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- Dec 5, 2013
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सरिता अपना फ़ोन no. सविता को dek-kar निकल जाती है. निश्छल अपनी बालकनी पर खड़ा होकर अपने गलो को सहलाते हुवे मन में सोचता है की बड़ी तीखी मिर्ची है ये मिस जोशी तो. इससे बच कर रहना पड़ेगा.
सरिता के जाते हुवे निश्छल देखता रहता है . तभी पीछे से सविता भी बालकनी पर आ जाती है और निश्छल के कंधे पर हाँथ रखकर उससे बोलती है.
सवी- क्या देख रहा है निशु. बहुत परेशां है बेचारी. इसलिए तुझपर गुस्से से चिल्ला रही थी. भूल जा इस बात को भाई और उसकी मैडम कर दे.
सविता की बात सुनकर निश्छल ने उसकी तरफ देखते हुवे कहा.
निश्छल- मैं उसकी मदद बिलकुल भी नहीं करूँगा. वो जाने और उसका काम जाने.
सवी- इसका मतलब तुम अपनी दी की बात नहीं मानोगे. मैंने उससे प्रॉमिस किया है की तुम उसकी मदद करोगे. मानती हूँ की उसने तुमसे चिल्लाकर बात की, लेकिन वो परेशां थी बेचारी. कर दे न उसकी मदद.
निश्छल- वो आपको बेचारी दिखती है और आपको क्या जरूरत थी उससे प्रॉमिस करने की. चलो मन की चिल्लाने तक तो ठीक था दी, लेकिन उसने तो हद hi कर दी. उसने आज फिर से………
इतना बोलकर निश्छल चुप हो गया और अपने गलो को सहलाने लगा. जिसे देखकर सरिता सोच में पद गयी और चुंकते हुवे बोली.
सवी- फिर से मतलब. फिर से थप्पड़. मतलब… कही ये वही लड़की तो नहीं जिसने उस दिन मार्किट में तुम्हे थप्पड़ मारा था. ये लड़की hi है न. वैसे तुम्हे बिलकुल सही नाम दिया है उसे लेडी डॉन. वैसे एक बात कहूँगी मैं वो लड़की बिलकुल तुम्हारे टक्कर की है. बिलकुल निडर, निर्भीक और बहादुर.
निश्छल- (मुंह बिचकाते हुवे) वैसे बात क्या थी. कुछ बताया उसने.
सविता ने निश्छल को पूरी बात बता दी. जिसे sun-ne के बाद निश्छल सोच में पद गया. फिर वो अपने कमरे में चला गया और तैयार होकर सविता से बोलकर घर से बहार निकल गया. सरिता घर आ गयी थी. उसके ऊपर केस चल रहा था तो वो पस नहीं जा रही थी. वो अपने कमरे में बैठी हुई सोच रही थी की तभी उसके फ़ोन पर पस से कॉल आया उसे फ़ोन उठाया.
सविता- Hello
उधर से बोलने वाले की आवाज़ सुनकर सरिता के फेस एक्सप्रेशन चेंज हो जाते हैं. पस से निश्छल का फ़ोन था.
निश्छल- मिस जोशी. क्या तुमको बुढ़िया की शकल याद है.
सरिता- हाँ.. याद है.
निश्छल- तुरंत पस पहुँचो. कोई बहाना कोई आर्गुमेंट मुझे नहीं चाहिए. मैं तुम्हारा बॉस हूँ. जितना बोल रहा हूँ. उतना करो. तुरंत पस पहुँचो.
निश्छल जनता था की अगर सरिता को बोलने का मौका दिया तो तो तरह तरह के बहाने बनाने लगेगी इसलिए उसने उसे आर्डर देने के तुरंत बाद फ़ोन काट दिया. इधर सरिता कुछ बोलना चाहती थी लेकिन तब तक फ़ोन काट चूका था. उसे निश्छल पर बहुत गुस्सा आ रहा था जो उसने बिना बात सुने hi फ़ोन काट दिया था. सरिता ने बड़बड़ाते हुवे कहा.
सरिता- पता नहीं अपने आपको क्या समझता है. हिटलर कही का. मेरी बात भी नहीं सुनी और फ़ोन काट दिया. पता नहीं क्या काम पद गया इसे मुझसे. कही सुबह की बात का बदला तो नहीं लेगा मुझसे. हे भगवन कहाँ फंसा दिया है तुमने मुझे. अब हुकुम आया है तो जाना hi पड़ेगा. नहीं तो वो हिटलर पता नहीं क्या करेगा.
यही सोचते हुवे सरिता तैयार होकर पस पहुँचती है तो सरिता को देखते hi उसके साथ काम करने वाले सभी अपने चेयर से उठकर उसे सलूट किया. ये देखकर सरिता को बहुत अच्छा लगा की काम से काम उसके साथ काम करने वालो को भरोषा है की उसने कोई गलत काम नहीं किया है. सरिता निस्चल का पूछी तो उसे केबिन की तरफ इशारा करके बताया गया.
सरिता जब केबिन में गयी तो वह पर निस्चल स्क्रीच आर्टिस्ट के साथ बैठा था. सरिता को देखते hi वो उठकर उसके पास आया और उसका हाँथ पकड़कर उसे लेजाकर कुर्सी पर बैठा दिया और बोलै.
निश्छल- स्क्रीच आर्टिस्ट को उस बुढ़िया की पूरी डिटेल्स बताओ.
