Adultery गुजारिश 2 (Completed) - Page 5 - SexBaba
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Adultery गुजारिश 2 (Completed)

#36



इस बातचीत ने मेरे मन में हलचल मचा दी, चाची की बातो से लग रहा था की वो वैसी नहीं है जैसा दिखती है, और उसकी क्या कहानी है अब मुझे ये मालूम करना था . दूसरी बात मुझे ये पता चली थी चाचा कर नहीं पा रहा है उसके साथ , शायद इसी बात से वो दबता था चाची से. जी भर कर पानी पीने के बाद मैं घर से निकला ही था की रीना की मामी मिल गयी.

“अरे मनीष, वो तेरा काम हुआ के नहीं ” उसने कहा

मैं- जल्दी ही हो जायेगा काकी.

काकी- अच्छा ही है

मैं- रीना कहा है

काकी- घर पर ही है .

मैं रीना के घर गया तो वो चबूतरे पर बैठी कपडे धो रही थी . मैं उसके पास ही बैठ गया .

रीना- आजकल कुछ जायदा ही मुलाकाते हो रही है ऐसा लोग कहने लगे है अब

मैं- कुछ तो लोग कहेंगे

रीना- कल मैं क्या पहनू

मैं- नीला सूट

रीना- तुझे मैं नीले में अच्छी लगती हूँ क्या

मैं- मेरी नजर से देख कभी खुद को समझ जायेगी.

रीना- इसी लिए तो नहीं देखती .और बता

मैं- अभी तो कुछ नहीं है बताने को

रीना- तेरी बाते सर के ऊपर से जाती है .

मैं - आजकल बस ऐसा ही चल रहा है .

रीना- ये सुहानी हवा, ये ढलती शाम कितने दिन हुए पनघट किनारे हम बैठे नहीं

मैं- बस कुछ दिनों की बात है , फिर पनघट भी मेरी और तू भी मेरी.

रीना ने आँखे मटकाई और आसपास देखते हुए बड़ी शोखियो से अपनी जुल्फे संवारी और बोली- कुछ भी बोलता है .

मैं- तू कहे तो न बोलू

रीना- एक नइ कसेट लायी हु गानों की ले जा , तुझे पसंद आएगी.

मैं - ताई के पास रख जाना , चल मिलता हूँ फिर.

आँखों में रंग थे,सपने थे कल मैं रीना के साथ मेले में जाने वाला था . मैं उस से वो सब कहना चाहता था जिसे सुनने को वो बेताब थी. मैं उसका हाथ पकड़ना चाहता था. उसके साथ घूमना चाहता था . उसकी जुल्फों के साये तले जीना चाहता था . ढलती शाम में मैं ताई के साथ बावड़ी पर बैठा था . वो मुझे देख रहा था मैं उसे .

ताई- क्या देखता है इस तरह से

मैं- तू जानती है मेरी नजर को फिर क्यों पूछती है

ताई- बस यूँ ही . आजकल तू कुछ खोया खोया सा रहता है , मुझे देवरानी ने बताया की कल रात तू खेत में किसी लड़की के साथ था , मैं तुझसे ये नहीं पूछूंगी की वो कौन थी पर इतना जरुर कहूँगी जिसका भी तू हाथ थामे , थाम कर रखना

मैं- वैसे तो चाची तुम्हे फूटी आँख नहीं सुहाती और वैसे बड़ी निजी जानकारिया बांटी जा रही है .

ताई- हैं तो मेरी देवरानी ही और फिर छोटी मोटी बाते किस घर में नहीं होती.

मैं- मुझे तो समझ नहीं आता

ताई- उसकी जरुरत भी नहीं .

मैं- ये हवा, ये मौसम कुछ कहता है

ताई- क्या कहता है

मैं- तुमसे प्यार करने को

ताई- मैं तुझे इतनी अच्छी लगती हूँ क्या , या तेरा प्यार बस उस चीज़ तक ही है

मैं- तुझे क्या लगता है, मुझे उस चीज की हसरत होती तो मेरे पास मौका था न , पर मैंने तुम्हे तब पाया जब तुम्हारे दिल ने कहा , वर्ना मेरी क्या औकात थी जो तुमसे जबरदस्ती कर सकता. क्या मैंने कभी तुमसे पूछा की कितने लोगो के साथ ..........

मैंने जान बुझ कर बात अधूरी छोड़ दी.

ताई- तुझे हक़ है जानने का ,

मैं- पर मुझे नहीं जानना

ताई- मेरी बात सुन, तेरी जो भी दोस्त है उसका ध्यान रखना, अब तूने इतने लोगो से दुश्मनी पाल ली है , तो ये बात हमेशा याद रखना की तेरी वजह से उसकी सुरक्षा से कोई समझोता न हो. अपनों को खोने का गम सहन करना आसन नहीं होता. दुश्मनी का पहला नियम यही होता है की लोग सबसे खास को ही नुक्सान पहुंचाते है .

मैं- , उसे मेरी जरुरत नहीं उस मामले में

ताई- वो तू जाने,

मैंने ताई की जांघ पर हाथ रखा और सहलाने लगा. उसके बदन की संदली खुशबु मुझे पागल कर रही थी . मैंने ताई के हाथ को धीरे से अपने लंड पर रख दिया. वो उसे सहलाने लगी. कुछ देर बात उसने हाथ अंदर पायजामे में डाल दिया और मैं क्या बताऊ मैं उस मजे के अहसास में डूबने लगा.

“ताऊ तुमसे नफरत क्यों करता है ” मैंने कहा

ताई- उसके पास पर्याप्त कारण है

मैं- उसने भी तुम्हे देख लिया था न किसी के साथ

ताई- उसकी नफरत जायज है , मैंने स्वीकार कर लिया है उसकी नफरत को

मैं- किसके साथ देखा था तुम्हे उसने

ताई- तुम्हे जरुरत नहीं जानने की .

मैंने ताई को खींच कर अपनी गोद में बिठा लिया और उसके गालो को चुमते हुए बोला- मुझे हर वो बात जाननी है जो मुझसे छिपी है.

ताई-कुछ चीज़े छिपी रहे तो ही बेहतर होती है .

मैंने अपने हाथ ताई की चुचियो पर रखा और उन्हें दबाते हुए बोला- ठीक है नहीं पूछता पर ये राज़ फिर किसी भी तरह से मेरे सामने नहीं आना चाहिए

ताई- वो मेरी जिंदगी है , उसे कैसे जिया मैंने वो मेरी मर्जी थी , जरुरी नहीं की दुनिया की नजर से देखा जाए, दुनिया की नजरो में ये गलत हो सकता है पर अगर मैं टांगे खोल दू तो क्या सबसे पहले ये समाज ही नहीं चढ़ जायेगा मुझे पर. मैंने तुझे दी , पर इसका मतलब ये नहीं था की मेरी कोई मज़बूरी थी , उसमे मेरी मर्जी थी . बेशक वो गलत था , पर उस छोटे से लम्हे ने मुझे ख़ुशी दी.

मैं- मैं बस चाहता हूँ की तुम खुश रहो , तुम्हारे दामन में दुनिया भर की खुशिया रहे .

मैंने ताई के पैरो को फैलाया और अपने उपर चढ़ा लिया ताई ने मेरे लंड को अपनी चूत पर लगाया और उस पर बैठती चली गयी . ताई की चूत की गर्मी का क्या कहना . वो धीरे धीरे ऊपर निचे होने लगी. घुप्प अँधेरे में बस हमारी साँसे ही चल रही थी. न वो कुछ बोल रही थी न मैं पर हमारे जिस्म एक दुसरे से कह रहे थे वो बात जो बस उन्हें ही मालूम थी .

चुदाई के बाद वो मेरे ऊपर से उठी और पास में बैठ कर ही मूतने लगी. अँधेरी रात में उसकी चूत से टपकते मूत की आवाज सुनना भी एक अजब ही सुख था .

“घर चले अब ” ताई ने कहा

मैंने उसका हाथ पकड़ा और कहा- क्या तुम मुझमे पिताजी को देखती हो .



ताई ने मेरी बाहं मरोड़ी और बोली- मेरा इम्तिहान मत ले तू , अर्जुन और मेरा रिश्ता जो था उसे समझने के काबिल नहीं है तू. बस इतना समझ ले मैं काशी का घाट हूँ , मेरे और अर्जुन के रिश्ते को समझने के लिए तुझे गंगा होना पड़ेगा. .......................
 
#37



“ये जीवन अजीब होता है , इन रिश्तो को भूल भुलैया को समझने के लिए सीने में धडकता दिल होना चाहिए , अब देख ले न तेरे मेरे दरमियान जो भी है, उस से मेरी ममता कम नहीं हो जाती, मेरे आँचल की छाँव हमेशा तेरे सर पर छत बन कर रहेगी. ” ताई ने मुझे धक्का सा दिया और चल पड़ी घर की तरफ.

ये औरत भी न अपने आप में अजीब थी, छोटे से दिल में न जाने क्या क्या समेटे हुए थी . घर आने के बाद ताई खाना बनाने लगी मैं उसके पास ही बैठ गया .

ताई- ऐसे खामोश क्यों बैठा है

मैं- कुछ नहीं बस , कल के बारे में सोच रहा हूँ

ताई- कल कभी नहीं आता ,

मैं- मेरा कल आएगा जरुर आएगा.

ताई- और क्या होगा उस कल में

मैं- एक घर होगा मेरा घर .

खाना खाने के बाद मैंने आँगन में ही बिस्तर लगाया और सितारों को देखते हुए सोचने लगा. पिछले कुछ दिनों में जो कुछ भी हुआ था मेरी जिन्दगी की चलती फिल्म जैसी हो गयी थी , एक दम से इतने बदलाव आ गए थे की समझना मुश्किल हो रहा था . मेरे पास रीना थी, मीता आ गयी थी मेरी जिन्दगी में . एक मेरी भोर का उजाला थी तो दूसरी मेरे अंधेरो की साथी . बार बार मुझे मीता की कही बात याद आ रही थी की , कुछ नहीं है सिवाय बर्बादी के.

मैं चाचा- चाची के बारे में सोचने लगा. मैंने दो बार उनकी बाते सुनी थी दोनों बार ही उन्होंने हैरत में डाला था मुझे, मुझे ये भी मालूम हुआ था की चाची की ले नहीं पाता चाचा . क्या वो भी ताई के जैसे किसी और संग चुदाई करती होगी. ऐसे तमाम सवालो ने मेरे सर में दर्द कर दिया था . पास रखे जग को मैंने मुह से लगाया और पानी पीने लगा. मेरी निगाह ऊपर चाँद की तरफ थी जो मुझे ही देख रहा था .

सुबह जब मैं उठा तो मौसम कुछ जुदा जुदा था , आसमान में बादल घुमड़ आये थे , करने को कुछ ख़ास नहीं था पर दिल में उमंग थी , आज मेले के बहाने मैं रीना से अपने दिल की बात कह देना चाहता था . दोपहर होते होते वो भी आ गयी. वादे के अनुसार उसने नीला सूट पहना था , क्या गजब लग रही थी वो आज

“ऐसे क्या देख रहा है ” उसने कहा

मैं- बड़ी प्यारी लग रही है आज, काला टीका लगा ले, कहीं नजर न लग जाये तुझे

रीना- तू साथ है न फिर क्या फ़िक्र. चल अब और देर मत कर , यही पर दोपहर कर दी तूने.

मैं- सुबह से तू गायब थी और बिल मुझ पर फाड़ रही है .

