबसे छोटा बेटा, गोरा और पतला था। मां-बाप के झगड़ों ने उसे उम्र से ज्यादा समझदार बना दिया था। वह कम्मू और मन्नू का दोस्त था, और क्रिकेट में उनकी तिकड़ी को कोई नहीं हरा सकता था।
 
अध्याय 2

तपती दोपहर, जब सूरज अपने पूरे जोश में था और लू की गर्म हवा सरलपुर को सन्नाटे में जकड़ चुकी थी, गांव की क्रिकेट टीम बगल के गांव से हारकर लौटी। धूल भरे मैदान से उठती निराशा और गर्मी की झल्लाहट हवा में तैर रही थी।

कम्मू, माथे से पसीने की बूंदें पोंछते हुए, गुस्से में बड़बड़ा रहा था, “अरे भाई, ठीक से पकड़ लेता तो जीत जाते! ले मरवाली अब, खेलना नहीं आता तो मैदान क्यों आया?”

मन्नू, जिस पर कैच छोड़ने का इल्जाम था, तपाक से जवाब देता है, “तू भाई ज्यादा कपिल देव मत बन! आंखों पर चौंध पड़ गई थी, इसलिए छूट गया। ऐसे बोल रहा है जैसे तूने कभी गलती नहीं की!”


अरे, अब हार गए ना, तुम दोनों लड़ना बंद करो!” सोनू, हमेशा की तरह मेल-मिलाप का रास्ता निकालते हुए बोला, “गर्मी से बुरा हाल है, चलो, घर चलते हैं।

तीनों जिगरी दोस्त—कम्मू, मन्नू, और सोनू—बाकी लड़कों से अलग हो गए और नहर किनारे पहुंचे। ठंडे पानी में हाथ-पैर धोकर उन्होंने गर्मी और हार की खीझ को धो डाला। नहर का पानी उनके पैरों को छूता, और हल्की हवा उनके चेहरों पर राहत लाती।

ये तीनों एक ही उम्र के थे, उनके घर एक-दूसरे के बगल में, और बचपन से ही एक-दूसरे के साए जैसे थे। साथ खेलना, साथ लड़ना, साथ जीतना, और साथ हारना—उनकी नोंक-झोंक और गाली-गलौज भी उनकी दोस्ती की मिठास थी, जो उनकी बातों में अपनापन घोल देती थी। नहर से राहत पाकर तीनों अपने घरों की ओर चल पड़े, गर्मी की दोपहर में गांव सन्नाटे में डूबा था। लोग घरों में दुबके थे या पेड़ों की छांव में खाट बिछाकर समय काट रहे थे। सुबह और शाम का वक्त ही काम-काज के लिए रहता, जब गर्मी थोड़ी कम होती। गांव में अधिकतर घरों में गाय या भैंस थीं, जो दूध-दही की जरूरत पूरी करती थीं। ये पशु न सिर्फ परिवार का पेट पालते, बल्कि गांव की जिंदगी का अभिन्न हिस्सा थे।कम्मू, जिसका असली नाम कमल था—हालांकि यह नाम सिर्फ कागजों तक सीमित था, क्योंकि पूरा सज्जनपुर उसे कम्मू ही बुलाता—अपने घर पहुंचा। हाथ हिलाता, थोड़ा झुंझलाया-सा वह छप्पर के नीचे कदम रखते ही अपनी मां सुमन के गुस्से का शिकार हो गया।

“आ गया! अब क्यों आया? और देर रुक लेता वहीं! पड़ा रहता उसी गेंद-बल्ले के साथ, खा लेता वही! घर की याद कैसे आई, हां?” सुमन की आवाज में गुस्सा था, मगर उसका प्यार भी छलक रहा था। कम्मू को इतना तो पता था कि इस वक्त मां को जवाब देना सेहत के लिए ठीक नहीं। वह चुपचाप छप्पर के नीचे बिछी खाट पर बैठ गया, मुंह लटकाए।

सुमन ने कुछ देर और अपने बेटे पर प्यार भरी खीज की बौछार की। फिर, अपनी साड़ी का पल्लू उठाकर, पसीने से भीगी अपनी गदराई कमर में ठूंसा और बड़बड़ाती हुई अंदर चली गई। “न जाने क्या मिलता है उस गेंद-बल्ले में कमबख्त को, जो खाना-पीना सब भूल जाता है! ऊंट हो रहा है, पर अकल दो पैसे की नहीं!”थोड़ी देर बाद सुमन वापस आई, हाथ में एक थाली, जिसमें रोटी, सब्जी, और थोड़ा-सा दही था। थाली कम्मू के सामने रखते हुए उसने चार चटपटी बातें और सुना दीं, ताकि खाने में मसाला कम न पड़े। सुबह से क्रिकेट के मैदान में दौड़-भाग और हार की खीझ के बाद कम्मू को भूख जोरों से लगी थी। वह मां की डांट को मन से ज्यादा पेट से सुन रहा था। थाली देखते ही वह खाने में जुट गया। सुमन वहीं खाट पर बैठ गई, हाथ में पंखा लिए, अपने और कम्मू के लिए हवा करने लगी। गर्मी की दोपहर में पंखे की हल्की हवा थोड़ा सुकून दे रही थी, और सुमन की बड़बड़ाहट अब धीमी पड़ चुकी थी।

कम्मू का घर सरलपुर के बाकी कच्चे घरों जैसा ही था—सादा, मगर अपनत्व से भरा। दो कमरे आमने-सामने, दोनों के आगे छप्पर, और बीच में एक छोटा-सा खुला आंगन। आंगन के एक कोने में एक नल लगा था, जिसके बगल में एक पत्थर की पटिया बिछी थी—यही था स्नानघर। नहाने से लेकर बर्तन धोने तक सब कुछ यहीं होता। दूसरी ओर घर का मुख्य द्वार था, जिसके पुराने लकड़ी के किवाड़ों पर समय की छाप साफ दिखती थी। रसोई के नाम पर छप्पर के एक किनारे मिट्टी का चूल्हा था, जहां लकड़ियों और उपलों से खाना बनता। चूल्हे के आगे एक छोटी-सी मिट्टी की दीवार बनाकर उसे रसोई का रूप दे दिया गया था। इन्हीं दो कमरों और छप्परों के बीच पूरा परिवार रहता था—एक कमरा अजीत के परिवार का, दूसरा फूल सिंह का। आंगन की मिट्टी और छप्पर की छांव में ही कम्मू का बचपन बीता था, और यहीं उसकी जिंदगी की छोटी-बड़ी कहानियां बुन रही थीं।

गर्मी की दोपहर सरलपुर में सन्नाटे की चादर ओढ़े थी। कम्मू अपने घर के छप्पर तले खाट पर बैठा खाना खा रहा था, और सुमन पास में बैठी पंखा हिलाकर अपने और बेटे के लिए हवा कर रही थी। तभी आंगन की ओर से किसी की पुकार सुनाई दी। सुमन ने पंखा खाट पर रखा और आंगन में जाकर देखा। बगल के घर से झुमरी, दोनों घरों के बीच की दीवार पर झुकी हुई, उसे पुकार रही थी।“हां जीजी, क्या हुआ?” सुमन ने दीवार के पास पहुंचते हुए पूछा।

“अरे बन्नो, थोड़ा दही हो तो दे दे, दही जमाने के लिए। मैंने बर्तन धो दिया, बस बहुत थोड़ा-सा दे दे,” झुमरी ने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा।

“हां जीजी, अभी लाई,” सुमन ने तुरंत जवाब दिया। वह जल्दी से अंदर गई और एक छोटी कटोरी में थोड़ा-सा दही लेकर लौट आई। कटोरी झुमरी को थमाते हुए उसने पूछा, “और, सब काम निपट गया?”झुमरी ने कटोरी हाथ में लेते हुए कहा, “हां, बस अब दही जमाना बाकी था। सुबह से गाय का दूध निकालने, बर्तन धोने, और खाना बनाने में लगी थी। तू बता, तेरे घर का क्या हाल है?”

सुमन ने हल्का-सा ठंडी सांस छोड़ते हुए कहा, “क्या बताऊं जीजी, ये कम्मू तो सुबह से गेंद-बल्ले के पीछे भागा हुआ था। बगल के गांव से हारकर आए हैं, और अब जाकर घर की याद आई। खेतों में पानी लगाने की बात कहो, तो मुंह फुलाए बैठा है। ऊपर से गर्मी ने हाल बेहाल कर रखा है।”

झुमरी हंस पड़ी, “अरे, हमारे मन्नू की भी यही हालत है। सुबह से खेत में पानी लगाने की बात कह रहे थे, पर ये भी गायब हो गया। ससुर जी रिश्तेदारी में गए हैं, तो सारा काम अकेले ही करना पड़ा। अब जाकर मन्नू लौटा है, और मुंह बनाए बैठा है, जैसे सारी दुनिया की जिम्मेदारी उसी के कंधों पर हो!”

सुमन ने भी हल्की हंसी के साथ जवाब दिया, “हां जीजी, ये लड़के ऐसे ही हैं। जवानी सिर चढ़कर बोल रही है, पर अकल अभी घुटनों में ही है। अब मैं क्या करूं, बस डांट-डपट कर ही काम चला रही हूं।”

“सही कहती है,” झुमरी ने सहमति जताई। “वैसे, शाम को नहर किनारे चलेंगी? थोड़ा पानी भर लें, और गर्मी भी शांत हो जाएगी।”

“हां, ठीक है जीजी, मैं अनामिका को लेकर आ जाऊंगी,” सुमन ने कहा। दोनों औरतें कुछ देर तक ऐसे ही बातें करती रहीं—घर के काम, गाय-भैंस की देखभाल, और गर्मी की मुश्किलों की चर्चा। फिर झुमरी ने कटोरी थामते हुए कहा, “चल, अब मैं दही जमा लूं, नहीं तो ये काम भी अटक जाएगा।”

“ठीक है जीजी,” सुमन ने मुस्कुराकर कहा और वापस अपने छप्पर की ओर बढ़ गई।

झुमरी कटोरी लेकर अपने घर की ओर बढ़ी। उसका घर सुमन के घर से मिलता-जुलता था। एक कमरा, जिसके आगे छप्पर पड़ा था, और फिर एक छोटा-सा आंगन। आंगन के दूसरी ओर एक और छप्पर था, जहां भैंस बंधी रहती थी। सुमन के घर की तरह ही यहां भी छप्पर के एक किनारे मिट्टी का चूल्हा था, जिसे छोटी-सी मिट्टी की दीवार से घेरकर रसोई बना दिया गया था। आंगन में एक नल और उसके बगल में पत्थर की पटिया थी, जहां नहाने से लेकर बर्तन धोने तक सारा काम होता था।

झुमरी छप्पर में पहुंची और दही जमाने के लिए बर्तन में दूध और दही डालने लगी। पास ही मन्नू बैठा था, मुंह बनाए, जैसे कोई बहुत बड़ा नुकसान हो गया हो।“अब मुंह बनाए क्यों बैठा है?” झुमरी ने मन्नू की ओर देखते हुए कहा। “चल, उठ, रोटी खा ले जाकर। बिंदिया, ओह बिंदिया, इसे रोटी परस दे जरा!”

झुमरी की आवाज सुनकर बिंदिया, जो मन्नू की बड़ी बहन थी, कमरे से बाहर निकली। उसने एक बार मन्नू की ओर नजर मारी, जिसमें हल्का-सा ताना था, और फिर रसोई की ओर बढ़कर मन्नू के लिए खाना निकालने लगी। झुमरी ने बात आगे बढ़ाई, “अब मुंह बनाने से क्या होगा? तुझे पता है न, तेरे पिता जी कब से खेत में पानी लगवाने के लिए तेरी राह देख रहे थे? और तू सुबह का निकला तो ऐसा निकला कि घर की सुध-बुध ही खो बैठा। पता है, अकेले उन्होंने पूरा खेत पानी लगाया, और फिर घर भी आ गए!”

बिंदिया ने थाली मन्नू के सामने रखते हुए तंज कसा, “और क्या, इसे तो बस गेंद-बल्ले से मतलब है। ये नहीं कि पिता जी का सहारा बने।”

झुमरी ने सहमति में सिर हिलाया, “सही बात है। ऊपर से अगर उन्होंने गलती पर एक-आध डांट भी दी, तो मुंह बनाने की क्या जरूरत है?”

मन्नू दोनों की बातें सुनते हुए चुपचाप थाली से एक निवाला तोड़ा और मुंह में डाल लिया। उसकी खीझ साफ झलक रही थी, मगर वह जानता था कि इस वक्त कुछ बोलना ठीक नहीं।

इधर सुमन झुमरी को दही देने के बाद और कम्मू को खाना खिलाने के बाद थोड़ी कमर सीधे करने के बहाने से कमरे में जाकर लेटी ही थी कि अचानक से बाहर से शोर आने लगा, तुरंत घर में जो भी था बाहर की ओर भागा, आंगन में आए तो आवाज़ बगल में से ही आ रही थी, कम्मू के एक ओर जहां मन्नू का घर था तो दूसरी ओर सोनू का,

कुछ ही पलों में पूरा घर दीवार पर से झांक कर सोनू के घर में देख रहा था, सोनू के पापा और उसकी मम्मी लड़ रहे थे,

कुसुम: ले आज ये फिर पी कर आए होंगे और कर दिया क्लेश शुरू,

सुमन: हां जीजी अब इनका बढ़ता ही जा रहा है,

अनामिका: अरे देखो, मम्मी और ताई, वो डंडे से मारने जा रहे हैं,

कुसुम: ए कम्मू, भाग कर अपने दाऊ या पापा को बुला नहीं तो ये आज कुछ गलत कर देंगे।

सुमन: बेचारी रजनी जीजी, कितना कुछ सहना पड़ता है उन्हें।

कुसुम: अब हम भी क्या करें पियक्कड़ शराबी के मुंह लग कर अपनी इज्ज़त और डूबा बैठो।

मंजू: अरे मम्मी वो तो अच्छा है अभी दोनों लड़कियां और बड़ा लड़का नहीं है नहीं तो बेचारे परेशान होते।

कुसुम: पर ये सोनू भी नहीं दिख रहा,

सोनू घर में घुसकर जैसे ही देखता है अपने पापा को अपनी मम्मी पर हाथ उठाते हुए वो बीच में आकर हाथ पकड़ लेता है जिससे उसके पापा दिलीप को और गुस्सा आ जाता है, रजनी लगातार रोए जा रही थी,

दिलीप: तू, तेरी इतनी हिम्मत हो गई अपने बाप का हाथ पकड़ता है, आज तेरी खैर नहीं,

ये कहकर दिलीप उसके गाल पर तमाचा मार देता है, और डंडा उठा कर उसे मारने को बढ़ता है तो रजनी अपने बेटे को बचाने के लिए आगे आ जाती है

रजनी: नहीं उसे मत मारो,छोड़ो उसे माफ करदो,

दिलीप: हट साली रांड,

ये कहकर दिलीप उसे धक्का देता है साथ ही दिलीप के पैरों के नीचे रजनी की साड़ी का पल्लू फंस जाता है, और वो पीछे की ओर गिरती है साथ ही उसकी साड़ी भी खुल जाती है उसका बदन अब पेटीकोट और ब्लाउज में सबके सामने होता है।






दिलीप फिर से सोनू को मारने के लिए आगे बढ़ता है और जैसे ही डंडा उठाता है फूल सिंह उसे पकड़ लेते हैं साथ में अजीत भी दोनों जबरदस्ती उसे पकड़ कर घर से बाहर खींच लेजाते हैं, दिलीप चिल्लाता हुआ जाता है, छोड़ो मुझे आज इस पिल्ले को मार ही डालूंगा, मेरा हाथ पकड़ता है।

दिलीप के बाहर जाते ही कुसुम, सुमन और झुमरी वगैरा रजनी के पास आ जाती हैं, रजनी सोनू को सीने से लगा कर रो रही थी, सोनू को भी अपनी ना मां के सीने से लग कर अच्छा लग रहा था, कम्मू और मन्नू वहीं खड़े थे और अपने दोस्त की मां को इस तरह देख कर, रजनी चाची के गदराए बदन को पेटिकोट और ब्लाउज में देख उन्हें थोड़ा अलग सा लग रहा था, जवान ही रहे थे तो ये स्वाभाविक ही था।

कुसुम और बाकी औरतों ने फिर रजनी को संभाला और उसे अंदर ले गई वहीं कम्मू और मन्नू सोनू को लेकर छत पर चढ़ गए।

इधर गांव के बाहर, नीलेश(गांव का जमींदार)अपने खेतों के बीच बने एक छोटे से मकान में एक मजदूर औरत के साथ था। वह औरत, कमला, अपनी बेटी की शादी के लिए कर्ज़ा मांगने आई थी। नीलेश ने कर्ज़े के बदले उससे शारीरिक संबंध की मांग की। कमला मजबूर थी—उसकी बेटी की शादी दांव पर थी। नीलेश ने उसे मकान में ले जाकर जमीन पर लिटाया। उसकी साड़ी खोल दी, ब्लाउज और पेटीकोट भी उतार दिए। कमला ने विरोध करने की कोशिश की, लेकिन नीलेश के आगे उसकी एक न चली। नीलेश ने उसकी मजबूरी का फायदा उठाया और अपनी हवस पूरी की।






कमला की आंखों से आंसू बह रहे थे, लेकिन वह चुपचाप सब सहती रही। बाद में नीलेश ने उसे कर्ज़ा देने का वादा किया और कमला अपने कपड़े समेटकर वहां से चली गई।

गांव के एक कोने में खड़ी थी सोमपाल की विशाल हवेली, जो पूरे सज्जनपुर पर अपनी हुकूमत चलाती थी। इस हवेली का रौब ऐसा था कि कोई भी इसके सामने आंख उठाकर बात नहीं करता था।






जमींदार का परिवार

सोमपाल, 56 वर्ष के, हवेली के मुखिया थे। उनका बदन अभी भी चुस्त-दुरुस्त था, और चेहरे पर रौबदार तेज झलकता था। लंबा कद, चौड़ा सीना, और घनी मूंछें—सोमपाल की मौजूदगी ही गांव को खामोश कर देती थी। उनके पास जमीन की कोई कमी नहीं थी; गांव के आधे से ज्यादा खेत उनके नाम थे। मगर सोमपाल का रंगीन मिजाज गांव में चर्चा का विषय था। उनकी नजरें हर खूबसूरत औरत पर ठहरती थीं उनकी हवस भरी मुस्कान और बातों का अंदाज औरतों को असहज कर देता था, मगर कोई उनके सामने बोलने की हिम्मत नहीं करता था।

सोमपाल का बेटा नीलेश, 40 वर्ष का, अपने पिता की कार्बन कॉपी था। लंबा, गठीला बदन, और रंगीन मिजाज। वह खेतों की देखभाल करता, मगर उसका ज्यादा समय गांव की गलियों में घोड़े पर सवार होकर, औरतों पर नजरें गड़ाकर, या ताश के अड्डों पर बीतता था।

नीलेश की पत्नी सरोज, 38 वर्ष की, एक मादक औरत थी। उसका गोरा रंग, भरा हुआ बदन, और कामुक अंदाज हवेली की शोभा बढ़ाता था। उसकी मोटी चूचियां, गहरी नाभि, और थिरकते चूतड़ साड़ी में तने हुए साफ दिखते थे। सरोज का बिंदास अंदाज और हंसी हवेली के नौकरों से लेकर गांव के मर्दों तक की नजरें खींचती थी। वह अपने पति की हरकतों को जानती थी, मगर खुद भी जवानी के मजे लेने में पीछे नहीं थी।






नीलेश और सरोज के दो बेटे थे—कर्मा, 19 वर्ष का, और अनुज, 18 वर्ष का। दोनों अपने दादा और पिता के रंग में रंगे थे। कर्मा का काला रंग, गठीला बदन, और शरारती आंखें उसे गांव के लड़कों में अलग बनाती थीं। वह क्रिकेट के मैदान में कम्मू, मन्नू, और सोनू के साथ खेलता, मगर उसकी नजरें अनामिका, अंजू, बिंदिया, और नेहा पर टिकी रहती थीं। अनुज, गोरा और थोड़ा पतला, मगर जवानी की गर्मी से भरा था। उसकी चिकनी बातें और हंसी लड़कियों को लुभाती थी, और वह अपनी उम्र से ज्यादा समझदार दिखता था। दोनों भाई हवेली के रौब का फायदा उठाते, और गांव की गलियों में उनकी दबंगई चलती थी।

