Adultery मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #02 Running - Page 25 - SexBaba
  • From this section you can read all the hindi sex stories in hindi font. These are collected from the various sources which make your cock rock hard in the night. All are having the collections of like maa beta, devar bhabhi, indian aunty, college girl. All these are the amazing chudai stories for you guys in these forum.

    If You are unable to access the site then try to access the site via VPN Try these are vpn App Click Here

Adultery मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #02 Running

सत्यम इस पल उसके चेहरा का सुकून देखते हुए उसे बेहरमी से छोड़ता रहता है उसकी चूचियों को बेहरमी से मसलता रहता है फिर खुद hi झुक क एक चुकी को मुंह में भर क जोर से उसके निप्पल पे काट क मानो उसे होश में लाता है

"आआआआह्ह्ह्ह… kutttttttttttteeeeeeeee… खून निकलेगा किया.."

सत्यम मुस्कुराते हुए जोर जोर से अपने लुंड को उस कामुक योनि की गहराई में उतारते हुए है पड़ता है और मुस्कुरा क कहता है

"नहीं.. माँ की लोदी.. दूध.."

मालती तोह बुरी तरह शर्मा सी जाती है, पर सत्यम अपना अगला सवाल करता है

"वैसे अगर सोनू ने छूट मांगी तोह देगी किया.."

मालती इस नए प्रश्न से पूरी तरह हैरान रह जाती है, वो पूरी तरह पागल सी हो उठी है ये सोच क एक जवान होता बचा उसे छोड़ेगा..

image-17.png


पर वो अपनी कामुकता को काबू करते हुए धीरे से कहती है

"कुट्टी.. सुवर कही का.. पागल हो गया है किया तू.. दिमाग ख़राब है तेरा.. किया"

पर सत्यम नीचे झुकते हुए एक बार पूरी चुकी को मुंह में भर लेता है और जोर से चूसना सुरु कर देता है

"उम्मम्मम… Slllllrrrrrrrrruuuuuuuuuupp… Glllrrrrrrrrrruuuuuuuuuuppp………… ummmmmmmmmmm… आआआआअह्ह्ह… उम्मम्मम्मम्मम… सल्ल्ल्लूऊरररररररपपप.."

पर कुछ hi पल में अपना मुंह हटते हुए कहता है

"साली रंडी एक बार उसे दे देगी तोह कोनसी तेरी छूट घिस जाएगी.. बोल बेहेन की लोदी देगी न उसे.. अपनी छूट.."

मालती कांपते हुए अपने अंदर और अधिक गर्मी का प्रवाह महसूस करती है और कांपती हुई आवाज़ में कहती है

"मुंह बंद कर अपना.."

पर सत्यम इस बार अपनी कमर को रोक देता है और एक hi पल में मालती जैसे तड़प उठती है, वो एक पल तक सत्यम की और ाश भरी नज़रों से देखती रहती है पर सत्यम कोई हरकत नहीं करता जिसपे मालती खुद hi नीचे से अपनी कमर चलने लगती है तोह सत्यम अपना लुंड थोड़ा सा बहार खींच लेता है और इस कारन मालती का हाल ऐसा हो जाता है जैसे उसके जलते बदन पे गिरता हुआ ठंडा पानी अचानक से रोक लिया गया हो

"आअह्ह्ह्हह्ह्ह्ह.. किया कर रहा है कुत्त्तीीीे.. छोड़.. छोड़.. छोड़.. मुझे.. छोड़.. नाआ…."

ये मालती की वो कामुकता थी जिसे अब वो छुपाने में कामयाब नहीं हो प् रही थी, पर सत्यम ऐसे अपनी जीत समझते हुए कहता है

"तोह बता पहले.. कहा लेगी सोनू का लुंड.. बोल चिनार.. वर्ण में जा रहा हु.."

मालती एक पल क लिए उसकी आँखों में देखती है और फिर अपनी hi आग में जलती हुई सी कहती है

"गांड.. गांड में.. अब खुस.. अब तोह छोड़ मुझे.. छोड़.. छोड़.. छोड़ कुत्त्ते.. छोड़ मुझे.."

मालती ने ये सोनू क लिए जिस द्वार की बात करि थी उसका कारन आप स्नानघर वाले उस खास अपडेट में पद hi चुके है 😉

सत्यम जैसे hi मालती क मुख से ये सुनता है वो अपने लुंड को वापस से ट्रैन की गति से दौड़ा देता है

1000131139.gif


जिससे मिलने वाले आनंद क चलते मालती की आँखें बंद होती चली जाती है और उसे ऐसे देख क सत्यम मन hi मन है पड़त है.. जैसे वो कोई जुंग जीत गया हो, अब मोनू की माँ 'मालती' भी अपनी छूट में वापस से बढ़ती हुई गति को साफ़ साफ़ महसूस कर प् रही थी, वही सत्यम ने फिर से मोर्चा सँभालते हुए अपने दोनों हाथों से अपनी नंगी पुंगी चची की दोनों चूचियों को कसके जकड क पूरी बेहरमी से मसलना सुरु कर दिया था.. यानि अब मालती एक साथ दोहरे हमले को महसूस कर रही थी और आनंद से भर्ती जा रही थी

“Aaaaaaaaaaaahhhh... माआआआ.... आईसीईई... हीई... आआआआअह्ह्ह्हह.... पहाडडडडड डाआआलल्लूऊओ.... बेताआए... अपनी चची की छूट को.... आआआअह्ह्ह्ह... माआआ... आआआआह्ह्ह्ह.... ऐसे hi.... आआआह्ह्ह्ह.... आआआआअह्ह्ह्हह.. छोड़ो मुझे.. मैं ऐसी लायक हु.. यही होना चाहिए मेरे साथ.. रंडी बना क छोड़ो मुझे… जोर जोर से छोड़ो.. भर दे मेरी छूट को.. Aaaaaaaaaahhhh… लाल कर दो मेरी छूट और चूचियों को.. आआआआह्ह्ह्ह"

सत्यम भी अब पूरी तरह पसीने में भीग चूका था, उसका पसीना उसके चेहरे से टपकते हुए मालती की चूचियों पे तोह कभी उसकी नाभि पे गिर रहा था.. हैरानी थी की ऐसी ठण्ड में भी एक औरत की गर्मी ने उसे पसीना ला दिया था, पर सत्यम भी म्हणत करने में कही से पीछे नहीं था वो दोनों हाथों से 'मोनू की माँ' की चूचियों को दबाते हुए ऐसे मसल रहा था जैसे अभी क अभी उनमें से दूध की धरा बह उठेगी

सत्यम जोर जोर से छूट में दकके लगते हुए

"आआआअह्हह्ह्ह्ह.... साआल्लीीी... इतनी गरम छुट्ट्ट्ट... आआआह्ह्ह्ह... कामिनी.. रंडी.. आआआअह्ह्ह.. साएलीई तेरी छूट… मेरे लुंड को गन्ने की मशीन क जैसे निचोड़ रही है... Aaaaaaaaaahhhhhhhhh"

मालती भी इस खेल में पीछे नहीं थी, वैसे भी पहले झींगुर और फिर सोनू क नाम ने जो एक आग भड़काई थी उसके अंदर उसके चलते वो खुद hi अब नीचे से अपनी कमर को हरकत देने लगी थी.. और पूरी कोशिश कर रही थी की सत्यम का इतना बड़ा लुंड उसकी योनि क अंतिम चोर को बार बार चुवे

"Aaaaaaaaaahhhhh... माआआआ.... उफ्फ्फ्फफ्फ्फ़.... और जोर जोर से छोड़... कुत्त्तीीी... भड़वे... आआआहहहहह.. हराम क पिल्लै… रंडी की औलाद.. पहाड़ दे मेरी छूट को.. आआआहहह… उफ्फफ्फ्फ्फफ्फ्फ़….. कमीने कोई अपनी चची को ऐसे छोड़ता है किया... आआआआअह्हह्ह्ह्ह.. हआ.. पर तू ऐसे hi छोड़ कुत्ते..."

सत्यम का जोश भी काम होने का नाम नहीं ले रहा था वो पूरी ताक़त से जोरदार दकके मरते हुए हाफ रहा था और मुस्कुरा क कहता है

"आआआअह्ह्ह्ह... साललीई.. चिनार.. है हु मैं 'रंडी की औलाद'.. और अब देख कैसे ये 'रंडी का बचा' तेरी छूट को भरेगा आज.. साली हरामजादी अब से तू मेरी चची नहीं.. सिर्फ मेरी रंडी है.. मेरी रखेल है... मेरी कुटिया है... बोल है न... साललीई"

सत्यम अपनी बात कहते हुए एक बार फिर से अपनी चची क नंगे जिस्म पे पूरी तरह च सा जाता है और उसके मुंह में अपनी जीभ घुसा क मुंह का अंदर तक स्वाद लेने लगता है.. पर इन सब क बाद भी उसकी चलती कमर में कोई भी कमी नहीं आयी थी, वो अब भी 'कुंदन की पत्नी' को उसी रफ़्तार से छोड़ रहा था



कंटिन्यू... 👇
 
मालती भी अपनी छूट में अपनी जेठानी क बेटे का लुंड अंदर बहार होने क कारन.. उसमें इस प्रकार से खो चुकी थी की और वो भी सब कुछ भूल क अपनी जीभ बहार निकल देती है, जिसे सत्यम ऐसे अपने होंठों क बीच लेके चूसने लगता है जैसे उसमें मीठा मीठा सेहद लगा हो, कामुकता का ये खेल आज मानो रुकने hi वाला नहीं था, पर दौड़ने वाला चाहे कितना भी ाचा धावक क्यू न हो.. किसी एक जगह जेक उसकी दौड़ का भी अंत जरूर होता है, सत्यम अपने जिस्म की पूरी ताक़त अपने लुंड में भरते हुए पूरी जान लगा क अपनी चची की छूट छोड़ते हुए



1000130926.gif


"आआआह्ह्ह्ह... बोल बेहेन की लोदी तू किया है.. तू अबसे मेरी चची नहीं है..."

मालती अपने नाख़ून अपने जवान भतीजे की पीट में गाड़ते हुए कामुकता से भरी हुई और जिस्म से आग में जलती हुई कहती है

"Aaaaaahhhhhh...bata कुट्टी.. मेरी तेरी चची नहीं तोह किया हु.. आआआआह्ह्ह्ह"

सत्यम अपने लुंड का पूरा दम अपनी चची की छूट में दिखते हुए

"आआआआह्ह्ह्ह... तू आज से मेरी कुटिया है.. मेरी रखेल है.. बता है न मेरी कुटिया..."

सत्यम अपने अंतिम सब्द कहते हुए अपनी चची क जिस्म से थोड़ा सा उठता है पर अगले hi पल उसका गाला दबोच लेता है और जोर जोर से मोनू की माँ छोड़ते हुए फिर से कहता है

"बोल रंडी.. है न तू मेरी कुटिया.."

सत्यम की इस नयी और अतरंगी हरकत की वजह से ऐसा लगता है मानो हमारी मालती की छूट किसी भी पल अपना गाड़ा पानी बहा देगी.. इसलिए मालती भी इस पल का भरपूर आनंद लेती हु

"आआआअह्ह्ह्हह.. हआ... मैं कुटिया हु तुम्हारी... रंडी हु तुम्हारी.. आआआह्ह्ह्ह... भर दे अपना भीज अपनी इस रंडी की छूट में.. आआआअह्ह्ह्ह.. भर बहनचोद भर मेरी छूट… भर दे हराम क पिल्लै.. भर मेरी छूट…"

सत्यम भी पूरी तरह पसीने में भीगा हु अपनी चची मालती क गले पे अपनी उँगलियों को फिरते हुए पूरा दम लगा क उसकी चुदाई करे जा रहा था.. और उसके दक्कों में बाद चुकी गति बता रही थी की किसी भी पल उसका लुंड अपना गाड़ा वीर्य अपनी चची की छूट में भर सकता है

मालती भी पूरी तरह नंगी और अपने जवान भतीजे क नीचे दबी हुई कामुकता से भरी पड़ी अपना जिस्म नीचे से हल्का उठा सा लेती है ताकि उसकी छूट को सत्यम का लुंड और ज्यादा अंदर तक भरता हुआ महसूस हो.. वही 'सविता का बीटा' भी अपनी चची की चुदाई में कोई कमी नहीं रख रहा था

"गपागप.. गपागप... सतसता. गप्पाहाककककक... Chaaaatttaaaakkkk...satsat... पाआआत्तत्त... पाहात्त्त्तत्त.... पाहात्त्त्तत्त... पट्टाककककक... गाछपाछकककक..."

की मधुर आवाज़ उस छोटी सी कोठरी में जोरो से गुजंनी सुरु हो चुकी थी.. जिससे रात का ये पहर सायद सबसे कामुक और खूबसूरत बन चूका था, सत्यम पूरा दम लगा क छूटा का कचूमर बनाते हुए जोरो से हफ्ते और पसीने में भीगा हुआ कहता है

“आआआअह्हह्ह्ह्ह.. तैय्यार हो जा साललीई.. आअज तेरी छूट को भर दूंगा.. अपने रास से..."

मालती भी नीचे से अपनी कमर को उठाते हुए मानो कामुकता की आग में जल क राख हो जाना च रही हो

"आआआआअह्ह्ह... कर दो बारिश अपने गाड़े पानी की मेरी सुखी भूमि पे.. आआह्ह्ह्ह बना दो अपनी चची को.. माआआआआ... Aaaaaaaaaaaaahhhhhhhh..... Haiiiiiiiiii... Maaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaa"

मालती की छूट किसी भी पल पानी का बहाव कर सकती थी की तभी उसे महसूस होता है की उसकी छूट में गरम गरम गाड़ा चिपचिपा पानी भरने लगा हो.. और इस एहसास मात्र से मालती का बाँध भी टूट जाता है और उसके अंदर भी एक सैलाब आ जाता है, वैसे ये सैलाब इस पुरे खेल में कई बार आया था पर जो मज़ा अब आ रहा था वो पहले नहीं मिला था.. ककी इस समय ये कामुकता का सैलाब दोनों और से एक साथ आया था, सत्यम अपने लुंड से निकले गाड़े सफ़ेद वीर्य की गति क साथ hi कुछ अंतिम जोरदार दकके जड़ता चला जाता है.. जिससे हमारी खूबसूरत नंगी मालती का पूरा जिस्म जोर से हिलोरे खाने लगता है

"Aaaaaaaaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhh… haiiiiiiiiiiiiiiiiiiii.. Maaaaaaaaaaaaaaaaaaa.."

