Adultery गुजारिश 2 (Completed) - Page 7 - SexBaba
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Adultery गुजारिश 2 (Completed)

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निश्चित दुरी बनाये हुए मैं ताई के पीछे पीछे शिवाले तक पहुँच गया . हर रास्ता मुझे शिवाले तक लाकर छोड़ देता था, ऐसा क्या था इस जगह में , किस तरह का मोह था ये . सोचते हुए मैं ताई की हरकतों को देख रहा था . पर ताई देवता के पास नहीं गयी न वो उस जगह गयी जहाँ पर संध्या चाची गयी थी . ताई शीशम के निचे बने चबूतरे पर बैठ गयी. जैसे उसे किसी का इंतज़ार था .

रात रोशन होने लगी थी , गहराती जा रही थी पर ताई के चेहरे पर कोई भाव नहीं था . चबूतरे पर बैठी वो बस आसमान को ताक रही थी . मैं उसे टोक सकता था पर मेरी दिलचस्पी इस बात में थी की इसका यहाँ आने का क्या प्रायोजन था .

“वो नहीं आएगा , नहीं आने वाला वो ” अचानक से आई इस आवाज ने ताई के साथ साथ मेरा भी ध्यान खींच लिया . मैंने देखा ये जब्बर था जो पैदल चलते हुए ताई के पास जा रहा था .

“ये हरामखोर यहाँ क्या कर रहा है ” मैंने मन ही मन कहा.

“सोलह बरस बीत गए , वक्त के साथ उसने भी हम सबको भुला दिया है ” जब्बर ने कहा .

ताई उठ खड़ी हुई . जब्बर का यहाँ होना मुझे ठीक नहीं लगा पर उसने ताई के पास जाते ही ताई के पैरो को छुआ और चबूतरे पर बैठ गया .

ताई- मेरा मन नहीं मानता, हर पल ऐसा लगता है की वो बस आस पास ही है .

जब्बर- जहाँ तक ढूंढ सकता था उसकी तलाश की फौज तक में गया पर वहां जाकर मालूम हुआ की यहाँ से तो वो गया था पर ड्यूटी पर पहुंचा ही नहीं .

जब्बर ने वो बात कह दी थी जिसे मैं छिपाए फिर रहा था . जब मैं फौज से आया था तो इसी सवाल का बोझ अपने कंधो पर लाया था .

ताई की आँखों से आंसू गिर पड़े.

“जब शिवाले के कपाट खुले थे तो मैंने सोचा की अर्जुन लौट आया है , ” ताई ने कहा .

जब्बर- मैंने भी ऐसा ही सोचा था . इस दुश्मनी का भार गला घोंटने लगा है मेरा .

ताई- कब तक सीने में रहेगी ये फांस

जब्बर- मरते दम तक भाभी, दिल कहता है की जब अर्जुन मिलेगा तो दौड़ कर गले लगा लूँगा उसको और फर्ज कहता है की जब वो मिलेगा तो गर्दन उतार दू उसकी .

ताई- कैसा फ़साना है ये , प्यार भी उस से और नफरत भी उसी से.

जब्बर- तू तो सब जानती हो भाभी . तुमसे क्या छिपा है .

ताई- तुम्हारा दर्द समझती हूँ,

जब्बर- तुम कम से कम उस पागल लड़के को तो समझा ही सकती हो न , जिस राह पर वो चल रहा है ठीक नहीं है

ताई- मुझे भी फ़िक्र है उसकी

जब्बर- वो बहुत दुःख दे रहा है मुझे , हर बार मैं रोक लेता हूँ खुद को

ताई- तुम्हारा स्नेह है उसके प्रति

जब्बर- नफरत है मुझे उस से

ताई- नफरत भी तो एक तरह का प्रेम ही है न .

जब्बर- तुम उस से कहो की वो मुझे उस लड़की का नाम पता बता दे .

ताई- वो प्रेम करता है उस से ,

जब्बर- तब तो और बेहतर होगा.

ताई- क्या तुम्हे लगता है की वक्त फिर से दोहरा रहा है खुद को

जब्बर- शायद हाँ , शायद न. कपाट खुले थे तो मुझे लगा था की वक्त की धारा मुड गयी है पर वो वहम ही निकला ,

ताई------- पर अर्जुन के सिवा कपाट कोई और नहीं खोल सकता .

जब्बर- तो फिर कौन , मनीष ने चाहे अनजाने में ही रक्तपात किया हो यहाँ पर वो रक्त को देवता तक ले गया. भोग तो लग ही गया .

ताई- सहमत हूँ पर ये ख़ामोशी कलेजे का पानी सुखाये हुए है .

जब्बर- कातिल लाला का कलेजा निकाल कर ले गया .

ताई- तब से मुझे भी कोतुहल है .

ताई ने जब्बर से बाते करते हुए चबूतरे पर एक दिया जलाया और बोली- ये दिया उसे बता देगा की मैं आई थी .

जब्बर- कभी कभी सोचता हूँ की गुजरा ज़माना कितना हसीं था

ताई- बीता हुआ दौर बस याद आता है , वैसे इस शिवाले के लिए तुम चाहते तो बहुत कुछ कर सकते थे , आखिर गुनाह में तुम भी तो शामिल थे . जितना लिया उसका थोडा भी लौटा दिया होता तो इस बियाबान में हलचल, रौनक रहती .

जब्बर- तुम भी कह लो भाभी, दुनिया तो कहती ही है तुम्हारे ताने भी सर माथे पर . खैर मैं चलता हूँ , तुम भी आओ छोड़ देता हूँ तुम्हे भी .

ताई ने एक नजर जलते दिए पर डाली और फिर जब्बर के साथ चली गयी. मैं रिश्तो के इस अजीब भंवर में उलझ गया था . क्या दोस्ती थी क्या दुश्मनी कौन थे ये लोग और कौन था मैं सोचते सोचते मेरा सर दुखने लगा. आज का दिन बहुत भारी हो गया था . मैं भी वहां से चल कर अपनी जमीन की तरफ आ गया .

दूर से जलती लौ को देख कर मैं समझ गया था की मीता होगी वहां पर. पर शायद ये पहली बार था जब मीता के जिक्र पर मुझे ख़ुशी नहीं हुई. ढीले कदमो से चलते हुए मैं पहुंचा तो देखा की अलाव जल रहा था , न जाने क्यों उसे ये आग पसंद थी . मैंने कपडे उतारे और हौदी में उतर गया.

ठंडा पानी मेरे तन को तो आराम दे सकता था पर मेरे मन को नहीं . गर्दन तक पानी में डूबे हुए मैं बस आज के बारे में सोच रहा था, आज के दिन क्यों ताई को लगता था की मेरे पिता आयेंगे, पृथ्वी ने मुझे चुनोती दी थी और सबसे बड़ा झटका तो मुझे उस तस्वीर ने दिया था जो मेरी आँखों में बसी थी .

“देर तक पानी में रहना ठीक नहीं है तुम्हारे लिए ” सर पर रखे लकडियो के गट्ठर को पटकते हुए मीता ने मुझसे कहा .

मैं- सच कहूँ तो कुछ भी ठीक नहीं है मेरे लिए.

मीता हौदी की मुंडेर पर बैठ गयी और बोली- ये उदासी की क्या वजह हुई भला

मैं- तुमसे बेहतर कौन जानता है भला.

मीता- सो तो है पर हुआ क्या बताओ तो सही, ये ठीक है की सभी बाते बताते नहीं है पर दोस्तों से कुछ भी छिपाते नहीं है .

“बहुत खूब, क्या बात कही ” मैंने कहा

मीता- आजा फिर, चाय चढ़ाती हूँ

मैं- तू चल मैं आता हूँ

मीता- आज से पहले तो कभी नहीं कहा ऐसा

मैं- आज से पहले ऐसा दस्तूर भी तो नहीं था ...... न ...............

