Incest Sex Kahani परम-सुंदरी - Page 176 - SexBaba
  • From this section you can read all the hindi sex stories in hindi font. These are collected from the various sources which make your cock rock hard in the night. All are having the collections of like maa beta, devar bhabhi, indian aunty, college girl. All these are the amazing chudai stories for you guys in these forum.

    If You are unable to access the site then try to access the site via VPN Try these are vpn App Click Here

Incest Sex Kahani परम-सुंदरी

चलिए दोस्तों आगे बढ़ते है।

वैसे तो यह किसी रीडर ने सुझाया था इसका अमल करने की कोशिश की है।

आशा है की आप सब को पसंद आएगा।
 
पुष्पा के अतीत में...

पुष्पा पति की छाती पर लेटी हुई थी, लेकिन उसका मन अचानक १८-१९ साल पीछे चला गया। उसकी माँ ने जो बातें उसे बताई थीं, आज वो सब एक-एक करके याद आने लगीं... फनलवर की प्रस्तुति।

उस समय पुष्पा ने ब्रा और चड्डी पहनना पूरी तरह छोड़ दिया था। घर में बस एक पतला कुर्ता और घाघरा पहनती थी, जिससे उसके उभरते स्तन और जवान चूत की हल्की झलक साफ दिखती थी।

एक दिन अचानक एक बाबा उनके घर आए। उन्हें देखते ही पुष्पा की माँ बहुत खुश हो गई। बाबा ने घर में घुसते ही माँ को सख्त आदेश दिया,

“मैं पूजा करने आया हूँ। इसमें तुम्हारी बहुत जरूरत पड़ेगी। जाओ, अच्छे से नहा-धोकर बिना घाघरे की नई सफेद साड़ी पहनकर आओ।”

माँ तुरंत अंदर चली गई। थोड़ी देर बाद बाबा ने पिताजी (श्यामलाल) और दादाजी से बातें शुरू कीं। पुष्पा को अपनी गोद में बिठाते हुए बोले,

“श्यामलाल... तुम्हारी लड़की अब जल्दी ही अच्छा माल बनने को तैयार हो रही है।”

पिताजी ने सिर झुकाकर कहा, “जी बाबा, सब आपकी मेहरबानी और कृपा है। अब वह बड़ी और अच्छे से मालदार बन रही है। थोड़ी आपकी कृपा भी उस पर पद जाए तो गंगा नहया।”

दादाजी बोले, “आपकी कृपा रहे तो पुष्पा जल्द ही एकदम परफेक्ट माल बन जाएगी। उसकी शादी की बात भी चल रही है। बस आपके हाथ उस पर फिरे और वह अपने माल से ससुराल की सेवा में तत्पर बने, और क्या मांगे आपसे। बस इसी गुजारिश से आपको आमंत्रित किया है।”

बाबा ने पुष्पा को अपनी गोद में खींच लिया और बोले, “चिंता मत करो... मैं हूँ ना। श्यामलाल इस माल ठीक है पर नजाकता कम है, चिंता की बात नहीं मैं उसे बना दूंगा। अब मैं यहाँ हूँ न! फिकर की बात ही नहीं।”
रचयिता फनलवर है।

पुष्पा थोड़ी घबराई हुई थी। दादाजी ने उसका हाथ पकड़कर बाबा की गोद में बैठा दिया और कहा,

“बेटी, इनसे क्या घबराना? ये हमारे सालों से बाबा हैं। इनकी सेवा करना हमारा सौभाग्य है। आराम से बैठो गोदी में और जो करना चाहते हैं, करने दो। इनका हर कार्य एक पूजा से कम नहीं होता बेटी। जाओ बेटी उनकी गोदी में बड़ा आराम और शुकून मिलेगा तुमे बेटी।"

बाबा ने पुष्पा को अपनी गोद में बिठाकर उसकी जाँघों पर हाथ फेरना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे उनकी उँगलियाँ जाँघों के अंदर की तरफ बढ़ने लगीं। वे पिताजी और दादाजी से बातें करते जा रहे थे और बीच-बीच में पुष्पा की जवानी की तारीफ करते जा रहे थे। और उनकी उंगलिया पुष्पा के कपडे से अन्दर-बाहर होती रहती थी।