1000131139.gif


पर सत्यम इस दौड़ क अंत तक भागता रहता है और फिर जब ये दौड़ अपने अंतिम बिंदु पे पहुँचती है तोह वो हफ्ते हुए किसी थक चुके अरबी घोड़े सामान मालती क ऊपर ढेर हो जाता है और लम्बी लम्बी साँसें लेने लगता है

वही हमारी मालती भी अपनी चुतरस क बहाव और अपनी छूट में अपने बेटे सामान भतीजे क लुंड रास क भरने की वजह से अपनी आँखों को बंद करने पे मजबूर हो जाती है और उसी प्रकार हफ्ते हुए अपनी आँखों को बंद करके उस आनंद देने वाले पल में पूरी तरह खो सी जाती है



कंटिन्यू... 👇
 
करीब 10 मं बाद.. सत्यम धीरे से अपना चेहरा उठता है जो इस समय उसने अपनी चची की बड़ी बड़ी और गोल चूचियों पे टिका रखा था, और एक बार फिर से वही पुराण सवाल करता है

"किया अब मैं आपको गाली दे सकता हु"

मालती हफ्ते हुए धीरे से अपनी आँखों को खोलती है और मुस्कुराये बिना नहीं रह पाती

"कमीने.. तू तोह पीछे hi पद गया है मुझे गन्दी गालिया देने क लिए"

सत्यम भी मुस्कुरा क अपनी बात आगे कहता है

"क्यों अभी तोह आप खुद गाली दे रही थी मुझे, सच बताओ मेरी कामुक गरम चची.. आपको मज़ा आया की नहीं.. ?"

मालती एक बार फिर से मुस्कुरा पड़ी थी

"आज तूने कई बार यही गालियों की बात करि.. सायद इसलिए मेरे मुंह से ऐसे अश्लील सब्द निकल गए होंगे"

मालती, सुबह खण्डार से लेके और अब यहाँ इस कोठरी में बीते हर एक पल को याद करते हुए कहती है

😉 वाह्ह.. कैसा सैयोग है न, मेरी माँ इस समय पूरी तरह नंगी लेती हुई और अश्लील सब्दो की बात कर रही है.. बरहाल

पर सत्यम न जाने किया सोचे बैठा था

"पर आप सच बताओं.. आपको मज़ा आया की नहीं.. ?"

इस बार मालती शर्मा सी उठी थी

"ाचा.. तुझे बुरा नहीं लगेगा अपनी चची को गाली देने में, चुदाई क समय और बात होती है पर..."

सत्यम तुरंत hi अपने होंठ आगे करके अपनी चची क पसीने से भीगे होंठों को चूमते हुए

"Ummmmmmmmmmm......."

"मैं कोनसा सबके सामने कहूंगा.. बस जब हम अकेले होंगे, तभी आपको पियर से गाली दूंगा और आपका नाम लूंगा

…मान जाओ न चची.. मेरे लिए"

सत्यम ला लुंड अब भी मालती की गीली और रास से भरी छूट में hi था.. और वो उसी प्रकार अपनी चची का पसीने से भीगा हुआ चेहरा देखते हुए ये बात कहता है, इस बार मालती कुछ पलों क लिए जैसे कुछ सोचती है और फिर कहती है

"ठीक है.. पर याद रहे किसी क सामने ऐसी गलती की तोह.."

पर सत्यम उसे आगे कहने क लायक hi नहीं चोरता

"Ummmmmmmmmmmm..... सललललूउपपप...... Ummmmmmmmmmmmmm"

वो उसके होंठों को जोर से चुम लेता है, मानो वो अपनी ख़ुशी जाहिर कर रहा हो, और अपनी चची क होंठों का रास अचे से निचोड़ने क बाद

"पक्का मेरी जान.. जब हम अकेले होंगे तभी आपको चिनार.. कुटिया और रैंड कहूंगा, बोलो तैयार हो न"

सत्यम ये कहते हुए अपनी चची की आँखों में देखते हुए धीरे से आँख मार देता है.. उसकी इस हरकत पे मालती मुस्कुराये और शर्माए बिना खुद को रोक नहीं पाती

मालती दिवार पे तंगी उस पुराणी सी गाड़ी को देखती है जिसमें एक समय 12:45 हो रहे थे, और फिर गाड़ी को निहारते हुए पियर से सत्यम क बालों में अपनी उंगलिया गुआंते हुए मुस्कुरा क कहती है

"ाचा ठीक है बाबा.. जो चाहे बोल लेना, पर अभी जा यहाँ से.. मुझे थोड़ा तोह आराम करने दे, एक hi दिन में 4 बार छोड़ क अपनी चची की हालत ख़राब कर दी है तूने"

सत्यम एक बार फिर से मालती की बात सुनकर पियर से उसके लाल और कामुक होंठों को चूस लेता है और फिर अपनी चची की गीली और रास से भरी छूट से अपना लुंड बहार खींच क उठ जाता है.. जहा ऐसा होते hi 'माँ' की योनि में भरा एक जवान लड़के का कॉमर्स तेज़ी से बेहटा हुआ बहार आना सुरु हो जाता है

Husband-s-semen-dripping-from-wife-s-vagina-kk-jk-DSC01176.jpg


सत्यम जल्दी से वही अपने एकलौते लोअर को उठता है और बिना पहने hi उसी नंगी हालत में कुण्डी खोल क दवाजे को बस ऐसे hi भिड़ा क बहार निकल जाता है

सत्यम क जाने क बाद कुछ दिएर तक मालती अपनी हालत पे खुद hi शर्माती रहती है जहा उसके गाल पहले से कही ज्यादा लाल नज़र आ रहे थे, फिर वो एक लम्बी सांस भरते हुए जैसे hi अपने ब्लाउज को उठती है वो हैरान रह जाती है ककी वो ब्लाउज 2 टूड़को में था.. मालती जल्दी से उठ क अपने सभी कपडे देखती है जहा उसका पेटीकोट, ब्लाउज और ब्रा- पेंटी तीनो hi किसी चीज़ से काटे गए दिख रहे थे.. कुछ पलों तक तोह उसे कुछ समझ hi नहीं आता पर तभी उसकी नज़र उस कैची पे जाती है जिसे देखते hi मालती क मुख से निकलता है

"कुत्ता कही का…"

पर फिर उसकी ऐसी अनोखी हरकत पे खुद hi है भी पड़ती है, उन सभी कपड़ों में बस एक साड़ी hi थी जिसे लपेटा जा सकता था इसलिय वो बाकि सभी चीज़ों को वही पड़े रहने देती है और साड़ी पहनने क लिए उठने को hi होती है की फिर उसे भी वही दाल देती है उन्ही कपड़ों क ऊपर और मुस्कुरा क रज़ाई क अपने ऊपर खींचते हुए खुद से कहती है

"सुबह पेहेन लुंगी.."

कुलमिलकर वो अपनी गीली और सत्यम क रास से भरी हुई छूट को भी साफ़ नहीं करती, और उसी अवस्था में अपने ऊपर रज़ाई दाल लेती है.. और फिर जल्दी hi थकन से भरा हुआ उसका जिस्म एक बार फिर से गहरी नींद में खोता चला जाता है जहा करवट लेके सोती हुई मालती की छूट से अब भी रह रह क उसके जवान भतीजे का कॉमर्स बह रहा था

cum-flowing-out-of-her-pussy-3sbc7ltdmr.jpg


***

आशा करता हु Chachi-Bhatije यानि माँ और सत्यम का ये कामुक मिलान और मेरी पूरी म्हणत आप सभी को पसंद आये

🙏🙏

जल्दी hi फिर लाटुंगा आगे की कहानी क साथ, जहा कामुकता का संगम और रहस्य की कई साड़ी पार्टी अभी खुलनी बाकी है

नष्ट अपडेट 👉 ये कैसा सपना था ? (30-04-2026)

स्टार्टिंग ऑफ़.. 🆕 Chapter

⭐⭐⏩

अपकमिंग उपदटेस 🖋️

नई Chapter 👉 बिछड़ना..

1- ये कैसा सपना था ?

2- ले पहाड़ मेरी गांड

3- बड़े साहब

4- नयी छूट की चुदाई

5- इंजन आयल लगा क मार ली

6- सुहानी सुबह

7- मेरा पियर चुद रहा था

8- छेड़खानी

9- दोस्त

10- मौत.. और अलविदा

🎁🎁🎁🎁


भविष्य में कही

एक कामुक भरे जिस्म की औरत पूरी तरह नंगी लेती हुई थी जहा उसका पति भी ठीक उसके बगल गहरी नींद में समाया हुआ था, पर वो औरत पूरी तरह नंगी अवस्था में अपनी रज़ाई को अपने हिस्से यानि अपने जिस्म से हटा चुकी थी और उसकी कामुक निघ्त्य भी वही बिस्तर क पास hi जमीन पे पड़ी हुई थी नज़र आ रही थी.. जहा उसकी खुली योनि में इस समय एक काला मोटा किसी भीमकाय लुंड जैसा कुछ पूरी तेज़ी से अंदर बहार हो रही थी और इस क्रिया को करते हुए उस औरत की साँसे भी बुरी तरह से भाग रही थी

solo-girl-001.gif


"आआआआह्ह्ह्ह... भड़वे कुत्ते साले.. खुद से तोह कुछ होता नहीं और अब देखो कैसे मुर्दे जैसा सो रहा है.. हरामजादे खुद कुछ नहीं कर पाटा तोह मेरे लिए hi कोई हत्ता कट्टा मर्द ढूंढ क ला दे.. जैसे वो जवान सत्तू है, बल्कि वही ला दे मेरे लिए.."

वो उस काले लुंड जैसे नज़र आते वास्तु.. जो अछि खासी लम्बी और मोटाई वाली थी उसे जोर जोर से अपनी योनि में अंदर बहार घुसते हुए अपने बगल hi सोते अपने पति को न जाने ऐसी और कितनी hi बातें बोलते हुए ये कार्य किये जा रही थी, सायद उसके हाथ थक चुके थे पर उसका कॉमर्स था की बहार आने का नाम hi नहीं ले रहा था.. तभी वो फिर से अपने पति की और देखती है धीरे से उसकी और थूक सा देती है


"ले कुत्ते तू ऐसी लायक है..."
 
प्रीवियस अपडेट ों पेज No. 550



अपडेट #23

Chapter 👉 बिछड़ना..

सन 🖼️ #01, #02, #03, #04 & #05

ये कैसा सपना था ?

सन 🖼️ #01

सुंदरपुर में फैले घनघोर कोहरे क बीच अपने बिस्तर से उठ क अपने दोनों हाथों को आपस में रगड़ते हुए वीरू सामने की और देखता है तोह उसे बस घने कोहरे की दिवार hi नज़र आती है जहा एक हाथ आगे का भी देख पाना संभव नहीं था

8456a4ceb7e4a5b0a9cfc3b534eaefd5.jpg


वो जोर से अपने दोनों हाथों को ऐसे रगड़ता है जैसे अभी आग की लपटें निकालनी सुरु हो जाएँगी.. और फिर अपना एक हाथ अलग करके उसे अपनी धोती में पीछे की और ले जाता है जहा वो अपने दोनों बड़े भाइयों की नज़रों से छुपाने क लिए अपनी बीड़ी का बंडल रखा करता है

जल्दी hi उसके हाथ में वो बीड़ी का बंडल थमा हुआ था और वो जैसे hi उसमें से एक बीड़ी निकलता है और उसे मुंह की और बढ़ाता है की तभी उसे एक दर्दभरी चीख सी सुनाई पड़ती है जो यक़ीनन किसी औरत की थी और उसमें भी खास ये था की वो उस आवाज़ को इतने अचे से पहचानता था की जैसे hi वो उसके कानो में पड़ती है मुंह से एक नाम फुट पड़ता है

"हर्षिता.."

तभी वो स्वर फिर से उसके सरीर में किसी बिजली जैसे भरते चले जाते hi ककी इस बार उसकी पत्नी 'हर्षिता' क स्वर में गिड़गिड़ाहट थी जैसे वो किसी क आगे हाथ जोड़ क उससे भीख मांग रही हो

"नहीं.. नहीं कुंदन भैया.. मेरी गांड मैं नहीं.. नहीं.. आपका इनके मुकालबे बहुत अधिक बड़ा है, मैं मर जाउंगी.. ये ये इतना बड़ा मोटा अगजर सेह नहीं पाऊँगी.. मैं हाथ जोड़ती हुई भैया.."