आपस में हंसी मजाक करते हुए हम और गाँव वालो संग रुद्रपुर के लिए चल पड़े. हवाओ में आज कुछ शोखिया सी थी. जब हवा बार बार रीना के झुमको को चूमती तो न जाने क्यों मुझे जलन होती. ऊँट गाड़ी पर हिचकोले खाते हुए चले जा रहे थे . आँखों के इशारे सीधे दिल तक जा रहे थे . और फिर वो घडी भी आ गयी जब हम मेले से कुछ ही दूर थे. उन ग्यारह पीपलो से थोडा पहले गाड़ी वाले ने हमें उतारा.

रंग बिरंगे खेल तमाशे , जगह जगह छोटी छोटी दुकाने लगी थी , झूले लगे थे.

“वादा याद है न ” रीना ने मेरे कान में कहा

मैं- तू भी याद है वादा भी .

मैंने उसका हाथ पकड़ा. और हम मेले में चल दिए.

“आजकल तू न जाने किस निगाह से देखता है मुझे ” उसने कहा

मैं- तू ही बता क्या दोष है मेरी निगाहों का

रीना- ये सीधा मेरे दिल में उतरती है .

मैं- पर वो दिल तेरा कहाँ , वो तो मेरा हो चूका

मेरी बात सुनकर रीना का चेहरा गुलाबी हो गया.

रीना- ऐसी बाते ना किया कर, कुछ कुछ होता है

मैं- बता फिर क्या होता है .

रीना- जान कर रोका है बताने को ,

मैं- तेरी मर्जी.

मैंने थोड़ी नमकीन खरीदी और खाते हुए रीना के साथ इधर उधर घुमने लगा. कुल्फी खाने के बाद हम लोग झूला झूलने गए. आज का दिन मेरे जीवन का सबसे बढ़िया दिन था , कम से कम उस वक्त तक तो मुझे ऐसा ही लग रहा था . घूमते-खरीदारी करते हुए समय न जाने कब ढलने लगा था .

रीना- देवता के दर्शन तो कर लेते है

मैं- हाँ चलते है .

हम शिवाले की तरफ जा ही रहे थे की तभी एक दूकान पर मेरी नजर पड़ी.

मैं- आ जरा मेरे साथ .

रीना- अब कहा ले जा रहा है .

मैं- आ तो सही .

मैं रीना को उस दूकान पर ले गया जहाँ पर पायल बिक रही थी .

मैं- काकी, सबसे सुन्दर पायल दिखा जरा.

एक पतली सी डोर वाली पायल पसंद आई मुझे.

काकी- चांदी की है .

मैं- रीना पैर उठा तेरा जरा .

जैसे ही उसने पैर उठाया मैंने पायल पहना दी उसे. वो कुछ कहना चाहती थी पर मैंने उसे रोका.

“एक दिन तूने मेरे लिए अपनी पायल बेचने की बात कही थी , आज मैंने तेरे लिए पायल खरीदी है , ” मैंने कहा

रीना- एक लड़की को पायल पहनाने का मतलब समझता है तू

मैं- मुझे समझने की जरुरत नहीं , चल आ दर्शन करने चलते है .

हम शिवाले से थोड़ी दूर ही थे की रीना बोली- “मनीष, बड़ी प्यास लगी है, पानी पीना है ”

“तू सीढियों पर बैठ, मैं अभी पानी लेकर आता हूँ ” मैंने उस से कहा और पानी लेने चल दिया. मैंने इधर उधर देखा पानी का जुगाड़ दिखा नहीं मुझे, मैं टंकी पर गया पर वो भी सूखी थी. कुछ देर भटकने के बाद मुझे प्याऊ दिखी, मैंने एक लोटा पानी भरा और रीना की तरफ चल पड़ा. जब मैं वहां पहुंचा तो मेरा दिल धक् से रह गया. मैंने देखा .........

मैंने देखा की रीना को चार पांच लडको ने घेर रखा है और एक लड़का जिसकी पीठ मेरी तरफ थी उसके हाथ में रीना की चुन्नी थी . जिसे वो लहरा रहा था एक लड़के ने रीना की बाहं पकड़ रखी थी . उस पल मुझे जो अफ़सोस हुआ , मुझे उन लडको से ज्यादा खुद पर गुस्सा था की मैं उसे छोड़ कर गया ही क्यों. मेरे हाथ से लोटा छूट गया .

“रीना ” चीखते हुए मैं उसकी तरफ भागा. रीना ने मेरी तरफ देखा उसका आंसुओ से भरा चेहरा मेरे कलेजे को चीर गया . जिस लड़के के हाथ में रीना की चुन्नी थी उसने मुझे देखा पलट कर वो जोरावर था . मेरे सीने में उसने वो आग जला दी थी जो बुझना मुमकिन थी .

“हरामजादे तेरी ये हिम्मत तू जानता है तूने क्या किया है ” मैंने कहा

जोरावर- चोट वही सबसे ज्यादा असर करती है जहाँ पर सही वार किया जाये. जब से मुझे मालूम हुआ तू अर्जुन का बेटा है , मैं जल रहा था , तेरे बाप ने मेरे बाप को मारा था आज मैं अपना बदला पूरा करूँगा.

“तेरी शिकायत मैं हस्ते हस्ते दूर कर देता पर तूने इस लड़की पर हाथ नहीं डाला, तूने मेरे गुरुर को ललकारा है , तेरी हर खता माफ़ थी , पर आज तू भी तेरे बाप के पास जायेगा. ” मैंने कहा और जोरावर की तरफ लपका. तभी उनमे से एक लड़के ने मेरे पैर में अडंगी लगा दी मैं गिर गया और गिरते ही जोरावर ने मेरी पीठ पर लात मारी.

“पीठ पर मारा है , सीने पर खायेगा. ” मैंने उठते हुए कहा.

दुसरे लड़के ने रीना की बाहं मरोड़ी. मैंने पास की एक गन्ने की रेहड़ी पर से फरसा उठाया और उस लड़के की तरफ फेंका जो सीधा उसके कंधे पर जा लगा. खून का फव्वारा छूट पड़ा. जैसे ही उसकी पकड़ ढीली हुई, रीना दौड़ पड़ी मेरी तरफ और अकार मेरे सीने से लग गयी.

“तुझे रोने की जरुरत नहीं , तेरे आंसू सूखने से पहले मैं आग लगा दूंगा इनको मेरा वादा है तुझसे ” मैंने रीना को पीछे किया. तब तक उन लोगो ने हथियार निकाल लिए थी .

मैंने उनमे से एक लड़के की लाठी रोकी और उसकी गोटियो पर लात जमा दी, पर मुझे इन चुतियो की परवाह नहीं थी मुझे बस जोरावर दिख रहा था . उस लड़के के हाथ से लाठी गिरते ही मैंने लाठी उठाई और उसके सर पर दे मारी , सर फूट गया पर मुझे कहाँ परवाह थी एक के बाद एक उसके सर पर वार करते ही गया मैं जब तक की लाठी टूट नहीं गयी. आस पास लोग इकठ्ठा होने लगे थे पर कोई भी बीच में नहीं आ रहा था .

जोरावर ने मेरी तरफ एक पत्थर फेक कर मारा जिसे मैंने बचाया और उसकी गर्दन पकड़ ली.

“मेरी आँखों में देख , तू तो न जाने किस आग में जल रहा था पर मैं तुझे आज इसी जगह पर जला दूंगा. और मुझे विश्वास है की तेरी सांसे इतनी कमजोर नहीं होगी, तू चीखेगा ” मैंने उसका गला दबाते हुए कहा. मेरे नाखून उसके गले की नसों को चीर देना चाहते थे . उसकी आँखे बाहर निकलने को मचलने लगी थी . की तभी पीछे से कीसी ने मेरे सर पर कुछ दे मारा. एक पल को मेरा सर चकरा गया . सर से टपकते लहू ने चीख कर कहा की सर फूट गया है मेरा. मेरी पकड़ जोरावर से ढीली हो गयी . मैं पीछे को पलटा ही था की मेरी पसलियों में दर्द भर गया . जिसने मेरा सर फोड़ा था उसने चक्कू घोप दिया था मेरी कमर के ऊपर .

“आह”दर्द से बिलबिला पड़ा मैं . तभी जोरावर ने लात मारी मुझे मैं गिर गया . वो चार लोग टूट पड़े मुझ पर लात पे पड़ती लात ने मुझे दोहरा कर दिया.

“तुझे क्या लगा था , तू मुझे हरा देगा. मैं इंतज़ार में कितना तदपा हु , तू नहीं समझ सकता कुत्ते, आज तेरे लहू से देवता को नहला कर मुझे चैन आएगा. ” उसने मुझे मारते हुए कहा .

मैंने अपने हाथ धरती पर टिकाये और खड़ा होते हुए कहा - तू भी झूठा , तेरा देवता भी झूठा. जिस देवता के दरबार में एक मासूम की इज्जत पर कोई भी हाथ डाल दे उस देवता को नहीं मानता मैं. और आज के बाद कोई मानेगा भी नहीं .

खड़े होते हुए मैंने उनमे से एक लड़के को धक्का दिया वो थोडा दूर हो गया और अपने आप को संभालते हुए, मैंने एक की गर्दन मरोड़ दी. पल भर में ही वो धरती पर गिर गया उसके प्राण साथ छोड़ गए उसका. झुकते हुए मैंने वो फरसा उठा लिया और एक और लड़के की पीठ पर वार किया वो चीख पड़ा. ये फरसा मेरे हाथ में होना एक मौका था जिसे मैं चूक नाही सकता था .मैंने बिना सोचे की कहाँ कहाँ लग रही है उसके, वार करने चालु किये और जैसे कसाई किसी बकरे को काटता है वैसे ही उसके टुकड़े करने शुरू कर दिए. मैं पूरी तरह खून में सन गया था .

उनमे से एक लड़का भाग गया और एक के कंधे पर पहले फरसा लगा था वो एक तरफ पड़ा था . रह गए मैं और जोरावर. मैंने फरसा साइड में फेंक दिया.

“आ जोरावर, तुझे मारने के लिए मुझे हथियार की जरुरत नहीं , ” मैंने चीखते हुए कहा . एक बार फिर हम दोनों गुत्थमगुत्था हो गए. उसने मेरे सर पर मारा और एक घूँसा मेरी पसली पर जहाँ चक्कू था . मैं दोहरा हो गया . पर यही तो मजा था इस खेल का , खून का नशा क्या होता है उस ढलती शाम को जाना था मैंने . आसमान में बादल कडकने लगे थे . सूरज को अपनी ओट में ले लिया था बादलो ने . कभी वो मुझ पर भारी कभी मैं उस पर . उसने मुझे घुटने पर मारा पर मैं एक पल झुका और तुरंत ही उसे अपने कंधो पर उठाते हुए दूर फेंक दिया. वो पत्थर की सीढियों पर जाकर गिरा. और मैंने उसके सर को सीढ़ी के कोने पर दे मारा . वो डकारा मैंने उसकी बाहं को पीछे किया, कड़क की आवाज आई और जोरावर की चीख गूंजने लगी.

“इसी हाथ से तूने मेरी रीना की चुन्नी को उतारा था न , मैं इस हाथ को ही उखाड़ दूंगा. ” मैंने कहा और अपना पैर उसकी बगल पर लगते हुए पूरा जोर लगा कर बाहं उखाड़ दी उसकी. हलाल होते बकरे की तरह मिमियाने लगा जोरावर और उसकी चीख ने जो मुझे सकूं दिया था न मैं लिख नहीं सकता .

“रीना, इधर आ. ” मैंने रीना को बुलाया.