सरिता- लेकिन किसलिए.
निश्छल- मैं सही कहता हूँ. तुम्हारे दिमाग का नट बोल्ट ढीला हो गया है. क्या तुम मेरी कोई भी बात बिना बहस किये नहीं मन सकती हो. अब मेरा दिमाग ज्यादा ख़राब मत करो और चुपचाप बैठकर स्क्रीच आर्टिस्ट को बुढ़िया की पूरी डिटेल्स बताओ.
सरिता निश्छल की बात सुनकर चुपचाप स्क्रीच आर्टिस्ट को उस बुढ़िया की पूरी डिटेल्स बताने लगी. कुछ hi देर में स्क्रीच बैंकर तैयार हो गया. निश्छल ने आर्टिस्ट को थैंक्स बोलकर स्क्रीच लेकर पस से बहार चला गया.
सरिता भी उसके बॉस अपने क्वार्टर पर वापस आ गई. सरिता अपने आपको बेक़सूर साबित करने के लिए हर संभव कोशिश कर रही थी. उसने यहाँ वह बहुत हाथ पेअर मरे, लेकिन उसे ऐसा कोई सुराग नहीं मिला था जिससे वो अपने आपको बेगुनाह साबित कर सके. आज एक हफ्ते पूरा हो चूका था. दोपहर का समय था. प्रधान की दी हुई समय की मियाद के पूरी होने में कुछ hi घंटा का समय शेष था.
सरिता को अब लगने लगा था की उसकी नौकरी चली जाएगी, क्योंकि अपनी बेगुनाही से जिस साबुत को वह एक हफ्ते से लगातार ढूंढ रही है. वह कुछ घंटो में कैसे ढूँढा जा सकता था. सरिता पस भी नहीं जा रही थी. सरिता ईमानदार थी ये सबको पता था, लेकिन वो कहते हैं न की जहाँ आपके चाहने वाले होते हैं वह आपके नापसंद भी करने वाले होते हैं. तो सरिता के रिश्वत लेने वाली बात जंगल में आग की तरह सरे डिपार्टमेंट में फ़ैल गयी थी.
सरिता आगे आने वाली मुसीबत के बारे में सोच रही थी की जिस नौकरी के लिए उसने रात दिन एक कर दिया था वो कुछ घंटा बाद उसे चीन ली जाएगी और जो बदनामी होगी वो अलग. वो यही सब सोचते हुवे अपने कमरे में चक्कर लगा रही थी. तभी सरिता के मोबाइल की घंटा बजी. उसने अपना फ़ोन उठाया. जो किसी अननोन NO. से था. सरिता ने फ़ोन उठाया.
सरिता- Hello.
ूंकंऊ- मिस सरिता जोशी.
सरिता- जी हाँ. आप कौन.
ूंकंऊ- जी मैं सीबीआई से प्रधान बोल रहा हूँ.
सरिता- जय हिन्द सर. फरमाइए सर.
प्रधान- जय हिन्द मिस जोशी. हमने ये बताने के लिए आपको फ़ोन किया है की आप पर लगाए गए सरे आरोप बबुनिया साबित हुए हैं. आपकी खिलाफ जितनी कम्प्लाइंस थी. सब फाल्स थी. इसलिए आप कल से अपनी ड्यूटी ज्वाइन कर सकती हैं.
सरिता ने जैसे hi ये खबर सुनी. ख़ुशी से उछाल पड़ी. उसे तो विश्वास hi नहीं हो रहा था की उसके ऊपर लगा आरोप बेबुनियाद साबित हो चूका है. लेकिन ये सब हुवा कैसे उसके समझ में ये नहीं आ रहा था. तो उसने ख़ुशी से प्रधान से पुछा.
सरिता- थैंक यू सर जी. मैंने तो पहले hi कहा था की मैंने कुछ नहीं किया है. लेकिन फिर भी अपने मेरी बात का भरोषा नहीं किया, लेकिन आप मुझे ये बताइये की आपको मेरी बात पर भरोषा अब कैसे हो गया. मेरी बेगुनाही का सबूत आपको कहा से मिला.
प्रधान- देखिये मिस जोशी. हम सुबूतों के आधार पर hi अपना काम करते हैं उस समय आपके खिलाफ हमको सुबूत मिले थे. हमने आपको रेंज हांथो पकड़ा था, लेकिन बाद में हमें आपकी बेगुनाही का सुबूत मिला इसलिए आपकी ड्यूटी बहाल की जा रही है.
सरिता अभी और कुछ कहना चाहती थी, लेकिन तब तक प्रधान ने फ़ोन कट कर दिया था. फ़ोन रखने के बाद सरिता के चेहरे पर ख़ुशी साफ झलक रही थी. सरिता ने सोचा की आखिर प्रधान को मेरी बेगुनाही का सुबूत मिला कैसे. तभी उसे याद आया की हिटलर (निश्छल) ने उस दिन स्क्रीच आर्टिस्ट से उस बुढ़िया का स्क्रीच बनवाया था. तो कही ये हिल्टर का काम तो नहीं है.
लेकिन उसने ऐसा क्या कर दिया की मेरी बेगुनाही का सुबूत लेकर आ गया. कही उसने उस बुढ़िया को खोज तो नहीं लिया है. जिसे मैं इतने दिन से खोजने की कोशिश कर रही थी. अब ये तो पस जाने के बाद hi पता चलेगा की आखिर ये सब हुवा कैसे. यही सब सोचते हुवे आज का दिन ख़ुशी ख़ुशी गुजर गया. रात में सरिता ने अपने घर में बात की और खाना पीना करके सो गयी.
