Adultery मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #02 Running - Page 26 - SexBaba
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Adultery मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #02 Running

11 दिन पहले.. सुबह क करीब 8:25 पे



महेंद्र हर रोज़ की तरह आज सुबह भी गाओं की पगडंडियों को नापने चला गया था, जहा वैसे तोह ठण्ड और कोहरे ने बदन में ठिठुरन भर राखी थी पर इतनी लम्बी सैर क बाद महेंद्र क अंदर जल्दी hi गर्मी का प्रवाह बाद चूका था, ऐसे में खेतों की और प्रस्थान करते हुए किसानों से मिलता हु वो अपने घर की और वापस लौट चला था.. जहा गाओं का लगभग हर किशन और अपनी माटी से प्रेम करने वाला व्यक्ति महेंद्र को भली भांति पहचानता था

महेंद्र गाओं क लिए उस व्यक्ति जैसा था जिसके पास लोग अक्सर अपनी समस्याएं लेके आना पसंद करते थे ककी उन्हें पूरा यकीन था की महेंद्र अपनी सूझ भुज से जो भी सुझाव या फैसला करेगा वो उनके भले क लिए hi होगा.. वैसे उसका यहॉ व्यव्हार गाओं क सबसे आलीशान हवेली में रहने वाले ठाकुर को पसंद नहीं थी ककी जो सम्मान उसे मिलना चाहिए था वो एक गरीब किशन को मिल रहा था पर 'ठाकुर बलवंत प्रताप सिंह' च क भी महेंद्र का कुछ बिगड़ नहीं सकता था ककी उसे अचे से पता था की महेंद्र क सामने हमेशा उसकी ढाल बना हुआ 'कुंदन' खड़ा रहता है.. बल्कि ये बात 'ठाकुर जी' किया गाओं का हर वो इंसान अचे से जनता था जिसे महेंद्र की अछि से नफरत थी.. पर ऐसे लोग कुंदन क बारे में सिर्फ सोच क hi काँप उठते थे और आगे बढ़ने का अपने मनसूबे अपने अंदर hi कही दफ़न कर लेते थे

जल्दी hi ऐसी ठण्ड में भी पसीने से पूरा भीग चूका 'कुंदन का बड़ा भाई' अपने घर पहुंच चूका था जहा उसका सबसे छोटा भाई 'वीरू' और उसके घर का दामाद 'भानु' subha-subha hi अपने अपने खेतों की और जा चुके थे पर महेंद्र की अनुपस्थिति में कुंदन इस समय घर क बहार किसी पेहरि की तरह बैठा हुआ था.. जो सामने से आते हुए अपने बड़े भाई को देखते hi पुरे सम्मान में खड़ा हो जाता है और महेंद्र इस प्रेम और सम्मान से gad-gad होते हुए मुस्कुरा क उसके कंधे पे हाथ रखते हुए सीधा घर क पिछले हिस्से में बने शौचालय की और बढ़ता चला जाता है

असल में वैसे तोह ज्यादातर महेंद्र तालाब पे hi हल्का होने क बाद घर आता था पर आज जब वो तालाब पे पंहुचा तोह उसे वह पहले से hi गाओं की कुछ जवान लड़किया पानी में खेलते हुए नज़र आयी और ऐसी कारन उसने रास्ता बदल लिया था.. इस समय सत्तू का बाप लम्बे लम्बे कदमो से घर क पिछले हिस्से में पहुंच चूका था पर अभी वो शौचालय की और अपना अगला कदम hi बढ़ाता है की ठीक तभी शौचालय क बगल में बने हुए स्नानघर का द्वार खुल पड़ता है और एक सलोनी काया बहार निकलते हुए महेंद्र को मिल जाती है


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सूरज की पहली किरणों ने अभी घने कोहरे को पार करके जमीन को चूमने की सुरुवात hi की थी और ऐसे में भीगे बदन की वो स्त्री जैसे hi बहार अपने कदम रखती है मानो सुबह की साडी hi सुनहरे किरणों ने उसके यौवन पे अपना नया ठिकाना ढूंढ लिया हो.. महेंद्र तोह जैसे की पत्तर में बदल चूका था मानो जैसे कोई निर्जीव वास्तु को जो बस एकटुक स्नानघर से बहार आयी उस कामुक सलोनी स्त्री से अपनी नज़रें hi नहीं हटा प् रहा हो और उसके ऐसे करने का कारन भी साफ़ था ककी स्नानघर से निकलने वाली वो सलोनी सूरत की मलिका उसके छोटे भाई की पत्नी 'हर्षिता' थी