 
ये उलझन ही पाठकों की जिज्ञासा बनाए रखती है, jabbar, लाला और अर्जुन किसी ज़माने मे दोस्त रहे थे, और दोस्ती मे जब दुश्मनी ही तो बात गहरी ही होती है, ताई और अर्जुन का रिश्ता क्या है, संध्या अर्जुन को कैसे देखती है, मनीष रीना और मीता का त्रिकोण

मेरी बस यही इच्छा रही है कि पाठक अनुमान ना लगा पाए कि आगे क्या होगा, पर अभी सवाल ये है कि अर्जुन कहाँ है, और मनीष ने हवेलि मे जो तस्वीर देखी थी वो उसके जीवन मे क्या परिवर्तन लाएगी, टूटते नातों की डोर कौन थाम पाएगा किसके हाथ से डोर छूट जाएगी
 
#55



मीता- तेरे मन में जो है वो कह दे फिर ,

मैं- मेरे सीने पर हाथ रख कर कह , मुझसे झूठ नहीं बोलेगी तू

मीता - तेरे सर की कसम, तेरे मेरे रिश्ते की कसम जो तुझसे झूठ बोलू

मैं- तेरा हवेली से क्या रिश्ता है

मीता- बस इतनी सी बात के लिए परेशां है तू, अधूरी हसरतो का और मन की उमंगो का रिश्ता है मेरा हवेली से. बिखरती रेत और उमड़ते बादल सा रिश्ता है मेरा हवेली से. जितना तुझे ये तेरे खेत प्यारे है , उतनी ही प्यारी मुझे हवेली है . मेरा घर है वो हवेली.

मैं-तो दद्दा ठाकुर की पोती, तू मुझे ये बता तो सकती थी न .

मीता- काश दद्दा ठाकुर ने हक़ दिया होता पोती बनने का .

मैं- ऐसा क्यों कहा

मीता- क्योंकि इस दुनिया में सिर्फ तेरी ही कहानी में दुःख नही है, आँखे खोल कर देख ये दुनिया ही दुखी फिरती है, उस हवेली के दरवाजे बरसों पहले बंद हो गए थे मेरे लिए. दद्दा ठाकुर नहीं चाहते थे की उनके कुल में कोई लड़की रहे, मुझे हवेली से बाहर फिंकवा दिया गया. दद्दा को बस ये जानकारी है की बरसो पहले मुझे मरवा दिया गया .

मैं- तेरी तस्वीर का वहां होना ही बताता है की दद्दा को जानकारी है तेरे वजूद की .

मीता- असंभव , अगर ऐसा होता तो मैं यहाँ खड़ी नहीं होती.

मैं- क्या करू कुछ समझ नही आ रहा है

मीता- मैं समझती हूँ तेरे हालात

मैं- नहीं, तू नहीं समझती. मेरी आँखों के सामने वो मंजर आ रहा है जब हम सब उन रास्तो पर खड़े होंगे जहाँ से मंजिल किधर जाएगी कौन जाने. तू पृथ्वी की बहन है , तू लाख इंकार कर पर एक दिन आएगा जब तुझे उसमे और मुझमे से एक का चुनाव करना होगा. इस हकीकत से न तू मुह मोड़ पायेगी न मैं.

मीता- मनीष, मैं जानती थी तू अर्जुन सिंह का बेटा है, मैं ये भी जानती थी की एक दिन तू मेरे सामने अपने सवाल लेकर खड़ा होगा. मैं ये भी जानती थी की तेरी दोस्ती पल पल मेरा इम्तिहान लेगी पर फिर भी मैंने तुझसे दोस्ती की , तुझे हाँ कहाँ. वो दो चार मुलाकाते मुझे भुलाये नहीं भूली, मुझे अहसास करवा गयी की जैसे बरसो से तू मेरा साथी हो. और फिर तेरी मेरी जिन्दगी एक जैसी ही तो है, तू भी धक्के खा रहा मैं भी . ये जो लम्हे हमने साथ जिए है, मुझे अब बताने की जरुरत नहीं की उस दोराहे पर मैं किसे चुनुंगी. रोटी बनाने जा रही हूँ , भूख लगे तो आ जाना

मीता के जाने के बाद मैं भी पानी से निकला और कपडे बदल कर उसके पास चला गया. चूल्हे की आंच में उसके चेहरे की रौनक क्या खूब लगती थी .

“क्या देख रहा है ” पूछा उसने

मैं- कही चूम न लू तुझे.

मीता- अच्छा जी

मैं- तेरा दिल नहीं करता क्या

मीता- दिल का क्या है ,दिल तो न जाने क्या चाहेगा, अब हर हसरत कहाँ पूरी होती है .

मैं- तू मेरी कौन सी हसरत है

मीता- मैं तेरी हसरत नहीं , तेरी तक़दीर बनना पसंद करुँगी.

मैं- वो तो तू अभी भी है

मीता- अभी तो नहीं हूँ पर एक न एक दिन जरुर

खाना खाने के बाद हम दोनों एक दुसरे के बगल में लेट गए. मीता ने मेरी बांह पर अपना सर रखा और बोली- क्या सोच रहा है .

मैं- न जाने मेरे पिता कहाँ पर होंगे.

मीता- मुझे विश्वास है वो तुझे जल्दी ही मिल जायेंगे.

मैं- मेरा विश्वास कमजोर हो रहा है अब . वो फ़ौज में नहीं गए तो गए कहाँ , सोलह साल थोडा समय नहीं होता कहाँ बिताया होगा उन्होंने ये समय , आखिर क्या वजह थी जो अपने परिवार को छोड़ गए वो .

मीता- कुछ तो वजह जरुर रही होगी.

हम बाते कर ही रहे थे की एकदम से मौसम बदलने लगा.

मीता- लगता है आंधी आएगी.

मैं- आने दे

आसमान में बादल सितारों को ढकने लगे थे, हवा की रफ़्तार बढ़ने लगी थी, हमारे आस पास के पेड़ झूलने लगे थे, हवा सन सनाते हुए दौड़ रही थी .

मीता- बिस्तर अन्दर कमरे में बिछा ले.

मैं- रहने दे, बारिश हुई तो देखेंगे वैसे भी धुल नहीं है ठंडी हवा अच्छी लग रही है .

मीता- कभी कभी सोचती हूँ मैं सबके सितारे पढने वाली, मेरे भाग्य में क्या है

मैं- काश मैं तुझे बता सकता , तू नहीं जानती मुझे किस हद ता तेरी फ़िक्र है

मीता- पर किसलिए

मैं- जब्बर तुझे ढूंढ रहा है और मैं जानता हूँ उसकी तलाश बस दिलेर सिंह के कातिल की ही नहीं है , उसका प्रयोजन कुछ और है .

मीता- मुझे परवाह नहीं उसकी

मैं- पर मुझे तेरी है,

मीता- क्या तुझे सच में लगता है वो मुझ पर हाथ डाल पायेगा.

मैं- मुझसे दुश्मनी के लिए वो किसी भी हद तक जायेगा ये जानता हूँ मैं ,

हम दोनों उस आंधी भरी रात में एक दुसरे से लिपटे हुए इस जहाँ से दूर अपनी बाते कर रहे थे की तभी कुछ ऐसा हुआ जिससे मेरे कानो की चूले हिल गयी. न जाने कैसी अजीब सी आवाज थी ये .

मीता- कुछ सुना तूने क्या था ये ..

“अजीब सी आवाज ” मैंने बिस्तर से उठ कर अपने कान मसलते हुए कहा .

मीता भी उठ खड़ी हुई.

