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सूर्य पूजा स्थल
आश्रम में एक बार फिर एक दुल्हन का परिधान विनीता के सामने था. यु तो वो पहले भी लखन से शादी कर चुकी थी पर इस बार उसे पुरे मन से लखन को अपने पति के रूप में स्वीकार करना था. जब कुछ दिन पहले लखन सिंह के साथ उसकी शादी हुई तब उसके मन में अनेको सवाल थे की पता नहीं एक अनजान आदमी के साथ एक एकांत जगह पर वो सुरक्षित रहेगी की नहीं कही इतने सालो से अपने पति के बिना रह रहे लखन सिंह उसे देखकर बहक तो नहीं जाएंगे. पर पिछले कुछ दिनों में उसने लखन सिंह को जितना जाना जितना समझा अब उसके मन में ऐसे कोई सवाल नहीं थे बल्कि इन कुछ दिनों में वो जितना करीब अपनी इस 7 दिन के पति के आ गई थी उतना तो अपने असली पति के भी नहीं आई थी. पर करीब आना एक अलग बात है और पति के रूप स्वीकार कर लेना अलग. करीब हम कई लोगो के होते है पर सबको अपना सब कुछ नहीं मान लेते.
पर पिछले कुछ दिन में उसके और लखन सिंह के बीच जो हुआ वो करीब से कुछ ज्यादा था. उसने लखन सिंह की गोड़ में बैठ कर अपने नितम्ब पर उनके लिंग को महसूस करा पूरी रात उनके आलिंगन में गुज़री उनके सामने तरह तरह के आकर्षक और उत्तेजक वस्त्र पहने और कल रात कल रात तो उसने उनका लिंग अपने मुँह में लिया उनका वीर्य पिया उनके मूत्र से स्नान करा. इन सब बातो ने लखन सिंह के प्रति विनीता के मन के विचारो में बहुत बड़ा बदलाव ला दिया था और लखन सिंह विनीता के लिए सिर्फ उसकी सहेली के ससुर नहीं रह गए थे बल्कि उससे कही आगे बाद गए थे. पहली बार लखन सिंह के बारे में सोचते हुए विनीता को अपनी जांघो के बीच गीला गीला महसूस हो रहा था जो इस बात का सबूत था की कही न कही वो भी इस शादी को असली जमा पहनना चाहती है पर समाज मर्यादा और उम्र का अंतर उसे ऐसा करने से रोक रहा है पर आज फिलहाल उस पर कोई रोक नहीं है आज वो पुरे मन से लखन सिंह को अपना पति मान सकती है और बचे हुए दो दिन के लिए hi सही उसे एक सच्चे और अच्छे पति का साथ तो मिलेगा जिससे वो पुरे मन से अपना पति मानती है.
यही सोचते हुए विनीता के हाथ उस शादी के जोड़े पर पहुंच गए और उसने एक बार फिर खुद को लखन सिंह की दुल्हन के रूप में तैयार करना शुरू कर दिया. पर पिछली बार तैयार होते वक़्त विनीता के मन में दुविधा थी पर इस बार ख़ुशी इस बात की उसे एक सच्चा पति कैसा होता है वो अनुभव करने का मौका मिला पर साथ hi ये गम भी था की अनुभव सिर्फ दो दिन का hi और है. विनीता ने एक बार फिर खुद को एक दुल्हन के बार में तैयार कर लिया और इस बार विनीता पहले से भी ज्यादा सुन्दर लग रही थी क्युकी इस बार के श्रृंगार में मजबूरी नहीं बल्कि प्रेम था सच्चा प्रेम.
दूसरी तरफ लखन सिंह का मन अब भी दुविधा में था की क्या विनीता जी आज की शादी को पुरे मन से कर पाएगी. भला मई उनसे ऐसी उम्मीद कर भी कैसे सकता हु की वो मुझे सच्चे मन से अपना पति मान ले वो मेरी बेटी से भी उम्र में छोटी है. वो इतना कुछ कर रही है मेरे परिवार के लिए यही बहुत इससे ज्यादा न मई डेसेर्वे करता हु न मुझे उम्मीद करनी चाहिए. बेशक उनकी अपनी शादीशुदा ज़िन्दगी में अनेको परेशानिया है उनकी शादी टूटने की कगार पर है पर इसका ये मतलब नहीं की मई उनसे उम्मीद करू की वो मुझे अपना पति मान ले. अभी उनकी उम्र hi क्या है उनकी शादी टूट भी जाए तब भी उन्हें अपना हमउम्र हमसफ़र मिल hi जाएगा. मई उनसे ये उम्मीद नहीं कर सकता की वो अपने से उम्र में दुगने इंसान को अपना पति मान कर उसके साथ अपनी ज़िन्दगी गुज़ार दे अपनी जवानी एक बुड्ढे पर क़ुर्बान करदे.