ये था गांव के जमींदार का परिचय जो लगभग पूरे गांव को ही अपने काबू में रखता था।
 
अध्याय तीन

गर्मी की एक तपती दोपहर थी। सज्जनपुर गांव में सूरज आसमान से आग बरसा रहा था, और हवा में धूल और गर्मी का मिश्रण ऐसा था कि सांस लेना भी मुश्किल हो रहा था। रजनी अपने छोटे से मिट्टी के घर में खाना बनाने की तैयारी कर रही थी। उसने अलमारी के ऊपर रखी पुरानी टिन की डिबिया को खोला, जिसमें वह अपने परिवार की थोड़ी-बहुत बचत रखती थी। लेकिन जैसे ही उसने डिबिया खोली, उसका दिल धक् से रह गया। डिबिया खाली थी—एक भी पैसा नहीं बचा था।

रजनी को तुरंत समझ आ गया कि यह दिलीप की करतूत है। उसका पति, जो पहले भी कई बार घर से पैसे चुरा चुका था, इस बार हद पार कर गया था। उसने सारी जमा-पूंजी ले ली थी—वही पैसे जो रजनी ने बच्चों की स्कूल फीस और रोज़मर्रा के खर्चों के लिए बड़े जतन से बचाए थे। दिलीप को जुआ और दारू की ऐसी लत थी कि वह अपने परिवार की भूख और जरूरतों को भूल चुका था। रजनी को पता था कि वह अभी किसी गंदी शराबखाने में बैठा होगा, या फिर जुए के अड्डे पर सारे पैसे हार रहा होगा।उसके हाथ कांपने लगे। वह डिबिया को वैसे ही खुला छोड़कर मिट्टी के फर्श पर बैठ गई। उसकी आंखों में आंसू छलक आए, और गला रुंध गया। "यह आदमी हमें भूखा मार डालेगा," वह बड़बड़ाई। उसने अपने बच्चों के बारे में सोचा—सोनू और उसकी दो बड़ी बहनें, जो अभी स्कूल से नहीं लौटी थीं। उनके लिए आज रोटी का इंतज़ाम कैसे होगा? घर में चावल का एक दाना तक नहीं बचा था, और बाजार से उधार लेने की उसकी हिम्मत भी जवाब दे चुकी थी।

रजनी ने खुद को संभाला और बाहर आंगन में कदम रखा। उसने सोनू को पुकारा, जो अपने दोस्तों के साथ गली में खेल रहा था। "सोनू! इधर आ, बेटा!"सोनू दौड़ता हुआ आया। उसका मासूम चेहरा पसीने से चमक रहा था। "क्या हुआ, अम्मा?" उसने मां की परेशान शक्ल देखकर पूछा।

रजनी ने अपने बेटे को देखा और एक पल के लिए हिचकिचाई। उसे नहीं चाहती थी कि इतनी छोटी उम्र में सोनू इन मुसीबतों को समझे, लेकिन अब छिपाने का वक्त नहीं था। "सोनू, तुम्हारे पापा ने घर के सारे पैसे चुरा लिए। अब हमारे पास खाने को कुछ नहीं है। हमें हवेली जाना होगा, नीलेश साहब से कर्जा मांगने।"सोनू की आंखें फैल गईं। वह जानता था कि हवेली का नाम सिर्फ मजबूरी में लिया जाता है। नीलेश गांव का जमींदार था, जिसके पास पैसा तो बहुत था, लेकिन उसकी शर्तें हमेशा भारी पड़ती थीं। फिर भी, उसने अपनी मां का हाथ थाम लिया और बोला, "ठीक है, अम्मा। मैं आपके साथ चलूंगा।

दोपहर की चिलचिलाती धूप में मां-बेटे हवेली की ओर चल पड़े। रास्ते में धूल उड़ रही थी, और पसीने से उनकी सस्ती सूती कपड़े भीग गए थे। रजनी की फटी साड़ी उसकी मजबूरी को बयां कर रही थी, और सोनू का चेहरा चिंता से भरा हुआ था। हवेली गांव के बाहर थी, और जब वे वहां पहुंचे, तो ऊंचे लोहे के फाटक और पत्थर की दीवारें देखकर रजनी का दिल और सिकुड़ गया। यह जगह उसके छोटे से घर से बिल्कुल उलट थी—शानदार, ठंडी, और ऐसी, जहां गरीबों का आना आसान नहीं था।नौकर ने उन्हें अंदर बुलाया और एक छोटे से कमरे में इंतज़ार करने को कहा। वहां बैठे-बैठे रजनी का मन बार-बार अपने फैसले पर शक कर रहा था। लेकिन फिर उसने सोनू की ओर देखा, जो चुपचाप उसका हाथ थामे बैठा था, और उसे याद आया कि उसके पास और कोई रास्ता नहीं है।

कुछ देर बाद उन्हें मुख्य हॉल में ले जाया गया। नीलेश एक बड़ी, नक्काशीदार कुर्सी पर बैठा था। उसकी साफ-सुथरी धोती-कुर्ता और माथे पर तिलक उसे एक सम्मानित आदमी का रूप दे रहा था, लेकिन उसकी आंखों में कुछ ऐसा था जो रजनी को बेचैन कर रहा था।

रजनी ने हाथ जोड़े और कांपती आवाज़ में कहा, "नमस्ते, साहब। मैं रजनी हूँ, दिलीप की बीवी। आपके पास मदद मांगने आई हूँ।"नीलेश ने उसे सिर से पांव तक देखा और शांत स्वर में बोला, "बोलो, रजनी। क्या परेशानी है?"रजनी की आंखों में आंसू आ गए, लेकिन उसने हिम्मत जुटाकर कहा, "साहब, मेरे मरद ने घर के सारे पैसे चुरा लिए और जुए-दारू में उड़ा दिए। मेरे पास बच्चों को खिलाने के लिए एक दाना तक नहीं बचा। मैं आपसे थोड़े पैसे उधार मांगने आई हूँ, जब तक मैं कोई काम-धंधा नहीं ढूंढ लेती।

नीलेश ने उसकी बात ध्यान से सुनी। उसने अपना सिर हिलाया और नरम स्वर में कहा, "यह तो बहुत बुरा हुआ, रजनी। दिलीप ने तुम्हें बड़ी मुश्किल में डाल दिया। लेकिन हमारे गांव में तो एक-दूसरे की मदद करनी ही चाहिए। मैं तुम्हारी मदद करूंगा।"रजनी के चेहरे पर एक पल के लिए राहत की किरण दिखी। उसने हाथ जोड़कर कहा, "बहुत-बहुत धन्यवाद, साहब। मैं हर पैसा चुका दूंगी, जितनी जल्दी हो सके।"नीलेश ने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा, "अरे, इसमें धन्यवाद की क्या बात है? लेकिन एक बात समझ लो, रजनी। कर्जा तो कर्जा होता है। इस पर ब्याज लगेगा। यह तो नीयत की बात है, कि मैं कुछ दूं तो कुछ वापस भी आए।"रजनी का दिल फिर से डूब गया। ब्याज का नाम सुनते ही उसे आने वाले दिनों की चिंता सताने लगी। लेकिन उसकी मजबूरी ऐसी थी कि वह इनकार नहीं कर सकती थी। उसने सिर झुकाकर कहा, "जी, साहब। जो भी शर्त होगी, मैं मान लूंगी। बस अभी मेरे बच्चों की भूख मिट जाए।"नीलेश ने संतुष्ट होकर सिर हिलाया। उसने अपने नौकर को इशारा किया, और एक छोटी सी थैली में कुछ नोट लाए गए। उसने थैली रजनी की ओर बढ़ाई और कहा, "लो, यह रखो। समझदारी से खर्च करना, और चुकाने की बात बाद में तय करेंगे।"रजनी ने कांपते हाथों से थैली ली। उसकी आंखों में आभार था, लेकिन मन में एक अजीब सी घबराहट भी। उसने फिर से हाथ जोड़े और कहा, "साहब, आपका यह एहसान मैं कभी नहीं भूलूंगी।

रजनी और सोनू जब जाने लगे, तो नीलेश की नजरें उन पर टिकी रहीं। रजनी की पुरानी साड़ी उसके पसीने से तर शरीर से चिपक गई थी, और जैसे ही वह मुड़ी, उसके कदमों के साथ उसके नितंबों की हल्की सी थिरकन दिखी। नीलेश की आंखों में एक चमक आई, और उसके होंठों पर एक शरारती मुस्कान खेल गई। यह मुस्कान ऐसी थी, जैसे वह कोई गुप्त योजना बना रहा हो। उसने कुछ नहीं कहा, बस चुपचाप उन्हें जाते हुए देखता रहा।

रजनी और सोनू धूल भरे रास्ते से घर की ओर लौट पड़े। थैली में पैसे थे, लेकिन रजनी के मन में शांति नहीं थी। उसे पता था कि यह कर्जा उसकी मुश्किलों को हल करने की बजाय शायद और बढ़ा देगा। लेकिन अभी के लिए, उसके पास अपने बच्चों को भूखा न देखने का एक रास्ता था, और फिलहाल वही काफी था।

गांव में शाम की ठंडी हवा बहने लगी थी। गंगा किनारे के खेतों में किसानों की थकान अब घरों की ओर लौट रही थी। उसी वक्त तेजपाल अपने रिश्तेदारी के दौरे से वापस लौटे। उनके चेहरे पर एक संतुष्ट मुस्कान थी, और हाथ में एक पुराना लकड़ी का बक्सा था जिसमें कुछ मिठाइयां और रिश्तेदारी से लाए उपहार थे। उनके उनके कदमों की रफ्तार से ज्ञात हो रहा था वो थोड़े थके हुए थे।

घर पहुंचते ही तेजपाल ने अपने परिवार को आंगन में बुलाया। झुमरी ने जल्दी से चूल्हे पर चाय बनाई, और सारा परिवार खटिया पर बैठ गया। तेजपाल ने अपनी पुरानी पगड़ी ठीक की और गर्व से बोले, "बच्चों, आज मैं एक अच्छी खबर लेकर आया हूँ। रिश्तेदारी में गया था, और वहाँ मेरी नजर पड़ी एक अच्छे घर के लड़के पर—बिंदिया के लिए।"रत्नाकर ने उत्सुकता से पूछा, "पिताजी, ये तो बड़ी अच्छी बात है, अब उमर हो गई है बिंदिया की, लड़का कैसा है? उसका परिवार ठीक-ठाक है ना?"

तेजपाल ने सिर हिलाया और बोले, "हाँ, बेटा। वह लड़का गाँव के पास के ही एक सेठ के यहाँ काम करता है—नाम है अनिल, उम्र कोई बाईस-तेईस साल होगी। गोरा-चिट्टा, मेहनती, और लड़के का बाप एक छोटा-सा दुकान चलाता है। माँ-बाप दोनों जिंदा हैं, और घर में एक छोटी बहन भी है। लड़के का स्वभाव सीधा-सादा है।

झुमरी ने मुस्कुराते हुए कहा, "वाह, ससुर जी! यह तो अच्छी बात है। बिंदिया भी अब बड़ी हो गई है, उसकी शादी का वक्त आ गया है।" बिंदिया, जो पास ही खड़ी थी, शर्म से लाल हो गई और अपनी साड़ी का पल्लू मुंह पर खींच लिया। मन्नू ने मज़ाक में कहा, "अरे दीदी, अब तो तुम ज़्यादा दिन मुझे डांट नहीं पाओगी!" परिवार में हल्की हंसी गूंजी, और तेजपाल ने मन्नू को डांटते हुए कहा, "चुप कर, शरारती! क्यों चिढ़ा रहा है हमारी गुड़िया रानी को।

इधर, रजनी के घर का माहौल उलटा था। उसकी दोनों बेटियाँ—नेहा और मनीषा—स्कूल से लौट चुकी थीं, और बड़ा बेटा विक्रम भी फैक्ट्री से घर आ चुका था। सबकी आंखों में चिंता थी, क्योंकि दिलीप की हरकतों ने घर को तबाह कर दिया था। रजनी ने थैली से नीलेश से लिए पैसे निकाले और बच्चों को दिखाए। "यह पैसे नीलेश साहब ने दिए हैं, लेकिन इन पर ब्याज लगेगा। हमें इसे चुकाना होगा, वरना और मुसीबत में पड़ जाएंगे।"विक्रम ने गुस्से से मुट्ठी बांध ली और बोला, "अम्मा, पापा की वजह से यह सब हो रहा है। मैं फैक्ट्री में ओवरटाइम करूंगा, और नेहा दीदी भी कहीं सिलाई का काम ढूंढ लें। सोनू, तू स्कूल के बाद खेतों में मदद कर लेना।" नेहा ने सहमति में सिर हिलाया, "हाँ, मैं माँ की मदद के लिए कुछ करूंगी। लेकिन पापा को कुछ करना चाहिए, वह तो बस बर्बाद कर रहे हैं।" मनीषा, जो छोटी थी, चुपचाप रो रही थी। सोनू ने अपनी बहनों का हाथ थामते हुए कहा, "हम सब मिलकर यह कर्जा चुकाएंगे। पापा को सुधारने की कोशिश भी करेंगे।

रजनी की आंखों में आंसू थे, लेकिन बच्चों की हिम्मत देखकर उसे थोड़ा सुकून मिला। उसने कहा, "बच्चों, तुम सब मेरी ताकत हो। मैं भी कोई छोटा-मोटा काम ढूंढूंगी। बस, इस मुसीबत से निकलना है।" परिवार ने एक-दूसरे का हौसला बढ़ाया और योजना बनाई कि वे मिलकर नीलेश के कर्जे को चुकाने के लिए मेहनत करेंगे।

घर-घर में अलग-अलग कहानियाँ जीवंत थीं—कहीं उत्साह था, कहीं टकराव, और कहीं नई मुसीबतें सिर उठा रही थीं।

फूल सिंह के घर में इन दिनों एक अलग ही रौनक थी। उनके बड़े लड़के धीरज का विवाह का समय पास आ रहा था, और पूरे परिवार में उत्साह का माहौल था। फूल सिंह और अजीत आंगन में खटिया पर बैठे थे, हाथ में चाय के कप लिए, और आगे की योजना बना रहे थे। खेतों से लौटते हुए धूप में पसीने से तर उनके चेहरे पर संतोष था। फूल सिंह ने अपनी पगड़ी ठीक करते हुए कहा, "अजीत, ये फसल कट जाए तो जो पैसा आएगा, उससे धीरज का ब्याह की सारी तैयारियाँ हो जाएँगी। दुल्हन के लिए साड़ी, मेहमानों के लिए खाना, और कुछ पैसे बचाकर घर की मरम्मत भी कर लेंगे।"अजीत ने सिर हिलाया और बोला, "हाँ भैया, सारी उम्मीद फसल से ही है। वैसे भी इस बार फसल अच्छी लग रही है—धान के पौधे हरे-भरे हैं, और बारिश भी समय पर हुई। बस, कटाई सही से हो जाए, तो हमारा काम बन जाएगा।

फूल सिंह ने मुस्कुराते हुए कहा, "हाँ, भगवान की कृपा रही तो सब ठीक होगा। कुसुम और सुमन को भी कह दो कि मेहंदी और चूड़ियाँ की तैयारी शुरू कर दें।" अजीत हँसते हुए बोला, "भैया, औरतें तो पहले से ही उत्साहित हैं। कुसुम तो कह रही थी कि धीरज की दुल्हन को सौंदर्य का ऐसा तोहफा देना है कि पूरा गांव तारीफ करे!

घर में कुसुम और सुमन पहले से ही मेहंदी के डिज़ाइन और दुल्हन के लिए सजावट की बातें कर रही थीं। कुसुम ने जोश में कहा, "सुमन, इस बार धीरज की शादी में ऐसा जश्न मनाएँगे कि गांव की सारी औरतें जलेंगी!" सुमन हँसते हुए बोली, "हाँ जीजी, लेकिन पहले फसल कटे, और सब कुछ अच्छे से हो जाए।

कुसुम: अरे सब अच्छे से होगा।

गांव के मैदान में क्रिकेट का मैच चल रहा था, जो हमेशा की तरह कम्मू, मन्नू, और सोनू की दोस्ती का केंद्र था। लेकिन इस बार माहौल गरमा गया। कर्मा, नीलेश का बेटा, मैदान में अपनी दबंगई दिखाने आया था। बल्लेबाज़ी के दौरान कम्मू ने उसकी विकेट उड़ा दी, और कर्मा को यह नागवार गुजरा। कर्मा ने गुस्से में चिल्लाया, "अरे भेंचो, इतनी तेज गेंद कहाँ से सीखी? अगली बार मिल छक्का मारकर तेरी गांड फाड़ दूंगा!

कम्मू ने हँसते हुए ताना मारा, "अरे कर्मा, तू तो बस भौंकता है, खेलना नहीं आता।

कर्मा: साले अपनी औकात में रह कर बात कर नहीं तो तुम सब की बहन यहीं चोद दूंगा।

यह सुनकर मन्नू भड़क गया और बोला, "कर्मा, तू अपनी हवेली की हेकड़ी यहाँ मत दिखा, ये तेरे बाप की हवेली नहीं है।

कर्मा का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। उसने मन्नू की ओर कदम बढ़ाया और कहा, "साला, तेरी इतनी हिम्मत? आज तेरी खबर लेता हूँ!" दोनों एक-दूसरे की ओर लपके, और झड़प शुरू हो गई। कम्मू भी बीच में कूद पड़ा, और तीनों एक-दूसरे को धक्का-मुक्की करने लगे।

सोनू और बाकी लड़कों ने दौड़कर बीच-बचाव किया। सोनू ने चिल्लाकर कहा, "अरे भाई, रुक जाओ! यहाँ लड़ाई से क्या होगा? खेल खेल की लड़ाई में, अब एक-दूसरे को मारोगे क्या?" बाकी लड़कों ने भी उन्हें अलग किया, लेकिन माहौल में तनाव बना रहा। कर्मा ने गुस्से से कहा, "ये गाँव के कुत्ते अपनी औकात भूल गए हैं। याद दिलानी पड़ेगी

कम्मू ने जवाब दिया, "जा, अपनी हवेली में जाकर सो जा, चुप चाप।

सोनू ने कम्मू को खींचते हुए कहा, "चुप कर, भाई। अब घर चल, वरना और बवाल होगा।

रजनी का परिवार धीरे-धीरे मेहनत से नीलेश के कर्जे को चुकाने की कोशिश कर रहा था। विक्रम फैक्ट्री में ओवरटाइम करता, नेहा सिलाई का काम ढूंढ रही थी, और सोनू स्कूल के बाद खेतों में मदद करता था। रजनी भी पड़ोसियों से छोटा-मोटा काम लेती थी। लेकिन एक दिन अचानक मुसीबत ने फिर दस्तक दी। विक्रम फैक्ट्री से उदास चेहरे के साथ घर लौटा। उसने रजनी को बताया, "अम्मा, फैक्ट्री में चोरी का इल्ज़ाम लगा दिया गया है। मालिक कह रहा है कि मैंने मशीन के पार्ट चुराए, जो सच नहीं है!