“क्या कही कोई शिकार कर रहा है ” मीता ने पूछा

मैं-क्या मालूम

आंधी के चक्रवात ने वो आवाज बहुत जोरो से गूँज रही थी , मैंने मीता का हाथ पकड़ा और हम लोग उस तरफ चल दिए जहाँ से आवाज आ रही थी ,

मीता- कहाँ जा रहे है हम

मैं -शिवाले पर

मीता- पर क्यों

मैं- तू चल तो सही .

अचानक ही मुझे याद आ गया था की ये आवाज मैंने कहाँ पर सुनी थी , जब संध्या चाची ने अपनी जिस्म का मांस उस जमीन पर फेंका था तो भी हु ब हु ये ही आवाज सुनी थी मैंने. तेज हवाओ से टकराते हुए मैं और मीता शिवाले पर पहुँच गए और जब हमने वहां जाकर देखा तो कसम से खुद की आँखों ने जैसे धोखा दे दिया हो . शिवाला जाग्रत हो गया था . दूर दूर तक दिए झिलमिला रहे थे हैरत ये थी की उस तेज आंधी में भी .

ये शिवाला वैसा बिलकुल नहीं था जैसा की हम उसे देखते आये थे , ये ऐसे सजा था जैसे की कोई उत्सव हो.

मीता-असंभव

मैं- संभव हो गया है , जो कुछ है तेरी आँखों के सामने ही है

मीता- यही तो असंभव है मनीष

मीता ने मेरा हाथ पकड़ा और लगभग दौड़ते हुए मुझे ले चली

मैं- कहा

मीता- आ तो सही .



मीता और मैं दौड़ते हुए उस स्थान पर पहुंचे जहाँ पर मैंने चाची को देखा था पर आज इस तूफानी रात में वहां पर चाची नहीं बल्कि कोई और था , जिसके वहां होने की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी . .................... वो सात और वो एक ........ हाथो में रक्तरंजित तलवारे ,,,, आँखों में कुछ कर जाने का जूनून और बदन से टपकता रक्त .............. ये रात बड़ी भारी होने वाली थी ............
 
#56



सात अश्व मानव और रीना अकेली . दियो की टिमटिमाती रौशनी ने उस मैदान में प्राण फूंक दिए थे. सारी बाते एक तरफ पर रीना का यहाँ होना अपने आप में कहानी थी, उसने मुझे कई बार ही तो बताया था की कुछ तो है जो उसे रुद्रपुर की तरफ खींच रहा है पर इस द्रश्य ने मेरी रूह को बताया की मामला वैसा नहीं था जैसे की मैं देख रहा था .

बिजली की तेजी से रीना उन अजीब से अश्व मनवो का मुकाबला कर रही थी , और मैं बस हैरान था की ऐसी भी कोई चीज होती है या ये सब मेरा वहम था .

“चली जा वापिस लौट जा ” उनमे से सबसे बुजुर्ग अश्व मानव ने रीना से कहा .

रीना- जाना होता तो आती ही नहीं

अश्व मानव- तू जो करने का सोच रही है वो असंभव है , तेरे दुस्साहस की प्रशंशा करता हूँ पर साथ ही मैं फिर से चेतावनी भी देता हूँ की मेरे सब्र का पैमाना छलक रहा है , कहीं ऐसा न हो की तेरे प्राण भी रिहाई की भीख मांगे .

रीना- मेरी आँखों में देख और फिर सोच क्या मुझे परवाह है तेरी या फिर किसी और की

अश्व मानव- तू जानती नहीं तू क्या कर रही है . तुझसे पहले कितने आये कितने गए , कितने तो हम तक भी नहीं पहुँच पाई, बता तुझे क्या चाहिए सोना चांदी या फिर तेरी कोई मनचाही

रीना- मेरी मनचाही में तो तू रोड़ा बना हुआ है .

रीना आगे बढ़ी और उस बुजुर्ग अश्व मानव पर वार किया पर वो तेज था, चपल था . उसके खुरो ने रीना की पीठ पर लात मारी पर वो गिरी नहीं . हवाओ ने जैसे आज ठान ली थी की सारा जोर यही पर लगा देंगी. रीना के होंठो पर कुटिल मुस्कान अ गयी और फिर अगले ही पल वो किसी बिजली के जैसे कौंधी और उस बुजुर्ग अश्व मानव के बीच से होती हुई उसकी तलवार ने उसे दो हिस्सों में बाँट दिया.

मासूम, फूल सी नाजुक रीना ने अभी अभी एक क़त्ल कर दिया था हमारी आँखों के सामने, बाकि बचे अश्व-मनवो ने अपने साथी के हश्र पर रुदन करना शुरू कर दिया , पर कुछ पालो के लिए क्योंकि अब उन्होंने व्यूहरचना बना दी थी . तीन तलवारों ने एक झटके में ही रीना के कुरते को तार तार करते हुए उसकी पीठ को चीर दिया था . रीना चीखी और , और तेजी से उनसे लड़ने लगी.

“मुझे तुम तो क्या नहारवीर भी नहीं रोक पाएंगे , “रीना ने कहा .

अश्वमानव- तेरी खुशकिस्मती नहीं की तू उन महान वीरो को देख पाए, तेरे भाग्य में हमारे हाथो से ही मरना है .

उनमे से एक अश्वमानव की कटार रीना की पिंडी को चीर गयी , वो धरती पर गिर गयी,

“बस बहुत हुआ ” मीता ने मुझसे हाथ छुड़ाया और उस घेरे की तरफ दौड़ पड़ी.

मेरी जिन्दगी में ये दो लडकिया आई थी और आज दोनों के ही अलग रूप देख रहा था मैं. मीता ने एक अश्वमानव की पीठ पर लात मारी और घेरे में प्रवेश कर गयी.

मीता- सितारों के रक्षको को मेरा प्रणाम , मैं नहीं जानती की आपका यहाँ होने का क्या प्रयोजन है ,पर यदि ये श्रेष्ट सुरक्षा पंक्ति के दर्शन मुझे हुए है तो मेरा सौभाग्य है साथ ही मेरा निवेदन है इस लड़की को बक्शा जाए.

अश्वमानव- अब देर हो चुकी है , शिवाले की धरती अब या तो इसके रक्त से सींची जाएगी या हमारे रक्त से . बीच का कोई रास्ता है ही नहीं .

मीता- आखिर ऐसा क्या है जिसकी वजह से इस पवित्र स्थान पर ये रक्तपात हो रहा है .

अश्वमानव- सितारों को पढने वाली, तू ये तो जानती होगी न की हम मर्जी के मालिक है , बिना मतलब के कुछ नहीं बताते. तू अपनी राह पकड़

मीता- इसे लिए बिना नहीं जाउंगी

अश्वमानव- तो फिर तेरे प्राण भी हरे जायेंगे.

मीता- ये बात मुझे पसंद नहीं आई,

मीता ने पास पड़ी उस बुजुर्ग अश्वमानव की तलवार उठा ली और बोली- चलो फिर देखते है व्यूह की पहली कतार कितना प्रतिकार कर पाती है .

मीता के चेहरे पर जो कशिश थी ठीक वही मैंने उस दिन थाने में महसूस की थी जब उसने दिलेर को मारा था . तब तक रीना भी खड़ी हो चुकी थी . मीता ने मुझे देखा और इशारा किया की मैं अपनी जगह से हिलू भी नहीं .

आठ तलवारों का शोर आसमान में गूँज रहा था . एक समय ऐसा भी आया की मैंने हवा में बस रक्त के छींटे उड़ते देखे. हवाओ ने उनके चारो तरफ जैसे कोई दिवार बना दी थी . कभी उनकी तो कभी मीता-रीना की चीखो को सुनकर मैं विचलित हो रहा था . ऐसा मंजर कोई कमजोर दिल का देख लेता तो कब का दौरा पड़ जाता उसे. और फिर एकाएक सब कुछ शांत हो गया जितने भी दिए वहां पर रोशन थे एक एक करके सब बुझ गए. शिवाला अपने अंधकार में डूब गया .