नहीं मई ऐसा सोच भी नहीं सकता पर यहाँ सवाल इस बात का है की क्या मई उन्हें सच्चे मन से अपनी पत्नी मान सकता हु. सच में अपने दिल से पूछू तो मई तो उन्हें अपनी पत्नी उसी दिन मान बैठा था जिस दिन हमने जंगल में खुले आकाश के नीचे वो रात बीते थी और उन्होंने मुझे अपनी शादी की सच्चाई से रूबरू करवाया था. उसी दिन मेरे दिल में उनके लिए एक सॉफ्ट कार्नर बन गया था जिसे मई चहु भी तो भी नहीं नकार सकता इसलिए अगर मई अपने साइड से देखु तो मई सच्चे मन से उन्हें अपनी पत्नी मान कर hi आज की शादी में बैठूंगा. पर मई उनके सामने अपने मन के भाव ज़ाहिर नहीं कर सकता वर्ण वो मेरे बारे में क्या सोचेगी वो तो इंसानियत और दोस्ती का फ़र्ज़ निभाते हुए ये साडी रस्मे पूरी कर रही है अगर मई उनसे ये केहड़ू की मुझे उनसे प्यार हो गया है तो शायद उन्हें मुझसे नज़रे मिलाने में झिझक महसूस होने लगे. वो मुझे ठरकी बुद्धा समझने लगे जो मौके का फायदा उठाते हुए अपने से उम्र में आधी अपनी hi बहु की सहेली पर चांस मार रहा है. वो ये सोचेंगी की उनकी शादीशुदा ज़िन्दगी की सच्चाई जान कर उनकी ज़िन्दगी में एक मर्द की कुमी का सच जान कर मई उन्हें हासिल करने की कोशिश कर रहा हु, उनकी मजबूरी का फायदा उठा रहा हु.
नहीं मई ऐसा कटाई नहीं करूँगा मई इस शादी में बैठूंगा ज़रूर पर उनसे यही कहूंगा की मेरे मन में ऐसा कुछ नहीं है और उन्हें भी ज़बरदस्ती ऐसा कुछ सोचने की ज़रूरत नहीं है. जैसे हमने पहले मजबूरी में शादी की रस्मे पूरी कर्ली थी वैसे hi आज भी कर लेंगे. वो निश्चित hi इस बात पर गिल्ट महसूस करेंगी की उनके मन में मेरे लिए कुछ नहीं है पर फिर भी उन्हें ऐसा सोचने के लिए विवश करा जा रहा है जब उन्हें पता चलेगा की मेरे मन में भी उनके लिए ऐसा कुछ नहीं है तो उनके अंदर का गिल्ट कम हो जाएगा. दोनों के मन में एक दुसरे के लिए शामे फीलिंग्स थी पर दोनों hi एक दुसरे की भावनाओ को हर्ट न करने के लिए अपनी अपनी फीलिंग्स छुपाने का ढोंग कर रहे थे.
दोनों दूल्हा दुल्हन के रूप में तैयार हो गए जब विनीता दुल्हन के लिबास में तैयार होकर लखन सिंह के सामने आई तो इस बार विनीता के रूप की सुंदरता से लखन सिंह की नज़रे नहीं हैट रही थी. दुल्हन तो वो पहले भी बानी थी पर लखन की आँखों में उसके लिए जो प्यार था उसने उसे और भी सुन्दर बना दिया था सूर्य सी दमकती सुनहरी साडी और उसपर बेहद हल्का मेकअप जिस वजह से वह मौजूद सभी दुल्हनों में विनीता सबसे अलग और सुन्दर लग रही थी.
विनीता का ये अनुपम सौंदर्य देख लखन का मन कर रहा था की वक़्त की रफ़्तार धीमी हो जाए और दो दिन बेहद धीमे बीते ताकि वो विनीता के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिता सके पर वक़्त तो अपनी गति से hi चलता है. कुछ यही स्थिति विनीता की थी पर वो दोनों अपने अपने मन के भावो को एक दुसरे से छुपकर ऐसे दिखा रहे थे जैसे उनके मन में एक दुसरे के लिए कोई प्रेमभाव नहीं है.
लखन सिंह विनीता के करीब आकर उन्हें दुबारा शादी के बारे में विचलित न होने के लिए समझने लगे.