रजनी का चेहरा पीला पड़ गया। "यह कैसे हो सकता है, बेटा? तू तो ईमानदारी से काम करता है!" विक्रम ने आंसुओं को रोकते हुए कहा, "मालिक कह रहा है, या तो पच्चीस हज़ार रुपये दो, वरना पुलिस में डलवा देगा। मैंने तो कुछ नहीं किया, अम्मा!" नेहा और मनीषा भी रोने लगीं। सोनू ने गुस्से में मुट्ठी बांध ली और बोला, "ये गंदी साजिश है। कोई और ने चोरी की होगी, और मुझ पर ठीकरा फोड़ दिया!"रजनी का दिमाग चकरा गया। नीलेश का कर्जा अभी पूरा नहीं चुकाया गया था, और अब यह नई मुसीबत। उसके पास और कोई रास्ता नहीं बचा था। उसने सोनू को बुलाया और कहा, "बेटा, हमें फिर से हवेली जाना होगा। नीलेश साहब से मदद मांगनी पड़ेगी।" सोनू ने हिचकते हुए कहा, "अम्मा, वो तो पहले ही हम पर कर्जा लाद चुका है। फिर भी, चलो, कोशिश करते हैं।

रजनी और सोनू फिर से हवेली के फाटक पर खड़े थे। नौकर ने उन्हें अंदर बुलाया, और नीलेश ने अपने उसी रौबदार अंदाज में उनका स्वागत किया। रजनी ने सारी बात बताई—विक्रम पर इल्ज़ाम, मालिक की धमकी, और उनकी बेबसी। नीलेश ने गहरी सांस ली और बोला, "अरे रजनी, यह तो बहुत बुरा हुआ। तुम चिंता मत करो, मैं तुम्हारी मदद करूँगा। पच्चीस हज़ार देकर इस मामले को सुलझा दूँगा।"रजनी ने राहत की सांस ली, लेकिन नीलेश ने बात को आगे बढ़ाया। "लेकिन रजनी, यह पैसा तुम वापस कैसे लोगे? तुम्हारे पास तो पहले से ही मेरा कर्जा है।" रजनी ने सिर झुकाकर कहा, "साहब, मैं मेहनत करके चुकाऊँगी। बस, मेरे बेटे को बचा लीजिए।" नीलेश ने एक शरारती मुस्कान के साथ कहा, "ठीक है, लेकिन मेरे पास एक उपाय है। तुम और तुम्हारा छोटा बेटा सोनू मेरी हवेली में काम करने लगो। मैं तुम्हें मज़दूरी दूँगा, और धीरे-धीरे तुम्हारा कर्जा भी उतर जाएगा।"रजनी का मन कांप गया। हवेली में काम करने का मतलब था नीलेश की नजरों के सामने रहना, जिसकी नीयत उसने पहले ही भांप ली थी। लेकिन विक्रम की रिहाई के लिए उसके पास और कोई चारा नहीं था। उसने सिर हिलाया और कहा, "जी साहब, जैसा आप कहें।" नीलेश ने नौकर को पैसे की थैली लाने का इशारा किया और रजनी को थैली थमा दी।

जब रजनी और सोनू हवेली से बाहर निकले, नीलेश की नजरें फिर से रजनी के बदन पर टिक गईं। उसकी साड़ी पसीने से चिपकी थी, और उसके नितंबों की थिरकन उसे और आकर्षक बना रही थी। नीलेश के चेहरे पर वह शरारती मुस्कान फिर खिल गई, जैसे वह अपनी जीत का जश्न मना रहा हो। रजनी ने यह महसूस किया, लेकिन उसकी मजबूरी ने उसे चुप रहने को मजबूर कर दिया।
 
अध्याय चार

सूरज की पहली किरणें नदी के किनारे पड़ रही थीं, और सज्जनपुर गांव में सुबह की चहल-पहल शुरू हो चुकी थी। रजनी ने नीलेश को दिए पैसे विक्रम तक पहुँचाए, और फैक्ट्री मालिक को देकर उसने अपने बेटे की जान बचा ली।

अगले दिन से ही रजनी और सोनू हवेली की ओर चल पड़े। रजनी का मन भारी था, लेकिन मजबूरी ने उसे यह रास्ता चुनने पर मजबूर किया था।

हवेली पहुँचते ही सोनू को माली के साथ बगीचे में लगा दिया गया। वह घास काटने और पौधों को पानी देने में जुट गया, जबकि रजनी को हवेली के अंदर काम सौंपा गया। सरोज, नीलेश की पत्नी, उससे मिलनसार थी। सुबह का नाश्ता तैयार करने में उसने रजनी की मदद की और मुस्कुराते हुए कहा, "रजनी, अच्छे से काम करो, सब ठीक हो जाएगा।" रजनी को सरोज का व्यवहार अच्छा लगा, लेकिन उसकी नजरें हमेशा हवेली के मर्दों—नीलेश, सोमपाल, कर्मा, और अनुज—की ओर चली जाती थीं, जो उसके बदन को ललचाई निगाहों से देखते थे। यह एहसास उसे अंदर तक बेचैन करता था।

दो-चार दिन ऐसे ही बीत गए। एक सुबह रजनी और सोनू फिर हवेली पहुँचे। सोनू बगीचे में माली के साथ काम में जुट गया, और रजनी हवेली के आंगन में पहुँची। वहाँ सोमपाल चाय की प्याली लिए बैठे थे, उनकी पगड़ी और कुर्ता उनकी शान को दर्शा रहे थे। रजनी को देखते ही सोमपाल ने आवाज़ लगाई, "अरे सुन, तू दिलीप की औरत है न?"रजनी ने अपने पल्लू को सिर पर डालते हुए शर्माते हुए कहा, "जी बाबूजी।"

सोमपाल ने उसे पास बुलाया, "आ इधर बैठ। सुना है तेरे परिवार के बारे में—दिलीप ने खुद का जीवन तो बिगाड़ा ही, तेरी और बच्चों की जिंदगी भी बर्बाद कर दी।" उनकी बातों में सहानुभूति थी, जो रजनी के मन को थोड़ा हल्का कर गई। उसकी आँखें नम हो आईं, और वह बोली, "अब क्या बताऊँ बाबूजी, बहुत दुखी हूँ।

सोमपाल ने सिर हिलाया और बोले, "अरे परेशान मत हो। अब तो तू हवेली में आ गई है। यहाँ मन लगाकर काम कर, सबकी सेवा कर—जल्दी ही तेरा कर्जा भी उतर जाएगा।" यह कहते हुए उन्होंने अपनी मोटी उंगली से रजनी की पीठ पर हल्का सा हाथ फेरा, जो उसकी त्वचा पर एक अजीब सनसनी छोड़ गया। रजनी ने सिर झुकाकर कहा, "जी बाबूजी, जैसा आप कहेंगे वैसा ही करूँगी।"सोमपाल ने एक चालाक मुस्कान के साथ कहा, "अच्छा, अभी एक काम कर। थोड़ा सरसों का तेल लेकर आ, और मेरे पैरों में दो दिन से दर्द है—मालिश कर दे। ऐसा कर, तेल लेकर छत पर आ जा, वहाँ आराम से कर देना।

रजनी को यह बात सामान्य लगी, और सोचकर कि सोमपाल इतने बड़े आदमी हैं, शायद उनकी मदद करना उसका फर्ज है, वह तुरंत रसोई की ओर चल दी। उसका मन अब भी हल्का था, क्योंकि उसे लग रहा था कि हवेली के लोग उतने बुरे नहीं हैं जितना वह सोचती थी।रजनी तेल की छोटी कटोरी लेकर छत पर पहुँची। लेकिन जैसे ही उसने सोमपाल को देखा, उसका कदम ठिठक गया। सोमपाल ने अपना कुर्ता उतार दिया था, उनका कसा हुआ बदन ऊपर से नंगा था, और धोती को उन्होंने जांघों तक चढ़ा लिया था। उनकी छाती पर घने बाल थे, और उनकी आँखें रजनी को घूर रही थीं। सोमपाल ने उसे बुलाया, "आ गई, आ जा—ले कर दे मालिश।

रजनी सकुचाई, लेकिन मजबूरी ने उसे आगे बढ़ने को मजबूर किया। उसने कटोरी नीचे रखी और सोमपाल के पैरों के पास घुटनों के बल बैठ गई। उसने थोड़ा तेल अपनी हथेलियों पर लिया और सोमपाल के पैरों पर मलना शुरू किया।






सोमपाल की मोटी टांगें और उनके पैरों की गर्मी रजनी को असहज कर रही थी, लेकिन वह चुपचाप काम करती रही। सोमपाल ने आँखें बंद कीं और बोले, "अरे, थोड़ा और जोर से कर—दर्द तो अभी भी है।"रजनी ने हल्का दबाव बढ़ाया। तभी सोमपाल ने अपनी एक टांग को थोड़ा सा हिलाया, और उसका पैर रजनी की जांघ से टकरा गया। रजनी चौंकी, लेकिन कुछ न बोली। सोमपाल ने हल्के से हँसते हुए कहा, "अरे, डरती क्यों हो? मालिश करो, मैं तो अब बूढ़ा हो गया हूँ।" लेकिन उनकी आवाज़ में एक चालाकी थी। उन्होंने धीरे से अपनी टांग को और पास लाया, और उनकी उंगलियाँ रजनी की कलाई को छू गईं। रजनी का शरीर सख्त हो गया, लेकिन वह सोच रही थी कि यह शायद अनजाने में हो रहा है।

मालिश के दौरान सोमपाल की साँसें भारी होने लगीं। उन्होंने अपनी आँखें खोली और रजनी की ओर देखा, जो सिर झुकाए काम कर रही थी। उन्होंने अपनी एक हाथ को रजनी की पीठ पर फिराया और बोले, "तेरी तो मेहनत देखकर लगता है तू बहुत अच्छी औरत है। दिलीप को ऐसी बीवी मिली, और उसने इसे बर्बाद कर दिया।" उनकी उंगलियाँ धीरे-धीरे रजनी की कमर की ओर सरकने लगीं, लेकिन रजनी ने तुरंत हाथ हटा लिया और बोली, "बाबूजी, बस इतना ही हो गया, अब और दर्द नहीं होगा।

सोमपाल हँसे और बोले, "ठीक है, जा अब—लेकिन कल फिर आना, पैरों का दर्द इतनी जल्दी नहीं जाने वाला है।

रजनी ने सिर झुकाया और कटोरी लेकर नीचे उतर गई, लेकिन उसके मन में एक अजीब सा डर और शक जाग उठा था।

इधर, हवेली के पीछे के कमरे में कर्मा और अनुज बैठे थे। क्रिकेट के मैदान में हुई झड़प का गुस्सा अभी भी उनके मन में था। कर्मा ने जोर से मुट्ठी पटकी और बोला, "साले कम्मू और मन्नू बहुत बोलने लगे हैं! इनकी औकात दिखानी पड़ेगी, वरना ये गाँव के कुत्ते हमारी हवेली का रौब भूल जाएँगे।"अनुज ने एक बाल हवा में उछालते हुए पूछा, "पर भैया, करोगे क्या?

कर्मा की आँखों में शैतानी चमक आई। उसने हँसते हुए कहा, "इनकी बहन नहीं चोदी, तो मेरा नाम भी कर्मा नहीं। अनामिका और बिंदिया दोनों को अपने नीचे लिटा कर ही मजा आएगा मुझे।इनकी इज़्ज़त की धज्जियाँ उड़ा दूंगा!

अनुज हँस पड़ा और बोला, "भैया, सही कहा। इन गाँव वालों को तो हमारा असली रौब दिखाना ही पड़ेगा।"दोनों भाइयों ने एक-दूसरे को देखा और साजिश की योजना बनानी शुरू कर दी।

लेकिन वह जोश में नहीं, बल्कि होश से काम ले रहा था। उसने सोचा कि सीधे टकराव से बेहतर है कि वह धीरे-धीरे मन्नू की बहन बिंदिया को अपने जाल में फंसा ले। उसे धीरे-धीरे तैयार करूँगा, फिर देखना कैसे मेरे पैरों पड़ती है। कर्मा ये सोच कर मुस्कुराने लगा।

इसी बीच, एक दिन रजनी हवेली पहुँची। जैसे ही वह अंदर कदम रखाआ, सरोज ने उसे अपने पास बुलाया। सरोज का चेहरा आज कुछ खास चमक रहा था। उसने मुस्कुराते हुए कहा, "रजनी, सुनो, आज घर में कुछ मेहमान आने वाले हैं। और तुझे मैं कामवाली नहीं, अपनी सहेली समझती हूँ। मैं नहीं चाहती कि मेरी सहेली मेहमानों के सामने ऐसे दिखे। इसीलिए तू ऐसा कर, ये कपड़े बदलकर दूसरे पहन ले।

रजनी ने हिचकते हुए कहा, "पर जीजी, मैं कैसे? ये तो मेरे लिए ठीक नहीं होगा। मेरे पास तो बस यही पुरानी साड़ी है।"

सरोज ने हँसते हुए जवाब दिया, "अब जीजी भी बोलती है और बात भी नहीं मानती? अरे, ये साड़ी और ब्लाउज़ मेरे हैं, तू इसे पहन ले—तुझ पर बहुत जंचेंगे। देख, मेहमानों के सामने हमारी इज़्ज़त का सवाल है। चुपचाप जाकर बदल ले!"

रजनी ने सोचा, "सरोज जीजी का इतना प्यार, फिर मना क्यों करूँ?" उसने सिर झुकाकर कहा, "ठीक है जीजी, जैसी आपकी मर्ज़ी।" सरोज की ज़िद के आगे उसे मानना पड़ा। वैसे भी सरोज का उसे सहेली कहना उसे अच्छा लग रहा था। समानता का एहसास हर किसी को पसंद होता है, और रजनी के मन में भी एक हल्की सी खुशी जगी।

रजनी कमरे में गई और सरोज की साड़ी पहनी। साड़ी लाल रंग की थी, जिसमें सुनहरे धागों का काम था, लेकिन वह बिल्कुल पारदर्शी थी। जैसे ही वह बाहर आई, उसे अजीब महसूस हुआ। साड़ी उसके गोरे पेट और गहरी नाभि को साफ दिखा रही थी। ब्लाउज़, जो सरोज का था, रजनी के लिए छोटा पड़ रहा था। रजनी की छाती उससे बड़ी थी, और इस वजह से उसकी मोटी चूचियों की झलक साफ नजर आ रही थी।








वह शर्माते हुए बोली, "जीजी, ये मुझे बहुत अजीब लग रहा है। ब्लाउज़ भी छोटा है, और साड़ी देखो—आर-पार दिखने वाली। लोग क्या कहेंगे?"सरोज हँस पड़ी और मजाकिया लहजे में बोली, "अरे तू बेकार में परेशान होती है। आजकल यही फैशन है—मैंने भी तो ऐसी ही साड़ी पहनी है। और रही ब्लाउज़ की बात, तो तेरी छातियां मुझसे इतनी बड़ी हैं, क्या करूँ! देख, मेहमानों के सामने ये तेरा रूप देखकर सब तारीफ करेंगे।"

रजनी शर्म से लाल हो गई। उसने साड़ी का पल्लू और कसकर सिर पर खींच लिया, लेकिन सरोज की हंसी और सहज व्यवहार ने उसे चुप करा दिया। वह मुस्कुराने लगी, हालांकि उसके मन में एक डर था कि मेहमानों के सामने यह सब कैसे सहन करेगी। सरोज ने उसे गले लगाया और कहा, "अरे, मेरी प्यारी सहेली, डर मत—मैं तेरे साथ हूँ।"

इधर, कम्मू के घर में धीरज की शादी की तैयारियाँ जोरों पर थीं। फसल की आमदनी का इंतज़ार था, लेकिन कुछ सामान के लिए अजीत और कुसुम शहर जाने की योजना बनाई गई। सुबह की बस पकड़ने के लिए दोनों भाभी और देवर तैयार हुए। अजीत ने अपनी पुरानी धोती-कुर्ता पहनी, और कुसुम ने अपनी रंग-बिरंगी साड़ी सजाई। बस में दोनों एक साथ बैठे, और जैसे ही गाड़ी चल पड़ी, उनके बीच की पुरानी मस्ती शुरू हो गई।अजीत ने कुसुम की ओर देखकर चुटकी ली, "भाभी, आज तो तुम इतनी सजी-धजी हो कि लगता है कोई नया प्रेमी ढूंढने जा रही हो!

कुसुम हँसते हुए जवाब दी, "हाँ, देवर जी, तुम्हारे भैया से ऊब गई हूँ—अब शहर में कोई तगड़ा मर्द ढूंढूँगी जो मेरी मोटी जांघों को संभाल सके!

दोनों हंसने लगे। अजीत ने हल्के से कुसुम की कमर को छुआ और बोला, "तो क्या, मैं तो अभी भी जवान हूँ और दूसरे मर्द को ढूंढने की क्या जरूरत है

रात को सुमन को छोड़कर तुम्हारे पास आ जाऊँ? तुम्हारी गदराई देह तो मुझे बेकरार कर देती है!"

कुसुम ने उसकी उंगली को हल्का सा दबाया और शरारती लहजे में कहा, "हाँ, पर सावधान रहना—मेरी जांघें इतनी मोटी हैं कि तुम्हारा दम निकल जाएगा, देवर जी! वो ये कहकर हंसने लगी। अपनी भाभी को संभालना इतना आसान नहीं है।

बसकी हलचल के बीच उनकी बातें और हल्की-हल्की छुअनें चलती रहीं। अजीत ने कुसुम की साड़ी के पल्लू को थोड़ा खिसकाया और उसकी गदराई कमर पर हाथ फेरा। कुसुम की सांसें थोड़ी तेज हो गईं, और उसने अजीत की ओर देखकर कहा, "देवर जी, यहाँ तो लोग देख रहे हैं—शहर पहुँचकर देखते हैं कि तुम मेरी कमर को और कैसे सहला सकते हो!" अजीत हँस पड़ा और बोला, "भाभी, तुम्हारी ये सिलवटें तो मेरे सपनों में आती हैं—एक दिन तो सुमन को बिना बताए तुम्हें पकड़ लूँगा!" दोनों की आँखों में एक कामुक चमक थी, जो उनकी मजाक को और गहरा बना रही थी।

शहर पहुँचकर उन्होंने शादी के लिए सामान खरीदा—साड़ियाँ, चूड़ियाँ, और कुछ बर्तन। दुकान में अजीत ने कुसुम को एक पारदर्शी साड़ी दिखाई और कहा, "भाभी, ये पहनो तो सारा गांव पागल हो जाए—तुम्हारी नाभि और कमर तो छुपेंगी नहीं!" कुसुम ने हँसते हुए उसकी छाती पर हल्का थप्पड़ मारा और बोली, "देवर जी, शरम करो—लेकिन सच कहूँ तो ये साड़ी पहनकर तुम्हें रात को बुलाऊँगी!" वापसी में भी उनकी बातें और हल्की शरारतें चलती रहीं, लेकिन दोनों जानते थे कि यह सब मजाक की सीमा में ही रहेगा।

गांव अब रात के अंधेरे में डूब चुका था, और हवेली की दीवारों के भीतर एक अलग ही दुनिया जाग उठी थी। सूरज की तपिश अब ठंडी हवा में बदल चुकी थी, लेकिन हवेली के अंदर का माहौल गर्म और उत्तेजित था। रजनी, जो अब हवेली में अपने नए किरदार में ढल रही थी, इस रात के अनजाने मोड़ की ओर बढ़ रही थी।

रजनी, सरोज के कहने पर उसी पारदर्शी साड़ी और छोटे ब्लाउज़ में तैयार हो चुकी थी। साड़ी उसके गोरे पेट और गहरी नाभि को उजागर कर रही थी, जबकि ब्लाउज़ उसकी मोटी चूचियों को दबाकर उनकी दरार को साफ दिखा रहा था। जैसे ही वह हवेली के आंगन में काम में जुटी, सभी की नजरें उस पर टिक गईं।






नौकर-चाकर, मेहमान, और हवेली के मर्द—सब उसकी ओर पलट-पलट कर देख रहे थे। उनकी आँखें उसके पेट की नाभि और ब्लाउज़ से झांकती छाती की दरार को घूर रही थीं। नीलेश और सोमपाल भी कोने में बैठे मुस्कुरा रहे थे, उनकी नजरों में एक चालाक चमक थी।

कुछ ही देर में मेहमान आने लगे—सोमपाल और नीलेश के दोस्त, जो उनके ही रंगीन मिजाज के थे। शानदार कपड़े पहने ये लोग हवेली के आंगन में दाखिल हुए, और जल्दी ही शराब की बोतलें खुल गईं। रजनी, जो खाना परोसने में लगी थी, यह देखकर हैरान रह गई कि मर्दों के साथ-साथ औरतें भी शराब पी रही थीं। यह माहौल उसके लिए बिल्कुल नया था—गाँव की मर्यादा में ऐसा खुलापन उसने कभी नहीं देखा था।रजनी का नया अवतार सबकी आँखें अपनी ओर खींच रहा था, जो उसे थोड़ा अजीब लग रहा था। लेकिन जीवन में पहली बार इस तरह का पहनावा और लोगों का ध्यान उसकी ओर आकर्षित होना उसे कहीं न कहीं अच्छा भी लग रहा था। उसका मन कह रहा था कि यह सब गलत है, लेकिन नशे की तरह यह नया अनुभव उसे अपनी ओर खींच रहा था।

शाम ढलने लगी, और सोनू का बगीचे में काम खत्म हुआ। वह हवेली के द्वार पर जाकर अपनी मां का इंतज़ार करने लगा। तभी दूसरी नौकरानी बिमला निकली और उसे तथा बाकी नौकरों को एक ओर ले गई। उसने उन्हें बढ़िया खाना परोसा—पनीर आदि की सब्जियां, कई तरह की मिठाई—जो हवेली के बाकी लोगों के लिए आम था, लेकिन सोनू जैसे गरीब परिवार के लिए सुखद आश्चर्य था।

खाना खाकर सोनू ने बिमला से कहा, "ताई, अम्मा को बुला दो, घर जाने का समय हो रहा है।"बिमला ने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया और हवेली के अंदर गई। कुछ देर बाद वह वापस आई और बोली, "बेटा, आज हवेली में दावत है न, तो तेरी अम्मा रात में यहाँ रुकेंगी। काम ज्यादा है, सुबह आएगी—उसने ऐसा ही बोला है। तू घर चली जा, चिंता मत कर।" सोनू ने थोड़ा सोचा, फिर बोला, "ठीक है ताई," और घर की ओर चल दिया, मन में एक अजीब सा डर लिए।

अंदर हवेली में माहौल और गरमा गया था। लोग शराब के नशे में सब भूलकर झूम रहे थे। कुछ मर्द और औरतें सुध-बुध खोकर फर्श पर पड़े थे, जबकि बाकी अपनी हंसी-मजाक में मग्न थे। रजनी यह सब देखकर चकित थी। इतना खुलापन, इतना बेबाक माहौल—उसने कभी सोचा भी नहीं था। वह मेहमानों के लिए खाना लगा रही थी, जब अचानक पीछे से किसी ने उसे बाहों में भर लिया। वह चौंकी और मुड़कर देखा तो सरोज थी।

रजनी ने राहत की सांस ली और बोली, "अरे जीजी, तुमने तो मुझे डरा ही दिया!"