“इसी हाथ से इसने तेरा आंचल खींचा था मैंने ये हाथ ही उखाड़ दिया रीना ” मैंने कहा

रीना- घर चल मनीष, घर चल

मैं- चलेंगे , पर अभी नहीं अभी तो जोरावर को ये देखना है की मौत कैसी होती है .

रीना- छोड़ दे इसे, तेरी हालत ठीक नहीं है ,

मैं- किसे परवाह है ,

रीना- मैंने माफ़ किया इसे ,

मैं - पर मैंने नहीं .

मैंने जोरावर की दूसरी बाहं पकड़ी और उसे घिसटते हुए देवता की तरफ ले चला.

“तेरे कमजोर देवता को भी तो मालूम हो की अभी इस दुनिया में ऐसे लोग भी है जिन्हें उसके रहमो कर्म की जरुरत नहीं अगर देवता के आँगन में ही ये पाप होने लगे तो मैं उस आँगन को ही मिटा दूंगा ” जोरावर के बदन से रिश्ते खून से फर्श लाल होने लगा था .

“आखिरी बार देख ले इस दुनिया को इस देवता को ” मैंने कहा और जोरावर की आँख फोड़ दी. उसकी चीखे गूंजने लगी . जितना वो चीखता उतना उन्माद मुझ पर छाता .

“अर्जुन के लड़के छोड़ दे जोरावर को ” पीछे से किसे ने कहा

मैंने पलट कर देखा , दद्दा ठाकुर और उसके पीछे न जाने कितने लोग खड़े थे .

मैं- तेरी गांड में दम है तो छुड़ा ले इसे.

ददा- मुझे मजबूर मत कर. तूने शिवाले में खून बहा कर अनर्थ किया है .

मैं- अनर्थ तो तू देखेगा अभी .

दो चार गाँव वाले मेरी तरफ भागे. मैंने तुरंत वो फरसा उठा लिया और जोरावर की पीठ पर वार किया. वो लोग रुक गए .

“आज चाहे सरे रुद्रपुर में आग लगानी पड़े, लाशो के ढेर लग जाये, जोरावर को तो मारूंगा ही मारूंगा और जो कोई भी मादरचोद बीच में आया वो भी मरेगा. ” मैंने कहा .

दद्दा- मेरा सबर टूट रहा है

मैं- माँ की चूत तेरी और तेरे सबर की .

वो कहते है न की कभी कभी इंसान जोस में होश खो देता है मेरी जिन्दगी में ये वो लम्हा था , मैंने दद्दा के अहंकार को चोट मार दी थी . पल भर में स्तिथिया बदल गयी थी . मैं अकेला और वो नजाने कितने पर मैने भी सोच लिया था मरना है तो सबको साथ लेकर मरेंगे. एक हाथ से मैं उनसे टक्कर ले रहा था दुसरे से जोरावर को थामा हुआ था , उसे छोड़ देता तो हमारी इज्जत क्या रह जाती.

मेरे वार उन पर हो रहे थे , उनके घाव मुझ पर , बदन से न जाने कहाँ कहाँ से खून बह रहा था , हालत ये थी की या तो मर जाऊ या मार दू. मैं जोरावर को तदपा तडपा कर मारना चाहता था और ये मुमकिन होता नहीं लग रहा था तो मैंने पुरे जोर से उसकी गर्दन पर वार किया और उसकी गर्दन फर्श पर लुढ़क गयी . एक पल के लिए सब कुछ जैसे जाम हो गया .

“जिसे जोरावर चाहिए था वो इस सर को ले जाये ” मैंने कहा

ददा- तुझे ये नहीं करना था, नहीं करना था

दद्दा ने तलवार मेरी तरफ फेंकी जो सीधा मेरी जांघ में घुस गयी. और वो सब लोग टूट पड़े मुझ पर . मेरी आँखे खुल नहीं रही थी , आंसू और खून से भीगी थी वो . हर जगह मुझे अँधेरा अंधेरा ही दिख रहा था . तभी किसी ने मुझे पकड़ा और घसीट कर ले गया .

“तुझे क्या लगा था तू जिन्दा यहाँ से चला जायेगा , अब तू भी देख मौत कैसी होती है ” ददा ने मुझे खड़ा करते हुए कहा.

“मौत तो आणि जानी है दद्दा ठाकुर, पर मैं ऐसे नहीं मरूँगा ,”मैंने कहा .

ददा ने मुझे लात मारी मैं दूर जाकर गिरा. मैंने हाथ में तलवार लेकर आते देखा उसे मेरी तरफ ............. पर तभी धांय धांय गोलियों की आवाजे आने लगी और सब लोग एक तरफ हो गए.

“बस ददा बहुत हुआ, अब किसी ने भी अगर इसकी तरफ आँख भी उठाई तो मैं मारूंगी दस गिनुंगी एक , ” डूबती आँखों से मैंने देखा वो चाची थी जो हाथो में बन्दूक लिए मेरी तरफ चली आ रही थी .

“तो तू भी आ गयी , ”ददा ने चाची की तरफ देखते हुए कहा

चाची- कसम खाके गयी थी की मरना मंजूर है पर रुद्रपुर में पैर नहीं रखूंगी, मुझे कसम तोड़ने पर मजबूर होना पड़ा. और ये लड़का जो वहां पड़ा है मेरा बेटा है , बेटे पर आंच आई तो माँ को तो आना पड़ेगा न , और माँ का कलेजा फटा न तो फिर ये गाँव क्या माँ दुनिया जला दे. किसी की भी नसों में ये गुमान जोर खा रहा हो की वो मनीष को नुक्सान पहुंचा देगा , मेरे सामने आये .

ऐसी ख़ामोशी छाई थी वहां पर जैसे कोई हो ही न, आसमान से बूंदे बरसने लगी थी . बरसात की बूंदों ने मेरे चेहरे को धोया तो मैंने साफ साफ देखा .

ददा- गलती कर रही है तू संध्या , तू पहले भी गलत थी तू आज भी गलत है .

चाची- मुझे तब भी फक्र था आज भी फक्र है

ददा- काश तू मेरी बेटी न होती

चाची- मैं तेरी बेटी कभी नहीं थी .....

चाची मेरे पास आई उसने रीना से मुझे उठाने को कहा और मुझे वहां से ले चली. मेरी आंखो में आंसू थे, रीना की आँखों में आंसू थे, आसमान रो रहा था .



“सोलह साल पहले आसमान भी रोया था , ” मेरे कानो में उस काबिले वाले बाबा के शब्द गूँज रहे थे . .....................
 
डियर मून लाइट,

मनीष के नसीब की आजमाइश शुरू हो गई है इस अपडेट के साथ ही, ये जो कांड हुआ है अब कहानी को ऐसे ही मोड़ पर लेके जाएगा जहां से सब बदल जाएगा

मीता ने कहा था, तुम्हारे हाथ की लकीरों मे कुछ नहीं सिवाय दुख के

मैं जो कुछ भी लिखता हूँ केवल आप पाठक लोगों के लिए आपका साथ ही है जो मुझ को प्रेरित कर्ता है
 
#38



बरसात की बूंदों से लिपटे मेरे खून को प्यासी धरती अपने होंठो से लगा कर पी रही थी . मेरी बाहं को थामे चाची मुझे अपने साथ लेकर शिवाले से बाहर आई . पर कुछ तो था जो मेरे कदमो को रोक रहा था, ऐसा क्या था मेरा उस जगह पर जो मेरे पैर उसे छोड़ने को तैयार नहीं थे. मैंने अपना हाथ झटका चाची के हाथ से .

“हॉस्पिटल लेके चल रहे है तुझे ” चाची ने कहा .

मैं- तुम जाओ.

चाची- तुम्हे लेके जाउंगी, हालत देखो अपनी, तुंरत चिकित्सा की जरुरत है तुम्हे.

मैं- मैंने कहा न तुम जाओ. रीना को ले जाओ अपने साथ . उसकी सुरक्षा जरुरी है .

चाची- सुरक्षित है वो . और तुम भी

मेरा बदन टूट रहा था , बेहोशी छा रही थी, मैं अपने अंतर्मन से लड़ रहा था . मैं वही एक दुकान के पाइप का सहारा लेकर बैठ गया .

रीना मेरे पास आई- मनीष, घर चल, मेरा कहा मान , घर चल मेरे लिए चल , तेरी हालत ठीक नहीं है , डॉक्टर के पास चल, तुझे कुछ हुआ ना तो फिर देखना

मैंने उसका हाथ पकड़ा और काह- चल चलते है, सहारा दे जरा

उसने मेरा हाथ पकड़ा और अपनी तरफ खींचा जैसे ही उसकी बाँहों का सहारा मिला फिर और कुछ याद नहीं रहा . क्या हुआ क्या नहीं कुछ खबर नहीं . बाहें फैलाये अँधेरा तैयार खड़ा था मुझे अपने आगोश में पनाह देने को . पर इस साले दिल ने भी जिद की हुई थी .

इक तरफ आसमान बरस रहा था एक तरफ दिल जल रहा था . मैं न जाने क्या कर देना चाहता था . पर हालात मेरे बस में नहीं थे, मुझे रीना की , चाची की आवाजे सुन तो रही थी पर वो क्या कह रहे थे क्या मालूम. मैं डूब रहा था ,

जब मुझे होश आया तो मैंने खुद को बिस्तर पर पाया. मेरे बदन को पट्टियों ने ढक रखा था , सर में दर्द सा था , हथेलियों ने नलकिया लगी थी . कमरे में पीला बल्ब जल रहा था , शायद ये रात का वक्त था . मैंने इधर उधर नजरे घुमाई , पास में एक दो बेड खाली थे, मैं किसी हॉस्पिटल में था . आसपास कोई दिख नहीं रहा था , मैंने उठने की कोशिश की पर शरीर साथ नहीं दे रहा था .

थोड़ी मेहनत करके मैं बैठा हुआ. हाथ से नलकी निकाली और अपने पैरो को निचे फर्श पर रखा. गैलरी में आकर देखा की बाहर बरसात हो रही थी . मैं वहीँ पर एक बेंच पर बैठ गया और बारिश देखने लगा. रात की बरसात का भी अपना ही सुख होता है , गीली मिटटी की सौंधी खुसबू मेरे मन को महका रही थी .

“ये बरसाते भी न ” उसनें मेरे पास बैठते हुए कहा.

मीता को देखते ही मैं खुश हो गया.

“तुम ” मैंने कहा

“और कौन होगा भला ” उसने चाय की चुस्की लेते हुए कहा .

मैं मुस्कुरा दिया.

मीता- इतना बड़ा काण्ड करके मुस्कुरा रहे हो. और क्या जरुरत थी वो सब करने की अभी हालत देखो खुद की जानते हो कितनी मुश्किल से जान बची है तुम्हारी. मैं बहुत नाराज हूँ तुमसे

मैं- तेरी नाराजगी सर आँखों पर .

मीता- जब मुझे मालूम हुआ तो दिल धक् से रह गया , तुम्हे कुछ हो जाता तो .

मैं- जब तू साथ है तो मुझे क्या हो सकता है

मीता- दिल करता है एक थप्पड़ लगाऊ तुझे, जिन्दगी है ये , कोई फिल्म नहीं जो तू बहला देगा मुझे.

मैं- थोड़ी चाय दे मुझे

मीता- रुक मैं लाती हूँ

मैं- ये कप ही दे दे, ऐसा लगता है की बरसो से कुछ खाया पिया नहीं है .

मीता- झूठा है ये कप मेरा

“क्या झूठा , क्या तेरा मेरा ” मैंने उसके हाथ से कप लेते हुए कहा .

वो बस मुझे देखती रही .

मैंने चाय की चुस्की ली.