थोड़ी देर बाद माँ बाहर आई। उसने सिर्फ एक बहुत पतली, पारदर्शी सफेद साड़ी पहनी हुई थी - बिना ब्लाउज, बिना पेटीकोट के। उसकी चूत के छोटे-छोटे बाल, गुलाबी योनि की झलक, भारी बोबले और खड़े निप्पल्स सब कुछ साफ दिख रहा था।

माँ को देख के बाबाजी की आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई। उन्हों ने माँ को अपने पास आने दिया, जब माँ उनके पास आई तो उनके सिर पर हाथ रखा और फिर निचे तक घुमाया। माँ ने बाबा के पैर छुए। बाबा ने पुष्पा को गोद से उतारा और माँ को आशीर्वाद देते हुए बोले,

“बहू, जाओ... अपने ससुर और पति की आज्ञा ले लो। और हाँ, ससुरजी की आगया कहा से मिलती है यह अब तुम्हे नहीं सिखाना चाहिए।” उन्होंने एक आदेशात्मक स्वरों में कहा।
जी बापजी, सब जानती हूँ, ससुरजी की आगया कहा से मिलती है और कैसे मिलती है। आप निश्चिन्त रहिये। माँ ने अपनी साडी ठीक करते हुए दादाजी की तरफ आगे बढ़ी।
संपादित मैत्री ने किया है।

माँ दादाजी के पास गई और उनके पैर छूने के लिए झुकी। झुकते ही उनका पल्लू गिर गया और दोनों भारी बोबला पूरी तरह बाहर आ गए। दादाजी ने मुस्कुराते हुए पल्लू उठाया और माँ के स्तनों पर ढीला-ढीला डाल दिया। फिर बोले,

“आज बहुत सालों बाद बाबाजी आए हैं। उनकी अच्छे से सेवा करना। ध्यान रहे, पूजा में कोई बाधा नहीं आनी चाहिए।”

माँ ने सिर झुकाया, “जी पिताजी... आपका हुक्म सिर आँखों पर।”

माँ ने दादाजी के पैरों के बीच हाथ डालकर उनका लंड पकड़ लिया और दबाया। फिर पिताजी के पास गई, उनके पैर छुए। पिताजी ने कुछ नहीं कहा, बस माँ का हाथ पकड़कर बगल वाले कमरे की तरफ ले गए। पिताजी ने शायद माँ को कुछ निर्देश दिए जो सुनाई नहीं दिया था।

कुछ देर बाद बाबा ने माँ को इशारा किया। माँ उनके साथ अंदर चली गई। पिताजी और दादाजी बाहर बैठे-बैठे सब देख रहे थे।

अन्दर से माँ की चींखे आती रही और दादाजी और पिताजी खुश होते रहे। थोड़ी देर के बाद माँ की आवाजे एक मधुर सिसकारी और आह...आह..और जोर से बाबाजी....दबाव न....आपके तो है.....यह माल को ठीक से चोद दीजिये बाबाजी.....जैसे कई शब्दों बाहर आते रहे।

करीब एक घंटे बाद माँ लडखड़ाती हुई बाहर आई। उसकी साड़ी गायब थी। वह सिर्फ एक चादर लपेटे हुए थी। उसकी चूत सूजी हुई, लाल और वीर्य से चिपचिपी दिख रही थी। जाँघों पर वीर्य की धार बह रही थी।

दादाजी उठे, माँ का हाथ पकड़कर बोले, “ठीक है ना बहू? पूजा में तुमने कोई बाधा तो नहीं डाली थी?”

