“और तू भी अब पूरी जवान हो गई है बेटी...एक दम भरी हुई है बेटी।” पिताजी ने सलोनी की गोद में बैठी बेटी की जाँघों को और जोर से सहलाते हुए कहा:
“तेरी शादी कर देंगे तो तुझे भी जवानी का पूरा मजा मिलेगा। हाँ, यह बात है कि घर से ही सब सिख के जाना चाहिए — कि यौन आनंद कैसे लिया जाता है, कैसे चुदाई का लुत्फ उठाया जाता है। लेकिन वह तेरी माँ बता देगी बेटी। मुझे पक्का यकीन है कि शायद तेरी माँ ने कुछ तो बताया ही होगा। और यह अपने गाँव का रिवाज भी है। जो तुजे जल्द से जल्द सीखना चाहिए। तभी तो तेरा शरीर आकर्षक बनेगा। और अपने पति और ससुराल वालो को आकर्षित रख पाएगी।” फनलव रचित कहानी।
सलोनी पिता की गोद में और भी कसकर बैठ गई। उसकी छोटी स्लिप अब लगभग कमर तक चढ़ चुकी थी। उसकी फैंसी पैंटी पूरी तरह भीग चुकी थी और चूत का गीला उभार साफ दिख रहा था।
“हाँ बाबूजी... हम खूब बातें करते हैं। माँ भी बहुत कुछ कहती है।” सलोनी ने शरमाते हुए लेकिन आँखों में आग भरकर कहा, “जब मेरे ये भर रहे थे ना... तब माँ ने कहा था कि अब पैंटी और ब्रा से बाहर निकलो और घर में इनको खुलकर झूलने दो।”
पिताजी की आँखें सलोनी की भारी बोब्लो पर टिक गईं। स्लिप के पतले कपड़े से उसके स्तन की दिंटी (निप्पल्स) साफ उभरे हुए थे।
“अच्छा! तो तेरी माँ ने सही कहा है बेटी।” पिताजी ने बेटी की ऊपरी जाँघ को दबाते हुए कहा, “बुराई कुछ नहीं है। जहाँ हम रहते हैं, वहाँ के तौर-तरीके से ही जीना पड़ता है। यहाँ की सब लड़कियों के स्तन भरने लगते हैं तो उनकी माँएँ उन्हें ब्रा से बाहर निकलने को कहती हैं, ताकि वे आकर्षक बनी रहें। स्तन खुलकर झूलें, लड़कों की नजरें उन पर टिकें... यही तो चलन है।”
“हाँ बाबूजी, आप सही कह रहे हो।” सलोनी ने पिता की छाती से सटकर बोला, “इसीलिए मैंने ब्रा पहनना बंद कर दिया है। और आप हैं कि दो जोड़े खरीदकर लाए थे।”
पिताजी हँसे और बेटी की एक चुची के ठीक नीचे हाथ फेरते हुए बोले, “हाँ बेटी, तेरी माँ ने मुझे कहा था कि सलोनी अब ब्रा से बाहर निकालने का समय आ गया है। पर मैं चूतिया भूल गया और दो जोड़े ले आया। तेरी माँ ने कहा था कि कॉलेज में तो जरूरी है, वरना कोई भी लड़का इन झूलती हुई टेकरियों को पहाड़ बना सकता है। और निचे जब चरक्ति है तो पेंटी की जरुरत होती है वर्ना नहीं।”
सलोनी ने पिता की गोद में अपनी टाँगें और चौड़ी कर लीं। अब उसकी भीगी पैंटी पिताजी के कठोर लंड के बिल्कुल पास थी।
“ तो आप भी सही मानते है की मैंने ब्रा और पेंटी को तिलांजलि दे दी। लेकिन पापा... हमारी कॉलेज में सभी लड़कियों की टेकरियाँ अब पहाड़ बन रही हैं, क्या गलत है इसमें? और मेरे देखो... कितने छोटे हैं अभी मेरे...” उसने अपनी छाती को पापा के चहरे की ओर ले जाते हुए कहा। फनलव निर्मित।
सलोनी ने जानबूझकर अपनी छाती को आगे कर दिया, ताकि पिता उसके स्तनों को अच्छी तरह देख सकें।