अगले दिन सुबह सबेरे उठकर उसने साडी तयारी की और नाश्ता करके पस के लिए निकल गयी. जब सरिता पस पहुंची तो सारा स्टाफ सरिता को दोबारा से देखकर बहुत खुश था. सरिता का सभी ने अभिवादन किया. जिसे सरिता ने अपना सर हिलाकर स्वीकार किया. उसके बाद सरिता रावत सर के पास गयी और बोली.
सरिता- गुड मॉर्निंग सर जी.
रावत सर- अरे बेटी तुम. वैरी वैरी गुड मॉर्निंग . तुम्हे यहाँ दोबारा देखकर मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है. मुझे पहले से पता था की तुम बेगुनाह हो. किसी ने तुम्हे फंसने की कोशिश की है, लेकिन मैं तुमसे माफ़ी भी चाहता हूँ बेटी की मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर पाया.
सरिता- नहीं सर. आप क्यों माफ़ी मांग रहे हैं. आप ने हमेशा मेरा भला hi सोचा है. आपने तो मुझे पहले से hi आगाह कर दिया था इसके बारे में की कोई मेरी झूठी कम्प्लेन कर रहा है. आपसे जितना बन पड़ा आपने किया मेरे लिए. इसलिए आप मुझसे माफ़ी मांग कर मुझे शर्मिंदा मत कीजिये. लेकिन एक बात मेरी समझ में नहीं आयी की मेरी बेगुनाही का सुबूत प्रधान सर को कहा मिला.
रावत सर- ये सब अपने निश्छल बेटे ने किया है. उसी ने दिन रात एक कर दिया था तुम्हारी बेगुनाही का सुबूत ढूंढने के लिए. तुम्हे पता नहीं है की तुम्हारे नाम से रिश्वत लेने की जितनी भी कम्प्लाइंस आयी थी वो सब फर्जी थी. जब निश्छल ने साडी कम्प्लाइंस की इन्वेस्टीगेशन किया तो पता चला की जिस एड्रेस और जिस नाम से वो कम्प्लाइंस भेजी गयी हैं उस ाड्र्स और वो नाम दोनों फर्जी निकले और वह पर इस नाम का कोई भी आदमी नहीं मिला.
किसी ने भी इस बात के ऊपर ध्यान hi नहीं दिया की कम्प्लाइंस फाल्स भी हो सकती है. ये तो अच्छा हुवा की निश्छल बेटे ने बहुत बारीकी से इस केस को ऑब्सेर्वे किया और उसने साडी सच्चाई सामने लायी. जिससे तुम्हारी बेगुनाही साबित हो गयी.
सरिता- लेकिन मेरी बेगुनाही का सुबूत तो वो बूढ़ी दादी थी. जिन्होंने मुझे इस केस में फंसाया था. उनके मिले बिना मेरी बेगुनाही संभव hi नहीं थी. तो क्या हिटलर ने… (दांतो टेल ऊँगली दबाकर) मेरा मतलब है सर ने उनको ढूंढ लिया है.
रावत सर- इसके बारे में मुझे कुछ भी पता नहीं है बेटी. ये सब निश्छल ने किया है तो उसी को इसके बारे में पूरी जानकारी होगी. अच्छा ये सब छोडो. तुम इतने दिन बाद पस आयी हो तो जाओ कुछ काम कर लो. जब निश्छल आएगा तो उससे पूछ लेना तुम जो पूछना होगा तुम्हे.
रावत सर की बात सुनकर सरिता हाँ में सर हिलाते हुवे अपने केबिन में चली गयी और अपनी चेयर पर बैठकर अपने हांथो में पेन उठाकर उसको अपनी ऊँगली में फंसकर हिलाते हुवे सोचने लगी.
सरिता- (अपने मन में) यार ये बुद्धि दादी तो बड़ी शातिर थी. मुझे फंसा कर कैसे गायब हो गयी थी उस दिन. लेकिन इस हिटलर ने दादी को ढूँढा कैसे. मुझे तो कही भी नहीं मिली थी वो दादी. मैंने भी तो कितनी कोशिश की थी ढूंढने की. चलो जब हिटलर आएगा तो उसी से पूछ लुंगी की बुद्धि दादी हैं कहा. वैसे एक बात तो है. हिटलर उतना भी बुरा नहीं है जितना मैं उसे समझती हूँ. मैंने hi उसे समझने में गलती कर दी. बेवजह बिना पूरी बात जाने उसे थप्पड़ भी मर दिया. मैं उससे माफ़ी मांग लुंगी. आखिर गलती तो मेरी hi थी इन सब में.
कुछ देर इसी तरह सोचने के बाद सरिता ने बेल्ल बजाकर एक हवलदार को बुलाया और उससे जान्हवी को अंदर भेजने के लिए कहा. थोड़ी hi देर में जान्हवी, रंजना और विकास उसके केबिन में आये.
जान्हवी- आपका एक बार फिर से इस पस में स्वागत है मैडम, हम लोगो ने आपको बहुत मिस किया. हमें तो आपके ऊपर पूरा भरोषा था की आपने कुछ भी नहीं किया है. लेकिन हम लोग आपकी मदद नहीं कर सकते थे. इसके लिए सॉरी.