“बरसात रुकते ही घर चलेंगे.” मैंने कहा

मीता- पागल हुआ है क्या चोदह दिन में तो आज आँखे खोली है , और होस आते ही ये चुतियापे चालू.

मैं- इतने दिन बीते

मीता- और नहीं तो क्या जब तक तू पूरी तरह ठीक नहीं हो जाता इधर ही रहेगा. तू आराम कर मैं जरा मंदिर होकर आती हूँ, मन्नत मांगी थी तेरे होश में आते ही परसाद चढाने जाउंगी.

मैं- इतनी बरसात में कहाँ जायेगी, और फिर ये काम कल भी तो हो सकता है .

मीता- इस बरसात का क्या, कौन जाने कब थमेगी .ये जरुरी है क्या पता कल कोई दुआ कबूल हो न हो.

मैं- ठीक है , पर ये बता फिर कब मिलेगी.

मीता- तू हर बार ये बात क्यों पूछता है ,

मैं- ठीक है नहीं पूछता.

तभी मैंने सामने से ताई को आते देखा, उसके हाथ में कुछ पैकेट थे. उसने जैसे ही मुझे बैठे देखा लगभग दौड़ ही पड़ी हो . बस मुझे देखती रही वो कुछ न बोली, उसकी आँखों में पानी था.

मीता- ताईजी आप ही संभालो इसे, मैं चलती हूँ

“खाना लाई हूँ खाकर जाना बेटी ” ताई ने कहा

मीता- अभी मंदिर जाना है बाकि काम बाद में .

मीता के जाने के बाद ताई मेरे पास बैठ गयी .

मैं- नाराज है क्या .

ताई-मुझे क्यों नाराजगी होगी, तू अपनी मर्जी का मालिक है तुझे जो करना है वो करके ही रहेगा.

मैं- समझता हूँ तेरे जज्बातों को पर जो हुआ उसमे मेरा दोष नहीं

ताई- छोड़ उस बात को , आराम कर, बेड पर चल, ऐसे क्यों उठा तू और वो हरामजादी नर्स कहाँ गयी , तुझे अकेला छोड़ के उसकी खबर लेती हूँ मैं .

मैं- शांत हो जा. मेरे सर पर तेरा आँचल है , तबियत का क्या है आज नहीं तो कल ठीक हो ही जानी है .

ताई- पर जो हुआ वो नहीं होना चाहिए था . अगर संध्या ठीक समय पर नहीं पहुँचती तो न जाने क्या अनर्थ हो जाता.

मैं- मेरी जान इतनी सस्ती नहीं की कोई ऐरा गैर ले ले.

ताई- पूरा गाँव था वहां पर, गाँव के आगे किसका जोर चलता है

मैं- चाची का जोर तो चला न

ताई- तू आराम कर. मैं डॉक्टर को बुला कर लाती हूँ

मैं- बात को मत बदलो. मुझे मालूम हो गया है की चाची दादा ठाकुर की बेटी है .

ताई- इस बात से कुछ खास फर्क नहीं पड़ता. फर्क पड़ता है इस बात से की तूने दुश्मनी की आग भड़का दी है . दोनों गाँवो में एक दुसरे के यहाँ आने जाने की मनाही हो गयी है , तेरी इस हरकत का खामियाजा दोनों तरफ के लोग भुगतेंगे.

मैं- कैसी मनाही मीता तो अभी थी ही न इधर.

ताई- छुप कर आती है वो. मैंने मना किया उसे पर वो भी तेरी ही साथी है , तू सुने तो वो सुने. तेरे साथ साथ उसकी फ़िक्र भी होने लगी है मुझे अब.

मैं- रीना कैसी है

ताई- ठीक है, उस दिन से गुमसुम सी रहती है , उसकी हंसी न जाने कहाँ खो गयी है .

मैं- कल लाना तू साथ उसे.

ताई- रोज ही आती है वो .

मैं- उसकी सुरक्षा का इंतजाम करो

ताई- मैंने कर दिया है पहले ही .

हम दोनों बात कर ही रहे थे की तभी मुझे ऐसा लगा की थोड़ी दूर एक शक्श कम्बल ओढ़े खड़ा हमें ही घुर रहा हो. हो सकता था की ये मेरा वहम हो. पर इस मौसम में कम्बल ओढना थोडा अजीब था. एक पल को मेरी आँखे उसकी आँखों से मिली और वो दूसरी तरफ मुड कर जाने लगा. मेरा शक यकीन में बदल गया .



“कम्बल वाले रुक जरा ” मैंने कहा और उसकी तरफ भागा पर मैं ये भूल गया था की............................................
 
#39



पर मैं ये भूल गया था की अभी मेरी हालत ठीक नहीं है , ये तो शुक्र है की ताई ने वक्त पर थाम लिया मुझे वर्ना और चोट लग जानी थी .

“क्या कर रहा है तू, ” ताई ने मुझे डांटा और वापिस बेड पर ला पटका. ताई के तानो से ज्यादा मेरा ध्यान उस आदमी पर था , वो भागा क्यों. रात भर मैं ये ही सोचता रहा .

सुबह नर्स पट्टी बदलने आई तो मुझे मालूम हुआ की सर पर बारह टाँके आये थे और पसलियों को बहुत जायदा नुक्सान हुआ था , जिसकी भरपाई ना जाने कब तक होगी, होगी या नहीं होगी. मैं रीना का इंतज़ार करता रहा पर वो आई नहीं, शाम होने को आई थी , मीता भी नहीं आई. कुछ दिन ऐसे ही बीते , हालत में थोडा सुधार महसूस होने लगा था . इस बीच मैंने नोटिस किया की चाची मुझे देखने नहीं आई थी , सिर्फ ताई ही थी जो दिन रात मेरे पास रहती थी . मैं रीना के बारे में पूछता पर वो ये ही कहती की वो ठीक है , जल्दी ही आयेगी.

मैं बस बरसते सावन को देखता रहता था, मैंने सोचा तो था की इस बार का सावन अनोखा होगा, जिसमे मोहब्बत की बारिश होगी और भेगेंगे मैं और रीना . बेशक मेरी हालत ठीक नहीं थी पर अब मुझे कोफ़्त होने लगी थी इस हॉस्पिटल के कमरे से . और एक ऐसी ही रात, मैंने पाया की ताई गहरी नींद में पड़ी थी, पास की कुर्सी पर चाचा ऊंघ रहा था. मैं हौले से उठा और दोनों को चेक किया. मैंने टेबल से चाचा की गाड़ी की चाबी उठाई और धीरे धीरे कमरे से बाहर खिसक गया. भोर का समय नजदीक था पर बारिश घनघोर थी .

कमजोर कदमो से चलते हुए मैं खुद को बारिश से बचाते हुए मैं चाचा की गाड़ी तक आया और उसे उड़ा ले चला. मैं बस उस चेहरे का दीदार करना चाहता था जिसके बिना मैं कुछ नहीं था . भोर की पहली किरण और चमकती बरसात अपने आप में गजब ढा रही थी . मैंने गाड़ी रोकी , और सर पर हाथ रखते हुए , मनदिर की सीढिया चढ़ने लगा.

बाबा के आगे दिया जलाये , शांत बैठी थी वो. इतनी शांत की दिल किया ये वक्त थम जाये उसके और मेरे लिए. अम्रता प्रीतम ने कहा था की उसे देखा ऐसा जैसे कोई मजदुर के हाथ में उसकी रोज़ी रख दे. मेरा हाल भी कुछ वैसा ही था .

“कैसी है ,मेरी सरकार ” मैंने हौले से उसे पुकारा.

आहिस्ता से उसने अपनी आँखे खोली. नजरो से नजरे मिली. उसकी आँखों से जो आंसू टपके वो धरती पर नहीं सीधा मेरे कलेजे पर आकर गिरे.

“आ गया मैं ” मैंने उस से कहा.

वो मरजानी कुछ नहीं बोली, बस आकार चुपचाप मेरे सीने से लग गई. मेरे माथे पर चुम्बन अंकित किया उसने.

“बस कर, ये आंसू बड़े कीमती है इन्हें मुझ जैसे के लिए बर्बाद मत कर.” मैंने उस से कहा.

रीना- मेरा सब कुछ तुझसे है . तेरे बिना ये दिन कैसे बीते है मुझ पर मैं जानती हूँ या मेरा रब जानता है.

मैं- और मेरा क्या, कितना इंतज़ार किया था तेरा मैंने .

रीना- संध्या मामी ने मना किया था हॉस्पिटल आने को, बोली की तुझे उस हालत में देख नहीं पाउंगी. और मेरे दिल पर भी बोझ था

मैं-कैसा बोझ

रीना- सब मेरी गलती है , मैं वहां नहीं जाती तो ये सब होता ही नहीं

मैं- तेरी कोई गलती नहीं थी उसमे, तू मेरा मान है , मेरे होते किसकी मजाल जो आँख भी उठा सके मेरी सरकार की तरफ

रीना- तुझे कुछ हो जाता तो.

मैं- कुछ हुआ तो नहीं न . थोड़ी बहुत चोट है देर सबेर ठीक हो ही जानी है . और अब से तू अकेले कहीं नहीं आयेगी-जाएगी तेरी सुरक्षा की व्यवस्था मैं जल्दी ही करूँगा.

रीना- उस दिन के बाद से हमेशा कोई न कोई होता है मेरे साथ .

मैं- पर अभी तू अकेली ही थी न यहाँ पर

रीना- अभी नहीं हूँ अकेली.

मैंने देखा दिन निकल आया था बारिश थोड़ी मंद पड़ने लगी थी . मैंने रीना को साथ लिया और घर आ गए. चाची ने मुझे देखा और खूब गुस्सा किया, उसके अनुसार मुझे हॉस्पिटल से ऐसे ही नहीं आना चाहिए था . मैं सुनता रहा उसकी .

“चाची तुमने कभी बताया नहीं तुम दद्दा ठाकुर की बेटी हो ” मैंने कहा

चाची- हर कोई किसी न किसी की बेटी होती ही हैं ये कोई विशेष बात नहीं

मैं- मुझे तुमसे कुछ बात करनी है

चाची ने एक नजर रीना की तरफ डाली और बोली- अभी नहीं , तुम लोग बैठो, मैं मिलती हूँ बाद में .

उसका यूँ जाना मुझे ठीक नहीं लगा. मैं बिस्तर पर लेट गया . रीना मेरे पास बैठ गयी .

मैं- बोल कुछ ऐसे खामोश क्यों है.

रीना- आजकल ख़ामोशी से दोस्ती सी हो गई है मेरी .

मैं- कहा न तुझसे, उस बात का मलाल मत रख , तुझसे किसी ने कुछ कहा क्या

रीना- नहीं, पर लोगो की नजरे सवाल करती है मुझ से

मैं- लोगो को मैं देख लूँगा.

रीना- मुझे बस तुम्हारी फ़िक्र है .

मैं- और मुझे तेरी . प्यास सी लगी है थोडा पानी पिला जरा

रीना उठी और झुक कर मटके से पानी भरने लगी तभी मेरी नजर उसके गले पर पड़ी, और मैं हैरान रह गया . उसके गले में वो ही हीरे वाला थागा था . हीरे का रंग उसके गेहुंगे रंग में जैसे घुल सा गया था . लाल-काले डोरे में गूंथा हुआ हीरा रीना के गले में बड़ा प्यारा लग रहा था.

“पानी ” उसने कहा .

मैंने उसके हाथ से गिलास लिया और घूँट भरे.

रीना- ऐसे क्या देख रहा है .