माँ ने थकी हुई लेकिन संतुष्ट आवाज में कहा, “जी... बाबाजी की पूजा पूरी हो गई... आप खुद ही देख लीजिये, बाबजी अन्दर संतुष्ट है। मैंने उनको और उसको निचोड़ लिया है।”
फनलवर की पेशकश।

पुष्पा इस याद में खो गई थी। उसकी चूत फिर से गीली हो चुकी थी। वह पति की छाती पर लेटे-लेटे अपने अतीत को महसूस कर रही थी।



***********************************************.


जुड़े रहिये दोस्तों।


Funlover.
 
“जी बाबूजी... बस मेरी गांड फटी हुई है... और बाबाजी ने कहा है कि आपको अंदर ले जाकर मेरी गांड से निकलता हुआ रस पिलाना है। मैं अपनी गांड दबाकर रखी हुई हूँ... मुझे अंदर ले चलो और मेरी गांड साफ करो... और बाद में अपना माल मुझे पिलाओ... फिर हमें दूसरी पूजा करनी है...”

सुप्रिया पुष्पा की माँ...
फनलवर की प्रस्तुति।

सुप्रिया की आवाज़ काँप रही थी। उसकी जाँघों के बीच से बाबाजी का गाढ़ा, सफेद वीर्य धीरे-धीरे टपक रहा था। उसकी गांड लाल और सूजी हुई थी।

सास ने सुप्रिया का हाथ पकड़कर अंदर ले जाया। पिताजी और दादाजी बाहर बैठे-बैठे सब कुछ देख रहे थे।

ससुरजी अन्दर गए और बहु की गांड को खोला और अन्दर से टपकता हुआ बाबाजी का प्रसाद पि ने लगे। कोई शरम या संकोच नहीं था बस बाबाजी का वीर्य रूपी प्रसाद अपनी बहु की गांड से चूसने लगे थे। थोड़ी ही देर में माँ की गांड पहले जैसे साफ़ थी। दादाजी ने माँ की गांड को अच्छे से साफ़ कर दी थी।

फिर थोडा फलाहार हुआ बाबाजी को सब भेंट चढाई गई। उन्हों ने सब मुस्कुराते हुए भेंटो का स्वीकार किया। और बोले

“अभी थोड़ी देर में सुप्रिया को वापस भेज देना वह कुछ काम से रसोईघर में होंगी और वह काम ख़तम करके हमें नई विधि शुरू करनी है। जिसमे तुम बाप बेटे को हाजिर रहना है।“

दादाजी और पिताजी ने हांमी भरी और माँ के आने का इंतज़ार करने लगे।
फनलवर रचित कहानी।

थोड़ी देर में माँ वही चादर में लपेटी हुई अपनी गांड मटकाती हुई अन्दर चली गई। मैं देख रही थी की माँ की गांड कुछ ज्यादा ही मटकती हुई थी। उसकी चाल भी ठीक नहीं थी। लेकिन वह खुश तो लग रही थी। माँ ने मेरी तरफ देखा और पुचकारा।

और थोड़े समय के बाद एक नयी विधि शुरू हुई।

बाबाजी कमरे के बीच में एक बड़े आसन पर बैठे थे। उनका लंड अभी भी अर्ध-खड़ा था, चमक रहा था।

उन्होंने सुप्रिया को इशारा किया। सुप्रिया घुटनों के बल उनके सामने बैठ गई। बाबाजी ने उसकी ठोड़ी पकड़कर ऊपर उठाई और बोले,

“बहू... तेरी गांड अभी भी मेरे वीर्य से भरी हुई है... अब तेरी सास इसे साफ करेगी...” वैसे सुप्रिया जानती थी की उसकी गांड ससुरजी ने बहोत ही अच्छे से साफ़ कर दी थी। फिर भी बाबाजी चाहते थे की उसकी सांस भी वही करे और उसे इस बात के लिए कोई समस्या भी नहीं थी।

साँस ने तुरंत सुप्रिया की गांड पर मुँह रख दिया और जीभ से वीर्य चाटने लगी। सुप्रिया शर्म और उत्तेजना से काँप रही थी। उसे पता था की ससुरजी ने कुछ भी नहीं छोड़ा उसकी गांड में।