अपनी पत्नी क मुख से अपने बड़े और घर क मंझले बेटे यानि कुंदन क लिए ऐसे सब्द सुनकर वीरू क हाथ में थमा उसकी बीड़ी का बंडल उसके कनपटी हुए हाथों से स्वतः hi गिर पड़ता है की तभी उसे सामने वाले कुवे पे कोई हलचल सी दिखती है, पर कोहरे की सफ़ेद दिवार इतनी घनी थी की वो कुछ भी सही से देख नहीं प् रहा था पर तभी फिर से उसे अपनी पत्नी की विनती भरी आवाज़ सुनाई पड़ने लगती है

"हैई.. री.. सोनू क बापू कहा मर गए हो.. जल्दी से आके बचा लो मुझे, जिसे देखो बस गांड का hi दुश्मन बना हुआ है.. रेहम करिये 'कुंदन जेठ जी' मैं इतना बड़ा लुंड सेह नहीं पाऊँगी.. मैं हाथ जोड़ती हु.. आपके"

वीरू इतना तोह जान hi चूका था की उसकी पत्नी का वो स्वर ठीक उस कुवे क पास से आ रहा है इसलिए वो धीरे और कांपते हुए पैरों क साथ कुछ कदम आगे की और बढ़ाता है, जहा जैसे जैसे वो उस कुवे क समीप पहुंच रहा था वो कोहरे की घनी दिवार धीरे धीरे मिटने सी लगी थी और जल्दी hi जो नज़ारा उसकी आँखों क आगे था जिसे देखते hi उसके पुरे सरीर में जैसे कंपकपी सी भर उठती है.. ककी वह उस कुवे की मुंडेर पे उसकी पत्नी हर्षिता पूरी नंगी हालत में झुकी थी और उसके पीछे उसका बड़ा भाई कुंदन खड़ा था जिनकी धोती नीचे पैरों में पड़ी मिटटी को चुम रही थी और उनका मोटा काला किसी सांड जैसा लुंड उसकी पत्नी की गांड क हलके भूरे या ये कहे की सावले छेद पे लगा हु ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे उसे चुम रहा हो

xn-22-p.jpg


"माफ़ करना बहु.. पर तेरी गांड का छेद इतनी पियारा है की अब मैं रुक नहीं पाउँगा, तू जिसे चाहे बुला ले आज मैं ऐसे पहाड़ क hi दम लूंगा"

कुंदन ये कहते हुए अपने मोठे लुंड का मोठे सेब जैसा टोपा अपने छोटे भाई की पत्नी की उस कैसे हुए छेद पे हल्का सा दबाते हुए आगे कहता है

"आअह्ह्ह.. बहु तेरी गांड इतनी कासी कैसे है ?,

..वीरू ने कभी छोड़ी नहीं किया ?"

हर्षिता पूरी नंगी हालत में कुवे की उस मुंडेर पे झुकी हुई कांपते हुए कहती है

"बहुत बार छोड़ी है उन्होंने मेरी गांड.. पर उनके पास लुंड है, आपके जैसे कोई मोटा बांस नहीं.. मैं हाथ जोड़ती हु 'कुंदन भैया' ये न घुसना मैं मर जाउंगी दर्द से"

वीरू अब इतने समीप आ चूका था की उसे सामने का पूरा नज़ारा बिलकुल साफ़ साफ़ दिखने लगा था, वैसे भी हर्षिता जहा महेंद्र को जेठ जी वही कुंदन को कभी जेठ तोह कभी भैया कहा करती थी.. पर इस समय उसकी आँखों क सामने उसकी पत्नी और उसका बड़ा भाई कुंदन उसकी उपस्थिति से पूरी तरह अनभिग घर क सामने hi उस कुवे पे ये कामुक खेल खेलने की पूरी तैयारी कर चुके थे.. तभी वीरू की नज़र कुवे की मुंडेर क पास नीचे जाती है जहा उसे अपनी पत्नी क सरीर और उसकी इज्जत को बचने वाला हर एक वस्त्र पड़ा हुआ दीखता है, यानि साड़ी से लेके वो छोटी काली पेंटी तक जो वो खुद खास तौर पे खालिद की दुकान से पसंद करके लाया था उसके लिए

वीरू का पूरा सरीर कंपकपी से भरता चला जाता है और दिमाग में बस एक hi बात आती है.. की किया इस पल उसकी पत्नी क सरीर पे बस उसका मंगलसूत्र और पैरों में पायल hi बची है, और इस सोच भर ने उसके पुरे सरीर में गर्मी की एक लहर सी भर दी पर इससे पहले की वीरू सामने उस कोहरे क बीच वो सब देखते हुए अपने इन विचारों से बहार आ पता उसके कानो में एक ऐसी दर्द भरी चीख घुलती चली जाती है जिसे सुनकर ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे उसकी पत्नी की कासी गांड में कोई मोटा गीला बांस घुसा दिया गया हो वो भी नीचे का जड़ वाला हिस्सा

images-80.jpg


"Aaaaaaaaaahhhhh... Maaaaaaaaaaaa.... maaaaaaaaaaaarrrrrr.. gayiiiiiiiiiiiiii… reeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeee…. सोनू क बापू………….. कहा मर गए बचा को अपनी हर्षिता को अपने इस जानवर भाई से……… Aaaaaaaaaaaaaaahhhhhh... कामिनीईईए.. Kutteeeeeeeeeeee.. जेठ जी...... रेहम करो.. अपने भाई की पत्नी पे.. आआआआहहह……. माआररररररर गयीईइ.... रईईईई.... Maaaaaaaaaaaaaaaa.... हीी...... रईईईईई... Maaaaaaaaaaaa.... हाथ जोड़ती हु कुंदन भैया… निकल लो वर्ण आज मेरी गांड खून बहा देगी.. आआआआह्ह्ह्ह.... हैई रे कितना दर्द हो रहा है……. Maaaaaaaaaa… इतनी तोह पहली बार में भी नहीं हुआ था….. मायआ.... माअररर्र... गईइइइइइ.... मैं... आआअह्ह्ह"

dfffb8a5b904a7a42167472024ca31e1.jpg


तभी हवा का एक ठंडा झोंका आके सीधा वीरू क चेहरा से इतनी जोर से टकराता है की उसका पूरा बदन काँप उठता है और जब एक पल क लिए बंद हुई उसकी आँखें वापस से खुलती है तोह वो खुद को उसी बिस्तर पे पाटा है जिसपे रात को सोया था



कंटिन्यू... 👇
 
सन 🖼️ #02

मोनू को अचानक अपने सरीर में एक तेज़ झटका सा लगता है और इससे पहले की वो कुछ भी समझ पता उसे तुरंत hi एहसास होता है की वो सांस नहीं ले प् रहा है, वो बैचनी से जैसे hi अपने हाथों को फैलता है उसे बस पानी hi पानी दीखता है.. जहा तक देखो बस पानी, नीला और शांत पर इतना ठंडा की सरीर क अंदर की हड्डियां तक वो ठण्ड उसे महसूस होनी सुरु हो चुकी थी

साथ hi उसे अपने सर में तीव्र दर्द की लहर भर्ती हुई महसूस होती है जैसे किसी ने उसके सर पे कोई भीसाद प्रहार किया हो, वो दर्द से तड़पते हु जैसे hi अपना मुंह खोलने की गलती करता है पानी का एक भनव उसके अंदर भरना सुरु हो जाता है.. एक hi पल में हालत इतनी बुरी हो चुकी थी की उसकी खुली आँखों क आगे जैसे कोई धूमिल सा पर्दा पड़ने लगा हो, और तभी उसे ऐसा लगता है जैसे उसके सरीर पे किसी प्रकार का भार बढ़ने लगा हो जिसका सबसे ज्यादा असर उसे अपने सीने पे महसूस होता है जैसे किसी ने कोई बड़ा सा पत्थर उसे ऊपर रख दिया हो

मोनू एक बार फिर से अपने हाथों को तेज़ी से हिलता है और पैरों में बची पूरी जान को लगा को ऊपर की और उठने की कोशिश की करता है ककी अब वो ये देख प् रहा था की वो किसी ऐसी जगह है जहा चारो और बस पानी hi पानी है.. ये देखते hi मोनू और ज्यादा हड़बड़ा सा जाता है और वो फिर से अपने अंदर बची हुई जान को समेत क अपने हाथ पैरों को हिलता है पर अबकी बार उसे ऐसा लगता है जैसे किसी ने उसके सरीर पे अपनी जकड बनाई सुरु कर दी हो और उसके हाथों को रोकने की कोशिश की जा रही हो, पर वो फिर भी अपनी पूरी जान लगा क ऊपर उठने की कोशिश करता है जिसमें वो इसमें सफल नहीं होता और जब ऊपर की और देखता है तोह बस पानी hi दीखता है

2f02c224a529a1bf561aaf9745959a0d.jpg


मोनू को ऊपर पानी की सतह तोह दिखती है पर इतनी दूर की वह तक पहुंच पाना उसके लिए जैसे अब संभल hi नहीं था, बल्कि उसे तोह ये महसूस हो रहा था जैसे कोई नीचे से उसके पैरों को पकड़ क और गहरी की और खींचता हुआ ले जा रहा हो.. और अब धीरे धीरे मोनू क सरीर में बची हुई इच्छाशक्ति भी उसका साथ चोरटी जा रही थी, वो ये बात अचे से महसूस कर प् रहा था की उसके चारो और का पानी कुछ जीवित जैसा था जैसे वो अपने हिसाब से उसे घेरते हुए नीचे की और ले जा रहा हो

या ये भी कह सकते है की उस पानी में मानो जान हो.. अब मोनू का सरीर धीरे धीरे ठंडा पड़ता जा रहा था जैसे उसके सरीर में बहने वाला गरम खून अंदर hi अंदर जमना सुरु हो चूका हो उसे अपनी बंद होती आँखों क सामने एक अंतिम चेहरा दीखता है जो उसकी खूबसूरत माँ 'मालती' का था

9d9c43d31fabafcfafea9d979ee3f8e0-1.jpg


मालती का चेहरा दीखते hi जैसे उसके अंदर जीवन का भुजता हुआ दिया एक आखिरी बार फड़फड़ा सा पड़ता है और वो अपनी पूरी शक्ति लगते हुए ऊपर की और देखता है जहा उसे सतह को पार करती हुई बस सूरज की कुछ किरणे hi नज़र आती है.. पर कभी खुलती तोह कभी बंद होती उसकी पलकों क चलते वो सूरज की सुनहरी किरणे भी जैसे उससे दूर होती जा रही थी, उसका सरीर लगातार पानी की अंदर की और बढ़ता जा रहा था जैसे सच में कोई उसे वह खींचता हुआ ले जा रहा हो, ऐसी पल उसे अपनी बंद होती आँखों क सामने किसी औरत का सरीर नज़र आता है और ऐसा लगता है जैसे वो हस्ती हुई अब उसके चारो और घूम रही हो पर वो पानी में आगे बढ़ने क लिए हाथ पाऊँ कुछ भी नहीं हिला रही थी यु समझो जैसे वो पानी खुद hi उसकी आज्ञा को मानते हुए उसके सरीर को दिशा देता जा रहा हो

2005-2113.jpg


तभी मोनू और उस औरत की नज़रें आपस में टकराती है हालाँकि मोनू को चेहरा साफ़ नज़र तोह नहीं आता पर उसे khil-khilahat जरूर सुनाई पड़ती है, जो पानी क अंदर कैसे संभव थी ये भी एक सवाल hi था.. वही और औरत इतनी आसानी से पानी में घूम रही थी जैसे वो खुद उसी पानी का हिस्सा हो या सायद उसका सरीर hi उस पानी से बना था, सायद मोनू की अंतिम गाड़ी आ चुकी थी पर तभी पानी की सतह को चीरती हुई एक आवाज़ मोनू को अपने कानो में सुनाई पड़ती है

"बीटा.."

मोनू को अपनी आँखें खुली रखने में भले की सफलता नहीं मिल प् रही थी पर ये आवाज़ तोह कभी और कही भी पहचान सकता था, सायद यही कारन था की जैसे hi ये स्वर उसके कानो में पड़ा था वो अपनी बची हुई इच्छाशक्ति को इक्कट्ठा करता है और ऊपर की और देखता है तोह उसे एक मजबूत सरीर सा नज़र आता है जो धीरे धीरे उसकी और बढ़ता जा रहा था, उस इन्शान का हाथ मोनू की और hi था जैसे बस किसी भी पल वो मोनू को थम लेगा और जल्दी hi ऐसा hi होता है.. पर जैसे hi वो इंसान मोनू की ब्याह को थमते हुए उसे ऊपर की और खींचने की कोशिश करता है, मोनू को महसूस होता है की कोई और ज्यादा ग़ुस्से से उसके पेअर को पकड़ को नीचे की और खींच रहा हो

पर मोनू को जैसे भरोषा था की अब वो बच जायेगा, और अब उसकी आँखें पूरी तरह बंद हो चुकी थी पर साँसों की पोटली में कुछ साँसे अब भी बची रह गयी थी.. ककी अब मोनू को बचने बड़ा वो हाथ अंततः उसे खींचता हुआ ऊपर बढ़ने hi लगता है और जल्दी hi पानी की सतह को चीरता हुआ एक वो इंसान उसे को बचा ले जाता है

मोनू अब पूरी तरह बेहोश था पर उसे ऐसा लगता है जैसे वो किसी नाव पे हो, उसे अब भी पानी की उछलती लहरों क साथ वो सवार सुनाई पद रहा था जो किसी स्त्री का था और अब वो ग़ुस्से से भरी हुई जैसे दहाड़ सी रही थी

"कुंदन.. तुमने मेरे जल से एक जीवन को बचा कर मेरा आहार चीन है, तुमने माया क ग़ुस्से को ललकारा है.. इसका अंजाम बहुत दरदानक होगा"

अब मोनू की साँसे वापस आ चुकी थी, वो तेज़ तेज़ साँसे लेने लगता है जैसे अपनी बची हुई साडी साँसे आज hi अपने अंदर भर लेगा वो पूरी तरह पसीने से भीगता चला जाता है और जब उसकी आँखें देखने की इस्तिथि में लौटती है वो खुद को बिस्तर पे पाटा है.. जहा रज़ाई उसके सीने से हैट क नीचे सरक गयी थी और वो अब उठ क बैठ चूका था, पूरी तरह पसीने से भीगा हुआ मोनू चारो और देखता है तोह खुद को उसी कमरे में पता है जहा रात को सोया था

वो बिस्तर क पास वाली खिड़की की और देखता है जहा बहार अब भी अँधेरा था पर ये अँधेरा रात का स्याह नहीं अपितु सुबह का धीरे धीरे उजाले क आगे हारता हुआ अँधेरा था.. तभी एक बार फिर से मोनू को अपने सर में जोर का दर्द महसूस होता है और उसकी आँखें बंद होती चली जाती है उसे ऐसा प्रतीत होता है जैसे उसका बड़ा भाई सत्तू उसके पास बैठा हो और कुछ बातें कर रहा हो पर वो कोई जवाब नहीं दे रहा था ककी वो तोह शांत सी अवस्था में लेता हुआ था

मोनू को कुछ भी समझ नहीं आता, पर उसके सर का दर्द धीरे धीरे बढ़ने लगता है, उसके कानो में सत्तू का स्वर गूंजने लगता है

"मैंने बहुत कोशिश करि की ऐसा कुछ न सौचु, ककी न hi ये सामाजिक तौर पे सही है.. न hi ऐसा कुछ संभव है, पर किया करू जीवन में पहली बार कोई पसंद आया और वो भी अपनी hi.."