लखन: आप चिंतित न हो पुजारी जी ने जो कहा उसके बारे में ज्यादा मत सोचिये मई जनता हु आपके मन में ऐसे कोई विचार नहीं है और लाए भी नहीं जा सकते क्युकी विचार पर किसीका ज़ोर नहीं चलता. और यकीन मानिये मेरे मन में भी आपके लिया ऐसा कोई भाव नहीं है. जैसे हमने उस दिन शादी की रस्मो को पूरा करा वैसे hi आज भी कर देंगे. किसी को कोई सफाई देने की ज़रूरत नहीं है.
लखन सिंह की बाते सुन कर विनीता को थोड़ी मायूसी हुई क्युकी उसे थोड़ी उम्मीद थी की शायद लखन सिंह के मन में भी उसके लिए थोड़ा बहुत प्रेम भाव उतपन्न हो गया हो पर लखन सिंह की बातो ने उसकी ग़लतफहमी को दूर कर दिया. वो अंदर से तो मायूस थी पर उसने इस मायूसी को अपने चेहरे पर नहीं आने दिया.
विनीता: आपकी बातो ने तो मेरी साडी चिंता दूर करदी मई भी यही सोच रही की ये दिल से शादी वाली रस्म कैसे पूरी करुँगी.
विनीता कज बातो ने लखन सिंह का दिक् तोड़ दिया और यकीन दिला दिया की विनीता के मन में उनके लिए न कभी कुछ था न कभी कुछ हो सकता है उसने अच्छा करा जो विनीता को इस ज़बरदस्ती की शर्त से आज़ाद कर दिया.
पुजारी: आप दोनों तैयार हो तो विवाह की रस्मो को पूरा करा जाए.
लखन विनीता- जी
पुजारी: पहले आप दोनों का विवाह आर्य रीति से हुआ पूरे रीति रिवाज़ो से पर यहाँ आपका और बाकि सभी जोड़ो का गंधर्व रीति से विवाह कराया जाएगा जिसे हम प्रेम विवाह भी कह सकते इसलिए इस विवाह से पहले पति पत्नी में प्रेम होना ज़रूरी है. गन्धर्व विवाह में आपके लिए शारीरिक सम्बन्ध बनाने की बाध्यता नहीं है पर रिश्ते में प्रेम है तो आप गन्धर्व विवाह के लिए पत्र है. अगर इतने दिनों में आप दोनों के मन में एक दुसरे के लिए थोड़ा प्रेम भी उत्पन्न हुआ है तो आप गन्धर्व विवाह के पत्र है. तो बोलिये क्या आप दोनों खुद को इस विवाह का पत्र समझते है.
विनीता ने लखन सिंह की तरफ देखा और लखन सिंह ने उन्हें आँख से हामी भर देने का इशारा करा और दोनों ने सम्मिलित रूप से हामी भर दी. हलाकि सत्य तो यही था की प्रेम उन दोनों के मन में था इसलिए एक दुसरे से छुपाते हुए भी वो इस विवाह के पूरी तरह पत्र थे.
पुजारी: उत्तम तो अब इस विवाह की रस्मे बता दू इसकी रस्मे आर्य विवाह की तरह लुम्बी और जटिल नहीं है. इसमें आप को अग्नि के सात नहीं केवल तीन फेरे लेने है वो भी बस एक दुसरे का हाथ थाम कर. एक दुसरे को ये वचन देते हुए की आप सदा एक दुसरे के लिए ऐसे hi प्रेम बनाए रखेंगे, हर सुख दुःख का सामना मिल कर करेंगे, और कभी भी भौतिक वस्तुओ सुख सुविधाओं को अपने प्रेम पर हावी नहीं होने देंगे. बस इसके बाद आपको एक दुसरे को माला पहनकर एक दुसरे को पति पत्नी के रूप में स्वीकार करना है. और पुरुष को स्त्री की मांग में सिन्दूर भर देना है बस ये विवाह संपन्न हो जाएगा.
विनीता: इस विवाह की रस्मे तो बहुत छोटी है.
पुजारी: इसीलिए इसे प्रेम विवाह कहा जाता है और आजकल तो ये बहुत प्रचलन में है पुराने समय में भी इस विवाह के अनेको उदाहरण देखने को मिल जाते है भीष्म के पिता शांतनु और सत्यवती का विवाह, राजा दुष्यंत और शकुंतला का विवाह, भीम और हिडम्बा का विवाह, अर्जुन और नागकन्या उलूपी का विवाह और भी न जाने कितनी बार इस तरह का विवाह किया गया है. तो अब सभी 101 जोड़ो से अनुरोध है की वो अपने अपने हवन कुंड के सामने खड़े हो जाए.
