Incest चीरहरण (Completed) - Page 7 - SexBaba
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Incest चीरहरण (Completed)

अपडेट 47

सुबह के सात बज चुके थे औऱ जगमोहन बेड पर ओंधे मुंह पड़ा हुआ कराटे मार रहा था.. सुमन उठकर नहा चुकी थी औऱ चाय बनाकर गौतम के कमरे की तरफ बढ़ गई थी.. गौतम भी आज जल्दी ही उठ गया था औऱ नहा चूका था..

सुमन चाय बेड के ऊपर सिरहने रखती हुई - चाय पिले शहजादे..

गौतम बेड से उठकर सुमन का हाथ पकड़ते हुए - इस शहजादे को चाय नहीं तुम्हारी चुत चाहिए शहजादी..

सुमन मुस्कुराते हुए - शहजादी तो चुत देने के लिए कब से तैयार है पर सही मौका औऱ दस्तूर भी तो हो..

गौतम सुमन का हाथ चूमते हुए - इतना सब्र किया तो कुछ पल औऱ सही..

सुमन गौतम के बालो को हल्का सा इधर उधर करते हुए - अब चाय पीके जा यहां से.. वो लोग आने वाले ही होंगे..

गौतम सुमन को बाहों में भरके गाल पर चुम्बन करते हुए - जो हुकुम मेरी सहजादी..

सुमन वहा से बाहर आ जाती है औऱ गौतम चाय पीके अपनी बाइक उठाकर बाहर चला जाता है..

गोतम कहा है?

मुझे क्या पता? गया होगा अपने दोस्तों के पास..

सुमन तूने जानबूझकर उसे बाहर भेजा है ना..

मैं क्यों उसे भेजनें लगी? वो खुद ही अपनी मर्ज़ी से गया है..

जगमोहन चिढ़ते हुए - मैं भी कहा तुमसे बात करने बैठ गया.. चाय ला दो..

सुमन - बनाके रखी है छन्नी करके पिलो..

जगमोहन उठकर जाता है कमरे से बाहर निकलता है की दरवाजे पर दो औरत औऱ एक आदमी दिखाई देते है..

जगमोहन उन्हें देखकर - माँ..

जगमोहन की माँ हेमा - जग्गू...

बृजमोहन - जग्गू भईया..

जगमोहन - आओ अंदर आओ..

हेमा उस घर देखकर - घर तो बड़ा सुन्दर बनाया है तूने जग्गू?

जगमोहन - आओ ना माँ.. बैठो... अरे सुमन देखो.. माँ मानसी औऱ ब्रजमोहन आये है..

सुमन कमरे से बाहर आकर बेरुखी से देखते हुए..

मानसी - कैसी हो सुमन?

सुमन - जैसी 18 साल पहले थी..

हेमा - बहु हमारा गौतम कहा है? अब तो बहुत बड़ा हो गया होगा.. पिछली बार जब दो साल का था तब देखा था उसे.. उसके बाद तो उसे देखने को आँखे ही तरस गई..

सुमन - मेरा गौतम दोस्तों के साथ बाहर गया है..

मानसी - सुमन तुम गाँव क्यों नहीं आई इतने सालों में..

सुमन - वहां मेरे औऱ मेरे ग़ुगु के लिए अब बचा ही क्या है..

बृजमोहन - ऐसा क्यों कहती हो भाभी.. वहा आपका घर है..

सुमन - घर औऱ जमीने तो तुमने अपने भाई से छीनकर अपने पास रख ली थी याद है.. सुना है सारी जमीन साहूकार को बेच दी तुमने अपनी ऐयाशी पूरी करने के लिए..

हेमा - सुमन.. पुरानी बातों को भूल जाओ.. उनसे अब किसी का भला नहीं होने वाला.. बृजमोहन अब बदल चूका है..

सुमन - सब लुटा कर अब बदलने की क्या जरुरत.. घर औऱ खेत बाकी है उसे भी बेच देते..

जगमोहन - सुमन.. ऐसे बात करते है अपनी सास से.. इतने सालों बाद आये है.. जाओ चाय औऱ नाश्ता बना दो.. सबके लिए..

सुमन बिना कुछ बोले रसोई में चली जाती है औऱ चाय बनाने लगती है..

उसके साथ ही मानसी भी सुमन के पीछे पीछे रसोई में चली जाती है..

जगमोहन बृजमोहन औऱ हेमा के साथ हॉल में लगे बड़े से सोफे पर बैठ जाता है औऱ बातें करने लगता है..

मानसी - सुमन.. लाओ मैं चाय बना देती हूँ.

सुमन - रहने दो मानसी.. मेहमान हो.. मैं बना लुंगी..

मानसी - इतनी भी क्या नाराज़गी सुमन.. मैं कोई पराई तो नहीं हूँ..

सुमन - अपनी भी कहा थी तुम मानसी..

मानसी - मैं जानती हूँ सुमन तुम गुस्सा हो हमसे पर मेरी बस में ना ही कल कुछ था ना ही आज कुछ है..

सुमन - साफ साफ कहो मानसी.. यहां क्यों आई हो?

मानसी - अपने जमाई को लेने..

सुमन - कोनसा जमाई? वो रिश्ता वही तोड़ के मैं यहां आई थी..

मानसी - तुम्हारे मेरे तोड़ने से रिश्ते नहीं टूटते सुमन.. गाँव में पंचायत के लोगों के सामने वो रिश्ता बना था.. बात तय हुई थी..

सुमन - बच्चों की शादी को सरकार भी शादी नहीं मानती मानसी..

मानसी - मगर पंचायत मानती है.. औऱ तुम जानती हो हमारे यहां ये फैसले कितने कड़ाई से निभाये जाते है..

सुमन - निभाए जाते होंगे.. मगर अब नहीं.. मैं मेरे ग़ुगु को हरगिज़ उस गाँव में नहीं जाने दूंगी..

मानसी - जाना तो उसे पड़ेगा सुमन.. कुसुम अब 18 साल की दहलीज़ को लांघ चुकी है.. उसे गौतम को अपनाना ही होगा..

सुमन - ऐसा नहीं होगा मानसी.. गौतम उसी से शादी करेगा जिससे उसका मन होगा..

मानसी - पर उसकी शादी हो चुकी है सुमन.. याद है तुम्हींने मेरी कुसुम को गोद में उठाकर कहा था ये ग़ुगु की दुल्हन बनेगी.. तुम्हारी मर्ज़ी शामिल थी उसमे..

सुमन - तब तक बटवारा नहीं हुआ था मानसी.. मुझे अगर पता होता कि तुम मेरे साथ ऐसा करोगे तो कभी वो सब नहीं करती..

मानसी - मैंने तुम्हारे साथ कभी कुछ गलत नहीं किया सुमन.. तुम जानती हो मेरा दिल साफ है.. अब मैं अपनी बेटी के लिए उसके पति को माँगने आई हूँ.. गाँव आकर गौतम कुसुम को पंचायत के सामने अपना कर अपने साथ रख ले बस.. मैं औऱ कुछ नहीं चाहती..

सुमन - ऐसा नहीं होगा मानसी.. गौतम को भूल जाओ.. कुसुम के लिए कोई औऱ लड़का देख लो..

मानसी - एक बार जिस लड़की का विवाह हो जाता है उसका किसी औऱ के साथ विवाह नहीं करवाया जाता.. अगर गौतम खुद गाँव आकर कुसुम को अपना नहीं बनाता तो मैं पंचायत में गौतम के खिलाफ गुहार लगा दूंगी.. औऱ तुम जानती हो पंचायत के नियम कितने कड़े है..

सुमन - तुम्हे जो करना है करो मानसी.. मेरा गौतम उस गाँव में नहीं जाएगा..

मानसी - उसे आना पड़ेगा सुमन.. वरना पंचायत ने जगन के साथ जो किया था तुम अच्छे से जानती हो.. तुम्हारी ज़िद कहीं सब ख़त्म ना कर दे..

सुमन - धमकी दे रही हो..

मानसी - नहीं.. भीख मांग रही हूँ.. अपनी कुसुम के लिए तुम्हारे गौतम की.. मेरी बात मान जाओ सुमन.. मैंने कुसुम को बहुत सभालके पाला पोसा है.. वो गौतम का अच्छे से ख्याल रखेगी.. औऱ तुम्हे भी कोई शिकायत का मौका नहीं देगी.

सुमन - चाय बन गई है.. लो.. लेजाकर दे दो..

मानसी अपने पर्स में से एक तस्वीर निकालकर सुमन के सामने रख देती है औऱ चाय की ट्रे उठाकर रसोई से बाहर आ जाती है औऱ सबको चाय दे देती है.. सुमन की नज़र तस्वीर पर पडती है औऱ वो कुसुम की तस्वीर को देखने लगती है.. सुमन कुसुम को देखने लगती है और मन ही मन वो भी कुसुम को गौतम के लिए सही मानते हुए दोनों का बंधन होने की बात सोचने लगती है..

************

सलामपुर गाँव में खेतो को पार करके जंगल के मुहाने पर कटीली झाड़ियों के पीछे दो सहेलियां पानी का मग्गा लेके टट्टी करने बैठी थी..

अरे कुसुम.. सुना आज तेरे मम्मी पापा तेरे दूल्हे से मिलने गए है.. कहीं झुमरी के दूल्हे की तरह तेरा दूल्हा भी काला कलूटा औऱ भद्दा निकला तो.. तू चाँद सी चितवन काया वाली औऱ वो अँधेरी काली रात..

कुसुम - नहीं.. मीना.. ऐसा मत बोल.. मैं मर ही जाउंगी अगर ऐसा हुआ तो.. दादी ने बताया था वो बचपन में बहुत प्यारे लगते थे.. अब भी शायद वैसे ही हो..

मीना - अच्छा.. औऱ फुलवा की जैसे शराबी औऱ जुवारी निकला तो..

कुसुम - तू औऱ कुछ नहीं बोल सकती क्या.. मेरी तो टट्टी भी बंद हो गई तेरी बातें सुनकर..

मीना हसते हुए - अरे तो मुझसे कह दे.. तेरी गांड में ऊँगली डालकर निकाल देती हूँ टट्टी..

कुसुम शरमाते हुए मग्गे से पानी हाथ में लेकर गांड धोती हुई - हट बेशर्म.. चल अब..

मीना भी गांड धोती हुई - हाय कैसे शर्माती है तू.. जब तेरा दूल्हा पटक पटक के चोदेगा ना तब सारी शर्म निकल जाएगी.. मेरे वक़्त तो तू भी बड़ा बोलती थी.. अब अपना वक़्त आया तो कैसे चुप है..

कुसुम खेत की पगदंडी से मीना के साथ वापस घर आती हुई - चुदाई में दर्द होता होगा ना मीना..

मीना - पहले पहल होता है फिर मज़ा आता है.. मन करता है बस चुदवाते ही रहो.. देख चुदाई की बात करके तेरे चुचक कैसे खड़े हो गए.. मिलन की रातों में जब तेरे ये नुकिले चुचक तीर की तरह तेरे दूल्हे के सीने में चुभेगे तो उसे मज़ा ही आ जाएगा..

कुसुम शरमाते हुए - धत..

मीना कुसुम के चुचे अचानक से मसलकर - शर्मा क्यों रही है सहेली.. अब तेरे खेत में हल चलाने वाला जल्दी ही आने वाला है.. तेरी छोटी सी चुत को वो बड़ा कर देगा..

कुसुम मुस्कुराते हुए - घर आ गया.. तू भी जा...

**************

पता नहीं आज ये फ़ोन क्यों नहीं उठा रहा..

रहने दो भईया.. आप तो उसे कल गाँव लेकर आ जाना.. कुसुम औऱ गौतम की रित निभाना है.. फिर जल्द ही दोनों का बंधन भी करवा देंगे..

मानसी - हाँ.. मेरा बहुत मन था गौतम को देखने का.. मगर आज नहीं तो कल सही.. जब वो गाँव आएगा तब देख लुंगी..

हेमा - अब चलना चाहिए.. कुसुम अकेली है.. शाम से पहले वापस पहुंचना है..

जगमोहन - माँ आप रुकिए मैं टेक्सी बुलवा देता हूँ..

सुमन - रहने दीजिये.. मैंने फ़ोन कर दिया था.. गौतम आने वाला होगा वही बस स्टेण्ड तक छोड़ आएगा..

मानसी ख़ुशी से - ये कितनी अच्छी बात है सुमन.. मतलब आज मैं अपने जमाई को देख सकती हूँ..

गौतम बाहर बाइक खड़ी करके अंदर आता है तो उसे देखकर हेमा मानसी औऱ बृजमोहन अपनी जगह से खड़े हो जाते है औऱ मानसी सुमन को देखकर कहती है..

मानसी - सुमन ये हमारा गौतम है ना?

सुमन - मानसी ये मेरा गौतम है..

मानसी सुमन की बात सुनकर आगे बढ़ती है औऱ गौतम को अपने गले से लगाकर - कितने प्यारा औऱ चाँद सा मुखड़ा है.. बिलकुल कोई शहजादा लगने लगा है.. माँ देखो ना..

हेमा आगे बढ़कर गौतम के चेहरे को चूमती हुई - हाँ सुमन.. मेरे पोते के जैसा सुन्दर और प्यारा तो कोई दूसरा ना होगा..

मानसी तस्वीर लेते हुए - अब तक हमसे छुपा के रखा था सुमन ने.. मगर आज देखो..

हेमा - बेटा मैं तेरी दादी..

गौतम पैर छूता है..

हेमा गले से लगाते हुए - अरे रहने दे ये सब.. तू तो मेरा अपना है.. तेरी माँ ने कब से तुझे हमसे छुपा के रखा था.. आज मिला है..

सुमन - ग़ुगु.. दादी औऱ चाचा चाची को बस स्टैंड तक छोड़ आ जरा..

गौतम सुमन की बात सुनकर उन सबको कार में बैठा कर बस स्टेण्ड छोड़कर आ जाता है.. तब तक जगमोहन घर से जा चूका था..

**************

मानसी - कुसुम.. कुसुम.. कहा गई ये लड़की?

कुसुम - माँ सहेली के पास गई थी.. कुछ काम था..

मानसी - कल रीत का सारा सामान तूने रख लिया है ना..

कुसुम - जी..

मानसी - ठीक है.. कल समय से तैयार रहना.. किसी सहेली के यहां ना चले जाना..

कुसुम - माँ..

मानसी - बोल..

कुसुम - वो माँ आप..

मानसी मुस्कुराते हुए - क्या बोल ना..

कुसुम - नहीं.. कुछ नहीं..

मानसी - तेरे दूल्हे से मिली या नहीं यही पूछना चाहती है ना मेरी लाडो..

कुसुम शरमाते हुए - माँ..

मानसी - तस्वीर देखेगी अपने होने वाले दूल्हे की?

कुसुम शरमाते हुए कुछ नहीं बोलती और चुपचाप खड़ी रहती है..

मानसी छेड़ते हुए - नहीं देखनी तो तेरी मर्ज़ी.. मुझे क्या

कुसुम - आप तस्वीर लेके आई हो..

मानसी कुसुम से मसखरी करते हुए - हाँ.. पर क्या फ़ायदा? ना शकल अच्छी है ना रंग अच्छा है गौतम का.. शहर में बिलकुल बेरंग हो गया है.. मुंह भी बांका है.. बोलता है तो लगता है दाँत ही गिर पड़ेंगे.. मैंने तो कहा ये रिश्ता तोड़ देते है पर तेरे पापा नहीं माने.. मेरी वैसे भी कहा चलती है..

कुसुम फ़िक्र से - इतना बुरी सूरत है..

हेमा आते हुए - अरे क्यों छेड़ती है कुसुम को.. देख कैसे चेहरा उतर गया है बेचारी का.. कुसुम ले ये देख तेरे दूल्हे की तस्वीर.. है ना चाँद का टुकड़ा..

कुसुम फ़ोन में तस्वीर देखकर देखती रह जाती है और ख़ुशी से शरमाते हुए अपना चेहरा अपने दोनों हाथों से छुपा कर खड़ी हो जाती है..

मानसी - अरे शर्मा रही है.. माँ जी लगता है गौतम पसंद नहीं आया कुसुम को.. शादी के लिए मना कर देंते है..

कुसुम एक दम से - मैंने ऐसा कब कहा?

मानसी और हेमा एक साथ हँसते है..

कुसुम फ़ोन लेकर अपने कमरे में भाग जाती है और गौतम की तस्वीर देखती हुई उसे अपनी आँखों में बसाने लगती है.. कुसुम के मन में बहुत से ख्याल आ जा रहे थे जिनसे खुश होते और सोचके शरमाते हुए कुसुम गौतम की तस्वीर को अकेले में अपने होंठों से चुम के बार बार उसके साथ शादी होने और प्यार करने के सपने अपनी खुली आँखों से देख रही थी..

कुसुम के मन की सारी चिंता और फ़िक्र निकल चुकी थी जिसके जगह प्यार उमंग और भविष्य की सम्भावनाओं ने ले लिया था.. कुसुम बार बार गौतम की तस्वीर को कभी अपने सीने से लगाती तो कभी चूमती.. उसने अपने फ़ोन के स्क्रीन पर भी गौतम की तस्वीर लगा दी और सोचने लगी की वो गौतम को अपनी पलकों पर सजा कर रखेगी उसे बहुत खुश रखेगी और प्यार करेगी..

**************

क्या हुआ माँ? क्या कह रहे थे वो लोग?

सुमन कुसुम की तस्वीर गौतम को देकर - कल हम गाँव जाने वाले है.. रित निभाने..

गौतम बिना तस्वीर देखे - क्या रित? कोनसी रित औऱ ये तस्वीर किसकी है?

सुमन - ये तेरी दुल्हन की तस्वीर है ग़ुगु..

गौतम बिना तस्वीर देखे रखते हुए - मैं कोई शादी नहीं करने वाला..

सुमन - तेरी शादी हो चुकी है.. जब तू 2 साल का था..

गौतम - क्या बकवास कर रही हो माँ.. मेरी साथ फालतू मज़ाक़ करने की कोशिश भी मत करना.

सुमन - ये मज़ाक़ नहीं है ग़ुगु.. कुसुम तेरे चाचा चाची की एकलौती बेटी है..

गौतम - चाचा चाची की? पर हमारे यहां कजिन मेर्रिज कहा होती है?

सुमन - होती है.. तेरे पापा से पूछना बाकी बातें.. मुझे बहुत काम है..

गौतम - काम गया माँ चुदाने.. ये हो क्या रहा है? साफ साफ बताओगी?

सुमन - ग़ुगु जैसे साउथ इंडिया में कजिन मैरिज होती है वैसे ही हमारे गाँव औऱ आस पास के गाँव में भी होती है.. तेरे पापा जिस समाज से है वो लोग सकड़ो साल पहले साउथ इंडिया आकर यहां बसे थे.. बचपन में मैंने तेरी औऱ कुसुम की शादी करवा दी थी मगर फिर बटवारे में विवाद के कारण मैं तुझे गाँव से लेकर यहां आ गई.. अब हमें वापस जाना होगा औऱ तुझे कुसुम के साथ रित निभाकर उसके साथ बंधन करना होगा..

गौतम - मैं कुछ नहीं करने वाला.. औऱ उस शादी को मना कर दो..

सुमन - नहीं कर सकते ग़ुगु.. अगर हमने मना किया तो मानसी पंचयात में चली जायेगी फिर पंचायत हमारे खिलाफ फैसला कर देगी.. जैसे सालों पहले जगन के साथ किया.. शादी तोड़ने के अपराध में उसे जान देनी पड़ी थी..

गौतम - अब वक़्त बदल चूका है माँ.. क़ानून से काम होता है..

सुमन - पंचायत का क़ानून ही सबकुछ है वहा गौतम. वो लोग नियम के मामले में बहुत कठोर है.. तुझे कल चलना ही होगा..

गौतम - तुम चाहती हो मैं वहा जाऊ औऱ कुसुम के साथ रीत निभाऊ उसे अपनी पत्नी बनाऊ?

सुमन - हाँ.. मैं चाहती हूँ..

गौतम - तो ठीक है मैं कल जाऊँगा.. लेकिन आज तुमको वो सब करना होगा जो मैं कहूंगा..

सुमन अपनी साडी का पल्लू गिराते हुए - मैं तैयार हूँ गौतम..

गौतम सुमन साडी खोलने से रोकता हुआ - यहां नहीं सुमन..

सुमन - तो?

गौतम सुमन को अपने साथ घर से लेकर कहीं बाहर चला जाता है...
 
अपडेट 48

जंगल के खंडर के जिस कमरे में गौतम औऱ सुमन ने हरिया औऱ मंजू को चुदाई करते हुए देखा था वहां अब हलकी सी सफाई कि जा चुकी थी.. एक खाट किसी ने लाकर रख दी थी जिसपर एक रुई का गद्दा भी पड़ा था औऱ साथ में एक फोल्डबल टेबल भी साइड में थी जिस पर शराब की एक बोतल सिगरेट के पैकेट लाइटर औऱ पानी की बोतल रखी हुई थी..

ये सब आज सुबह गौतम ने ही इस कमरे में रखे थे औऱ अब वो अपनी माँ को भी अपने साथ लेकर खंडर के बाहर आ चूका था औऱ गौतम सुमन का हाथ पकड़ कर उसे खंडर के अंदर ले आया.. सुमन को डर लग रहा था मगर गौतम के साथ में होने से उसका डर काफूर भी हो रहा था.. गौतम ने सुमन को अपनी गोद में उठा लिया औऱ सीढ़ियों से खंडर के ऊपरी मंज़िल पर आ पंहुचा..

सुमन के मन में इस वक्त अजीब अजीब ख्याल चल रहे थे और उसके बदन में सुरसुरी कौंध रही थी.. सुमन का दिल जोरो से धड़क रहा था और आने वाले पलों की कल्पना करके काम वासना के भाव से भरी जा रही थी.. सुमन की आंखों के सामने गौतम का चेहरा था जिसे वह बड़ी प्यार से देख रही थी और अपने हाथ से उसके प्यारे मुख को सहला भी रही थी..

सुमन को पता नहीं था कि गौतम के मन में क्या चल रहा है.. गौतम आज किसी भी कीमत पर सुमन को पा लेना चाहता था और इस नियत से वह सुमन को अपनी गोद में उठा खंडर के इस कमरे पर आ रहा था जहाँ उसने सारी तैयारी कर रही थी.. गौतम ने अपने सुहाग दिन को मनाने के लिए पूरा प्रबंध किया हुआ था..

गौतम ने सुमन को लाकर कमरे में बिछी उसी खत पर पटक दिया औऱ शराब कि बोतल खोलकर सुमन औऱ खुद के लिए एक एक पेग बना दिया..

गौतम पेग देते हुए - लो माँ..

सुमन पेग लेकर - यहां इस खंडर में करोगे अपनी ख्वाहिश पूरी?

गौतम पेग पीकर अपने लिए दूसरा पेग बनाते हुए - यहां तु खुलकर चीख-चिल्ला सकती है सुमन.. तेरी आवाजे सुनकर यहां कोई नहीं आएगा.. औऱ तु मुझसे बचकर कहीं भाग भी नहीं पाओगी..

सुमन पेग पीते हुए - मैं क्यों भागने लगी भला.. मैं भी अब तेरे साथ हर हद पार करना चाहती हूँ..

गौतम दूसरा पेग ख़त्म करके एक सिगरेट सुलगा लेता है औऱ सुमन अपना पहला पेग ख़त्म कर देती है.. गौतम सुमन के करीब खाट पर बैठ कर अपना एक हाथ सुमन के गले में डालकर उसका चुचा पकड़कर मसलते हुए सिगरेट के कश लेता हुआ कहता है..

गौतम - एक बात सच सच बतायेगी सुमन?

सुमन गौतम से सिगरेट लेकर कश मारती हुई - पूछ ना मेरी जान.. जो तुझे पूछना है.. आज तेरी माँ नहीं शर्माने वाली.. मेरे चुचे 34 कमर 28 गांड 36 है..

गौतम सुमन के निप्पल्स मरोड़ता हुआ - मेरा असली बाप कौन है?

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सुमन सिसकती हुई - आह्ह.. गौतम.. ये तू केसा सवाल कर रहा है.. जगमोहन तेरा बाप है..

गौतम सुमन से सिगरेट लेकर कश मारता हुआ वापस सुमन के चुचे पर उभरा हुआ चुचक मसल देता है औऱ बोलता है - सुमन मै मज़ाक़ नहीं कर रहा.. सच सच बता.. मेरा असली बाप कौन है?

सुमन दर्द से - अह्ह्ह्ह.. ग़ुगु मरोड़ मत मेरी निप्पल्स.. औऱ तू अचानक कैसी बात कर रहा है.. औऱ क्या बेतुका सवाल पूछ रहा है...

गौतम सिगरेट का कश लेकर सिगरेट फर्श पर फेंककर अपने जूते से बुझा देता है औऱ सुमन को धक्का देकर खाट पर पीठ के बल लिटाता हुआ उसके ऊपर चढ़कर उसके बालो को अपनी मुट्ठी में भींचकर पकड़ते हुए कहता है - मुझे चुतिया समझा है माँ तूने? चुपचाप मुझे मेरे असली बाप का नाम बता दे.. वरना आज चोदने के बाद तुझे हमेशा के लिए अकेला छोड़ जाऊँगा..

सुमन हैरानी परेशानी औऱ फ़िक्र से भरी हुई - ग़ुगु तू क्या बोले जा रहा है बेटा.. तू जो बोले रहा है मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा..