सरिता- इतस ोकक जान्हवी. जब मैंने खुद इतनी दौड़ धुप की और मुझे कुछ नहीं मिला तो मैं तुम लोगो को क्यों तकलीफ देती इसके लिए. वैसे सर ने बहुत मैडम की मेरी.
रंजना- हाँ मैडम सीओ सर ने इस मामले को अपने हांथो में ले लिया था और बहुत hi बारीकी से सब छान बिन की और पोरे मामले को इन्वेस्टीगेट किया. उन्होंने दिन रात एक कर दिया आपको बेगुनाह साबित करने के लिए. जावेद और मोहित भी सर के साथ hi थे इस पूरी इन्वेस्टीगेशन में.
सरिता- अच्छा. जावेद भी था. जावेद आया है क्या आज पस में. जरा उसे भेजना मेरे पास.
फिर तीनो सरिता को सेलुटे करके केबिन से बहार चले जाते हैं. थोड़ी देर बाद केबिन का दूर नॉक होता है और सरिता अंदर आने के लिए बोलती है. जावेद सरिता के सामने जाकर खड़ा हो जाता है. सरिता उसे बैठने का इशारा करती है. जावेद सरिता के सामने कुर्सी पर बैठ जाता है. सरिता जावेद से मुखातिब होते हुवे बोली.
सरिता- जावेद. सुना है की मेरे केस में तुम भी पूरी तरह से इन्वॉल्व थे मुझे बेगुनाह साबित करने के लिए.
जावेद- जी मैडम. हमको आपकी ईमानदारी पर पूरा भरोषा था, इसलिए मैंने और मोहित ने सर के साथ मिलकर अपनी जान लगा दी इस केस में.
सरिता- केस मेरा था और मुझे hi कोई जानकारी नहीं मिल रही है इस केस के बारे में. मुझे तुम पूरी बात बताओ.
जावेद- सॉरी मैडम नहीं बता सकता आपको कुछ भी.
सरिता- क्यों नहीं बता सकते मुझे. केस मेरा था और मुझे jan-ne का पूरा हक़ है. तुम्हे बताने में कोई प्रॉब्लम है क्या.
जावेद- नहीं मैडम मुझे बताने में कोई प्रॉब्लम नहीं है. लेकिन मैं नहीं बता सकता. मेरी कुछ मजबूरी है.
सरिता- अरे ऐसी क्या मजबूरी है जो तुम मुझे नहीं बता सकते इस केस के बारे में.
जावेद- क्योंकि सर ने आपको इस केस के बारे में कुछ भी बताने से मन किया है. इसलिए मैं आपको कुछ भी नहीं बता सकता.
सरिता- कौन से सर ने मन किया है तुम्हे.
जावेद- निश्छल सर ने मन किया है.
सरिता- क्या. वो हिट.. मेरा मतलब है की सर पागल हो गए हैं क्या. मेरा केस है और मुझे hi कुछ बताने से मन किया जा रहा है. समझ में नहीं आता की तुम और तुम्हारे सर को मुझसे क्या प्रॉब्लम है.
जावेद- कोई काम था क्या आपको मैडम या मैं जॉन.
सरिता- नहीं तुम जा सकते हो. मुझे जब जरूरत होगी तो मैं बुला लुंगी. तुम सब किसी काम के नहीं हो. सब उस हिट… अच्छा जाओ तुम अब. मुझे कुछ काम करना है.
जावेद सरिता की बात सुनकर उसके केबिन से बहार चला गया. उसके बाद सरिता अपने काम में जुट गयी. पस का काम ख़तम करके जब वो अपने कमरे पर आती है और फ्रेश होकर चाय की चुस्किया लेने लगती है तभी उसका फ़ोन बजने लगता है. जब वो फ़ोन उठती है तो स्क्रीन पर ूंकंऊ नंबर फ़्लैश हो रहा था. सरिता ने फ़ोन उठाया तो उधर से आवाज़ आई.
सरिता- hello.
ूंकंऊ- है सरिता. मैं सवी बोल रही हूँ.
सरिता- ओह्ह्ह्ह डीई आप. कैसी हैं आप दी.
सवी- मैं बिलकुल बढ़िया हूँ. और आज मैं बहुत खुश हूँ तो इसी ख़ुशी के मौके पर आज का डिनर तुम मेरे यहाँ पर करोगी.
सरिता- क्या मैं आपकी ख़ुशी का राज़ जान सकती हूँ दी.
सवी- मैं इसलिए खुश हूँ क्योंकि तुम पर जो केस चल रहा था वो क्लियर हो गया. इसलिए मैंने तुम्हारे लिए डिन्नर में अचे अचे खान ेके पकवान बनाये हैं. तुम जल्दी से आ जाओ.
सरिता- थैंक यू दी. लेकिन इन सबकी क्या जरूरत है.
सवी- जरूरत है सरिता. इसी लिए तो तुम्हे बुला रही हूँ. और मुझे पता है की तुम जरूर आओगी.
सरिता सवी की बातो में अपने लिए मिठास और प्यास का अनुभव कर रही थी. इसलिए उसने ज्यादा बहस नहीं की और आने के लिए हाँ कर दी. सरिता की इस हाँ के पीछे एक और मकसद था की वो इसी बहाने अपने केस के बारे में कुछ पता भी कर सकती थी.
सरिता सवी के यहाँ जाने के लिए तैयार हो गयी.
इसके आगे की कहानी अगले भाग में..