अचानक से जैसे मोनू का दर्द ख़तम हो जाता है वो अपनी आँखों को खोल क चारो और देखता है क्युकी उसे ऐसा लग रहा था जैसे वो ध्वनि हर जगह से उसके कानो में आ रही हो, जबकि उसे अचे से याद था की उसके बड़े भाई सत्तू ने कभी भी उसके साथ ऐसी कोई बात नहीं की थी.. उसे ऐसा लगता है जैसे वो सब बस कुछ टूटी हुई यादें हो, जिसे वो जोड़ने की बहुत hi कोशिश सी करता है पर सफल नहीं हो पाटा

महेंद्र क घर से दूर उस शापित वृक्ष क नीचे खड़ा वो लाल वस्त्रों वाला बुद्धा खड़े खड़े ऐसे मुस्कुरा रहा था जैसे वो मोनू को सुन प् रहा हो, वो एक लम्बी सी सांस भरता है फिर उस पेड की और देखता है जिससे एक पत्ता उसी पल टूट क हवा में घूमता हुआ उसके फ़ैल चुके हाथ पे आके खुद hi रुक जाता है.. वो उस ोष की बून्द से सजे हुए पत्ते की और देखते हुए मुस्कुरा पड़ता है और उसके हिलते हुए होंठों से वो सब्द निकलता है

"सब कुछ वैसा hi है.. जैसा होना चाहिए, जल्दी hi इस श्रापित जीवन से मुख्ती मिलेगी"

वो एक लम्बी सी सांस भरते हुए खुद सुबह की ताज़गी को मानो अपने अंदर समेटने लगा हो.. तभी दूसरी और सर्प नदी में जैसे अचानक से कोई सुनामी आ गयी हो उसके लहरें खुद hi हवा से बातें करनी सुरु कर देती है

2127c751a3c49a0a9bda3f5cf7014b64.jpg


उन लहरों क बीच से एक निवस्त्र नंगा सरीर ऊपर की और उठता है जिसके जबड़े ग़ुस्से भींचे हुए था और उसके मुख से एक एक सब्द ऐसा निकलता है जैसे वो नफरत की अग्नि से झुलस रहे हो

"तुम कितनी भी छाले चल हो, मैं इस जीवन को चोर्ने वाली नहीं हु.. न तुम्हे चोर्ने दूंगी"

वही मोनू इन सब से पूरी तरह बेखराब पसीने से नहाया हुआ अपने बिस्तर पे बैठा हुआ सोच रहा था की आखिर ये सब किया था, और अगर ये सब हुआ है तोह उसे याद क्यों नहीं.. बस टूटी हुई यादों सामान सब क्यों लग रहा है, मोनू अब भी उसी प्रकार पसीने में भीगा हुआ था और काफी दिएर इस बारे में सोचने क बाद वो वापस से तकिये को सिधार करके अपने पीछे लगता है और उसकी टैक लेते हुए adh-leta हुआ पसर पड़ता है.. वो अपने दोनों हाथों को अपने सर क पीछे ले जाता है और इन दर्द भरी और उलझने वाली यादों को मिटने क लिए कुछ पुराणी यादों में खोता चला जाता है और जल्दी hi बचपन का वो दिन उसके सामने ऐसे चलने लगता है जैसे कोई चलचित्र सुरु हो चूका हो


कंटिन्यू... 👇
 
सन 🖼️ #03

गर्मी का पारा पूरी तरह ऐसे चढ़ा हुआ था जैसे सूरज मां आज ग़ुस्से से लाल हो रहे हो ऐसे में इस चिलचिलाती हुई गर्मी से बचते हुए किनारे लगे उन पेड़ों की चाव में मोनू आगे बढ़ता जा रहा था जहा उसके साथ उसके बचपन क सबसे खास दोस्त था 'खालिद' था

खालिद का हाल भी उसके जैसा hi था, दिन क करीब 2 बज रहे होंगे और स्कूल से छुट्टी होते hi दोनों सीधा पास की दुकान पे पहुंच गए थे जहा आज सुबह hi जब मोनू और खालिद स्कूल जा रहे थे तब रस्ते में उन्हें उनकी बुआ 'शीला' मिली थी जो मंदिर जा रही थी उसने hi पियर से मोनू और खालिद को वो पैसे दिए थे जिससे अब वो दोनों 2 बड़ी कुल्फी लेके कहते हुए घर की और प्रस्थान कर रहे थे वैसे उस कुल्फी ने ज्यादा दिएर तक उनका साथ नहीं दिया और आधे रस्ते में hi वो ख़तम हो गयी थी.. बाकि गर्मी का केहर कुछ ऐसा था जैसे उस कच्ची सड़क से भी आग निकल रही हो और दोनों दोस्तों की सफ़ेद शर्ट पसीने से इतनी भीग चुकी थी वो उनके सरीर से पूरी तरह चिपक गयी थी और पसीना तोह ऐसे बह रहा था जैसे नाहा क चले आ रहे हो

"तू बुआ को ऐसे क्यों देख रहा था.. ?"

822e442e54357fb51623bb18ee7b53f4.jpg


तभी अचानक से मोनू क शब्दों ने गर्मी से परेशां खालिद को पूरी तरह चौका दिया था.. खालिद एक पल क लिए सोच hi नहीं पाटा की किया उत्तर दे पर फिर खुद को सँभालते हुए कहता है

"अरे मैं.. वो देख रहा था की बुआ इतनी गर्मी में भी अक्सर मंदिर जाना नहीं भूलती"

मोनू उसकी बात से सहमत होते हुए, "है ये तोह तूने बिलकुल सत्य कहा.. बुआ की बात hi अलग है"

खालिद रहत की सांस लेता है, वही मोनू एक बार चोर नज़रों से उसे घूरते हुए धीरे से मुस्कुरा पड़ता है.. दोनों दोस्त अब भी उस पथ पे आगे बढ़ते जा रहे थे

जहा एक और मोनू की शर्ट पूरी तरह उसकी पीठ और सामने से चिपकी हुई थी वही खालिद का हाल भी कुछ जुड़ा नहीं था, उसके काले बाल पूरी तरह पसीने से भीग क उसके माथे पर पूरी तरह चिपके हुए थे, वैसे दोनों hi इस समय सर्प नदी क किनारे किनारे आगे बाद रहे थे.. वैसे ये उनका रोज़ वाला रास्ता नहीं था पर आज जब वो स्कूल से बहार निकले तोह एक 52-55 साल की सावली पर पुरे भरे बदन की औरत उन्हें स्कूल क बहार hi मिल जाती है जो खास तौर पे उन दोनों क पास hi आके खाने को कुछ मांगने लगती है जहा उनकी बात सुनकर खालिद है पड़ा था

"किया दादी.. देख नहीं रहे हम तोह खुद बचे है, हम किया देंगे आपको"

काले वस्त्रो से लिपटी हुई वो औरत एक बार को खालिद को ऐसे देखती है जैसे उसे खा hi जाएगी, उनकी आँखों में न जाने ऐसा क्या था की में कुछ काँप सा गया था

74d5fb2b342a32a02fb48c020bca095e.jpg


पर फिर अचानक से वो खालिद की बात पे धीरे से मुस्कुरा पड़ती है, और पियर से पहले उसके और फिर मेरे सर पे हाथ रखते हुए कहती है

"भूके को एक नीलवा भी खिला दो तोह बहुत है.. बाकि नहीं है तोह कोई बात नहीं"

उस बुध्दिया की बात सुनकर न जाने क्यों mera(Monu) का दिल करने लगा की काश कुछ भी होता इस समय मेरे पास तोह जरूर देता, पर तभी मैं देखता है की खालिद अपने कंधे से अपना बैग उतरता है और जल्दी से अपना टिफ़िन निकल उसके खोलते हुए उस बुढ़िया की और बड़ा देता है

"एक पराठा और अचार है दादी.. अगर ये आप"

वो बुढ़िया एक पल क लिए मेरी और देखती है जैसे वो कुछ मुझसे च रही हो और फिर खालिद की और देखे हुए उसकी बात पे मुस्कुरा पड़ती है और बिना किसी झिझक क वो पराठा और अचार उठा लेती है और मुस्कुरा क कहती है

"जीवन बढ़ाते रहो.."

ये बड़ी hi अजीब सी दुआ थी जो हमने पहली बार hi सुनी थी, ऐसा लगा जैसे वो हमे नहीं खुद को hi दुआ दे रही हो.. पर हम एसपी इतना धियान नहीं देते

मैं तुरंत hi खालिद को कोहनी मरते हुए

"साले तूने अपना खाना नहीं खाया था.. ?"

खालिद भी मेरी बात पे मुस्कुरा पड़ता है और टिफ़िन वापस बैग में रखते हुए

"मालती माँ क हाथों से बानी खीर क आगे अचार पराठा कोण खायेगा"

खालिद की बात पे मुझे हसी आ जाती है, असल में जब भी खीर लेके आता था वो ज्यादातर उसी क लिए होती थी.. ककी उसे hi माँ क हाथ की खीर ज्यादा पसंद थी जबकि मुझे तोह 'नसरीन अम्मी' क हाथों की बानी बिरयानी का सौक था, इधर वो बुढ़िया कहते हुए कुछ hi कदम आगे बड़ी थी की हमारी और मुद क मुस्कुरा क कहती है

"वैसे इतनी गर्मी में तुम दोनों घर कैसे जाओगे.. ?"

उनकी की इस बात पे हम दोनों hi है पड़ते है और इस बार में जवाब देता हु

"किया दादी.. जैसे रोज़ जाते है वैसे hi"

मेरी बात पे वो भी है पड़ती है और फिर हस्ते हुए कहती है

"अरे तोह वो सर्प नदी वाले रस्ते से जाओ न, उधर तोह पानी की ठंडक और पेड़ों की चाव भी रहेगी.."

वो ये कहते हुए आगे बाद चलती है, और उनके जाते hi हम दोनों hi आगे बाद चलते है और जब मोड़ आता है तोह मैं hi बुढ़िया दादी क सुझाव अनुसार उस 'सर्प नदी' वाला रास्ता लेने क लिए कहता हु, जिसपे खालिद कुछ सोचते हुए कहता है

"बेकार का इतना लम्बा रास्ता क्यों लेना.. वैसे भी वो कितना सुनसान रहता है, इधर से hi चलते है न"

खालिद की बात पे मैं इस बार है पड़ता हु और उसकी ब्याह खींचते हुए उसे सर्प नदी वाले रस्ते की और मोड़ देता है

"चुपचाप चल.. साला फत्तू कही का"

और फिर हस्ते हुए आगे बाद चले थे, और अभी इस समय उसी मार्ग पे थे हम दोनों जहा बगल में hi नदी kal-kal करते हुए बहती जा रही थी

नदी का बहाव काफी तीव्र दिख रहा था और ऐसी गर्मी में भी उस नदी क पानी में तनिक भी कमी नहीं आयी थी, वैसे ये खूबी हमेशा से इस 'सर्प नदी' की रही है कैसे भी हाल को पर ये नदी आज तक नहीं सुखी.. हम दोनों अपनी hi बातों में लगे हुए आगे बाद hi रहे थे की तभी मुझे नदी किनारे एक विशाल पीपल का पेड़ नज़र आता है जो पूरी तरह झुका हुआ था उस नदी क ऊपर.. उसकी बड़ी बड़ी और घनी डालियाँ उस गहरी नदी क तेज़ बहते हुए पानी में डूबी हुई थी पर ऐसी कारन पेड क नीचे अछि खासी जगह नहीं दिख रही थी जहा एक छोटा सा पत्थर भी नज़र आता है

मैं आगे बढ़ते हुए अनायास hi उस लगभग पूरी तरह लेते हुए वृक्ष को देखने लगता हु और फिर मेरी नज़र उस पेड क आगे नदी क थोड़ा बीच में एक आकृति पे जाती है जैसे कोई मंदिर जैसा ढांचा हो.. वैसे वो पूरी तरह उस पानी में समाया हुआ था बस उसका ऊपरी हिस्सा पे एक अजीब सी आकृति उखेरी गयी थी जिसे देख क ऐसा लग रहा था जैसे वो 2 आँखें हो और वो भी बिलकुल सजीव सी जैसे वो हमे hi देख रही हो

मैं आगे बढ़ते हुए उन आखों को देखता हु तोह न जाने कैसे मन में वह स्नान करने की ीचा उत्पन होने लगती है और मैं वही रुक जाता हु और खालिद की और देखते हुए

"चल न नहाते है.."