गौतम गुस्से में एक जोरदार तमाचा सुमन के गाल पर मार देता है औऱ कहता है - अब समझ आया तुझे रंडी? बंद कर अपना ये संस्कारी बनने का ढोंग.. मुझे पता चल गया तू कितनी बड़ी रांड रह चुकी है..

सुमन अपने गाल पर हाथ लगा कर - बेटा.. मैं सच कह रही हूँ तेरा बाप जगमोहन ही है..

गौतम हलके नशे में थोड़ा पीछे होता है औऱ सुमन की साडी का पल्लू हटाकर सुमने के चुचो पर अपने दोनों हाथ रखकर ब्लाउज को कस के पकड़ता है औऱ इतना जोर से खींचता है कि सुमन कि छाती पर से उसका ब्लाउज एक बार में फटकार अलग हो जाता है औऱ साथ में ब्रा भी उतर जाती है..

गौतम सुमन के दोनों चुचो को अपने दोनों हाथों के पंजो में पकड़कर दबा दबा के मसलते हुए - अब तो सच बोल दे रंडी.. मैं जान गया हूँ जगमोहन मेरा बाप नहीं है औऱ ना ही वो किसी औऱ का बाप बन सकता है.. ना ही कभी बन सकता था.. वो शुरु से बाप बनने के काबिल नहीं था.

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सुमन गोतम को हैरानी से देखती हुई सिसक कर - गौतम तुझे कैसे..

गौतम सुमन के तनकर खड़े हुई चुचक को मुंह में लेकर चूसता हुआ - मुझे कैसे पता? तू यही सोच रही है ना सुमन.. आज मुझे बहुत कुछ पता चला है तेरे बारे में.. अब मुझे सच सच बता कौन है मेरा असली बाप?

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सुमन गोतम के चेहरे को पकड़कर उसके होंठ पर अपने होंठ रखते हुए चूमती हुई - छोड़ ना गौतम.. अब क्या फर्क पड़ता है.. सालों पहले की बात है..

गौतम सुमन में बाल पकड़कर उसके होंठों को अपने होंठों से अलग करता हुआ उसकी आँखों में देखकर कहता है - फर्क पड़ता है माँ.. तू शादी से पहले जिस जिस के नीचे लेटी है मुझे उनसे कोई मतलब नहीं है.. बस तू इतना बता दे उनमे से मेरा बाप कौन था?

सुमन गौतम के हाथों से अपने बाल छुड़ाकर वापस उसके होंठों पर टूट पडती है औऱ गौतम को चूमती हुई कहती है - उन सब बातों का अब क्या फ़ायदा मेरे शहजादे.. देख तेरी माँ आज तुझे पूरी तरफ से अपनाने को तैयार है.. कर ले अपने मन कि हर ख्वाहिश पूरी बेटा.. होजा मेरे साथ एक जिस्म दो जान..

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गौतम फिर से सुमन के होंठों से अपने होंठ हटाते हुए - मुझे जानना है माँ.. कि कौन था वो जिसने तेरी टाँगे चौड़ी करके तेरी चुत में लंड घुसाकार अपना माल तेरी चुत में झाड़ा जिसके करण तूने मुझे अपनी चुत से निकला..

सुमन अपनी साडी निकालकर पटीकोट का नाड़ा खोलती हुई - गौतम तू कैसी बातें लेकर बैठ गया.. आज तेरा औऱ मेरा पहला मिलन है.. देख तेरी माँ ने तेरे लिए आज अपनी चुत के सारे बाल शेव करके चुत को कितना चिकना कर दिया है...

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गौतम सुमन के मुंह पर थूक देता है औऱ कहता है - हट माँ.. अगर तू मुझे उस आदमी का नाम नहीं बतायेगी तो तुझे चोदने से अच्छा है मैं कोठे पर कोई रंडी चोद लु..

सुमन गौतम का थूक चेहरे से साफ करके मुंह में भर लेटी है औऱ गटकते हुए गौतम का शर्ट खोलती हुई कहती है - मुझे कोठे की रांड समझकर ही चोद ले ग़ुगु.. मैं कोनसी कुछ कह रही हूँ.. तू तो फालतू की ज़िद पकड़ कर बैठ गया.. अब इतने साल बाद क्या मतलब इन बातों का..

गौतम शर्टलेस होकर उठकर कमरे की खिड़की से बाहर जंगल की तरफ देखने लगता है औऱ सुमन से कहता - मुझे मेरे असली बाप का नाम तक नहीं पता औऱ तू कहती है मैं फालतू की ज़िद पकड़ कर बैठा हूँ..

सुमन टेबल पर रखी शराब की बोतल से एक पेग बनती है औऱ पेग के साथ सिगरेट लाइटर हाथ में लेकर गौतम के पास आती है.. - नाम जानने से क्या हो जाएगा गौतम.. हम अब तक जैसे जी रहे थे वैसे ही जी सकते है ना.. तू कब से मेरे पीछे पडा था.. अब जब मैं तैयार हूँ तो तू ऐसे कर रहा है.. ये कहते हुए सुमन ने पेग गौतम के हाथ में दे दिया औऱ उसके होंठों पर एक सिगरेट लगाकर जलाते हुए अपने घुटने पर आ बैठी.. सुमन गौतम की जीन्स का हुक खोलकर उसके लंड को चूमने लगी..

गौतम सिगरेट का कश लेकर पेग पिने लगा औऱ फिर अपने आगे घुटनो पर बैठकर अपने लंड ओर चुम्मिया बरसाती हुई होनी माँ सुमन को देखता हुआ बोला - मैं तुझे औऱ कुछ नहीं कहूंगा सुमन.. तू बस मुझे इतना बता दे की मैं किसके लंड की पैदाईश हूँ?

सुमन लंड पर चुम्मियो की बरसात करने के बाद लंड को मुंह में भरती हुई - आज क्या हुआ है तेरे लंड को गौतम? इतनी चुम्मिया करने औऱ हिलाने के बाद भी खड़ा नहीं हो रहा..

गौतम पेग ख़त्म करके गिलास एक तरफ रख देता है औऱ सिगरेट का लम्बा कश खींचकर सुमन के बाल पकड़कर उसे खड़ा करके उसके मुंह पर सिगरेट का धुआँ छोड़ते हुए कहता है - जब तक इसे अपने बाप का नाम नहीं पता चलता ये खड़ा नहीं होने वाला.. समझी सुमन.. अब बता कौन है मेरा बाप? क्या वो बाबा मेरा असली बाप है जिसके पास जाकर तू कुछ ना कुछ मांगती रहती है..

सुमन हिचकती हुई - गौतम.. बाबाजी के साथ मेरा कोई रिश्ता नहीं रहा..

गौतम सिगरेट का कश लेकर सिगरेट खिड़की से बाहर फेंक देता है औऱ सुमन की चुत को अपनी मुट्ठी में पकड़कर मसलते हुए कहता है - रिश्ता कैसे नहीं रहा? उसने तुझे नंगा नहीं किया था रातों में? तेरी इस चुत में लंड तो उसका भी जा चूका है.. मैं जान चूका हूँ की बच्चे की मन्नत लेकर आई हर औरत को बाबाजी औऱ उसका साथी किशोर रात रात भर होने बिस्तर में चोदते है.. तुझे भी चोदा होगा ना वहा किसीने जब तू बच्चे की मन्नत लेकर वहा गई थी..

सुमन सिसकियाँ लेती हुई गौतम को बाहों में भरकर उसे चूमती हुई - नहीं मेरे शहजादे.. अह्ह्ह्ह... मैं तेरी कसम खाती हूँ.. मैं उस पहाड़ी पर बाबाजी के बिस्तर में नंगी जरुर हुई थी मगर वक़्त रहते मैंने अपना इरादा बदल लिया था औऱ मैं बीना चुदे ही वहा से वापस आ गई थी..

गौतम सुमन को चूमता हुआ खाट में आ जाता है औऱ उसके चुचो का मर्दन करता हुआ कहता है - वहा नहीं चुदी तो कय हुआ माँ? संजय मामा ने तो तुझे शादी के बाद भी बहुत बार चोदा था.. क्या मैं उसकी चुदाई से पैदा हुआ हूँ?

सुमन गौतम का लंड पकड़कर अपनी चुत पर रगडती हुई - नहीं बेटा.. तेरे मामा ने मेरी शादी के बाद कभी मेरी चुत में अपना माल नहीं झाड़ा.. तू तेरे मामा का बेटा नहीं है ग़ुगु..

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गौतम सुमन के चुचो को दांतो से खींचता हुआ चूसता है औऱ सुमन की आँखों में देखकर कहता है - तो क्या मैं तेरे उस पुराने आशिक विजय का बेटा हूँ, जो तुझे सिनेमा दिखाने के बाद अपने दोस्त कमल की पंचर की दूकान में लेजाकर चोदता था.. जिससे तू अब इतने सालों बाद फिर से इंस्टा पर बात करने लगी है..

सुमन गौतम का लंड चुत पर रगढ़ते हुए चौंककर - गौतम तुझे कैसे पता मैं इंस्टा चलाती हूँ औऱ विजय से बात करने लगी हूँ?

गौतम सुमन की गर्दन चाटता हुआ - पूराना अकाउंट डिलीट करके नया बना लेने से तुझे क्या लगा.. मुझे आता नहीं चलेगा.. शर्मीली सुमन नाम से अकाउंट बनाया है ना तूने नया.. उसपर अपनी चिकनी कमर की फोटो डालने से तुझे क्या लगा मुझे पता नहीं चलेगा? माँ.. तेरी कमर के तिल ने मुझे बता दिया कि ये तेरा अकाउंट है.. मैंने तेरे फ़ोन में इंस्टा के पास देखकर अपने फ़ोन में तेरा अकाउंट खोला था सुबह.. औऱ जिस जिस से तूने जो जो बात कि है सब पढ़ ली..

सुमन शर्माते हुए - गौतम तूने ऐसा क्यों किया.. मुझे शर्मिंदा करने से तुझे क्या मिल जाएगा.. मैं तेरी सगी माँ हूँ क्या ये तेरे लिए काफी नहीं?

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गौतम सुमन की टाँगे चौड़ी करके उसके चुत के दाने को चूमकर होंठों से खींचता हुआ - मुझे बस अपने बाप का नाम जानना है सुमन.. अगर तू मुझे उसका असली नाम बता देगी तो मैं वादा करता हूँ.. मैं अपने ईस लंड की छत्रछाया मैं तुझे हमेशा सुखी रखूँगा.. बता सुमन कौन है मेरा असली बाप? क्या वो विजय का दोस्त कमल है? जो विजय के चोदने के बाद तेरी चुदाई करता था..

सुमन गौतम का सर पकड़कर अपनी चुत में घुसाती हुई - नहीं.. गौतम.. वो ना विजय है ना कमल..

गौतम जोर जोर से सुमन की चुत चाटता हुआ - तो बता ना रंडी.. वो कौन है? कौन है मेरा असली बाप?

सुमन का बदन अकड़ने लगता है औऱ वो गौतम के मुंह में झड़ते हुए एक नाम लेती है - वो तेरे चाचा है गौतम.. बृजमोहन..

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गौतम के मुंह पर सुमन की चुत से जबरदस्त पिचकारी की धार निकलकर पडती है औऱ गौतम का सारा मुंह सुमन के पानी से भीग जाता है..

सुमन झड़ने के बाद तेज़ तेज़ सांस लेती हुई सिसकियाँ लेकर - वो तेरा चाचा है गौतम.. तेरा चाचा ही तेरा असली बाप है..

गौतम सुमन की चड्डी से अपना चेहरा साथ करता हुआ - बृजमोहन..

सुमन शरमाते हुए पछतावे से - हाँ गौतम हां.. बृजमोहन.. वही है तेरा असली बाप..

गौतम खाट से खड़ा होकर पानी की बोतल से पानी पीते हुए सुमन को देखकर - मुझे सारी बात बता माँ.. उसने कब औऱ कैसे क्या क्या किया तेरे साथ...

सुमन - वो सब जानकर तू क्या करेगा बेटा.. रहने दे उन बातों को..

गौतम वापस खाट पाकर सुमन की टाँगे चौड़ी करके चुत के छेद लड़ लंड टिका कर दबाव बनाते हुए - मुझे सब जानना है माँ.. तेरे साथ उसने कब कब औऱ क्या क्या किया है..

सुमन गौतम के लंड को चुत के अंदर लेने के लिए पकड़ लेती है चुत में घुसाने लगती है जिसमे उसे बहुत दर्द भी होने लगा था

सुमन सिसकियाँ लेती हुई - बता दूंगी बेटा.. सबकुछ बता दूंगी.. अब तुझसे छीपा कर करुँगी भी क्या?

फूलों का लेप लगाने से सुमन की चुत सिकुड़ चुकी थी और उसे गौतम का मोटा लंड लेने में बहुत तकलीफ होने लगी थी सुमन अभी तक केवल लंड का टोपा ही अपनी चुत में घुसा पाई थी कि उसकी आहे निकलने लगी वो तेज़ सिसकियाँ लेने लगी और किसी कुंवारी की तरह मचलने लगी..

सुमन को समझ नहीं आ रहा था कि अचानक उसे यह क्या हुआ है और वह कैसे इतनी सिकुड़ी हुई चुत की मालकिन बन गई है.. गौतम ने अपनी पूरी कोशिश और दबाव डालते हुए सुमन की सिकुड़ चुकी चुत में अपने लंड को टोपे से थोड़ा आगे औऱ प्रवेश करवा दिया औऱ सुमन के चेहरे पर आते कामुकता औऱ दर्द से भरपुर भावो को देखने लगा.. जिसमे उसे अद्भुत आनंद आ रहा था.. गौतम सोच रहा था ईसी योनि से सालों पहले दो बच्चे निकल चुके हैं लेकिन अभी यह योनि कितनी टाइट है और लेप लगाने के बाद कितनी सिकुड़ चुकी है..

सुमन सिसकियाँ भरती हुई - आराम से गौतम बहुत दर्द हो रहा है.. पता नहीं कैसे इतनी सिकुड़ गई..पता नहीं कैसे तेरे इतने बड़े लंड को अंदर ले पाऊँगी..

गौतम सुमन को देखता हुआ - माँ मुझे माफ़ कर दो..

सुमन - क्यों बेटा.. तूने कोनसी गलती कर दी जो तू माफी मांग रहा है.. सारी गलती तो मेरी है..

गौतम - गलती की नहीं माँ.. करने वाला हूँ..

सुमन - कैसी गलती गौतम..

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गौतम ने एक हाथ सुमन की गर्दन के नीचे लेजाकर उसका कन्धा पकड़ लिया औऱ दूसरे हाथ से सुमन की गांड औऱ पूरी ताकत से एक धमाकेदार झटके के साथ अपने लंड को सुमन की चुत के अंदर पूरा जड़ तक घुसेड़ दिया जिससे सुमन की चुत में गौतम का पूरा लंड घुस गया औऱ खून की कुछ बुँदे चुत से निकल कर बह गई.. इसीके साथ सुमन के गले से इतनी जोर से चीखे निकली की खंडर से दूर दूर तक हवा में उसकी आवाज सुनाई दे जा रही थी.. गौतम के चेहरे पर विजयी मुस्कान थी औऱ सुमन के चेहरे पर दर्द शिकायत औऱ रहम की उम्मीद करती आँखों के साथ दया के भाव.

सुमन गुस्से औऱ दर्द से चिल्लाते हुए गौतम के गाल पर थप्पड़ मारती हुई - गौतम मादरचोद..

गौतम सुमन के दोनों हाथ पकड़कर सुमन के होंठों पर अपने होंठ रखकर उसका मुंह बंद करता हुआ - सुमन बेटाचोद..

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सुमन की चुत में गौतम का लंड बच्चेदानी तक घुसा हुआ था औऱ उसके दोनों हाथ गौतम ने अपने हाथों से पकड़कर सर के ऊपर कर दिए थे.. उसके होंठों पर भी गौतम ने अपने होंठ चिपका दिए थे.. सुमन की आँखों से आंसू की बुँदे निकल कर बह रही थी.. गौतम सुमन की आँखों में रहम औऱ शिकवे के उठते भाव देख सकता था..

गौतम अब प्यार से सुमन के होंठ चूमने लगा था औऱ मगर फिर भी सुमन गौतम का साथ नहीं दे रही थी औऱ गौतम के होंठो की क़ैद से बार बार अपना मुंह इधर उधर घुमाकर अपने होंठों को रिहा करवा रही थी.

गोतम अपनी माँ की इस हरकत पर मुस्कुराते हुए उसे देख कर बार बार उसके होंठों को अपने होंठों में भरकर चुमने की कोशिश कर रहा था औऱ बार बार सुमन गौतम के होंठों से अपने होंठ छुड़वा रही थी.. सुमन जब मुंह घूमती तो गौतम उसके गाल औऱ गर्दन पर चुम लेटा औऱ प्यार से जीभ निकालकर चाट लेटा..

सुमन को अब इस छेदखानी में हल्का मीठा सा मज़ा आने लगा था औऱ उसकी चुत में घुसा हुआ गौतम का शैतानी लड उसे पहले की तुलना में कम दर्द दे रहा था.. 10-15 मिनट तक ऐसा ही चलता रहा औऱ गौतम सुमन के होंठों के बीच की जंग जारी रही जिसमे बार बार गौतम को सुमन से हार का सामना करना पड़ रहा था.

अब गौतम मुस्कुराते हुए सुमन को देखकर उसे छेड़े जारहा था जिससे सुमन को भी अच्छा लगने लगा था..

गौतमप्यार से - इतने नखरे? लगता है मेरी माँ को बहुत गुस्सा आ रहा है मेरी ऊपर..

सुमन गौतम की बात पर अपने हाथ गौतम के हाथों से छुड़वा कर गौतम के चेहरे को पकड़ लेती है औऱ गौतम के होंठों को अपने होंठों में भरके चूमती हुई दांतो से इतना जोर से काटती है की गौतम की आह्ह निकल जाती है औऱ वो दर्द से चीख उठता है औऱ कहता है..

गौतम - तेरी माँ को चोदू.. खा जायेगी क्या? दर्द होता है ना..

सुमन वापस गौतम के होंठ चूमते हुए - सिर्फ तुझे ही दर्द होता है क्या.. रंडी की औलाद.. एक झटके में इतना बड़ा लंड घुसाया है मेरे दर्द नहीं होता क्या? मेरी चुत से खून निकाल दिया तूने..

गौतम चुत से निकला हुआ खून जो गौतम औऱ सुमन की कटी हुई साफ झांटो पर लंड औऱ चुत के मिलन के आसपास चिपचिप कर रहा था, उसे ऊँगली में लगाकर सुमन के मांग में भर देता है औऱ कहता है - इसी खून से मैं तेरी मांग भर रहा हूँ माँ.. आज से तू मेरी हुई.. मुझे ख़ुशी है मेरी दुल्हन कुंवारी निकली.. आज से तेरी चुत पर सिर्फ मेरा हक़ है सुमन..

सुमन का दर्द अब बहुत कम हो चूका था औऱ मीठा मीठा अहसास हुए होने लगा था.. पिछले 20 मिनट से गौतम का लंड उसकी चुत में पूरा घुसा हुआ था औऱ गौतम उसके ऊपर लेटा हुआ था..

सुमन गौतम होंठ दांतो से खींचकर चूमती हुई अपना मगलसूत्र उतारकर उसे देती हुई - मांग तो भर दी तूने मेरी शहजादे.. मगलसूत्र भी पहना दे..

गौतम मगलसूत्र पहनाता हुआ - शादी मुबारक हो माँ..

सुमन - अब बेटा.. इस हालत में मैं तेरे पैर छूकर तेरा आशीर्वाद कैसे लूँ?

गौतम - चुदाई के बाद पैर छू लेना माँ.. मैं नहीं रोकूंगा.. अब बताओ मुझे वो सब कुछ.. जो तेरे औऱ चाचा के बीच हुआ था.. एक भी बात मुझसे मत छुपाना..

सुमन - मेरी चुत में लंड घुसा के तू मुझसे मेरी चुदाई की कहानी सुनेगा? मुझे शर्म आएगी बेटा..

गौतम सुमन के निप्पल्स से छेड़खानी करता हुआ - पति पत्नी में शर्म अच्छी बात नहीं है माँ.. जो हुआ था वो साफ साफ औऱ खुलके कहो.. मैं सुनने को बेताब हूँ..

सुमन - एक पेग पीके बताती हूँ.. एक बार निकाल ले..

गौतम खाट से थोड़ा दूर रखी टेबल को हाथ बढाकर अपने करीब खींचता है औऱ सुमन से कहता है - लंड नहीं निकलेगा माँ.. पेग मैं यही से बना देता हूँ..

गौतम पेग बनाकर सुमन को पीला देता है.. सुमन पेग पीके एक सिगरेट अपने होंठों पर लगा लेती है औऱ लाइटर से सुलगाते हुए पहला लम्बा कश लेकर धुआँ छोड़ते हुए कहती है..

सुमन - तो सुन मेरे शहजादे.. मैं आज तुझे वो बात बता देती हूँ जो अबतक किसी को नहीं पता.. तेरे चाचा बृजमोहन को भी नहीं..

गौतम - क्या? चाचा को भी नहीं पता मतलब?

सुमन - हाँ गौतम.. तेरे चाचा भी नहीं जामते कि तू उनका बेटा है..

गौतम - ये कैसे मुमकिन है माँ.. चाचा को भी नहीं पता कि मैं उनका बेटा हूँ..

सुमन - हुआ ही कुछ ऐसा था गौतम.. पता नहीं इसमें किसका दोष था..

गौतम - मुझे साफ साफ पूरी कहानी शुरुआत से बताओ माँ.. क्या हुआ था?

सुमन सिगरेट का अगला कश लेकर - बात तेरे पैदा होने से 9 महीने पहले की है जब मेरी शादी को 3 साल हो चुके थे औऱ मुझे कोई बच्चा नहीं हुआ था.. सब मुझे बाँझ समझने लगे थे मगर मैं जानती थी कि कमी मुझमे नहीं है क्युकी ऋतू भी मेरी ही कोख से जन्मी थी.. लेकिन फिर भी मैं सबकी बातें सुनकर बाबाजी के पास एक औलाद की मन्नत लेकर आने लगी.. औऱ हर तरह एक बच्चा पैदा करने के जतन करने लगी.. फिर एक दिन वो हुआ जिसकी मुझे उम्मीद नहीं थी..

सवान के बाद भादो ने गाँव की उस धरती को बारिश की तेज़ तर्रार बूंदो से सराबोर कर रखा था शाम के वक़्त की बात थी जब जगमोहन तेरे दादा के साथ खेत की जुताई के लिए खाद लेने गया था औऱ बारिश का पानी भर जाने से आने जाने वाला रास्ता पानी के भराव से बंद हो चूका था औऱ जगमोहन तेरे दादाजी के साथ वही फंस गया था.. तेरी दादी पड़ोस के गाँव में तेरी दादी हेमा की मुंह बोली बहन माला के यहां उसके बेटे के लगन में गयी थी औऱ वो भी बारिश के करण वही फंस गई थी.. मानसी की तबियत खराब थी और वो गलती से मेरे कमरे में आकर सो गई थी..

मौसम की बरसात, ठंडी बहती हवा औऱ जोबन का बाईसवा साल.. मेरा अंग अंग नई तरंग से भरकर मुझे कामोतेजना में खींच रहा थ.. मैं उस वक़्त मेरे शरीर की आग बुझाना चाहती थी.. शाम से रात का समय हो चला था अमावस की रात में घर के कई कोनो में मैंने दिए जला के रख दिए थे.. लाइट का कोई नामो निशान नहीं था. मैं तेरे चाचा बृजमोहन के कमरे में दिया रखने गई थी कि तभी बाहर से मुझे किसी के आने की आहट सुनाई दी औऱ मैं इससे पहले की पीछे देख पाती किसीने मुझे पीछे से अपनी बाहों में भर लिया. मेरी हाथ से दिया नीचे गिरकर बुझ गया था औऱ अब कमरे में अंधेरा ही अंधेरा था.. अमावस की उस काली रात में अन्धकार इस तरह फैला हुआ था जैसे दिल्ली की हवाओ में ज़हर...

मैं शराब की आती बू से समझ गई थी की ये ब्रिजमोहन ही है.. उसने मुझे सीधा बिस्तर पर लिटा दिया औऱ मेरी साडी ऊपर करके पीछे से उसने सीधा लंड मेरी चुत में डाल दिया औऱ कुछ देर चोदा.. वो नशे में धुत मुझे मानसी समझकर मुझे चोदे जा रहा था औऱ मैं काम भावना से भरी हुई चुपचाप उससे चुदे जारही थी.. मैं झड़ गई थी औऱ कुछ पलों में वो भी झड़ गया था.. नशे की हालत में बृजमोहन पूरी तरह उतर हुआ था औऱ मुझे चोदने के बाद वो बिस्तर पर ही उल्टा मुंह करके सो गया था.. उसे अँधेरे में ये भी नहीं दिखा कि जिसे वो मानसी समझ रहा था वो मानसी नहीं थी..

चुदने के बाद मैं वहा से बाहर आ गयी जब मौसम ठीक हुआ औऱ तेरे दादा दादी औऱ जगमोहन घर आये तो सब कुछ पहले की तरह ही था.. दिन बीतने लगे औऱ कुछ समय बाद मुझे एक दिन पता चला कि मैं पेट से हूँ.. फिर तू पैदा हुआ औऱ उसके 2 साल बाद कुसुम.. कुसुम के पैदा होने के छः महीने बाद ही हमने मीलकर तेरी औऱ कुसुम कि शादी करवा दी.. मगर फिर बटवारे का विवाद खड़ा हो गया औऱ हमें यहां आना पड़ा..