सरिता अपना फ़ोन no. सविता को dek-kar निकल जाती है. निश्छल अपनी बालकनी पर खड़ा होकर अपने गलो को सहलाते हुवे मन में सोचता है की बड़ी तीखी मिर्ची है ये मिस जोशी तो. इससे बच कर रहना पड़ेगा.
सरिता के जाते हुवे निश्छल देखता रहता है . तभी पीछे से सविता भी बालकनी पर आ जाती है और निश्छल के कंधे पर हाँथ रखकर उससे बोलती है.
सवी- क्या देख रहा है निशु. बहुत परेशां है बेचारी. इसलिए तुझपर गुस्से से चिल्ला रही थी. भूल जा इस बात को भाई और उसकी मैडम कर दे.
सविता की बात सुनकर निश्छल ने उसकी तरफ देखते हुवे कहा.
निश्छल- मैं उसकी मदद बिलकुल भी नहीं करूँगा. वो जाने और उसका काम जाने.
सवी- इसका मतलब तुम अपनी दी की बात नहीं मानोगे. मैंने उससे प्रॉमिस किया है की तुम उसकी मदद करोगे. मानती हूँ की उसने तुमसे चिल्लाकर बात की, लेकिन वो परेशां थी बेचारी. कर दे न उसकी मदद.
निश्छल- वो आपको बेचारी दिखती है और आपको क्या जरूरत थी उससे प्रॉमिस करने की. चलो मन की चिल्लाने तक तो ठीक था दी, लेकिन उसने तो हद hi कर दी. उसने आज फिर से………
इतना बोलकर निश्छल चुप हो गया और अपने गलो को सहलाने लगा. जिसे देखकर सरिता सोच में पद गयी और चुंकते हुवे बोली.
सवी- फिर से मतलब. फिर से थप्पड़. मतलब… कही ये वही लड़की तो नहीं जिसने उस दिन मार्किट में तुम्हे थप्पड़ मारा था. ये लड़की hi है न. वैसे तुम्हे बिलकुल सही नाम दिया है उसे लेडी डॉन. वैसे एक बात कहूँगी मैं वो लड़की बिलकुल तुम्हारे टक्कर की है. बिलकुल निडर, निर्भीक और बहादुर.
निश्छल- (मुंह बिचकाते हुवे) वैसे बात क्या थी. कुछ बताया उसने.
सविता ने निश्छल को पूरी बात बता दी. जिसे sun-ne के बाद निश्छल सोच में पद गया. फिर वो अपने कमरे में चला गया और तैयार होकर सविता से बोलकर घर से बहार निकल गया. सरिता घर आ गयी थी. उसके ऊपर केस चल रहा था तो वो पस नहीं जा रही थी. वो अपने कमरे में बैठी हुई सोच रही थी की तभी उसके फ़ोन पर पस से कॉल आया उसे फ़ोन उठाया.
सविता- Hello
उधर से बोलने वाले की आवाज़ सुनकर सरिता के फेस एक्सप्रेशन चेंज हो जाते हैं. पस से निश्छल का फ़ोन था.
निश्छल- मिस जोशी. क्या तुमको बुढ़िया की शकल याद है.
सरिता- हाँ.. याद है.
निश्छल- तुरंत पस पहुँचो. कोई बहाना कोई आर्गुमेंट मुझे नहीं चाहिए. मैं तुम्हारा बॉस हूँ. जितना बोल रहा हूँ. उतना करो. तुरंत पस पहुँचो.
निश्छल जनता था की अगर सरिता को बोलने का मौका दिया तो तो तरह तरह के बहाने बनाने लगेगी इसलिए उसने उसे आर्डर देने के तुरंत बाद फ़ोन काट दिया. इधर सरिता कुछ बोलना चाहती थी लेकिन तब तक फ़ोन काट चूका था. उसे निश्छल पर बहुत गुस्सा आ रहा था जो उसने बिना बात सुने hi फ़ोन काट दिया था. सरिता ने बड़बड़ाते हुवे कहा.
सरिता- पता नहीं अपने आपको क्या समझता है. हिटलर कही का. मेरी बात भी नहीं सुनी और फ़ोन काट दिया. पता नहीं क्या काम पद गया इसे मुझसे. कही सुबह की बात का बदला तो नहीं लेगा मुझसे. हे भगवन कहाँ फंसा दिया है तुमने मुझे. अब हुकुम आया है तो जाना hi पड़ेगा. नहीं तो वो हिटलर पता नहीं क्या करेगा.
यही सोचते हुवे सरिता तैयार होकर पस पहुँचती है तो सरिता को देखते hi उसके साथ काम करने वाले सभी अपने चेयर से उठकर उसे सलूट किया. ये देखकर सरिता को बहुत अच्छा लगा की काम से काम उसके साथ काम करने वालो को भरोषा है की उसने कोई गलत काम नहीं किया है. सरिता निस्चल का पूछी तो उसे केबिन की तरफ इशारा करके बताया गया.
सरिता जब केबिन में गयी तो वह पर निस्चल स्क्रीच आर्टिस्ट के साथ बैठा था. सरिता को देखते hi वो उठकर उसके पास आया और उसका हाँथ पकड़कर उसे लेजाकर कुर्सी पर बैठा दिया और बोलै.
निश्छल- स्क्रीच आर्टिस्ट को उस बुढ़िया की पूरी डिटेल्स बताओ.