खालिद तोह जैसे हैरान hi रह जाता है मेरी बात पे, वो हैरानी से मुझे देखते हुए कहता है

"साले पागल हो गया है किया.. पता है न ये कोनसी जगह है, चुपचाप चल यहाँ से"

मुझे न जाने क्यों हसी सी आ जाती है

"किया बच्चों जैसा डरता है, देख न वह उस पेड क नीचे मस्त चाव है.. वही चलके नहाते है"

मैं ये कहते हुए जैसे hi उस और पहला कदम बढ़ाता हु खालिद मेरा हाथ पकड़ लेता है और थोड़े ग़ुस्से से कहता है

"बकवास मत कर, चुपचाप घर चल.. पता नहीं है किया, गाओं क लोग तक इधर आना पसंद नहीं करते कहते है ये जगह किसी यक्षणी का निवेश स्टाल हुआ करता था"

मैं फिर से उसकी बात पे है पड़ता हु

"साले तू बड़ा hi डरपोक है, अरे मेरे बापू कहते हैं ये भूत वोट कुछ नहीं होता.. देख न कितना पसीना आ रहा है चल न जल्दी से नाहा लेंगे"

इस बार खालिद का चेहरा पहले से ज्यादा गंभीर होता चला गया, उसने मेरा हाथ और जोर से जकड लिया मानो उसे दर हो की कही मैं चला hi न जाऊ

"देख मैं मज़ाक नहीं कर रहा हु.. कहते है यहाँ आज भी लोगो को अजीब अजीब आवाज़ें सुनाई पड़ती है, और वो जो तू ऊपर निकली हुई वो चीज़ देख रहा है न.."

खालिद नदी क थोड़ा आगे बहार नज़र आती उसी आकृति की और दिखते हुए कहता है

"वो उस यक्षणी क घर की अंतिम निशानी है, कहते है आज भी पानी क अंदर उसका पूरा घर है.. जिसके अंदर वो जाना चाहती है पर जा नहीं सकती, और ऐसी कारन वो इस नदी से बंधी हुई है"

फिर एक पल क लिए रुकता है और अपने दिमाग पे जोर डालने क बाद आगे कहता है

"कहते है उसके अपने hi पति ने उसे कोई श्राप दिया था, और तभी ऐसा है और यही ऐसी नदी क जल में भटक रही है"

मोनू, खालिद की ये गंभीर बातें सुनकर इतनी जोर से हस्ता है की उसकी हसी दूर तक फैलती चली जाती है

"तू और तेरी रोचक कहानियां.. तू पक्का बड़ा होक Deepaksoni जैसा कोई बड़ा लेखक बनेगा"

मैं ये कहते हुए उससे हाथ छुड़ाने की कोशिश सी करता हु की तभी खालिद बोल उठता है

"अरे वो याद आया.. आज तोह अम्मी ने बिरयानी बनाई है न, तू जा नाहा मैं तोह घर जा रहा हु"

3d655aba243e464cd49a2d72b4a669f8.jpg


वो ये कहता है और ऐसे मुद जाता है जैसे सच में जाने वाला हो, पर उसने अभी भी मोनू का हाथ मजबूती से पकड़ रखा था.. वही मोनू जैसे hi बिरयानी की बात सुनता है वो तोह जैसे सब भूल hi जाता है

"किया कहा बिरयानी.. साले मेरे बिना खायेगा, मुंह तोड़ दूंगा तेरा"

मेरी बात पे खालिद भी है पड़ता है, और फिर बिना किसी विल्बम क हम उसके घर की और आगे बाद चलते है, इस बीच थोड़ी दूर जाने पे मैंने एक बार फिर से वापस पीछे मुड़कर देखा तोह एक पल क लिए मुझे ऐसा लगा जैसे उस झुके हुए पेड क पास कोई औरत कड़ी हो पर जैसे hi मैंने अपनी पलकों को वापस से बंद करके खोला वह कुछ नहीं था

मोनू एक बार फिर से झटके से अपनी आँखों को खोल क बैठ जाता है, और समझ नहीं आ रहा था आज अचानक से उसे ये सब क्यों याद आ रहा था.. और इतनी पुराणी बात की छोटी छोटी चीज़ें उसे पुरे विस्तार से याद आने लगी थी जैसे वो कल की hi बात हो

वही अब भी उसी श्रापित पेड क नीचे खड़ा वो बुद्धा बस मुस्कुराये जा रहा था, और फिर से वो सब्द निकलते है

"तू मुझे रोक नहीं पायेगी.."

जहा इस बात का सीधा असर वह से दूर सर्प नदी क जल में दीखता है जिसमें अचानक से तीव्र उछाल आने सुरु हो चुके थे और फिर पानी क अंदर उसकी सतह पे एक स्वर गूंजता हुआ ऊपर की और आता है

"तुम चाहे जितने भी खेल खेल लो, पर बिना उस 'शक्ति खंजर' और बिना उसकी धारक क तुम मेरा कुछ नहीं बिगड़ सकते, तुम मेरे साथ अंतहीन समय तक यही ऐसी लोक में फसे रहोगे.. पर में एक न एक दिन उस 'शक्ति खंजर' की धारक को ढूंढ hi लुंगी और उसे ख़तम करके तुम्हारे इस खेल को हमेशा हमेशा क लिए ख़तम कर दूंगी"

इस बार उस वृक्ष क नीचे खड़ा वो बुद्धा मुस्कुरा सा पड़ता है और लगभग हस्ते हुए कहता है

"सालों से तुम्हारी हर चाल विफल होती आयी है, चाहे उस अमावस्या क दिन उन बच्चों का आहार करने की मंशा hi क्यों न हो"

सर्प नदी में इस बार ऐसे बचल सा आता है, जैसे वो ग़ुस्से को दर्शा रही हो

"उस दिन तोह उस लड़के क कारन मैं सफल नहीं हुई पर मैं तुम्हे भी कभी सफल नहीं होने दूंगी.. मैं ये लोक कभी नहीं छोड़ूंगी न तुम्हे चोरनी दूंगी"

बुद्धा ऐसे है पड़ता है जैसे कोई व्यंग की बात सुनी हो उसने, और फिर उसके हाथों की उँगलियों में हलकी सी थिरकन होती है फिर देखते hi देखते उस पेड क अनगिनत से पत्ते टूटते चले जाते है और हवा क चक्र क साथ उस बुड्ढे क चारो और एक आवरण सा बनाते चले जाते है.. जहा उस आवरण क अंदर उस बुड्ढे क आन्ध्रों पे मुस्कान खिलती चली जाती और फिर वो मुस्कुरा क कहता है

"खेल तोह आज से 39 साल पहले hi सुरु हो चूका था…"


पर इस बार सर्प नदी में कोई हलचल नहीं होती, जैसे वो कुछ भी सुन hi नहीं प् रही हो

कंटिन्यू... 👇
 
सन 🖼️ #04

39 साल पहले उस घनघोर वर्षा क दिन हरिपुर गाओं क पुराने कुल देवता क मंदिर वाले रस्ते पे आगे बढ़ती हुई एक बैलगाड़ी पूरी रफ़्तार से भागती जा रही थी

Gemini-Generated-Image-ex3a6yex3a6yex3a.png


पर वो अचानक से तब रुक जाती है जब उसके सामने एक लाल वस्त्रों में लिप्त हुआ एक बुद्धा आके खड़ा हो जाता है, उस गाड़ी का चालक बिना समय नष्ट किये अपनी बैलगाड़ी को रोक देता है और पुरे सम्मान से उतर क बारिश में भीगते हुए उस बुड्ढे बाबा क पास पहुंच क हाथ जोड़ते हुए

"किया बात है बाबा.. हमारा रास्ता क्यों रोके हुए है"

फिर अपनी गाड़ी क पिछले हिस्से की तरफ इशारा करते हुए

"बाबा मेरी पत्नी पेट से है और उसकी हालत बिगड़ती जा रही है, हमे जल्दी से 'दायी माँ' क पास पहुंचना है.."

वो बुद्धा एक पल क लिए मुस्कुराता है और फिर शांत स्वर में कहता है

"बीटा मुझे भी ऐसी रस्ते पे आगे जाना है.. जरा चोर डोज किया ?"

आदमी बिना किसी देरी क तुरंत हामी भरते हुए कहता है

"आप जल्दी से पीछे बैठ जाइए.. समय बहुत काम है, मेरी पत्नी की हालत बिगड़ती जा रही और इस वर्षा क कारन किसी उपचार का मिलना मुश्किल सा लग रहा है"

वो 80-90 साल का लाल वस्त्रों में पूरी तरह भीगा हुआ बुद्धा बैलगाड़ी क पिछले हिस्से की और चल पड़ता है जहा एक औरत लेती हुई थी और उसकी आँखें दर्द से बंद थी जैसे धीरे धीरे वो बेहोशी की सागर में दुब रही हो.. इधर उस बैलगाड़ी का स्वामी बिना देरी किये वापस अपनी जगह पहुंच क गाड़ी आगे बड़ा देता है और इतनी दिएर में वो बुद्धा भी उसी औरत क पास hi बैठ चूका था

आदमी ने बैलगाड़ी को ऊपर से धक् रखा था, ताकि बारिश से बचा जा सके.. बुद्धा एक पल क लिए उस औरत को देखता है और फिर परेशानी से भरे उस गाड़ी चालक को देखते हुए कहता है

"वैसे नाम किया है तुम दोनों का.. ?"

वैसे तोह वो गाड़ी चालक इस समय पूरी तरह परेशानी से भरा हुआ था पर वो बिना कुछ सोचे बोल पड़ता है

"मेरा नाम.. 'धरम राज' और मेरी पत्नी का कौशल्या देवी.."

बुद्धा बहार होती उस घनघोर वर्षा को देखते हुए उस औरत की टूटी हुई साँसों को मानो सुनता हुआ का कहता है

"वैसे होने वाली बेटी का नाम किया सोचा है.."

धरम राज को जैसे कुछ समझ hi नहीं आता, वो तोह इस बात से परेशां था की किसी प्रकार वो दूसरे गाओं पहुंच सके ताकि वह की 'दाई अम्मा' की मदद ली जा सके और किसी प्रकार उसकी पत्नी और उसका होने वाला बचा बच सके.. धरम राज जैसे उलझन में और उलझता हुआ

"कोनसी बेटी.."

वो बुद्धा बस मुस्कुरा पड़ता है, और धीरे से उस औरत क पेट पे हाथ रखते हुए कहता है

"मालती.. मालती नाम रखा इसका"

तभी अचानक से न जाने काया से एक काल कौवा ऐसी बारिश में उड़ता हुआ सीधा धरम राज की और झटक पड़त है पर धरम राज जल्दी से खुद का बचाव करते हुए उस बैलगाड़ी को सम्बल लेता है, उसे समझ नहीं आता ऐसी बारिश में कोई पक्षी कैसे बहार ुधा सकता है.. जल्दी hi वो आगे बढ़ते हुए बिना पीछे देखते कहता है

"मालती क्यों बाबा.. ?"

पर कोई उत्तर नहीं मिलता उसे, वो पीछे मुद क देखता है तोह उसकी पत्नी क अल्वा वह कोई नहीं था.. उसे कुछ भी समझ नहीं आता पर अभी उसकी पत्नी की बिगड़ती हालत क कारन वो इस बारे में और नहीं सोच पता और आगे बढ़ता चला जाता है पर अब उसके दिमाग में एक नाम बैठ चूका था

"मालती"

वापस सुंदरपुर लौट चलते है, जहा कहानी का एक और पन्ना पलटने का समय है अब..



कंटिन्यू... 👇
 
सन 🖼️ #05

सुंदरपुर में चली कल की वर्षा ने ठण्ड का पारा पूरी तरह बड़ा रखा था वही कोहरे का हाल कुछ ऐसा था की हाथ को हाथ न सूझे, ऐसे में एक तेज़ रफ़्तार कार गाओं क अंदर प्रवेश कर चुकी थी.. वैसे हैरानी की बात थी की ये कार जंगल क उस रस्ते से आयी थी जहा कोई भी जाना पसंद नहीं करता था

सुबह क अभी सायद 6:30 hi हुए थे और ऐसे में चारो और कोहरे की दिवार बानी हुई थी और खेतों का हाल तोह कुछ ऐसा था की अगर कोई आपसे बस कुछ हाथ भी दुरी पे खड़ा होता तोह सायद hi नज़र आता

80328451436d9cd4d5ca9d54211800eb.jpg


बाकि गाओं में ऐसी ठण्ड में किया हाल होता है ये तोह गाओं क जीवन को जानने वाला हर इन्शान अचे से समझ hi सकता है

सुंदरपुर की सडकों पे अभी भी जगह जगह घड़ों में पानी जमा हुआ था, जिसके चलते आवागमन पहले से कहथिन हो चूका था.. वही कच्ची सड़क क दोनों और विशाल पेड़ों की डालियों को देखो तोह ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वो अब भी बारिश में भीगी हुई हो क्युकी उनके पत्तों पे ोष की नन्ही नन्ही बूंदें किसी मोती सामान सजी हुई दिख रही थी, बाकि सूरज की किरणे तोह दूर दूर तक नज़र आने से कटरा रही थी और ऐसी ठण्ड में सायद hi कोई घर से बहार इतनी सुबह निकलना पसंद करेगा पर ये किशन hi होते है जो बिना ठण्ड और वर्षा की परवा किये हुए अपनी माटी क प्रेम क चलते घर से निकल hi पड़ते है

बाकि सुंदरपुर की ठंडी हवा हौले हौले चलते हुए अब भी किसी भी इन्शान की हड्डिया तक कंपकपा देने का दमखम रखती थी, जहा एक और सामने का कुछ भी सही से नज़र नहीं आ रहा था ऐसे में वो कार तेज़ी से गाओं में प्रवेश कर चुकी थी और अब एक खास गंतव्य की और आगे बढ़ती जा रही थी जिसे चलने वाला आगे बैठा हुआ एक 50-55 साल का कोई बुद्धा आदमी था वही उस कार में पीछे एक खूबसूरत लड़की बैठी हुई थी