सुमन आखिरी कश लेकर मुंह से धुआँ छोड़ती हुई - बस गौतम.. यही सब हुआ था..

गौतम सुमन की गांड पकड़कर बिना लंड चुत से निकाले सुमन को खाट के बीच में लाते हुए - टाँगे चौड़ी कर ले माँ.. मैं शुरु कर रहा हूँ..

सुमन टाँगे फैलाती हुई - धीरे धीरे करना बेटा.. अभी भी दर्द बाकी है..

गौतम लंड को आधा बाहर निकालकर वापस अंदर डाल देता है औऱ अब ऐसे ही सुमन को चोदने लगता है..

गौतम चोदते हुए - आज किसी रहम की उम्मीद मत कर मुझसे सुमन..

सुमन खुलकर मादक सिसकियाँ भरती हुई - अह्ह्ह्ह... अह्ह्ह्ह.... अह्ह्ह्ह... गौतम.. आह्ह.. अह्ह्ह्ह... बेटा धीरे... अह्ह्ह्ह... गौतम... अह्ह्ह्ह अह्ह्ह.. आराम से बेटा.. अह्ह्ह्ह.. दर्द हो रहा है.. अह्ह्ह्ह... गौतम... अह्ह्ह्ह...
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दिन के तीन बजे का समय था जब गौतम ने सुमन को खंडर के उस कमरे में चोदना शुरु किया औऱ खाट पर लेटाकर मिशनरी में सुमन की चुत की खुदाई शुरु कर दी.. गौतम पुरे जोश में धक्के पर धक्के मारता हूँ सुमन को चोद रहा था औऱ सुमन गौतम का लंड झेलती हुई किसी कुत्तिया की तरह उसके सीने में अपने नाख़ून गड़ाकर दहाड़े मार मार चिल्ला रही थी औऱ गौतम से आराम से चोदने की गुहार लगा रही थी मगर गौतम अपनी माँ को ऐसे चोद रहा जैसे वो कोई बाज़ारू रांड हो.. गौतम के मन कोई पछतावा औऱ दुख नहीं था वो आज सुमन की चुत पर अपने लंड की सील लगा देना चाहता था औऱ उसके लिए पूरी जोशओखरोश से सुमन को चोद रहा था..

मिशनरी पोज़ में गौतम के मारे हर एक झटके पर सुमन ऊपर से नीचे तक पत्ते की तरफ फड़फड़ाती हुई हिल रही थी औऱ चीखते हुए आह्ह कर रही थी....

गौतम चोदते हुए - औऱ जोर से चिल्ला माँ.. यहां तेरी कोई नहीं सुनने वाला..

सुमन चिल्लाते हुए - आराम से गौतम.. अह्ह्ह्ह.. अह्ह्ह्ह... माँ हूँ तेरी.. अह्ह्ह्ह... धीरे... आराम से..

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गौतम सुमकी दोनों टांग अपने कंधे पर रखकर चुत में ताबड़तोड़ झटके मारते हुए - माँ के साथ दुल्हन भी तो है तू मेरी सुमन.. झटके तो ऐसे ही पड़ेगे तेरी चुत में मेरी जान.. जितना जोर से चिल्लाना है चिल्ला..

सुमन सिसकती हुई हाथ जोड़कर - अह्ह्ह्ह... गौतम.. भगवान के लिए.. आराम से बेटा.. मेरे वापस दर्द होने लगा है.. चुत में.. धीरे चोद मुझे.. धीरे चोद बेटा..

गौतम जब सुमन को हाथ जोड़ता देखता है तो वो सुमन के दोनों हाथ अपने हाथ में पकड़ लेता है औऱ जोर से पूरी रफ़्तार से झटके मारने लगता है जिससे सुमन कुतिया की तरह अह्ह्ह... अह्ह्ह.. करती हुई गला फाड़ फाड़ कर चिल्ला है.. औऱ गौतम को देखकर रोने जैसा मुंह बनाकर चुदती है..

सुमन - अब नहीं गौतम.. अब नहीं.. बहुत दर्द हो रहा है. अह्ह्ह्ह... छोड़ मुझे.. आराम से.. गौतम...

गौतम हाथ छोड़कर सुमन की चुत से लंड निकाल लेता है औऱ सुमन की गांड पकड़ कर उसे पलटकर खाट पर अपने आगे घोड़ी बना लेता है औऱ मजबूती से उसकी कमर थाम कर लंड वापस चुत में घुसा देता है जिससे वापस सुमन की आह्ह निकल जाती है.. इस बार चुत औऱ लंड के मिलन की मधुर आवाज से कमरा औऱ खंडर का कुछ हिस्सा गूंजने लगता है..

सुमन - अह्ह्ह.. गौतम.. अह्ह्ह्ह...

गौतम सुमन की कमर पकड़कर चुदाई के मीठे झटके मारता हुआ - अब मज़ा आ रहा है ना माँ? अब तो दर्द नहीं हो रहा ना तेरी चुत में?

सुमन घोड़ी बनी हुई - अह्ह्ह.. बेटा.. आह्ह... अह्ह्ह्ह.. गौतम आराम से... अह्ह्ह.. आराम से.. ऐसे ही.. धीरे धीरे... अह्ह्ह्ह...

गौतम - अब तो नहीं रोकेगी ना माँ मुझे अपनी इस चुत की सवारी करने से

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सुमन - नहीं ग़ुगु... तू ऐसे ही प्यार से करता रह बेटा.. बहुत मज़ा आ रहा है.. सालों बाद आ जाकर मुझे ठंडक मिल रही है.. अह्ह्ह्ह...

गौतम सुमन के बाल अपनी मुट्ठी में भींचकर पीछे से झटके मारते हुए - बहुतो को चोदा माँ.. पर तेरे जैसी कोई नहीं.. परफेक्ट अरेबियन घोड़ी है तू.. तेरी सवारी करने में लंड को मज़ा आ रहा है..

सुमन - ऐसे ही चोद अपनी माँ को घोड़ी बनाके गौतम.. आह्ह.. चोद मुझे..

गौतम सुमन की बात सुनकर चोदने की स्पीड बढ़ा देता है औऱ रफ़्तार से सुमन की चुत मारने लगरा है..

सुमन - अह्ह्ह.. गौतम.. आराम से दर्द हो रहा है आह्ह.. बेटा.. धीरे...

गौतम सुमन की बात नहीं सुनता औऱ झटके मारता हुआ सुमन के बाल खींचकर मज़े से उसकी चुदाई करता है औऱ सुमन अह्ह्ह करती हुई जोर से चिल्लाने लगती है..

सुमन - गौतम दर्द हो रहा है... आह्ह... धीरे कर.. अह्ह्ह.. आराम से कर गौतम...

गौतम सुमन के बाल छोड़कर उसकी कमर में हाथ डालकर आगे से उसका पेट पकड़ लेता है औऱ उसे अपने ऊपर लेते हुए खुद खाट पर पीठ के बल लेट जाता है औऱ सुमन की चुत में नीचे से धक्के पर धक्के मारते हुए उसकी चुत के दाने को रगडकर मसलने लगता है..

सुमन पूरी कामुकता की नदी में बहती हुई - अह्ह्ह्ह.. बेटा.. उम्म्म्म... अह्ह्ह्ह.... ऐसे ही... अह्ह्ह्ह... चोद गौतम.. उम्म्म्म... अह्ह्ह्ह... उह्ह....

गौतम - मज़ा आ रहा है ना माँ?

सुमन - बहुत मज़ा आ रहा है बेटा.. ऐसे ही चोद अपनी माँ..

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गौतम सुमन के चुचे पर हाथ रखते हुए - माँ तेरे चुचे कितने तेज़ हिल रहे है..

सुमन - मेरे कहा है बेटा. अब सब तेरा है.. मेरा चुचा मेरी चुत औऱ मैं.. सब.. तेरी है...

गौतम रफ़्तार से झटके मारते हुए चुत के दाने को ऊँगली से तेज़ रगढ़ता है औऱ सुमन को चोदता है..

सुमन मादकता भरी सिस्कारी लेती हुई झड़ जाती है औऱ साथ में तेज़ तेज़ धार निकाल कर चुत से मूत भी देती है जिसमे गौतम का हाथ मूत से गिला हो जाता है औऱ उसका लंड बाहर निकल जाता है..

गौतम का लंड अब भी तनकर योद्धा की तरह खड़ा था औऱ सुमन झड़कर गोतम के सीने के ऊपर से हटकर खाट से उतरती हुई खड़ी होने की कोशिश में लड़खड़ा कर फर्श पर गिर जाती है औऱ खाट पकड़कर वापस खड़ी होने की कोशिश करने लगती है मगर बहुत जोर लगाने पर भी हिलती हुई टांगो से खड़ी होकर काँपती हुई खाट पर वापस बैठ जाती है.. चुदाई में लगी मेहनत औऱ बहे पसीने से शराब का नशा उतरकर पूरा हल्का हो चूका था..

सुमन गौतम को देखती हुई शिकायत भरी आवाज में - प्यार से भी तो कर सकता है तू..

गौतम शराब के दो लार्ज़ पेग बनाकर एक पेग सुमन को देदेता है औऱ दूसरा खुद पिने लगता है.. शराब का पेग ख़त्म होने के बाद गौतम फिर से सुमन को पकड़ लेटा है औऱ खड़ा होते हुए खाट से उतरकर सुमन को अपने आगे झुका लेता औऱ चुत में लंड घुसाकर हलके झटके मारता हुआ उसे चोदता हुआ खिड़की के पास ले आता है जहा से बाहर जंगल का नज़ारा दिख रहा था.. सुमन होने दोनों हाथ खींडकी की दिवार पर रख देती है औऱ पीछे से गौतम सुमन को वापस चोदने लगता है..

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सुमन - एक घंटा हो गया गौतम.. तूने मुझे चोद चोद कर थका दिया.. तेरा कब निकलेगा? अब तक मैं 2 बार झड़ चुकी हूँ.. तू कब झडेगा बेटा..

गौतम पीछे से झटके मारते हुए - इतनी भी क्या जल्दी है माँ.. कितना इंतजार किया है तेरी चुत का.. बहुत सब्र किया है मैंने.. चोदने दे आराम से मुझे...

सुमन - एक ही बार में चोद चोद कर मेरी चुत को ढीली कर देगा क्या?

गौतम सुमन को दोनों हाथ पकड़ कर लंड के झटके मारते हुए - ढीली हो गई तो टाइट करनी मुझे आती माँ.. तू चिंता मत कर.. मेरे लंड को तेरी चुत का नशा हो गया है.. अब ये किसी की बात नहीं सुनने वाला..

सुमन - अह्ह्ह्ह गौतम.. आराम से... अह्ह्ह्ह... उफ्फ्फ.. देख सामने पेड़ पर बन्दर हमें कैसे देख रहा है.. अह्ह्ह्ह...

गौतम सुमन को चोदते हुए बन्दर से चिल्लाकर कहता है - क्या देख रहा है साले.. माँ है मेरी... है ना सेक्सी? बिलकुल सनी लियॉन जैसी... देख साले मेरी माँ के चुचे पर ये टैटू.. है ना मस्त..

सुमन चुदते हुए हलकी सी हस्ती हुई - गौतम.. पागल हो गया क्या तू? बन्दर से क्या बात कर रहा है..

गौतम रफ़्तार में आता हुआ - जो तू सुन रही है माँ..

सुमन - अह्ह्ह्ह... आराम से गौतम.. दर्द होता है जब तू रफ़्तार से चोदता है.

गौतम सुमन के बाल खींचकर - आदत डाल ले माँ...

सुमन - अह्ह्ह.. रंडी की औलाद... धीरे.. आराम से..

गौतम सुमन को अपनी तरफ पलटकर गोद में उठाकर चोदता हुआ - तुझे रोज़ सपनो में इसी तरह गोद में उठा उठाके चोदता था माँ.. अब जाकर हुई है मेरी ख्वाहिश पूरी..

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सुमन अपने दोनों हाथ गौतम के गले में डालकर नीचे से गौतम के झटके खाती हुई - पहली बार ऐसा मज़ा आ रहा है बेटा... अह्ह्ह.. मैं तो फिर से झड़ने वाली लगती हूँ.. अह्ह्ह्ह... अह्ह्ह्ह.. उफ्फ्फ.. अह्ह्ह...

गौतम - पसंद आया ना माँ तुझे मेरा लंड?

सुमन - मैं तो दिवानी हो गई बेटा.. तेरे लंड की.. अब तो तुझे हरदम खुश रखूंगी.. अह्ह्ह्ह... गौतम.. आई love you.. मेरे शहजादे...

गौतम - आई love you too मेरी शहजादी...

सुमन - अह्ह्ह.. गौतम मेरा होने वाला है वापस...

गौतम सुमन को खाट पर पटककर चोदता हुआ - बस माँ.. मैं भी झड़ने वाला हूँ.. आज तेरी चुत को मैं अपने वीर्य से इतना भर दूंगा कि नो महीने बाड़ तू मेरा बच्चा पैदा करेगी..

सुमन - भर दे मेरे शहजादे.. डाल दे होना माल होनी माँ की चुत में.. झड़ जा..

गौतम गाना गाता हुआ - माँ तेरी जांघो का पसीना बन गया तेल चमेली का.. ओ माँ तेरी जांघो का पसीना बन गया तेल चमेली का..

सुमन चुदवाते हुये हस्ती हुई गाती है - बेटा चोद दे अपनी माँ को खाके गुड़ बरेली का.. ओ बेटा चोद दे अपनी माँ को खाके गुड़ बरेली का..

गौतम - माँ तेरी मोटी मोटी गांड तू रांड बन जा कोठा पे.. ओ माँ तेरी मोटी मोटी गांड तू रांड बन जा कोठा पे..

सुमन - बेटा रांड भी बन जाउंगी तू आजा चोदने कोठे पे.. ओ बेटा रांड भी बन जाउंगी तू आजा चोदने कोठे पे..

गौतम चुत में लंड धीरे धीरे हिलता हुआ - माँ तू मत दबवाये बोबा ब्लाउज हो जाएगा टाइट रे.. ओ माँ तू मत दबवाये बोबा ब्लाउज हो जाएगा टाइट रे..

सुमन झड़ते हुए - बेटा तू मुंह लगा के चूस दे बोबा कर दे ढीला रे.. ओ बेटा तू मुंह लगा के चूस दे बोबा कर दे ढीला रे..

गौतम झड़ते हुए - माँ तेरी चुत में लंड घुसाते ही निकली पिचकारी की धार.. ओ माँ तेरी चुत में लंड घुसाते ही निकली पिचकारी की धार..

सुमन गौतम के होंठ पकड़कर चूमती हुई - चोद के अपनी माँ को तू खुश है ना मेरी यार..

गौतम सुमन की चुत में लंड डाल के लेटा हुआ - बहुत खुश माँ..

दिन के पांच बज चुके थे.. गौतम औऱ सुमन अब खाट पर एक साथ ऊपर नीचे लेटे हुए एकदूसरे को देख रहे थे..

सुमन - शाम होने वाली है गौतम.. अब घर ले चल मुझे..

गौतम - इतनी जल्दी क्या है माँ.. अभी वक़्त है..

सुमन - खंडर है बेटा.. कोई आ गया तो अनर्थ हो जाएगा..

गौतम - कुछ नहीं होगा माँ.. कोई नहीं आने वाला.. औऱ ये बार बार अपनी चुत को कपडे से ढकना बंद कर.. खुला छोड़ दे इसे..

सुमन चुत सहलाती हुई - कितनी बेरहमी से चोदा है तूने मेरी चुत को.. फूलकर लाल हो गई है बेचारी.. मैं तेरी कितनी परवाह करती हूँ मगर तुझे जरा भी तरस नहीं आता मुझपर...

गौतम शराब डालकर पेग बनाते हुए - आता है पर क्या करू माँ.. तेरे बदन का नशा ऐसा है कि बहक जाता हूँ..

सुमन सिगरेट उठाकर सुलगाती हुई कश लेकर - अभी तो तूने मुझे डेढ़ घंटा चोदा है औऱ वापस तेरा लंड खड़ा हो गया..

गौतम पेग पीकर सुमन के होंठों पर लगी सिगरेट का एक कश लेकर सिगरेट फेंक देता है औऱ सुमन की टांग फिर से चौड़ी करके लंड घुसाने लगता है...-

सुमन अजीब ओ गरीब हाव भाव चेहरे पर लाकर - गौतम अब नहीं.. बहुत दर्द होगा.. अब नहीं.. दुखेगा.. बेटा... अह्ह्ह्ह... गौतम.. अह्ह्ह्ह..

गौतम लंड घुसाके चोदना शुरु करते हुए - उफ्फ्फ माँ तेरा ये नखरा.. कहीं मेरी जान ही ना लेले..

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सुमन - जान तो तू मेरी लेने पर तुला हुआ है.. मैंने हां क्या की तूने तो रंडी ही समझ लिया.. कैसे नॉनस्टॉप चोदे जा रहा है...

गौतम सुमन की कमर में एक हाथ डालकर उसे गोद में उठा लेता है औऱ खाट से खड़ा होता हुआ शराब की आधी खाली बोतल को दुसरे हाथ में उठाकर सुमन को लंड पर उछालकर चोदता हुआ शराब के घूंट लगाते हुए खंडर के उस कमरे से बाहर आ जाता है औऱ सीढ़ियों से ऊपर छत की ओर चला जाता है.. जहा खुले आसमान के नीचे गौतम नंगा अपनी नंगी माँ को अपने लंड पर उछाल उछाल कर चोदता हुआ शराब की बोतल से शराब के घूंट लगाता है..

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सुमन गौतम लंड पर उछलते हुए - अह्ह्ह्ह.. हे भगवान.. अह्ह्ह... उफ्फ्फ.. केसा बेटा पैदा किया है मैने.. मुझे रंडियो की तरह खुले में लंड पर उछालते हुए चोदकर शराब पी रहा है..

गौतम सुमन के सर पर बोतल से शराब ढ़ोलता हुआ बोतल खाली कर देता है ओर कहता है - माँ तूने मर्द पैदा किया है.. मर्द...

सुमन लंड पर उछलती हुई - हाँ हां.. अह्ह्ह.. मान गई तू मर्द है.. अह्ह्ह्ह.. अब चल यहां से..

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गौतम खाली बोतल फेंक कर सुमन को लंड पर से नीचे उतार देता है मगर सुमन खड़ी भी नहीं हो पाती ओर गौतम का सहारा लेकर नीचे बैठने लगती है मगर गौतम सुमन को पलट कर अपने आगे झुका लेटा है ओर सुमन की गांड के चुत पर थूक लगा कर अपने लंड सेट करते हुए कहता है..

गौतम नशे में - आखिरी बार गांड कब मरवाई थी तूने?

सुमन अपनी गांड पर लंड महसूस करके गौतम को गांड चोदने से रोकने ही वाली होती है की गौतम उसकी कमर पकड़कर गांड के छेद में थूक लगाकर लंड का इतना जोरदार झटका देता है की लंड आधा गांड में घुस जाता है ओर सुमन पूरी ताकत से चिल्लाती है - गौतम मादरचोद...

सुमन की चीख सुनकर गौतम हसते हुए गांड में धक्के पर धक्का देकर चोदते हुए चिल्लाता है - सुमन बेटाचोद...

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सुमन गांड मरवाते हुए - गौतम मेरी गांड के साथ खिलवाड़ मत कर...

गौतम नशे में - खिलवाड़ कहा कररहा हूँ माँ.. मैं चोद रहा हूँ.. गांड भी एक नम्बर है तेरी तो.. अह्ह्ह..

सुमन पूरी आवाज के साथ चिल्लाती हुई सिसकियाँ लेकर - अह्ह्ह्ह.. अह्ह्ह्ह.. गौतम.. नहीं.. अह्ह्ह.. गौतम.. छोड़ दे मेरी गांड..

गौतम - चोद के छोड़ दूंगा माँ.. क्यों परेशान हो रही हो..

सुमन - बहुत दर्द हो रहा है बेटा..

गौतम गांड में झेटके पे झेटके मारता हुआ - माँ तू मेरी लिए नहीं सह सकती थोड़ा दर्द..

सुमन गांड मरवाती हुई - तू बहुत बड़ा मादरचोद है गौतम..

गौतम गांड मारता हुआ - तूने ही तो मादरचोद बनाया है माँ.. अब तुझे तेरा ये मादरचोद मुबारक हो..

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शाम के छः बजने वाले थे ओर खंडर की छत ओपर गौतम सुमन की अच्छे से गांड मारके उसे लंड चूसा रहा था..

सुमन लंड चुस्ती हुई - कब निकलेगा तेरा.. चुत ओर गांड के बाद अब मुंह भी दुखने लगा है.... मुझे अब डर भी लगने लगा है यहां..

गौतम - डरने की क्या बात है सुमन? तेरा बेटा है ना तेरे साथ.. तू बस मेरी लंड की सेवा कर बाकी सब भूल जा...

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सुमन लंड को गले तक लेकर जोर जोर से चुस्ती हुई गौतम को देखती है ओर उसके आंड भी हाथ से सहलाती है जिससे गौतम झड़ने के मूंड में आ जाता है ओर सुमन के मुंह से अपना लंड निकलकर हिलाते हुए सुमन के मुंह पर अपने वीर्य की धार मार कर झड़ जाता है..

अपनी माँ के मुंह पर लंड से वीर्य के गाढ़ी पिचकारी की धार मारने के बाद गौतम थोड़ा ठंडा हुआ ओर उसने सुमन की एक चूची पकड़कर उसे खड़ा करते हुए अपने कंधे पर उठा लिया और खंडर की छत से नशे में झूलते हुए कदमो की साथ वापस उसी कक्ष में आ गया जहा चुदाई का शुभारम्भ हुआ था..

गौतम ने सुमन को खाट पर पटक दिया और सुमन खाट पर आते ही आस पास बिखरे अपने कपड़ो को समेटकर बिना खाट से उतरे एक तरफ करने लगी..

गौतम नशे में चूर था उसने अपना लंड अपने हाथ में थाम लिया और खाट पर बैठकर कपडे समेटती हुई अपनी माँ की मुंह पर लंड से निशाना लगाकर मूतना शुरु कर दिया..

गौतम की मूत की धार सीधी सुमन की माथे की बिंदिया पर पड़ी फिर उसके चेहरे की बाकी हिस्सों पर.. सुमन ने जब देखा की उसका बेटा एक हाथ से अपना लंड पकड़ कर उसके ऊपर मूत रहा है वो कपड़ो को एक गिला होने की डर से एक तरफ रख देती है और अपने चेहरे से होकर अपने बदन पर पडती मूत की धार को अनदेखा करके आगे बढ़ते हुए अपने हाथ से गौतम का लंड पकड़ कर झट से अपने मुंह में भर लेती है और उसका मूत पिने लगती है...

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गौतम अपनी माँ की मुंह में मूत देता है और सुमन उसका मूत आसानी पी जाती है और पिने की बाद उसके लंड को साफ करके उसे कपडे देते हुए पहनने को कहती है और खुद भी पहनने लगती है..

सुमन फ़िक्र से - तूने ब्लाउज फाड़ दिया अब क्या पहनू मैं?

गौतम नशे में - आजकल ब्लाउज के साथ साड़ी नहीं पहनते माँ.. ब्रा के साथ पहनते है.

गौतम जीन्स शर्ट पहनकर सुमन की पास खाट पर बैठ जाता है और सुमन खाट पर घुटने की बल खड़ी हुई साडी बाँधने लगती है खड़े होने पर उसके पैर काँप रहे थे और चलने में उसे दर्द महसूस हो रहा था सुमन बार बार गौतम को शिकायत भरी नज़रो से देख रही थी और गौतम नशे की सुरूर में अपनी ही दुनिया में खोया था उसे जो सुकून और संतुष्ट सुमन ने आज दे दी थी उसका परिणाम था की गौतम को अब और किसी की याद नहीं आ रही थी..

सुमन खाट से उतरकर चलने को हुई तो लड़खड़ा गई और गौतम की तरफ गिरते हुए उसे पकड़ लिया गौतम समझ चूका था कि सुमन अब कुछ दिनों तक ठीक से चल नहीं पाएगी उसने सुमन को अपनी गोद में उठा लिया और खंडर से बाहर कार में लाकर बैठा दिया.. एक पल की लिए उसे लगा कि कोई उसे देख रहा है मगर जब उसने पीछे देखा तो वहा कोई नहीं था.. गौतम भी सुमन के साथ कार में बैठ गया और अंधेरा होते होते दोनों खंडर से निकल कर घर की लिए चल दिये..

सुमन की चुत और गांड में भले ही दर्द अब तक हो रहा था मगर उसके दिल में एक सुकून और संतुस्टी से घुला हुआ मीठा मीठा अहसास भी था वो गौतम को देखकर मुस्कुराते जा रही थी अब उसे गौतम में बेटे के साथ साथ अपने हवस मिटाकर प्यार देने वाला मर्द भी नज़र आ रहा था..

गौतम ने कार चलाते हुए बार बार रोककर रास्ते में कई बार उल्टिया की हाईवे पर पहुंचते पहुंचते उसका नशा कम हो चूका था गौतम ने सुमन की साथ एक शिकंजी वाले की पास गाडी रोककर 2-3 गलास निम्बू पानी भी पिया जिससे उसका नशा शहर में पहुंचते पहुंचते बिलकुल हल्का हो चूका था...