विनीता और बाकी 100 जोड़े हवन कुंडो के पास खड़े हो गए और पुजारी के कहने पर सबने अपने अपने जोड़ो का हाथ थम लिया विनीता और लखन ने भी. और अग्नि के फेरे लेना आरम्भ कर दिया. विनीता और लखन सच्चे मन से एक दुसरे से छुपाते हुए ये रस्मे पूरी कर रहे थे और मन hi मन एक दुसरे को वचन दे रहे थे.
लखन मन में: आपने मेरे दिल में जो प्रेम का बीज बो दिया है वो आपके जाने के बाद भी मेरे दिल से कभी ख़तम नहीं होगा.
विनीता मन में: मई जानती हु हमारे बीच उम्र और रिश्तो की जो दीवार है वो कभी नहीं टूटेगी पर मेरा प्रेम उम्र की सीमा से परे है.
लखन मन में: आप भले hi यहाँ से चली जाओ पर आपके जीवन की हर परेशानी अब मेरी परेशानी है जिसे मई हर कीमत पर दूर करके रहूँगा. आपको ज़िन्दगी में कभी भी मेरी ज़रुरत पड़ी तो मई हर मदद पर आपका साथ दूंगा.
विनीता मन में: अब इस पूजा की रस्म कुछ भी हो वादा करती हु हर रस्म पुरे दिल से पूरी करुँगी खुद को न्योछावर भी करना पड़ा तो पीछे नहीं हटूंगी ये वादा करती हु.
लखन मन में: कोई भौतिक सुविधा मेरे दिल में आपके लिए प्रेम को ख़तम नहीं कर सकती.
विनीता मन में: आपकी उम्र भी मुझे आपको प्यार करने से नहीं रोक सकती.
तीन फेरो के बाद सभी जोड़ो ने एक दुसरे को माला पहनकर एक दुसरे के प्रति अपने प्रेम पर मोहर लगा दी. और लखन सहित सभी पुरुषो अपनी अपनी पत्नियों की मांग में सिन्दूर भर दिया. और भगवान् सूर्य को साक्षी मान कर एक दुसरे को पति पत्नी के रूप में स्वीकार करा. फिर सभी शादीशुदा जोड़ो ने सूर्य की प्रतिमा का आशीर्वाद लिया.
और ढोल नगाड़े वालो ने ढोल बजाना शुरू कर दिया सभी शादी शुदा जोड़ो ने भगवान् सूर्य की प्रतिमा के चारो और नाचना गण शुरू कर दिया. विनीता ने भी नृत्य की एक सुन्दर प्रस्तुति दी. पर लखन जरूर नृत्य में थोड़े कच्चे थे पर उनके इस कच्चे नृत्य पर भी विनीता को प्यार hi आ रहा था. सूर्यास्त होने को था और सूर्यास्त के साथ hi ये उत्सव एयर सूर्य पूजा के सातो चरण पुरे हो गए थे और इस तरह विनीता लखन की गृह पूजा में एक और गृह की पूजा संपन्न हो चुकी थी.
पुजारी: अंदर आश्रम में सबके भोजन का प्रबंध करा गया है आप दोनों भी अंदर चलकर भोजन करले उसके बाद अघोरी बाबा आपको चंद्र पूजा की सभी विधियों के बारे में सूचित कर देंगे जिसके बाद आप रथ द्वारा अपनी चंद्र पूजा वाली जगह के लिए प्रस्थान कर लीजियेगा.
सूर्य पूजा पूरी हो चुकी थी यु तो इस पूजा में विनीता लखन के बीच ऐसी कोई इंटिमेट चीज़ नहीं हुई न विनीता को बदन दिखाऊ कपडे पेहेन्ने पड़े पर कुछ मैने में ये पूजा काफी विशेष थी क्युकी इस पूजा ने उनके मन में एक दुसरे के लिए जो प्रेम था उससे खुद को परिचित करा दिया था. अब तक पूजा की जो रस्मे उनकी मजबूरी बानी हुई थी जिन्हे जल्द से जल्द पूरा होने के बारे में वो सोचते थे अब वो उन्ही रस्मो के धीमे धीमे बीतने की प्रार्थना कर रहे थे. ये प्रेम उनकी आने वाली पूजा को आसान बनाने वाला था या मुश्किल ये तो समय hi जनता था. सूरज लाल आभा के साथ दूर छितिज में डूब रहा था और आसमान में छंद का हल्का हल्का अक्सा उभर कर आ रहा था ये संकेत था की तपिश के सौदागर सूर्य का समय ख़तम हो गया और अब समय था शीतलता के वाहक चंद्र का.