सरिता- लेकिन किसलिए.
निश्छल- मैं सही कहता हूँ. तुम्हारे दिमाग का नट बोल्ट ढीला हो गया है. क्या तुम मेरी कोई भी बात बिना बहस किये नहीं मन सकती हो. अब मेरा दिमाग ज्यादा ख़राब मत करो और चुपचाप बैठकर स्क्रीच आर्टिस्ट को बुढ़िया की पूरी डिटेल्स बताओ.
सरिता निश्छल की बात सुनकर चुपचाप स्क्रीच आर्टिस्ट को उस बुढ़िया की पूरी डिटेल्स बताने लगी. कुछ hi देर में स्क्रीच बैंकर तैयार हो गया. निश्छल ने आर्टिस्ट को थैंक्स बोलकर स्क्रीच लेकर पस से बहार चला गया.
सरिता भी उसके बॉस अपने क्वार्टर पर वापस आ गई. सरिता अपने आपको बेक़सूर साबित करने के लिए हर संभव कोशिश कर रही थी. उसने यहाँ वह बहुत हाथ पेअर मरे, लेकिन उसे ऐसा कोई सुराग नहीं मिला था जिससे वो अपने आपको बेगुनाह साबित कर सके. आज एक हफ्ते पूरा हो चूका था. दोपहर का समय था. प्रधान की दी हुई समय की मियाद के पूरी होने में कुछ hi घंटा का समय शेष था.
सरिता को अब लगने लगा था की उसकी नौकरी चली जाएगी, क्योंकि अपनी बेगुनाही से जिस साबुत को वह एक हफ्ते से लगातार ढूंढ रही है. वह कुछ घंटो में कैसे ढूँढा जा सकता था. सरिता पस भी नहीं जा रही थी. सरिता ईमानदार थी ये सबको पता था, लेकिन वो कहते हैं न की जहाँ आपके चाहने वाले होते हैं वह आपके नापसंद भी करने वाले होते हैं. तो सरिता के रिश्वत लेने वाली बात जंगल में आग की तरह सरे डिपार्टमेंट में फ़ैल गयी थी.
सरिता आगे आने वाली मुसीबत के बारे में सोच रही थी की जिस नौकरी के लिए उसने रात दिन एक कर दिया था वो कुछ घंटा बाद उसे चीन ली जाएगी और जो बदनामी होगी वो अलग. वो यही सब सोचते हुवे अपने कमरे में चक्कर लगा रही थी. तभी सरिता के मोबाइल की घंटा बजी. उसने अपना फ़ोन उठाया. जो किसी अननोन NO. से था. सरिता ने फ़ोन उठाया.
सरिता- Hello.
ूंकंऊ- मिस सरिता जोशी.
सरिता- जी हाँ. आप कौन.
ूंकंऊ- जी मैं सीबीआई से प्रधान बोल रहा हूँ.
सरिता- जय हिन्द सर. फरमाइए सर.
प्रधान- जय हिन्द मिस जोशी. हमने ये बताने के लिए आपको फ़ोन किया है की आप पर लगाए गए सरे आरोप बबुनिया साबित हुए हैं. आपकी खिलाफ जितनी कम्प्लाइंस थी. सब फाल्स थी. इसलिए आप कल से अपनी ड्यूटी ज्वाइन कर सकती हैं.
सरिता ने जैसे hi ये खबर सुनी. ख़ुशी से उछाल पड़ी. उसे तो विश्वास hi नहीं हो रहा था की उसके ऊपर लगा आरोप बेबुनियाद साबित हो चूका है. लेकिन ये सब हुवा कैसे उसके समझ में ये नहीं आ रहा था. तो उसने ख़ुशी से प्रधान से पुछा.
सरिता- थैंक यू सर जी. मैंने तो पहले hi कहा था की मैंने कुछ नहीं किया है. लेकिन फिर भी अपने मेरी बात का भरोषा नहीं किया, लेकिन आप मुझे ये बताइये की आपको मेरी बात पर भरोषा अब कैसे हो गया. मेरी बेगुनाही का सबूत आपको कहा से मिला.
प्रधान- देखिये मिस जोशी. हम सुबूतों के आधार पर hi अपना काम करते हैं उस समय आपके खिलाफ हमको सुबूत मिले थे. हमने आपको रेंज हांथो पकड़ा था, लेकिन बाद में हमें आपकी बेगुनाही का सुबूत मिला इसलिए आपकी ड्यूटी बहाल की जा रही है.
सरिता अभी और कुछ कहना चाहती थी, लेकिन तब तक प्रधान ने फ़ोन कट कर दिया था. फ़ोन रखने के बाद सरिता के चेहरे पर ख़ुशी साफ झलक रही थी. सरिता ने सोचा की आखिर प्रधान को मेरी बेगुनाही का सुबूत मिला कैसे. तभी उसे याद आया की हिटलर (निश्छल) ने उस दिन स्क्रीच आर्टिस्ट से उस बुढ़िया का स्क्रीच बनवाया था. तो कही ये हिल्टर का काम तो नहीं है.
लेकिन उसने ऐसा क्या कर दिया की मेरी बेगुनाही का सुबूत लेकर आ गया. कही उसने उस बुढ़िया को खोज तो नहीं लिया है. जिसे मैं इतने दिन से खोजने की कोशिश कर रही थी. अब ये तो पस जाने के बाद hi पता चलेगा की आखिर ये सब हुवा कैसे. यही सब सोचते हुवे आज का दिन ख़ुशी ख़ुशी गुजर गया. रात में सरिता ने अपने घर में बात की और खाना पीना करके सो गयी.