सुंदरपुर क उस घने कोहरे को चीरते हुए वो कार अब खेतों क पास से गुजरते हुए आगे बाद रही थी, जहा ठीक उसी समय आगे क खेतों की पतली पगदंगी पे चलता हुआ एक जवान लड़का जो किसी मर्द जैसा प्रतीत हो रहा था वो आगे बढ़ते हुए उस सड़क की दिशा में चलता जा रहा था.. उसकी चौड़ी छाती और मजबूत काठ काठी उसे उस घने कोहरे में भी सबसे अलग दिखा रही थी, इस समय उस जवान लड़के ने एक पेंट पहनी हुई थी पर इस पल वो उसके घुटनो तक ऊपर छड़ी हुई थी और उसका निचला हिस्सा कुछ भीगा हुआ भी था

बाकि उसके पेअर ऊपर घुटनो तक पूरी तरह मिटटी में साणे हुए थे जैसे वो ऐसी ठण्ड और इतनी सुबह सुबह hi खेतों में जेक अपना कार्य करके लौट रहा हो, वही ऊपर सरीर पे उसने एक मोती सी सोल को लपेटा हुआ था पर वो सोल भी उसके मजबूत सरीर और भीमकाय काय को छिपा नहीं प् रही थी.. वो तेज़ क़दमों से आगे बढ़ते हुए उस सड़क की और बाद रहा था जहा उसके चेहरे की शांति कुछ ऐसी थी जैसे उसे खेतों में म्हणत करने से एक सुकून मिला हो

ठीक ऐसी पल जंगल क रस्ते से गाओं में प्रवेश करती हुई वो कार अब उसी जगह आ चुकी थी जहा से पगडंडियों पे चलता हुआ वो मरदाना जवान लड़का आगे बाद रहा था, की तभी उस कार की हेडलाइट्स जो घने कोहरे को चीरती हुई आगे का मार्ग दिखा रही थी अचानक से हिलने लगती है जिसका कारन उस कार का संतुलन बिगड़ना था और फिर उस कार ने एक जोर का झटका खाना सुरु कर दिया और एक और हलकी सी झुकती चली गयी.. वो तोह उस कार क चालक ने ठीक समय पे उसे संभल लिया वर्ण सायद सड़क क किनारे लगे किसी पेड से टकरा भी सकती थी, पर तभी कार क एक पाहिले से जोर की आवाज़ आयी और उस सन्नटे वातावरण में "हिस्स्स्सस्स्स्स…"

की ध्वनि भर्ती चली गयी जैसे कोई गदराई औरत अपने चूतड़ों क बीच से गरम हवा का रिसाव कर रही हो

इस सब क चलते कार की पिछली सीट पे बैठी वो जवान होती लड़की जो इससे पहले पूरी तरह अपने मोबाइल में लगी पड़ी थी और उसकी उंगलिया बार बार स्क्रीन पे चलते हुए स्क्रॉल करती जा रही थी, और इस अचानक आये असंतुलन क चलते बुरी तरह दर गयी थी और उसके हाथ से उसका वो महंगा फ़ोन लगभग girte-girte बचा था.. तभी कार में तेज़ी से ब्रेक लगती है और अगर वो जवान होती लड़की अपना एक हाथ आगे की सीट क पिछले हिस्से पे जमा न लेती तोह सायद उसका खूबसूरत चेहरा अब तक वह टकरा चूका होता

"बुड्ढे दिमाग ख़राब हो गया है क्या?

.. ड्राइविंग नहीं आती तोह इतनी महंगी कार को हाथ भी क्यों लगते हो"

वो एक hi सांस में साडी चीज़ों का दोष उस बुड्ढे ड्राइवर पे दाल चुकी थी और बिना वजह जाने अपने गुस्से की बिजली उस गरीब आदमी पे बर्षा चुकी थी

ड्राइवर जो अभी तक खुद hi अचानक

'ये किया हुआ?'


ये hi सोच रहा था वो ऐसी डाट सुनकर और ज्यादा सकपका सा गया, उसपे वो लड़की जो उसकी बेटी की उम्र थी.. उससे ये डाट सुनकर उसे और ज्यादा चुबती हुई महसूस हुई, पर वो अचे से जनता था की वो बस एक नौकर है इसलिए बिना अपनी गलती क भी माफ़ी मांगते हुए

"माफ़ करना छोटी मालकिन, पर वो सायद गाड़ी का टायर पंचर हो गया है.. इसलिए.."

वो बस इतना hi बोल पाया था की वो लड़की फिर से उसपे बरस सी पड़ती है

"तोह अब बैठ क मेरा मुंह किया देख रहे हो, जाओ उतरो गाड़ी से और तुरंत सही करो.. वह भैया भाभी मेरी प्रतीक्षा कर रहे होंगे"

पर इससे पहले की उसका ड्राइवर कार से उतरता वो जवान होती खूबसूरत काय की मलिका खुद hi ग़ुस्से से लाल पीली होती हुई कार का दरवाजा खोलता हुए खुद hi उतर पड़ती है और चारो और घने कोहरे को देखने क बाद ठण्ड से कंपकपाते अपने सरीर को अपने हाथों से रगड़ते हुए ग़ुस्से कहती है

"पता नहीं भैया ऐसे जाहिलो को नौकरी पे क्यों रख लेते है.."

ड्राइवर जो अब बहार आ चूका था ऐसी बात सुनकर बेचारा ग़ुस्से से भर पड़ता है, पर वो अपनी हद अचे से जनता था इसलिए बिना कुछ बोले जल्दी से कार क चारो टायर देखत है और जल्दी hi उसे वो टायर दिख जाता है जो पंचर हुआ था.. वो बिना किसी अतिरिक्त विलम्ब क जल्दी से कार की दिग्गी खोलता है और एक अतिरिक्त रखे हुए टायर को बहार निकलता है और फिर तभी अचानक से उसका चेहरा पूरी तरह उतर जाता है और अपना सर ऊपर करके छोटी मालकिन को देखता है जो अब सड़क से थोड़ा हटके एक किनारे कड़ी हो चुकी थी और दूर दूर तक सिर्फ सफ़ेद कोहरे की चादर को देखते हुए खुद hi बड़बड़ा सी रही थी

"न जाने कैसे लोग आज भी ऐसे जंगल और ऐसे पिछड़े हुए गाओं में रह रहे है, ये भी कोई जीवन है भला.."

चालक की तोह हिम्मत hi नहीं होती की वो आगे बोल पाए, पर उसे कहना तोह था की इसलिए वो डरते हुए धीरे से कहता है

"छोटी मालकिन वो.. वो जैक तोह है hi नहीं यहाँ"

अब तोह जैसे वो लड़की पहाड़ hi पड़ती है और तेज़ से चिल्लाते हुए कहती है

"किया बकवास कर रहे हो, चलने से पहले देखना था न.. तुम जैसे अनपढ़ गवारों क चलते hi मन करता है की लात मार क तुम लोगो को नौकरी से निकल दे

..अब बोलो ऐसी ठण्ड में किया मैं पैदल घर जाउंगी, अगर मैंने भैया से तुम्हारी सिखयात कर दी न तोह जानते हो न किया हाल होगा तुम्हारा, पता है न ठाकुर साहब क कितने खास आदमी है वो"

ड्राइवर बेचारे कुछ बोलना तोह च रहा था पर अब कुछ कह hi नहीं पाटा, जबकि इस जवान होती लड़की का घर यहाँ से ज्यादा दूर था भी नहीं, पर एक बार फिर वो जैसे गुरुर से भरी हुई बोल पड़ती है

"अब मुंह किया देख रहे हो मेरा.. जल्दी से कुछ करो, यहाँ खड़े करवा क मुझे ठण्ड में जमाना है किया"

फिर एक बार उस ड्राइवर की और देखती है जो उसे hi देखे जा रहा था और फिर धीरे से वापस बुदबुदा पड़ती है

"खूबसूरत लड़की देखि नहीं की.."

ड्राइवर जैसे hi ये सुनता है, वो थोड़ा सकपका सा जाता और सोचने लगता है

'मेरी गलती किया है.. ?'

ड्राइवर को कुछ भी समझ नहीं आता, पर जैसे तैसे वो अपनी हालत सँभालते हुए कहता है

"मैं.. करता हु"

पर उसने ये कह तोह दिया था, पर बिना जैक क गाड़ी को उठाया नहीं जा सकता था और बिना गाड़ी उठाये आखिर टायर कैसे बदला जा सकता था, वो अब एक अजीब hi धर्मसंकट में फास चूका था

फिर वो इधर और देखता है तोह उसे हर तरह बस घने सफ़ेद कोहरे की दिवार hi नज़र आती है, वही वो जवान होती लड़की भी जब अपना फ़ोन देखती है तोह ग़ुस्से से भर पड़ती है

"नेटवर्क तक नहीं है यहाँ, पता नहीं आज भी भैया यहाँ क्यों रह रहे है"

इस बीच ड्राइवर बाकि सभी औजार निकल चूका था, पर बिना जैक क वो किया करता उसे खुद ये समझ नहीं आ रहा था पर तभी उसकी नज़र सामने घने कोहरे को चीरते हुए आते हुए किसी मर्द जैसा दिखने वाला वो लड़का नज़र आता है जिसे देखते hi उसके अंदर आशा की किरण जाग उठती है और बिना किसी देरी क वो आवाज़ दे देता है

"अरे सत्तू बीटा… सुन्ना जरा"

अब आप जान hi गए की उस पतली पगदंगी पे चलता हुआ वो जवान लड़का यही यानि हमारा अपना सत्तू hi था, असल में सत्तू सुबह 5 बजे hi उठ गया था और फिर अचानक उसे याद आता है की कल दिन भर हुई वर्षा क चलते कही खेत में पानी भरा न रह गया हो.. और बस ये विचार आते hi वो तुरंत बिना देरी क आँखों को मलते हुए अपनी सोल को लपेट क खेत की और चल पड़ा था और अब इस समय सब काम निपटा क hi वापस लौट रहा था

सत्तू जो अपनी hi धुन में आगे बढ़ता जा रहा वो जैसे hi आवाज़ सुनता है और सामने कार क पास hi गाओं क एक आदमी को देखता तोह बिना किसी विलम्ब क उनकी और आगे बाद चलता है, वही वो जवान होती लड़की जैसे hi सत्तू को उनकी और आते हुए देखती है उसकी नज़र एक hi बार में सत्तू को ऊपर से नीचे तक मानो तौल सा लेती है और फिर वो मुंह बनाते हुए

"ये गाओं क अनपढ़ और दिहाती लोग, देखो तोह किया हाल बना रखा है.. पूरा सरीर कीचड़ में सना हुआ है"

वो लड़की सत्तू क पैरों में लगी मिटटी को देखते हुए ऐसे मुंह बना रही थी जैसे न जाने कोनसी बदबू उसे आने लगी हो, फिर अपने ड्राइवर की और देखते हुए ग़ुस्से से कहती है

"हमे मैकेनिक की जरुरत है.."

वापस सत्तू की और देखती है और मुंह क

"गाओं क किसी अनपढ़ जाहिल की नहीं."

इस समय तक सत्तू भी पास पहुंच चूका था और वो सब्द भी उसके कानो तक आ चुके थे, सीधा साधा सत्तू कुछ बोलने को hi होता है की उसकी नज़र उस बुड्ढे ड्राइवर पे पड़ती है जो मायुशि से भरा हुआ था.. जिसे देख क सत्तू अपना ग़ुस्सा पि सा जाता है

"क्या बात है चाचा… सब ठीक है न?"

इससे पहले की वो नकचढ़ी लड़की और कुछ बोलती वो बुद्धा ड्राइवर एक hi सांस में सब बोलता चला गया, जिसे सुन्दर सत्तू बस इतना hi बोलता है

"हम.. जैक चाहिए मतलब"

पर वो लड़की अब भी नहीं मानती और सत्तू का मज़ाक सा बनाते हुए व्यंग्य भरे स्वर में कहती है

"गाओं क जनपदों को जैक क्या होता है… अब ये भी समझाना पड़ेगा?"

वैसे आपको तोह पता है न 😉

Cric-hydraulique.jpg


इस बार सत्तू की सेहन सीलता उसका साथ चोर देती है और ग़ुस्से से अपनी मुट्ठिया बीच सा लेता है और कुछ कहने को hi था की वो बेचारे ड्राइवर तुरंत hi सत्तू क आगे हाथ जोड़ देता है

"मेरे लिए जाने दो इस बात को.. मैं हाथ जोड़ता हुआ"

वही सत्तू क आगे अपने ड्राइवर को हाथ जोड़ते हुए देख वो लड़की हैरानी से भर उठती है की उसके भैया क लिए काम करने वाला आदमी एक लड़के से क्यों दर रहा है

सत्तू ने एक बार फिर से एक गहरी सांस भरी और अपने गुस्से को अंदर hi पाल सा लेता है, वो एक पल क लिए उस लड़की को देखता है जो ऐसी ठण्ड में भी सेहरी कपड़ों में थी

Ravishing-Poses-Of-Sreeleela-In-Green-16.jpg


और उसके पुरे घुटने खुले हुए थे.. वैसे उसे देख क साफ़ पता चल रहा था की ठण्ड क मरे उसका पूरा सरीर काँप रहा है पर फिर भी दिखावे और फैशन का साथ छोड़ना उसे मंजूर नहीं था, इस एक पल में उस लड़की की भी नज़रें सत्तू से टकराती और वो मुंह बनाते हुए दूसरी और घूम जाती है

ड्राइवर ाश भरी नज़रों से सत्तू को देखते हुए

"बीटा कुछ हो सकता है किया.. कही कोई मैकेनिक मिल जाये तोह.."

सत्तू उस बेचारे मायुश अपने गाओं क बुड्ढे को देखते हुए धीरे से कहता है

"गाओं में एक hi तोह मैकेनिक है, वो भी मेरा दोस्त hi है.. पर इतनी ठण्ड में सुबह सुबह.."