सरोज हँसते हुए बोली, "अरे डर क्यों रही है, और तू ये क्या कर रही है?"

रजनी ने कहा, "खाना लगा रही हूँ, जीजी।"

सरोज ने उसे रोकते हुए कहा, "छोड़ इसे, तुझे बोला था ना तू मेरी सहेली है, तू कोई काम नहीं करेगी। काम करने के लिए बहुत लोग हैं, तू मेरे साथ चल।" सरोज ने उसका हाथ पकड़कर एक तरफ ले गई, जहाँ कुछ मेहमान बैठे थे।

रजनी के पहुँचते ही सब उससे मिलने लगे। वह गले लग-लगकर सब से मिल रही थी, जो उसके लिए हैरान करने वाला था। औरतों के साथ तो ठीक था, लेकिन पराए मर्दों से गले लगना उसके लिए मर्यादा के बाहर था। इसी बीच एक मोटा-ताजा मेहमान, जिसकी आँखें शराब से लाल थीं, ने सरोज की कमर में हाथ डाला और बोला, "भाभी, इनसे भी तो मिलवाओ। ये सुंदर अप्सरा कौन है?"

सरोज ने हँसते हुए कहा, "अरे ये मेरी प्यारी सहेली है, रजनी। और रजनी, ये सब इनके और मेरे दोस्त हैं।"

वह आदमी रजनी की ओर देखकर बोला, "सच में रजनी जी, आप बहुत सुंदर हैं।"

सरोज ने मजाक में टोकते हुए कहा, "अरे बस बस, ये शादीशुदा है। इस पर इतने डोरे डालने का कोई फायदा नहीं है।"

आदमी ने मायूसी भरे लहजे में कहा, "अफसोस," और हँस दिया।रजनी को अपने लिए ऐसी तारीफ सुनकर अजीब लगा, लेकिन हर औरत की तरह उसे भी अपनी सुंदरता की सराहना सुनकर अच्छा लगा। सरोज ने उसे अपने साथ घुमाया और अलग-अलग मेहमानों से मिलवाया। रजनी को बड़े लोगों के बीच रहना और उनसे मिलना कहीं न कहीं पसंद आ रहा था। कुछ देर बाद अधिकतर मेहमान चले गए, लेकिन कुछ खास लोग—चार औरतें और उतने ही मर्द—रात को रुकने वाले थे। सरोज ने रजनी को बताया, "ये हमारे खास दोस्त हैं, रात यहाँ रहेंगे।"मर्दों ने नीचे अपनी महफिल जमा ली, जहाँ शराब और ठहाकों का दौर चल रहा था। चारों औरतें, सरोज, और रजनी ऊपर एक कमरे में चली गईं। सरोज ने एक नौकर से बोतल मंगवाई, जो देखने में ही शानदार थी—गहरे हरे रंग की, सोने के ढक्कन वाली। एक औरत ने उसे छह गिलास में डाला। सबने अपने-अपने गिलास उठा लिए, सिवाय रजनी के। सरोज और बाकी औरतों ने उसे देखा और कहा, "रजनी, ले लो ना।"

रजनी ने सकुचाते हुए कहा, "वो नहीं पी सकती, जीजी। मैने कभी नहीं पी, ऊपर से बहुत बदबू आती है।"

सरोज ने हँसते हुए कहा, "अच्छा रजनी, तू सबके सामने मेरी बात टालेगी, अपनी सहेली की?"

एक औरत ने हल्के लहजे में कहा, "अरे रजनी, ले लो ना। मैं भी कभी-कभी ही पीती हूँ।"

रजनी ने फिर कहा, "वो जीजी, ऐसा नहीं—मैने कभी नहीं पी, और बदबू से डर लगता है।"

सरोज ने उसे ग्लास पास किया और बोली, "अरे, ये अलग है। इसमें बिल्कुल बदबू नहीं आएगी, ले सूंघकर देख।" सरोज ने ग्लास को रजनी की नाक से लगा दिया। रजनी ने सूंघा और सचमुच हैरान रह गई—बदबू की जगह एक मीठी खुशबू आ रही थी।

एक औरत ने हँसते हुए कहा, "रजनी, पी जाओ। बहुत अच्छी है ये। मैं भी नहीं पीती वैसे तो, लेकिन इसको मना करना बेवकूफी होगी।"

सबके दबाव में आकर रजनी ने पहला घूंट लिया। स्वाद मीठा और गर्म था, जो उसे अच्छा लगा। फिर क्या था, एक के बाद एक ग्लास खाली होने लगे। कुछ ही देर में औरतों ने मिलकर बोतल खाली कर दी। नशा चढ़ने लगा—रजनी को ऐसा कभी महसूस नहीं हुआ था। उसका बदन हल्का हो गया, और मन में किसी चिंता का नामो-निशान नहीं था।रजनी का अनचाहा साक्षात्कारतभी एक औरत बोली, "यार, मुझे बाथरूम जाना है—किधर है?"

सरोज ने कहा, "रजनी, इन्हें बाथरूम दिखा देगी?"

रजनी ने हाँ में सिर हिलाया और बोली, "हाँ जीजी, चलिए।" बहके कदमों के साथ वह औरत को लेकर पीछे की ओर चली। औरत को बाथरूम में छोड़कर वह बाहर खड़ी हो गई। बाथरूम के पास ही एक कमरा था, जो सोमपाल का था। रजनी को उस कमरे से कुछ आवाजें सुनाई दीं—हल्की सिसकियाँ और भारी साँसें।

नशे की हालत में सब कुछ उसे एक खेल सा लगा। वह धीरे-धीरे कमरे के पास गई और दरवाजे को हल्का सा खोलकर अंदर झाँका। सामने का नजारा देखकर उसकी आँखें चौड़ी हो गईं। बिस्तर पर बिमला, हवेली की नौकरानी, बिल्कुल नंगी होकर झुकी हुई थी। उसके मोटे चूतड़ हिल रहे थे, और भारी चूचियाँ झूल रही थीं। पीछे से सोमपाल, पूरी तरह नंगा, उसकी कमर को पकड़े हुए था। उसका मोटा और लंबा लंड बिमला की चूत में अंदर-बाहर हो रहा था, और हर थाप के साथ बिमला की साँसें तेज होती जा रही थीं।






सोमपाल के चेहरे पर हवस की चमक थी, और वह दनादन धक्के लगा रहा था।रजनी का बदन जम सा गया। उसकी साँसें रुक गईं, और एक अनजानी सिहरन उसके पूरे शरीर में दौड़ गई। उसकी चूत में नमी महसूस हुई—पहली बार वह ऐसा कुछ देख रही थी। तभी उसे अपनी नंगी कमर पर किसी का हाथ महसूस हुआ। वह तुरंत चेहरा दरवाजे की दरार से हटाकर पीछे मुड़ी। उसका पल्लू सीने से सरककर नीचे गिर गया, लेकिन उसका ध्यान अभी उस इंसान पर था जो उसके सामने खड़ा था—कर्मा।

कर्मा ने बनावटी चिंता से कहा, "क्या हुआ चाची, यहाँ क्या कर रही हो?"

वह जानता था कि अंदर क्या हो रहा है, लेकिन रजनी को परेशान करने का मौका छोड़ना नहीं चाहता था।

रजनी ने बात को संभालने की कोशिश की, "कुछ, कुछ नहीं बेटा, वो बस ऐसे ही।"

वह कैसे कह सकती थी कि उसने क्या देखा? कैसे एक पोते को उसके दादा की ये हरकत बता सकती थी?

कर्मा ने हल्का सा हँसते हुए कहा, "अरे लगता है चाची, तुमने पी ली है। चलो, मैं तुम्हें माँ के पास ले चलता हूँ।"

रजनी ने बचने का मौका देखा और बोली, "हाँ-हाँ, चलो।"

लेकिन कर्मा ने फिर से उसे एक तरफ से पकड़ लिया। उसका हाथ रजनी के नंगे पेट पर कस गया, और उसकी उंगलियाँ धीरे-धीरे उसकी नाभि के पास घूमने लगीं। रजनी का मन काँप उठा, लेकिन नशे और मजबूरी ने उसे चुप रहने को मजबूर कर दिया।
 
अध्याय पांच
रात का अंधेरा सज्जनपुर गांव को ढक चुका था, और हवेली के अंदर का माहौल अब पूरी तरह रंगीन और उन्मुक्त हो चुका था। गंगा की ठंडी हवा बाहर बह रही थी, लेकिन हवेली के भीतर शराब, संगीत, और हवस की गर्मी हावी थी।

रजनी, जो इस अनजान दुनिया में कदम रख चुकी थी, अब एक ऐसे मोड़ पर थी जहां उसकी मर्यादा और मजबूरी के बीच एक पतली रेखा बची थी।

कर्मा ने रजनी को अपने हाथों से पकड़ रखा था, और उसकी उंगलियाँ धीरे-धीरे रजनी की नाभि के चारों ओर मंडरा रही थीं। रजनी का शरीर काँप रहा था, और नशे की हालत में उसका विरोध कमजोर पड़ चुका था।





वह डरी हुई आवाज़ में बोली, "बेटा, छोड़ दो मुझे, ये ठीक नहीं है।" उसकी आवाज़ में लाचारी और डर साफ झलक रहा था, लेकिन कर्मा ने हल्का सा हँसते हुए कहा, "अरे चाची, डर क्यों रही हो? मैं तो बस तुम्हें सहारा दे रहा हूँ—तुम तो लड़खड़ा रही हो।"

उसकी बातों में एक चालाकी थी, जो रजनी को और असहज कर रही थी।रजनी ने अपने पल्लू को फिर से सिर पर खींचने की कोशिश की, लेकिन कर्मा का हाथ उसके मखमली पेट पर और कस गया। तभी सरोज की आवाज़ गूंजी, "रजनी, कहाँ हो? मेहमान बुला रहे हैं!" कर्मा ने तुरंत हाथ हटा लिया और पीछे हट गया, जैसे कुछ हुआ ही न हो। रजनी ने राहत की सांस ली और जल्दी से सरोज की ओर बढ़ गई।

सरोज ने उसे देखा और बोली, "अरे, तुम्हारा पल्लू तो नीचे है—सुधार लो, वरना मेहमानों की नजरें और चढ़ जाएँगी!" रजनी ने शर्माते हुए पल्लू ठीक किया और सरोज के पीछे चल पड़ी, मन में एक अजीब सा डर लिए।

अब सब औरतें भी नीचे मर्दों के पास पहुँच गईं। सब नशे में डूबे थे—औरत हो या मर्द। तभी एक मेहमान ने जोर से कहा, "यार नीलेश, कुछ नाच-गाने का प्रोग्राम नहीं है क्या?"

नीलेश, जो शराब के नशे में अपनी नशीली आँखों से सबको देख रहा था, हँसते हुए बोला, "अरे ऐसे कैसे नहीं है, अभी करवाता हूँ!" उसने नौकरों को इशारा किया, और तुरंत ही आंगन को साफ कर दिया गया। मेज-पट्टियाँ हटाई गईं, और एक स्पीकर पर मधुर लेकिन उत्तेजक संगीत बजने लगा।

संगीत की पहली धुन के साथ ही एक मेहमान ने सरोज की ओर हाथ बढ़ाया। सरोज मुस्कुराते हुए उठ गई और उस आदमी के साथ नाचने लगी। दोनों चिपककर नाच रहे थे—उस आदमी का हाथ सरोज की कमर पर था, और वे एक-दूसरे के करीब थे। रजनी को यह अजीब लगा, क्योंकि पराए मर्द के साथ ऐसे चिपककर नाचना उसकी मर्यादा से बाहर था। लेकिन उसके बदन में एक अनजानी सिहरन भी दौड़ रही थी, और बार-बार उसकी आँखों के सामने सोमपाल और बिमला का अंतरंग दृश्य कौंध रहा था।धीरे-धीरे और लोग भी उठने लगे और नाचने लगे। सभी औरतें अपने-अपने जोड़ों के साथ झूम रही थीं, लेकिन रजनी बस खड़ी होकर सब देख रही थी। तभी उसने एक ओर देखा—कोई उसे घूर रहा था। उसकी नजर कुर्सी पर बैठे नीलेश से टकराई, जो हाथ में गिलास लिए नशीली नजरों और कामुक मुस्कान के साथ उसे देख रहा था। रजनी की साँसें तेज हो गईं। नीलेश ने अपना गिलास एक ओर रखा और उसकी ओर बढ़ने लगा।

रजनी का दिल धड़कने लगा, लेकिन वह हिल भी नहीं सकी। नीलेश धीरे-धीरे उसके पास आया और वैसे ही हाथ बढ़ाया जैसे बाकी मर्द औरतों को नाचने के लिए बुला रहे थे। न जाने यह माहौल का असर था या नशे का, लेकिन रजनी कुछ सोच ही नहीं पाई। उसका हाथ अपने आप उठकर नीलेश के हाथ में पहुँच गया। नीलेश ने उसे पकड़कर सबके बीच में ले गया और फिर उसे अपनी ओर घुमाया। उसका हाथ रजनी की कमर पर रखा, और उस छुअन से रजनी के बदन में सिहरन दौड़ गई।

रजनी को सब कुछ होता हुआ महसूस हो रहा था—यह गलत था, लेकिन वह खुद को रोक नहीं पा रही थी। नीलेश उसे लेकर धीरे-धीरे हिलने लगा, और उसके हाथ रजनी की कमर और पीठ पर फिराने लगे। सरोज का ब्लाउज़, जो पीछे से खुला था, नीलेश के हाथों को रजनी की नंगी पीठ पर घूमने का मौका दे रहा था। रजनी के मन में उत्तेजना, नशा, और मर्यादा के बीच जंग छिड़ गई थी।

नीलेश रजनी के गदराए बदन को अपने हाथों से नाप रहा था। उसने रजनी की कमर को मसला, और रजनी ने ऊपर उसकी आँखों में देखा। नीलेश ने उसकी आँखों में देखते हुए अपना चेहरा रजनी के चेहरे की ओर बढ़ाया। रजनी का दिल और तेज धड़कने लगा।





नीलेश के होंठ उसके होंठों के पास आए, और रजनी ने तुरंत अपना चेहरा एक ओर कर लिया। उसकी नजर दूसरों पर पड़ी—कई जोड़े एक-दूसरे को चूम रहे थे, किसी की कमर मसली जा रही थी।

फिर उसकी नजर सरोज पर गई, जो अपने जोड़ीदार के साथ नाच रही थी। वह आदमी सरोज की कमर को मसलते हुए उसके होंठों को चूस रहा था। रजनी हैरान थी—क्या सरोज को डर नहीं कि उसका पति यहीं है? क्या नीलेश को यह दिखाई नहीं दे रहा?रजनी ने यह सवाल मन में सोचा और नीलेश की ओर देखा, जो उसे ही देख रहा था। इस बार जैसे ही उनकी आँखें मिलीं, नीलेश ने अपने होंठों को उसके होंठों से मिला दिया। रजनी का पूरा बदन सिहर उठा, मानो बिजली दौड़ गई हो। नीलेश ने उसे संभलने का मौका नहीं दिया और उसके होंठों का रस चूसने लगा। रजनी उत्तेजना, नशा, और इस खुले माहौल से जूझ रही थी। उसके पति दिलीप ने कभी ऐसा प्यार नहीं किया था—उसने कब रजनी को कभी प्यार से चूमा भी था उसे याद भी नहीं। यहाँ नीलेश उसे प्यार से चूम रहा था, और ये सब कारणों से उसका विरोध टूटने लगा। उसके होंठों ने भी नीलेश का साथ देना शुरू कर दिया, और वह एक गहरे चुम्बन में डूब गई। उसकी आँखें बंद हो गईं।

रजनी को अपने बदन पर नीलेश के हाथों का फिरना और मसला जाना महसूस हो रहा था—कभी कमर पर, तो कभी नंगी पीठ पर।





उसे महसूस भी नहीं हुआ कि नीलेश ने उसके ब्लाउज़ की डोरी पीछे से कब खोल दी। सब कुछ धुंधला सा होने लगा। उसे आभास हुआ कि नीलेश उसे कहीं ले जा रहा है, लेकिन वह इतनी मग्न थी कि आँखें तक नहीं खोली। कुछ पल बाद बदन में उठती तरंगों की वजह से उसने आँखें खोली, तो खुद को एक सोफे पर लेटा पाया। उसका ब्लाउज़ पूरा खुला था, और उसकी दोनों मोटी चूचियाँ बाहर थीं। नीलेश उन्हें मसल रहा था। यह देखकर रजनी की आह निकल गई।





नीलेश ने फिर अपना सिर झुकाया और उसकी एक चूची को मुंह में भर लिया, रजनी आहें भरने लगी उसकी आँखें फिर से आनंद में बंद हो गईं। रजनी के हाथ अपने आप नीलेश के सिर पर कस गए।

नीलेश ने बदल-बदलकर उसकी चूचियों को चूसा और मसला, फिर नीचे सरकते हुए उसके पेट और नाभि को चाटने-चूमने लगा। रजनी उसकी हरकतों से मचलने लगी। नीलेश की जीभ उसकी नाभि को चूसने लगी, और रजनी का पूरा बदन ऐंठने लगा। उत्तेजना का फायदा उठाकर नीलेश ने उसकी साड़ी और पेटीकोट खोल दिए। रजनी का कामुक बदन अब पूरी तरह नंगा था। नाभि चाटने के बाद नीलेश और नीचे सरका और अपना मुंह उसकी चूत पर लगा दिया। यह रजनी के लिए असहनीय था—उसे पता भी नहीं था कि ऐसा भी हो सकता है। पेशाब की जगह पर किसी का मुंह? लेकिन नीलेश की जीभ ने उसकी चूत पर ऐसा जादू चलाया कि रजनी को ऐसा आनंद मिला वो सिसकने लगी





उसकी हाथ नीलेश के सिर को चूत पर झुकाने लगे, जो उसने कभी महसूस नहीं किया था।

वह लेटी हुई मचल रही थी, उसकी कमर नीलेश की जीभ के साथ झटके खा रही थी। फिर उसका पूरा बदन अकड़ गया, उसकी कमर धनुष की तरह तन गई, और वह झड़ने लगी। उसे लगा मानो उसके बदन से सारी जान चूत के रास्ते से नीलेश चूस रहा हो। झड़कर वह वापस सोफे पर गिर गई, आँखें बंद हो गईं, और वह हाँफने लगी।कुछ पल बाद उसकी नींद खुली, जब चूत में उसे फिर से एक सनसनी हुई। उसने आँखें खोली और देखा कि नीलेश का काला, मोटा, और लंबा लंड उसकी चूत में थोड़ा सा घुसा हुआ था। रजनी का दिल जोरों से धड़कने लगा। नीलेश ने उसकी टांगें फैलाईं और धीरे-धीरे अपने लंड को अंदर धकेलने लगा। रजनी की साँसें तेज हो गईं, और वह एक नए आनंद और डर के बीच झूलने लगी।

जैसे-जैसे नीलेश का मोटा और लंबा लंड रजनी की चूत में घुस रहा था, उसकी चूत को फैलाता हुआ, रजनी के बदन में एक अनजाना आनंद दौड़ रहा था। दिलीप की तुलना में नीलेश का लंड कहीं ज्यादा मोटा और लंबा था, जो रजनी की चूत को चीरते हुए अंदर तक पहुँच रहा था। नीलेश ने एक-दो जोरदार धक्के मारे और अपना पूरा लंड उसकी चूत में धकेल दिया। रजनी को पहली बार अपनी चूत में इतनी गहराई तक लंड का एहसास हुआ। वह नशीली आँखों से नीलेश को देख रही थी, मानो उसका शरीर अब उसके काबू से बाहर हो चुका हो।





नीलेश ने रजनी की कमर को थामते हुए धक्के लगाना शुरू किया और गंदी हंसी के साथ बोला, "आह साली, क्या गरम चूत है तेरी!" रजनी अब पूरी तरह उसके हाथों की गुड़िया बन चुकी थी। हर धक्के के साथ उसकी मोटी चूचियाँ नाच रही थीं जिन्हें नीलेश अपने रूखे हाथों में मसल रहा था, रजनी मजे से आहें भर रही थी नीलेश का लंड उसे वह सुख दे रहा था, जिसकी कल्पना उसने कभी नहीं की थी। उसका बदन आनंद के सागर में गोते लगा रहा था, और वह अपनी सुध-बुध खो बैठी। धीरे-धीरे सब कुछ धुंधला पड़ने लगा; उसे बस इतना आभास था कि एक मोटा-लंबा लंड उसकी चूत में अंदर-बाहर हो रहा था। नीलेश की चुदाई से रजनी एक बार फिर झड़ने लगी, और फिर तो मानो वह बेहोश हो गई। उसका बदन थरथराता हुआ सोफे पर ढह गया, और नीलेश ने भी अपनी संतुष्टि पा ली।

सुबह की पहली किरणें सज्जनपुर के घरों में दस्तक दे रही थीं, लेकिन रजनी के घर में चिंता का माहौल था। बच्चे परेशान थे कि उनकी माँ अब तक क्यों नहीं लौटी। विक्रम ने सोनू से पूछा, "सोनू, माँ ने कब तक आने को कहा था?"