मैंने देखा मीता अपने कंधे पर बेहोश रीना को लादे मेरी तरफ आ रही थी . मैं दौड़ कर उसके पास गया और रीना को अपनी बाँहों में ले लिया.

मीता- आग लगा दी है तेरी मोहब्बत ने .

हम रीना को लेकर कुवे पर आये. मैंने लालटेन जलाई और रीना को बिस्तर पर लिटा दी. मीता उसके घावो को देखने लगी. रीना की नंगी पीठ पूरी कटी हुई थी . पैरो में अलग से घाव थे , मैंने देखा की उसकी एक पसली पर भी कट था .

मीता- इसे चादर ओढा दे.

मैं- इसे डाक्टर की जरुरत है

मीता- मैंने कहा न इसे चादर ओढा दे.

मीता ने अपनी चोटों पर मिटटी मलनी शुरू की .

मैं-ये क्या कर रही है तू

मीता- ये मिटटी सबकी माँ है , इसकी पनाह में गए तो हर दर्द को खींच लेगी ये.

मैं- क्या था वो सब और रीना वहां क्या कर रही थी .

मीता- कल बात करेंगे हम इस सब के बारे में . मुझे जरा बैठने दे दो पल . तेरी रीना ने आज मरवा ही दिया था . इसके होश में आते ही दो थप्पड़ लगाने वाली हु इसके.

मैं- रीना अपने बस में नहीं है, कोई तो है , इसने मुझे पहले भी बताया था की कोई डोर जैसे इसे खींच रही है शिवाले की तरफ.

मीता- मौत बुला रही है इसे और कुछ नहीं . अश्व्मनावो का आह्वान कर बैठी ये नादाँ, तंत्र में बहुत सशक्त होता है उनका स्थान, ये तो बस आज दिन ठीक था . पर आगे हालत बहुत बुरी होगी मनीष , सितारों के रक्षक होते है वो उनकी हत्या हुई है आज. ये बात दूर तक जाएगी. तुझे कैसे भी करके संध्या से जानकारी निकलवानी होगी. वो एक दक्ष साधिका है , नाहरविर जल्दी ही आयेंगे हमें संध्या की जरुरत पड़ेगी.



मीता ने मेरी गोद में अपना सर रखा और अपनी आँखों को मूँद लिया. रह गया मैं अकेला ये सोचते हुए की आने वाला कल अपने साथ क्या लेकर आएगा.
 
मीता मनीष और रीना ये तीनों भविष्य है उस अतीत के जो अचानक एक दिन बदल गया, गांव देहात की कई खूबियों मे से एक खूबी है वहाँ की शांति, जंगल, खण्डहर आदि. जो गाँव शहरो से दूर है आज भी वहां कुछ ना कुछ ऐसा वैसा देखते सुनते है ये कहानी भी ऐसी ही है निश्चल

रही बात संध्या की तो जब वक़्त आएगा वो खुद बता देगी अपने किस्से
 
#57



भोर से कुछ पहले मीता हमें छोड़ कर चली गयी. रहे गए मैं और रीना. पूरी रात बस एक मैं ही था जो एक पल भी नहीं सोया था ये सोचकर की आज की ये रात इतनी भयानक है तो आगे और न जाने क्या देखने को मिलेगा. कुछ देर बाद रीना भी उठ गयी .

रीना- मैं यहाँ कैसे

मैं- ये सवाल तो मैं तुझसे पूछता हूँ

रीना की आँखों में कशमकश थी जिसका मतलब ये था की उसे कल रात की घटना याद नहीं थी .

मैं- कल तू मुझसे मिलने आई थी और फिर यही रुक गयी .

रीना- और मेरे बदन पर ये तेरी शर्ट क्या कर रही है , रात को कुछ हुआ था क्या तेरे मेरे बीच .

मैं- क्या बात कर रही है तु, आजतक मैंने कभी ऐसा वैसा कुछ किया है क्या तेरे साथ .

रीना- तो फिर क्या छिपा रहा है तू

मैं-कुछ नहीं छिपा रहा तुझसे मेरी जान, सच ये है की कल रात तू मुझे रुद्रपुर के शिवाले में बेहोश मिली थी , मैं तुझे उठा कर यहाँ ले आया. सोचा की तू होश में आएगी तो तुझसे बात करूँगा.

रीना- मुझे याद नहीं मैं कब गयी वहां पर.

मैं- रीना मेरी बात ध्यान से सुन, मुझे तेरी हद से ज्यादा परवाह है तुझे अगर कुछ भी हुआ तो मैं सह नहीं पाउँगा. आज के बाद तू घर से बिना बताये कही भी नहीं आयेगी-जाएगी. मुझे चाहे लाख काम हो पर मैं हर कदम तेरे साथ रहूँगा.

रीना- मैं समझती हूँ

मैं- तो वादा कर , आज के बाद चाहे कुछ भी हो जाये तू रुद्रपुर की तरफ देखेगी भी नहीं .

रीना- ठीक है

मैं- क्या तुझे कुछ भी याद नहीं कल रात के बारे में

रीना - तेरी कसम

मेरे लिए ये अजीब स्तिथि हो गयी थी . रीना कल मरते मरते बची थी और उसे कुछ भी याद नहीं था . उसके जख्म् भी गायब थे .

मैं- तू चल मेरे साथ

रीना- कहाँ

मैं- संध्या चाची के पास.

मैं रीना को लेकर संध्या चाची के पास गया .

मैं- चाची मैं गोल मोल बात नहीं करूँगा पर कल रात सात अश्व्मान्वो की हत्या हो गयी है .

मेरी बात सुनकर चाची के चेहरे का रंग उड़ गया.

चाची- असंभव

मैं- तुम खुद जाकर पड़ताल कर लो रुद्रपुर में

संध्या- ऐसा कौन माई का लाल पैदा हो गया जिसने मृत्यु का वरन करने की ठान ली है .

मैं- वो कोई भी हो . पर अब मुझे तुम्हारी मदद की जरुरत है . तुम ही हो जो नहारविरो को काबू में कर सकती हो .

मेरी बात सुनकर चाची की आँखों की पुतलिया फ़ैल गयी .

चाची- किसने कहा तुमसे की मैं ऐसा कर सकती हूँ

मैं- किसी अपने ने , पर मैं तुमसे मदद की भीख मांगता हूँ

चाची- तूने सिर्फ नाहरविरो का जिक्र सुना है उनके बारे में तू जानता नहीं है

मैं- तुम बताओ

चाची- इस दुनिया में दो तरह के सच होते है एक जो सामने होता है दूसरा जो सामने होकर भी अनजान होता है . दुनिया में पूजा पाठ है तो तंत्र-मन्त्र भी है . कुछ लोग किताबी ज्ञान प्राप्त करते है , कुछ लोग दुनिया के अनसुने, अनसुलझे ज्ञान की तलाश करते है , भटकते रहते है बिना किसी बात के पर वो ही जानते है की वो बात क्या है . तो नाहरविरो की कहानी ये है की वो ऐसे रक्षक है जो सिर्फ साधने वाले या फिर साधक के बताये प्रमाण को ही पहचानते है , साधक उन्हें अपनी किसी खास चीज की सुरक्षा के लिए वचन घेरे में ले सकता है . एक नाहार्वीर ही बहुत होता है अपने आप में .

मैं- उन्हें कैसे साधा जाता है

चाची- तंत्र में कुछ मुमकिन है कुछ नहीं, साधक की जिजीविषा देखि जाती है

मैं- तुमने कैसे साधा था उन्हें.