अगले दिन सुबह सबेरे उठकर उसने साडी तयारी की और नाश्ता करके पस के लिए निकल गयी. जब सरिता पस पहुंची तो सारा स्टाफ सरिता को दोबारा से देखकर बहुत खुश था. सरिता का सभी ने अभिवादन किया. जिसे सरिता ने अपना सर हिलाकर स्वीकार किया. उसके बाद सरिता रावत सर के पास गयी और बोली.
सरिता- गुड मॉर्निंग सर जी.
रावत सर- अरे बेटी तुम. वैरी वैरी गुड मॉर्निंग . तुम्हे यहाँ दोबारा देखकर मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है. मुझे पहले से पता था की तुम बेगुनाह हो. किसी ने तुम्हे फंसने की कोशिश की है, लेकिन मैं तुमसे माफ़ी भी चाहता हूँ बेटी की मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर पाया.
सरिता- नहीं सर. आप क्यों माफ़ी मांग रहे हैं. आप ने हमेशा मेरा भला hi सोचा है. आपने तो मुझे पहले से hi आगाह कर दिया था इसके बारे में की कोई मेरी झूठी कम्प्लेन कर रहा है. आपसे जितना बन पड़ा आपने किया मेरे लिए. इसलिए आप मुझसे माफ़ी मांग कर मुझे शर्मिंदा मत कीजिये. लेकिन एक बात मेरी समझ में नहीं आयी की मेरी बेगुनाही का सुबूत प्रधान सर को कहा मिला.
रावत सर- ये सब अपने निश्छल बेटे ने किया है. उसी ने दिन रात एक कर दिया था तुम्हारी बेगुनाही का सुबूत ढूंढने के लिए. तुम्हे पता नहीं है की तुम्हारे नाम से रिश्वत लेने की जितनी भी कम्प्लाइंस आयी थी वो सब फर्जी थी. जब निश्छल ने साडी कम्प्लाइंस की इन्वेस्टीगेशन किया तो पता चला की जिस एड्रेस और जिस नाम से वो कम्प्लाइंस भेजी गयी हैं उस ाड्र्स और वो नाम दोनों फर्जी निकले और वह पर इस नाम का कोई भी आदमी नहीं मिला.
किसी ने भी इस बात के ऊपर ध्यान hi नहीं दिया की कम्प्लाइंस फाल्स भी हो सकती है. ये तो अच्छा हुवा की निश्छल बेटे ने बहुत बारीकी से इस केस को ऑब्सेर्वे किया और उसने साडी सच्चाई सामने लायी. जिससे तुम्हारी बेगुनाही साबित हो गयी.
सरिता- लेकिन मेरी बेगुनाही का सुबूत तो वो बूढ़ी दादी थी. जिन्होंने मुझे इस केस में फंसाया था. उनके मिले बिना मेरी बेगुनाही संभव hi नहीं थी. तो क्या हिटलर ने… (दांतो टेल ऊँगली दबाकर) मेरा मतलब है सर ने उनको ढूंढ लिया है.
रावत सर- इसके बारे में मुझे कुछ भी पता नहीं है बेटी. ये सब निश्छल ने किया है तो उसी को इसके बारे में पूरी जानकारी होगी. अच्छा ये सब छोडो. तुम इतने दिन बाद पस आयी हो तो जाओ कुछ काम कर लो. जब निश्छल आएगा तो उससे पूछ लेना तुम जो पूछना होगा तुम्हे.
रावत सर की बात सुनकर सरिता हाँ में सर हिलाते हुवे अपने केबिन में चली गयी और अपनी चेयर पर बैठकर अपने हांथो में पेन उठाकर उसको अपनी ऊँगली में फंसकर हिलाते हुवे सोचने लगी.
सरिता- (अपने मन में) यार ये बुद्धि दादी तो बड़ी शातिर थी. मुझे फंसा कर कैसे गायब हो गयी थी उस दिन. लेकिन इस हिटलर ने दादी को ढूँढा कैसे. मुझे तो कही भी नहीं मिली थी वो दादी. मैंने भी तो कितनी कोशिश की थी ढूंढने की. चलो जब हिटलर आएगा तो उसी से पूछ लुंगी की बुद्धि दादी हैं कहा. वैसे एक बात तो है. हिटलर उतना भी बुरा नहीं है जितना मैं उसे समझती हूँ. मैंने hi उसे समझने में गलती कर दी. बेवजह बिना पूरी बात जाने उसे थप्पड़ भी मर दिया. मैं उससे माफ़ी मांग लुंगी. आखिर गलती तो मेरी hi थी इन सब में.
कुछ देर इसी तरह सोचने के बाद सरिता ने बेल्ल बजाकर एक हवलदार को बुलाया और उससे जान्हवी को अंदर भेजने के लिए कहा. थोड़ी hi देर में जान्हवी, रंजना और विकास उसके केबिन में आये.
जान्हवी- आपका एक बार फिर से इस पस में स्वागत है मैडम, हम लोगो ने आपको बहुत मिस किया. हमें तो आपके ऊपर पूरा भरोषा था की आपने कुछ भी नहीं किया है. लेकिन हम लोग आपकी मदद नहीं कर सकते थे. इसके लिए सॉरी.