सत्तू ने इतना hi कहा था की वो लड़की न जाने किस बात क घमंड से भरी हुई थी वो फिर से आग बबूला होते हुए चढ़ सी जाती है उस बुड्ढे ड्राइवर पे

"सब तुम्हारी गलती है, देखना भैया से कहकर मैं तुम्हारा वह हाल करवाउंगी की.."

पर इस बार वो इतना hi बोल पायी थी की अबकी बार सत्तू का गुस्सा उसके काबू से बहार हो hi जाता है, असल में सत्तू अपने बारे में सब सुनकर तोह बर्दास्त कर ले रहा था पर एक बुड्ढे आदमी क लिए ऐसे शब्दों ने उसके अंदर की आग को भड़का दिया था.. और इस बार वो पहात पड़ा था

"तुम्हारे घर वालों ने बड़ों से बात करने की तमीज नहीं सिखाई क्या ?

.. या कपड़ों के साथ साथ अपनी अकाल भी वही शहर में रख आयी हो, एक कान क नीचे लगाऊंगा तोह बड़ों से बात करने का तरीका समझ आ जायेगा"

उस लड़की को तोह समझ hi नहीं आता की ये किया हो गया अचानक से, वो भले hi ग़ुस्से वाली थी पर सत्तू की दहाड़ ने जैसे उसके पुरे सरीर में कंपकपी भर दी हो.. वो ऐसे काँप उठी थी जैसे सार्ड ऋतू ने उसके सरीर को अपने ठण्ड से भर दिया हो, उसके मुख से जैसे सब्द hi निकलने बंद हो चुके थे और इसका कारन भी साफ़ था की आज जीवन में पहली बार कोई उसे ऐसे दांत रहा था

वो जल्दी से खुद को संभालती है और अपने ड्राइवर की और देखती है पर इस बार उसकी आँखों में ग़ुस्सा नहीं बल्कि विनती थी जैसे उस बुड्ढे ड्राइवर से खुद को बचने की विनती कर रही हो.. पर वो ड्राइवर तोह खुद hi सत्तू का ग़ुस्सा देख क हिल चूका था, वो अचे से जनता था की सत्तू किस सम्मानित परिवार से है और खासकरके उसके पिता का इस गाओं में कितनी सम्मान है

पर फिर सत्तू खुद hi शांत हो जाता है पर इसका ये मतलब नहीं की उसका ग़ुस्सा ख़तम हो गया था, वो अपनी आवाज़ को शांत करते हुए पहले कार क उस पंचर टायर की और देखता है और फिर उस ड्राइवर की और देख क कहता है

"चाचा.. आपको टायर की बदलना है न, आओ बदलो"

ड्राइवर और वो लड़की दोनों hi ये समझ नहीं पाते की बिना जैक के कार कैसे उठेगी और कैसे टायर बदला जायेगा, पर सत्तू उन दोनों की सोच की परवा किये बिना कार क पिछले हिस्से में आ जाता है और अपने दोनों हाथों को कार के बम्पर के नीचे जमा लेता है.. साथ hi अपने पैरों को उस कच्ची सड़क की भूमि पे मजबूती से जमाते हुए एक जोर सी सांस भरता है और एक hi बार में कार को इतना हवा में उठा देता है की अब उसका टायर आसानी से बदला जा सकता था

वही ऐसा कुछ देख क उस लड़की का तोह मुँह hi खुलता चला जाता है, वो हैरानी से कभी कार को देखती तोह कभी उसे हवा में उठा चुके सत्तू की और.. उसे जैसे अपनी आँखों पे यकीन hi नहीं हो रहा था ये कैसे संभव है ?

वही वो सुंदरपुर का आदमी भी हैरान रह जाता है और मन hi मन सोचता है

'कुंदन क बारे में तोह सुना था, की एक बार वो अकेले hi 2 भेड़ियों से भीड़ गया था, पर ये तोह पूरा परिवार hi..'

सत्तू उसी हालत में ड्राइवर की और देखता है और ग़ुस्से से कहता है

"अब किस बात का इंतज़ार कर रहे है, जल्दी करिये न"

वो बुद्धा ड्राइवर जैसे नींद से जगता है और जल्दी से सभी औजार लेके अपने काम पे लग जाता है, अब उसकी उंगलिया पूरी तेज़ी से चलनी सुरु हो चुकी थी.. इस बीच हवा क एक झोंके क कारन सत्तू की वो सोल उसके सरीर से थोड़ा सरक सी जाती है जिस कारन सत्तू की मजबूत भुजाये और उसका मरदाना सीना अब पूरी तरह खुल क नज़र आना सुरु हो चूका था, वो लड़की जो वही सामने कड़ी थी अब कभी सत्तू को देखती तोह कभी अपने ड्राइवर की और जिसकी उंगलिया ऐसे थिरक रही थी जिअसे उनमें बिजली सी तेज़ी भर गयी थी

तभी उस जवान होती लड़की की नज़रें सत्तू की भुजाओं पे पड़ती है जहा पसीने की नन्ही नन्ही बंधे नज़र आने सुरु हो चुकी थी और अपनी सम्पूर्ण ताक़त लगाए हुए सत्तू का चेहरा भी धीरे धीरे लाल पड़ना सुरु हो चूका था, पर वो उसी प्रकार कार को हवा में तने हुए खड़ा रहता है.. जल्दी hi ड्राइवर ने अपना काम ख़तम कर लिया और सत्तू एक झटके से कार को नीचे चोर देता है, एक पल क लिए वो अपनी भुजाओं को सीधा करता है जैसे सुबह की अंगदी ले रहा हो और फिर अपनी सोल को सही करते हुए एक सरसरी की नज़र उस लड़की पे डालता है और अपने हाथों में लगी मिट्टी झड़ते हुए मुस्कुरा क कहता है

"हो गया न चाचा.. चलो अब आराम से जाना"

वो गाओं का बुद्धा भी मुस्कुरा क सत्तू क आगे जैसे hi हाथ जोड़ने को होता है सत्तू उनके हाथों को पकड़ लेता है और मुस्कुरा क कहता है

"बड़ों क हाथ आशीर्वाद देते हुए hi अचे लगते है.."

और वापस से अपनी hi धुन में आगे बढ़ता चला जाता है, सत्तू पैरों में खेत की वो मिटटी अब भी लगी हुई थी. वो अब भी गाओं का वही अनपढ़ था पर अब वो वह कड़ी उस लड़की क लिए कुछ अलग सा लगने लगा था

वो एकटुक तब तक सत्तू को जाते हुए देखती रहती है जब तक वो उस कोहरे की दिवार क पीछे कही घूम नहीं हो जाता, और फिर उसके कानो में उस बुड्ढे की आवाज़ पड़ती है

"चले छोटी मालकिन.."

वो जैसे अपने होश में वापस आयी हो, बिना किसी देरी क एक बार फिर से उस और देखती है जहा सत्तू आगे बढ़ता हुआ मानो गायब सा हो गया था और फिर वापस अपनी कार में अंदर आके बैठ जाती है.. जल्दी hi कार उसके घर की और आगे बाद चली थी जहा इस बार वो धीरे से न जाने कैसे पर सम्मान क साथ अपने ड्राइवर से कहती है

"चाचा.. वो लड़का कोण था ?"

ड्राइवर भी एक बार को हैरान था की अचानक उसकी छोटी मालकिन क शब्दों में ये बदलाव कैसे आ गया, पर वो मुस्कुरा क कहता है

"अब किया बताऊ.. पर ये बिलकुल अपने पिता जैसा hi है, या ये कहु की ये हमारे गाओं का अंगद"

फिर एक पल क लिए कार को अगले मोड़ पे मोड़ते हुए आगे कहता है

"सतेंद्र नाम है.. पर सभी पियर से सत्तू कहते है"

वो लड़की अपनी पीठ कार की सीट पे लगते हुए अपने लाल होंठों को धीरे से हिलती है और फिर मुस्कुरा क कहती है

"सत्तू.."

जल्दी hi वो कार गाओं क बड़े बाजार को पार करते हुए एक आलीशान घर क सामने रूकती है, जहा बहार hi लगे उस लोहे क गेट पे एक नाम लिखा हुआ था 'मंगल सिंह' और उसी नाम क नीचे लिखा था..


'उर्फ़ पहलवान'

***

जल्दी hi नए अपडेट क साथ किसी और दिन किसी और समय वापस यही मिलता हु

🙏🙏🙏🙏
 
मैं काफी समय से छोटा सा ब्रेक लेके कुछ अलग लिखना च रहा है, इसलिए आज मैंने एक शार्ट स्टोरी सुरु की है जो बस 4-5 अपडेट की hi होगी

📖



👉 7000 की वसूली

IMG-20260506-145736-752.jpg


 
प्रीवियस अपडेट ों पेज No. 📃 438



अपडेट #21

Chapter 👉 कामुक वर्षा..

सन 🖼️ #03

नयी चिंगारी..

नोट - ये अपडेट पूरी तरह से अपडेट #20, सन #03 से जुड़ा है.. तोह यदि आपने वो नहीं पड़ा तोह कृपया एक बार जरूर पद ले

कंटिन्यू..

सुबह क करीब 11 बजे..

सुंदरपुर में सुबह से होती कामुक वर्षा ने पुरे मौसम को ठंडा कर रखा था.. इस दिन काफी कुछ हो चूका है, छूट का लुंड से मिलान का कामुक खेल तोह आज सुबह से hi चलता हुआ आ रहा है जो आप पड़ते हुए आये है और आगे भी पड़ने वाले है

हम वापस उस समय में लौट चलते है जब सोनू की सलोनी सूरत वाली गरम कामुक माँ 'हर्षिता' दूध क गिलास लेके घर क बहार छप्पर नीचे बैठे हुए मर्दो को दूध पिलाने गयी थी.. चारो तरफ फैले काले बादलों क कारन सुबह क इस समय भी रात क अँधेरे जैसा प्रतीत हो रहा था और लगातार होती घनघोर वर्षा ने इस मौसम को पूरा संजीदा बना रखा था

बारिश की तेज़ बंधे ऊपर छप्पर पे गिरते हुए अपने शोर से अपने आगमन की सुचना देती जा रही थी.. वही घर क बहार की कच्ची मिटटी और बड़े से बहार क आँगन में पानी पूरी तरह भरा हुआ नज़र आ रहा था और इन सभी क कारन मिटटी और पानी की मनमोहक सी खुसबू चारो और फैली हुई थी, पर ये खुसबू और इसकी एहमियत सिर्फ एक किशन या गाओं से जुड़ा व्यक्ति hi जान सकता है

जैसे की मैंने बताया था की इस समय छप्पर क नीचे वीरू अपने बड़े भाई महेंद्र, बड़े भतीजे सत्तू और अपने पुत्र सोनू क साथ बैठा हुआ था, जहा हर्षिता आके दूध देते हुए कैसे अपने दूध की झलक दिखा जाती है ये तोह आपने पड़ा hi था पर वह एक और मर्द भी मौजूद था जो न चाहते हुए भी अपनी सलोनी कासी हुई यौवन वाली बहु को देखने से खुद को रोक नहीं पाया था.. और आज उसी क बारे में है

वैसे सायद इसमें उसकी गलती नहीं थी आज मौसम hi कुछ ऐसा है मानो आसमान से पानी नहीं अपितु कॉमर्स बरस रहा हो, जहा देखो बस वह ठन्डे मौसम में आपको हवस की गर्मी मिल जाएगी

महेंद्र को अपने छोटे भाई क द्वारा अपने पैरों क दबाने पे जितना दर्द से रहत मिल रही थी उससे कही ज्यादा उसे इस बात की ख़ुशी थी की आज क समय में भी उसे ऐसे भाई मिला, भले की समय की धरा ने कुछ समय क लिए तीनो भाइयों को दूर कर दिया था पर उनके बीच का स्नेह कभी ख़तम नहीं हुआ था और ये पल उसी की गवाही दे रहे थे

पर ऐसी पल वह वो कामुक किसी कोयल सा स्वर गूंज उठा था

"मुझे नहीं पता था की यहाँ इतना प्रेम भरा दृस्य देखने को मिलेगा"

इस स्वर को सुनकर करीब वह उपस्तिथ हर व्यक्ति की नज़रें उस स्वर की स्वामिनी पे चली गयी थी पर सायद महेंद्र ने जैसे देखा था वैसे वो नहीं देखना चाहता था.. ककी वह खूबसूरत सी साड़ी में अपने कामुक और कैसे हुए सरीर को सँभालते हुए सलोनी सूरत वाली हर्षिता कड़ी मुस्कुरा रही थी


G2fg-AEm-Xo-AEx-C-9.jpg




जिसकी मुस्कान और उसके साड़ी क ऊपर से कैसे यौवन की मजबूती में न जाने ऐसा किया था जिसने महेंद्र की नज़रों को कुछ पलों क लिए वह से हटने hi नहीं दिया था, पर समय रहते हुए उसे ये एहसास हो गया था की वो किया पाप कर रहा है

'बहु है तेरी.. भूल मत,

जो पाप मंझली बहु क साथ किया था, वही पाप की लालशा इस समय तेरी आँखों में नज़र आ रही है

संभल खुद को महेंद्र..'