चाची- मेरे गुरु का सामर्थ्य और मेरा हठ

मैं- जिसने सात अश्व मानवो को ढेर कर दिया उसका सामर्थ्य कितना होगा

चाची- मैं भी यही सोच रही हूँ, मेरी लालसा है उस से मिलने की

मैं- रीना ने कल ये काम किया है

जैसे ही मैंने ये कहा चाची ने अपने मुह पर हाथ रख लिया , उसे जरा भी यकीन नहीं था.

चाची-जो मैं कह रही हूँ रीना उसे ध्यान से समझना ये जो भी हुआ है , या नहीं हुआ है मुझे मतलब नहीं है पर अगर तू जिन्दा रहना चाहती है तो रुद्रपुर से दूर रहना . मैंने इन आँखों से बहुत कुछ देखा है, इतना कुछ देखा है की तू सोच भी नहीं सकती. इन हाथो से एक और चिता का बोझ नहीं उठाया जायेगा. वहां पर मौत है , और सबसे पहले उस तपिश में तू ही झुलसेगी. आगे तेरी मर्जी है , किस्मत हर दफा साथ नहीं देगी. जो चिंगारी बरसो पहले बुझ गयी उसे सुलगाने की गलती मत करना.

मैं- तुम बताती क्यों नहीं आखिर ऐसा क्या हुआ था बरसो पहले.

चाची- काश मैं जानती , काश मैं जानती तो आज हालात बेहतर होते. और तुम रीना मेरी बात पर विचार करना

चाची उठ कर चली गयी .रह गए हम दोनों.

मैं- सब मेरी गलती है मैं वो धागा तुझे नहीं देता तो ये सब होता ही नहीं

रीना- शायद यही नियति है .

मैं- बदल दूंगा मैं इस नियति को . अगर मौत भी तेरी तरफ आई तो उसे मुझसे पार पाना ही होगा.

रीना- अगर मैं मर भी गयी तो तेरी बाँहों में जान निकले मेरी

मैं- पागल हुई है क्या ये क्या बोल रही है तू तुझे जीना है मेरे साथ जीना है . तू अभी उतार फेंक उस धागे को

रीना- नहीं कर सकती

मैं- क्यों

रीना- क्योंकि वो मेरे गले में नहीं है , मुझे लगता है की वो मेरे अन्दर है .

रीना की बात सुनकर मैं और चिंतित हो गया .

मैं- तू फ़िक्र मत कर, मैं जल्दी ही मेरे पिता को तलाश कर लूँगा. उनके पास कोई समाधान जरुर होगा.

रीना- पर ऐसा कौन सा बोझ है जिसे मैं उठा रही हूँ तू नहीं

मैं- इसका जवाब अब चौधरी अर्जुन ही देंगे. तू बस घर पर ही रहना.

रीना- एक बात और थी

मैं- दो बात पूछ तू

रीना- वो लड़की कौन थी ...........

मैं- कौन लड़की

रीना- मुझे दोहराने की जरुरत नहीं

मैं- ठीक है फिर तू जब उस से मिले तो खुद पूछ लेना

रीना मेरे पास आई, इतना पास की उसकी सांसे मेरे सीने में उतरने लगी.

रीना- मैं कौन हूँ तेरी ये याद रखना हमेशा

मैं- तू मेरी सबकुछ है



रीना को छोड़कर मैं घर से बाहर तो आ गया था पर दिल में ये भी था की हालात ठीक नहीं होंगे जब ये दोनों सामने आएँगी. और मेरे लिए दोनों ही मेरी जिन्दगी थी , ये भी था की चाची जैसी घाघ औरत खुल कर मुझे अपना अतीत कभी नहीं बताएगी. रात को मैं और मीता एक बार फिर से कुवे पर बैठे रीना के लिए सोच रहे थे की मैंने तभी उसे आते हुए देखा..............................
 
यही तो जीवन है, तंत्र इस कहानी का वो भाग है जो अतीत को वर्तमान से जोड़ता है, परंतु जैसा मैंने कहा ये कहानी मीता मनीष या रीना की नहीं है, ये तीनों बस एक नजरिया है जिससे पाठक कहानी को समझ रहे है, मेरा सदैव मानना रहा है कि वर्तमान से ज्यादा रोचक अतीत होता है. ईन तीनों का कहानी मे बस इतना रोल है कि ये टूटी कडियों को जोड़ रहे हैं
 
#58



सुनार की घरवाली तेज तेज चलते हुए हमारी तरफ ही आ रही थी , पर किसलिए ये देखना था .

काकी- पिछले कुछ दिनों से मैं तुमसे मिलना चाह रही थी .

मैं- कुछ काम था क्या

काकी ने एक नजर डाली मीता पर और बोली- अकेले में बात हो सकती है

मैं- सब अपने ही है खुल कर कहो जो कहना है

काकी- लालाजी के जाने के बाद मैं ऐसे कुछ पुराणी चीजे जो जरुरत की नहीं थी उन्हें देख रही थी की मुझे कुछ ऐसा मिला जिसे मैं समझ नहीं पायी.

मैं- तो इसमें मेरा क्या लेना देना है .

काकी-मुझे एक चिट्ठी मिली जिसमे लिखा है अर्जुन के वारिस को दे देना, वो समझ जायेगा

मैं- क्या समझ जायेगा

काकी- यही तो उलझन है मेरी, चिट्ठी में बस इतना ही लिखा है ये नहीं लिखा की क्या दे देना .

काकी ने चिट्ठी मेरे हाथ पर रख दी. चमड़े के ऊपर लाल स्याही से लिखे गए शब्द थे . मीता ने भी पढ़ा उसे. एक तो जीवन में कम स्यापे थे ऊपर से ये चुतिया सुनार भी मरते मरते एक पहेली छोड़ गया .

मैं- काकी, जब्बर लाला और मेरे पिता किसी ज़माने में बड़े गहरे दोस्त थे पर उनकी दुश्मनी का क्या कारण था .

काकी- इसका जवाब उन तीनो में से ही कोई दे सकता है .

मैं- लालाजी के सामान को मैं देखना चाहूँगा अगर आपको कोई ऐतराज़ न हो तो .

काकी- मुझे भला क्या दिक्कत होगी, बस तुम अपना जो कुछ भी है वो ले जाओ .

मैं- ठीक है रात को आता हूँ मैं

काकी के जाने के बाद मैं और मीता उस चिट्ठी को देखने लगे.

मीता- अजीब सा चमड़ा है . ऐसी खाल मैंने देखि नहीं कभी

मैं- छोड़ अपने को क्या लेना देना. अपन रात को लाला के घर चलेंगे. तू ही जाना मेरा मन नहीं है .

मैं- क्या हुआ तेरे मन को

मीता- तेरी बातो ने उलझन में डाल दिया है मुझे, तूने कहा की रीना को अश्व मानव याद नहीं उसके घाव याद नहीं पर उसे ये याद थी मैं.

मैं- तू रीना पर शक कर रही है

मीता- नहीं, मैं बस सम्भावना तलाश रही हूँ . मुझे भी परवाह है रीना की . मुझे लगता है की वो बार बार रुद्रपुर जाएगी. उसे तलाश है किसी चीज की , उसकी आँखों में अजीब शिद्दत दिखी थी मुझे. मैं नहीं चल पाऊँगी तेरे साथ .

मैं- ठीक है . मैं ही जाऊँगा.

मीता- कल दोपहर को मिलेंगे फिर हम

मैं- कुछ देर तो रुक साथ मेरे

मीता- मुझे आदत होने लगी है तेरी, और ये आदत ठीक नहीं

मैं- मीता और मनीष एक ही तो है

मीता- ये तू कहता है तेरा दिल नहीं , वो किसी और के लिए धडकता है

मैं-इन धडकनों से अब डरने लगा हूँ मैं

मीता- समझा के रख इनको,

मीता ने अपना झोला उठाया और जाने लगी. कुछ कदम उसके साथ चला और फिर बावड़ी पे जाके बैठ गया .ये शाम ये डूबता सूरज . ये तन्हाई और मैं , मीता का कहना बिलकुल सही था मैं दो नावो की सवारी कर रहा था मेरे लिए रीना सबकुछ थी और मीता जिन्दगी थी . मुझे दोनों से बेपनाह प्यार था . ये जानते हुए भी की वो लम्हा मेरी जान ही ले जायेगा जब ये दोनों आमने सामने आएँगी जब किसी एक का साथ पकड़ना होगा , किसी एक का साथ छोड़ना होगा. सीने पर हाथ रखे मैं पत्थर पर लेटे हुए इसी कशमकश में डूबा था की एक आवाज ने मुझे धरातल पर ला पटका .