सोनू ने चिंतित स्वर में कहा, "कहा तो सुबह ही था भैया, लेकिन अब तक आई ही नहीं।"

नेहा ने घबराते हुए कहा, "मुझे तो चिंता हो रही है। वैसे भी मुझे ये हवेली वाले लोग पहले ही नहीं पसंद थे।"

सोनू ने हिम्मत जुटाते हुए कहा, "दीदी, चिंता मत करो। मैं हवेली जाता हूँ अभी।"

विक्रम ने सहमति में सिर हिलाया, "हाँ जा, और देख कर आ—कोई परेशानी तो नहीं।"सोनू घर से निकल पड़ा और कुछ ही देर में हवेली के फाटक पर पहुँच गया। वह अब तक हवेली के अंदर कभी नहीं गया था; उसका काम हमेशा बाहर के बगीचे में रहता था। आज भी वह दरवाजे पर पहुँचा और वहाँ बैठे दरबान से बोला, "चाचा, अंदर आवाज़ लगा दो, मेरी माँ अंदर ही हैं।"

दरबान कुछ बोलने से पहले ही कर्मा अंदर से बाहर निकला और बोला, "अरे सोनू, क्या हुआ?"

सोनू ने घबराते हुए कहा, "वो कर्मा भैया, माँ रात में यहाँ रुकी थीं, और अभी तक घर नहीं पहुँची।"

कर्मा ने बनावटी चिंता दिखाते हुए कहा, "अरे, वो रात का प्रोग्राम देर तक चला, तो शायद सो रही होंगी। एक काम कर, अंदर जा और उठा ले।"

सोनू ने हिचकते हुए कहा, "पर मैं कैसे ढूंढूँगा उन्हें भैया, इतनी बड़ी हवेली में?"

कर्मा ने हँसते हुए कहा, "अरे, मैं चलता हूँ, आजा।"कर्मा उसे हवेली के अंदर ले गया। अंदर की शान—चमकते संगमरमर के फर्श, ऊँची दीवारें, और सजे हुए कमरे—देखकर सोनू चकित रह गया। कर्मा उसे आंगन में ले जाकर बोला, "देख, वो जो सीढ़ियाँ हैं, उनसे ऊपर जा। सीधे हाथ पर जो कमरा है, न, वहाँ चाची होंगी।"

सोनू ने कहा, "ठीक है भैया," और आगे बढ़ गया। सीढ़ियों से ऊपर पहुँचकर वह कर्मा के बताए कमरे के पास गया। उसने धीरे से दरवाजा खोला और अंदर झाँका। सामने का नजारा देखकर उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं, और उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।

बिस्तर पर उसकी माँ रजनी बिल्कुल नंगी लेटी हुई थी। सिर्फ इतना ही नहीं, उसके बगल में नीलेश भी पूरी तरह नंगा था। रजनी का सिर नीलेश की छाती पर था, और उसका हाथ उसके पेट पर रखा था। सोनू के सामने उसकी माँ का पूरा बदन नंगा था—उसकी मोटी-मोटी चूचियाँ, बड़े-बड़े गोल-मटोल चूतड़, और जांघों के बीच से उसकी चूत की दरार साफ दिख रही थी। सोनू स्तब्ध सा वहीं रुक गया। उसके दिमाग ने मानो काम करना बंद कर दिया था। कुछ पल बाद नीलेश ने हल्की सी हरकत की, और सोनू के बदन में भी हरकत हुई। वह तुरंत कमरे से बाहर निकल गया, दिल धड़कते हुए और आँखों में आंसुओं के साथ।

सोनू सीढ़ियों से नीचे उतरा, और उसका चेहरा पीला पड़ गया था। कर्मा ने उसे देखते ही पूछा, "क्या हुआ सोनू, चाची मिलीं?"

सोनू ने सिर झुकाए रखा और बोला, "हाँ भैया, मिल गईं... मैं अब घर चलता हूँ।"

कर्मा ने मुस्कुराते हुए उसे देखा, लेकिन कुछ नहीं कहा। सोनू हवेली से बाहर निकला और तेज कदमों से घर की ओर चल पड़ा। उसके मन में सवालों का तूफान था।

सोनू के कदम भारी होकर आगे बढ़ रहे थे, उसकी आँखें भर कर छलक रही थीं, उसे समझ नहीं आ रहा था क्या करे, उसकी मां इस हालत में नीलेश के साथ, क्या उसने मां के साथ कोई जबरदस्ती की, पर मां तो कितने आराम से उसके सीने पर सिर रख कर सो रही थी, तो क्या मां ने ये सब जान कर किया, नहीं नहीं मां ऐसा नहीं कर सकती जरूर इसमें नीलेश की कोई साजिश है पर कैसे पता चलेगा, क्या मां से पूछूं इस बारे में, पर मैं उनसे ये सब कैसे पूछ सकता हूं, ये सब सोचते हुए वो हवेली से बाहर निकला उसे समझ नहीं आ रहा था घर कैसे जाए और क्या बोले।

तभी पीछे से किसी ने उसे आवाज़ दी।

सोनू के जाते ही रजनी की नींद खुली और उसे कुछ पल लगे ये समझने में कि वो कहां है क्या है, उसने अपने आप को नंगा पाया तो उसका दिल धक धक करने लगा, फिर बगल में नीलेश को भी नंगा सोते देख उसको एक झटका सा लगा वो तुरंत उठ कर खड़ी हो गई, और बिस्तर के नीचे पड़ी अपनी साड़ी से खुद को ढकने लगी, उसकी आंखों से आंसू बहने लगे, उसे खुद पर और नीलेश पर बहुत गुस्सा आ रहा था,

इतने में नीलेश भी उठा और उसे देख मुस्कुराते हुए बोला: उठ गई रजनी?

रजनी तो कुछ बोलने लायक नहीं थी बस वहीं बैठ कर रोने लगी, नीलेश नंगा ही उठा और उसके पास आ कर उसकी पीठ पर हाथ रखा तो रजनी ने उसे झटक दिया।

नीलेश: अरे दुखी क्यों होती हो, इतना तो मज़ा आया, तुम्हारे जैसी औरत बहुत कम होती हैं।

रजनी कुछ नहीं बोली,

नीलेश: तुम्हारे जैसा बदन भोग कर तो मैं खुद को भाग्य वाला मान रहा हूं, और तुम हो कि रो रही हो, किस के लिए? दिलीप के लिए, जिसने तुम्हें सिवाय दुख के कुछ नहीं दिया, सिवाय पीड़ा और बरबादी के कुछ नहीं मिला तुम्हें अब तक।

नीलेश ने उसके आंसू पोंछते हुए कहा,

रजनी ने एक बार नज़र उठाकर देखा और फिर नीचे कर ली,

नीलेश ने उसे इस बार कंधे से पकड़ कर उठाया और बिस्तर पर बिठा दिया, रजनी भी बिना विरोध के बैठ गई, नीलेश उसके बगल में बैठ गया,

नीलेश: देखो मैं जानता हूं तुम्हें मैं गलत लग रहा होऊंगा, मेरी बातें गलत लग रही होंगी, पर एक बार इमानदारी से अपने मन से पूछ कर देखो, क्या तुम्हें अच्छा नहीं लगा जो रात को हुआ हमारे बीच,क्या तुम्हें आनंद नहीं आया?

रजनी कुछ देर चुप रही फिर दबी हुई आवाज़ में बोली: मुझे अच्छा लगा या नहीं इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता, जो हुआ बहुत गलत हुआ।

नीलेश: अच्छा अगर हम दोनों को अच्छा लगा तो ये गलत कैसे हुआ?

रजनी: हमारे समाज के लिए गलत है, मेरी मर्यादा, मेरे संस्कारो के अनुसार गलत है, महापाप है।

नीलेश: बहुत अच्छी हो तुम, हमेशा मर्यादा में रहने वाली, संस्कारों को मानने वाली, पर एक बात बताओ इन संस्कारों ने आज तक तुम्हें दिया क्या? क्या मर्यादा ने तुम्हारे दुख को कम किया? या ये समाज तुम्हारी मुसीबत में काम आया? ऊपर से बढ़ाई ही हैं।

रजनी ये सब सुन कर चुप हो गई और सोचने लगी, कुछ देर की चुप्पी के बाद नीलेश बोला: देखो मैंने अपने मन की बात तुम्हारे सामने रख दी, अब फैसला तुम्हारे सामने है, तुम्हें अपने और अपने परिवार के लिए जीना है या मर्यादा, संस्कार और समाज के लिए। जो तुम्हारा फैसला होगा मुझे मंजूर होगा, बिना तुम्हारी मर्ज़ी के मैं तुम्हें स्पर्श भी नहीं करूंगा।

रजनी मुंह झुकाए चुप बैठी रही, नीलेश उठा और उठ कर कमरे से सटे हुए बाथरूम में नंगा ही घुस गया, शौच आदि करके जब बाहर निकला और बिस्तर पर देखा तो हैरान हो गया और उसके चेहरे पर मुस्कान फैल गई, रजनी ने अपनी साड़ी को फिर से अपने बदन से अलग कर दिया था और नंगी बिस्तर पर लेटी हुई थी, हालांकि उसके चेहरे पर अब भी झिझक और शर्म दिखाई दे रही थी,

नीलेश अपने अकड़ते हुए लंड को लेकर आगे बढ़ा, नीलेश ने फिर अगले एक दो घंटों तक रजनी को कामसुख के कई नए पाठ पढ़ाए, रजनी ने पहली बार लंड चूसा और हैरानी की बात ये थी कि उसे लंड को चूसना अच्छा भी लगा, शुरुआत में झिझक हुई और थोड़ी घिन भी आई पर जब चूसने लगी तो उसेदेख नीलेश भी हैरान रह गया, वो तो ऐसे चूस रही थी मानो इसमें निपुण हो।





नीलेश: आह रजनी क्या कमाल की औरत हो तुम, लग ही नहीं रहा पहली बार लंड चूस रही हो।

रजनी को न जाने क्या हो गया था उसे लग रहा था जितना मज़ा वो नीलेश को दे उतना अच्छा है, उसके लंड चूसते हुए नीलेश की सिसकियों को सुनते हुए रजनी को एक ताकत और नियंत्रण का अहसास हो रहा था,

कुछ देर बाद नीलेश ने उसे एक नया आसन सिखाया जिसमें रजनी नीलेश के लंड को अपनी चूत में लेकर उछल रही थी,





नीलेश: आह साली ऐसे ही उछाल अपने चूतड़ों को मेरे लौड़े पर, आह क्या मस्त गरम चूत है तेरी,

नीलेश नीचे से धक्का लगाते हुए बोला,

रजनी भी आह आह मां, करके सिसकियां ले रही थी,

रजनी के लिए जैसे अब एक ही लक्ष्य था, अपने बदन से नीलेश को खुश करना और अभी वो वही कर रही थी,

नीलेश: आह तेरे जैसी कामूक औरत बहुत कम होती हैं मेरी रानी,

रजनी: आह ओह तुम्हारा ये भी बहुत मोटा है साहब।

इसी बीच कमरे का दरवाज़ा खुला और बिमला जिसे रात को सोमपाल के साथ चुदाई करते हुए रजनी ने देखा था वो चाय के दो कप लेकर अन्दर घुसी, बिमला ने बिस्तर पर देखा और रजनी की नज़र भी बिमला से मिली, बिमला उसे देख मुस्कुराई तो रजनी के चेहरे पर भी मुस्कान आ गई,

बिमला ने चाय रखी और बापिस चली गई। इस बीच रजनी ने एक पल भी खुद को नहीं रोका था और लगातार अपने चूतड़ों को लंड पर पटक रही थी।

रजनी को खुलता देख नीलेश को भी खुशी हो रही थी, कुछ देर यूं ही चुदाई चली नीलेश ने फिर से आसन बदला और उसके पीछे से उसे चोदने लगे और इस बार तो नीलेश ने रजनी के पीछे जगह ली और फिर उसे सीधा कर उसकी चूचियों को थाम कर चोदने लगा,

रजनी की चूत में उसका लंड अंदर तक वार कर रहा था और रजनी के मुंह से कामुक आहें निकल रही थी





कुछ पल बाद ही कामुक आहें उत्तेजना की चीखों में बदल गईं और रजनी झड़ने लगी, पर इस बार नीलेश भी उसके साथ झड़ा और उसकी चूत को अपने रस से भर दिया।

दोनों शांत होकर एक दूसरे के बगल में लेट गए, रजनी लेटकर छत की ओर देखकर सोच में पड़ गई, वो जानती थी उसकी जिंदगी अब पूरी तरह बदलने वाली थी।

जारी रहेगी।
 
छठा अध्याय

सज्जनपुर की सुबह धीरे-धीरे अपने रंग में ढल रही थी। नदी की लहरें खेतों को छू रही थीं, और गाँव की गलियों में मिट्टी की सौंधी खुशबू बिखर रही थी। मगर रजनी के घर में एक अजीब सा सन्नाटा था, जो सोनू के मन के तूफान को और गहरा कर रहा था। हवेली से लौटते वक्त सोनू के कदम भारी थे, और उसकी आँखें आँसुओं से भरी थीं। उसने जो देखा था—अपनी माँ को नीलेश के साथ नंगे बिस्तर पर—वह नजारा उसके मासूम मन को तोड़ चुका था। वह तेजी से घर की ओर बढ़ रहा था, सवालों और दुख के बोझ तले दबा हुआ।

पर तभी पीछे से एक आवाज़ गूँजी, “सोनू, रुक जा!”सोनू ने पलटकर देखा। कर्मा अपनी मोटरसाइकिल पर सवार, मुस्कुराता हुआ उसकी ओर बढ़ रहा था। सोनू का चेहरा और सख्त हो गया। उसे कर्मा की बनावटी चिंता और चालाक मुस्कान पर गुस्सा आ रहा था। कर्मा ने बाइक रोकी और बोला, “क्या हुआ, भाई? इतना परेशान क्यों है? चल, मेरे साथ थोड़ा घूम आ।” सोनू ने कुछ कहने की कोशिश की, लेकिन उसका गला रुँध गया। कर्मा ने उसका कंधा थपथपाया और बोला, “आजा, बैठ। दो मिनट की बात है।” सोनू हिचकिचाया, लेकिन कर्मा की बातों में कुछ ऐसा था कि वह बाइक पर बैठ गया। कर्मा ने मोटरसाइकिल स्टार्ट की और गाँव के बाहर नदी किनारे की ओर चल पड़ा।

नदी का किनारा शांत था, सिर्फ पानी की हल्की छलछल और दूर कहीं चिड़ियों की आवाज़ सुनाई दे रही थी। कर्मा ने बाइक रोकी और सोनू को उतरने का इशारा किया। दोनों एक पेड़ की छाँव में बैठ गए। सोनू का चेहरा अब भी गुस्से और दुख से भरा था। कर्मा ने उसकी ओर देखा और शांत लहजे में बोला, “मैं जानता हूँ, तूने क्या देखा, सोनू।” सोनू की आँखें चौड़ी हो गईं, और उसका चेहरा लाल पड़ गया। वह चिल्लाया, “सब तेरी वजह से हुआ है, तुम हवेली वाले हो ही सब ऐसे, तूने मुझे जान-बूझकर वहाँ भेजा, ना?”

कर्मा ने हाथ उठाकर उसे शांत किया और बोला, “गुस्सा मत कर, भाई। सुन पहले। मैं तुझसे साफ-साफ बात करना चाहता हूँ।

”कर्मा ने एक गहरी साँस ली और बोला, “देख, सोनू, मैं समझता हूँ तुझे कितना दुख हुआ होगा। लेकिन जरा अलग ढंग से सोच। सही-गलत के चक्कर में तेरा परिवार आज तक क्या पाया?