मैं- ये डोरा अच्छा लग रहा है तुझ पर

रीना- तेरी निशानी, उस दिन बेहोश होने से पहले तूने ही तो इसे मेरे हाथ पर रखा था . रुक अभी उतार कर देती हूँ तुझे

मैं- नहीं रे, पहने रख जंच रहा है तुझ पर .

तभी रीना को किसी ने बाहर से आवाज दी और वो चली गयी . पर मेरे लिए सवाल छोड़ गयी. जिस डोरे को मैं नहीं पहन पाया. उसे बड़ी आसानी से अपने गले में सजा रखा था रीना ने, मेरी आँखों के सामने उस कागज़ पर लिखे शब्द घूम रहे थे जिस पर लिखा था , इसका बोझ उठाना बड़ा मुश्किल है .



पर जो मेरे लिए मुश्किल था वो रीना के लिए आसान कैसे . सोचते सोचते कुछ देर के लिए मेरी आँखे बंद हो गयी.
 
#40



आँख खुली तो दोपहर बाद का समय था ,मैं कमरे से बाहर आया तो देखा की ताई और चाचा भी आ चुके थे , पर उन्होंने मुझे कुछ भी नहीं बोला. शायद चाची ने उन्हें मना किया हो. पर मुझे चैन नहीं था , उस हीरे की गुत्थी ने मुझे जैसे पागल कर दिया था चाची ने मेरी बात को पकड़ लिया और पूछा- क्या परेशानी है तुम्हे

मैं- तुमसे बात करनी है

चाची- मेरे पास तुम्हारे सावालो के जवाब नहीं है

मैं- तो ठीक है फिर, मैं अपने जवाब तलाश कर ही लूँगा.

चाची- ये तेरी जिद है न , तुझे ले डूबेगी एक दिन

मैं- क्या फर्क पड़ता है .तुम दद्दा ठाकुर की बेटी हो तुम छिपा सकती हो , तो मैं भी अपनी जिद संग रह लूँगा

चाची- पुरे गाँव को मालूम है मैं दद्दा ठाकुर की बेटी हूँ अब तुझे ही नहीं मालूम तो मेरा दोष नहीं. और अब ये बीती बात हुई मुझे रुद्रपुर छोड़े एक जमाना हुआ.

मैं- क्यों छोड़ा आपने रुद्रपुर

चाची- कभी कभी मुझे लगता है सारे चूतिये मेरी ही तक़दीर में है, मेरी शादी हुई थी तेरे चाचा से तो रुद्रपुर छोड़ना ही था मुझे .

मैं- मेरी दिलचस्पी उस राज में है की आखिर क्या वो बात थी जिसके कारन मेरे पिता ने वो काण्ड किया.

चाची- तेरी क्या मज़बूरी थी जो तूने जोरावर को मारा, हर दिन कोई न कोई लड़की कहीं न कहीं तो छिड ही रही होती है न. हर कोई जिसे भी मौका मिलता है वो औरत को मसलने के लिए तैयार ही होता है न . इसमें कोई नयी बात नहीं है . और मेरी एक बात को अच्छे से समझ ले कुछ चीजे बस हो जाती है , उन पर किसी का जोर नहीं होता. और गड़े मुर्दे उखाड़ने से कुछ नहीं मिलता सिवाय सड़ांध के

मैं- तुम मेरे पिता के बारे में कुछ जानती थी न

चाची- सारी दुनिया जानती थी जेठ जी के बारे में

मैं- क्या उन्होंने तुमसे ऐसा कुछ कहा था जो तुम्हे ठीक नहीं लगा हो

चाची- हां,

मैं- क्या बताओ मुझे

चाची- यही की मेरा लड़का बड़ा होकर चुतिया बनेगा , तुम्हे इसका चुतियापा ठीक करना है .

मैंने गुस्से से घूरा चाची को .

चाची- और क्या कहूँ फिर , मान ले तुझे अगर मालूम भी हो गया की जेठ जी ने उन लोगो की हत्या क्यों की थी तो तू क्या कर लेगा, क्या तू उन परिवारों के दुखो पर मरहम लगा पायेगा. नहीं, न . बल्कि तूने तो और गहरी खाई खोद दी.

मैं- जोरावर ने रीना पर हाथ डाला था .

चाची- तो क्या दुनिया में एक ही रीना है , और किसी की बहन -बेटी भी रीना जैसी ही होंगी न उनके लिए. क्या मालूम जेठ जी ने भी रुद्रपुर में कोई ओछी हरकत की हो.

मैं- ये नहीं हो सकता

चाची- क्यों नहीं हो सकता, दुनिया भर के मर्दों के पायजामे की गांठे बड़ी कच्ची होती है , तराजू को बराबरी पर लाकर देख दुनिया को . ये दुनिया वैसी नहीं जैसी हम सोचते है .

मैं- मेरे पिता ऐसे नहीं हो सकते

चाची- क्यों नहीं हो सकते,

मैं- क्योंकि मैं कह रहा हूँ

चाची- और कौन है तू. मुझे हैरानी होती है किस घमंड में जी रहा है तू, तेरी खाल उतार लेनी थी दद्दा ठाकुर ने, अगर मैं वहां नहीं पहुँचती तो . बित्ते भर का छोकरा गाँव से पंगा लेगा. अरे देख खुद को , क्या औकात है तेरी , जब देखो अर्जुन का बेटा अर्जुन का बेटा. कोई महानता की बात नहीं है ये, वैसे भी लोग जो अपने बाप का नाम साथ लेकर जीते है कुछ खास कर नहीं पाते जिन्दगी में, तेरे चाचा को ही देख ले. तू मनीष है, मनीष बन कर जी .

चाची की बाते मुझे बड़ी गहरी चोट पहुंचा रही थी .

चाची- मैं तेरी दुश्मन नहीं हूँ, तू चाहे जो भी सोच मेरे बारे में, तुझे कठोरता से पालना मेरी जरुरत थी ताकि तू एक मजबूत इन्सान बने, तू हर उस चीज़ का मोल समझे जो तेरे पास है . बेशक तुझे जनम नहीं दिया पर मेरा खुदा जानता है मेरी ममता की असलियत, इसलिए तुझे बार बार कहती हूँ की गड़े मुर्दे मत उखाड़, आने वाले कल के उजाले को देख.

चाची ने अपना स्टैंड क्लियर कर दिया था . पर मेरे दिमाग में कुछ और ही चल रहा था . न जाने क्यों मेरा मन कह रहा था की चाची पर विशवास करना गलती होगी. ऐसे ही उधेड़बुन में थोडा वक्त और बीता, हर शाम, दोपहर मैं रीना के साथ होता. मेरी हालत में भी काफी सुधार था ज़ख्म भरने लगे थे बस पसलियों को छोड़कर.

इस बीच मीता एक बार भी नहीं आई थी मुझसे मिलने. या शायद उसने घर पर आना उचित नहीं समझा था . पर ऐसी ही तो थी वो अपनी मर्ज़ी की मालिक. हवा के झोंके सी . मैं बार बार रीना के गले में झूलते उस हीरे को देखता , जैसे वो मुझे चिढ़ा रहा हो. इस बीच मुझे उस जमीन का ध्यान आया जिस पर मैं फसल उगाना चाहता था . यही सोच कर मैं उस दोपहर को जमीन की तरफ निकल गया .

बारिस के कारण कीचड फैला हुआ था .गाड़ी से उतरने के बाद मैं आराम से चलते हुए जमीन पर पहुंचा, देखा की वहां पर एक कमरा और बनवा दिया गया था , शायद ये ताई का काम था . ठंडी हवा चल रही थी जिस से गीली मिटटी की खुशबु दूर दूर तक फैली हुई थी . मेरा दिल तो कर रहा था की अभी के अभी रुद्रपुर जाकर मीता से मिल लू. पर फिलहाल इस ख्याल को टाल देना ही ठीक था.घूमते घूमते मैं बावड़ी पर गया . जो पानी से लबालब भरी थी .

मैंने कपडे उतारे और बावड़ी में घुस गया. इतना शीतल अहसास मुझे बरसो बाद ही मिला हो शायद. मैंने दूर झाड़ियो के बीच से मीता को आते हुए देखा.हमेशा के जैसे बगल में झोला टाँके. उसने भी मुझे देख लिया था , चाल में आई तेजी ने बता दिया था मुझे. कुछ ही देर में वो बावड़ी पर थी.

मैं- कितने दिन हुए , तू आई नहीं मिलने.

मीता- अभी आई तो सही.

मैं- घर पर आ सकती थी न

मीता- वैसे ही नहीं आई

मैं- किसी ने कुछ कहा क्या तुझसे

मीता- नहीं तो , ऐसी बात होती तो मै यहाँ रोज थोड़ी न आती .

मैं- रोज़

मीता- यहाँ आकर ऐसा लगता है की जैसे तुझसे मिल लिया हो.थोड़ी बाते तेरी ताई से कर जाती हूँ . जी लगा रहता है.

मैं- कम से कम ताई ही बता देती मुझे.

मीता- मैंने ही मना किया था क्योंकि फिर तू रोज़ यहाँ आने की जिद करता, मैं चाहती थी की पहले तू ठीक हो जाये.

मैं- इतनी फ़िक्र किसलिए

मीता- दोस्ती की है, निभानी तो पड़ेगी न. और तू भी निकल पानी से , जखम अभी भरे नहीं है और हरकते देखो

मैं- तू भी आजा पानी में , पानी में आग लग जाएगी

मीता- कहीं और न लग जाए आग.

मैं- आजा न

मीता- फिर कभी , चाय बनाती हु आजा तब तक.

जब तक मैं पहुंचा मीता ने चूल्हा सिलगा लिया था . मैंने चारपाई बाहर निकाल ली

मैं- तू कहे तो इधर तार बंदी करवा दू.

मीता- खेत-खलिहान खुले ही ठीक लगते है , और फिर हमें भला किसका डर

मैं- बस सुरक्षा के लिए

मीता- जो होना है वो होकर ही रहेगा, नसीब में लिखे को कौन टाल सकता है , और फिर तू साथ है तो कोई फ़िक्र कैसे हो सकती है.

मैं- सो तो है

उसने चाय दी मुझे और बगल में आकर बैठ गयी.उसके बदन की खुशबु मुझे अच्छी लग रही थी .

मैं- मुझे लगता है की संध्या चाची कुछ न कुछ छिपा रही है मुझसे

मीता- क्या भला

मैंने मीता को अपने मन की बात बताई.

मीता- ठीक ही तो कहती है, गड़े मुर्दे उखाड़ने से क्या फायदा.

मैं- मीता मुझे तेरी मदद चाहिए. मैं जानता हूँ की तुझे खाली सितारे पढने ही नहीं आते, बल्कि और कुछ भी आता है . मेरी एक मुश्किल आसान कर दे

मीता- क्या

मैं- ऐसा क्या बोझ हो जिसे हम अंगूठी, चेन , पायजेब आदि में रख सके.

मीता- क्या बोला तू

मैंने अपने शब्द फिर से दोहराए.

मीता- बात समझ नही आई पर तूने कही है तो गहरी ही होगी.

मैं- क्या संध्या चाची की वजह से हमारे परिवारों में दुश्मनी हुई थी

मीता- नहीं रे, बल्कि शादी तो बड़ी धूमधाम से हुई थी ऐसा सुना मैंने .पर एक बात और सुनी थी मैंने



मैं- क्या. ..................................
 
#41



“क्या सुना था तूने ” मैंने कहा

मीता- यही की संध्या इस शादी से खुश नहीं थी , शादी के बाद फिर कभी वो रुद्रपुर नहीं गई .

मेरे मन में वो ख्याल आया जब चाची चाचा से कह रही थी की तुमसे होता ही नहीं, शायद इसी बात से वो खुश नहीं थी

मीता- कहाँ खो गए.