बाबाजी ने सुप्रिया को अपनी गोद में खींच लिया। उन्होंने उसकी भारी बोब्लो को दोनों हाथों से जोर से दबाया, निप्पलों को खींचा और चूसा। फिर उन्होंने सुप्रिया को चारों खाने चित्त लिटाया, टाँगें फैलाईं और अपनी लंबी जीभ से उसकी चूत चाटनी शुरू कर दी।

“आह्ह्ह... बाबाजी... उफ्फ... बहुत गहरा... जीभ अंदर डालिए...” सुप्रिया कराह उठी। शायद माँ पहले से ही तैयार थी।

बाबाजी ने सुप्रिया की चूत में दो उँगलियाँ डालकर तेजी से हिलाईं और बोले,

“बहू... तेरी चूत बहुत रसीली है... लेकिन गांड भी फाड़नी है आज...फिर से यही विधि है।”

उन्होंने सुप्रिया को कुत्ते की तरह घुटनों पर मोड़ा। सुप्रिया की गांड ऊपर थी। बाबाजी ने गांड पर थूक लगाया और अपना मोटा, लंबा लंड गांड के छेद पर रख दिया।

“आआआह्ह्ह... बाबाजी... बहुत मोटा है... फट जाएगी मेरी गांड...” सुप्रिया चीखी।

“तेरी माँ की चूत साली तेरी गांड जो फडानी थी वह पहले से ही फाड़ चूका हूँ मैं।“ उन्हों ने साँस को भी अपनी तरफ खींचते हुए कहा।

बाबाजी ने एक जोरदार धक्का मारा। आधा लंड गांड में घुस गया। फिर उन्होंने कमर कसकर पूरी लंबाई अंदर ठेल दी।

“आह्ह्ह... मर गई... बाबाजी... मेरी गांड फट गई...” सुप्रिया रोते हुए चीखी। ऐसा लगता थी की वह जान-बुज कर ऐसा कर रही हो। दादी मेरी माँ की पीठ सवारे जा रही थी और पुचकारे जा रही थी।
निर्मात्री फनलवर है।

बाबाजी ने सुप्रिया की कमर पकड़कर जोर-जोर से गांड मारना शुरू कर दिया। हर धक्के के साथ सुप्रिया की चीखें कमरे में गूँज रही थीं। दादाजी और पिताजी वही बैठे-बैठे सब सुन और देख रहे थे।

बाबाजी ने सुप्रिया की चूत में भी उँगलियाँ डालकर दोनों छेदों का मजा लिया। आखिरकार उन्होंने सुप्रिया की गांड के अंदर गरम वीर्य की मोटी धार छोड़ दी।

सुप्रिया थककर गिर पड़ी। बाबाजी ने सास को बुलाया और कहा, “बहू की गांड और चूत साफ कर...और तुम बाप-बेटे इधर आके पीछे लग जाओ।” दादाजी और पिताजी भी साँस के पीछे जाके उनकी गांड को फैला के चाट रहे थे। जैसे कतार ही बन गई थी।

साँस ने सुप्रिया की गांड और चूत को चाट-चाटकर साफ किया।

बाबाजी शाम तक सुप्रिया और साँस दोनों को बारी-बारी से चोदते रहे। उन्होंने दोनों की चूत और गांड का पूरा मजा लिया। जब मैंने माँ को देखा उनका मुंह पे अभी भी सफ़ेद रंग का कुछ पड़ा था। ( जो बाद में मालुम हुआ की वह बाबाजी का वीर्य था जो माँ और दादी के मुंह पर पिचकारी मारा गया था।

जब बाबाजी गए...

जब बाबाजी शाम को चले गए, तब घर में सिर्फ सुप्रिया और उसकी बेटी (पुष्पा) अकेली थीं।

पुष्पा ने माँ से पूछा, “माँ... ये बाबा कौन हैं? आज क्या हुआ था? किस चीज़ की विधि थी? आप नंगी क्यों घूम रही थी> दादा और दादी आपकी गांड क्यों चाट रहे थे?” जैसे सवालों की झड़ी माँ के सामने रख दी।

सुप्रिया ने गहरी साँस ली और बोली,

“आ बैठ... आज मैं तुझे सब बता देती हूँ कि ये बाबा कौन हैं...”