सुमन ने चुत देकर गौतम का दिल चुरा लिया था वो रास्ते में जहा भी चाट पकोड़ी की दूकान देखती गौतम से कहकर गाडी रुकवाती और बिना गाडी से उतरे मज़े ले लेकर चाट खाती.. सुमन ने साड़ी से बदन इस तरह ढक लिया था कि किसीको उसके ब्लाउज न पहने का पता नहीं चल सकता था.. Cरास्ते में दोनों ने सुमन की पसंद की अलग अलग चाट खाई और एक दूसरे की साथ प्यार भरी बातें करते हुए खाना एन्जॉय किया..
 
अपडेट 49

घर पहुंचते पहुंचते दोनों को रात के 10 बज गए.. गौतम सुमन को गोद में उठा कर घर के अंदर ले गया और दरवाजा बंद कर दिया.. सुमन ने खुदको गौतम की गोद से नीचे उतरवाकर दिवार का सहारा लेती हुई बाथरूम की अंदर जा घुसी.. गौतम भी दूसरे बाथरूम में नहाने चला गया..

काफी देर तक गौतम शावर के ठन्डे पानी की नीचे खड़ा रहा और धीरे धीरे ब्रश करके नहा कर बाहर निकला उसके होंठों पर मुस्कान शाम से ही सजी हुई थी जो अब भी थी.. वो मुस्कुराते हुए ख्यालो में खोया हुआ प्रेम गीत गुन गुना रहा था और जब वो नहा कर बाथरूम से निकला और अपने बाल तौलिये से पोछ कर एक टीशर्ट और लोअर में कमरे से बाहर निकला तो उसने देखा की सुमन रसोई में चाय बना रही थी..

गौतम अपनी माँ को पीछे से बाहों में जकड़ लिया और पीछे से सुमन की गर्दन और गाल चूमता हुआ बोला..

गौतम - चाय की साथ चुत भी चाहिए माँ..

सुमन अपने आप को छुड़वाते हुआ - पेट नहीं भरा क्या तेरा अबतक? दर्द हो रहा है.. लाल होके सुजी पड़ी है पूरी.. अब तो कुछ दिन भूल ही जा मेरी चुत को..

गौतम चुत पर हाथ रखकर प्यार से सहलाते हुए - ज्यादा दर्द हो रहा है?

सुमन - मेरे दर्द से तुझे क्या? केसा जालिम बना हुआ था.. मैं चीख रही थी और तू बस मुझे चोदे जा रहा था.. जरा भी तरस नहीं आया तुझे अपनी माँ पर..

गौतम सुमन को अपनी तरफ पलटकर - गलती हो गई माँ.. माफ़ नहीं करेंगी तू अपने बेटे को?

सुमन - माफ़? खंडर की छत पर खुले आसमान के नीचे मुझे ऐसे लंड पर उछाल उछाल के चोद रहा था जैसे मैं तेरी माँ नहीं कोई रखैल हूँ.. मेरे ऊपर शराब गिरा दी मेरे ऊपर मूत दिया जैसे मैं कोई टके पर चुदाने वाली छिनाल हूँ.. बेशर्मी की सारी हद पार कर दी.. चुत और गांड में दर्द के साथ जलन हो रही है और अब वापस चोदना है शहजादे को..

गौतम सुमन के बंधे हुए बाल खोलकर - अच्छा ठीक है माँ.. पर तू ऐसे मुंह फुला के नाराज़ तो मत हो मुझसे..

गौतम जिस तरह से सुमन को देख रहा था उससे सुमन का दिल अब वापस जोरो से धड़कने लगा था और चुत में दर्द होने के बावजूद उसकी चुत में सरसरी मचने लगी थी और चुत गीली होने लगी थी.. मगर सुमन के लिए गौतम से ऐसी हालात में चुदना मतलब असहनीय दर्द को सहन करना था..

सुमन चाय छन्नी करती हुई - कैसे ना होउ नाराज़.. मेरे ही बेटे ने मेरी इज़्ज़त जो लूटी है आज..

गौतम - अब माँ भी तेरे जैसी पतली कमर और मोटी गांड वाली हो तो बेटा भी क्या करें? लंड तो उसके पास भी होता है..

सुमन चाय देते हुए - माँ सुन्दर हो तो क्या बेटे को चोद देना चाहिए?

गौतम पीते हुए - मैंने तो चोद दी मेरी माँ.. बाकियों का मुझे पता नहीं.

सुमन - चोद दी तो अब सो जा सुकून से.. अब क्यों पीछे पड़ा है.. मुझे तो चैन लेने दे अब..

गौतम सुमन की कमर में हाथ डालकर उसे अपने सीने से लगाते हुए - मैं तभी सोऊंगा जब मेरी बीवी मेरे साथ बिस्तर होगी..

सुमन गैस के पास पड़ा हुआ चाक़ू उठाके गौतम को दिखाते हुए - बीवी से पहले माँ हूँ तेरी.. अगर जबरदस्ती करने की कोशिश की तो ऐसा सबक सिखाउंगी कि याद रखेगा तू..

गौतम - पहले तो कभी ऊँगली तक नहीं दिखाई अब सीधा चाक़ू दिखाने लगी.. ले चुम लिया तेरे होंठों को अब कहो.. क्या सबक सिखाऊगी मुझे..

सुमन चाकू रखते हुए - होंठों को चूमने से कब रोका मैंने? कुछ और किया तब देखना क्या करती हूँ..

गौतम सुमन को गोद में उठाकर अंदर कमरे में बिस्तर पर ले जाता है..

सुमन - क्या कर रहा है.. छोड़ वरना मारूंगी तुझे.. आज बहुत बदतमीजी कर ली तूने मेरे साथ अब और नहीं..

गौतम सुमन के पास बैठकर - एक कविता लिखी है माँ.. तेरे लिए.. सुना दू..

सुमन - अच्छा तू लेखक भी बन गया? सुना क्या लिखा है तूने..

गौतम कमरे की लाइट्स ऑफ करके बेड पर आ जाता है और सुमन के बगल में बैठ जाता है..

सुमन एक सिगरेट जलाकर कश लेती हुई गौतम को देखने लगती है जो एक नोटबुक और पेन लेकर उसके बगल में आ बैठा था और फोन के टोर्च की रौशनी में नोटबुक पर लिखा हुआ पढ़ने लगा था...

गौतम - सुनो...

सुमन सिगरेट का एक कश लेकर - सुना..

गौतम - लिखा है कि...

कितनी प्यारी प्यारी है..

माँ तू सबसे न्यारी है..

तुझे देखकर सब कहते है..

कि तू बहुत ही संस्कारी है..

सुमन - वाह.. मेरा गौतम तो बहुत अच्छा लिखता है..

गौतम सिगरेट छीनकर बुझाते हुए - आगे सुनो.. और ये सिगरेट रहने दो.. आजकल बहुत सिगरेट पिने लगी हो तुम.. अब बोलना मत बीच में..

तेरे रेशम जैसे बाल है माँ..

सूरत भी क्या कमाल है माँ..

गर्दन सुराहीदार है तेरी..

और होंठ भी लाल लाल है माँ..

तेरी छाती पर चुचक खड़े हुए..

चुचे से चुचे अड़े हुए..

कोहिनूर से ज्यादा कीमती है..

तेरे चुचो पर तिल माँ जड़े हुए..

तेरी चिकनी चिकनी कमर है माँ..

और चालिस के पार उमर है माँ..

जो कहती है दुनिया कहने दे..

तेरा और मेरा प्यार अमर है माँ..

अगर कमर से नीचे आउ मैं..

फिर क्या माँ तुझे बताऊ मैं..

तेरी जांघे पनघट के पत्थर सी..

जिनपे फिसलके गिर जाऊ मैं..

तेरी जांघो के जोड़ पर जंगल है..

तूने साफ किया है मंगल है..

अब हर दिन होगा माँ युद्ध यहां..

जमकर होगा अब दंगल है..

तेरी सुर्ख गुलाबी चुत है माँ..

इससे निकला तेरा सपूत है माँ..

कुछ पवित्र है तो इस दुनिया में..

तेरी चुत से निकला मूत है माँ..

माँ मैं तुझको पाना चाहता हूँ..

दिल से अपनाना चाहता हूँ..

तेरे साथ यहाँ इस बिस्तर में..

माँ मैं उम्र बिताना चाहता हूँ..

गौतम - केसा लिखा है?

सुमन गौतम के हाथ से नोटबुक और पेन लेकर साइड में रख देती है फिर गौतम को पीछे धकेल कर उसकी टीशर्ट उतारते हुए अपना ब्लाउज खोलकर अपनी नंगी छाती गौतम के नंगे सीने से चिपका देती है और कहती है - अगर तू कभी छोड़कर गया तो जान से मार दूंगी तुझे.. समझा? इतना कहकर गौतम के होंठ चूमने लगती है...

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गौतम सुमन के होंठों को चूमते हुए अपने मुंह कि लार सुमन के मुंह कि लार से मिला कर चुम्बन को प्रगाड़ करके चुम्बन का आंनद लूटने लगता है..

सुमन चुम्बन तोड़कर - फ़ोन आ रहा है ना..

गौतम - हां.. तेरा है मेरी जान..

सुमन फ़ोन उठाकर - हेलो..

जगमोहन - सुमन.. कल गाँव जाना है रीत निभाने.. सुबह मैं जल्दी आ जाऊंगा.. गौतम को फिर से कहीं मत भेज देना..

सुमन गुस्से से - मुझे सिखाने कि जरुरत नहीं है.. तुम आये तो ठीक है वरना मैं और मेरा ग़ुगु दोनों कल सुबह 9 बजे गाँव चले जायेंगे..

जगमोहन - मैं आ जाऊंगा.. हर वक़्त गुस्से में रहती हो.. फ़ोन कट जाता है..

गौतम - मैं कुसुम से शादी नहीं करूँगा..

सुमन अपनी साडी कमर तक उठाकर चड्डी नीचे सरका देती है और गौतम के लोअर को भी नीचे सरका कर उसका लंड पकड़कर अपनी सूजी हुई चुत के छेद पर टिका कर धीरे से अंदर करती हुई कहती है - शादी तो करनी पड़ेगी मेरे शहजादे...

गौतम सुमन का हाथ पकड़कर - क्या कर रही है दर्द होगा तुझे..

सुमन हाथ छुड़वा कर गौतम का लंड धीरे से अपनी चुत में घुसा लेती है और कहती है - चोदने के लिए मना किया है.. घुसाने के लिए नहीं.. और कुसुम से तो तुझे शादी करनी ही पड़ेगी.. समझा..

गौतम - मैं तेरे अलावा और किसी से शादी नहीं करूँगा..

सुमन मज़ाकिया अंदाज़ में - क्यों? तेरा ये लंड दो बीविया नहीं संभाल सकता?

गौतम - दो नहीं चार संभाल सकता है.. पर मैं नहीं करूंगा शादी..

सुमन गौतम को अपने नीचे पूरी तरह खींचकर करवट लेते हुए - मुझे नींद आ रही है..

गौतम सुमन को अपने ऊपर सुलाते हुए - मैंने कह दिया तो कह दिया.. समझी.. और कल मैं जाऊँगा भी नहीं गाँव..


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सुमन - हम्म..

गौतम - क्या हम्म..

सुमन - सो जा मेरे पतिदेव.. कल मेरी सौतन से भी मिलना है तुझे...

गौतम - तू सुन रही है मैं क्या कह रहा हूँ?

सुमन आँख बंद किये हुए - हम्म..

गौतम - फिर हम्म..

सुमन - सो जा ना ग़ुगु..

गौतम सुमन को थोड़ा ठीक से अपने ऊपर करते हुए चादर ओढ़कर सुलाते हुए - ऐसे चुत में लंड डाल के सोउ?

सुमन उसी तरह आँख बंद किये हुए - हम्म..

गौतम आगे कुछ नहीं कहता और सुमन के सर पर प्यार से हाथ फेरता हुआ उसे सुला देता है और कुछ देर बाद खुद भी सो जाता है..

सुबह जब उसकी आँख खुलती है तो वो देखता है उसका लंड अभी भी उसकी माँ सुमन कि चुत में घुसा हुआ था और वो उसी तरह गौतम के साथ स्टी हुई सो रही थी.. उसके हाथ का धागा सफ़ेद हो चूका था.. और गौतम समझ जाता है कि बाबाजी के कार्य का वक़्त आ चूका है..

सुमन की जब आंख खुली तो उसने देखा कि गौतम उसके बाल संवारते हुए उसे ही देखे जा रहा था.. सुमन ने भी मुस्कुराते हुए गौतम को देखा और गौतम के ऊपर से अपनी चुत से उसका लंड निकालती हुई उठकर बेड पर एक तरफ बैठ गई और पास पड़े ब्लाउज को पहनने लगी...

गौतम ने बेड से खड़े होते हुए अपनी मां को गुड मॉर्निंग बोला और पूछा..

गौतम - चाय बना दू?

सुमन ब्लाउज के बटन बंद करती हुई मुस्कुराकर - हम्म..

गौतम रसोई की तरफ जाते हुए - अब भी हम्म..

गौतम रसोई में जाकर चाय बनाने और सुमन लंगड़ती हुई बाथरूम में नहाने चली जाती है..

बाथरूम से नहा कर वापस आती है तो देखती है कि गौतम उसके सामने हाथों में चाय लिए खड़ा है और उसी को बाथरूम से बाहर आते हुए देख रहा है..

सुमन का बदन गिला था और उसने अपने गीले बालों को भी ऐसे ही बंधा हुआ था.. सुमन ने अपने बदन पर काले कलर का ब्लाउज और पेटीकोट पहना था मगर उसने ब्रा नहीं पहनी थी जिससे उसका कमर से ऊपर बदन साफ साफ नज़र आ रहा था.. ब्लाउज की पारदर्शिता बहुत ज्यादा थी सुमन के खड़े हुए चुचक गौतम को ही देख रहे थे..

सुमन में चाय लेते हुए गौतम से कहा - तू भी नहा ले. जगमोहन आता होगा.. और लंगड़ती हुई अलमीरा की तरफ चली गई.. उसकी चाल देखकर गौतम हसता हुआ बोला..

गौतम - लंगड़ी घोड़ी..

सुमन गौतम की बात सुनकर - लंगड़ी भी तूने ही किया है मुझे.. बिगड़ैल शहजादे..

गौतम बाथरूम में जाते हुए - अच्छा सुन ना सुमन.. मेरे कपड़े निकल देना.. मैं नहाके आता हूँ..

सुमन मुस्कुराते हुए - जैसा आप कहो मेरे पतिदेव...

गौतम नहाने घुस जाता है और सुमन गौतम के कपड़े निकाल कर एक बैग पैक कर लेती जिसमे उसका और गौतम का सामान भरा होता है..

गौतम नहाने के बाद कपड़े पहनकर तैयार हो जाता है और सुमन रसोई में नास्ता बनाने लगती है उसने एक आसमानी शाडी पहनी थी और अब उसके बदन पर पुरे कपड़े थे जिसमे ब्रा ब्लाउज और बाकी चीज़े भी शमील थी..

गौतम कमरे से रसोई में आता हुआ - क्या बना रही हो?

सुमन अंडा फोड़ते हुए - ऑमलेट बना रही हूँ..

गौतम अपने फ़ोन पर किसी का फ़ोन आता देखकर - ब्रेड भी सेक देना माँ..

सुमन बिना पीछे देखे - ठीक है मेरे शहजादे..

गौतम फोन उठाकर बात करता हुआ छत ओर चला जाता है वही नीचे जगमोहन आ जाता है..

जगमोहन - लो.. तुमने नो बजे कहा था मैं आठ पर ही आ गया..

सुमन चाय का कप देते हुए - बहुत बड़ा बहादुरी का काम कर दिया.. 26 जनवरी को सरकार से कहकर मैडल दिलवा दूंगी..

जगमोहन - अरे सुबह सुबह तो मूंड सही रखो.. अब तो घर भी मिल गया तुम्हे.. और पैरों में क्या हुआ?

सुमन - सीढ़ियों से गिर गई.. और घर तुमने तो नहीं दिलवाया.. बात करते हो..

जगमोहन - अंडे? तुम अंडे बना रही हो?

सुमन - तो? ऐसे चौंक क्यों रहे हो.. गौतम को छुप छुप के बाहर खाना पड़ता था तो अब उसकी पसंद का खाना यही घर ही बना रही हूँ.. तुम्हे कोई परेशानी तो कहो..

जगमोहन - हम शाकाहारी लोग है.. और तुम ये सब बना रही हो..

सुमन - तुम्हारे लिए नहीं है.. मैने और मेरे बेटे ने खाना शुरु कर दिया.. अब तुम मना करो या ना करो.. तुम्हरी कोई नहीं सुनने वाला..

जगमोहन - सुमन.. तुम्हारे कारण हुआ है ये.. गौतम पर ध्यान देती तो वो ये सब ना करता.. इतना ना बिगड़ता..

सुमन जगमोहन की बात अनसुनी करते हुए - खुद तीन तीन शादी करके बैठो हो और गौतम के बिगड़ने की बात कर रहे हो..

यहां ये सब चल रहा था कि छत पर गौतम फ़ोन उठाते हुए बोला - गुडमॉर्निंग बुआ..

पिंकी - गुडमॉर्निंग बाबू.. क्या कर रहा है?

गौतम - बस आपको याद कर रहा था..

पिंकी - हाय.. मुझे भी तेरी याद आ रही थी बाबू.. एक खुशखबरी सुननी है तुझे..

गौतम - कैसी खुसखबरी बुआ? माँ बनने वाली हो क्या?

पिंकी - हाँ मेरे बाबू.. तेरी बुआ के पेट में तेरा बच्चा लग गया है.. तू बाप बनने वाला है..

गौतम - क्या जबरदस्त खुशखबरी दी है बुआ सुबह सुबह.. मन कर रहा है आपके पास उड़ के आ जाऊ और गले से लगा के इतना चूमु की होंठ दर्द करने लग जाए..

पिंकी - तो आजा ना बाबू.. मैं सर से पैर तक तेरी ही तो हूँ.. जो करना है वो कर लेना..

गौतम - गाँव जा रहा हूँ बुआ माँ के साथ.. वरना पक्का आ जाता आज आपके पास..

पिंकी - अच्छा मैं ही आ जाउंगी तेरे पास जल्दी..

गौतम - बुआ कुसुम कैसी लड़की है?

पिंकी - अच्छा तो ये बात है.. तेरी माँ मान गई रीत निभाने के लिए.. तभी गाँव की सैर पर निकले हो तुम सब...

गौतम - बताओ ना बुआ.. मैंने कभी देखा तक नहीं उसे.. और अब शादी करने वाला हूँ...

पिंकी - बहुत अच्छी लड़की है बाबू.. तोड़ी सी गुस्सैल है पर तुझे बिस्तर में पूरा खुश रखेगी.. हर सुख देगी..

गौतम - कोई और तो नहीं है उसकी लाइफ में?..

पिंकी - अरे तू जाके खुद ही पता कर लेना अपनी होने वाली दुल्हन के बारे में..

गौतम - मैं शादी भी नहीं करना चाहता बुआ.. मेरे साथ तो माँ जबरदस्ती कर रही है.. अगर उनकी बात ना मानु तो मुझसे रूठ जाएंगी...

पिंकी हसते हुए - अरे भाभी से इतना प्यार है मेरे बाबू को.. उनके रूठने के डर से शादी कर रहा है..

गौतम - छोडो यार बुआ.. इतनी सी उम्र में शादी हो रही है..

पिंकी - बाबू अभी शादी नहीं करनी तो रीत निभा ले बंधन में दो साल बाद ले लेना.. तब तक मगेतर बनाकर रख कुसुम को..

गौतम - ऐसा हो सकता है..

पिंकी हसते हुए - हाँ तू कुसुम को मना ले.. जो कुसुम कहेगी वही होगा.. और कुसुम को शादी से पहले पेट से मत मर देना..

गौतम - मैं तो छूने भी नहीं वाला उसे बुआ..

पिंकी - वो छू लेगी तुझे.. जो उसका होता है उसे वो दिल से लगा के रखती है..

गौतम - इतनी गले पड़ने वाली है लड़की है?

पिंकी - अब तू कुछ समझ.. एक बात तय है वो प्यार बहुत करेगी तुझे.. पलकों पर सजा कर रखेगी तुझे.. तेरी हर बात मानेगी.. 4 साल पहले आखिरी बार जब मैंने उसे देखा तब उसका जोबन फूल सा खिलने लगा था.. अब अठरा की हो गई.. जोबन को तेरे लिए सजा के रखी होगी..

गौतम - मुझे क्या करना है बुआ उसके जोबन से.. मुझे तो आप पसंद हो..

पिंकी - कुसुम होने वाली पत्नी है तेरी बाबू.. तुझे भी उसे खुश रखना होगा समझा.. नहीं तो वो बहुत परेशान करेगी तुझे..

गौतम - देखा जाएगा बुआ.. छोडो.. वैसे आपके पति फ़कीर चंद को पता है आप माँ बनने वाली हो..

पिंकी - वो तो ये खबर सुनते ही ख़ुशी से उछल पड़े थे.. अब भी ख़ुशी से इधर उधर घूम रहे होंगे.. उनको लगता है ये उनका बच्चा है..

गौतम - सही है बुआ.. अच्छा माँ बुला रही है.. बाद में बात करता हूँ..

पिंकी - चल बाय मेरा बाबू...

गौतम - बाय बुआ.. Love you..

पिंकी - love you too बाबू...

जगमोहन - मुझे बात ही नहीं करनी तुमसे.. मैं बाहर इंतजार कर रहा हूँ.. जब चलना हो तो बता देना.

जगमोहन बाहर चला जाता है और गौतम नीचे आ जाता है..

गौतम - तुम्हारे पतिदेव कहा है?

सुमन नाश्ता देकर गौतम के गाल चूमती हुई - वो तो यही पर है..

गौतम नास्ता करते हुए - अरे दूसरे वाले..

सुमन - बाहर चले गए.. इतनी बेज्जती की कि अपनेआप उठकर बाहर चले गए..

गौतम - कभी प्यार से बात कर लो उनसे..

सुमन लंगड़ती हुई कमरे में जाकर बेग उठाकर लाती हुई - तू है ना प्यार करने के लिए और किसी कि क्या जरुरत..

गौतम - तुम्हारा नाश्ता?

सुमन मुस्कुराते हुए - वो तो कल ही हो गया था.. आज भूक नहीं है..

गौतम सुमन को खिलाते हुए - थोड़ा तो खा लो.. आओ.. मैं खिला देता हूँ अपने हाथों से..

सुमन खाते हुए - बस बस.. और नहीं..

गौतम - एक और.. बस..

सुमन - बस गौतम.. पेट भरा हुआ है..

गौतम - ठीक है.. हो गया मेरा भी.. चले..

सुमन - तू बेग लेजाकर रख मैं आती हूँ ये सब साफ करके..

गौतम सुमन के गाल चूमता हुआ - ठीक है मेरी लंगड़ी घोड़ी..

गौतम बेग दिग्गी में रखता है.. वही पास खड़ा जगमोहन कहता है..

जगमोहन - पिंकी बड़ा ख्याल रखती है तेरा.. कार भी दिलवा दी तुझे...

गौतम - आपने तो आजतक कुछ नहीं दिलवाया मुझे.. एक बार बुआ से बात कर लो.. आपको नोकरी भी दिलवा देगी.. कब तक हवलदारी करोगे..

जगमोहन - ये घर मेरी कमाई से बना है बेटा.. और क्या चाहिए तुझे?

गौतम हसते हुए - माँ ने लिया आपकी दूसरी पत्नियों से.. सुना है आपसे रिश्ता भी तोड़ दिया उन्होंने..

जगमोहन - छोड़ उन बातों को..

गौतम - मैं सही कह रहा हूँ.. बुआ से बात कर लो.. लोग मुझे ठुल्ले कि औलाद कहते है बहुत शर्म आती है..

जगमोहन - बेटा पुलिस वाला है तेरा बाप..

गौतम - काहे का पुलिस वाला.. इतने सालों से कांस्टेबल के कांस्टेबल हो..

जगमोहन - मेरी ड्यूटी जयपुर में ips के पास लगने वाली है..

गौतम हसते हुए - वो तो फिर कपड़े धुलवायेगा आपसे.. हो सकता है आपको उसके घर में झाडू भी लगानी पड़े.. मैंने जैसा देखा वैसा बता रहा हूँ..

जगमोहन - मत बता.. अपनी माँ को बुला.. चलना भी है..

गौतम - आ रही है..

जगमोहन - तेरा कोई चक्कर तो नहीं है ना किसी के साथ.. कुसुम से ही तेरी शादी होनी है याद रखना..

गौतम - आप चिंता मत करो.. चक्कर चला के मैं शादी नहीं करता आपकी तरह...

जगमोहन - तू भी तेरी माँ का सिखाया हुआ है क्या? बात बात में ताने मार रहा है..

गौतम - माँ आ गई..

गौतम ड्राइविंग सीट पर बैठ जाता है और उसके बगल में जगमोहन बैठ जाता है और पीछे सुमन बैठ जाती है.. गौतम गाड़ी चला कर हाईवे पर ले लेता है और गांव चलने के लिए निकल पड़ता है.. रास्ते में किसीने भी ज्यादा बात नहीं की और अगले तीन घंटे में गौतम सुमन और जगमोहन के साथ गांव पहुंच गया था..

मानसी - आओ सुमन.. तुम्हे क्या हुआ?

सुमन - कुछ नहीं हलकी सी मोच आई है पैरों में ठीक हो जायेगी कुछ दिनों में..