मैं- कोई तो डोर है जिससे ये सब लोग बंधे है बस वो डोर मुझे दिखाई नहीं दे रही .

मीता- लगता है मेह फिर आएगा. मुझे चलना चाहिए, इस बार सावन बड़ा तेज बरस रहा है

मैं- ऐसे कैसे जाएगी. एक बारिश भी तेरे साथ देखि नही मैंने. ठहर जरा, बरसने दे इस घटा को .

मीता- तू ऐसा कैसे है

मैं- ऐसा कैसे

मीता- मतलब इतना सरल कैसे हो सकता है कोई

मैं- छोड़ न तू भी क्या, ये बता रुद्रपुर में क्या चल रहा है

मीता- शांत है , सन्नाटा पसरा है फिज़ाओ में और यही सन्नाटा सच कहूँ तो खाए जा रहा है , जैसे कह रहा हो की कोई तूफ़ान आने को है .

मैं- जानता हूँ , जो हुआ नहीं होना चाहिए था

मीता- उस लड़की को इतना चाहता है न तू

मैं - नहीं रे, बस दोस्त है वो मेरी बचपन से, जब कोई नहीं था मेरे साथ वो थी .

मीता- मुझसे झूठ बोल सकता है तू खुद से नहीं , इतना जूनून , कोई इस हद तक आ जाये की अपनी सांसो की परवाह भी नहीं करे, ये तो प्यारे बस इश्क में ही हो सकता है .

मैं- तूने ही तो कहा था मेरे हाथ की लकीरों में कुछ नहीं सिवाय बर्बादी के तो फिर मोहब्बत कैसे होगी.

मीता- मोहब्बत अपना रस्ता खुद तय कर लेती है . नियति ने तेरी तक़दीर में सुख का पन्ना भी लिखा होगा.

मैं- नियति ने मुझे तुझसे भी तो मिलाया है न

मीता- तेरे मेरे रिश्ते में एक शर्त है दोस्ती की . हमने एक रेखा खींची है

मैं- नियति अगर उस रेखा को नहीं माने तो

मीता- मुझे पाना ऐसा है जैसे की एक मुट्ठी रेत को हथेली पर रख कर फूंक मार देना. और अगर तेरी बात मान भी लू तो एक दिन आयेगा जब तुझे चुनाव करना होगा. तब क्या करेगा तू. मुझे तेरे और उस लड़की के रिश्ते से कोई परेशानी नहीं है क्योंकि तुझ पर पहला हक़ उसका है . और मैं बंधी हूँ अपनी हदों के दायरे में . पर मैं तुझसे इतना कहूँगी की आशिकी इम्तेहान लेती है , नंगे पैर तलवार पर चलने जैसा होता है मोहब्बत करना , पाँव के घाव सह सके तो करना मोहब्बत.

मैंने मीता का हाथ अपने हाथ में लिया और बोला- सब कुछ रब्ब के हाथ में छोड़ दिया है, उसके हाथ में डोरी है .

मीता- अब जाने दे मुझे .

मैं- मुझे शिवाले की कहानी जाननी है

मीता- तुझे पता है

मैं- तू बता

मीता- मुझे बस इतना पता है की शिवाले का मतलब मंदिर नहीं होता, शिवाले का मतलब होता है वो भूमि जहाँ शिव का धुना होता है ,

मीता ने बड़ी गहरी बात कही थी जिसे समझने में कुछ थोड़ी देर लगी.

मैं- इसका मतलब ,

मीता- हाँ उसका वही मतलब है . अब जाती हूँ मैं

मैं- चलता हूँ थोड़ी दूर तेरे संग

मीता- नहीं बिलकुल नहीं

मैं- बस थोडा सा दूर

मीता-ये जिद किस काम की

मैं उठ खड़ा हुआ और हम दोनों हौले हौले जमीन को पार करते हुए रुद्रपुर की तरफ चल दिए. उसकी पायजेब की झंकार, दूर कही कूकती कोयल की आवाज को ताल दे रही थी . माथे पर पड़ती हलकी बूंदे उसके सांवले चेहरे पर गजब लग रही थी .

“ऐसे क्या देख रहा है ” पूछा उसने

मैं- बस तुम्हे

मीता- इतनी भी सुन्दर नहीं मैं

मैं- मेरी नजर से देख कभी खुद को

मीता ने अपनी उंगलिया मेरी उंगलियों से अलग की और बोली- बस , यहाँ से आगे मैं अकेले जाउंगी.मैंने उसका हाथ छोड़ दिया. शाम को मैं गाँव में आया तो मालूम हुआ की सुनार वापिस गाँव में लौट आया है .बेशक मेरा उस से छत्तीस का आंकड़ा था पर , ये मेरी गरज थी तो मैं उसके घर चला गया उस से मिलने के लिए.

लाला की हालत कोई खास बढ़िया नहीं थी , उसका एक साइड का शरीर जैसे सूख गया था .मुझे देख कर उसकी आँखों में नफरत आ गयी पर वो कुछ नहीं बोला.

मैं- कैसे हो लाला , तबियत कैसी है तुम्हारी

लाला चुप रहा .

मैं- अब बोल भी दे लाला.क्या मालूम कब जिन्दगी की शाम हो जाये, आत्मा पर इतना बोझ लेकर तू कैसे जायेगा. वैसे भी मैंने हमला करवाया नहीं था तुझ पर.

लाला- तेरी औकात भी नहीं इतनी

मैं- जे बात लाला. देख, माना की अपनी दुश्मनी है पर हजार नालायक दोस्तों से एक सच्चा दुश्मन भला होता है , हैं न, तो हम आपस में सौदा कर सकते है

लाला- कैसा सौदा

मैं- मेरे कुछ सवाल है उनका जवाब दे, बदले मैं तुझे थोडा सोना दूंगा

लाला- क्या सवाल है तेरे

मैं- उस बक्से में ऐसा क्या था जिसकी हिफाजत तूने सोलह साल तक की.

लाला- तूने खोल कर देख तो लिया ही होगा न

मैं- उस धागे में ऐसी क्या खास बात है लाला

लाला- तू जा यहाँ से

मैं- मुझे बता दे लाला. तू कहे तो मैं अभी के अभी सारा सोना तुझे लाकर देता हूँ

लाला- माँ चुदाने गया सोना, भोसड़ी के तू अभी के अभी निकल जा यहाँ से और दुबारा दिखना मत मुझे. वर्ना तेरा ऐसा हाल करूँगा की तूने सोचा नहीं होगा.

मैं- लोडू लाला मेरे सब्र का इम्तिहान मत ले,मैं क्या कर सकता हूँ इसकी खबर तुझे हो तो गयी ही होगी .

कुछ तो ऐसा राज था लाला के सीने में दफ़न जो लाला मरने को तैयार था पर बताने को नहीं. मैं घर आया तो देखा की चाची अकेली थी घर पर.

“कुछ बना दू तुम्हारे लिए ” उसने पूछा मेरे से

मुझे थोडा अजीब सा लगा फिर मैंने मना किया. और चोबारे में चला गया कुछ देर बाद चाची भी वहां पर आ गयी .

“अबकी बार झड़ी अच्छी लगी है , पानी रुक ही नहीं रहा है ” उसने कहा

मैं- हाँ, ऐसा सावन मैंने देखा नहीं कभी पहले. मैं कुछ दिनों के लिए कही बाहर जाना चाहता हूँ

चाची- कहाँ

मैं- वो सोचा नहीं है पर यहाँ से दूर

चाची- अब क्या खुराफात आई मन में

मैं- इसमें क्या खुराफात होगी भला.

चाची- जैसे मैं तो जानती ही नहीं न तुझे,

मैं- काश तुम मुझे जान पाती.

चाची ने एक गहरी साँस ली और खिड़की के पार देखने लगी. उसकी पीठ मेरी तरफ थी, ब्लाउज से झांकती पीठ पर जो निशान था उसने मेरा ध्यान खींचा.

“ये तुम्हारी पीठ पर कैसा निशान है चाची ” मैंने कहा



“दर्द का रुसवाई का ” अचानक से उसके मुह से निकल गया .
 
#42



“कैसा दर्द , कैसी रुसवाई चाची ” मैंने कहा

चाची ने मुड कर मुझे देखा और बोली- कुछ चीजो पर जमी धुल को हटाना नहीं चाहिए, हम सबकी जिन्दगी में कुछ पल ऐसे होते है जो निजी होते है , हमें उन लम्हों की कद्र करनी चाहिए. मैं तेरी सोच पर पहरा नहीं लगा सकती तू चाहे जो सोच सकता है मेरे और जेठ जी के बारे में और मुझे फर्क भी नहीं पड़ेगा. पर कुछ रिश्ते बस होते है उनका कोई नाम नहीं होता जैसे की तेरा और रीना का . दुनिया चाहे कुछ भी कहेगी पर तुम दोनों एक दुसरे के लिए जो हो वो हमेशा रहोगे.

मैं- अगर आप पिताजी से प्रेम करती थी तो फिर चाचा से शादी क्यों की

चाची- उफ़ तेरे ख्याल भी तेरे जैसे न लायक ही है. पर तेरे ख्याल अगर ऐसे है तो तू लाख कोशिश कर ले अर्जुन को कभी समझ नहीं पायेगा. वो एक दिया थे उन्हें समझने के लिए तुझे बाती बनना होगा.

मैं- इन निशानों के बारे में बता सकती हो तुम मुझे

चाची- ये घाव मुझे लगाव भी है इनसे और नाराजगी भी है इनसे.

मैं- तुम चाचा केसाथ खुश नहीं हो, मैंने सुना था आप दोनों की बातचीत

चाची- वो मेरा और उसका मसला है , तुम्हे जानने की जरुरत नहीं . ख़ुशी गमी बस हमारे नजरिये की बात है . खैर बाते बहुत हुई मुझे और भी काम है .

चाची मुझे छोड़ कर चली गयी . मैं खिड़की के पास खड़ा रहा . पर इतना तो मुझे मालूम हो ही गया की ताई और चाची गहरी जुडी थी मेरे पिता से. पर क्या राज़ थे इनके , क्या मेरे पिता का सम्बन्ध भी चुदाई वाला था इनसे, क्या ताई मुझसे इसलिए चुद गयी की वो मुझमे मेरे पिता का अक्स देखती हो. पर दोनों ने ही इस बात को नकारा था . अब मुझे बस ये ही मालूम करना था किसी भी हाल में.

मैं फिर ताई के घर चला गया तो देखा की ताऊ आज घर आया हुआ था. मैं उसके पास ही बैठ गया बाते करने लगा.

मैं- ताऊ मुझे तुमसे कुछ बात करनी है

ताऊ- हां

मैं-ताऊ, मुझे नहीं मालूम की ये सही समय है या नहीं पर मैं ये जानना चाहता हूँ की ऐसी कौन सी बात है जिसकी वजह से तुम ताई को हमेशा गाली बकते हो .

ताऊ- छोड़ न क्या उस का जिक्र करता है

मैं- ताऊ, आज तुम्हे बताना ही होगा.

ताऊ- उस कुलटा से ही जाकर पूछ लेना तू.

मैं- कहते की एक न एक दिन ऐसा आता है जब आदमी ओ अपने दिल के बोझ को हल्का कर लेना चाहिए, मैं तेरा बेटा हु . मेरे सामने अपना दिल खोल सकता है तू

ताऊ- मेरे दिल में कुछ नहीं

मैं- फिर भी

ताऊ- सुनना चाहता है तो सुन, ये हरामजादी ऐसी नागिन है जो किसी को भी डस जाये. ये किसी की नहीं हो सकती, अब मैं तुझसे क्या कहूँ पर इतना समझ ले घर बसाने लायक नहीं है ये.