आश्रम में एक बार फिर एक दुल्हन का परिधान विनीता के सामने था. यु तो वो पहले भी लखन से शादी कर चुकी थी पर इस बार उसे पुरे मन से लखन को अपने पति के रूप में स्वीकार करना था. जब कुछ दिन पहले लखन सिंह के साथ उसकी शादी हुई तब उसके मन में अनेको सवाल थे की पता नहीं एक अनजान आदमी के साथ एक एकांत जगह पर वो सुरक्षित रहेगी की नहीं कही इतने सालो से अपने पति के बिना रह रहे लखन सिंह उसे देखकर बहक तो नहीं जाएंगे. पर पिछले कुछ दिनों में उसने लखन सिंह को जितना जाना जितना समझा अब उसके मन में ऐसे कोई सवाल नहीं थे बल्कि इन कुछ दिनों में वो जितना करीब अपनी इस 7 दिन के पति के आ गई थी उतना तो अपने असली पति के भी नहीं आई थी. पर करीब आना एक अलग बात है और पति के रूप स्वीकार कर लेना अलग. करीब हम कई लोगो के होते है पर सबको अपना सब कुछ नहीं मान लेते.
पर पिछले कुछ दिन में उसके और लखन सिंह के बीच जो हुआ वो करीब से कुछ ज्यादा था. उसने लखन सिंह की गोड़ में बैठ कर अपने नितम्ब पर उनके लिंग को महसूस करा पूरी रात उनके आलिंगन में गुज़री उनके सामने तरह तरह के आकर्षक और उत्तेजक वस्त्र पहने और कल रात कल रात तो उसने उनका लिंग अपने मुँह में लिया उनका वीर्य पिया उनके मूत्र से स्नान करा. इन सब बातो ने लखन सिंह के प्रति विनीता के मन के विचारो में बहुत बड़ा बदलाव ला दिया था और लखन सिंह विनीता के लिए सिर्फ उसकी सहेली के ससुर नहीं रह गए थे बल्कि उससे कही आगे बाद गए थे. पहली बार लखन सिंह के बारे में सोचते हुए विनीता को अपनी जांघो के बीच गीला गीला महसूस हो रहा था जो इस बात का सबूत था की कही न कही वो भी इस शादी को असली जमा पहनना चाहती है पर समाज मर्यादा और उम्र का अंतर उसे ऐसा करने से रोक रहा है पर आज फिलहाल उस पर कोई रोक नहीं है आज वो पुरे मन से लखन सिंह को अपना पति मान सकती है और बचे हुए दो दिन के लिए hi सही उसे एक सच्चे और अच्छे पति का साथ तो मिलेगा जिससे वो पुरे मन से अपना पति मानती है.
यही सोचते हुए विनीता के हाथ उस शादी के जोड़े पर पहुंच गए और उसने एक बार फिर खुद को लखन सिंह की दुल्हन के रूप में तैयार करना शुरू कर दिया. पर पिछली बार तैयार होते वक़्त विनीता के मन में दुविधा थी पर इस बार ख़ुशी इस बात की उसे एक सच्चा पति कैसा होता है वो अनुभव करने का मौका मिला पर साथ hi ये गम भी था की अनुभव सिर्फ दो दिन का hi और है. विनीता ने एक बार फिर खुद को एक दुल्हन के बार में तैयार कर लिया और इस बार विनीता पहले से भी ज्यादा सुन्दर लग रही थी क्युकी इस बार के श्रृंगार में मजबूरी नहीं बल्कि प्रेम था सच्चा प्रेम.
दूसरी तरफ लखन सिंह का मन अब भी दुविधा में था की क्या विनीता जी आज की शादी को पुरे मन से कर पाएगी. भला मई उनसे ऐसी उम्मीद कर भी कैसे सकता हु की वो मुझे सच्चे मन से अपना पति मान ले वो मेरी बेटी से भी उम्र में छोटी है. वो इतना कुछ कर रही है मेरे परिवार के लिए यही बहुत इससे ज्यादा न मई डेसेर्वे करता हु न मुझे उम्मीद करनी चाहिए. बेशक उनकी अपनी शादीशुदा ज़िन्दगी में अनेको परेशानिया है उनकी शादी टूटने की कगार पर है पर इसका ये मतलब नहीं की मई उनसे उम्मीद करू की वो मुझे अपना पति मान ले. अभी उनकी उम्र hi क्या है उनकी शादी टूट भी जाए तब भी उन्हें अपना हमउम्र हमसफ़र मिल hi जाएगा. मई उनसे ये उम्मीद नहीं कर सकता की वो अपने से उम्र में दुगने इंसान को अपना पति मान कर उसके साथ अपनी ज़िन्दगी गुज़ार दे अपनी जवानी एक बुड्ढे पर क़ुर्बान करदे.