तेरे पापा की हरकतों ने तुम सबको बरबाद कर दिया। और तेरी माँ? वो भी तो इंसान है, सोनू। क्या उसे सुख का हक नहीं? जैसे पेट की भूख होती है, वैसे ही बदन की भी होती है। अगर उनकी वो भूख हवेली में मिट रही है, तो बुराई क्या है?” सोनू की आँखें कर्मा की बातों पर ठहर गईं, लेकिन उसका मन अब भी उलझा था।

कर्मा ने आगे कहा, “मेरे पापा उनकी मदद कर रहे हैं। तेरा परिवार मुसीबत से निकलेगा, सोनू। बस तू ये बात अपने सीने में दबा ले। अपनी माँ की खुशी के लिए इतना तो कर सकता है न?”सोनू चुपचाप कर्मा की बातें सुनता रहा। उसका मन भारी था, लेकिन कर्मा की बातें उसके दिमाग में घूम रही थीं। कर्मा ने उसका कंधा थपथपाया और बोला, “सोच ले, भाई। मैं चलता हूँ।” कर्मा मोटरसाइकिल पर सवार होकर चला गया, और सोनू नदी किनारे अकेला रह गया। वह पानी की लहरों को देखता रहा, कर्मा की बातें उसके मन में गूँज रही थीं। कुछ देर बाद वह उठा और धीरे-धीरे घर की ओर चल पड़ा, रास्ते भर सोचता हुआ।

उधर, रजनी दोपहर के वक्त घर लौटी। उसका हाव-भाव बदला हुआ था। चेहरे पर एक अजीब सी चमक थी, जो सोनू ने तुरंत भाँप ली। रजनी की साड़ी सजी हुई थी, और उसके कदमों में एक नई रौनक थी। सोनू उसे देखता रहा, उसका मन भारी था, लेकिन वह चुप रहा। वह जानता था कि माँ ने क्या किया, मगर कर्मा की बातें उसके मन में गूँज रही थीं। रजनी ने आँगन में कदम रखते ही बच्चों को बुलाया। विक्रम, नेहा, और मनीषा इकट्ठा हो गए। रजनी ने मुस्कुराते हुए कहा, “सुनो, सब। नीलेश साहब ने हमारा ब्याज माफ कर दिया है। अब बस हमें कर्जा ही चुकाना है। और विक्रम, उन्होंने अपने एक दोस्त से बात की है। तुझे उनके यहाँ नौकरी पर रखवा देंगे।

बच्चों के चेहरों पर राहत की लहर दौड़ी। नेहा ने उत्साह में कहा, “सच, अम्मा? ये तो बहुत अच्छी खबर है!” विक्रम ने सिर हिलाया और बोला, “अम्मा, ये सब कैसे हुआ? साहब ने इतनी मेहरबानी क्यों की?” रजनी की मुस्कान एक पल के लिए ठिठकी, लेकिन उसने तुरंत खुद को संभाला और बोला, “बस, उनकी मेहरबानी है।

हमारी हालत देखी तो दया आ गई होगी।” सोनू चुपचाप एक कोने में खड़ा सब सुन रहा था। उसकी नजरें माँ के चेहरे पर थीं, जहाँ खुशी के साथ-साथ एक अजीब सी बेचैनी भी झलक रही थी। वह कुछ नहीं बोला और आँगन से बाहर निकल गया।

इधर, कर्मा अपनी साजिश की शुरुआत कर चुका था। दोपहर की तपती गर्मी में वह तेजपाल के घर के बाहर खड़ा था, अपनी मोटरसाइकिल पर टिका हुआ। बिंदिया आँगन में बर्तन धो रही थी, उसकी सूट के दुपट्टे को एक ओर रखा हुआ था, और पसीने से तर बदन धूप में चमक रहा था।






कर्मा ने उसे देखा और हल्का सा मुस्कुराया। बिंदिया ने उसकी नजरें महसूस कीं और पलटकर देखा। कर्मा ने अपनी आँखों में एक शरारती चमक लाते हुए उसे देखा और धीरे से सिर हिलाया। बिंदिया का चेहरा शर्म से लाल हो गया, और वह जल्दी से पल्लू ठीक करके अंदर चली गई। कर्मा की मुस्कान और गहरी हो गई। वह मोटरसाइकिल स्टार्ट करके वहाँ से निकल गया, मन ही मन अपनी योजना को और पक्का करते हुए।

कम्मू के घर में धीरज की शादी की तैयारियाँ जोरों पर थीं। आँगन में सुमन और कुसुम मेहंदी के डिज़ाइन की किताबें लिए बैठी थीं, और चारों ओर चूड़ियों की खनक गूँज रही थी। फूल सिंह और अजीत खटिया पर बैठे खेतों की फसल और शादी के खर्चों की बात कर रहे थे। फूल सिंह ने पगड़ी ठीक करते हुए कहा, “अजीत, इस बार धान की फसल अच्छी है। कटाई हो जाए तो ब्याह की सारी तैयारियाँ पक्की हो जाएँगी।” अजीत ने हँसते हुए कहा, “हाँ भैया, और कुसुम भाभी तो पहले ही दुल्हन को सजाने की सारी योजनाएँ बना चुकी हैं।” कुसुम ने दूर से सुनकर चिल्लाया, “देवर जी, तुम बस अपनी दुल्हन को संभालो, बाकी मैं देख लूँगी!” आँगन में हँसी गूँज उठी।

कम्मू, जो पास में क्रिकेट का बल्ला लिए खड़ा था, बोला, “मम्मी, बस ये ब्याह जल्दी निपट जाए, फिर मैं अपनी क्रिकेट टीम को और पक्का करूँगा!” सुमन ने उसे डाँटते हुए कहा, “बस गेंद-बल्ले की पड़ी है तुझे, जरा घर के काम में भी हाथ बँटाया कर!” मगर उसकी डाँट में प्यार साफ झलक रहा था।

तेजपाल के घर में भी रौनक थी। झुमरी आँगन में चूल्हे पर रोटियाँ सेंक रही थी, और तेजपाल खटिया पर बैठे मन्नू को समझा रहे थे। “बेटा, लड़के वाले दो दिन बाद आ रहे हैं। बिंदिया का रिश्ता पक्का करने की पूरी कोशिश करेंगे। तू भी जरा घर में मदद कर, और हाँ, क्रिकेट के चक्कर में ज्यादा मत पड़।” मन्नू ने मुस्कुराते हुए कहा, “ठीक है, बाबूजी। पर दीदी का रिश्ता पक्का हो जाए, फिर तो जो भी चीज आएगी खाने की मैं ही खाया करूंगा!

” झुमरी ने हँसते हुए कहा, “हाँ, और फिर मेरे मन्नू की भी बारी आएगी!” बिंदिया, जो पास में खड़ी थी, शर्म से लाल हो गई और बोली, “मम्मी, बस करो ना!” आँगन में हल्की हँसी गूँज उठी, लेकिन किसी को कर्मा की साजिश का अंदाज़ा नहीं था, जो धीरे-धीरे बिंदिया की जिंदगी को उलझाने की ओर बढ़ रही थी।

जारी रहेगी
 
सातवाँ अध्याय


रात का अंधेरा सज्जनपुर को अपने आगोश में ले चुका था, और हवेली में खाने के बाद का माहौल अब एक अलग ही रंग में रंग गया था। नदी की ठंडी हवा बाहर की सादगी को छू रही थी, मगर हवेली की दीवारों के भीतर कामुकता और हवस का तूफान उमड़ रहा था।

सरोज अपने कमरे में सोने की तैयारी कर रही थी। उसने अपनी साड़ी उतारी और एक ओर रख दी। उसका भरा हुआ, कामुक बदन अब सिर्फ पेटीकोट और ब्लाउज़ में था, जो उसकी मोटी चूचियों और गहरी नाभि को उभार रहा था। तभी उसे अपनी कमर पर दो हाथ महसूस हुए, जो उसके पेट को मसलने लगे।“अजी, छोड़ो न, क्या कर रहे हो?” सरोज ने शरारती लहजे में कहा।“अपनी पत्नी से प्यार, और क्या?” नीलेश ने हँसते हुए जवाब दिया, उसकी आँखों में चमक थी।





“अच्छा, बड़ा प्यार आ रहा है? क्यों, अपने नए खिलौने से मन भर गया क्या? सुबह तक आवाज़ें आ रही थीं, बिमला ने भी देखा था,” सरोज ने तंज कसते हुए कहा।

नीलेश ने सरोज के ब्लाउज़ की डोरी खोलते हुए कहा, “वो खिलौना है, और तुम हमारी रानी हो। वैसे, बड़ा स्वाद है उसमें। अपनी सेवा का अवसर दो उसे और कुछ कामुकता के पाठ पढ़ाओ।”“अच्छा, फिर तुम्हें मेरी जगह वो पसंद आ गई तो?” सरोज ने बनावटी नाराज़गी दिखाते हुए पूछा।

“ऐसा कभी हो सकता है?” नीलेश ने सरोज की मोटी, नंगी चूचियों को मसलते हुए कहा।“आह, आराम से जी,” सरोज की साँसें गर्म हो गईं।“अब आराम का नहीं, काम का समय है,” नीलेश ने हँसते हुए सरोज के पेटीकोट का नाड़ा खोल दिया।

कुछ देर बाद सरोज नीलेश के मोटे लंड पर कूद रही थी। उसकी चूचियाँ हवा में झूल रही थीं, और उसकी आहें कमरे में गूँज रही थीं।





नीलेश: आह मेरी रानी तेरी चूत जैसी गर्मी किसी औरत में नहीं, आह ऐसे ही।

सरोज: तुम्हारा लंड भी तो ऐसा है कि जिसे पाकर ही मेरी चूत की प्यास बुझती है, आह चोदो अपनी रानी की प्यासी चूत को,

नीलेश: आह साली तुझ जैसी गरम औरत को पत्नी बना कर तो मेरे भाग ही खुल गए,

सरोज: ओह जी तुम्हारे मोटे लंड वाले पति को पाकर तो मेरी चूत की भी किस्मत जाग गई है, आह चोदो इसे ऐसे ही।

पूरा कमरा दोनों की थापो की आवाज से गूंज रहा था और दोनों ही जल्दी इसी तरह एक दूसरे को उकसाते हुए चुदाई कर रहे थे,

हवेली के पिछले कमरे में भी कुछ ऐसा ही माहौल था। नीलेश और सरोज के दोनों बेटे, कर्मा और अनुज, बिमला के भरे बदन को भोग रहे थे। बिमला बिस्तर पर पीठ के बल पूरी नंगी लेटी थी। उसकी टाँगों के बीच कर्मा था, जिसका लंड उसकी अनुभवी चूत में अंदर-बाहर हो रहा था। बिस्तर के नीचे अनुज खड़ा था, और उसका लंड बिमला के मुँह में था, जिसे वो चूस रही थी।





कर्मा: आह चाची क्या गरम चूत है तुम्हारी ओह मेरी रांड चाची।

कर्मा ने बिमला की चूत में धक्के लगाते हुए कहा,

अनुज: चूसती भी उतना ही बढ़िया है चाची, भैया।

अनुज उसके मुंह में लंड को और घुसाते हुए बोला।

दोनों बिमला के कामुक बदन को एक साथ भोग रहे थे, बिमला भी दो जवान लड़कों का साथ पाकर आनंद से उनके बीच लेट कर अपना बदन मसलवा रही थी। उसके मुंह से घुटी हुई आहें निकल रहीं थीं।

हवेली की रात ऐसे ही कामुक थापों और आहों के बीच बीत गई।अगली सुबह रजनी और सोनू फिर से हवेली की ओर निकले। दोनों के मन में एक तूफान था, मगर मुँह पर ताला। सोनू बार-बार अपनी माँ को देख रहा था। कल सुबह का दृश्य—रजनी का नंगा बदन नीलेश के नंगे बदन से चिपका हुआ—उसकी आँखों के सामने बार-बार कौंध रहा था। हवेली पहुँचते ही सोनू को हमेशा की तरह बगीचे में माली के साथ काम में लगना पड़ा, मगर उसका मन अपनी माँ के साथ अंदर जाने का था। उसके मन में सवालों का भँवर चल रहा था—आज न जाने माँ के साथ क्या होगा?

रजनी सीधे रसोई में काम में जुट गई। जल्दी ही उसका बदन पसीने से भीगकर चमकने लगा, जिससे वह और कामुक लगने लगी।





तभी कर्मा रसोई में आया। रजनी को इस हाल में देखकर उसके मन में हलचल होने लगी। वह धीरे से रजनी के पीछे जाकर खड़ा हो गया और साड़ी के ऊपर से उसके पेट पर हाथ रखते हुए बोला, “क्या बना रही हो, चाची?

रजनी चौंक गई, मगर संभलते हुए बोली, “नाश्ता बना रही हूँ, लल्ला। तुझे भूख लगी होगी न?” उसने कर्मा के चेहरे को प्यार से सहलाते हुए कहा।

कर्मा को रजनी का ये बदला हुआ अंदाज़ देखकर हैरानी हुई। रजनी में अब एक नया आत्मविश्वास था। कल की घटना के बाद वह बदल चुकी थी। उसका गदराया बदन, जो उसे अब तक कमज़ोर बनाता था, अब उसे अपनी ताकत लग रहा था। कर्मा ने उसे खुलता देख मन ही मन खुश हुआ और पीछे से उससे चिपक गया। उसने रजनी के पल्लू को थोड़ा ऊपर खिसकाया और उसके नंगे पेट को सहलाने लगा।





अरे लल्ला, नाश्ता बना लेने दो, देर हो जाएगी,” रजनी ने प्यार भरे लहजे में कहा। उसे अपने चूतड़ों के बीच कर्मा के कड़क लंड की चुभन महसूस हुई, और एक सिहरन उसके बदन में दौड़ गई। कर्मा उसके बेटे विक्रम से भी छोटा था, मगर एक जवान लड़के को अपने बदन के लिए इतना आकर्षित देखकर रजनी को मन ही मन गुदगुदी हो रही थी।

चाची, नाश्ता तो बनता रहेगा, अपनी सुंदर चाची से प्यार तो कर लेने दो,” कर्मा ने शरारती अंदाज़ में कहा।“अरे नहीं, लल्ला, ये बुढ़िया चाची कहाँ से सुंदर लग रही है तुझे?” रजनी ने मजाक में जवाब दिया।

अरे चाची, तुम और बुढ़िया? तुम तो अभी जवानों से भी जवान हो,” कर्मा ने रजनी के पेट को मसलते हुए कहा।

कर्मा की हरकतों और उसके लंड की चुभन का असर रजनी पर पड़ रहा था। उसका बदन गरम हो रहा था, और उसकी टाँगों के बीच हल्की नमी महसूस हो रही थी।

तभी सरोज तैयार होकर रसोई में आई और कर्मा को रजनी से चिपके देख बोली, “अरे रजनी, आ गई तू? और ये क्यों लाड़ लगा रहा है तुझसे?

रजनी थोड़ा झेंप गई और बोली, “अरे जीजी, देखो न लल्ला को, नाश्ता नहीं बनाने दे रहे।

अरे कर्मा, क्यों परेशान कर रहा है चाची को? जा, उन्हें काम करने दे,” सरोज ने डाँटते हुए कहा।

अरे माँ, मैं तो बस चाची को बता रहा था कि वो कितनी सुंदर हैं,” कर्मा ने रजनी से हटते हुए कहा और रसोई से बाहर निकल गया।

जाते हुए सरोज की नज़र अपने बेटे के पैंट में बने तंबू पर पड़ी, और उसके चेहरे पर एक मुस्कान आ गई।“क्या बात है, रजनी? सब खुश हैं तुझसे?” सरोज ने शरारती लहजे में पूछा।

मतलब, जीजी?” रजनी ने हिचकते हुए कहा।“मतलब, सब की अच्छे से सेवा कर रही है तू। सब तेरे काम से खुश हैं—बच्चे, बड़े, सब,” सरोज ने आँख मारते हुए कहा।

जीजी, सेवा करने ही तो आई हूँ मैं यहाँ। क्या तुम खुश नहीं हो मुझसे?” रजनी ने मासूमियत से पूछा।

मेरी सेवा तूने करी ही कहाँ है अभी?” सरोज ने मजाकिया लहजे में कहा।

चलो जीजी, अभी कर दूँगी। बताओ, क्या करना है?” रजनी ने उत्साह से कहा।

बताऊँगी। चल, अभी खाना बना ले, फिर करवाती हूँ तुमसे सेवा,” सरोज ने एक कामुक मुस्कान के साथ कहा, जिसे रजनी समझ नहीं पाई।

बाहर सोनू का दिल जोरों से धड़क रहा था। उसके मन में कई खयाल चल रहे थे। वह जानना चाहता था कि उसकी माँ के साथ हवेली में कुछ गलत तो नहीं हो रहा। बार-बार उसकी माँ का नंगा बदन नीलेश के साथ चिपका हुआ उसके सामने कौंध रहा था। वह हवेली के दरवाजे को झाँक रहा था, शायद माँ की एक झलक मिल जाए।

तभी कर्मा हवेली से बाहर निकला और उसकी आँखें सोनू पर पड़ीं। सोनू ने चेहरा घुमा लिया, मगर कर्मा उसकी ओर चलकर आया और बोला, “चल सोनू, थोड़ा घूमकर आते हैं।

नहीं कर्मा भैया, अभी मुझे फुलवाड़ी में काम है,” सोनू ने हिचकते हुए कहा।कर्मा ने पास खड़े माली पर नज़र डाली। माली खुद ही बोल पड़ा, “अरे नहीं, सोनू बेटा, तुम जाओ छोटे मालिक के साथ। यहाँ इतना कोई काम नहीं है।

कर्मा मुस्कुराने लगा, और सोनू को मजबूरी में उसके साथ जाना पड़ा। कर्मा ने उसे अपनी मोटरसाइकिल पर बैठाया। सोनू पकड़कर बैठ गया। उसके लिए मोटरसाइकिल एक सपने से कम नहीं थी। उनके घर में साइकिल भी नहीं थी, और वह मोटरसाइकिल पर बैठ रहा था। एक अलग अहसास उसके मन में जाग रहा था, जो उसकी उम्र के हिसाब से स्वाभाविक था। इस उम्र में ऐसी गाड़ियाँ मन को अपनी ओर खींचती हैं।

कर्मा सोनू को मोटरसाइकिल पर बैठाकर निकल पड़ा। सोनू को मोटरसाइकिल पर बैठकर बड़ा मज़ा आ रहा था। कितनी तेज चल रही थी! साइकिल में तो पैडल मारना पड़ता है, मगर इसमें ऐसी कोई चिंता नहीं। बस बैठो और फुर्र से चल पड़ती है। गाँव से जब मोटरसाइकिल निकली, तो सोनू को लग रहा था कि सबकी नजरें उन पर ही थीं। वह सोच रहा था, “देखो, कैसे सब जल रहे हैं मुझे मोटरसाइकिल पर बैठे देख!” मोटरसाइकिल के साथ-साथ सोनू के खयाल भी भाग रहे थे।

कर्मा उसे गाँव से थोड़ी दूर बाज़ार में ले गया, जहाँ एक दुकान के आगे उसने मोटरसाइकिल रोकी। दुकानवाले ने कर्मा को देखते ही पहचान लिया और बोला, “आओ आओ, छोटे मालिक, अंदर चलकर बैठो।”दुकानवाला दोनों को अंदर ले गया और एक मेज़ के साथ दो कुर्सियों पर बैठा दिया। उसने पहले से साफ मेज़ को और साफ करते हुए कहा, “कहिए मालिक, क्या सेवा करूँ? क्या लगाऊँ?

कर्मा ने कहा, “दो ठंडी कोका कोला और दो दोना समोसे लगा।” दुकानदार बोला, “जी, बहुत अच्छा, अभी लाया।

सोनू के मुँह में पानी आ रहा था। बहुत दिन हो गए थे उसे समोसा चखे, और कोका कोला का तो उसने बस नाम सुना था। उसका मन इस ओर भी जा रहा था कि कर्मा उस पर इतनी मेहरबानी क्यों कर रहा है।

इससे पहले कि वह और सोचता, एक भरे बदन की औरत अपनी चूचियाँ हिलाती हुई आई और समोसे मेज़ पर उनके सामने रख दिए। उसने अपने पल्लू से पसीना पोंछा, तो उसका पेट और गहरी नाभि दिखाई दी, जिसे देखकर सोनू की नज़र पल भर को ठहर गई।





बाबू, चटनी दूँ का?” औरत ने पूछा। सोनू हड़बड़ाते हुए बोला, “नहीं, नहीं।” वह औरत चली गई और तुरंत दो बोतल कोका कोला लेकर आई, जो दूर से ही ठंडी लग रही थीं, मुँह से ठंडा धुआँ निकल रहा था। देखते ही सोनू के मुँह में पानी आ गया। औरत ने बोतलें रख दीं, और कर्मा ने एक बोतल उठाकर मुँह से लगा ली। सोनू इन सब में खोया हुआ था।

उसे देखकर औरत मुस्कुराते हुए बोली, “अरे बाबू, तुम भी खाओ न, कहाँ खोए हुए हो?”

कर्मा ने भी कहा, “हाँ सोनू, खा न, क्या सोच रहा है?” सोनू ने सिर हिलाकर खाना शुरू किया। उसे कर्मा के साथ होने पर जो आवभगत और सम्मान मिल रहा था, वो अच्छा लग रहा था। नहीं तो दुकानवाला उसे दुकान के आसपास भी नहीं भटकने देता। समोसे को चखने पर सोनू को मज़ा आ गया। फिर उसने ठंडी बोतल उठाकर मुँह से लगाई, तो जैसे-जैसे उसका गीला रस गले में उतरा, उसे शीतल करता चला गया।

औरत रखकर मुड़कर गई, तो कर्मा की नज़र उसके थिरकते चूतड़ों पर जमी थी। “आह, क्या मस्त चूतड़ हैं यार,” कर्मा ने धीरे से कहा, जो सोनू को सुनाई दिया। सुनकर सोनू ने भी उस औरत के थिरकते चूतड़ों को निहारा और उसे भी अपने अंदर एक गर्मी का एहसास हुआ,





कर्मा: साली के चूतड़ हैं या मटके, कैसे ऊपर नीचे हो रहे हैं।

सोनू के चेहरे पर भी ये सुनकर मुस्कान आ गई। सोनू ने कर्मा को देखा, और दोनों हँसने लगे। दोनों के बीच एक नए तरह का रिश्ता पनप रहा था।

इधर, हवेली में खाना बन चुका था, और रजनी सरोज के कमरे में खड़ी थी। सरोज ने पूछा, “सारा काम हो गया न?”