जिसने कामुक सलोने जिस्म पे इस समय सिर्फ एक पेटीकोट बंधा हुआ था और एक हाथ में उसके भीगे हुए सायद धुले गए कपडे थे तोह दूसरे में उसकी साड़ी जिसे सायद उसने वह स्नानघर में किसी कारन पहनना जरुरी नहीं समझा था.. पर जिस चीज़ ने अपने नाड़े क पक्के महेंद्र क जिस्म में चीटिया चलवा दी थी वो था हर्षिता का वो भीगा हुआ पेटीकोट जिसका रंग गाड़ा नीला था और इस समय उसके कामुक सरीर पे ऊपर तक चढ़ा हुआ था

पर सायद हर्षिता आज कुछ ज्यादा hi जल्दी में थी ककी उसने वो पेटीकोट अपने भीगे बदन पे hi बंद लिया था तभी तोह इस समय महेंद्र को उसकी 'चुकती बहु' क पेटीकोट से उसके काले तने हुए निप्पल्स और उसके पास का पूरा गोला काला हिस्सा पेटीकोट क ऊपर से साफ़ साफ़ नज़र सा आ रहा था.. अब आपके सामने कोई स्त्री ऐसी अवस्था में आके कड़ी हो जाये जो बस नाहा क आयी हो जिसके बालों से अब भी पानी की कामुक बंधे टपक रही हो और जिस्म पे मोतियों सामान पानी जमा हुआ हो, तोह आप समाज hi सकते है की आपका हाल किया होगा और फिर ये कामुक सरीर तोह हर्षिता का था

पेटीकोट की लम्बाई कुछ ऐसी थी की वो हर्षिता क घुटनो तक hi आ रही थी और उचाई यानि ऊपर वो ऐसी जगह बंधा हुआ था जहा अगर वो 1" भी और निचे होता तोह सायद 'सोनू की माँ' की दोनों चूचियों क काले गुलाबजामुन इस समय महेंद्र को पूर्ण रूप से दिख जाते.. बेचारे महेंद्र जो च क भी अपनी नज़रों को अपनी बहु क भीगे हुए सरीर से हटा नहीं प् रही थी वही जैसे hi स्नानघर से हर्षिता बहार आती है तोह उसके सामने मजबूत जिस्म वाला महेंद्र यानि उसका जेठ खड़ा हुआ दिख जाता है

हर्षिता ने आज जल्दबाजी क चक्कर में नहाने क बाद ऐसे hi पेटीकोट चढ़ा लिया था और ये सोचा था की वो जल्दी से कमरे में जेक आराम से कपडे बदल लेगी..

महेंद्र की जो बहु आज तक उसके सामने बिना पल्लू न आयी थी आज वो उसके सामने भीगे बदन एक ऐसे पेटीकोट में कड़ी थी जिसमें से उसके सरीर का हर अंग और हर कटाव महेंद्र को ऐसे नज़र आ रहा था मानो वो पूर्ण नंगी अवस्था में कड़ी हो.. बेचारा 'सविता का पति' तोह जैसे सांस लेना hi भूल गया था वही हर्षिता का भी हाल ऐसा था जैसे किसी ने उसके सरे संस्कारों को एक hi दिन में उससे चीन लिए हो

हर्षिता- (मारे लाज क उसके मुंह से निकलने वाले सब्द टूट से जा रहे थे) जेठ जी.. आप.. वो में.. बस.. मैंने सोचा अभी.. है.. नहीं तोह.. वो.. मैं..

हर्षिता क इन टूटे शब्दों क चलते महेंद्र को कही जेक होश आया और बिना एक भी पल गवाए वो तुरंत की दूसरी और मुंह करके मुद जाता है.. और अपनी गरम हो चुकी साँसों को सँभालते हुए धीरे से कहता है

"कोई.. कोई बात नहीं बहु.. वो मैं बस.. आज थोड़ा जल्दी आ गया न.. तुम.. तुम.. जाओ.. जाओ.."