हेमा - अरे आ गया मेरा पोता.. हाय किसी की नज़र ना लगे मेरे ग़ुगु को.. कितना प्यारा मुखड़ा है.. बिलकुल राजकुमार लगता है..

जगमोहन - इतना लाड प्यार मत करो माँ.. पहले ही बहुत बिगड़ा हुआ है और बिगड़ जाएगा..

मानसी - भाईसाब अब इसके सिवा कौन है जिसे लाड प्यार करें.. माँ अंदर लेकर चलो हमारे ग़ुगु को.. बाहर किसी की नज़र ना लग जाए..

बृजमोहन - भाईसाब शाम को पंचायत की हाज़िरी में कुसुम और गौतम की रित निभाने की बात है..

जगमोहन - ठीक है बृज.. सब तैयारी तो हो चुकी है ना..

बृजमोहन - हाँ.. रीत निभाने की सारी तैयारी हो चुकी है..

हेमा चाय लेते हुए - कुसुम कहा है? अभी तो इधर उधर घूम रही थी अब नज़र नहीं आ रही..

मानसी - अपने कमरे में होगी माँ.. बाहर आने से शर्मा रही है..

हेमा - और गौतम कहा गया?

सुमन - छत पर गया है.. छत से गाँव दीखता है ना..

मानसी - मैं चाय देके आती हूँ ग़ुगु को..

हेमा - अरे तू क्यों जाती है? कुसुम को भेज.. मिलेंगे तो कुछ बात होगी.. साथ रहना है अब उनको..

मानसी कुसुम के कमरे में जाती हुई - ठीक है माँ जी..

मानसी - कुसुम..

कुसुम - हाँ माँ..

मानसी - ले चाय दे आ तेरे दूल्हे राजा को.. छत पर है..

कुसुम शरमाते हुए - माँ.. आप दे आओ ना..

मानसी - ठीक है तुझे नहीं जाना तो मैं ही दे आती हूँ..

कुसुम - माँ..

मानसी - अब क्या है?

कुसुम चाय लेते हुए - मैं दे आती हूँ..

मानसी मुस्कुराते हुए - अच्छा जी.. सिर्फ चाय देके आना.. समझी..

कुसुम - माँ..

कुसुम चाय लेके छत पर आ जाती है और गौतम को पीछे लहलहाते खेत की और देखते हुए अपनी बढ़ी हुई दिल की धड़कन के साथ उसके पास पीछे की तरफ आ कर खड़ी हो जाती है..

कुसुम नज़र झुका कर - जी चाय...

गौतम जब पीछे मुड़कर देखता है तो फिर देखता ही रह जाता है.. उसके मुंह में जैसे जबान ही नहीं थी उसे कुसुम को देखकर किसी की याद आ गई जिसे वो पहले भी देख चूका था वही चेहरा वही रंग रूप वही आवाज.. गौतम ऐसे खड़ा हुआ कुसुम को देख रहा था जैसे उसने कोई अजूबा देख लिया हो..

कुसुम नज़र झुका कर शरमाते हुए - जी चाय ले लीजिये.. ठंडी हो जायेगी..

गौतम ख्याल से बाहर आता हुआ चाय का कप कुसुम से ले लेता है और कुसुम पहली बार गौतम के चेहरे को देखती है अपनी आँखों में गौतम के सुन्दर चेहरे को बसाने लगती है वही गौतम भी कुसुम के प्यारे से भोले चेहरे को देखे जा रहा था..

गौतम - शुक्रिया..

कुसुम धीमी आवाज में - कुछ और चाहिए?

गौतम - नहीं.. तुम कौन हो?

कुसुम शरमाते हुए - कुसुम..

ये कहते हुए कुसुम नीचे जाने के लिए मुड़ गई और तेज़ कदमो के साथ नीचे अपने कमरे में वापस आ गई.. उसकी होंठों पर मुस्कुराहट, दिल की बढ़ी हुई धड़कन और तेज़ चल रही सांस उसके मन का हाल बयाँ कर रही थी..

गौतम चाय पीते हुए कुछ और सोच रहा था.. कैसे ऐसा मुमकिन है कि एक जैसे दो लोग हो सकते है.. मगर उसने इस बात को छोड़ते हुए गाँव के मनभावन और मनोहर दृश्य को देखते हुए चाय का आंनद लेना ज्यादा जरुरी समझा..

शाम हो चुकी थी और गाँव की चौखट पर पंचायत के सामने अपनी बनाई रीति से कुसुम और गौतम आमने सामने खड़े थे..

पंचायत ने दोनों की रित निभाने का कार्य शुरु कर दिया और सब हंसी ख़ुशी से संपन्न भी हो गया.. आखिर में बंधन जिसमे लड़का लड़की को अपने साथ लेजाकर पति पत्नी की तरह रखता है उसकी तारीख तय करने के लिए दोनों को बात करने के लिए कहा..

गौतम - मुझे थोड़ा समय चाहिए..

कुसुम - मंजूर है..

पंचायत का एक आदमी - कितना समय चाहिए? कोई तारीख कहो..

गौतम - 2-3 साल..

पंच का आदमी - बेटी बोल.. मंजूर है कि नहीं?

कुसुम - नहीं..

पंच का आदमी - तो कितना समय देगी अपने मर्द को बंधन के लिए?

कुसुम - 2-3 हफ्ते दे दूंगी..

गौतम - पागल है क्या? 2-3 हफ्ते? कम से कम दो साल तो चाहिए मुझे.. एक दम से कैसे बंधन में ले लु..

कुसुम - 1 महीना.. बस उससे ज्यादा नहीं..

पंच का आदमी - अरे ये तो पहले से तय करना था ना बृजमोहन और जगमोहन को.. लड़का और लड़की एक मत है ही नहीं..

गौतम - मैं इतना जल्दी ये सब नहीं कर सकता.. मुझे समय चाहिए..

पंच का आदमी - बेटी बोल क्या कहती है.. आखिरी में लड़के को लड़की की ही बात माननी पड़ेगी तू कितना समय देगी अपने दूल्हे को साथ ले जाने के लिए..

कुसुम - उन्हें समय चाहिए तो 2 महीने दे दूंगी...

गौतम - मुझे मंजूर नहीं है..

पंच का आदमी - बेटा तेरे मंजूर करने से कुछ नहीं होता..

गौतम कुसुम से - 6 महीने तो दे कम से कम..

कुसुम गौतम को देखकर - 3 महीने बस.. और नहीं..

पंच का आदमी - तो ठीक है आज से तीन महीने बाद इसी तारीख को यही बंधन होगा और फिर लड़का लड़की को अपने साथ ले जाएगा और पत्नी की तरह रखेगा..

बृजमोहन - पंचो पहले आप लोग खाने की शुरुआत करो..

जगमोहन - हाँ.. रसोई तैयार है..

गौतम वापस घर आ जाता है और उसके पीछे पीछे सुमन भी घर आ जाती है..

मानसी और सुमन घर जाने लगती है तो हेमा उन दोनों को रोक लेती है और कहती है..

हेमा - तुम दोनों कहा चली.. जाने दो उन दोनों को अकेले में बात करेंगे तो अच्छा रहेगा..

सुमन - दोनों झगड़ा ना करें..

मानसी - हां माँ देखा नहीं दोनों कैसे बात कर रहे थे..

हेमा - करते है तो करने दो.. झगडे से प्यार बढ़ता है..

गौतम फिर से छत पर चला जाता है और कुसुम भी उसके पीछे पीछे छत पर आ जाती है..

गौतम गुस्से से - पीछे पीछे क्यों आ रही हो? क्या चाहिए तुम्हे?

कुसुम प्यार से - इतना क्यों बिगड़ते हो..

गौतम - बिगडू नहीं तो क्या करू? तुम्हे बड़ी जल्दी है शादी की.. मैं मना तो नहीं कर रहा शादी से..

कुसुम उसी प्रेम से - हामी भी कहा भर रहे हो.. पहली नज़र में भा गए हो तुम.. कैसे रहूंगी इतना समय दूर मैं?

गौतम पलटकर सिगरेट निकलकर लाइटर से जलाकर कश लेते हुए - अच्छी मुसीबत है..

कुसुम नजदीक आकर गौतम के होंठों से सिगरेट छीनकर फेंक देती है और कहती है - पूरी रात तुम्हारी तस्वीर गले लगाकर तुम्हारे ख्याब देखें है मैंने.. इतना बिगड़ोगे तो अपनी जान दे दूंगी.. फिर तुम्हारी मुसीबत ख़त्म..

गौतम - सिर्फ 21 साल का हूँ मैं.. अभी से शादी कैसे करूंगा? मैं खुद बच्चा हूँ..

कुसुम गले लगते हुए - मैं संभल लुंगी तुम्हे.. शादी कर लेते बच्चा जब तुम कहोगे तब करेंगे..

गौतम - यार कैसी बातें कर रही है शर्म नहीं आती तुझे?

कुसुम मुस्कुराते हुए - आती है ना.. पर तुम्हे देखकर प्यार भी बहुत आता है.. इतने सुन्दर हो मेरी तो नज़र ही नहीं हट रही.. मैं तो चाहती हूँ आज ही हमारा बंधन हो जाए और तुम मुझे ले जाओ अपने साथ.. और खूब सारा प्यार करो..

गौतम कुसुम को देखते हुए - मैंने तो सुना था गाँव की लड़किया बहुत शर्मीली होती है पर तुम तो बहुत अलग हो... तुम्हे तो लड़का होना चाहिए था..

कुसुम - अगर मैं लड़का होती तो तुम लड़की होते.. मेरे साथ में तो तब भी रहना पड़ता तूम्हे.. और मैं तो बहुत बुरा लड़का होती.. रोज़ शराब पीकर तुम्हारे साथ मार पिट करती.. और तुम्हे अपने पैरों में रखती.. और तुम रोज़ मेरे सामने सर झुका कर सुनो जी.. सुनो जी.. करते..

गौतम हसते हुए - अच्छा है तुम लड़का नहीं हो..

कुसुम - हम्म.. माँ भी मेरा गुस्सा देखकर यही कहती है.. तुम्हे भी मुझे झेलना होगा.. मेरे गुस्से को भी संभालना होगा..

गौतम दिवार का सहारा लेकर बैठते हुए - सब मेरे नखरे उठाते है मैं तेरे उठाऊंगा? तू कितनी गलतफहमी में है.. मैं अपनी मर्ज़ी का मालिक हूँ..

कुसुम बगल में बैठती हुई - एक बार मुझे साथ ले जाओ.. फिर देखना मेरी मर्ज़ी से सब करोगे..

गौतम - अच्छा? जादू टोना जानती हो..

कुसुम - हाँ.. दादी कहती है जरुर पिछले जन्म में मैं जादूगरनी थी.. मैं जिसे गुस्से दे देखु वो फूल भी मुरझा जाता है और प्यार से देखु तो मुरझाया हुआ फूल भी खिल उठता है..

गौतम कुछ सोचकर - ऐसी बात है?

कुसुम - हाँ.. कोई शक है तुम्हे?

गौतम कुसुम को घूर कर उसके हाथ पकड़ते हुए - घर में कोई नहीं है..

कुसुम शर्म से नज़र चुराते हुए - बंधन से पहले कुछ करने की सोचना भी नहीं..

गौतम - अगर कुछ कर दू तो...

कुसुम गौतम को देखकर - चूमने की इज़ाज़त है उससे ज्यादा करोगे तो छत से धक्का दे दूंगी..

गौतम - क्या चूमने की..

कुसुम शरमाते हुए - होंठ...

गौतम छेड़ते हुए - कोनसे? ऊपर वाले या नीचे वाले?

कुसुम समझ जाती है गौतम किन होंठों की बात कर रहा है और वो शर्मा कर धत.. कहते हुए गौतम से अपना हाथ छुड़वा कर छत से नीचे चली जाती है और गौतम मुस्कुराते हुए कुसुम के बारे में कुछ सोचने लगता है..

गौतम छत पर खड़ा हुआ ये सब सोच ही रहा था कि उसके फ़ोन पर किसी का फ़ोन आता है..

हेलो..

हेलो गौतम..

हाँ.. तुम कौन?

मैं किशोर.. बड़े बाबाजी बात करना चाहते है तुमसे..

बड़े बाबाजी - गौतम..

गौतम - प्रणाम बाबाजी..

बड़े बाबाजी - मेरे कार्य का समय आ गया है बेटा..

गौतम - बाबाजी मैं कल ही आपके पास आ जाऊंगा..

बड़े बाबाजी - कल नहीं गौतम दो दिन बाद.. अमावस के दिन मेरा कार्य शुरु होगा जो अगली अमावस तक चलेगा..

गौतम - ठीक है बाबाजी मैं आ जाऊंगा..

बड़े बाबाजी - बेटा.. तुम अपने साथ अपनी जरुरत का सारा सामान लेकर आना.. तुम्हे कुछ दिन यही रुकना होगा.. जिसे भी तुम बताना चाहते हो उसे कोई और कारण बताकर आना..

गौतम - टेंशन मत लो बाबाजी मैं कह दूंगा वर्ल्ड टूर पर जा रहा हूँ.. मैं आपके पास आ जाऊंगा..

बड़े बाबाजी - ये मज़ाक नहीं है बेटा.. जैसा कहता हूँ वैसा ही करना..

गौतम - जी बाबाजी.. मैं कोई बहाना बनाकर आपके पास आ जाऊंगा कुछ दिनों के लिए..

बड़े बाबाजी - मैं प्रतीक्षा करूँगा बेटा.. समय से उपस्थित हो जाना वरना तुम्हे जो भी मुझसे मिला है वो तुमसे छीन जाएगा...

गौतम - क्या बात कर रहे हो बाबाजी.. मैं आ जाऊंगा.. आप कुछ भी मत छीनना.. अच्छा अब रखता हूँ..

बड़े बाबाजी - ठीक है बेटा..
 
अपडेट 50

हेमा - सुमन नीचे ही सोजा मेरे पास तेरे पैरों में मोच है ना..

सुमन - ठीक माँ जी..

मानसी - ग़ुगु ऊपर वाले कमरे में चल मैं बिछोना लगा देती हूँ तेरा..

हेमा - जग्गू.. तू भी यही सोजा..

जगमोहन - हाँ माँ... बहुत सालों बाद मौका मिला है.. बहुत बात करनी है आज..

हेमा - कुसुम.. बृजमोहन कहा चला गया?

मानसी ऊपर जाते हुए - कहा जाएंगे माँ जी.. खेत कि तरफ गए है.. या अपनी मंडली की बैठक में होंगे शराब पिने..

गौतम - चाची.. आराम से.. मैं उठा लेता हूँ गद्दा..

मानसी मुस्कुराते हुए - तू मेरा जमाई राजा है ग़ुगु.. तुझसे काम थोड़ी करवाउंगी.. हट मैं खाट पर गद्दा डाल देती हूँ..

गौतम - चाची.. कितना काम करती हो थकती नहीं हो..

मानसी - इसमें थकावट कैसी बेटा.. शहर की औरत थोड़े हूँ जो थोड़ी सी मेहनत में थक जाऊ.. काम करने की आदत है मुझे तो..

गौतम - चाचा ऐसे ही देर तक बाहर रहते है आपको घर में अकेला छोड़कर?

मानसी हसते हुए - वो तो अपनी मर्ज़ी के मालिक है.. उसने कुछ कहना यानी दिवार में सर देना.. ले तेरा बिस्तर तैयार हो गया.. तू आराम कर..

गौतम मानसी का हाथ पकड़ते हुए - चाची आप कहा जा रही हो? थोड़ी देर बैठो ना मेरे साथ..

मानसी गौतम के साथ बैठते हुए - लगता है अकेले सोने में डर लगता है मेरे जमाई को..

गौतम - अब इतना अंधेरा है.. लाइट नहीं है ऊपर से बाहर का बिगड़ा हुआ मौसम.. डर तो लगेगा ही चाची..

मानसी गौतम के गाल चूमते हुए - डरने की क्या बात है बगल वाले कमरे में ही तो हूँ मैं.. कुछ चाहिए हो तो बता देना.. चाची के साथ साथ अब सासु माँ भी तो तू तेरी.. तेरा ख्याल रखना तो मेरा पहला काम है.. वैसे तू खुश तो है ना.. कुसुम के साथ तीन महीने बाद पति पत्नी की तरह रहेगा.. वो बहुत खुश रखेगी तुझे.. कल से तेरे बारे में ही सोच रही थी.. रित निभाने के बाद छत पर क्या बात की तुमने? कहीं कुछ ऐसा वैसा तो नहीं हुआ ना..

गौतम मानसी की गोद में सर रखकर सोते हुए - कहाँ चाची.. वो तो बंधन में आने से पहले कुछ करने को ही तैयार नहीं है.. पहले मेरे ऊपर रोब जमाया फिर मैंने हाथ पकड़ा तो छुड़ा के भाग गई..

मानसी गौतम के सर पर हाथ फेरती हुई - तो ले ले बंधन में.. फिर जो करना हो कर लेना अपनी घरवाली के साथ.. कोई रोकने थोड़ी आएगा तुम दोनों को..

गौतम - वैसे चाची आप बहुत खूबसूरत हो..

मानसी मुस्कुराते हुए - लगता मेरे जमाई की मुझपर नियत खराब है..

गौतम - आप तो दिल की बात जान जाती हो चाची..

मानसी हसते हुए - अपनी नियत सही कर ले मेरे जमाई राजा.. मेरे साथ तेरा कुछ नहीं होने वाला.. और ये बात कुसुम को पता चली तो तेरा हाल बुरा कर देगी.. उसका गुस्सा ऐसा है की दहकती आग.. अब मैं भी सो जाती हूँ जाकर.. इनका पता नहीं कब आएंगे..

गौतम - इतना अधेरा है रात को डर लगा तो?

मानसी - डर लगा तो मेरे पास आकर मुझे बता देना.. अब सो जाओ जमाई राजा..

मानसी अपने कमरे में चली जाती है और गौतम सोने लगता है... करीब दो घंटे बाद गौतम की नींद किसी आहट से खुलती है तो वो देखता है की अँधेरे में कोई आदमी कमरे के दरवाजे पर आ चूका है और उसके कदम बहुत लड़खड़ा रहे है.. गौतम समझ गया था कि ये और कोई नहीं बल्कि उसके चाचा या कहे सगा बाप बृजमोहन था जो नशे में धुत कमरे के दरवाजे पर दिवार का सहारा लेकर खड़ा था और उसके पास आ रहा था..

गौतम समझ चूका था कि बृजमोहन इतना नशे में है कि उससे चला भी नहीं जा रहा.. बृजमोहन लड़खड़ाते हुए अँधेरे में गौतम के बिस्तर तक आ गया और गौतम उठकर एक तरफ खड़ा होकर बृजमोहन को देखने लगा जो अँधेरे में बिस्तर पर लेटते ही बेहद नशे के करण नींद के हवाले हो गया.. बृजमोहन गौतम की जगह अब शराब के नशे ने धुत होकर सो गया था और गौतम अंधरे में उसे देखता ही रह गया था..

नीचे एक लालटेन जल रही थी मगर उसकी रौशनी ऊपर तक नहीं आ सकती थी.. बारिश ने भी आज बिगड़े हुए मौसम का साथ निभाना शुरु कर दिया था और गाँव को भीगाने लगी थी..

गौतम कमरे से बाहर निकल गया और बगल के कमरे जहा मानसी सो रही थी वहा आ गया.. अंधरे में कुछ भी देख पाना मुश्किल था.. गौतम को मुश्किल से कुछ दिखाई दे रहा था उसने आगे बढ़ते हुए इधर उधर संभल के कदम बढ़ाना शुरु कर दिया उसके कदम जब बेड से टकराये वो बेड के ऊपर सो रही मानसी पर गिर गया और मानसी नींद से जागते हुए गुस्से से बोली - आज भी नशे में धुत होकर आये हो.. चला भी नहीं जा रहा क्या तुमसे? कमसे कम आज तो शराब नहीं पीनी चाहिए थी तुमको..

मानसी को भी गौतम कि शकल दिखना मुश्किल था..

गौतम मानसी पर से हट कर बगल में आ गया और मानसी कि बात का कोई जवाब नहीं दिया..

मानसी करवट लेकर वापस सोते हुए बड़बड़ाने लगी - अजीब मुसीबत है.. दिनभर नोकर कि तरह घर में काम करो और रात को बिना देह का सुख भोगे यूँ ही सो जाओ.. तुमसे शादी करना सबसे बड़ी भूल थी..

गौतम मानसी कि बड़बड़ाहट सुन रहा था और सब समझ भी रहा था गौतम जानता था कि ऐसे मौसम में मानसी के बदन कि आग और भड़क रही होगी..

उसने मानसी को आज देह का सुख देने का सोचा मगर उसे सुमन से किया वादा याद आने लगा मगर मानसी की कमर चिकनाहट ने उसका दिल बदल दिया और वो सोचने लगा की सुमन को वो अपने इस काम की भनक नहीं लगने देगा..

गौतम ने अपनी टीशर्ट उतार दी और हलके से मानसी के पीछे उसके करीब आकर अँधेरे में उसकी पीठ फिर कमर पर हाथ रख दिया.. मानसी ने पहले तो दो चार कड़वी बातें कहकर गौतम को बृजमोहन समझते हुए उसका हाथ हटा अपनी कमर से हटा दिया मगर फिर गौतम के करीब आकर उसे पीछे से गले लगाकर अपना हाथ उसके कमर से होते हुए आगे लेजाकर मानसी की चुत पर रखकर धीरे धीरे सहलाने पर मानसी भी गर्म होने लगी और कड़वी बातें बोलना बंद करके गौतम का मोन समर्थन करने लगी..

गौतम ने पहले मानसी की चुत को सहलाया और फिर उसकी साड़ी के अंदर हाथ डालकर उसकी चुत में ऊँगली डालके मानसी की गर्मी महसूस की फिर उसकी गर्दन चूमते हुए अपना दूसरा हाथ उसकी छाती पर ले आया और उसके चुचे मसलने लगा.. मानसी गर्म होते हुए आँख बंद करके गौतम की हरकतो का आनद उठाने लगी.. गौतम ने महसूस किया की मानसी के चुचो पर चुचक तनकर खड़े होगये है और उसकी हिम्मत अब पूरी बुलंदी पर पहुंच गई.. गौतम पीछे से मानसी के कमर और कंधे को चुम और चाट रहा था.. जिससे मानसी अब अपने मुंह से हलकी हलकी काममई आवाजे निकलने लगी थी..

गौतम ने मानसी की शाडी को धीरे धीरे खींचकर उसकी कमर से ऊपर तक उठा दिया और अपनी जीन्स को भी खोल दिया..

मानसी करवट लेकर - आज शराब नहीं पी आपने? और ये आपके बदन को क्या हुआ? ऐसा लग रहा जैसे आपने सीने के सारे बाल कटवा लिए हो..

मानसी कुछ और बोलती इससे पहले गौतम मानसी के ऊपर आ गया और उसके लबों को अपने लबों में भरके चूमने लगा और अपने लंड को पकड़कर मानसी की चुत टटोलते हुए छेद पर रखकर मानसी की गीली फिसलन भरी चुत पर लगाने लगा..


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मानसी पुरे काम के प्रभाव में गौतम के चेहरे को अपने दोनों हाथों से थाम कर इस तरह चूमने लगी जैसे उसे आखिरी बार किसी को चूमना हो.. गौतम अपनी चाची मानसी की मुंह के गीलेपन से रूबरू हो रहा था और मानसी भी इस चुम्बन से काम के दरिया में बही चली जा रही थी.. गौतम ने जब चुम्बन तोड़कर मानसी के गाल और गर्दन पर चुम्बन देना शुरु किया तो मानसी आँख बंद किये हुए ही बोली - आज आपके बदन से खुशबु क्यों आ रही है.. और इतने नाजुक और मुलायम होंठ कैसे हो गए आपके..

गौतम को चुत का छेद मिल गया था और वो अब अपने लंड को मानसी की चुत पर सेट करके अंदर घुसाने लगा था मानसी अपने दोनों हाथों से गौतम को पकडे हुए अपनी टांग फैला कर अपनी चुत में लंड लेने को आतुर हो रही थी उसने ये तक महसूस नहीं किया की उसके पति और गौतम में कितना अंतर है और अब लंड में कितना अंतर है.. मानसी बिगड़े हुए मौसम की बारिश जैसे काम की भावना के साथ बरस रही थी..

गौतम ने वापस मानसी को मुंह से लगा लिया और बिलकुल धीरे धीरे मानसी की गहराई में उतरने लगा... मानसी की चुत पहले ही गाजर मूली घुसाने से बड़ी हो चुकी थी सो लंड को चुत में जाने में ज्यादा दर्द नहीं हुआ मगर फिर भी हल्का दर्द हो ही रहा था.. मानसी को लंड चुत में उतरने हो रहे दर्द से इस बात का शक हुआ की उसके साथ बृजमोहन की जगह कोई और तो नहीं.. मगर अबतक गौतम के लंड का मानसी की चुत से मिलन हो चूका था..


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लंड चुत की गहराई में उतर चूका था..

मानसी ने चुम्बन तोड़कर बड़ी हुई आवाज में सिसकियाँ लेते हुए एक हाथ से बेड के ऊपर अपना फ़ोन तलाशते हुये उठा लिया और उसकी स्क्रीन लाइट से अपने ऊपर लेटे हुए गौतम का चेहरा देखा तो वो हैरानी परेशानी और शर्म से लाल होकर उसी दबी हुई आवाज में बोली..

मानसी - ग़ुगु बेटा तू..