नहीं मई ऐसा सोच भी नहीं सकता पर यहाँ सवाल इस बात का है की क्या मई उन्हें सच्चे मन से अपनी पत्नी मान सकता हु. सच में अपने दिल से पूछू तो मई तो उन्हें अपनी पत्नी उसी दिन मान बैठा था जिस दिन हमने जंगल में खुले आकाश के नीचे वो रात बीते थी और उन्होंने मुझे अपनी शादी की सच्चाई से रूबरू करवाया था. उसी दिन मेरे दिल में उनके लिए एक सॉफ्ट कार्नर बन गया था जिसे मई चहु भी तो भी नहीं नकार सकता इसलिए अगर मई अपने साइड से देखु तो मई सच्चे मन से उन्हें अपनी पत्नी मान कर hi आज की शादी में बैठूंगा. पर मई उनके सामने अपने मन के भाव ज़ाहिर नहीं कर सकता वर्ण वो मेरे बारे में क्या सोचेगी वो तो इंसानियत और दोस्ती का फ़र्ज़ निभाते हुए ये साडी रस्मे पूरी कर रही है अगर मई उनसे ये केहड़ू की मुझे उनसे प्यार हो गया है तो शायद उन्हें मुझसे नज़रे मिलाने में झिझक महसूस होने लगे. वो मुझे ठरकी बुद्धा समझने लगे जो मौके का फायदा उठाते हुए अपने से उम्र में आधी अपनी hi बहु की सहेली पर चांस मार रहा है. वो ये सोचेंगी की उनकी शादीशुदा ज़िन्दगी की सच्चाई जान कर उनकी ज़िन्दगी में एक मर्द की कुमी का सच जान कर मई उन्हें हासिल करने की कोशिश कर रहा हु, उनकी मजबूरी का फायदा उठा रहा हु.
नहीं मई ऐसा कटाई नहीं करूँगा मई इस शादी में बैठूंगा ज़रूर पर उनसे यही कहूंगा की मेरे मन में ऐसा कुछ नहीं है और उन्हें भी ज़बरदस्ती ऐसा कुछ सोचने की ज़रूरत नहीं है. जैसे हमने पहले मजबूरी में शादी की रस्मे पूरी कर्ली थी वैसे hi आज भी कर लेंगे. वो निश्चित hi इस बात पर गिल्ट महसूस करेंगी की उनके मन में मेरे लिए कुछ नहीं है पर फिर भी उन्हें ऐसा सोचने के लिए विवश करा जा रहा है जब उन्हें पता चलेगा की मेरे मन में भी उनके लिए ऐसा कुछ नहीं है तो उनके अंदर का गिल्ट कम हो जाएगा. दोनों के मन में एक दुसरे के लिए शामे फीलिंग्स थी पर दोनों hi एक दुसरे की भावनाओ को हर्ट न करने के लिए अपनी अपनी फीलिंग्स छुपाने का ढोंग कर रहे थे.
दोनों दूल्हा दुल्हन के रूप में तैयार हो गए जब विनीता दुल्हन के लिबास में तैयार होकर लखन सिंह के सामने आई तो इस बार विनीता के रूप की सुंदरता से लखन सिंह की नज़रे नहीं हैट रही थी. दुल्हन तो वो पहले भी बानी थी पर लखन की आँखों में उसके लिए जो प्यार था उसने उसे और भी सुन्दर बना दिया था सूर्य सी दमकती सुनहरी साडी और उसपर बेहद हल्का मेकअप जिस वजह से वह मौजूद सभी दुल्हनों में विनीता सबसे अलग और सुन्दर लग रही थी.
विनीता का ये अनुपम सौंदर्य देख लखन का मन कर रहा था की वक़्त की रफ़्तार धीमी हो जाए और दो दिन बेहद धीमे बीते ताकि वो विनीता के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिता सके पर वक़्त तो अपनी गति से hi चलता है. कुछ यही स्थिति विनीता की थी पर वो दोनों अपने अपने मन के भावो को एक दुसरे से छुपकर ऐसे दिखा रहे थे जैसे उनके मन में एक दुसरे के लिए कोई प्रेमभाव नहीं है.
लखन सिंह विनीता के करीब आकर उन्हें दुबारा शादी के बारे में विचलित न होने के लिए समझने लगे.