रजनी ने जवाब दिया, “हाँ जीजी, अब बताओ तुम्हारी क्या सेवा करनी है।

सरोज बोली, “कल से ही बदन टूट रहा है, थोड़ी मालिश कर दे।” रजनी ने उत्साह से कहा, “हाँ जीजी, बिल्कुल, तुम लेट जाओ, अभी कर देती हूँ।

सरोज ने कहा, “हाँ, अभी ले, पीछे आरे से तेल की शीशी उठा ले।”जब तक रजनी शीशी उठाकर लाती, सरोज लेट चुकी थी। रजनी ने सबसे पहले सरोज के हाथों की मालिश शुरू की।

सरोज बोली, “अच्छा लग रहा है, तेरे हाथ अच्छा चलते हैं।

रजनी ने हँसते हुए कहा, “अरे बस जीजी, ये तो कोई भी कर लेगा।

रजनी ने दोनों हाथों की मालिश की, फिर थोड़ा तेल लिया और सरोज की साड़ी को उसके पेट से हटाकर पेट को मसलने लगी,





जिससे सरोज की हल्की आह निकल गई। क्या जीजी, इतने से झटके में आह निकल गई तुम्हारी तो,” रजनी ने मज़ाक करते हुए कहा।

सरोज ने पलटवार किया, “हाँ, मेरी तो निकल जाती है, तू तो तगड़े-तगड़े झटके यूं ही झेल जाती है।

सरोज की बात से रजनी झेंप गई और शर्मा गई। “धत्त जीजी, तुम भी न,” रजनी ने कहा।

देखो तो, कैसे शर्मा रही है, नई दुल्हन की तरह,” सरोज ने हँसते हुए कहा।

रजनी बोली, “अरे जीजी, अब मेरा शर्माना छोड़ो और अपना ब्लाउज़ हटाओ, नहीं तो तेल से खराब हो जाएगा।

सरोज ने कहा, “हाँ, अभी ले,” और उठकर बैठ गई। उसने साड़ी का पल्लू कमर से नीचे इकट्ठा कर दिया और ब्लाउज़ उतार दिया। अब सरोज का बदन सिर्फ ब्रा और साड़ी में था। रजनी उसकी मालिश करने लगी।





जीजी, तुम्हारा बदन बहुत चिकना है, एकदम मलाई जैसा,” रजनी ने तारीफ की।

अरे, मलाई है तो तू चखकर देख ले,” सरोज ने शरारती लहजे में कहा।

रजनी हँसी, “अरे जीजी, तुम भी न, बड़ी वो हो। चलो, अब घूमो, कमर की भी कर दूँ।” सरोज बोली, “अरे, इसमें वो की क्या बात है,” और घूम गई। रजनी उसकी कमर और पीठ की मालिश करने लगी।





आराम मिल रहा है, जीजी?” रजनी ने पूछा। “हाँ रजनी, बहुत अच्छा लग रहा है। तेरे हाथों में सच में आराम मिल रहा है,” सरोज ने जवाब दिया।

रजनी कुछ देर चुप रही, फिर बोली, “जीजी, अब कमर भी हो गई, टाँगें भी करनी हैं क्या?

सरोज ने कहा, “हाँ, कर देगी तो अच्छा लगेगा।

रजनी बोली, “फिर साड़ी? ये खराब होगी।

सरोज ने तुरंत कहा, “अरे, क्यों होगी? ले, अभी उतार देती हूँ।” सरोज उठी और अपनी साड़ी के साथ पेटीकोट भी उतार दिया। उसका गोरा, भरा, और चिकना बदन सिर्फ कच्छी और बनियान में था। रजनी की आँखें उस पर टिक गईं।

सरोज वापस लेट गई और बोली, “वैसे, साड़ी तो तेरी भी खराब हो सकती है, तू भी उतार दे।” रजनी थोड़ा चौंकी, “अरे नहीं जीजी, ऐसे ही ठीक है।

सरोज ने हँसते हुए कहा, “अरे, शर्मा क्या रही है? मुझे देख, तेरे सामने अधनंगी पड़ी हूँ, तू बेकार में शर्मा रही है।” रजनी सरोज को मना नहीं कर पाई और अपनी साड़ी उतार दी।

अब वह पेटीकोट और ब्लाउज़ में थी। वह सरोज के पैरों की मालिश करने लगी। पैरों से ऊपर बढ़ते हुए जब वह जाँघों तक पहुँची, सरोज की आह निकल गई। रजनी को सरोज के नंगे बदन को छूना अच्छा लग रहा था, और सरोज को भी रजनी का स्पर्श भा रहा था। सरोज की गर्म साँसें रजनी को उत्तेजित कर रही थीं।





रजनी, एक काम करेगी?” सरोज ने गर्म आवाज़ में कहा। रजनी बोली, “हाँ जीजी, कहो न, क्या करना है?

सरोज ने कहा, “बिमला को आवाज़ लगा दे, अब आगे वो करेगी।”

रजनी ने हैरानी से कहा, “क्यों जीजी, मैं कर तो रही हूँ।

सरोज ने जवाब दिया, “जैसा मुझे चाहिए, वैसे तू नहीं कर पाएगी अभी। तुझे सीखना पड़ेगा।

रजनी को कुछ समझ नहीं आया, मगर सरोज की बात मानते हुए वह बोली, “ठीक है जीजी, बुलाती हूँ।” रजनी दरवाजे तक गई और बिमला को आवाज़ दी।

कुछ ही देर में बिमला आई और अंदर आकर दरवाजा बंद कर दिया। उसने रजनी को मुस्कुराकर देखा। सरोज बोली, “आ गई बिमला, चल अब अपनी खास वाली सेवा कर दे। और रजनी, अगर सीखना चाहे तो उसे भी सिखा दे।

बिमला ने कहा, “हाँ मालकिन, बिल्कुल,” और अपनी साड़ी उतारने लगी।

जारी रहेगी।
 
रजनी को कुछ समझ नहीं आया, मगर सरोज की बात मानते हुए वह बोली, “ठीक है जीजी, बुलाती हूँ।” रजनी दरवाजे तक गई और बिमला को आवाज़ दी।

कुछ ही देर में बिमला आई और अंदर आकर दरवाजा बंद कर दिया। उसने रजनी को मुस्कुराकर देखा। सरोज बोली, “आ गई बिमला, चल अब अपनी खास वाली सेवा कर दे। और रजनी, अगर सीखना चाहे तो उसे भी सिखा दे।

बिमला ने कहा, “हाँ मालकिन, बिल्कुल,” और अपनी साड़ी उतारने लगी।



अध्याय आठ
जल्दी ही बिमला की साड़ी जमीन पर थी, रजनी एक मेले में आए खेल देखने वाले बच्चे की तरह थी और अब क्या होगा ये सोच कर हैरानी से देख रही थी, बिमला अपनी साड़ी तक ही नहीं रुकी बल्कि उसने कुछ ऐसा किया जिससे रजनी हैरान रह गई, बिमला ने साड़ी के बाद ब्लाउज उतारा और फिर पेटीकोट और एक एक करके लगभग सारे कपड़े ही उसके ज़मीन पर थे और बिमला के बदन पर बस एक कच्छी थी और वो दोनों के बीच खड़ी थी।

रजनी की आँखें तो बिमला के नंगे बदन पर जमी हुईं थीं, बिमला खुद नंगी हुई और सरोज की ओर बढ़ी,

बिमला बिस्तर के पास पहुंची

सरोज: आ गई अब दिखा अपना कमाल रजनी को।

बिमला: जी मालकिन,

बिमला ने एक बार रजनी की ओर देखा मानो कह रही हो कि देख और सीख, उसने अपने हाथ बढ़ाए और सरोज की ब्रा को उसके सीने से खोल कर अलग फेंक दिया, सरोज की मोटी चूचियां नंगी सामने आ गईं, रजनी की तो आँखें और फैल गई उसका दिल जोरों से धड़कने लगा, वो सरोज की मोटी चूचियों की सुंदरता देख मन ही मन उनकी तारीफ करने लगी,

बिमला ने सरोज की नंगी चूचियों को एक दो बार मसला और फिर कटोरी से हथेली में तेल लिया और तेल भरे हाथों से सरोज की चूचियों से खेलने लगी और सरोज की आहें निकलने लगीं। बिमला सरोज की चूचियों को आटे की तरह कभी गूंथती तो कभी उन्हें पकड़ कर हिलाती।





और बिमला की हर हरकत पर सरोज आहें भर रही थी, रजनी का तो ये खेल देख बुरा हाल था वो अपनी उत्तेजना दबाए हुए बस देखे जा रही थी, उसकी टांगों के बीच की नमी उसे महसूस हो रही थी,

बिमला: आह जीजी तुम्हारी चूचियां कितनी मुलायम है मानों माखन की पोटलियां हों।

सरोज: आह ऐसे ही कर इन पर तेरे हाथों का स्पर्श बहुत अच्छा लगता है मुझे आह तुझे पता है इनसे कैसे खेलना है एक अलग आनंद देती है तू,

बिमला: आह हां मालकिन मुझे भी तुम्हारे गुब्बारों से खेलना बहुत पसंद है,

ये कह बिमला अपना मुंह एक चूची पर लगा कर उसे चूसने लगती है और सरोज की आंखें बंद हो जाती है सिर पीछे की ओर हो जाता है,

वहीं कोने में बैठी रजनी चुपचाप सब देख रही थी। पहले वो सरोज की मालिश करने आई थी, पर अब बस देखती जा रही थी—बिमला के हाथों की लय, सरोज की मचलती साँसें, और उनके बीच का अनकहा साज़।

सरोज की आँखें खुलीं और रजनी की ओर उठीं। “क्या हुआ रजनी, ऐसे क्या देख रही है?”

रजनी सकपकाई, “कुछ नहीं जीजी… बस… देख रही थी।”

सरोज ने हँसते हुए कहा, “देख न… सीखना भी है तुझे। बिमला अच्छा पढ़ा रही है आज। ऐसी मास्टरनी नहीं मिलेगी तुझे,

रजनी को अजीब लग रहा था कि नंगी होने के बाद भी दोनों कितनी आसानी से बात कर रही हैं न कोई झिझक न कोई शर्म।

बिमला ने एक शरारती मुस्कान के साथ सरोज चूची को मुंह से निकालते हुए कहा, “सीखने के लिए पहले मन खोलना पड़ता है… और देह भी।”

रजनी और बिमला की नज़र मिली इस बात पर फिर बिमला ने सरोज की चूची को मुंह में भर लिया पर उसकी बात रजनी के मन में घूमने लगी, उधर बिमला ने सरोज की चूची को मुंह से निकाला और फिर दोनों अपनी अपनी चूचियों को एक दूसरे में घिसते हुए बच्चियों की तरह खिलखिलाने लगी,





रजनी को ये देख लगा कि दोनों कितनी खुश लग रही हैं, क्या वो भी इतनी खुश हो सकती है कभी क्या उसके अंदर भी इतनी खुशी बाकी है रजनी ये सब सोच रही थी वहीं सरोज और बिमला एक दूसरे की चूचियों को आपस में मिला रही थी और जल्दी ही दोनों के होंठ भी मिल गए और एक दूसरे के होंठो को चूसने लगी, रजनी के लिए ये बहुत नया था वो पहली बार दो औरतों को एक दूसरे के चूमते हुए देख रही थी पर देखते हुए हर पल उसके बदन की गर्मी बढ़ती जा रही थी।

सरोज और बिमला के होंठ अलग हुए बिमला ने सरोज को बिस्तर के सामने पड़े सोफा पर बैठा दिया और उसके होंठों को एक बार फिर से चूमा। दोनों की नजरें एक बार फिर से रजनी की ओर गईं जो खड़े खड़े दोनों के इस खेल को देख रही थी,

सरोज ने रजनी की प्यासी आंखों को देखा और बोली: देख रजनी मैं तुझसे कुछ भी ऐसा नहीं करवाऊंगी जो तू न करना चाहे, अब तेरे पास दो रास्ते हैं, या तो तू कमरे से चली जा और दूसरा कोई काम कर या आगे बढ़ और हमारे साथ शामिल हो, मर्ज़ी तेरी है।

बिमला: पर रजनी जीजी हमारी बात याद है न, मन और देह दोनो खोलना पड़ेगा।

बिमला ने ये कहा और फिर सरोज ने इतने में बिमला की चूची को मुंह में भर लिया और चूसने लगी, बिमला की सिसकी और खिलखिलाहट निकली।

रजनी के लिए दुविधा हो गई थी, उसका अंतर्मन उसे बता रहा था कि ये सब गलत है और उसे सही मौका मिला है यहां से जाने का और इस महापाप से बचने का, पर उसकी नजरें तो सरोज और बिमला से हट ही नहीं रही थी, उसके कदम इतने भारी हो गए थे कि हिल ही नहीं रहे थे बिमला और सरोज का तो उस पर ध्यान ही नहीं था, सरोज सोफे पर बैठी थी और बिमला सोफे पर ही उसके बगल में घुटनों पर खड़ी होकर अपनी चूचियों को चुसा रही थी। अचानक से सरोज को अपनी चूची पर गर्म एहसास हुआ और उसने बिमला के चूचे से मुंह हटा कर देखा तो उसके दूसरी तरफ रजनी आ चुकी थी, और सरोज की चूची को पकड़ कर चूसने लगी थी, ये देख बिमला के चेहरे पर भी मुस्कान आ गई।





वहीं सरोज के मुंह से आहें निकलने लगी, और वो बापिस बिमला की चूची को मुंह में भरने लगी। रजनी ने अपने मन और मस्तिष्क में से मन की बात सुनी थी और सरोज की चूचियों को चूस रही थी, उसे ऐसा लग रहा था मानो सरोज की चूचियों से रस उसके मुंह में घुल रहा है। सरोज बिमला की चूचियों को चूस रही थी और बिमला आहें भर रही थी।

बिमला: आह मालकिन ओह ऐसे ही। आह रजनी जीजी तुम भी बहुत अच्छे से चूस रही हो मालकिन की मोटी चूचियां।

रजनी ने बिना मुंह हटाए ही बिमला की ओर देखा और आंखों ही आंखों में मुस्कुराई।।

बिमला: पर ये क्या रजनी जीजी मैने कहा था न देह और मन दोनों को नंगा करना पड़ेगा।

ये सुन रजनी ने अपना मुंह हटाया सरोज कि चूचियों से और ब्लाउज़ उतारने लगी कुछ ही देर में उसकी नंगी चूचियां सामने थीं।

वहीं बिमला भी उठी और अपनी कच्छी में उंगलियां फंसा कर नीचे सरका दी और पूरी नंगी हो गई, और फिर सरोज की टांगों के बीच आ गई सरोज की कच्छी को भी नीचे सरका दिया, रजनी खुद के कपड़े निकालते हुए सकुचा कर सरोज और बिमला को देख रही थी, अभी भी उसमें शर्म बाकी थी, उसने ब्रा उतार दी बस पेटीकोट उसके बदन पर था, और वो खड़ी खड़ी शर्मा रही थी,

सरोज और बिमला ने उसकी ओर देखा और उठ कर उसके पास गई और दोनों ओर से उसे घेर लिया,

सरोज: ये हुई न बात रजनी तूने बिल्कुल सही फैसला लिया है।

बिमला: पर जीजी अभी भी थोड़ी कमी है, ये कह कर बिमला ने रजनी का पेटीकोट उठा कर उसकी कमर पर इकठ्ठा कर दिया अब रजनी की चूत भी सबके सामने थी, जिस पर लगती हुई ठंडी हवा रजनी को महसूस हो रही थी,

बिमला और सरोज दोनों ने रजनी की एक एक चूची को मुंह में भर लिया और चूसने लगीं





दोनों के हाथ रजनी के नंगे चूतड़ों पर घूमने लगे, रजनी की आँखें बंद हो गई और उसके मुंह से आहें और सिसकियां निकलने लगीं।

रजनी: आह जीजी ओह बिमला आह अच्छा लग रहा है आह हम्मम।

रजनी को यकीन नहीं हो रहा था कि वो कभी औरतों के आमने इस अवस्था में होगी और उससे भी बड़ी बात उसे औरतों का साथ भा रहा था, उसने सोचा नहीं था कि औरतें भी एक दूसरे को इस प्रकार का सुख दे सकती हैं उसे तो यही लगता था कि संभोग से जुड़ी सब चीजें मर्द और औरत के बीच ही हो सकती हैं।

सरोज ने कुछ पल बाद उसकी चूची से मुंह हटाया और बोली: बिमला अब रजनी को अगला पाठ पढ़ा वैसे भी अब अपनी चूत की खुजली सही नहीं जा रही मुझसे।

रजनी को थोड़ी हैरानी हो रही थी सरोज के मुंह से खुले शब्द सुनकर फिर उसने कमरे का माहौल देखा तो खुद उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई,

बिमला और सरोज उसके बगल से हट गई थीं बिमला नीचे बैठ गई सोफा के सहारे और सरोज ने सोफे पर चढ़ कर अपनी टांगें फैलाकर बिमला के मुंह पर रख दिया और बिमला बिना देरी किए अपनी जीभ चलाने लगी, और सरोज के मुंह से आहें निकलने लगीं,

रजनी खड़े खड़े ये सब देख हैरान थी एक औरत को दूसरे औरत की चूत चाटते देखना ये दृश्य वो पहली बार देख रही थी पर इस बार वो सिर्फ दर्शक नहीं बनना चाहती थी वो आगे बढ़ी और फिर से सरोज के बगल में जाकर उसकी चूची को मुंह में भर लिया, सरोज तो दोहरे मजे से आहें भरने लगी।





सरोज: आह ओह बिमला आह ऐसे ही जीभ चला अपनी ओह अह रजनी चूस ऐसे ही आह दिखा तेरे अंदर कितनी गर्मी है।

बिमला और रजनी मिलकर हवेली की मालकिन की सेवा कर रही थी और वो उस आनन्द से सिसक रही थी बदन मचल रहा था,

सरोज ये दोहरा मज़ा ज़्यादा देर तक नहीं सह पाई और उसका बदन थरथराते हुए झड़ने लगा, झड़ते हुए वो नीचे फिसलती हुई सोफे पर लेट गई और हांफने लगी।

सरोज: आह ओह अह बिमला, क्या जादू करती है ओह तू।

बिमला ने मुस्कुराते हुए अपने मुंह पर लगे रस को अपनी उंगलियों पर लिया और फिर उंगलियां भी चाटने लगी, रजनी बिमला के इस फूहड़पन को मुस्कुराते हुए देख रही थी, बिमला ने एक उंगली रजनी की ओर बढ़ाई मानो पूछ रही हो कि स्वाद लेना चाहोगी, और उसे और खुद को हैरान करते हुए रजनी ने उंगली को मुंह में लेकर चूस लिया उसे एक अलग सा स्वाद आया उंगली से पर वो बुरा नहीं लगा बल्कि उसे और उत्तेजित कर गया।

बिमला ने ये देखा तो वो जोश और उत्तेजना से भर गई और अगले ही पल उसने रजनी के होंठों से अपने होंठो को मिला दिया, रजनी इस अचानक हमले से हैरान हुई पर कुछ पल बाद वो भी ऐसे साथ देने लगी मानो हमेशा से ये करती आ रही हो, सरोज लेट कर मुस्कान के साथ दोनों को देख रही थी, और अपनी चुचियों से खेल रही थी,

बिमला और रजनी एक दूसरे को चूमते हुए सोफे पर लेट जाती हैं बिमला नीचे होती है और रजनी ऊपर दोनों की मोटी चूचियां आपस में दब जाती हैं दोनों एक दूसरे के होंठों को छोड़ नहीं रहीं, सरोज उनकी टांगों की ओर बैठती है और उसके सामने रजनी की चूत होती है, सरोज रजनी की चूत को हाथ बढ़ाकर सहलाने लगती है, सरोज की उंगलियों को अपनी चूत पर महसूस करते ही रजनी के बदन में सनसनी होती है उसका चेहरा ऊपर उठ जाता है आँखें बंद हो जाती है, सरोज एक उंगली उसकी चूत में घुसा देती है और रजनी की उत्तेजना और आनदं और बढ़ जाता है।





बिमला नीचे से रजनी की छाती और गर्दन को चूमने लगती है, रजनी को ऐसा आनंद कभी नहीं आया था, उसके साथ दो दो औरतें थीं जो उसने बदन के साथ खेलते हुए आनंद पहुंचा रहीं थी, वो वासना और आनदं में बह रही थी, रजनी उस आनदं में डूब कर हिलोरे मार रही थी उसका बदन हर हरकत पर सिहर रहा था और फिर कुछ देर के सुख के बाद एक तीव्र सी ऊर्जा उसके बदन से निकलने लगी, उसका बंद कांपने लगा और वो झड़ने लगी

कुछ देर यूं ही कमरे में शांति रही फिर रजनी के बदन में बापिस जान सी आई,

बिमला: अरे उठो रजनी जीजी ऊपर से तुम तो सोने लगी हमारे ऊपर,

बिमला ने हंसते हुए कहा, तो रजनी उसके होंठों को चूमकर उठ गई, रजनी उठी तो बिमला बोली: क्यों जीजी कैसा लगा?