गौतम मानसी के हाथ से फ़ोन लेकर साइड में रखते हुए उसे धीरे धीरे चोदना शुरू करते हुए - ग़ुगु नहीं चाची.. आपका जमाई राजा.. चाचा तो नशे में तेरे बिस्तर पर आकर सो गए.. इसलिए मैं यहां आपके पास आ गया.. आपकी बातों से लगा आप प्यासी हो तो मैंने सोचा मैं ही आज रात आपकी प्यास मिटा देता हूँ..

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मानसी सिसकते हुए - बेटा हट ऊपर से.. ये अनर्थ मत कर.. किसीने देख लिया तो घर में कोहराम मच जाएगा..

गौतम धीरे धीरे चुत में लंड अंदर बाहर करता हुआ - आपने ही कहा था चाची रात के अंधरे में ऊपर कोई नहीं आता.. फिर इतनी फ़िक्र किस बात की.. कुछ देर की बात है.. और इस बरसात में तो किसीके आने का कोई चांस ही नहीं है..

मानसी अपने दोनों हाथ गौतम के कंधो पर रखकर उसके साथ चुदाई के सुख को भोगते हुए - बेटा तू ये बहुत गलत कर रहा है.. अगर किसीको भनक तक लग गई तो न जाने क्या होगा.. तू छोड़ मुझे..

गौतम मानसी की कमर में हाथ डालकर उसकी कमर थाम लेता है और मानसी को नीचे से अपने ऊपर खींचता हुआ खुद बेड पर पीठ के बल लेते जाता है और मानसी को अपने ऊपर ले लेता है.. चुत में लंड अपनी भी पूरी औकात में घुसकर खड़ा था..

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गौतम मानसी के बाल पीछे करके उसके चेहरे को थामते हुए मानसी को होंठ अपने होंठों के करीब लाकर प्यार से - अपने जमाई राजा को मना करोगी चाची.. ये तो गलत बात है.. और वैसे भी हमारे बिच जो हो रहा है ना मैं किसीको बताने वाला ना आप बताओगी..

मानसी काम की अग्नि में अंधी होकर - मुझे तेरे मुलायम बदन और नाजुक होंठ के छूने से ही समझ जाना चाहिए था की तू कौन है.. तू जो करना चाहता है कर ले.. मैं अब मना नहीं करुँगी जमाइराजा.. पर इसके बारे में किसी को कुछ भी ना पता लगे..

ये कहते हुए मानसी गौतम के होंठों पर टूट पडती है और चुदवाते हुए अपना ब्लाउज खोलकर किनारे रखती हुई खुलकर सम्भोग के रास्ते पर अग्रसर हो जाती है..

गौतम नीचे से झटके पर झटके मार रहा था और मानसी झटके खाते हुए गौतम के लब चूमती हुई सिस्कारी भरी जा रही थी बाहर बरसात ने भी बिकराल रूप धारण कर रखा था जो बरसते हुए दोनों के सम्भोग में उठती आवाजो को दबा रही थी..

गौतम के झटको ने मानसी को झड़ने पर मजबूर कर दिया और वो झड़कर गौतम के ऊपर गिर गई मगर गौतम ने चुदाई नहीं रोकी और लगातार ताबड़तोड़ झटके मारते हुए बरसात की छप छप के साथ चुत में लंड की थप थप भी जारी रखी..

मानसी कुछ ही देर में वापस मूंड में आ गई और गौतम के झटके को रोककर खुद उसके लंड पर उछलने लगी..

उछलने के दौरान मानसी ने गौतम के हाथ पकड़ कर अपने चुचो पर रख दिया और उछलते हुए दबवाने लगी.. मानसी के बदन की आग उसकी चुत से पानी बनकर बहाने लगी थी और गौतम को भी नई चुत मिल चुकी थी.. मानसी उछलते उछलते दूसरी बार भी झड़ गई थी और अब ढीली पड़कर गौतम से लिपटकर उसे अपने होंठों की चुम्बन वर्षा से अभीभुत कर रही थी..

गौतम का लंड अभी भी खड़ा का खड़ा था और दूर दूर तक झड़ने का अंदेशा नहीं था गौतम ने अपना चेहरा चुम रही मानसी का बोबा पकड़ के उसे अपने नीचे पेट के बल लिटा लिया और दोनों हाथ से कमर पकड़कर गांड उठाते हुए घोड़ी बनाकर चुत में वापस लंड पेल दिया और मानसी की रेल बनाना शुरु कर दिया..

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गौतम मानसी को घोड़ी बनाके चोदने लगा और उसकी चुत को लंड से और खोदने लगा..

मानसी की कामुक सिसकियाँ कमरे की हवा में काम और सम्भोग की मिठास घोल रही थी..

गाँव के इस घर में गौतम और मानसी के अलावा भी कोई जाग रहा था जो मानसी और गौतम की चुदाई से बेखबर नीचे कमरे में अपने बिस्तर पर टांग फैला के लेटी हुई गौतम की तस्वीर देखते हुए सपनो में उसके साथ सम्भोग करने की कल्पना करती हुई गौतम की तस्वीर को बार बार अपने होंठों से चूमती हुई अपनी बीच वाली को ऊँगली चुत में घुसाये चुत में ऊँगली कर रही थी..

कुसुम ने पिछली रात भी इसी तरह चुत में ऊँगली करते हुए जागकर निकाली थी.. और अब भी वही कर रही थी वो अनजान थी इस बात से की गौतम ऊपर उसकी माँ चोद रहा है..

पिछले एक घंटे में मैं तीन बार झड़ चुकी हूँ तू कब झडेगा बेटा..

गौतम - जब निकलेगा बता दूंगा चाची अभी चुसती रहो..

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मानसी बैड पर बैठी हुई गौतम का लंड मुंह में लिए चूसे जा रही थी और गौतम मानसी के बाल मुट्ठी में पकड़कर उसे लोडा चुसवा रहा था जैसे मानसी उसकी चाची नहीं कोई छिनाल थी..

गौतम लंड चूसाने के बाद वापस मिशनरी में आते हुए मानसी की चुत चोदी और फिर पूरा माल उसकी चुत में झाड़ दिया..

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गौतम रात के 1 बजे मानसी के कमरे में आया था और अब सुबह के 4 बज रहे थे मानसी अभी भी टांग खोलकर गौतम के नीचे लेटी हुई थी.. उसकी आँखों में आंसू थे और दोनों हाथ गौतम के सामने जुड़े हुए थे.. गौतम का लंड अब भी मानसी की चुत में घुसा हुआ था और मानसी हाथ जोड़कर गौतम से अब और नहीं चोदने की विनती कर रही थी..

मानसी - बस कर बेटा.. और कितना चोदेगा.. पता नहीं आज कितनी बार झड़ चुकी हूँ मैं.. अब और नहीं झेल पाउंगी तेरे जैसे मर्द को.. मेरे अंग अंग में दर्द होने लगा है बेटा.. अब सोने दे.. तुझे मेरी कसम..

गौतम - चाची आप तो कई बार झड़ गई मेरा तो अभी तक सिर्फ एक बार हुआ है.. अब मैं क्या करू? कम से कम एक बार और झड़ने दो..

मानसी - बेटा.. तू लेट जा मैं तेरे लंड को मुंह से शांत कर देती हूँ..

गौतम मानसी के ऊपर से हटकर लेटते हुए - ठीक है चाची..


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मानसी गौतम के लंड को चूसने लगती है और जोर जोर से लंड के साथ टट्टे भी चुस्ती हुई गौतम के लंड से माल निकालने की कोशिश करती है..

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काफी मेहनत मसक्कत के बाद गौतम झड़ने वाला होता है तो वो मानसी को लेटा कर उसकी चुत में लंड ड़ालकर चोदते हुए झड़ जाता है और पहले की तरफ इस बार भी मानसी की गहराईयो में काम के अमृत की वर्षा कर देता है और फ़ोन का टोर्च जला कर एक तरफ रख देता है ..
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गौतम - शुक्रिया चाची.. अपने जमाई राजा को इतना सुख देने के लिए..

मानसी गौतम का लंड साफ करते हुए - शकल से तो इतना मासूम और प्यारा दीखता है मगर बिस्तर इतना जालिम है की क्या कहु.. देख मेरी चुत को एक रात में कितनी सुज्जा दी..

गौतम - मानसून सीजन है चाची.. बेटी के साथ माँ तो चाहिए ही मुझे.. अच्छा मैं बाथरूम होके आता हूँ आप सो जाओ कपड़े पहनकर..

मानसी गौतम का मुंह वापस मुंह में लेकर - बाहर बरसात से खीचड़ बन गया है ग़ुगु.. कहा जाएगा.. ला मूत दे मेरे मुंह में..

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गौतम मानसी के मुंह में मूतते हुए - अह्ह्ह चाची.. आप तो दीवाना बना दोगी आज मुझे अपना.. मेरा मूत पानी जैसे पी रही हो..

मानसी मूत पीकर मुंह साफ करते हुए - चल बेटा अब अपनी जीन्स शर्ट पहन और सोजा मैं साडी बाँध लेती हूँ..

जैसा आप कहो चाची.. अब तो मुझे भी नींद आने लगी है... ये कहते हुए गौतम कपड़े पहनकर लेट गया..


मानसी भी पूरी संतुष्ट होकर मुस्कुराते हुए गौतम का सर अपनी छाती से लगाती हुई लेट गई.. और गौतम मानसी के चुचे चूसते हुए सो गया.. और मानसी भी मुस्कुराते हुए गौतम के बाल सहलाती हुई उसका सर चूमकर सो गई...
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सुबह 6 बजे का समय हो चूका था और जैसा कि गांव में अक्सर होता है लोग सुबह सवेरे ही उठकर अपने-अपने काम पर लगा चुके थे आसपास का वातावरण ऐसा था कि मनोरन् दृश्य देखने से ही बनता था गांव की ताजी हवा और रात को हुई बारिश से उठती हुई ठंडी महक सुबह के मौसम को और सुहाना बना रही थी.. गौतम उठ चुका था और उसने देखा कि उसके पास सब उसकी चाची नहीं सो रही.. गौतम उठकर अपना मुंह धोकर छत पर आ गया और काफी देर तक वहीं बैठ रहा.. सुबह के 7:00 बजे उसने देखा कोई ऊपर आ रहा है और जब उसने पीछे मुड़कर देखा तो पाया कि कुसुम हाथों में चाय का प्याला लिए उसी की तरफ बढ़ती हुई चली आ रही है..

कुसुम शरमाते हुए - चाय..

गौतम चाय लेकर साइड में रख देता है और कुसुम का हाथ पकड़ के अपनी बाहों में भरता हुआ कहता है - तूने बताया नहीं कल.. कोनसे होंठो कि बात कर रही थी..

कुसुम अपने लबों पर ऊँगली रखते हुए - इनकी..

गौतम कुसुम के होंठों के करीब अपने होंठो लाते हुए - चुम लु?

कुसुम शरामते हुए - हम्म..

गौतम - देखोगी नहीं मुझे?

कुसुम शर्म से - नहीं...

गौतम - जब तक नहीं देखोगी मैं नहीं चूमने वाला.

कुसुम - मत चूमो.. मुझे लाज आती है..

गौतम गाल पर चूमते हुए - सुहागरात को भी लाज आयेगी तो कैसे काम चलेगा?

कुसुम आँखे उठाते हुए - मेरा पहला चुम्बन है..

गौतम हल्का सा चूमकर - कितने नाजुक लब है तुम्हारे..

कुसुम मुस्कुराते हुए - बिलकुल तुम्हारे जैसे..

गौतम कुसुम कि कमर में हाथ डालकर उसके सीने से लगाता हुआ छत पर बने छज्जर के अंदर लेजाकर उसके होंठों पर अपने होंठो रखकर चूमता हुआ - कुसुम बहुत नाजुक हो तुम.. बिलकुल फूल सी..

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कुसुम अपने लब को गौतम कि गिरफ्त से आजाद करवाते हुए - चाय ठंडी हो जायेगी..

गौतम कुसुम कि जुल्फ पीछे करके गर्दन चूमते हुए - होने दे...

कुसुम गौतम के पेंट में बनते तम्बू को महसूस करने लगती है और समझा जाती है कि गौतम मूंड में आ रहा है..

गौतम गर्दन चूमता हुआ कंधे पर एक निशान देखकर - ये निशान..

कुसुम - बचपन से है.. इतने हैरान क्यों हो.. किसी और के भी कंधे ओर ये निशान है..

गौतम - नहीं.. कुछ नहीं..

कुसुम गौतम को धकेलते हुए - और नहीं.. मैं और कुछ देर रुकी तो तुम आज ही सब कुछ कर डालोगे मेरे साथ..

गौतम मज़ाक़ में - पति को नाराज़ कर रही हो तुम... चला जाऊँगा कहीं दूर छोड़कर..

कुसुम गौतम का गिरेबान पकड़ते हुए - चुपचाप चाय पी लो.. और मुझे ऐसा मज़ाक़ बिलकुल पसंद नहीं है.. इतनी प्यारी सूरत है कहीं मैं इसे बिगाड़ ना दूँ..

गौतम वापस कुसुम के लबों को चूमते हुए - उफ्फ्फ तेरा ये गुस्सा मेरी जान... तब भी वैसा था अब भी वैसा ही है..

कुसुम - तब कब?

गौतम - छोड़.. कुछ नहीं..

कुसुम प्यार और उदासी दोनों के मिले हुए भाव से -कल आये और आज चले भी जाओगे..

गौतम - जाना तो पड़ेगा फिर वापस कैसे आऊंगा..

कुसुम - 3 महीने कैसे रहूंगी मैं..

गौतम - हाय इतना प्यार.. ऐसे प्यार से मत बोल वरना मैं कहीं सारी हद ना पार कर दूँ...

कुसुम मुस्कुराते हुए गौतम को धक्का देकर जाती हुई - पहले अपने साथ ले जाओ मुझे.. फिर जो चाहो कर लेना मेरे पतिदेव...

गौतम छज्जर से बाहर आकर चाय उठता है तो एक आवाज आती है - इसे मत पीना मैं गर्म चाय लाती हूँ..

और कुछ पल बाद कुसुम एक गर्म चाय का कप दूर से छत पर रखकर गौतम को देखते हुए मुस्कुराकर वापस चली गई और गौतम चाय का कप लेकर चाय पीते हुए कुसुम कि मासूमियत भोलेपन और सादगी के बारे में सोचने लगा..

सुबह के 11 बजे गौतम सुमन और जगमोहन के साथ गाँव से वापस घर आने के लिए निकल गया जहा अजमेर रेलवे स्टेशन पर जगमोहन उतर गया और जयपुर जाने के लिए निकल गया.. गौतम जगमोहन को स्टेशन पर छोड़कर सुमन के साथ घर के लिए निकल पड़ा..
 
अपडेट 51



सुमन घर दरवाजा खोलकर - जी?

डिलीवेरी एजेंट - मैडम आपका प्रोडक्ट रिसीव कर लीजिये..

सुमन - मैंने कुछ नहीं मंगवाया.. ग़ुगु.. ग़ुगु.. कुछ मंगवाया था क्या तूने?

गौतम आते हुए - हाँ टीवी आया होगा माँ.. भईया इसे इनस्टॉल भी करना था ना..

डिलीवेरी एजेंट - जी ये लड़का आया है कहा इनस्टॉल करवाना है बता दो..

गौतम - अंदर ले आओ भईया.. इस तरफ..

गौतम लड़के को घर के मुख्य रूम जो सुमन और गौतम का बैडरूम था वहा ले आता है और बेड के ठीक सामने वाली दिवार पर टीवी इनस्टॉल करने को कहता है..

सुमन - इतना बड़ा टीवी क्यों मंगवाया है ग़ुगु?

गौतम - मूवी देखने के लिए..

लड़का - भईया थोड़ा मदद करना..

गौतम - हां..

गौतम - टीवी को बेड के ठीक सामने दिवार ओर लगवा लेता है और लड़का टीवी on करके चला जाता है..

सुमन बाहर दरवाजा बंद करके आती है और कहती है - कितना बड़ा है...

गौतम - 65 इंच का है 4के क्लियर..

सुमन - कितने का है?

गौतम - 80 हज़ार...

सुमन - क्या.. इतना महंगा? तूने बुआ का एटीएम इस्तेमाल किया ना?

गौतम - क्या फर्क पड़ता है माँ.. एटीएम में इतने पैसे पड़े है.. बुआ फिर कहती और चाहिए तो बताना.. और शिकायत करती है तू कुछ खर्च ही नहीं करता..

सुमन - पर ग़ुगु इतने बड़े टीवी का क्या करेंगे?

गौतम टीवी से फ़ोन और 2 इयरबड्स कनेक्ट करके एक सुमन के कानो में लगाता है और दूसरे इयरबड्स को अपने दोनों कानो में लगा लेता है और कहता है - मूवी देखेंगे सुमन.. लाइट ऑफ कर दे..

सुमन कमरे की लाइट्स ऑफ करके बेड पर आ जाती है जहा से टीवी अँधेरे में किसी सिनेमा हॉल के बड़े परदे की तरह दीखता है..

सुमन - ये किसी सिनेमा हॉल जैसा लगता है गौतम..

गौतम सुमन की साड़ी का पल्लू पकड़कर खींचते हुए सुमन की साडी उतारता हुआ - माँ यार घर में साड़ी मत पहना करो..

सुमन - साड़ी क्यों उतार रहा है तू.. मैं अभी नहीं देने वाली समझा.. अभी भी दर्द है मेरी चुत में.. परसो इतना कस कस के किया था तूने अब जब तक वापस पहले जैसी नहीं होती मैं नहीं देने वाली..

गौतम साड़ी उतार कर कमरे में रखे सोफे ओर फेंकते हुए - यार सुमन तू भी नखरे करने लगी..

सुमन - अब नखरे समझ या कुछ और.. मेरे दर्द होता है.. 1-2 दिन और सब्र कर...

गौतम टीवी पर mom son पोर्न मूवी प्ले कर देता है...

सुमन - ये क्या है?

गौतम - मूवी है..

सुमन - इंग्लिश मूवी है?

गौतम सुमन को बाहों में लेकर - हाँ..

सुमन गौतम के साथ मूवी देखने लगती है...

गौतम - आगे देखना बहुत कुछ होगा..

सुमन - ये कौन है?

गौतम - वो माँ है ये बेटा.. बेटा माँ के birthday पर घर आया है और पापा बाहर है..

सुमन - छी... ये तो वो वाली मूवी है...

गौतम - छी तो ऐसे कर रही हो जैसे बड़ी सती सावित्री हो..

सुमन - ये सब देखने के लिए टीवी लिया ना तूने.. बेशर्म..

गौतम लंड निकाल कर - अच्छा... संस्कारी दुनिया के सामने बनना माँ.. मेरे सामने नाटक मत करो.. चलो चुत में नहीं लेना तो मुंह में लेकर खुश करो अपने पतिदेव को..

सुमन गुस्से से लंड पर मुंह लगाती हुई - कमीने तुझे हाँ करनी ही नहीं चाहिए थी मुझे..

गौतम सुमन के बाल पकड़ कर मुंह में लंड घुसते हुए - उसको देखो कैसे चूस रही है तू भी चूस अच्छे से.. Blowjob में मज़ा आना चाहिए..

सुमन लंड चुस्ती हुई - कुसुम पसंद आई तुझे?

गौतम - हाँ.. शादी के लिए परफेक्ट है.. अच्छा है अपनी बहन मिल गई.. वरना कब से दुसरो की माँ बहन चोद रहा था..

सुमन - कमीने होने वाली बीवी है तेरी.. और चचेरी बहन..

गौतम - माँ अलग है तो क्या हुआ.. बाप तो एक ही है... और सास तो गज़ब ही है.. मानसी चाची भी मस्त माल है..

सुमन - दूर रहना.. समझा.. मेरे साथ रहना तो सबसे दूर रहना पड़ेगा.. बोला था याद है ना..

गौतम कल रात का सोचकर हसते हुए - हाँ याद है मेरी माँ.. चूस अब अच्छे से...

सुमन - गले तक तो ले रही हूँ और क्या करू.. तू भी ना..

गौतम पोर्न देखते हुए सुमन से blowjob ले रहा था की उसे बाबाजी की बात याद आ गई..

गौतम - माँ..

सुमन लंड चुस्ती हुई - हम्म...

गौतम - कल मेरे दोस्त टूर पर जा रहे है.. मैं भी चला जाऊ अगर बोलो तो?

सुमन - मुझे अकेला छोड़कर जाएगा ग़ुगु?

गौतम - अरे आप कुछ दिन मामा के यहां चले जाओ ना.. तीन महीने बाद कुसुम आ जायेगी और वो तो ऐसी है की गले में पट्टा डालके रखेगी मेरे.. ना कहीं जाने देगी ना किसी से मिलने बस गले लगा के रखेगी.. आप समझो ना.. मैं कभी गया भी कहीं.. कुछ दिनों की बात है.. इंडिया के कुछ शहर ही है.. 20-25 दिन में आ जाएंगे..

सुमन - और मेरा क्या होगा? मैं कैसे इतने दिन रह पाउंगी तेरे बिना?

गौतम - देखो पति भी हूँ तुम्हारा.. मान जाओ वरना आज चुत से जाओगी..

सुमन जुल्फे कान के पीछे करके मुंह में लंड लेती हुई - ठीक है शहजादे.. चले जाना कल...

गौतम सुमन के मुंह में झड़ते हुए - thanks माँ...

****†***†******

गौतम बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह कहे मुताबिक पहाड़ी के पीछे उसकी कुटीया के करीब आ गया..

बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह - आ गए बेटा..

गौतम - जी बाबाजी.. आपका जैसे ही फ़ोन आया मैं तुरंत दौड़ा चला आया..

बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह - इतना बड़ा बेग?

गौतम - हाँ आपने कहा था ना कुछ दिनों के लिए कही जाना है जरुरी सामान लेकर आउ.. तो इसमें सब है.. मेरे कपडे जूते टूथपेस्ट ब्रश शैम्पू इत्र कुछ दवाइया लाइटर सिगरेट दो शराब की बोतल भी है..

बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह एक पिस्तौल देते हुए - उस सबसे ज्यादा तुझे इसकी जरुरत पड़ेगी.. 18 राउंड फायर करती है इसके दो और मैगज़ीन है.. लो..

गौतम - इसकी क्या जरुरत? जंग पर थोड़ी भेज रहे हो आप मुझे..

बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह - नहीं.. जंग पर नहीं.. तुम्हारे पिछले जन्म में...

गौतम चौंकते हुए फिर हंसकर - क्या? पिछला जन्म? बाबाजी आपने बहुत मदद की है पर ऐसा मज़ाक़ तो ना करो..

बैरागी जो वीरेंद्र सिंह के पास खड़ा था मगर गौतम को नहीं दिख रहा था वो अपना रूप और अस्तित्व गौतम को दिखाते हुए गौतम के सामने प्रकट होकर कहता है - ये मज़ाक़ लग रहा है तुम्हे?

गौतम इस बार हैरानी अचरज से - बैरागी...

बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह - हाँ गौतम.. ये वही बैरागी है जिसे तूने सपने में देखा था..

गौतम गौर से बड़े बाबाजी को देखकर - वीरेंद्र सिंह?

बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह - हाँ सही पहचाना..

गौतम - मतलब जो भी मैंने देखा वो सही और सत्य था.. ऐसा असल में हो चूका है...

बैरागी - सही कहा हाक़िम..

गौतम - हाक़िम?

बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह - पिछले जन्म में यही नाम था तुम्हारा बेटा.. तुम एक बंजारा काबिले के सरदार लाखा की बेटी मुन्नी के बेटे थे.. डाकी ने तुम्हारे नाना लाखा की जान लेकर तुम्हारी माँ मुन्नी और मौसी शीला को अपनी रखैल बना लिया था.. और तुम्हे काबिले से बाहर निकाल फेंका था..

गौतम जिज्ञासा से - और मैंने कुछ नहीं किया?

बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह - नहीं..

गौतम गुस्से से - इतना चुतिया था मैं पिछले जन्म में?

बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह - तुम डरपोक और कमजोर थे गौतम..

बैरागी - हाक़िम..जब तुम पिछले जन्म में जाओगे तो मुझसे मिलने महल आ जाना.. और मुझे ये ताबीज़ दिखाकर मुझसे वो जदिबूटी लेकर वापस इस जन्म में आ जाना.. इसके अतिरिक्त और कुछ करोगे तो मुसीबत में पड़ जाओगे..

गौतम - ये क्या ताबीज़ है?

बैरागी - ये वही ताबिज़ है जो मृदुला ने मेरे गले में बाँधा था.. ये तुम्हारे गले में होगा तो तुम्हे चोट पहुंचाने वाला सुरक्षित नहीं रह पायेगा..

गौतम - अच्छा बाबाजी.. एक सवाल है.. पिछले जन्म में जाने के बाद मेरा वापस छोटा तो नहीं होगा ना..

बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह हसते हुए - पिछले जन्म में तेरा शरीर जैसा था जैसा ही रहेगा.. मगर तू फ़िक्र मत कर.. उसी पेड़ से कुछ जामुन तोड़ कर इस बैग में रखकर साथ लेजा..

गौतम जामुन तोड़कर ले आता है और बेग में रख लेता है..

बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह - अब चल..

गौतम चलता हुआ - कहा.. पैदल चलाकर जाना है पिछले जन्म में?

बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह हसते हुए - नहीं

गौतम - तो कैसे जाऊंगा?

बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह - आगे उस झील को देख रहा है..

गौतम - बहुत बार देख चूका हूँ.. ऊपर बैठकर यही तो देखता था..

बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह - एक ऐसी झील वहा भी होगी.. और एक ऐसा बड़ का पेड़ भी.. तू इस बेग को इस पेड़ के नीचे गाड दे.. ये सामान अपने आप वहा पहुंच जाएगा...

गौतम - और मैं कैसे पहुँचूँगा? मुझे मत गाड देना बाबाजी..

बैरागी - तुमको गड़ना नहीं पड़ेगा हाक़िम.. डूबना पड़ेगा..

गौतम - कहा?

बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह - उस झील में.. जैसे तुम वहा जा रहे हो वैसे ही तुम वापस भी आओगे..

गौतम - झील में डुबकी लगाने से पिछले जन्म में पहुंच जाएगा मेरा शरीर?

बैरागी - शरीर नहीं केवल आत्मा.. इस जन्म की आत्मा पिछले जन्म के शरीर में पहुंच जायेगी और पिछले जन्म के शरीर की आत्मा तुम्हारे इस शरीर में..

बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह - हाँ गौतम..

गौतम - तो मेरे इस शरीर में पुराने जन्म की आत्मा आ जायेगी और पुराने जन्म के शरीर में इस जन्म की आत्मा चली जायेगी... अच्छा है.. अगर ऐसा हो तो आप पिछले जन्म की आत्मा आने पर मेरे गाल पर दो थप्पड़ मार दीजियेगा.. बोलना मैंने ही कहा था मारने को..

बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह - तू चिंता मत मैं उसे कमजोर से ताकतवर और डरपोक से निडर बना दूंगा..

गौतम - थप्पड़ जरुरत मारना.. साला इसी लायक है..

बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह - ठीक है अब तुम इस पेड़ के नीचे खड्डा खोद दो और ये सारा सामान उसमे रखकर दफ़न कर दो..

गौतम - ठीक है अभी रख देता हूँ.. पर मैं सबको पहचानुगा कैसे?

बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह - तुमने सबको देखा है सिवाये अपने कबीले के.. वो लोग तुझे अपने आप पहचान लेंगे..

गौतम - और वो जदिबूटी कैसे लानी है?

बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह - जिस तरह ये सामान जारहा है वैसे ही जड़ी बूटी भी यहां आ जायेगी.

गौतम - मतलब पेड़ के नीचे खड्डा खोद कर.

बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह - हाँ बेटा... तुम जो भी पेड़ के नीचे गाड दोगे वो यहां आ जाएगा.. मगर एक से ज्यादा कुछ नहीं गाड़ना वरना सब बर्बाद हो जाएगा.. और सिर्फ जाडीबूती आना कुछ और मत ले आना..

गौतम - एक आखिरी बात..

बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह - जो कुछ है पूछ..

गौतम - क्या मैं समर और लीलावती को बचा सकता हूँ आपसे?

बैरागी - मैंने कहा ना हाक़िम.. तुम सिर्फ मुझसे वो जड़ी बूटी लेकर वापस आओगे और कुछ करने की आवश्यकता नहीं है.. वरना सब ख़त्म हो जाएगा.. जल्दी ही मेरे पास आना वरना सब ख़त्म हो जाएगा..

गौतम - ठीक है.. बेचारे के लिए बुरा लगा.. इसलिए पूछ लिया..

बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह - याद रखना गौतम.. यहां तुम्हारा वापस आना कितना जरुरी है और तुम्हारा इंतजार कौन कर रहा है..

गौतम - मैं भी जल्दी से वापस आ जाऊंगा जदिबूटी लेकर.. वहा मुझे मिलेगा ही क्या?

बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह - बेटा.. हर कदम सोचकर उठाना..

गौतम - मतलब?

बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह - मतलब.. मोह बंधन है..

गौतम - तो? मुझे क्यों बता रहे हो बाबाजी.. मैं जानता हूँ ये बात..

बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह - कहीं भूल मत जाना गौतम..

गौतम - मैं नहीं भूलूंगा बाबाजी..

बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह - प्रेम और मोह से दूर रहना..

गौतम - मैं जिनसे प्रेम करता हूँ वो इस जन्म है.. वहा मैं किससे प्रेम करूँगा?

बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह - मन चंचल होता है.. प्रेम अविरल..

गौतम - हिंदी में बताओगे? आप क्या बोल रहे हो?

बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह - मैं ये कहना चाहता हूँ गौतम कि वहा तुम्हे किसी से प्रेम या मोह हो सकता है.. इसलिए तुम्हे अपने मन पर काबू रखना जरुरी है...

गौतम - जैसा आप कहो.. अगर मिलेगी तो घोड़ी बनाऊंगा.. दिल नहीं लगाउँगा..

बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह - यही तुम्हारे और तुम से सम्बंधित लोगों के लिए सही होगा..

गौतम - वैसे तो मैंने खासी, जुखाम, बुखार, सरदर्द, बदन दर्द, और नींद की गोली रख ली है फर्स्ट ऐड किट भी है और तो कोई और दवा रखने की जरुरत तो नहीं है ना

बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह - अचेत करने की दवा भी रख लेते..

गौतम - अचेत मतलब बेहोश ना? अरे वो भी है.. मेडिकल से सारी दवा लेके आया था.. साला दे नहीं रहा था.. एक्स्ट्रा पैसे देने पड़े..

बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह हड़ते हुए - मेरी कही एक एक बात याद रखना गौतम.. तुम्हे जदिबूती लेकर शीघ्र से शीघ्र वापस आना होगा..

गौतम - शाम तक आ जाऊंगा बाबाजी.. आप टेंशन मत लो..

बैरागी - कौन से दिन की शाम हाक़िम?

बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह - गौतम ये एक दिन में होने वाला कार्य नहीं है.. तुम्हे महल में घुसना पड़ेगा.. और आसानी से तुम महल में नहीं घुस सकते ना ही बैरागी से मिल सकते हो..

गौतम - अरे मैं कोई ना कोई उपाए ढूंढ़ लूंगा बाबाजी.. बेफिक्र रहो.

बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह - आज अमावस है और तुम अगली अमावस को ही लौट पाओगे.. सिर्फ उस दिन ही आया जा सकता है जब आसमान पर चाँद नहीं हो.. अब तुम झील में उतर जाओ गौतम..

गौतम - बहुत बार ऊपर से देखा है मैंने इस झील को.. और सोचा था की कभी इसे नजदीक से देखूंगा.

बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह - आज देख लो..

गौतम - हां बाबाजी.. देखने के बाद उतरना भी है..

बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह - बिना कपड़े पहनें उतरना होगा गौतम..

गौतम हैरानी से - नंगा जाऊंगा? कोई देख लिया तो..

बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह - यही नियम है गौतम.. ये झील आम नहीं है.. उल्काओ के विस्फोट से उसका निर्माण हुआ है और आयामों के बीच का मार्ग बनाती है.. वस्त्र पुरे शरीर को बांधता है..

गौतम - ठीक है.. नंगा जाता हूँ..

बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह - अब जाओ..

गौतम - एक मिनट.. मेरा फ़ोन...

बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह - वहा तुम्हारे इस फ़ोन का क्या काम बेटा?

गौतम - समझा करो बाबाजी.. बहुत काम है... मैं इसे उस खड्डे में गाड के आता हूँ..

बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह - जैसा तुम चाहो..

गौतम फ़ोन गाड़ के आ जाता है..

बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह - अब जाओ..

गौतम - जा रहा हूँ..

बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह - क्या सोच रहे हो..

गौतम - कुछ नहीं बाबाजी.. बस भूक लग रही है.. वहा खाने को क्या क्या मिलेगा?

बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह - कुछ नहीं.. जो तुम यहां खाते हुए वो सब वहा नहीं मिलेगा..

गौतम - फिर?

बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह - जो पहले खाया जाता था वही मिलेगा.. उसके अतिरिक्त फल खाने को मिलेंगे..

गौतम - फिर तो वापस जाना पड़ेगा बाबाजी.. बेग में खाने का सामान भी लाना पड़ेगा..

बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह - सूर्यास्त होने से पहले तुमको पिछले जन्म में जाना पड़ेगा गौतम.. आज अमावस है इसके बाद एक माह तक और प्रतीक्षा करनी होगी..

गौतम - अभी सूर्यास्त होने में बहुत टाइम है बाबाजी.. मैं यूँ जाके यूँ आ जाऊंगा.. पेट का सवाल है समझा करो..

बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह - ठीक है शीघ्र करो...

गौतम वापस चला जाता है और 2 घंटे बाद वापस आता है तो एक बड़ी बोरी में सामान भरके लाता है और कहता है - बाबाजी रेडी..

बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह - इसे ले जाना है तो खड्डा खोदकर गाड़ना पड़ेगा..

गौतम - इतना बड़ा खड्डा खोदना पड़ेगा?

बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह - हाँ..

गौतम खड्डा खोदने लगता है - बाबाजी थोड़ी हेलप करदो..

बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह - तुम्हे जाना है तुमको खोदना पड़ेगा..

गौतम खड्डा खोदते हुए - ठीक है..

बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह - जल्दी... सूर्यास्त होने वाला है..

गौतम - हो गया बस.. लो गाड दिया.

बड़े बाबाजी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह - अब जाओ.. और जदिबूती लेकर ही आना.. यदि तुम विफल हुए तो तुम जानते हो क्या होगा...

गौतम झील में जाते हुए - हाँ.. आप और बैरागी की मुक्ति नहीं हो पाएगी और आप बाकी बचे 500 सालों तक यूँ ही रहोगे..

ये कहकर गौतम झील में उतर जाता है...

 
अपडेट 52



गौतम जब झील में उतरा तो पलक झपकते ही उसकी आत्मा उसके पुराने जन्म के शरीर में पहुंच गई और वह आंख खोल कर अपने आप को देखने लगा..

गौतम ने देखा कि वह एक झील से बाहर पड़ा हुआ है उसके आसपास में बड़े-बड़े पेड़ पौधे थे और छोटे मोटे जानवर इधर-उधर घूम रहे थे..

झील के पानी के अक्स में उसने अपना चेहरा देखा तो मन में सोचते हुए बोला..

गौतम मन में - शकल सूरत कदकाठी तो उस शरीर की तरह इस शरीर की भी बहुत अच्छी है.. मतलब पिछले जन्म में मेरा दिमाग ही चुतिया था..

गौतम ने अपने शरीर पर कपड़े देखे तो वह चौंक गया कि उसकी शरीर पर केवल एक धोती लिपटी हुई थी और ऊपर बनियान जैसी एक चीज.. गौतम ने झील के आसपास देखने शुरू किया और उस पेड़ के पास आ गया जिसके नीचे उसने सारा सामान गाडा था..

झील के आसपास देखने पर उसे थोड़ी देर बाद एक पेड़ दिखाई दिया जो बिल्कुल उसी तरह का था जिस तरह का बड़े बाबा जी उर्फ़ वीरेंद्र सिंह ने उसे बताया था..

गौतम ने उसी पेड़ के नीचे वहीं पर खोदना शुरू किया जहां पर उसने अपना सामान गाड़ा था.. थोड़ी देर खोदने के बाद उसे अपना वह बैग मिल गया जो वह गाड कर इस जन्म में आया था.. गौतम में सबसे पहले झील में कमर तक उतरकर नहाना शुरू किया और फिर बाहर आकर बेग से तोलिया निकाल कर अपना बदन पोंछा फिर कपड़े पहन कर बैक से कुछ चीज अपने पास रख ली और वहां से चला गया..

गौतम जब वहां से चला तो उस जंगल के रास्ते सपने में देखे हुए लग रहे थे और वह उसी रास्ते के आधार पर चला जा रहा था गौतम को अब काबिले का रास्ता भी पता था और वीरेंद्र सिंह की जागीर कुशलगढ़ में जाने का रास्ता भी पता था.. वह समझ नहीं पा रहा था कि वह कहां पहले जाकर अपना काम करें..

गौतम ने सबसे पहले बंजारा काबिले में जाकर अपनी मां मुन्नी और मौसी शीला को छुड़ाने का निश्चय किया और कबीले की तरफ कदम बढ़ाते हुए चला गया..

कबीले से थोड़ा दूर एक पनघट पर जब उसे प्यास लगी तो वह पानी पीने के लिए रुक गया जहां पर कुछ महिला है और कुछ लड़कियां पानी भर रही थी..

गौतम उनसे - थोड़ा पानी मिलेगा?

पनघट पर पानी भर रही औरतें और लड़कियां गौतम और उसके पहनावे को देखकर हैरान थी और वह गौतम को ऐसे देख रही थी जैसे गौतम इस दुनिया का नहीं कहीं और का हो.. मगर उनमें से एक लड़की पानी का बर्तन हाथ में लिए पनघट से आगे बढ़ गई और गौतम को दे देते हुए बोली.

लड़की - ले पिले.. और तू कहा चला गया था? कब से तुझे ढूंढ रही हूँ.. मगर तू है कि मिलने का नाम ही नहीं लेता.. और ये क्या पहना है.. और ये सुगंध कैसी है तेरे बदन से? अब चुप क्यों खड़ा है बोल ना..

पीछे से दूसरी लड़की - अरे उर्मि.. तू बोलने दे तो कुछ बोले ना हाक़िम.. बेचारे को कब से सुना रही है.. फिर से पहले की तरफ रोकर चला ना जाए.. बहुत नाजुक और भोला है तेरा हाक़िम..

(उर्मि हाक़िम की मौसी शीला की बेटी थी जो 20 साल की थी और हाक़िम इस वक़्त 21 साल का था)

(अब से गौतम को हाक़िम कहा जाएगा)

हाक़िम पानी पी लेता है और बर्तन वापस देकर आगे जाने लगता है कि उर्मि उसका हाथ पकड़ लेती है उससे कहती है..

उर्मि - अरे अब कहा चले.. चुपचाप मेरे साथ चलो.. मौसी से मिलो चुपचाप.. बस्ती में तुम्हारे आने पर मनाही है.. मगर बस्ती के पीछे घाटी के छज्जर में तुम्हारी माँ रोज़ सांझ तक तुम्हारा रास्ता देखती है..

पीछे से लड़की - हाँ लेजा लेजा.. रास्ते में अपने हाक़िम से पिछली गलती की माफ़ी भी मांग लेना..

उर्मि शर्माती हुए - गलती कैसी? अपने हाक़िम को छुआ था मैंने किसी पराये को तो नहीं.. मगर ये लड़कियों जैसे रूठ के चला गया तो इसमें मेरा क्या दोष? कभी ना कभी तो मेरे साथ इसे सबकुछ करना ही पड़ेगा.. विवाह भी..

पीछे की लड़कि - हां हां.. पर हाक़िम माने तब ना.. कब से तुझसे पीछा छुड़वा रहा है.. पर तू है की इसके पीछे ही लगी हुई है..

हकीम सारी बातें सुन रहा था और उसे यह पता चल रहा था कि उसकी मौसी शीला की बेटी उर्मी उसके पीछे पड़ी हुई है और उससे शादी करना चाहती है और हाक़िम उससे दूर भाग रहा है..

उर्मि हाकिम का हाथ पकड़कर ले जाते हुए - मैं इसका पीछा छोडूंगी तब ना..

उर्मि हकीम का हाथ पकड़ कर पनघट से पगडंडी वाला रास्ता ले लेती है और हकीम के साथ चलती हुई उससे इधर-उधर की और जो मन में आता है वही बात करती हुई चलती रहती है हकीम सब सुनता है और उर्मि को देखता रहता है..

हकीम ने अब तक उर्मि को ठीक से नहीं देखा था मगर अब रास्ते पर चलते हुए वो उर्मि के नरमी और प्यार भरे लहज़े में की हुई बातें सुनते हुए उसका बदन की बनावट को आँखों में बसा रहा था..

उर्मि बेहद हसीन और जवा लड़की थी जिसके खूबसूरत चेहरे के नीचे सुराहीदार गर्दन और जवानी में भरे हुए छाती पर आम सामने देखते हुए छोटी सी चोली में क़ैद थे कमर ऐसी चिकनी की पनघट का पत्थर भी शर्मा जाए.. एक घुटने तक आता घाघरा जो उर्मि की कमर के नीचे एक डोरी की मदद से बंधा हुआ था.. हाक़िम ये सब देखकर कामुक हो रहा था और सोच रहा था की वो पिछले जन्म में कितना चुतिया था कि ऐसी दिलकश लड़की जो उसकी मौसी शीला की बेटी भी है उसके पीछे पड़ी हुई है और वो उससे दूर भाग रहा है..

उर्मि रास्ते में एक जगह ठहर कर - अरे.. तू कहा देख रहा है और क्या सोच रहा है? देख मेरा ध्यान भटका कर भाग मत जाना.. वरना अगली बार मिलेगा तो मैं बहुत सताऊंगी तुझे..

उर्मि ने इतनी बात अपने मुंह से कही थी कि हाक़िम ने आगे बढ़कर उसकी नंगी चिकनी कमर में हाथ डाल दिया और उर्मि को अपने सीने से चिपका कर उसके उर्मि के होंठों ओर अपने होंठ रख दिये..

उर्मि जैसे सन्न खड़ी रह गई.. उसे कोई उम्मीद नहीं थी कि हाक़िम ऐसा कर सकता है और हाक़िम मैं इतनी हिम्मत है कि वह आगे बढ़कर कोई पहल कर सकता है.. उर्मी के होठों पर हकीम के होंठ लगे हुए थे और हकीम धीरे-धीरे उर्मी के होठों से काम रस पी रहा था और उर्मि चुपचाप खड़ी हुई यह सब होता देख रही थी.. उसे ये विश्वास कर पाना मुश्किल था कि हकीम में अभी-अभी उसे अपनी बाहों में भर के उसके होठों पर अपने होंठ लगा दिए हैं और उसकी होंठों का रस पी रहा है..

हकीम एक चट्टान का सहारा लेकर उर्मि को उस पर सटा दिया और उसके होंठों को चूमते हुए अपना दूसरा हाथ उसकी छोटी सी चोली के ऊपर रखकर उसके उरोज को दबाने लगा..

उर्मि सोचने लगी थी कि आज तक हकीम शर्मा कर उसे दूर भागता था मगर अब उसे खुद शर्म आने लगी थी जिस तरह हाक़िम उसे चूम रहा था और उसके छाती पर हाथ फिराकर उसकी छतिया दबा रहा था इससे वह खुद शर्माने लगी थी..

हकीम समझ गया था कि उर्मि उसे पसंद करती है और उसे नहीं रोकने वाली.. उसने उर्मि के होंठों पर से अपने होंठ हटा लिए और उर्मि कि गर्दन और चेहरे पर चुम्बन करते हुए अपना सर उर्मि कि छाती पर लगा दिया और चोली के हुक खोलकर उर्मि के नये नये जवा होकर तने हुए चुचे को मुंह में भर लिया और उसके चुचक चूसने लगा...

उर्मि हाक़िम को ऐसा करते देखकर पागल सी हो गई और हाक़िम के बालों को पकड़ कर जोर से अपनी छाती में दबाने लगी और मादक सिस्कारी लेने लगी..

हाक़िम एक पत्थर बैठ गया और उर्मि को अपनी गोद में बैठाकर उसका एक हाथ अपनी गर्दन के पीछे रखकर उर्मि कि चूची मुंह में भरकर चूसने और चाटने लगा.. उर्मि प्यार और काम वासना के हाक़िम को देख रही थी और उसपर अपना प्यार लुटाने को तैयार हो रही थी..

उर्मि अपनी चूची चुसवाते हुए - आह्ह.. हाक़िम आज क्या हो गया है तुम्हे... आह्ह.. हाक़िम.. तुम कितने बदल गए हो.. पहले तो मुझसे कितना दूर भागते थे अब कितने पास आ गए हो.. तुम्हे क्या हो गया है हाक़िम.. अह्ह्ह...

हाक़िम ने अपना एक हाथ नीचे ले जाकर उर्मि के घाघरे में डाल दिया और उसकी चुत से छेड़खानी करने लगा.. उर्मि कामुकता के शिखर पर पहुंच गई थी और हाक़िम की छेड़खानी से उसकी चुत जो पहले से गीली होकर बह रही थी उसने पानी छोड़ दिया और झड़ गई..

हाक़िम ने उर्मि को अपनी गोद में उठा लिया और उसे चूमते हुए चट्टान के पीछे खाली जगह ले जाकर घास में लेटा दिया और उसकी घघरी उठा कर चुत को नंगी करते हुए सहलाकर बोला..

हाक़िम - बहुत चिकनी चुत है तेरी.. उर्मि..

उर्मि - चुत क्या?

हाक़िम - कुछ नहीं..

यह कहते हुए हाक़िम उर्मि की चुत पर आ जाता है और जीभ निकाल कर एक बार जबान से उर्मि की चुत चाट लेता है जिससे उर्मि सिसक कर आह भरती है और कहती है..

उर्मि - छी.. क्या कर रहे हो हाक़िम.. मुख क्यों लगाते हो.. ये कोई मुंह लगाने वाला स्थान है..

हाक़िम - चुप रहो.. देखो मैं क्या करता हूँ.. ये कहते हुए हाक़िम में फिर से उर्मि की चुत पर मुंह लगा दिया और इस बार पूरी कामुकता से उर्मि की चुत चाट कर चुत का दाना सहलाने लगा.. जिससे उर्मि अलग ही दुनिया में पहुंच गई और सिसकियाँ लेते हुए गौतम को देखकर मदहोश होने लगी.. उसे फिर से झड़ने में समय नहीं लगा.. वो हाक़िम के मुंह में ही झड़ गई और फिर कुछ देर यूँ ही रहकर हाक़िम को देखती हुई मुस्कुराने लगी.. उसे अब बहुत शर्म आ रही थी..

हाक़िम ने अब अपनी जीन्स उनहुक करके नीचे सरका दी.. और अपने लंड को देखने लगा जो बिना जामुन खाये ही काफी तगड़ा और मोटा था उसने एक दो बार लंड हिला कर उर्मि के मुंह के पास ले गया और उसे कहा..

हाक़िम - अब तेरी बारी...

उर्मि - नहीं.. मुख में थोड़ी लेते है इसे..

हाक़िम - नहीं लोगी तो मैं जाता हूँ..

उर्मि - रुको.. क्या बालक जैसे करते हो.. लेती हूँ..

हाक़िम ने उर्मि के मुंह में अपना लंड दे दिया और उसे बिना दाँत लगाए चूसने को कहा और उर्मि ने हाक़िम के प्यार में पागल होकर बिलकुल वैसा ही किया..

कुछ देर लंड चूसाने के बाद हाक़िम ने उर्मि के मुंह से लंड निकाला और उर्मि की टांग चौड़ी करते हुए उसकी चुत में लंड सटा के एक झटके में पेल दिया..

उर्मि की चुत से खून और मुंह से चिंख एक साथ निकल गई हाक़िम जानता था की ऐसा होगा इसलिए उसे उर्मि के मुंह पर हाथ रख दिया था.. जिससे वो ज्यादा तेज़ नहीं चिल्ला पाई..

हाक़िम ने दो मिनट लंड को उसी तरह रहने दिया और फिर धीरे धीरे उर्मि को चोदने लगा..

उर्मि - अह्ह्ह.. हाक़िम.. ये क्या किया तुमने?

हाक़िम - प्यार किया है जानेमन..

उर्मि - पीड़ा हो रही है..

हाक़िम - बस.. थोड़ी देर में मज़ा भी आएगा..

उर्मि - मज़ा? वो क्या होता है?

हाक़िम - आनंद.. मेरी जान..

उर्मि - आह्ह.. तुम बहुत पीड़ा देते हो..

हाक़िम - नहीं करना तो बता दे उर्मि.. मैं चला जाता हूँ..

उर्मि हाक़िम को चूमकर - ऐसी बात ना करो हाक़िम.. पहला मिलन है हमारा.. मैं तो बता रही थी.. अह्ह्ह.. बहुत पीड़ा हुई जब तुमने..

हाक़िम - अंदर डाला.. यही ना उर्मि..

उर्मि शर्मा जाती है और धीमी धीमी आहे भरने लगती है वही हाक़िम अब रफ़्तार बढ़ा कर उर्मि की चुत चोदने लगता है और उर्मि की सिस्कारिया भी तेज़ होने लगती है वो हाक़िम के गले में हाथ डालकर उसे अपने आप से चिपका लेती है और चुदवाते हुए हाक़िम को चूमकर आहे भरने लगती है...

हाक़िम उर्मि को पलट देता है और कमर पकड़ कर घोड़ी बनाते हुए उसकी चुत में लंड वापस पेल देता है और ताबड़तोड़ झटके मारता हुआ उसे चोदने लगता है..

हाक़िम को बहुत मज़ा आ रहा था और उर्मि वापस झड़ने लगी थी और साथ में उसका मूत भी निकल गया था मगर हाक़िम उर्मि की चुत में लंड के झटके पर झटके मारता हुआ उसे चोद रहा था..

हाक़िम ने अब उर्मि के बाल पकड़कर उसकी घुड़सवारी शुरु कर दी और उर्मि चुत में लंड लेती हुई अब वापस सिसकने लगी..

हाक़िम ने उर्मि को वापस पीठ के बल लेटा कर मिशनरी में चोदने लगा और और अब उर्मि के साथ साथ वो भी उर्मि की चुत में झड़ गया..

उर्मि हाक़िम को प्यार भरी निगाहो से देखती हुई - हाक़िम.. तुम तो बड़े ही बुरे हो.. ऐसा कोई करता है किसी के साथ.. अब विवाह भी कर लो मुझसे..