लखन: आप चिंतित न हो पुजारी जी ने जो कहा उसके बारे में ज्यादा मत सोचिये मई जनता हु आपके मन में ऐसे कोई विचार नहीं है और लाए भी नहीं जा सकते क्युकी विचार पर किसीका ज़ोर नहीं चलता. और यकीन मानिये मेरे मन में भी आपके लिया ऐसा कोई भाव नहीं है. जैसे हमने उस दिन शादी की रस्मो को पूरा करा वैसे hi आज भी कर देंगे. किसी को कोई सफाई देने की ज़रूरत नहीं है.
लखन सिंह की बाते सुन कर विनीता को थोड़ी मायूसी हुई क्युकी उसे थोड़ी उम्मीद थी की शायद लखन सिंह के मन में भी उसके लिए थोड़ा बहुत प्रेम भाव उतपन्न हो गया हो पर लखन सिंह की बातो ने उसकी ग़लतफहमी को दूर कर दिया. वो अंदर से तो मायूस थी पर उसने इस मायूसी को अपने चेहरे पर नहीं आने दिया.
विनीता: आपकी बातो ने तो मेरी साडी चिंता दूर करदी मई भी यही सोच रही की ये दिल से शादी वाली रस्म कैसे पूरी करुँगी.
विनीता कज बातो ने लखन सिंह का दिक् तोड़ दिया और यकीन दिला दिया की विनीता के मन में उनके लिए न कभी कुछ था न कभी कुछ हो सकता है उसने अच्छा करा जो विनीता को इस ज़बरदस्ती की शर्त से आज़ाद कर दिया.
पुजारी: आप दोनों तैयार हो तो विवाह की रस्मो को पूरा करा जाए.
लखन विनीता- जी
पुजारी: पहले आप दोनों का विवाह आर्य रीति से हुआ पूरे रीति रिवाज़ो से पर यहाँ आपका और बाकि सभी जोड़ो का गंधर्व रीति से विवाह कराया जाएगा जिसे हम प्रेम विवाह भी कह सकते इसलिए इस विवाह से पहले पति पत्नी में प्रेम होना ज़रूरी है. गन्धर्व विवाह में आपके लिए शारीरिक सम्बन्ध बनाने की बाध्यता नहीं है पर रिश्ते में प्रेम है तो आप गन्धर्व विवाह के लिए पत्र है. अगर इतने दिनों में आप दोनों के मन में एक दुसरे के लिए थोड़ा प्रेम भी उत्पन्न हुआ है तो आप गन्धर्व विवाह के पत्र है. तो बोलिये क्या आप दोनों खुद को इस विवाह का पत्र समझते है.
विनीता ने लखन सिंह की तरफ देखा और लखन सिंह ने उन्हें आँख से हामी भर देने का इशारा करा और दोनों ने सम्मिलित रूप से हामी भर दी. हलाकि सत्य तो यही था की प्रेम उन दोनों के मन में था इसलिए एक दुसरे से छुपाते हुए भी वो इस विवाह के पूरी तरह पत्र थे.
पुजारी: उत्तम तो अब इस विवाह की रस्मे बता दू इसकी रस्मे आर्य विवाह की तरह लुम्बी और जटिल नहीं है. इसमें आप को अग्नि के सात नहीं केवल तीन फेरे लेने है वो भी बस एक दुसरे का हाथ थाम कर. एक दुसरे को ये वचन देते हुए की आप सदा एक दुसरे के लिए ऐसे hi प्रेम बनाए रखेंगे, हर सुख दुःख का सामना मिल कर करेंगे, और कभी भी भौतिक वस्तुओ सुख सुविधाओं को अपने प्रेम पर हावी नहीं होने देंगे. बस इसके बाद आपको एक दुसरे को माला पहनकर एक दुसरे को पति पत्नी के रूप में स्वीकार करना है. और पुरुष को स्त्री की मांग में सिन्दूर भर देना है बस ये विवाह संपन्न हो जाएगा.
विनीता: इस विवाह की रस्मे तो बहुत छोटी है.
पुजारी: इसीलिए इसे प्रेम विवाह कहा जाता है और आजकल तो ये बहुत प्रचलन में है पुराने समय में भी इस विवाह के अनेको उदाहरण देखने को मिल जाते है भीष्म के पिता शांतनु और सत्यवती का विवाह, राजा दुष्यंत और शकुंतला का विवाह, भीम और हिडम्बा का विवाह, अर्जुन और नागकन्या उलूपी का विवाह और भी न जाने कितनी बार इस तरह का विवाह किया गया है. तो अब सभी 101 जोड़ो से अनुरोध है की वो अपने अपने हवन कुंड के सामने खड़े हो जाए.