“चौधरी ओ चौधरी , तेरी मर्जी हो तो थोडा पानी पी लू ”

मैंने देखा ये वो ही आदमी था जो उस दिन मुझे कुवे पर मिला था . मैं लगभग दौड़ते हुए उसके पास गया .

मैं- तुम यहाँ

आदमी- इधर से गुजर रहा था प्यास लग आई. और आज मैंने पूछा भी है तुमसे

मैंने आँखों से इशारा किया तो उसने अंजुल भरी हौदी से और पीने लगा. उसकी दाढ़ी, मूंछे भीगने लगी पानी से.

“जी भर गया चौधरी , खूब असीश तुमको ” उसने कहा

मैं- जल्दी में नहीं हो तो आओ बैठते है थोड़ी देर.

उसने एक नजर आस पास डाली और बोला- जो तुम्हारी इच्छा चौधरी.

मैं उस से सीधा सीधा नहीं पूछ सकता था मैंने भूमिका बनानी शुरू की .

मैं- तुम किसान हो , मुझे बताओ ये कुवा मीठे पानी का है , पास में नहर है . आसपास का हर खेत फसल उगाता है पर मेरी जमीन ही बंजर क्यों .

आदमी-धरती हमारी माँ होती है चौधरी,और माँ भी संतान को तब तक दूध नहीं पिलाती जब तक की संतान रो रो कर उसे बताती नहीं की भूक्ख लगी है , तुम्हारे पास सब कुछ है , धरती माँ को बताओ की तुम उस पर आश्रित हो अपने पसीने से सींच दो उसके कलेजे को , वो किरपा करेगी तुम पर .

मैं- तुम मेरी मदद करोगे यहाँ खेती करने में, मैं तुम्हे मनचाही रकम दूंगा.

उस आदमी ने मेरी तरफ देख कर मुस्कुराया और बोला- चौधरी, लालच दे रहे हो मुझे, मैंने तुम्हे बताया था की मैं खुद किसान हूँ व्यापारी हूँ मुझे भला किसका मोह, पेट भरने लायक अनाज ये धरती माँ दे देती है .

मैं- उस रात जब तुम यहाँ से गए. इस हौदी का पानी मिटटी हो गया . मेर्रे किसी अपने की जान पर बन आई.

आदमी- खेद की बात है पर मेरा ऐसा कुछ प्रयोजन नहीं था . मैं बस पानी पीने रुका था .

मैं- हैरानी की बात जिस रात ये घटना हुई उसी रात किसी ने मेरे गाँव में एक आदमी को मार कर उसका दिल निकाल लिया और उसे शिवाले में भोग दे आया .

मेरी बात का उस आदमी पर जरा भी फर्क नहीं पड़ा , जरा भी भाव नहीं बदले उसके .

आदमी- मैं देखना चाहता हूँ की तुम कैसे मेहनत करते हो इस जमीन पर हल चला कर दिखाओ जरा .

मैं- मेरे पास बैल कहाँ है .

आदमी- ये भुजाये किसी बल से कम है क्या . उठाओ हल दिखाओ मुझे तुम काबिल बी हो या नहीं.

मैंने हल काँधे पर लगाया और चलाने लगा. बेशक मिटटी ने खूब पानी पीया था पर फिर भी जल्दी ही मेरी हिम्मत जवाब दे गयी. उस आदमी के चेहरे पर मुस्कराहट थी .

उसने हल मेरे काँधे से लेकर खुद पर लगाया और मैं देखता रह गया. कितना शक्तिशाली था वो . धरती ने जैसे खुद रास्ता दे दिया था उसको .. मैंने आगे होकर हल की दूसरी तरफ अपना कन्धा लगा दिया. वो मुस्कुराया. और हल छोड़ दिया.

आदमी- मैंने कहा था न ये धरती हमारी माँ है इसे दिल से पुकारो . माँ संतान के लिए जरुर आती है .

उसने अपना गमछा सही किया और जाने लगा.

मैं- रुको जरा मुझे बहुत बाते करनी है तुमसे

पर वो नहीं रुका, उसने सुना ही नहीं मुझे बस चलता रहा .



“मैं जानता हूँ तुम कौन हो . रुक जाओ मत जाओ ” मैंने चिल्ला कर कहा पर उसके कदम नहीं रुके ........................ हलके अँधेरे में मैं उसके पीछे दौड़ा और जब तक मैं मुंडेर पर पहुंचा वहां पर कोई नहीं था कोई भी नहीं था .............
 
#59



ऐसा नहीं था की मैं पहले भी जिन्दगी से परेशां नहीं था , आज भी मैं उलझा था उन उलझनों में जो बस मेरे गले पड़ गयी थी. मैंने लाला के घर जाने का विचार त्यागा और कपडे उतार कर हौदी में घुस गया . ठंडा पानी जो बदन पर पड़ा तो कुछ देर के लिए आराम मिला. एक नजर आसमान पर डाली आज सितारे चमक रहे थे . मन में बेचैनी थी , करे तो क्या करे नंगे बदन हौदी पर बैठे मैं बहुत देर तक यही सोचता रहा . हर बार मेरे दिल ने बस यही कहा की हर सवाल का जवाब वहीँ पर है बस मेरी नजर उस कहानी की डोर को पकड़ नहीं पा रही है .

दूर शिवाले में............

रात बेशक गहरा गयी थी पर शिवाला जाग्रत था हजारो दियो की रौशनी में जगमगा रहा था .दींन दुनिया से बेखबर , उसकी पायल की झंकार शिवाले में ऐसे गूँज रही थी जैसे की सावन में कोई अल्हड झूला चढ़ रही हो . बिखरी जुल्फे, चेहरे पर बेताक्लुफ्फी पर आंखो में शांति, इतनी शांति की जो देखे वो आने वाले तूफ़ान को महसूस कर जाए. उसने मिटटी खोद कर एक दिया बनाया और फिर अंगुली पर घाव करके उस दिए को खून से भर दिया. जैसे वो दिया जगमगाया धरती में हलचल सी मच गयी . उसने अपने आस पास एक घेरा बनाया और जोर से जमीन पर थपकी मारी.

“मुझे लगता है ये सब करने की तुम्हे कोई जरुरत नहीं है ” ये मीता थी जो तेज तेज चलते हुए रीना की तरफ आ रही थी .

रीना ने घुर कर उसे देखा और बोली- तू मुझे समझाएगी की क्या करना है क्या नहीं

मीता अब तक रीना के बिलकुल पास आ चुकी थी .

मीता- रीना, बात को समझ मुझे तेरी परवाह है , तु नहीं जानती तू कितनी कीमती है

रीना- मेरी परवाह है तो चली जा यहाँ से , मुझे जो करना है करने दे.

मीता- मैं जानना चाहती हूँ तू क्या करना चाहती है , तूने शिवाले को कैसे जाग्रत किया .

रीना- बताने की जरुरत नहीं मुझे, देवो के देव सबको अपनाते है मुझे भी शरण दी है , उनका जो है अब मेरा है वो .

मीता-तेरा नहीं रीना, उस चीज का जो तुझे अपने इशारो पर नचा रही है .

रीना- मेरा दिमाग ख़राब मत कर चली जा यहाँ से .