मैं- इस बात का कोई सबूत है तुम्हारे पास या फिर किसी ने कान भरे है तुम्हारे.

ताऊ- मुझे सबूत की क्या जरुरत , मैंने तो खुद उसे ..........

ताऊ ने बात अधूरी छोड़ दी.

मैं- उसे क्या ताऊ

ताऊ- कुछ नहीं, कुछ नहीं तू जा बाहर खेल . मुझे वापिस शहर जाना है

मैं- ताऊ क्या तुमने ताई को मेरे पिता के साथ देखा था .

ताउ- मैंने कहा न तू जा यहां से

मैं- मुझे समझ आ गया वो मेरे पिता के साथ ही थी .

ताऊ- मैंने कहा न चला जा यहाँ से . अभी तू इतना बड़ा नहीं हुआ है जितना तू समझ रहा है .

मैं घर से बाहर आकर नीम के पेड़ के निचे बैठ गया और विचार करने लगा. मेरी बात सच होने की पूरी सम्भावना लग रही थी मुझे, ताई जब ठेकेदार से चुद सकती है , मुझसे चुद सकती है तो अर्जुन चौधरी से क्यों नहीं चुद सकती. क्या मेरे पिता अपनी भाभी और छोटे भाई की पत्नी को रगड़ रहे थे . क्या यही वो वजह थी की ताऊ ने उन्हें ताई के साथ देख लिया हो तो वो घर छोड़ गये.

पर यहाँ आकार मेरा अनुमान गड़बड़ा रहा था , घर छोड़ना जम नहीं रहा था . घर छोड़ने की वजह ये नहीं हो सकती . मैंने सोचा इस घर की औरते इतनी शातिर है तो मर्दों का कहना ही क्या होगा. इन सवालो के जवाब किसी के पास थे तो वो थे चौधरी अर्जुन सिंह और अब समय आ गया था मेरा उनसे मिलने का.

अगले दिन सुबह सुबह ही मैंने अपना बैग लिया और शहर के लिए बस पकड़ ली.शाम तक मैं उस भर्ती सेंटर पर पहुँच गया जिसका पता मुझे रीना की मामी ने लाकर दिया था . वहां जाकर मालूम हुआ की वहां पर नए फौजियों को कुछ समय के लिए ही रखते है फिर ट्रेनिंग के लिए भेज देते है . मैंने उस फौजी को अपनी व्यथा बताई तो उसका दिल पसीज गया वो मुझे अपने साथ बड़े अफसर के पास ले गया . मैंने अफसर को पूरी कहानी बताई.

अफसर- देखो बेटे, मैं तुम्हारे जज्बात समझता हूँ और जितना हो सके मैं तुम्हारी मदद करूँगा. मैं रिकॉर्ड की जांच करवाता हूँ . थोडा समय लगेगा पर तुम्हारा काम मैं आज ही करूँगा.

मैंने हाथ जोड़ कर उसका धन्यवाद किया.

करीब दो घंटे बाद अफसर ने मुझे बुलाया और बोला- अर्जुन सिंह नाम का बन्दा भर्ती तो यही से हुआ था पर उसकी ट्रेनिंग अलवर में हुई थी. तुम्हे वहां जाना होगा. मैं वहां के लिए एक ख़त लिख देता हूँ तुम्हे आसानी होगी .



अफसर ने मुझे एक चिट्ठी दी और बोला की वहां किसी को भी दिखा देना . मैंने तुरंत अलवर के लिए बस पकड़ी और अगली शाम पहुँच गया . वहां के आर्मी सेंटर पर जाकर मैंने चिट्ठी दिखाई और फिर जो मुझे मालूम हुआ मैं हैरान रह गया .............................
 
#43

बोझिल कदमो से वापिस लौटते हुए मेरा एक एक कदम भारी हो रहा था. मेरा दिमाग भन्नाया हुआ था , अपने आप से जूझते हुए मैं नहर की पुलिया पर थोड़ी देर बैठ गया की तभी दिलेर सिंह आ गया . उसे देख कर मेरा माथा और ठनक गया .

“तुझे मेरे साथ थाणे चलना होगा ” उसने कहा

मैं- दिलेर सिंह मेरा दिमाग बहुत ज्यादा ख़राब है , मुझे तंग मत कर. गुस्से में मैं कुछ कह दूंगा तुझे

दिलेर- मैंने कहा न चुपचाप जीप में बैठ,

दिलेर ने मेरा कालर पकड़ लिया .

“लाला ने रपट लिखवाई है तेरे खिलाफ ” उसने गुर्राते हुए कहा .

मैं- देख दिलेर, मैं तुझसे फिर कहता हूँ मेरा दिमाग भन्नाया हुआ है . तू लौट जा ये गुस्ताखी तेरी मैं माफ़ करता हूँ

दिलेर- रपट है तेरे खिलाफ कार्यवाही करनी ही पड़ेगी. मैंने तुझसे कहा था न की मौका मिलते ही तेरी गर्दन पकड़ लूँगा.

मैं- मेरे सब्र का इम्तिहान मत ले ,

दिलेर- तू बैठ जीप में

जिस दिन से रुद्रपुर वाला काण्ड हुआ था मैं ऐसा वैसा कुछ नहीं करना चाहता था पर ये चूतिये जानबूझ कर पड़ी लकड़ी उठाने में लगे थे. मैंने दिलेर की गांड पर लात मारी और उसको उल्टा कर दिया जीप के बोनट पर .

“बहन के लंड, कब से कह रहा हूँ, बात को मत बढ़ा. मत बढ़ा. पर दरोगा की गांड में चुल मची हुई है .साले लंड पर रखता हु मैं तेरे जैसो को .देखना चाहता है मेरी दुश्मनी को तो देख..” मैंने उसको मारते हुए कहा.

“पुलिसवाले पर हाथ उठाता है, साले तू तो गया ” जब्बर ने मुझे धक्का देते हुए कहा और मेरी पसलियों पर वार किया. यही वो कमजोर जगह थी . मैं गिर पड़ा और जब संभला तो मैं थाने में था. हालत ख़राब थी .

“दिलेर सिंह, ये तूने ठीक नहीं किया. मेरा वादा है तुझसे , मेरे पैर पकड़ कर रहम की भीख मांगेगा तू ” मैंने कहा

दिलेर- अरे वो हवालदार, जरा और सुताई कर इस लौंडे की. पुलिस के डंडे का जोर दिखा इसे.

दो पुलिस वालो ने मुझ को पकड़ कर लिटाया और एक ने मेरे पैरो के तलवो पर डंडे मारना शुरू किया . हवालात में मेरी चीखे गूंजने लगी.

“पता नहीं जीजा क्यों घबराया हुआ है इस बित्ते भर के छोकरे से , जीजा को जब मालूम होगा की मैंने गांड तोड़ी है इसकी तो बड़ा खुश होगा वो ” दिलेर अपने आप से बोला.

मैं- जितना जोर दिखाना है दिखा ले भोसड़ी के. पर मेरी बात याद रखना मैं मारूंगा तीन गिनूंगा एक

दिलेर- हवालदार , इसकी चीखे पुरे थाणे में आणि चाहिए.

एक एक वार भारी पड़ रहा था मुझ पर . पर फिर मैं चीखा नहीं. अपनी भी जिद थी . और जिद दिलेर सिंह की भी थी . मुझे नहीं मालूम की उस समय क्या समय रहा होगा. रात कितनी बीती थी .जब सारे थाने में सन्नाटा पसरा हुआ था उस पायल की आवाज बड़ी जोर से गूंजी थी .

“थानेदार, मनीष को छोड़ दे ” आवाज में कुछ तल्खी सी थी .

दिलेर- ओह हो. ये बताने तू इतनी रात में चली आई अकेले. वैसे तू है छमिया.

“”तू बस इतना समझ ले ,अगर मैं खुद चल कर थाने आई हूँ तो कोई तो हूँ ही, मनीष को तुरंत छोड़ दे .” उसने कहा

दिलेर- छोड़ दूंगा. अभी छोड़ देता हूँ. पर तुझे मेरा एक काम करना होगा. आज की रात तू मेरे पास रुक जा . सुबह सुबह ही छोड़ दूंगा इसे. वैसे भी अकेले राते कटती नहीं है मुझसे .

“दिलेर सिंह, अपनी जुबान को लगाम दे हरामजादे.” मैंने गुस्से से कहा

दिलेर- साले. तू देख मैं क्या करता हूँ , इस छमिया की यही लेता हूँ तेरे सामने, तुझे भी मजा आयेगा.

“तू मेरी लेगा. तू हाथ लगा कर दिखा मुझे एक बार तुझे मलाल रहेगा की तूने जन्म भी क्यों लिया ” मीता ने शांत स्वर में कहा .

दिलेर- वाह भाई वाह, ऐसा तो बस फिल्मो में देखा था पर क्या मालूम था की इसी थाने में ये महफ़िल लगेगी. प्रेमी के सामने प्रेमिका की लेने में मजा ही आ जायेगा.

मुझे खुद की बेबसी पर गुस्सा आ रहा था पर वो मीता थी , मरजानी . जैसे ही दिलेर उसकी तरफ बढ़ा उसने उसके पैर में अडंगी डाली और दिलेर के गिरते ही उसने अपने झोले से एक कटार निकाल कर दिलेर के पैर में घोंप दी .

“आह ” चीखा वो . और मैंने पहली बार मीता की आंखो में कुछ अलग सा देखा. जैसे ही हवालदार मीता को पकड़ने उसकी तरफ भागा उसने पास में पड़ी कुर्सी उसके सर पर दे मारी और उसकी चमड़े की बेल्ट से उसकी खाल उधेड़ने लगी.

“मेरी लेगा तू , चल खड़ा हो हरामजादे ” मीता ने दिलेर को उठाया और कटार से उसकी बाह चीर दी. इसी आपा धापी में सिपाही जो मेरे साथ अन्दर था वो बाहर की तरफ भागा . और मैं उसके पीछे मैंने उसका सर सलाखों में दे मारा. वो वही ढेर हुआ . मैं चलते हुए दिलेर सिंह के पास गया .

“मैंने तुझसे कहा था न, आग से मत खेल .पर तेरी गांड में तो चुल मची थी . मैंने बार बार तुझसे कहा था , मत खेल मुझसे अब बुला ले तेरे जीजा को , वो साला भी देख लेगा तेरा क्या हाल होता है ” मैंने कहा

मीता- मनीष पीछे हट, इस को मैं दिखाउंगी की मुझसे बदतमीजी करने का क्या नतीजा होता है देख ले थानेदार , तेरा थाना है , तेरी सरकार, तू है और मैं हूँ और तेरी कही बात है .उठ आ जरा , दिखा तेरा जोर मुझे,

मीता ने एक लात दिलेर को मारी .

दिलेर- माफ़ कर दो मुझे, गलती हो गयी मुझसे

मीता- गलती सुधार दूंगी मैं . तेरी औकात ही क्या जो मेरे होते हुए तू मेरे अजीज को हाथ लगाये. जितने जख्म तूने इसे दिए है तेरी खाल उतार लुंगी मैं. गौर से देख मुझे , मेरी आँखों को देख . और समझ मेरा नाम मितलेश है . मितलेश ठकुराइन और ये नाम तुझे मरते दम तक याद रहेगा.