विनीता और बाकी 100 जोड़े हवन कुंडो के पास खड़े हो गए और पुजारी के कहने पर सबने अपने अपने जोड़ो का हाथ थम लिया विनीता और लखन ने भी. और अग्नि के फेरे लेना आरम्भ कर दिया. विनीता और लखन सच्चे मन से एक दुसरे से छुपाते हुए ये रस्मे पूरी कर रहे थे और मन hi मन एक दुसरे को वचन दे रहे थे.
लखन मन में: आपने मेरे दिल में जो प्रेम का बीज बो दिया है वो आपके जाने के बाद भी मेरे दिल से कभी ख़तम नहीं होगा.
विनीता मन में: मई जानती हु हमारे बीच उम्र और रिश्तो की जो दीवार है वो कभी नहीं टूटेगी पर मेरा प्रेम उम्र की सीमा से परे है.
लखन मन में: आप भले hi यहाँ से चली जाओ पर आपके जीवन की हर परेशानी अब मेरी परेशानी है जिसे मई हर कीमत पर दूर करके रहूँगा. आपको ज़िन्दगी में कभी भी मेरी ज़रुरत पड़ी तो मई हर मदद पर आपका साथ दूंगा.
विनीता मन में: अब इस पूजा की रस्म कुछ भी हो वादा करती हु हर रस्म पुरे दिल से पूरी करुँगी खुद को न्योछावर भी करना पड़ा तो पीछे नहीं हटूंगी ये वादा करती हु.
लखन मन में: कोई भौतिक सुविधा मेरे दिल में आपके लिए प्रेम को ख़तम नहीं कर सकती.
विनीता मन में: आपकी उम्र भी मुझे आपको प्यार करने से नहीं रोक सकती.
तीन फेरो के बाद सभी जोड़ो ने एक दुसरे को माला पहनकर एक दुसरे के प्रति अपने प्रेम पर मोहर लगा दी. और लखन सहित सभी पुरुषो अपनी अपनी पत्नियों की मांग में सिन्दूर भर दिया. और भगवान् सूर्य को साक्षी मान कर एक दुसरे को पति पत्नी के रूप में स्वीकार करा. फिर सभी शादीशुदा जोड़ो ने सूर्य की प्रतिमा का आशीर्वाद लिया.
और ढोल नगाड़े वालो ने ढोल बजाना शुरू कर दिया सभी शादी शुदा जोड़ो ने भगवान् सूर्य की प्रतिमा के चारो और नाचना गण शुरू कर दिया. विनीता ने भी नृत्य की एक सुन्दर प्रस्तुति दी. पर लखन जरूर नृत्य में थोड़े कच्चे थे पर उनके इस कच्चे नृत्य पर भी विनीता को प्यार hi आ रहा था. सूर्यास्त होने को था और सूर्यास्त के साथ hi ये उत्सव एयर सूर्य पूजा के सातो चरण पुरे हो गए थे और इस तरह विनीता लखन की गृह पूजा में एक और गृह की पूजा संपन्न हो चुकी थी.
पुजारी: अंदर आश्रम में सबके भोजन का प्रबंध करा गया है आप दोनों भी अंदर चलकर भोजन करले उसके बाद अघोरी बाबा आपको चंद्र पूजा की सभी विधियों के बारे में सूचित कर देंगे जिसके बाद आप रथ द्वारा अपनी चंद्र पूजा वाली जगह के लिए प्रस्थान कर लीजियेगा.
सूर्य पूजा पूरी हो चुकी थी यु तो इस पूजा में विनीता लखन के बीच ऐसी कोई इंटिमेट चीज़ नहीं हुई न विनीता को बदन दिखाऊ कपडे पेहेन्ने पड़े पर कुछ मैने में ये पूजा काफी विशेष थी क्युकी इस पूजा ने उनके मन में एक दुसरे के लिए जो प्रेम था उससे खुद को परिचित करा दिया था. अब तक पूजा की जो रस्मे उनकी मजबूरी बानी हुई थी जिन्हे जल्द से जल्द पूरा होने के बारे में वो सोचते थे अब वो उन्ही रस्मो के धीमे धीमे बीतने की प्रार्थना कर रहे थे. ये प्रेम उनकी आने वाली पूजा को आसान बनाने वाला था या मुश्किल ये तो समय hi जनता था. सूरज लाल आभा के साथ दूर छितिज में डूब रहा था और आसमान में छंद का हल्का हल्का अक्सा उभर कर आ रहा था ये संकेत था की तपिश के सौदागर सूर्य का समय ख़तम हो गया और अब समय था शीतलता के वाहक चंद्र का.