मीता- मैं तुझे यहाँ मरने के लिए नहीं छोड़ सकती, तू चल मेरे साथ

मीता ने रीना का हाथ पकड़ा. पर रीना ने एक झटका दिया जिससे मीता का पूरा अस्तित्व हिल गया . रीना ने अपने होंठो को बुदबुदा कर न जाने क्या कहना शुरू किया , आसपास का माहौल बदलने लगा. एक बार फिर से वो कुछ अजीब कर रही थी की मीता ने उसको रोक लिया.

रीना- तू ऐसे नहीं मानेगी. पहले तेरा ही रोग काटती हूँ .

मीता- तेरी अगर यही मर्जी है तो ठीक है ,

रीना ने ताली बजाई और हवा में से बेतहाशा हथियार निकल कर दोनों के दरमियान गिर गए.

रीना- तेरे लहू की तपिश को महसूस किया था मैंने , उसे पीकर ही आज मेरी प्यास बुझेगी .

मीता- आ फिर देर किस बात की ये रही मैं और ये मेरी तलवार .

मीता ने एक तलवार उठाई और दूसरी रीना की तरफ फेंकी . रीना की आँखों का रंग एक बार फिर गहरा काला हो गया . इस से पहले की मीता कुछ करती बिजली की सी रफ़्तार से रीना ने उसकी पीठ चीर दी.

“बहुत बढ़िया ” चीखी मीता और उसने रीना के पैर पर वार किया पर रीना जिस पर रक्त का जूनून चढ़ने लगा था उसने फिर से बचाया और मीता के कंधे पर अपनी तलवार की मूठ दे मारी. मीता कुछ कदम पीछे हुई.

पानी की हौदी पर बैठे बैठे अचानक ही उदासी ने मुझे घेर लिया. अजीब सी बेचैनी हो रही थी दिमाग में बस उस अजनबी किसान की बाते घूम रही थी , उसने जो जो बात मुझे कही थी मैं उनके अर्थ समझने की कोशिश कर रहा था की अचानक से एक कोवा आकर मेरे सर से टकराया और मर गया . काले कौवे का अचानक से ऐसे सर पर आकर टकराना एक अपशकुन था, मेरा दिमाग घूम गया , दिल ने किसी अनिष्ट की आशंका से धडकनों की रफ़्तार शिथिल कर दी.

दूर शिवाले में दो बिजलिया एक दुसरे पर बरसने को बेताब हो रही थी . मीता की तलवार ने रीना की कोहनी से मांस का एक टुकड़ा उड़ा लिया था , रीना के चेहरे पर मुस्कान उभर आई . उसने मीता की पीठ पर लात मारी, मीता धडाम से जमीन पर गिर गयी. मौके का फायदा उठा कर रीना ने मीता की जांघ कर अपनी तलवार का निशाँ लगा दिया.

रीना ने तलवार पर लगे मीता के रक्त को अपने होंठो से चाटा और बोली- बरसो बाद इस लहू को चखा है , आज भी उतना ही ताजा और मजेदार है .

मीता- क्या बोल रही है तू रीना

रीना- अब क्या बोलना क्या सुनना अब तो बस तेरे लहू को पीना है शिवाले के कण कण को तेरे लहू से लीप दूंगी मैं.

उस कौवे को देखते हुए मैं ख्यालो में डूबा था की तभी मेरे दिमाग में बत्ती सी जली और मैं उसी पल शिवाले की तरफ दौड़ पड़ा. फूली हुई सांसो की बिना परवाह किये मैं बस दौड़ रहा था शिवाले की और. उस अजनबी की कही हुई बात का भेद शायद मैंने समझ लिया था . पर मैं कहाँ जानता था की वहां पर एक और तूफान मेरा इंतज़ार कर रहा है , शिवाले की रौशनी देखते ही मेरा दिल अनहोनी की आकांशा से घबराने लगा था और जब मैंने उस मैदान में उन दोनों को खून से लथपथ एक दुसरे पर वार करते हुए देखा तो मेरे दिल के दो टुकड़े हो गए.

“मीता, रीना ” चीखते हुए मैं दोनों की तरफ बढ़ा .

मैं- ये क्या कर रही हो तुम , पागल हुई हो क्या.

मीता- मनीष, पीछे हटो ये अपने होश में नहीं है , मैं संभाल लुंगी इसे.

मीता ने रीना को मारा पर उसे क्या पता था की चोट मेरे इड्ल पर लगी है .

मैं- नहीं मीता. नहीं, मैं संभाल लूँगा इसे. रीना होश में आओ देखो मेरी तरफ तुम्हारा मनीष तुमसे कह रहा है , छोड़ो इस हथियार को और पास आओ मेरे .

रीना- दूर हट जा , मैंने वादा किया है इस से की आज हम में से कोई एक ही रहेगा एक को जाना होगा.

मैं- कोइ नहीं जाएगा हम तीनो साथ है साथ ही रहेगे.

रीना मेरे पास आई बोली- कौन है तू , क्या तू भी मरना चाहता है इसके जैसे

मैं- अगर मेरे मरने से ही तेरा क्रोध शांत होता है तो मेरी जान , ये भी मंजूर है

रीना- आज की रात लगता है मेहरवान है , तू थोडा धैर्य रख इसके बाद तेरा ही नंबर है .

रीना ने मीता को मारने के लिए प्रहार किया पर मैंने उसकी तलवार पकड़ ली

मैं- शांत हो जा रीना , शांत हो जा. टाल दे इस घडी को . कही अनर्थ न हो जाये.

रीना ने मेरे पेट में लात मारी और मुझे फेंक दिए एक बार फिर से वो दोनों जुट गयी . अनिष्ट की शंका तो मुझे उसी पल हो गयी थी पर ऐसे होगा ये नहीं जानता था . मीता घायल थी , रीना पर जूनून शामिल था और इस से पहले की वो मीता पर उस जानलेवा वार को करती , मैंने अपने बदन को मीता की ढाल बना दिया.

रीना की तलवार मेरे बदन के आर पार हो गयी .

“नहीं ” चीखी मीता और मुझे अपने आप पर से हटाते हुए उसने रीना को धक्का दिया. रीना का सर चबूतरे से जा टकराया. मीता ने मुझे अपनी बाँहों में भर लिया

“क्यों, क्यों किया ऐसा तुमने ” सुबकते हुए बोली वो

मेरे बहते खून से धरती गीली होने लगी थी .

मीता- कुछ नहीं होने दूंगी तुझे

मैं- सहारा दे जरा मुझे

मीता ने मुझे खड़ा किया लड़खड़ाते कदमो से मीता का सहारा लिए कुछ कदम ही चल पाया था की एक बार फिर से मैं गिर गया .

“होश कर मनीष होश कर ” मीता ने मेरे गाल थपथपाते हुए कहा .

मैंने उसके हाथ को थामा और बोला- उसे कभी मालूम नहीं होना चाहिये, वादा कर मुझसे , चाहे कुछ भी हो जाये, मैं रहूँ न रहूँ तू उसका ध्यान रखेगी , उसे कभी मत बताना की ये उसके हाथो से हुआ है .

मीता- वादा मेरे सनम वादा

मीता के मुह से ये सुनते ही मैंने अपनी आँखे मूँद ली और खुद को उसके हवाले कर दिया...............................
 
#60



“आँखे खोल मनीष, मैं तुझे कुछ नहीं होने दूंगी . जब तक मैं हूँ ये साथ नहीं छुटेगा ” मीता ने मुझे थपथपाते हुए कहा.

मैंने उसके हाथ को थाम लिया. तलवार आर पार थी , खून लबालब बह रहा था . हलकी सी आंखे खोल कर मैंने मीता को इशारा दिया की थोड़ी जान बाकी है . आहिस्ता आहिस्ता मीता ने वो तलवार मेरे सीने से खींची और अपनी चुनरिया को इस तरह से बाँध दिया की वो खून को रोक सके.