रजनी ने शर्माकर पहले उसे देखा और फिर सरोज को और फिर बोली: ऐसा तो पहले कभी महसूस नहीं किया ऐसा भी मज़ा आ सकता है सोचा भी नहीं था।

बिमला: चलो तुमने मज़ा ले लिया अब मेरी रसभरी भी बहुत देर से राह देख रही है, ले लो स्वाद इसका भी।

बिमला ने अपनी टांगें खोलते हुए अपनी चूत को दिखाते हुए कहा,

रजनी ने बिमला की चूत को देखा फिर उसके चेहरे की ओर और बोली: पर करना कैसे है मैं नहीं जानती?

बिमला: अरे बस तुम शुरू करो सब अपने आप आ जाएगा।

रजनी ने बिमला के कहे अनुसार अपने चेहरे को आगे किया और बिमला की चूत के पास ले गई, एक अजीब और अलग सी गंध उसकी नाक में घुल गई, सकुचाते हुए रजनी ने जीभ निकाली आग बिमला की गीली चूत पर रखी तो बिमला की आह निकली और साथ ही रजनी के बदन में भी सिरहन हुई। एक अलग सा स्वाद उसकी जीभ पर आया वहीं बिमला चीख पड़ी, कुछ देर तक रजनी नई नई सीखी कला का अभ्यास बिमला पर करती रही बिमला कराहती रही सरोज पास बैठे ये सब देख रही थी।

कुछ देर बाद बिमला झड़ गई और रजनी ने उसके पैरों के बीच से मुंह निकाला तो उसका मुंह गीला था और उसके चेहरे पर बड़ी मुस्कान थी।

सरोज: बहुत अच्छे रजनी तू तो बहुत जल्दी सीख रही है, अब आ मुझे भी दिखा तूने क्या सीखा, रजनी तुरंत सरक कर सरोज के पैरों के बीच आ गई और अब एक आत्मविश्वास के साथ सरोज की चूत चाटने लगी, सरोज उसकी जीभ की कला के असर से आहें भरने लगी, रजनी को अपनी जीभ के बल पर सरोज को इस तरह आहें भरवाने और उसके बदन को नचाने में मज़ा आ रहा था,

कुछ पल बाद बिमला उठी और रजनी और सरोज के बगल में बैठ गई,

बिमला: अरे वाह जीजी बहुत अच्छे से चाट रही हो बहुत अच्छे से सीख गई तुम तो,

सरोज: आह सही कह रही है बिमला, आह क्या मस्त जीभ चला रही है ये, आह इसे तो सिखाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी। आह पूरी तैयार है पहले से ही।

सरोज ने रजनी का सिर पकड़ कर अपनी चूत उसके मुंह पर घुमाते हुए कहा,

रजनी दोनों की बातों को बिना अपनी जीभ हटाए सुन रही थी और उत्तेजित हो रही थी।

पूरी तैयार हैं या नहीं अभी देख लूं मालकिन?

सरोज: आह हम्मम।

रजनी को समझ नहीं आया कैसे देखने की बात हो रही है, पर तभी उसे अपने सिर पर बिमला का हाथ महसूस हुआ जिसने उसके बालों को पकड़कर उसे सरोज को चूत से थोड़ा अलग किया, रजनी की नजरें अभी भी सरोज की चूत पर थीं, सरोज ने अपनी टांगों को थोड़ा और पीछे की ओर मोड़ लिया जिससे उसके चूतड़ और खुल गए, बिमला ने फिर रजनी के चेहरे को आगे धकेला और अब उसके मुंह को सरोज की गांड के छेद के करीब कर दिया, रजनी समझ गई ये ही थी वो तैयारी वाली बात, रजनी सरोज की गांड के भूरे कसे हुए छेद को देखने लगी, ये वो छेद है जिसे बदन का सबसे गंदा हिस्सा कहा जाता है, जिससे सब घिन खाते हैं पर सरोज की गांड का छेद ऐसा कुछ नहीं था,

बल्कि उसका छेद तो उसे सुंदर लग रहा था, चूतड़ों के बीच एक बंद गोल छोटी सी खिड़की जैसा, रजनी का चेहरा अपने आप आगे हो गया और उसने अपनी जीभ सरोज के छेद पर फिराई, तो सरोज का पूरा बदन कांप गया, और बिमला और सरोज दोनों के चेहरे पर मुस्कान आ गई, वहीं सरोज की गांड चाटते ही रजनी को अपने अंदर कुछ बदलता हुआ सा अहसास हुआ उसे लगा अब सब कुछ बदल रहा है, वो अपने अंदर एक नई ताकत और आज़ादी महसूस करने लगी, बस वो फिर सरोज की गांड चाटने पर पूरी लगन से लग गई, जीभ से उसके छेद को कुरेदने लगी, और सरोज पागल होने लगी,





सरोज ने बिमला को इशारा किया तो बिमला सरोज के चेहरे पर आकर बैठ गई, सरोज उसकी चूत चाटने लगी, तीनों का ये खेल तब तक चला जब तक तीनों एक एक बार और स्खलित नहीं हो गईं। और तीनों थक कर कमरे में लेट गईं, रजनी जानती थी आज उसके अंदर कुछ बदला है, अब वो पहले वाली रजनी नहीं रह गई थी।

दूसरी ओर बाज़ार से निकल कर कर्मा ने मोटरसाइकिल सड़क के एक किनारे पर लगा दी और उस पर बैठ गया, सोनू भी उसके बगल में खड़ा हो गया,

सोनू: कर्मा भैया हम यहां क्यों रुके हैं? कोई काम है?

कर्मा: अरे काम तो नहीं हैं पर काम की चीज हैं,

कर्मा ने खेत की ओर इशारा करते हुए कहा तो सोनू ने उस ओर देखा,

खेत के किनारे तीन औरतें थीं शायद मजदूर थीं, तीनों में से एक सास और दो बहुएं थीं जो खेत में से बालियां बीन रहीं थीं।





तीनों ही मज़दूर थीं पर तीनों के ही बदन भरे हुए और कामुक थे साथ ही उनकी साड़ी ऐसी थी जो उनका पेट और बदन दिखा रही थी।

सोनू: इनका क्या करोगे भैया?

कर्मा: थोड़ी गर्मी शांत करूंगा, तुझे करना है क्या?

सोनू को जैसे ही बात समझ आई उसने तुरंत ना में सिर हिला दिया।

कर्मा: अरे आ तू न शर्माता बहुत है,

सोनू: नहीं भैया सही में मुझे कुछ नहीं करना,

सोनू ने घबराते हुए कहा,

कर्मा: ठीक है मत कर आ मेरे साथ तो चल।

सोनू उसके साथ साथ चल दिया सिर हिलाकर।

कर्मा और वो चलकर खेत के अंदर गए जहां वो तीनों औरतें काम कर रही थीं कर्मा ने एक को इशारा किया तो जो सबसे अधिक उम्र की थी वो आगे आई, कर्मा ने अपना पर्स जेब से निकाला और उसमें से एक नोट निकाल कर उस औरत को थमा दिया,

औरत: कौन चाहिए मालिक?

कर्मा: तू,

ये सुनकर औरत थोड़ी मुस्कुराई साथ ही उसके पीछे खड़ी बहुएं भी आपस में खुसुर पुसुर कर रही थी,

औरत: और ये बाबू,

कर्मा: इसे कुछ नहीं चाहिए,

सोनू ये सब ध्यान से और हैरानी से देख रहा था,

कर्मा उस औरत को लेकर आगे बढ़ा और सोनू उसके पीछे पीछे साथ ही उसकी दोनों बहुएं भी, खेत को पार करके वो लोग एक जगह पहुंचे जहां घास थी,

औरत: मालिक यहीं सही है,

कर्मा: हां ठीक है,

कर्मा ने अपने पैंट से पर्स निकाला और सोनू को पकड़ा दिया फिर पैंटी खोलने लगा।

औरत: ए तुम दोनों खेत में काम करो तब तक जाओ,

उसने अपनी बहुओं से कहा,

फिर सोनू से बोली: बाबू तुम भी बाहर इंतजार कर लो थोड़ा,

सोनू उसकी बात सुन कर मुड़ा ही था।

कर्मा: नहीं सब यहीं रुकेंगे, तेरी बहुएं भी और ये भी।

औरत ने कर्मा की ओर देखा और फिर अपनी नजरें नीची करके साड़ी खोलने लगी, और साड़ी उतार कर नीचे बिछा दी।

और उस पर खुद लेट गई अपने पेटिकोट को कमर तक उठाकर,

औरत: आ जाओ मालिक,

कर्मा: साली ऐसे नहीं पूरे कपड़े उतार,

औरत उठ कर बैठी एक बार कर्मा को देखा फिर उसकी आंखों मे देख और समझ गई कि उससे कुछ नहीं कह सकती थी, उसने ये सोचा और फिर अपने सारे कपड़े उतारने लगी, और पूरी नंगी हो गई अपनी बहुओं के सामने।

कर्मा ने भी अपने कपड़े उतारे और सोनू के हाथ में दे दिए। सोनू इन सब को हैरानी और बहुत ध्यान से दे रहा था, औरत के नंगे बदन को देख कर उसे भी उत्तेजना हो रहीं थी।

कर्मा पूरा नंगा हो कर आगे बढ़ा और औरत को घोड़ी बनाया, और फिर उसके पीछे जगह ली और फिर पीछे से अपना मोटा कड़क लंड उसकी चूत में घुसा दिया जिससे उस औरत की आह निकल गई। कर्मा औरत की कमर थाम उसे चोदने लगा।





औरत आह आह करके आहे भर रही थी और सोनू पहली बार चुदाई देख रहा था अपनी आंखों से उसका लंड पेंट में कड़क हो चुका था पर अभी वो झिझक और शर्म से कुछ नहीं कर पा रहा था सिवाय देखने के।

कर्मा ने औरत को काफी देर चोदा और फिर जब निकलने वाला था तो उस औरत के मुंह में लंड घुसा दिया और झड़ने लगा, औरत के पास और कोई चरा नहीं था सिवाय उसे गटकने के जिसे वो तुरंत गटक गई। कर्मा उठा अपना लंड उसके मुंह से निकाल कर सोनू से अपने कपड़े लेकर पहनने लगा। जल्दी ही दोनों मोटरसाइकिल के पास थे।

कर्मा: क्या हुआ इतनी देर से चुप क्यों है,

सोनू जैसे होश में आया उसके सामने तो बस वही दृश्य चल रहा था, जब कर्मा उस औरत को चोद रहा था,

सोनू: कुछ नहीं भैया.

कर्मा: अरे तू शर्माता बहुत है, इतनी झिझक रखेगा न तो कुछ नहीं मिल पाएगा,

सोनू: वो बात नहीं भैया बस होता है थोड़ा।

कर्मा: शर्म कर पर अपने फायदे के समय तो मत संकोच कर, अच्छा खासा मौका गंवा दिया चुदाई का,

सोनू: कोई बात नहीं भैया मौका तो मिल ही जाएगा।

सोनू ने थोड़ा हंसते हुए कहा,

कर्मा: मेरे साथ रहेगा तो बिल्कुल मिलेगा, पर तुझे मेरे सामने झिझकना छोड़ना होगा, अब तो तूने मुझे नंगा भी देख लिया है।

इस पर दोनों हंस पड़े,

सोनू: नहीं बिल्कुल नहीं झिझकूंगा अब तो, अच्छा एक बात पूछूं भैया?

कर्मा: हां पूछ ना,

सोनू: दो दो जवान बहुओं के होते हुए तुमने सास को ही क्यों चुना,

कर्मा: हां ये पूछा है तूने काम का सवाल, देख इसका जवाब है कि मुझे बड़ी उम्र की औरतें पसंद हैं, पता है क्यों?

सोनू: क्यों?

कर्मा: देख एक तो उनका बदन भरा होता है, हम लड़कों को क्या चाहिए सब कुछ बड़ा बड़ा, तो औरतों की चूचियों से लेकर गांड तक सब कुछ बड़ा बड़ा होता है।

सोनू बात को समझते हुए: हां ये तो सही बात है भाई।

कर्मा: दूसरी वजह कि वो कच्ची कलियों की तरह रोती नहीं, झटके तेज हो या लंबे सब सह जाती हैं ऊपर से कुछ न कुछ सिखा ही देती हैं, शर्माती नहीं हैं इतना,

सोनू: सही में, भैया तुमने तो पूरा पाठ सोच रखा है इस पर तो,

कर्मा: अब लौड़े को सुखी रखना है तो सोचना ही पड़ता है, यार सही में कुछ तो अलग होता है बड़ी उम्र की औरतों में भरा बदन साड़ी में से झांकता पेट, कमर में पड़ी सिलवटें ये देख मेरा तो लंड तन जाता है।

सोनू: हां सही कह रहे हो भैया,

कर्मा: अपने गांव में ही एक से एक मस्त ऐसी औरतें हैं, जिन्हें देख मेरा कड़क हो जाता है।

सोनू: अच्छा सच में कौन कौन?

कर्मा: नहीं रहने दे तू बुरा मान जाएगा।

सोनू सोचने लगा कि ऐसी कौन हैं कहीं ये मां के बारे में तो नहीं बोल रहा? ये सोच कर सोनू को जिज्ञासा होने लगी।

सोनू: अरे नहीं मानूंगा भैया बताओ ना।

कर्मा: पक्का? देख ले फिर बाद में मुंह मत बनाना।

सोनू: हां पक्का बताओ तो सही।

कर्मा: तेरे यार कम्मू की मां और ताई, हाय क्या मस्त गदराए बदन वाली हैं दोनों, कई बार हिलाया है दोनों को सोच कर।

सोनू: अपने दोस्त के परिवार के बारे में सोच कर चुप हो गया।

कर्मा: क्या हुआ तूने बोला था बुरा नहीं मानेगा, वैसे भी देख सोच पर किसका वश है, अब वो सोच में आती हैं तो क्या करूं।

सोनू: हा ये भी सोच में तो कुछ भी हो सकता है।

कर्मा: वही तो यार वैसे तो मन्नू की मां भी कम नहीं है उसका बदन भी खूब भरा है।

सोनू: हां भैया,

सोनू को समझ नहीं आ रहा था क्या बोले अब।

कर्मा: तुझे पसंद नहीं भरे बदन की औरतें?

सोनू: हां पसंद हैं पर ।

कर्मा: तो कभी इन तीनों का नहीं सोचा?

सोनू: नहीं भैया ये दोस्त की मां हैं तीनों इनके बारे में गंदा नहीं सोच सकता।

कर्मा: अच्छा दोस्त है तू पर क्या तेरे दोस्त तेरे घर की औरतों के बारे में नहीं सोचते होंगे इसका विश्वास है तुझे।

ये सुनकर सोनू सोच में पड़ गया फिर कुछ सोच कर बोला: नहीं भैया मेरे दोस्त ऐसे नहीं हैं, वो लोग अच्छे हैं।

कर्मा: चल ये तो और बढ़िया है। चल अब चलते हैं।

कर्मा मोटरसाइकिल शुरू करता है और गांव की ओर चल देते हैं,

गांव आकर कर्मा ने सोनू को उसके घर के सामने उतार दिया और बोला: आज अब तेरी छुट्टी,

सोनू ने भी सिर हिलाया तो कर्मा आगे बढ़ गया और सोनू घर की ओर मुड़ गया, कर्मा थोड़ा आगे बढ़ा तो उसकी मोटरसाइकिल धीमी हुई, बिंदिया अपने घर की दहलीज पर खड़ी थी, कर्मा उसे देखने लगा, बिंदिया की नज़रें भी कर्मा से मिलीं, और कर्मा को अपनी ओर देखता पा कर बिंदिया सकुचाई पर उसने अपनी नजरें फेर ली पर कर्मा ने नहीं हटाई, बिंदिया बार बार नज़र हटा कर देखती तो कर्मा को अपनी ओर देखता पाती, साथ ही उसके चेहरे पर वो मुस्कान थी, ये सिलसिला जब तक कर्मा गली से बाहर नहीं निकल गया तब तक चलता रहा, बिंदिया के दिल की धड़कन बढ़ गई, कर्मा स्वभाव का जैसा भी था पर देखने में सुंदर था ऊपर से उसका रुतबा हवेली का लड़का होने से और था तो गांव की लड़कियां उससे प्रभावित तो रहती थीं पर शर्म की वजह से खुद को रोकती थीं। बिंदिया को भी कर्मा देखने में भाता था पर घरवालों से उसने हमेशा से ये ही सुना था कि हवेली वालों से जितना दूर रहो उतना ही अच्छा है। वैसे भी आज उसे देखने वाले आ रहे थे तो उसके लिए तो कुछ भी सोचना व्यर्थ ही था ये सोच वो अंदर चली गई।

सोनू के घर में कुछ दिनों से शांति थी, उसका बाप उस दिन से घर नहीं लौटा था, उसकी बड़ी बहन नेहा घर संभाल रही थी वहीं नीलेश के कहने से उसके बड़े भाई की नौकरी भी लग गई थी पास के ही गांव में, सोनू घर पहुंचा तो घर पर उसकी दोनों बहने ही थीं,

नेहा: अरे आज इतनी जल्दी कैसे आ गया तू?

सोनू: दीदी वो कर्मा छोड़ गया आज काम कम था।

मनीषा: क्या वो कर्मा, सोनू तू उससे दूर ही रहा कर, तुझे पता है न वो कैसा है, वैसे तू क्या कर रहा था उसके साथ? तुझे तो माली के साथ काम मिला है ना?

सोनू: नहीं दीदी वो मुझे अपने साथ ले गया था बाज़ार, समोसे और ठंडा भी खिलाया,

नेहा: अच्छा इतनी मेहरबानी किस खुशी में?

सोनू: पता नहीं जीजी, शायद वो मेरी उम्र का ही है तो मुझे अपना दोस्त मानता है,

मनीषा: इन हवेली वालों की दोस्ती इन्हें ही मुबारक हो,

नेहा: ऐसा भी नहीं है मनीषा, हो सकता है हम उन लोगों को ज़्यादा ही बुरा मानते हो, पर आज उनकी वजह से ही हमारी कितनी मुसीबतें टली हैं ये भी नहीं भूलना चाहिए।

मनीषा: हां दीदी ये तो सही कह रही हो।

थोड़ी देर आराम और बहनों से बात करने के बाद सोनू घर से निकल गया, कई दिनों से वो अपने दोस्तों से नहीं मिला था, इसीलिए सीधा कम्मू के घर पहुंचा, आंगन में ही सुमन थी जो कपड़े धो रही थी नल के पास बैठ कर उसका ब्लाउज़ पानी से गीला हो चुका था नीचे सिर्फ एक पेटीकोट था वो भी घुटनों पर इकट्ठा था गीला होकर, मखमली पेट पर पानी की बूंदें सरक रहीं थी, गोल गहरी नाभी किसी झील की तरह लग रही थी। और सबसे बड़ी बात ब्लाउज़ गीला होकर पारदर्शी हो गया था और उसकी बड़ी बड़ी चूचियों की झलक दे रहा था।





सोनू ने उसे देखा और उसे कर्मा की बात याद आ गई, वैसे कर्मा भी गलत नहीं कह रहा था, चाची सच में बहुत सुंदर हैं, सोनू के मन में खयाल आया उसे अपने लंड में हरकत हुई सी महसूस हुई तो उसने खुद के सिर को झटका। और आगे बढ़ बोला।

सोनू: चाची प्रणाम, कम्मू कहां है?

सुमन: अरे खुश रह मेरा बच्चा, मां कैसी है तेरी अब सब ठीक है न?

सुमन ने कपड़े धोना जारी रखते हुए कहा क्योंकि वो सोनू को बचपन से खिलाती आई थी वो उसके लिए बेटे के जैसा ही था इसलिए उसने भी कोई ध्यान नहीं दिया।

सोनू: हां चाची सब ठीक है मां भी ठीक है अभी हवेली पर ही है,

सोनू ने मुश्किल से अपनी आंखें और कहीं केंद्रित करते हुए कहा।

सुमन: चल अच्छा है, जा कम्मू कमरे में सो रहा है उठा ले जाकर।

सोनू सुमन की बात सुनकर कमरे में गया और कम्मू को उठाने लगा,


जारी रहेगी।
 
Back
Top