ये वो आवाज़ थी जिसने महेंद्र को समय रहते अपनी नज़रों को हर्षिता क यौवन से हटाने से बाध्य कर दिया था, पर फिर भी अनायास hi मुस्कुराते हुए महेंद्र ने न च क भी अपनी सलोनी बहु हर्षिता को एक पल क लिए hi सही पर ऊपर से नीचे देख जरूर लिया था.. खास करके उसके ब्लाउज में कैसे और तने उसके यौवन को जिससे न जाने महेंद्र की कोनसी कहानी जुडी थी

पर इससे पहले की उसका छोटा भाई ये जान पता की उसका बड़ा भाई उसी की पत्नी को निहार रहा है, महेंद्र ने जल्दी से अपनी नज़रों की दिशा घर क बहार होती घनघोर वर्षा की और मोड़ दी थी

सायद ऐसी कारन हर्षिता को देखते hi महेंद्र ने अपने पेअर सीधे करने की कोशिश की थी पर वीरू ने ऐसा करने नहीं दिया था.. आखिर उसे किया पता था की उसके 'बड़े भाई' ने उसकी पत्नी को आज किस नज़रों से देखा है

इधर हर्षिता पहले दोनों बच्चों की और आगे बाद जाती है पर उसका सुरीली स्वर फिर से महेंद्र को सुनाई पड़ता है

"हमे भी तोह थोड़ा पुण्य मिलना चाहिए न"

ये बात हर्षिता ने अपने पति द्वारा उसके जेठ क पेअर दबाने की बात पे कही थी, जिससे एक बार फिर से महेंद्र को हर्षिता क कामुक हिलते हुए लाल होंठों पे ध्यान केंद्रित करने पे मजबूर कर दिया था.. पर उसने दुनिया देखि है इसलिए वो अपना काबू इतनी आसानी से तोह नहीं खो सकता था

वैसे इसमें उसकी भी गलती नहीं जो व्यक्ति रोज़ सविता क भरी भरकम जिस्म का रास चुस्त हो वो पिछले लगभग 3 महीनों से पियासा था, ऐसे में घर में खुशिया लौटते hi उसकी िचाईए भी उसपे हावी होने ले थी.. या सायद इस आग का कारन कुछ और hi था जिसकी हलकी तपिश सायद हर्षिता तक भी पहुंच रही थी, ककी हर्षिता की उसके जेठ पे एक पल क लिए hi सही पड़ी उन नज़रों में कुछ तोह खास था

"तू भी आ जा.. तुझे भी पुण्य मिल जायेगा"

हर्षिता की बात सुनते hi वीरू हस्ते हुए मज़ाकिया अंदाज़ में बोलै था, जिसपे उसे तुरंत hi उत्तर भी मिला था

"आप तोह अपना देखिये.. मुझे जब पुण्य चाहिए होगा, तोह खुद आगे बड़के ले लुंगी"

हर्षिता ये कहते हुए मुस्कुरा क अपने जेठ यानि महेंद्र की और देखते हुए आगे कहती है

“क्यू है न.. जेठ जी"

तोह उस पल महेंद्र को ऐसा लगा जैसे उसकी साँसे अटक जाएँगी, और एक पल क लिए उसकी आँखों क सामने एक अँधेरा कमरा और वो हलकी रौशनी वाला चिराग नज़र आने लगता है

सायद ऐसी सब कारन से वो बस अपना सर 'है' में हिला क hi हामी भर पाटा है.. वैसे भी इस घर की औरतों की कामुकता का सामना कर पाना हर किसी क बस की बात नहीं और ऐसी क चलते महेंद्र एक बार फिर से घनघोर वर्षा की और देखने क लिए मजबूर हो गया था.. मानो वो अपनी नज़रों को चुराने का पूरा प्रतिना कर रहा हो जहा बारिश क बीच गुजरती हुई ठंडी हवा उसके चेहरे पे आके किसी थपेड़े जैसी लग रही थी, या सायद उसे ऐसा प्रतीत हो रहा था

इधर हर्षिता हल्दी वाले दूध की ट्रे लिए हुए सबसे पहले सत्तू क आगे झुकती है, जहा उसी क साथ एक बार फिर से महेंद्र क कानो में उसकी बहु का स्वर गूंजता है और एक बार फिर से वो उसकी और देखने पे मजबूर हो जाता है

"देखो तुम्हारे लिए गरमा गरम दूध लाइ हु.. जल्दी से मुंह लगा लो"

हर्षिता भले hi ये बात महेंद्र से नहीं कह रही थी पर उसे ये सब्द अपने लिए hi सुनाई पड़ते हुए लगे

हर्षिता, सत्तू की और मुंह किये हुए ये बात उससे बोल रही थी पर जब महेंद्र की नज़रें उसकी और घूमती है तोह उसे झुकी हुई सिर्फ हर्षिता नज़र जाती है जिसकी कोमल और कमल की गांड का कामुक दृश्य इस समय मानो ठीक उसी क लिए था, और इस नज़रे में न जाने किया ताक़त थी जिसने महेंद्र की लुंगी में मानो आग भर दी थी जिसका परिणाम ये था की उसकी लुंगी में एक छोटा सा हिलोरा नज़ारा आने लगे था जिसे खुद महेंद्र से पहले उसके पेअर दबाने वाले वीरू ने महसूस किया

और जब वो अपने भाई की और ऊपर देखता है और उसकी नज़रों को एकटुक एक और जमा हुआ पाटा है इसलिए न च क भी वो उस दिशा की और देखने पे मजबूर हो जाता है जहा उसके अंदर गर्मी का तेज़ झटका तब लगता है जब वो अपने 'बड़े भाई' को अपनी खूबसूरत सलोनी पत्नी की कासी हुई गांड देखते हुए पाटा है.. इस छोटे से पल में इतनी शक्ति भरी हुई थी की महेंद्र से पहले वीरू क लुंड ने हुंकार भर दी थी

'किया भैया.. मेरी हर्षिता को देख रहे है

किया वो उसकी गांड.. घर रहे है ?'

ये वो सवाल थे जिसने वीरू क अंदर कोलाहल भर दिया था, इधर इस बात से अनभिग महेंद्र.. की उसकी चोरी अब उसके भाई द्वारा पड़की जा चुकी है वो अब भी एकटुक बस झुकी हुई हर्षिता की साड़ी में कासी हुई गांड देखे जा रहा था.. उसकी नज़रें कुछ इस प्रकार वह जैम चुकी थी मानो हर्षिता ने उस पल कुछ पहना hi न हो

जहा एक और सत्तू अपने आगे झुकी हुई अपनी चुटकी चची क 'गोला आम' से अपनी नज़रें चुराने की कोशिश कर रहा था वही उसका बाप अपने छोटे भाई की पत्नी की बड़े बड़े कार्बूजे जैसी गांड से अपनी नज़रें हटाने में विफल हो रहा था.. आज बाप बेटे को एक hi नारी ने ऐसी बारिश में भी पियासा बनाने का कार्य कर दिया था

यहाँ हर्षिता सत्तू की और झुकी हुई उसे दूध देते हुए कुछ दिएर उसी प्रकार सुबह की ठण्ड में अपना गरम नज़ारा दिखते हुई कड़ी रहती है, और सच लिखू तोह एक पल भी ऐसा नहीं गुजरा होगा जब महरा अपनी बहु की गांड को घूरने से खुद को रोक पाया हो.. की तभी एक बार फिर से हर्षिता धीरे से कड़ी होती है और एक हाथ से अपने पल्लू को सँभालते हुए ऐसे उसे अपने सरीर पे डालती है मानो उसका अंग प्रदर्शन का कार्य पूरा हो चूका हो.. पर सविता की छोटी देवरानी को किया पता की असली नज़ारा वो नहीं जो सत्तू ने देखा, असली दृस्य तोह वो था जो महेंद्र की आँखों क आगे था

हर्षिता एक पल रुक क वापस से अपने बेटे की और बढ़ती है और फिर से झुक जाती है जहा अब जो नज़ारा था उसने तोह महेंद्र क लुंड को उसकी लुंगी में पूरी तरह उठा क रख दिया था.. और ऐसी क साथ एक बार फिर महेंद्र को उसका सुरीला स्वर सुनाई पड़ता है

"किया पूरा दिन मोबाइल में घुसा रहता है.. ये ले दूध पि"

पर महेंद्र तोह जैसे इस उम्र में भी जवानी का जोश महसूस करने लगे था, असल में इस बार जब हर्षिता एक पल क लिए कड़ी होक वापस अपने बेटे क आगे उसे दूध देने क लिए झुकी थी तोह उसकी साड़ी का कुछ हिस्से उसकी कोमल गदराई गांड क पाटों क बीच फास सा गया था, जिससे उसकी दरार की गहराई का हल्का अनुमान मिलने लगा था और इस समय महेंद्र वही देखते हुए न च क भी गरम साँसे चोर्ने पे मजबूर हो गया था..

पर उससे कही ज्यादा बुरा हाल उसके छोटे भाई वीरू का था जिसका लुंड पूरी तरह उसकी लुंगी में तन चूका था और उसे ये यकीन hi नहीं हो रहा था की उसका पिता सामान बड़ा भाई उसकी पत्नी की गांड और उस गांड में फांसी हुई साड़ी क कारन उसकी कामुक दरार को देख रहा है, एक बार फिर से सुंदरपुर क परिवार की एक स्त्री ने एक साथ 2-2 मर्दो की जान हलक में अटका दी थी

वह हर्षिता अपने बेटे क आगे झुकी हुई उससे कुछ बातें कर रही थी और यहाँ उसका पति और उसका जेठ उसकी गांड की गोलाई क दर्शन में खोये हुए थे.. की तभी हर्षिता जैसे उनकी और देखती है जहा महेंद्र जल्दी से छप्पर क बहार कुवे की और देखने लगता है, इस उम्र में भी उसका हाल कुछ यु था जैसे वो कोई पाप या चोरी कर रहा हो और उसके पकडे जाने का भय उसे जवान बना रहा हो

हर्षिता अपने पति की और देखती तोह वो पाती जैसे वीरू की साँसे जोरो से भाग रही हो इसलिए वो अपनी आँखों क इशारे से पूछती है किया हुआ.. जिसपे वीरू 'न' में सर हिलाते हुए अपने बड़े भाई क पैरों की हलकी मालिश सी करते हुए वही बैठा रहता है पर उसके मन में ये बात किसी प्रहार जैसी पद रही थी

'की.. किया उसका बड़ा भाई उसकी पत्नी की गांड… मरण...'

हर्षिता अब सोनू को दूध देके अपने जेठ क पास पहुंच चुकी थी, जहा वो मुस्कुरा क दूध का गिलास महेंद्र की और बढ़ाते हुए कहती है

"याद से पि लीजिएगा.. बड़की भौजाई का आदेश है"

जिसपे उसका जेठ यानि महेंद्र उस पल उससे नज़रें नहीं मिला प् रहा था, और उसका कारन तोह हम जान hi चुके है.. महेंद्र जल्दी से इधर उधर देखते हुए दूध का गिलास थम लेता है पर इस हड़बड़ाहट क कारन एक पल क लिए उसकी उंगलिया हर्षिता की कोमल उँगलियों को छू लेती है, जिससे वो जल्दी से अपना हाथ पीछे खींचते हुए बस 'है' में सर हिला क दूध पीने क लिए हामी भर देता है

पर ये बात वीरू भी नहीं देखा पाया था की उस एक पल में हुई उस घटना क चलते जहा उसका बड़ा भाई अपनी नज़रें नहीं मिला प् रहा है वही उसकी पत्नी धीरे से मुस्कुरा उठी थी.. पर क्यू ?

इसके बाद हर्षिता बचा हुआ गिलास अपने पति परमेश्वर की और बढ़ाते हुए धीरे से मुस्कुरा क उसके पैरों क बीचे इशारा करती है, जिसपे वीरू हल्दी वाले दूध का गिलास थमते हुए धीरे से बस मुस्कुरा पड़ता है.. अब वो किया hi कहता की उसके लुंड का ये हाल क्यू हुआ है, वो कैसे ये बताता की उसका बड़ा अभी उसकी पत्नी की गांड को ऐसे घर रहा था मानो उसके पाटों क बीच अपना मुंह लगा दें च रहा हो

यहाँ हर्षिता अपने पति क तने हुए लुंड से अपनी नज़रों को सरकते हुए जैसे hi मुड़ने को होती है उसकी नज़रें अचानक से उसके जेठ क पैरों क बीच आके अटक जाती है, जहा एक विशाल मोटा अजगर पुरे जोश से खड़ा था.. हर्षिता एक पल क लिए मुड़ना भूल hi जाती है और एकटुक बस उस मोठे अजगर को उस थोड़ी क नीचे सांस लेते हुए महसूस सी करने लगती है और इस बात को उसके पति यानि वीरू ने भी भांप लिया था

तभी वो अजगर जोरो से हिल पड़ता है और हर्षिता जल्दी से अपनी नज़रों को हटा लेती है पर इस पूरी प्रक्रिया में इस बार उन Jeth-bahu की नज़रें आपस में टकरा सी जाती है और जैसे hi महेंद्र अपनी बहु को देखता है उसका पूरा चेहरा ऐसे पीला पद जाता है जैसे उसकी चोरी का ज्ञान हर्षिता हो गया था.. इसलिए वो जल्दी से एक बार फिर से वही करता है यानि अपनी नज़रों को घर क बहार होती घनघोर वर्षा की और मोड़ देता है

इसके बाद तोह हर्षिता क लिए भी वह कुछ बचा hi नहीं था इसलिए वो वह से सीधा रसोईघर की और चल पड़ती है, जहा एक नया आश्चर्य उसका इन्तिज़ार कर रहा था यानि उसकी भौजाई सविता जो पूरा दृस्य आप पद hi चुके है

पर सबसे बड़ा सवाल जो मन में उठता है वो ये है की आखिर ऐसा किया हु की अचानक से महेंद्र की नज़रें उसकी बहु हर्षिता क सरीर पे घुमनी सुरु हो गयी.. और ऐसा किया कारन है की खुद हर्षिता क व्यव्हार में ये बदलाव देखे को मिल रहा है

इन सवालों क जवान क लिए किसी प्रतीक्षा की जरुरत नहीं है, हमे बस कुछ दिन पहले लौटना होगा जब मोनू मूर्छित अवस्था में बिस्तर पे पड़ा हुआ था.. इस सब की शुरुवात आज से 11 दिन पहले हुई थी



कंटिन्यू... 👇
 
Back
Top