आंसुओ से भरा चेहरे लिए मुझे अपनी गोद में लिए बैठी मीता सुबक रही थी . सहला रही थी मेरे तन को . सब कुछ शांत था सिवाय उसकी सुबकियो और मेरी सांसो के .

“क्या कहते है तेरे सितारे , पूछ कर बता जरा ” मैंने खांसते हुए कहा

मीता- सितारे जो भी कहे , आज मैं उनकी एक नहीं सुनने वाली.

मैं- सहारा दे जरा मुझे .

मीता ने मुझे अपने कंधे का सहारा देकर खड़ा किया. शिवाला अब भी रोशन था. जिसका मतलब था की अभी ये रात अभी और रोशन थी , कहानी अभी और बाकी थी .

“थोडा पानी पिला दे ” मैंने कहा

मीता तुरंत ही एक घड़ा उठा लाइ . ठन्डे पानी ने बदन को जैसे आराम दिया.

मीता- हमें डाक्टर के पास जाना चाहिए.

मैं- ये डॉक्टर के बस का रोग नहीं है मीता

मीता- तो क्या ऐसे ही तडपता रहेगा तू

इस से पहले की मैं मीता को जवाब दे पाता , शिवाले के सरे दिए एक झटके में बुझ गए . काले मनहूस अँधेरे ने सब कुछ अपने कब्ज़े में ले लिया. आसमान कडकने लगा. एकाएक ही घटा चढ़ आई मौसम में .

“मनीष उधर देख जरा ” मीता ने उस तरफ इशारा किया जहाँ देवता का कमरा था . बस वही पर ही उजाला था , मीता का सहारा लिए मैं वहां पर पहुंचा . अन्दर का सारा नजारा बदल गया था , इतना बदला की मीता और मैं दोनों ही हैरत में रह गए. अन्दर की दीवारे चांदी के तेज से जगमगा रही थी . देवता की मिटटी की मूर्ति काले सफ्तिक में बदल गयी थी जिस पर चन्दन का त्रिपुंड बना था . ये को शक्ति थी जो हमें वहां पर अपने होने का अहसास करवा रही थी .

मैंने अपने हाथो से सफ्टीक को छुआ, और माथे से लगाया , मीता ने भी वैसा ही किया जैसे ही हम दोनों का खून उस मूर्ति को अर्पण हुआ वहां पर आग लग गयी . शायद देवता क्रोधित हो गया था . दीवारों की चांदी पिघल कर बहने लगी. मेरे घाव में तपिश बढ़ने लगी थी . मीता की खाल जलने लगी . और फिर सब शांत हो गया जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो. पर ये सब हुआ था इसका सबूत थी दिवार पर पिघली चांदी से बनी वो आकृति .

वो आकृति जिसका वहां होना हमारे लिए कोई पहेली थी या फिर कोई सन्देश था .

“कौन होगी ये ” मीता ने पूछा

मैं- अभी तो नहीं मालूम पर पता कर लेंगे हम

मैंने अपने हाथ से उस आक्रति को छुआ ही था की एक बार फिर से हमारे कदम लडखडा गए. ऐसे लगा की भूकंप ने दस्तक दी हो .

मैं- इस से मेरा कोई तो रिश्ता है मीता , ये पहचान रही है मुझे

मैंने फिर से अपनी हथेली आक्रति पर रखी. आकृति से पानी रिसने लगा.

“पानी ” मैंने कहा

मीता- नहीं पानी नहीं आंसू .

मीता ने इशारा किया , मैंने देखा उस छाया की आँखों से आंसू बह रहे थे . पर बस दो पल के लिए फिर वो आकृति राख बन कर मिट गयी . मैंने उस राख को मुट्ठी में भर लिया. जैसे ही राख में मेरे बदन को महूसस किया मुझे अलग ही ताजगी, स्फूर्ति लगने लगी. थोड़ी देर पहले मैं दर्द में था पर अब ठीक लग रहा था . बस मेरा जख्म भरा नहीं था . जितनी भी वो राख थी मैंने अपने बदन पर लगा ली. शक्ति का संचार तो हुआ पर जख्म ताज्जा ही रहा ये अजीब बात थी .

मैं और मीता वापिस आये तब तक रीना का वहां कोई नामो निशान नहीं था . ख़ामोशी से चलते हुए मैं और मीता कुवे पर पहुंचे . मीता कमरे में गई और पट्टियों वाली थैली ले आई ,

मीता- पट्टी से काम नहीं चलेगा. डॉक्टर से तो दिखाना ही पड़ेगा

मैं- ठीक है बाबा . अब ये हुलिया बदल ले कोई देखेगा तो भूतनी समझ के खौफ से मर जाएगा.

जब मीता अपना हुलिया ठीक कर रही थी तो मैंने देखा उसको भी बहुत चोट लगी थी . कुछ देर बाद वो और मैं बिस्तर पर लेटे थे.

मैं- तो किस बात पर आपस में तकरार कर बैठी तुम लोग

मीता- तेरी जानेमन मौत का आह्वान कर रही थी मैं उसे रोक रही थी .

मैं- और वो तुझसे उलझ पड़ी

मीता- मुझसे चाहे लाख बार उलझ पड़े कोई दिक्कत नहीं है . दिक्कत बस ये है की वो जो कर रही है उसका मकसद क्या है , नाहरविरो से लड़ना चाहती है पर किसलिए ,

मैं- शायद नाहर वीर को साधना चाहती है रीना

मीता- मनीष, मैं घुमा फिरा कर नहीं कहूँगी पर मुझे लगता है की उस जमीन में कुछ है , नाहर वीर को बेहतरीन सुरक्षा करने वाले माना जाता है तो इतना तो तय है की किसी बेहद कीमती चीज की रक्षा कर रहे है वो .

मीता की बात से मुझे वो द्रश्य याद आया जब संध्या चाची ने अपना मांस जमीन पर फेंक कर कुछ किया था तो जमीन से सोना चांदी निकले थे .

मैं- उस जमीन में खजाना है

मीता- मुझे संदेह था , पर रीना क्या करेगी सोने-चांदी का

मैं- यही तो मेरे भी समझ में नहीं आ रहा , बात इतनी सरल नहीं है . संध्या चाची को भी सोने से जयादा किसी और चीज में दिलचस्पी थी . उसने कहा था मुझे नहीं चाहिए ये सब .

मीता- और हम इस काबिल नहीं है की संध्या का मुह खुलवा सके. इन सबका अतीत हमारे आज पर भारी पड़ रहा है , संध्या के अतीत को तलाश कर ही हम कुछ सुराग तलाश कर पाएंगे.

मैं- हम जरुर कामयाब होंगे.

मैंने मीता के कंधे पर सर रखा और सोने की कोशिश करने लगा. शिवाले की उस राख ने मुझे काफी राहत दे दी थी पर फिर भी अगले दिन मैं डॉक्टर के पास चला गया . उसने जैसे तैसे करके टाँके लगाये और कुछ दवाइयां भी दी. मैं वहां से ताई के पास चला गया जो घर पर ही थी .

ताई- आजकल कहाँ गायब है तू

मैं- बस ऐसे ही कुछ कामो में उलझा था .

ताई- सब ठीक है न

मैं- हाँ सब बढ़िया है .

ताई- सुन खाना खा लेना अभी बना कर ही रखा है , तेरा ताऊ आज आने वाला है तो घर पर ही रहना मैं रीना के घर पर जा रही हूँ , कुछ मेहमान आने वाले है आज कोई काम हो तो बुला लेना मुझे

मैं- कौन मेहमान आने वाले है ताई



ताई- तुझे नहीं मालूम क्या , रीना के लिए रिश्ता आया है .....
 
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