****************************************************************************.

जुड़े रहिये दोस्तों.



Funlover.
 
मेरी माँ का नाम सुप्रिया है।।।।। अब सुप्रिया के शब्दों में।।।।


तब मेरी उम्र 27 साल थी, और मेरा फिगर 34-28-37 है। मेरी गोरी रंगत और चेहरे की नाजुक बनावट की वजह से लोग मुझे अक्सर तारीफ करते हैं। मेरी चूचियाँ इतनी मुलायम और सुडौल हैं कि देखने वाले की नजरें उन पर टिक ही जाती हैं। ऐसा लगता है जैसे मेरे सीने पर दो बड़े-बड़े रसीले आम टंगे हों। जब मैंने पहली बार अपने बोब्लो को दबाया था, तो मुझे इतना मजा आया कि मैं खुद को रोक नहीं पाई थी। उस दिन से जब भी मैं जोश में होती, अपने बोबले को मसलती और साथ में अपनी चूत में उंगली करती थी।

मेरी चूत की बात करूँ तो वो इतनी रसीली और कमसिन है कि देखकर किसी का भी मन ललचा जाए। मेरी चूत का दाना ऐसा है जैसे कोई लाल, रसीली लीची हो, जो मेरी चूत के ऊपर लटक रही हो। उसकी नरमी और गीलापन इतना है कि उंगली डालते ही फिसलन होने लगती है। मैं जब भी अपनी चूत को सहलाती, तो ऐसा लगता जैसे मेरा पूरा बदन सिहर उठता हो।

मेरी शादी को चार साल हो चुके थे। शुरू-शुरू में सब कुछ किसी सपने जैसा लगता था। श्याम एक आकर्षक, मिलनसार और आत्मविश्वासी व्यक्ति था। शादी के शुरुआती दिनों में उसका स्नेह और ध्यान मुझे विशेष महसूस कराता था। उसकी कुछ हरकतें मुझे पहले गुस्सा दिलाती थीं, जैसे उसका बार-बार मेरे जिस्म को छूना, लेकिन धीरे-धीरे मुझे उसकी ये आदतें अच्छी लगने लगीं। हमारी शादी के बाद वो मुझे रोज चोदता था। उसका लंड 6 इंच का है, और वो हर रात अपनी हवस मिटाता था। समय के साथ हम दोनों ने साथ रहने की लय सीख ली थी। छोटी-छोटी नोकझोंक होतीं, फिर हँसी-मजाक में सब सामान्य हो जाता।

लेकिन चार साल बीत जाने के बाद भी हमारे घर में बच्चे की किलकारी नहीं गूँजी थी। यही बात धीरे-धीरे मेरे मन पर बोझ बनती जा रही थी। आसपास के रिश्तेदारों के सवाल, पड़ोसियों की जिज्ञासा और परिवार की अपेक्षाएँ मुझे भीतर ही भीतर परेशान करती थीं। मेरी चूत अब ढीली हो चुकी थी, और चुदाई का वो मजा नहीं मिलता था जो पहले मिलता था। राकेश को बस अपनी हवस पूरी करने की जल्दी रहती थी, मेरे मजे की उसे ज्यादा परवाह नहीं थी।
फनलवर की रचना।

एक शाम जब हम दोनों छत पर बैठे थे, मैंने हिम्मत जुटाकर राकेश से पूछा, “तुमने कभी सोचा है कि हमें अभी तक बच्चा क्यों नहीं हुआ?” रचयिता फनलवर है।

राकेश कुछ क्षण चुप रहा। फिर बोला, “सोचा तो है, लेकिन मैं नहीं चाहता कि तुम इस बात को लेकर खुद को परेशान करो। जो होगा, सही समय पर होगा।”