सरिता- इतस ोकक जान्हवी. जब मैंने खुद इतनी दौड़ धुप की और मुझे कुछ नहीं मिला तो मैं तुम लोगो को क्यों तकलीफ देती इसके लिए. वैसे सर ने बहुत मैडम की मेरी.
रंजना- हाँ मैडम सीओ सर ने इस मामले को अपने हांथो में ले लिया था और बहुत hi बारीकी से सब छान बिन की और पोरे मामले को इन्वेस्टीगेट किया. उन्होंने दिन रात एक कर दिया आपको बेगुनाह साबित करने के लिए. जावेद और मोहित भी सर के साथ hi थे इस पूरी इन्वेस्टीगेशन में.
सरिता- अच्छा. जावेद भी था. जावेद आया है क्या आज पस में. जरा उसे भेजना मेरे पास.
फिर तीनो सरिता को सेलुटे करके केबिन से बहार चले जाते हैं. थोड़ी देर बाद केबिन का दूर नॉक होता है और सरिता अंदर आने के लिए बोलती है. जावेद सरिता के सामने जाकर खड़ा हो जाता है. सरिता उसे बैठने का इशारा करती है. जावेद सरिता के सामने कुर्सी पर बैठ जाता है. सरिता जावेद से मुखातिब होते हुवे बोली.
सरिता- जावेद. सुना है की मेरे केस में तुम भी पूरी तरह से इन्वॉल्व थे मुझे बेगुनाह साबित करने के लिए.
जावेद- जी मैडम. हमको आपकी ईमानदारी पर पूरा भरोषा था, इसलिए मैंने और मोहित ने सर के साथ मिलकर अपनी जान लगा दी इस केस में.
सरिता- केस मेरा था और मुझे hi कोई जानकारी नहीं मिल रही है इस केस के बारे में. मुझे तुम पूरी बात बताओ.
जावेद- सॉरी मैडम नहीं बता सकता आपको कुछ भी.
सरिता- क्यों नहीं बता सकते मुझे. केस मेरा था और मुझे jan-ne का पूरा हक़ है. तुम्हे बताने में कोई प्रॉब्लम है क्या.
जावेद- नहीं मैडम मुझे बताने में कोई प्रॉब्लम नहीं है. लेकिन मैं नहीं बता सकता. मेरी कुछ मजबूरी है.
सरिता- अरे ऐसी क्या मजबूरी है जो तुम मुझे नहीं बता सकते इस केस के बारे में.
जावेद- क्योंकि सर ने आपको इस केस के बारे में कुछ भी बताने से मन किया है. इसलिए मैं आपको कुछ भी नहीं बता सकता.
सरिता- कौन से सर ने मन किया है तुम्हे.
जावेद- निश्छल सर ने मन किया है.
सरिता- क्या. वो हिट.. मेरा मतलब है की सर पागल हो गए हैं क्या. मेरा केस है और मुझे hi कुछ बताने से मन किया जा रहा है. समझ में नहीं आता की तुम और तुम्हारे सर को मुझसे क्या प्रॉब्लम है.
जावेद- कोई काम था क्या आपको मैडम या मैं जॉन.
सरिता- नहीं तुम जा सकते हो. मुझे जब जरूरत होगी तो मैं बुला लुंगी. तुम सब किसी काम के नहीं हो. सब उस हिट… अच्छा जाओ तुम अब. मुझे कुछ काम करना है.
जावेद सरिता की बात सुनकर उसके केबिन से बहार चला गया. उसके बाद सरिता अपने काम में जुट गयी. पस का काम ख़तम करके जब वो अपने कमरे पर आती है और फ्रेश होकर चाय की चुस्किया लेने लगती है तभी उसका फ़ोन बजने लगता है. जब वो फ़ोन उठती है तो स्क्रीन पर ूंकंऊ नंबर फ़्लैश हो रहा था. सरिता ने फ़ोन उठाया तो उधर से आवाज़ आई.
सरिता- hello.
ूंकंऊ- है सरिता. मैं सवी बोल रही हूँ.
सरिता- ओह्ह्ह्ह डीई आप. कैसी हैं आप दी.
सवी- मैं बिलकुल बढ़िया हूँ. और आज मैं बहुत खुश हूँ तो इसी ख़ुशी के मौके पर आज का डिनर तुम मेरे यहाँ पर करोगी.
सरिता- क्या मैं आपकी ख़ुशी का राज़ जान सकती हूँ दी.
सवी- मैं इसलिए खुश हूँ क्योंकि तुम पर जो केस चल रहा था वो क्लियर हो गया. इसलिए मैंने तुम्हारे लिए डिन्नर में अचे अचे खान ेके पकवान बनाये हैं. तुम जल्दी से आ जाओ.
सरिता- थैंक यू दी. लेकिन इन सबकी क्या जरूरत है.
सवी- जरूरत है सरिता. इसी लिए तो तुम्हे बुला रही हूँ. और मुझे पता है की तुम जरूर आओगी.
सरिता सवी की बातो में अपने लिए मिठास और प्यास का अनुभव कर रही थी. इसलिए उसने ज्यादा बहस नहीं की और आने के लिए हाँ कर दी. सरिता की इस हाँ के पीछे एक और मकसद था की वो इसी बहाने अपने केस के बारे में कुछ पता भी कर सकती थी.
सरिता सवी के यहाँ जाने के लिए तैयार हो गयी.
इसके आगे की कहानी अगले भाग में..