“नहीं बेटी, कोई गलत नहीं है।” पिताजी ने बेटी की जाँघों को दोनों हाथों से दबाते हुए कहा, “लड़के लोग इसे दबाएँगे नहीं तब तक ये पहाड़ कैसे बनेंगे? लेकिन सब दबाव से करना होता है। कुछ लड़कियाँ तो घर में ही पहाड़ बनवा लेती हैं... अपनी माँ के सामने, या पिता के हाथों...भाई भी मदद कर देते है...दादाजी भी....मतलब घर के कोई भी आदमी से दबवा के अपने बोब्लो को सही आकार में ली आती है।”
“हाँ पापा, सही कह रहे हैं आप।” सलोनी ने पिता की गर्दन में हाथ डालते हुए कहा, “सभी लड़कियाँ घर और बाहर दबवा ही लेती हैं। माँ ने कहा था कि यह दबवाना जरूरी भी है। घर से हो तो बेहतर,बाहर इज्जत नहीं जाती। वरना सभी लोग दबा जाते हैं और फिर पीछे कहते हैं कि रंडी है।”
अब पिताजी की हालत खराब थी, उनका लंड पूरी तरह तन चुका था। पैंट के अंदर उनका मोटा, नसों वाला लंड खड़ा होकर फड़क रहा था। अगर सामने कोई वेश्या होती तो अब तक वे उसे सोफे पर लिटाकर जोर-जोर से चोद रहे होते। लेकिन यहाँ उनकी अपनी जवान बेटी सलोनी थी — अर्धनग्न, भीगी चूत और झूलते स्तनों के साथ उनकी गोद में बैठी हुई।
पिताजी की साँसें भारी हो गईं। उन्होंने बेटी को और कसकर अपनी गोद में दबाया, ताकि सलोनी को उनका खड़ा लंड साफ महसूस हो जाए।
“अब घर की बात है तो...” पिताजी ने गहरी आवाज में कहा, “मेरा पूरा हक है कि मैं अपनी बेटी को चुदाई सिखाऊँ...”
सलोनी का दिल जोरों से धड़कने लगा। उसकी चूत से और भी गर्म रस टपकने लगा। पैंटी का कपड़ा अब पूरी तरह भीगकर उसके चूत के होंठों से चिपक गया था। अब पेंटी भी उसकी चूत के रस को और पि नहीं सकती थी उतनी गीली हो गई थी की मानो अभी पेंटी को धो के राखी हो। वह पिता की गोद में हल्के से अपनी चूत को उनके कड़े लंड पर रगड़ने लगी।
पिताजी ने एक हाथ सलोनी की कमर पर रखा और दूसरे हाथ से उसकी एक भारी चुची को हल्के से दबाया। उनकी उँगलियाँ निप्पल के चारों ओर घूमने लगीं।
“बाबूजी...” सलोनी ने फुसफुसाते हुए कहा, लेकिन उसकी आवाज में शर्म की जगह सिर्फ़ भूख थी। मैत्री द्वारा एडिटेड।
“क्या हुआ बेटी?” उन्हों ने सलौनी की निपल पर थोडा सा भार देते हुए पूछा।
“बाबूजी, आप मेरी उस को दबा रहे थे न तो मेरे मुंह से बस ऐसे ही निकल गया।“ सलौनी ने अपने पिता के हाथ पर थोडा और जोर देते हुए कहा ताकि पिता का दबाव अपने बोब्लो पर ज्यादा पड़े और उन्हें कोई राह दिखे।
पिताजी की आँखों में अब पिता का प्यार नहीं, बल्कि बेटी की जवानी को चोदने की तीव्र इच्छा थी। उन्होंने सलोनी की जाँघों को और फैलाया और अपनी हथेली को धीरे-धीरे उसकी भीगी पैंटी की तरफ बढ़ाने लगे... अब मर्यादा टूटने पर है.................
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बने रहिये...............................