ठीक हर्षिता की hi भांति उसके जेठ क मुख से निकलने वाले सब्द भी उसका साथ नहीं दे रहे थे.. वीरू की पत्नी हर्षिता अब वह और नहीं रुक पाती ककी ऐसे अपने जेठ क सामने आने की तोह उसने कल्पना भी नहीं की और आज जो नहीं सोचा था वो हो चूका था

हर्षिता लगभग भागती हुई सी अंदर की और चल पड़ती है और इस पल न जाने क्यू महेंद्र क मन में ये विचार सा आता है की.. किया वो मुद क अपनी बहु को पीछे से देखे, पर बड़ी मुश्किल से hi सही उसने अपने इन विचारों पे विजय प्राप्त की थी और ऐसा कुछ भी उसने नहीं किया था

पर ये पहली घटना जरूर थी जिसने महेंद्र की आँखों क सामने उसकी बहु हर्षिता का कामुक यौवन ला दिया था पर ये अंतिम बार नहीं था..



कंटिन्यू... 👇
 
आज से ठीक 7 दिन पहले.. दिन क करीब 3 बजे



महेंद्र बड़ी मुश्किल से अपनी बहु की उस लगभग नंगे यौवन की तस्वीर को अपने दिमाग से निकल पाया था, न जाने उसके साथ ऐसा कितनी hi बार हुआ की वो अपनी बहु क उस भीगे बदन और उसके यौवन को न चाहते हुए भी याद करने पे मजबूर हो जाता और अनायाश hi उसका हाथ उसके भीमकाय लुंड पे चला जाता.. फिर आँखें खुद hi बंद होती चली जाती और जल्दी hi उन बंद आँखों क आगे उसकी छोटी बहु उसे अपना यौवन दिखते हुए नज़र आती


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पर जब भी ऐसा होता उसके अंतर्मन की वो आवाज़ उसे पाप करने से रोक देती

'ये किया कर रहा है.. भूल गया किया की वो तेरी बहु है, तेरे छोटे भाई की पत्नी

जो पाप एक बार कर चूका है, उसे वापस नए सिरे से दोहराने की गलती मत करना.. समय रहते संभल खुद को..'

महेंद्र क अंदर से आती इन आवाज़ ने hi उसे किसी भी प्रकार क पाप से रोका हुआ था, पर सवाल अब भी वही था की आखिर कब तक.. ?

आज ठण्ड क इस भीसाद मौसम में सुबह से hi तीखी धुप ने अपना सर उठा रखा था जिस कारन सविता अपने बड़े बेटे सत्तू क साथ सुबह hi गाओं क बड़े बाजार चली गयी थी घर क लिए जरुरी वस्तुएं लेने.. वैसे तोह महेंद्र ने उसे मन किया था पर सविता को तोह आप जानते hi है वो कहा किसी की सुनती है

कुंदन हमेशा की तरह सुबह hi चक्की पे जा चूका था और सोनू भी अपने चाचा यानि कुंदन क साथ hi चक्की चला गया था, ककी वह उसे मोबाइल में गेम खेलने से कोई मन नहीं करता था.. आखिर कुंदन को काम से hi फुर्सत कहा रहती थी वैसे भी जब्बार की सचाई सामने आने क बाद से उसे अभी तक कोई नया आदमी नहीं मिला था इसलिए सरे काम वो अकेले hi संभल रहा था

बाकि वीरू और भानु अपने अपने खेतों पे म्हणत मजदूरी में लीं थे और सत्यम को भी महेंद्र ने अपने खेत पे भेज रखा था खेत की मेड और नाली को सही करने क लिए.. जहा आप जानते hi है की काम क नाम पे सत्यम का किया हाल हो जाता है

यानि आसान भाषा में लिखू तोह इस समय घर पे कामुक मालती, यौवन से भरी हुई हर्षिता, और अब भी किसी जवान युवती सामान अपने गोर अंगों पे गर्व करने वाली शीला hi थे

मालती सुबह से hi आज अपने मूर्छित अवस्थी में लेते हुए बेटे क पास बैठी हुई थी और शीला तीखी धुप का फायदा उठाते हुए छत्त पे एकांत में अकेली बैठी हुई अपने अंगों पे हलके गुनगुने टेल की मालिश कर रही है.. ये उसे कितना पसंद है ये आप जानते है (आशा है वो अपडेट अब भी आपको याद होगा 🍌)