उसकी बात में सांत्वना तो थी, लेकिन मेरे मन की बेचैनी कम नहीं हुई। मुझे लगता था कि वह इस विषय को उतनी गंभीरता से नहीं ले रहा जितना मैं ले रही थी।

मेरी सास का स्वभाव अलग था। वह धार्मिक और अंधविश्वासी दोनों थीं। उन्हें तरह-तरह के साधु, बाबा और कथित चमत्कारों पर बहुत विश्वास था। जब भी किसी नए बाबा या मंदिर के बारे में सुनतीं, वहाँ पहुँच जातीं। वो अक्सर उनके पास जाती, चुदवाती वापस आकर कभी कोई ताबीज देतीं, कभी कोई प्रसाद, तो कभी कोई विशेष व्रत रखने की सलाह।

“बहू, यह प्रसाद बहुत सिद्ध है,” वह विश्वास से कहतीं, “इसे श्रद्धा से ग्रहण करो, सब ठीक हो जाएगा।”


मैं विज्ञान और चिकित्सा पर भरोसा करती थी, लेकिन परिवार का सम्मान बनाए रखने के लिए उनकी बातों को सीधे नकार भी नहीं पाती थी। कई बार मुझे लगता था कि मेरी अपनी इच्छाओं और विचारों का महत्व कहीं पीछे छूट गया है।

दिन बीतते गए। परिवार का दबाव बढ़ता गया। हर पारिवारिक समारोह में कोई न कोई बच्चा न होने का विषय छेड़ देता। कुछ लोग सहानुभूति दिखाते, तो कुछ अनजाने में ऐसे शब्द कह जाते जो दिल को चोट पहुँचा देते।

आखिर एक दिन मैंने निर्णय लिया कि अब केवल अनुमान और अंधविश्वास के भरोसे नहीं रहा जा सकता। मैंने राकेश से कहा, “हमें किसी अच्छे डॉक्टर से मिलना चाहिए। समस्या जो भी हो, उसका पता लगाना जरूरी है।”

इस बार राकेश ने मेरी बात गंभीरता से सुनी। शायद उसने पहली बार मेरी आँखों में वह चिंता देखी थी जो पिछले कई वर्षों से मेरे भीतर जमा होती जा रही थी।
प्रस्तुतकर्ता फनलवर है।

यहीं से हमारे जीवन का एक नया अध्याय शुरू हुआ, एक ऐसा अध्याय जिसमें हमें केवल संतान की चाह ही नहीं, बल्कि अपने रिश्ते की मजबूती, आपसी विश्वास और समाज के दबावों से भी जूझना था।

ऐसे ही एक दिन राकेश ने मुझे कहा; “ अरे भाग्यवान तुम एक कम क्यों नहीं करती? यह माँ तुम्हे बार-बार साधू संतो के साथ जाने को कहती है तो क्यों नहीं जाती एक बार वहा चली जाया करो। उस से नुकशान तो होने से रहा और जोग वह फायदे के लिए ही होगा।

मैंने निराश होते कहा; “अजी आप जानते हो वहा माँ क्या करने जाती है?”

“हां जानता हूँ बचपन से देखता आया हूँ। पहले यह सब घर में ही हुआ करता था लेकिन जब से तुम आई किसी को आमंत्रीत नहीं करती। मेरे ख्याल से तुम्हे वहा चली जाना चाहिए वैसे पापाजी भी यही कह रहे है। और तुम्हे इनका भी तो ख्याल रखना चहिये। शायद तुम्हारे घरवालो ने तुम्हे नहीं सिखाया पर यहाँ ऐसा रिवाज है जिनको तुम्हे अनुकरण करना है।“ वह उठ के चले गए।

मैंने भी सोचा की एक बार हो आऊ और देखू तो सही, अब की बार अगर साँस कहेगी तो उनके साथ चली जाउंगी।



***************************************************************.
यही तक दोस्तों।



Funlover.



जय भारत।।

371
 
दोस्तों आपके मंतव्यो की प्रतीक्षा में ..............................
 
Back
Top