मीता ने दिलेर की वर्दी फाड़ी और टेबल पर पटक कर उसकी पीठ को काटने लगी कटार से. दिलेर सिंह की चीखे थाने में गूंजने लगी. इतनी नफासत ने कसाई भी बकरे को नहीं काटता जितनी सफाई से मीता उसकी पीठ को काटते हुए उसकी हड्डिया खींच रही थी .

मीता का ऐसा रूप देख कर एक पल को मेरी रूह भी कांप गयी .दिलेर की सांसे कब की थम गयी थी पर मीता का गुस्सा नहीं थमा था , उसका पूरा चेहरा खून से सना हुआ था . कोई कमजोर दिल का उसे ऐसे हाल में देख लेता तो बेहोश हो जाता.

“इसके जीजा के पास भेज देना इसे ” मीता ने हवालदार से कहा जिसने अपनी पेंट में मूता हुआ था . मीता ने मेरा हाथ पकड़ा और बाहर आई अचानक ही वो रुक गयी .

मैं- क्या हुआ

वो- रुक जरा .

मीता ने पुलिस जीप की टंकी उखाड़ ली और थाने में आग लगा दी.

“अब ठीक है ” उसने कहा और पास की टंकी पर हाथ मुह धोने लगी. उसके बाद हम दोनों हमारी जमीन पर आ गए.

मीता- हुलिया ठीक कर ले तेरा.किसी को पता नहीं चलना चाहिए तुझे और चोट लगी है ,

मैं- तुझे वहां नहीं आना चाहिए था . तू दुनिया की नजरो में आ जाएगी. मेरा तो जो होगा वो होगा पर अब मुझे तेरी चिंता भी लगी रहेगी.

मीता- किसकी मजाल जो मेरी तरफ आँख उठा कर देखे.

मैं- पर तुझे कैसे मालूम हुआ की मुझे दिलेर थाने ले गया है .

मीता- तुझे तो मालूम ही है की मेरा चाचा हॉस्पिटल में दाखिल है , मैं उसकी दवाई लेने जिस दूकान पर गयी थी वो थाने के पास ही है, वहीँ पर चाय की दूकान पर दो सिपाही बात कर रहे थे की थानेदार ऐसे ऐसे किसी को उठा कर लाया है और मैं समझ गयी .

मैं- पर तुझे मेरी मुसीबत अपने सर नहीं लेनी चाहिए थी .

मीता- दोस्ती की है तुझसे, निभानी तो पड़ेगी . चल अब थोड़ी देर आराम हो जाये.

मीता ने बिस्तर लगाया और कुछ देर के लिए हमने आँखे मूँद ली. सुबह चाय की चुस्कियो के साथ मैंने मीता को बताया की कैसे मैं फौज में मालूमात करने गया था और वहां से मुझे क्या जानकारी मिली. मेरी बात सुनकर मीता भी हैरान हो गयी .

मीता- अब क्या करेगा तू .

मैं- तू ही बता क्या करू.

मीता- समस्या अब गहरी हो गयी है.

मैं- हर रास्ता थोड़ी दूर जाकर बंद हो जाता है.

मीता- अभी मुझे जाना होगा. वापिस आउंगी तो हम कुछ अनुमान लगायेंगे

मीता के जाने के बाद मैं भी घर की तरफ चल दिया. पर रस्ते में ताई मिल गयी मुझे

ताई- मैं तुझे ही तलाश रही थी कहाँ था तू

मैं- बस यही था क्या हुआ


ताई ने फिर जो मुझे बताया मेरा दिमाग ही घूम गया
 
#44



“चाचा ऐसा कैसे कर सकता है ” मैंने ताई से पूछा

ताई- मैं भला तुझसे झूठ क्यों बोलूंगी.

मैं- ये बात और किस किस को मालूम है

ताई- औरो का तो मुझे मालूम नहीं पर मुझे और तुझे तो मालूम है ही

मैं- रीना को पता चलेगा तो उसे कैसा लगेगा .

ताई - नहीं पता चलना चाहिए

मैं- ये जिन्दगी साली मुझे ऐसे जकड़ रही है जैसे सांप अपने शिकार को , रीना तो टूट ही जाएगी जब उसे मालूम होगा की उसकी मम्मी और चाचा के बीच नाजायज रिश्ता है .

ताई- और ये रिश्ता कोई नया नहीं है जिस तरह से उनकी बाते, हाव भाव थी मुझे लगता है इश्क पुराना है .

मैं- उनकी जिन्दगी है वो जैसे मर्जी जिए उनको अधिकार है बस रीना की जिन्दगी पर असर नहीं पड़ना चाहिए.

रोज़ एक नयी हकीकत से मेरा सामना होता था, पर मैं इतना जरुर जान गया था की इन्सान के लिए किसी रिश्ते की सबसे ज्यादा अहमियत अगर है तो वो है जिस्मो के रिश्ते की .

ताई- कहाँ खो गया तू

मैं- कही नहीं , बस थोड़ी देर सोना चाहता हूँ

घर आने के बाद मैं सो गया , जागा तो बदन में बुखार सा था और रात हो गयी थी . मैंने उठ कर एक दो गोली ली और घर से बाहर आया . रात भीगी हुई थी और मैं जल रहा था . मेरे दिमाग में बस एक ही बात घूम रही थी और उसका जवाब पाने के लिए मैंने वो करने का सोचा जो बहुत खतरनाक था .पर कभी कभी बड़ी कामयाबी के लिए बड़ा रिस्क लेना पड़ता है .

और वो बड़ा रिस्क था सुनार का अपहरण, क्योंकि वो उस धागे के रहस्य को जानता था . वो ही था जो मेरी उलझन सुलझा सकता था . लठ के जोर पर उसे उठाना न मुमकिन था . और चूँकि उसका इलाज चल रहा था इसलिए वो घर से बाहर निकलता नहीं था . कैसे किया जाये ये काम सोचते सोचते मैं चबूतरे पर लेट गया . मुझे दो बाते परेशां कर रही थी एक तो संध्या चाची की पीठ के वो निशान दूसरा उस धागे का मामूली नहीं होना.

जब्बर अभी तक शांत बैठा था , मुझसे हुए पंगे के बाद वो सुनार से नहीं मिला था और ना ही सुनार अपने घर से बाहर निकल रहा था .दो तीन दिन मैंने गुज़ार दिए योजना बनाने के लिए की कैसे सुनार को उठाया जाये पर बात बन नहीं रही थी . मुझे अब खुद पर गुस्सा आने लगा था .

उस दिन मैं मंदिर की सीढियों पर बैठा इसी उधेड़बुन में उलझा था की मैंने सुनार की बीवी को मंदिर में आते देखा. वो मुझे देख कर मुस्कुराई. मैं भी मुस्कुरा दिया.

“और कैसे हो ” उसने पूछा मुझसे.

मैं- सच कहूँ तो हालात ठीक नहीं है , ऊपर से तुम्हारे पति ने जीना मुश्किल किया हुआ है

काकी- उसमे नया क्या है, सारे गाँव की यही शिकायत है , एक तुम्हारी और सही

मैं- तुम समझाती क्यों नहीं उसे

काकी- जो खुद से बेगाने हो जाते है फिर वो ऐसे ही हो जाते है .तुम बताओ तुम्हारा क्या झगडा है उनसे

मैं- मेरे चाचा ने तुमको नहीं बताया क्या

काकी- भला वो क्यों बताने लगा मुझे

मैं- तो इतनी रात को शमशान के पार तुम क्या करने गयी थी उसके साथ

काकी के चेहरे के भाव बदल गए एकदम से

काकी- बड़े तेज हो तुम ,

मैं- क्या करे. सबके चेहरे पर नकाब है हम ही नंगे है बस , तो कब से चल रहा है ये चक्कर तुम्हारा

काकी- कोई चक्कर नहीं है बस एक डोर है जो हम दोनों को जोडती है

मैं- कितना आसान है न इन बातो को छिपाना

काकी- तेरी मर्जी है जो समझ,

मैं- लाला के सीने में ऐसा कौन सा राज दफ़न है ये बताओ मुझे

काकी- तुम्हे क्या लगता है

मैं- मुझे लगता है की लाला मुझसे कोई सौदा करना चाहता है

काकी- उसे खजाने की तलाश है ,

मैं- किस खजाने की तलाश है उसे

काकी- तुम इतने नादाँ भी नहीं

मैं- नादाँ तो तुम भी नहीं जो चाचा के साथ सेट हुई पड़ी हो .

काकी- तेरे चाचा से ही पूछ लेना तसल्ली से बता देगा वो

मैं- क्या वो तुमसे प्यार करता है

काकी- इस दुनिया में कोई किसी से प्यार नहीं करता, सब के अपने अपने मतलब होते है .

मैं- तुम्हारा और चाचा का क्या मतलब है फिर

काकी- उसका अहसान है मुझ पर

मैं- कैसा अहसान

काकी- बता दिया तो अहसान, अहसान कहाँ रहेगा फिर . पर मैं तुझसे इतना कहूँगी की तू इन सब से दूर रहना मेरे पति की जिन्दगी गुजर गयी उस चीज के पीछे भागते भागते जो कभी मिल नहीं सकती . तू भी मत भागना उसके पीछे

मैं- किसके पीछे

काकी- अंधेरो के

इतना कह कर वो ऊपर मंदिर में चली गयी. मैं सीढियों पर ही रह गया . मुझे कोई ऐसा चाहिए था जो चाचा की जासूसी कर सके. मेरे लिए चाचा की असलियत तलाश करना अब जरुरी था. सुनार की बीवी और रीना की माँ दोनों को फ़साये हुए था वो. जितना भोला वो दीखता था उतना था नहीं .

अँधेरा घिरने लगा था घर जाने की बजाय मैं खेतो की तरफ चला गया . चारपाई बिछाई और ठंडी हवा को महसूस करते हुए मैं लेट गया . मध्दम चलती पवन लहराते हुए पेड़ , क्या खूब नजारा था .

“आराम करने के बजाय तुझे अब मेहनत करने के बारे में सोचना चाहिए ” ये मीता थी जो अपना झोला खूँटी पर लटका रही थी .

मैं- कल से पक्का

मीता- ये सावन बड़ी जोर से बरस रहा है इस बार , किस्मत मेहरबान है तुझ पर , आगे तेरी मर्जी . मेहनत के पसीने से सींच दे इस धरा को , इसकी प्यास तेरा पसीना ही बुझाएगा.

मैं- जो हुकुम सरकार.

मीता- संध्या आजकल रुद्रपुर के बहुत चक्कर लगा रही है

मैं- किस से मिलती है वो

मीता- किसी से भी नहीं

मैं- किसी से भी नहीं

मीता- हाँ किसी से भी नहीं, घंटो बैठी रहती है , न जाने किसे ताकती है वो

मैं- पर वो तो कह रही थी की सोलह साल से वो रुद्रपुर नहीं गयी .

मीता- सच है ये भी पर आजकल वो बस शिवाले में बैठी रहती है

मैं- ये शिवाला न हुआ जी का जंजाल हो गया .

मीता- खाना खायेगा

मैं- भूख नहीं है

मीता- तेरी मर्जी , चल थोडा परे सरक .पैर दुःख रहे है मेरे जरा कमर सीढ़ी कर लू

मैं थोडा सा सरका . वो मेरे पास लेट गयी. आज से पहले वो मेरे इतना पास कभी नहीं आई थी . उसके बदन की खुसबू मेरे जिस्म में समाने लगी.

मैं- बता कुछ अपने बारे में

मीता- क्या बताऊ, तुझसे क्या छिपा है

मैं- मैं मीता के बारे में नहीं मितलेस ठकुराईन के बारे में जानना चाहता हूँ



मीता-मितलेस वो दास्ताँ है जिसे भुला दिया गया.
 
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