महेंद्र घर क बहार छप्पर क नीचे बैठा हुआ था जहा उसे चाय की तालाब महसूस होती है, इसलिए पहले तोह वो 1-2 बार चुटकी भौ और अपनी मंझली बहु को आवाज़ देता है पर जब कोई भी उत्तर नहीं मिलता तोह सीधा खुद hi उठ क अंदर चला आता है, जहा वो सबसे पहले मोनू वाले कमरे में hi पहुँचता है पर जैसे hi एक माँ को उसके बेटे को दर्द में देखता है वो उससे कुछ भी कहना सही नहीं समझता और वह से निकल क अपने कमरे की और चल पड़ता है ककी उसे इतना तोह पता hi था इस समय वह उसे शीला और हर्षिता में से कोई न कोई मिल hi जायेगा, पर सत्तू क पिता को ये नहीं पता था की उसकी बहिन शीला तोह चाट पे गुनगुने टेल की मालिश अपने गरम जिस्म पे करने में व्यस्त है यानि वह उस कमरे में महेंद्र को उसकी चुटकी बहु क hi दर्शन होने वाले थे

महेंद्र जैसे कमरे में अंदर प्रवेश करता है उसे हर्षिता लेती हुई नज़र आती है

"बहु.. हर्षिता… ओह चुटकी बहु.."

पर कोई भी उत्तर नहीं मिलता, एक पल सोचने क बाद महेंद्र आगे बढ़ना सही समझता है वो बस ये देखना च रहा था की सब ठीक है न, इस समय उसके मन में और कुछ भी नहीं था

पर जैसे hi वो चारपाई क करीब करीब पहुँचता है उसकी नज़रें उस चारपाई पे लेती हुई सलोनी सूरत वाली खूबसूरत हर्षिता पे ऐसे अटक जाती है जैसे मानो दुनिया में देखने क लिए और कुछ था hi नहीं.. जो था बस यही यौवन था..

असल में उसके छोटे भाई की पत्नी इस समय अपने सर क नीचे अपना एक हाथ रखे हुए करवट लेके लेती हुई थी और अपनी एक तंग को मोड हुए हल्का ऊपर की और चढ़ा रखा था.. जिस कारणवस जिस चीज़ पे महेंद्र की नज़रें सबसे पहले पड़ी थी वो थी सलोनी हर्षिता की मसल सावली सूरत वाली जाँघों पे, जो साड़ी क कुछ ज्यादा hi ऊपर सरक जाने क कारन लगभग नंगी सी थी

अब सामने ऐसा नज़र देख क मर्द कितना भी चाहे पर अपनी नज़रों को वह से हटा पाना उसके लिए कोई आसान नहीं होता, और अगर वो स्त्री स्वर्गवासी सुरीली देवी की तीनो बहुओं में से कोई हो तोह किसी भी मर्द क लिए ये काम लगभग नामुमकिन सा हो जाता है

महेंद्र क जिस्म में दौड़े खून में मानो अचानक से गर्मी सी उत्त्पन होने लगती है, वो च तोह रहा था की वो अपने hi छोटे भाई की पत्नी को ऐसे न देखे पर इस समय उसकी नज़रों पे उसका hi बस नहीं चल रहा था, मानो जैसे मूर्ति में बदल क एकटुक बस अपनी बहु की ऊपर उठी हुई साड़ी से बहार नज़र आती उसकी जाँघों की खूबसूरती में वो खो सा गया था

तभी उस कमरे की खुली खिड़की से हवा का एक हल्का सा झोंका अंदर न जाने कैसे आज जाता है जिससे साड़ी में धीरे से सरसराहट सी पैदा हो जाती है और एक पल क लिए तोह ऐसा लगता है जैसे वो हवा उस साड़ी को और ऊपर तक उठा देगी.. सच कहु तोह इस एक पल में hi महेंद्र का खून उबाल मारने लगा था, दिल में न जाने कैसे ये चाहत उत्त्पन हो गयी थी की खास..

'ये किया देख रहा है.. ये किया पाप कर रहा है'

महेंद्र क अंतर्मन ने उसे कुरेदने की पूरी कोशिश सी की थी पर उसके हवस क देवता ने भी उसके अंतर्मन की बात को काटने से संकोच नहीं किया

'अरे तोह किया हुआ.. जो चीज़ देखने क लिए है वही तोह देख रहा है, इसने कोनसा खुद से साड़ी उठाई है

अब अगर ऐसा नज़ारा.. ऐसा यौवन देखने को मिल रहा है तोह इसमें इसकी किया गलती

ये कोई पाप थोड़ी है.. खूबसूरती तोह होती hi है प्रशंसा करने क लिए, और किसी चीज़ की प्रशंसा करने क लिए पहले उसे अचे से देखने भी पड़ता है

…तुम देखो महेंद्र, तुम कुछ गलत नहीं कर रहे हो..'

महेंद्र क अंदर की अच्छी और उसकी हवस ने उसे अजीब सी परिस्थिति में दाल दिया था, जहा से वो च क भी नहीं निकल प् रहा था पर हर्षिता क यौवन में कुछ तोह ऐसा था जिस कारन महेंद्र ये सोचने से खुद को रोक नहीं प् रहा था की किया हर्षिता ने साड़ी क नीचे कुछ पहना होगा..?

एक मर्द की हवस धीरे धीरे रिश्तों की पतली डोर पे अपनी पकड़ बनती जा रही थी, पर देखना ये था की आखिर ये डोर टूटेगी की नहीं.. पर सामने लेती वो स्त्री उसकी बहु थी और इस कारन उसके लिए कुछ भी तय कर पाना इतना आसान नहीं था पर मर्द क उस हिस्से का किया करे जो ऐसा नज़र देखते hi अपना सर उठा देता है और इसका परिणाम भी महेंद्र की धोती में नज़र आने लगे

महेंद्र अपने सूखे हुए गले को खुद hi अपने थूक से तर करते हुए धीरे से दरवाजे की तरफ देखता है मानो जैसे उसे दर हो की कही कोई उसे ऐसी इस्तिथि में पकड़ न ले, पर जैसे hi उसे यकीन होता है की उसके इस पाप का शाक्षी कोई नहीं है वो एक बार फिर से हर्षिता की सलोनी गुदाज और लगभग नंगी सी जांघ को वापस देखने लगता है.. या सायद ये लिखना ज्यादा सही होगा की हर्षिता क सलोने यौवन ने महेंद्र को मजबूर कर रहा था उसके दर्शन क लिए

तभी हर्षिता नींद में hi अपनी करवट बदलती है और अपने पैरों को सीधा करते हुए अब दूसरी और मुंह करके लेत जाती है.. और इस पल में महेंद्र जैसा पहाड़ सा दिखने वाला मर्द भी किसी सूखे पत्ते सामान काँप उठा था की किया हर्षिता जाग गयी.. ?

पर ऐसा नहीं था, हर्षिता अब भी अपनी खुमारी में भरी दोपहरी में अपनी नींद का भोज उतर रही थी.. वही अब उसके ऐसे लेत जाने क कारन और पैरों को सीधा कर लेने की वजह से महेंद्र को पहले वाला डरिसीहा तोह नहीं मिल रहा था पर जो चीज़ सामने थी उसके चलते उसकी धोती में जैसे कोई कोहराम मच गया हो ककी हर्षिता की गोल मोती और कसावट से भरी हुई गांड अब महेंद्र की आँखों क इतने पास थी जिसे अगर वो चाहे तोह अपने दोनों हाथों में भर क उसकी कोमलता जी जांच भी कर सकता था, पर महेंद्र जैसे सुलझे हुए मर्द क लिए ऐसे अपना कदम आगे बढ़ाना इतना आसान नहीं था

पर हर्षिता क करवट बदलते hi उसके जेठ की खुमारी भी एक पल क लिए तुध चुकी थी और जो कला जादू उसकी बहु की नंगी जाँघों ने उसपे किया था वो टूट चूका था.. इसलिए वो और देरी नहीं करता और लगभग भागने की हालत में घर क बहार छप्पर क नीचे आके बैठ जाता है, महेंद्र गया तोह चाय की तालाब में था पर अब वो पहले से ज्यादा पियासा था



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