हाक़िम जीन्स से एक गर्भ निरोधक गोली निकालकर उर्मि को देता हुआ..

हाक़िम - इसे खा ले उर्मि..

उर्मि - ये क्या है?

हाक़िम - ये नहीं खाएगी तो तेरा पेट फूल जाएगा और नो महीने बाद तू मेरे बच्चे की माँ बन जायेगी....

उर्मि - तो क्यों खाऊ? मैं चाहती हूँ तेरे बच्चे की माँ बनना..

हाक़िम - बिना विवाह के?

उर्मि - विवाह नहीं करोगे?

हाकीम - नहीं.. पहले उस डाकी की माँ चोदनी है.. साला मेरी माँ को रखैल बनाके रखेगा..

उर्मि - तुम क्या क्या बोल रहे हो कुछ समझ नहीं आता.

हाकीम - 300 साल बाद इस्तेमाल होने वाले शब्द है.. तु नहीं समझेगी.. चल खा ले चुपचाप..

उर्मि मुस्कुराते हुए गोली खा लेती है और कहती है - अब ऐसे ही रहोगे मेरे अंदर?

हाक़िम का लंड अब भी उर्मि की चुत में घुसा हुआ था..

हाक़िम - थोड़ी देर रहने दे उर्मि.. आराम करने दे बेचारे को..

उर्मि - कोई देखा हाक़िम.. यहां आगे से काबिले की कई लड़किया पानी लेकर गुजरती है..

उर्मि इतना बोल ही पाई थी की किसी ने पीछे से कहा..

और तेरी माँ भी इसी रास्ते जाती है कलमुही..

हाक़िम और उर्मि ने एक साथ आवाज की दिशा में देखा तो पाया की एक 40 साल की औरत जो उर्मि की तरह ही छोटा ब्लाउज पहनकर कमर से नीचे घुटनो तक लम्बा घाघरा पहना था.. सर पर एक छोटी से ओढ़ानी लिये बगल में पानी का घड़ा लेकर खड़ी थी.. बहुत खूबसूरत लग रही थी..

उर्मि ने औरत को देखकर कहा - माँ...

हाक़िम समझ गया कि ये उर्मि की माँ और उसकी मौसी शीला ही है..

वो उर्मि के ऊपर से खड़ा हुआ और उर्मि भी लड़खड़ा कर खड़ी होती हुई शीला की तरफ देखती हुई वहा से लचके खाकर जाने लगी.. तभी शीला बोली..

शीला - विवाह तक तो रुक जाती कलमुही.. कब से हाक़िम के पीछे पड़ी थी आज कर लिया तूने मुंह काला हाक़िम के साथ.. ये बेचारा भोलाभाला आ गया तेरे चक्कर में..

उर्मि जाते हुए - अरे माँ.. आज मैंने कुछ नहीं किया आज तो यही मुझे सता रहा है.. अब भोला नहीं रहा हाक़िम.. बदल गया है..

शीला - हाँ हाँ जानती हूँ दोनों को.. जा अब..

हाक़िम तो उर्मि के बाद शीला को देखे जा रहा था शीला भी देखने में कम सुन्दर नहीं थी.. शीला को देखकर हाक़िम को वापस कामुकता ने घेरना शुरु कर दिया.. उसका लंड जो अभी अभी उर्मि की चुत से निकला था वीर्य से सना हुआ था..

शीला की नज़र गौतम के लंड पर गई तो उसने घड़ा एक जगह रख दिया और हाक़िम के लंड को बिना किसी शर्म लिहाज और झिझक के मुस्कुराते हुए पकड़ते हुए अपना घाघरा हाथ में लेकर साफ करने लगी..

शीला का हाथ लगते ही लंड में वापस तनाव आने लगा और हाक़िम का लंड वापस पूरी औकात में अकड़कर आसमान की तरफ देखता हुआ खड़ा हो गया.. शीला ने जब ऐसा होता देखा तो वो मुस्कुराते हुए हाक़िम के चेहरे की तरफ देखी और लंड का पूरा साफ कर दिया..

शीला और हकीम एक दूसरे को देख रहे थे और दोनों के होठों पर एक अजीब सी मुस्कान तैर रही थी दोनों की आंखों ही आंखों में बातें हो रही थी जिसका अर्थ वह दोनों जानते थे कि क्या हो सकता है दोनों की बातें बिना होठों से कह भी एक दूसरे को समझ में आ रही थी और दोनों एक दूसरे को देखकर मोहित होते जा रहे थे..

हाक़िम शीला को देखकर इतना कामुक हो गया था कि उसने अपना हाथ कब शीला के छाती पर रख कर उसके चुचे को पकड़ लिया था उसे खुद पता नहीं चला

शीला को भी इस बात की खबर तब तक नहीं लगी जब तक हकीम ने उसकी चूची को जोर से मसाला नहीं दिया..

शीला - अह्ह्ह.. हाक़िम..

हाक़िम शीला की कमर मे हाथ डालकर उसी जगह लेटा देता है जहा थोड़ी देर पहले उसकी बेटी उर्मि लेटी हुई थी..

शीला - हाक़िम छोड़.. क्या करता है... पहले तो बिन बताये कहीं भाग गया और आते ही पहले अपनी होने वाली घरवाली उर्मि के साथ और अब मेरे साथ ये सब करने लगा.. तेरी माँ सुनेगी तो गुस्सा करेंगी तेरे ऊपर..

हाक़िम अपना हाथ शीला की घाघरी में डालकर उसकी चुत मसलते हुए - छोडो ना मासी.. माँ से भी बात कर लूंगा..

शीला सिसकियाँ लेते हुए - अह्ह्ह..हाक़िम.. तू कितना बदल गया है रे.. अह्ह्ह्ह. छोडो.. मैं तेरी होने वाली घरवाली की माँ हूँ... तेरी माँ की बहन भी..

हाक़िम चुत में ऊँगली घुसा देता है और ऊँगली करते हुए कहता है..

हाक़िम - इसलिए कह रहा हूँ मासी.. चुप रहो.. थोड़ी देर की बात है सिर्फ.. क्यों इतने संकोच करती हूँ..

शीला अह्ह्ह करती हुई - तू तो बिलकुल ही बदल गया है हाक़िम.. पहले कितना शांत और भोला था.. छोटी बातों पर नाराज़ होता था हमसे रूठकर चला जाता था.. अब तो बिलकुल बदल गया है तू..

हाक़िम अपना लंड चुत पर रगढ़ते हुए - मासी भूल जाओ उस हाक़िम को.. अब नया हाक़िम आया है..

शीला - हाक़िम.. छोड़ जाने दे.. वरना कोई आ जाएगा.. वो डाकी बहुत बुरा है..

हाक़िम - डाकी की माँ तो मैं चोदुँगा मासी..

शीला - क्या..

हाक़िम चुत पर लंड सेट करते हुए - कुछ नहीं.. बड़ी मस्त है तुम्हारी मौसी..

ये कहते हुए बिना किसी संकोच के हाक़िम शीला की चुत में लंड पेल देता है और चुदाई का कार्यकर्म शुरु कर देता है..

शिला चुदवाते हुए - अह्ह्ह.. हाक़िम.. तेरी माँ लड़ेगी मुझसे..

हाकिम चोदता हुआ - पता चलेगा तब लड़ेगी ना मौसी.. वैसे भी डाकी की रखैल हो तुम दोनों बहने... रात को वो साला चोदता होगा तुम दोनों को..

शीला - क्या? चोदता..?

हाक़िम - अरे जो मैं अब कर रहा हूँ वो रात में करता होगा ना डाकी तेरे और माँ के साथ में..

शीला - अब क्या करें हाक़िम.. जो सरदर बनता है उसे हक़ होता है रखैल रखने का.. और नए सरदार को पुराने सरदार की रखैल मिल जाती है...

हाक़िम शीला का बोबा निकाल कर चूसते हुए - यानी मैं सरदार बन जाऊ तो तू और माँ मेरी रखैल बन जाओगी..

शीला - अह्ह्ह.. हाँ पर वो तो मुमकिम नहीं हाक़िम.. डाकी बहुत शक्ति शाली है..

हाक़िम पलटकर नीचे आ जाता है और शीला को अपने ऊपर ले लेता है और नीचे से झटके मारता हुआ कहता है - कितना भी शक्तिशाली क्यों ना हो मौसी.. मैं उसे हरा दूंगा और काबिले का नया सरदार बनुगा.. और तुझे और माँ को अपने साथ रखूँगा..

शीला - अह्ह्ह हाक़िम ऐसा सोचना भी मत डाकी तुझे मार डालेगा..

हाक़िम हसते हुए - मुझे तो बस तेरे जैसी कोई औरत ही मार सकती है मौसी अपनी चुत में घुसा के..

शीला झड़ती हुई - हाक़िम अब छोड़.. जाने दे वरना डाकी किसी को भेज देगा बुलाने...

हाक़िम शीला को वापस पतट देता है और चोदते हुए कहता है - भेजनें दे मौसी.. अब तू मेरी बनकर रहेंगी..

शीला - हाक़िम.. तुझे क्या हो गया है. तू पहले तो ऐसा नहीं था..

हाक़िम - सही कह रही हो.. मुझे पहले ही ऐसा हो जाना चाहिए था.. मैं तब कमजोर और डरपोक था मौसी.. अब नहीं.. उस डाकी को अब मैं बताऊंगा..

शीला - अब जाने दे हाक़िम.. नहीं वो डाकी मेरी जान ले लेगा..

हाक़िम शीला को घोड़ी बनाते हुए चोदने लगता है..

हाक़िम - तेरी गांड तो मस्त है मौसी.. सेक्सी बिलकुल..

शीला - अह्ह्ह्ह...

हाक़िम शीला के मुंह में लोडा डाल देता है और फिर थोड़ी देर में मुंह में ही झड़ जाता है..

शीला माल थूकती हुई - ये क्या कर डाला तूने हाक़िम.. कितना बुरा है ये..

हाक़िम - पहली बार मुंह में लिया है ना मौसी.. धीरे धीरे आदत पड़ जायेगी..

शीला अपने कपड़े ठीक करके घड़ा उठाते हुए - तेरी माँ छप्पर में तेरी राह देख रही है हाक़िम... जब से तू गया है वो तेरे बारे में पूछती है.. जाकर मिल ले.. और पता नहीं कैसे वस्त्र पहने है तूने.. अब जा..

गौतम जीन्स पहनकर - ठीक है मौसी.. पर कल इसी वक़्त यही आ जाना मिलने..

शीला मुस्कुराते हुए - उर्मि को भेज दूंगी.. कर लेना जो करना है उसके साथ.. तेरी होने वाली घरवाली है वो.. उसे सुखी रख हाक़िम.. मैं तो अब किस काम की...

हाक़िम शीला की कमर पकड़कर होंठ चूमते हुए - तू भी आना उर्मि के साथ मौसी.. कुछ पूछना है मुझे..

शीला मुस्कुराते हुए - ठीक है हाक़िम. अब जाने दे..

शीला लचकती हुई वहा से चली जाती है और वापस झील के पास उस पेड़ के नीचे आ जाता है.. खाना निकाल कर खाने लगता है साथ वो जामुन भी खा लेता है जो बाबा के कहने पर साथ लाया था.. उसके बाद सामान से सिगरेट का पैकेट लाइटर लेकर और शराब की बोतल से 3-4 पेग पीकर वापस चला जाता है..

हाक़िम.. तू कहा था.. पता है कितना ढूंढा तुझे?

सब कह रहे थे मंगरू हाक़िम कहीं चला गया है तुझे नहीं मिलेगा पर मैंने मेरे मित्र और मेरी बहन उर्मि के होने वाले पति को ढूंढ ही लिया..

हाक़िम नशे में - मंगरू..

मंगरू - हाक़िम ये क्या पहना हुआ है तूने और इस तरह क्यों मुझे देख रहा है..

हाक़िम नशे में भी समझ गया था कि ये मंगरू उसका दोस्त होगा और काबिले में रहता होगा..

हाक़िम - मंगरू.. अब क्या बताऊ.. तू मुझे छप्पर तक ले चल..

मंगरू - हाँ चल.. तेरी माँ सबसे तेरे बारे में पूछती रहती है..

हाक़िम नशे में मंगरू के साथ चल पड़ता है और मंगरू से काबिले के बारे में बहुत सी बातें पूछने लगता है..

मंगरू - हाक़िम.. डाकी ने सबको दुखी किया हुआ है.. काबिले के बहुत से लोग उसे मारना चाहते है मगर उसकी ताक़त इतनी है कि कोई उसे लड़ने की चुनौती नहीं दे सकता.. और उसके साथी भी बहुत है..

हाक़िम - तू चिंता ना कर मंगरू.. मैं डाकी को जल्द हरा कर सरदार बन जाऊँगा..

मंगरू - हाक़िम.. तू? तू कैसे हरायेगा डाकी को?

हाक़िम - मंगरू.. वो सब मुझ पर छोड़ दे.. मैं कल उसे लड़ने की चुनौती दूंगा.. और उसे हरा दूंगा.. फिर सब ठीक हो जाएगा..

मंगरू - नहीं हाक़िम.. वो बहुत ताक़तवर है.. उसने हमारे नाना लाखा को आसानी से हरा कर मार डाला था.. और तेरी मेरी माँ के साथ..

हाक़िम - जानता हूँ मंगरू.. मगर अब उसे सबका उत्तर देना होगा.. मैं माँ को उसकी रखैल नहीं बने रहने दूंगा..

मंगरू - तू क्या कह रहा है हाक़िम.. ऐसा करना असंभव है वो इतना लम्बा चौड़ा और बाहुबली है..

हाक़िम - तू मुझे नहीं जानता मंगरू.. मैं अब पहले वाला डरपोक और कमजोर हाक़िम नहीं हूँ.. मैं कल उसे ललकार कर लड़ने के लिए बुलाऊंगा..

मंगरू - एक बार फिर विचार कर हाक़िम.. ये साधारण काम नहीं है.. ले छप्पर आ गया.. तू रुक यही.. मैं काबिले में जाकर तेरी माँ मम्मी मुन्नी मौसी को बताता हूँ..

मंगरू हाक़िम को काबिले से कुछ दूर जंगल में एक घाटी के पास समतल जगह पर बने छप्पर जहा जागीरदार की सेना गुजरते हुए विश्राम करती है वहा छोड़कर काबिले की तरफ चला जाता है..

हाक़िम छप्पर के नीचे एक बड़े से पत्थर पर बैठकर नशे में अपनी गर्दन इधर उधर हिलाकर आस पास के माहौल और वातावरण को देखता है फिर कुछ देर बाद एक सिगरेट जलाकर कश लेने लगता है..

हाक़िम सिगरेट के एक दो कश लेता है की उसे सामने एक बेहद खूबसूरत हसीन और मदमस्त जोबन से भरी हुई औरत भागते हुए उसकी और आती हुई दिखाई देती है जिसके भागने से उसके चुचे ऊपर नीचे ऐसे हिल रहे थे जैसे तेज़ हवा में घर की छत पर सुखाये हुए कपड़े हिलते है.. औरत की कमर दूधिया गोरी और पतली थी मगर कमर के ऊपर और नीचे भरीपन था जो उसकी छाती पर और गांड पर साथ दिख रहा था.. औरत का चेहरा अभी साफ साफ नहीं दिखा था और हाक़िम सिगरेट के कश लेते हुए अपने लंड में आ रही अकड़न को महसूस करता हुआ पत्थर से खड़ा हो गया था..

भागने से औरत के सर की ओढ़ानी जमीन पर गिर गई थी और उसके बदन पर एक छोटा सा ब्लाउज जिसमे उसके आधे चुचे उछल कर बाहर आ रहे थे और कमर से घुटनो तक लम्बा घाघरा था.. औरत को देखकर ऐसा लगता था जैसे कामदेवी दे अवतार लिया हो..

हाक़िम का लंड अब खड़ा हो चूका था जिसे जीन्स ने क़ैद किया हुआ था..

हाक़िम सिगरेट पीते हुए उस औरत की कमर देखकर तय कर लिया था कि इसे मन भरके चोदे बिना वो वापस नहीं जाएगा..

औरत जब उसके करीब आई तो हाक़िम ने सिगरेट का आखिरी कश लेकर सिगरेट फेंक दी और औरत के चेहरे को देखा जो चन्द्रमा कि तरह प्रकाशित और सुन्दर था..

औरत भागती हुई आकर सीधे हाकिम के गले से लग गई और बोली..

औरत - कहा चला गया था हाक़िम अपनी माँ को छोड़कर.. मैं जानती हूँ तू नहीं चाहता कि मैं डाकी की दासी बनकर रहू पर मैं कर भी क्या सकती हूँ.. कहा जा सकती हूँ.. कोई और ठोर ठिकाना भी तो नहीं है मेरे पास.. तेरे नाना को मार कर वो डाकी सरदार बन बैठा है और अब काबिले पर मनमानी कर रहा है..

हाक़िम अपनी माँ मुन्नी के बदन को बाहों में भरके उसके बदन का मुआयना कर रहा था और उसके कानो में मुन्नी की बाते कम ही जा रही थी.. हाक़िम ने अपनी माँ की चिकनी कमर को ऐसे थाम रखा था जैसे वो उसे अपने अंदर समा लेना चाहता हो..

मुन्नी उसी तरह गले लगी हुई वापस बोली - तू वापस काबिले में आजा हाक़िम मैं डाकी से किसी तरह तुझे काबिले में रहने की स्वीकृति दिला दूंगी..

हाक़िम नशे में था और उसके बाहों में बेहद हसीन औरत थी जो उसकी माँ थी मगर फिर भी हाक़िम से रहा ना गया और उसने मुन्नी के चेहरे को एक हाथ से थामकर उसके गुलाब सुर्ख होंठों को बिना मुन्नी की इज़ाज़त के अपने होंठों की गिरफ्त में ले लिया और बड़े प्यार से चूमने लगा..

हाक़िम को ऐसा लग रहा था जैसे कोई जन्नत की हूर उसे मिल गई है और हाक़िम अपनी माँ मुन्नी के लबों का रस पिने लगा जिसमे मुन्नी के मुंह की लार हाक़िम के मुंह की लार से मिलकर नया एक स्वाद दोनों के मुख में घोल रही थी.. हाक़िम बार बार मुन्नी के होंठों को खींचता हुआ चुम रहा था और निचले होंठ को दांतो से खींचते हुए ऐसे चुम रहा था जैसे आमरस पी रहा हो..

हाक़िम का हाथ मुन्नी की गर्दन पर से नीचे आ गया और मुन्नी की चोली में क़ैद उसके उन्नत विकसित सुडोल और उठे हुए उरोजो पर चला गया.. हाक़िम में मुन्नी की छाती के उभार को मसलते हुए उसके चुचक को पकड़ लिया ऊँगली से छेड़खानी करते मरोड़ने लगा..

मुन्नी जब भागते हुए आई थी उसकी आँखों में आंसू थे मगर हाक़िम जो अभी अभी उसके साथ छेड़खानी कर रहा था उससे उसके मन की पीड़ा और आँखों को आंसू विलुप्त हो गए और मुन्नी आश्चर्य और संकोच में पड़ गई.. उसके बेटा हाक़िम उसे बाहों में लिए चुम रहा था और बिना किसी शर्म लिहाज़ और हिचक के उसके छाती के मादक उभार को अपने हाथ से मथ रहा था..

मुन्नी आश्चर्य के साथ भ्रम में थी की उसे इस वक़्त क्या करना चाहिए और क्या नहीं.. वो इतने दिनों से अपने बेटे हाक़िम के जाने से अफ़सोस और पीड़ा में थी और जब उससे मिली तो हाक़िम की हरकतो से आश्चर्यचकित..

हाक़िम ने बिना चुंबन तोड़े अपना हाथ मुन्नी के चूची के दाने से नीचे लेजाकर मुन्नी के घाघरे में डाल दिया और उसकी चुत पर उगे हुए लम्बे लम्बे बालों से होते हुए उसकी चुत पर आ पंहुचा.. चुत पर जैसे ही हाक़िम ने हाथ लगाया मुन्नी ने चुम्बन तोड़कर हाक़िम को थोड़ा पीछे धकेला और एक जोरदार तमाचा उसके गाल पर जड़ दिया.

मुन्नी - ये क्या कर रहा है तू.. माँ हूँ मैं तेरी और तू मेरे ही साथ.... मैं जानती हूँ तू मुझसे रूठा है ओर ऐसा करेगा अपनी माँ के साथ.. मदिरा का नशा है ना तेरे ऊपर? तू सही गलत नहीं समझ पा रहा इस समय.. कैसे वस्त्र पहनें है तूने.. बहरूपिया सा लगता है.. चल मेरे साथ..

हाक़िम अपना गाल पकड़ कर पत्थर पर बैठता हुआ - मुझे कहीं नहीं जाना..

मुन्नी हाक़िम का हाथ पकड़ कर - मैं कहती हूँ हाक़िम चल मेरे साथ.. मैं डाकी से क्षमा मागकर तुझे काबिले में रहने की अभी स्वीकृति दिला दूंगी..

हाक़िम मुन्नी से हाथ छुड़वाते हुए - वहा जाकर क्या करूँगा मैं माँ.. तुझे उस डाकी के साथ देखूंगा? जब वो तेरे इस बदन को छुएगा, निर्वस्त्र करेगा मैं कैसे खुदको वहा रोक पाऊंगा?

मुन्नी हाक़िम को समझाते हुए - मैं उसकी दासी हूँ हाक़िम.. वो काबिले का सरदार.. मुझे उसकी हर बात माननी पड़ेगी वरना वो कुछ भी कर सकता है..

हाक़िम मुन्नी की कमर में हाथ डालकर उसे सीने से लगता हुआ - अगर ऐसी बात है तो कल मैं उस डाकी को लड़ने के लिए ललकारूँगा और उसे हराकर मैं काबिले का सरदार बनुगा.. फिर माँ.. तुझे मेरी हर बात माननी पड़ेगी.. जैसे तू डाकी को खुश रखती है तुझे मुझे भी खुश रखना पड़ेगा..

मुन्नी हाक़िम का हाथ अपनी चुत पर रखकर - अगर तू मुझे पाना चाहता है हाक़िम.. तो यही पर जो करना है कर ले.. मगर डाकी से लड़ने की बात भूल जा.. वो बहुत ख़तरनाक है.. हाक़िम तू उसे नहीं हरा पायेगा.. मैं तुझे नहीं खोना चाहती..

हाक़िम मुन्नी की चुत मुट्ठी में पकड़कर मसलते हुए - अब तो इसका स्वाद सरदार बनने के बाद ही लूंगा माँ.. अपनी जेब से एक गोली निकालकर.. माँ कल जब वो मुझसे लड़ने आये तब तू ये किसी चीज में मिलाकर डाकी को खिला देना.. बस..

मुन्नी अपनी चुत से हाक़िम का हाथ हटाते हुए - ये क्या है?

हाकीम - अचेत होने की चीज़ है.. जब वो इसे खा लेगा तो पूरा नशे में हो जाएगा और अपने होश गवाकर अचेत होकर मुझसे लड़ेगा.. फिर मैं उसे आसानी से हरा दूंगा.

मुन्नी - मैंने कहा ना हाक़िम तू डाकी को नहीं ललकारेगा.. उसके साथ और भी लोग है जो बहुत खतरनाक है.. अपना इरादा बदल दे.. मैं तुझे ऐसा नहीं करने दूंगी..

मंगरू आते हुए - मौसी ओढ़नी..

मुन्नी ओढ़नी लेकर सर पर रखती हुई - मंगरू समझा हाक़िम को.. कैसे उल्टी सीधी बात कर रहा है.. अचानक से वीर योद्धा बनने चला है..

मंगरू - मौसी मुझसे भी ऐसी ही बात कर रहा था.. आप जाओ काबिले में.. मैं हाक़िम को अपने साथ ले जाता हूँ.. कल तक इसका मन बदल जाएगा..

मुन्नी जाते हुए - हाक़िम.. तू डाकी से नहीं लड़ेगा..

मंगरू - चल हाक़िम..

हाक़िम - कहा ले जाएगा मंगरू?

मंगरू - हाक़िम काबिले में हमारी तरफ पहरा नहीं होता.. तू मेरे साथ चल.. रात को मेरे साथ ठहर जाना.. वहा और कोई नहीं होगा तो किसी को ये भी खबर नहीं लगेगी कि तू मेरे साथ है..

हाक़िम - ठीक है मंगरू.. आज रात तेरे झपडे में रहता हूँ पर तुझे मेरा एक काम करना होगा..

मंगरू - क्या हाक़िम?

हाक़िम - उर्मि को जाकर बता दे की आज रात मैं तेरे साथ हूँ..

मंगरू - पहले तो तू उससे कितना दूर दूर और बचके रहता था अब खुद से बुला रहा है..

हाक़िम - पिछले जन्म में चुतिया था ना..

मंगरू - क्या?

हाक़िम - कुछ नहीं.. चल.. बता.. कहाँ है तेरा झोपड़ा..

मंगरू - पर हाक़िम.. अगर तू उर्मि के साथ झोपड़े में रहेगा तो मैं कहा जाऊंगा?

हाक़िम - इतना छोटा झोपड़ा है तेरा?

मंगरू - नहीं.. पर उर्मि मेरी बहन है हाक़िम..

हाक़िम - मंगरू.. आज रात की बात है.. और उर्मि से मेरा विवाह भी होने वाला तो इसमें गलत क्या है..

मंगरू - ठीक है हाक़िम.. मैं आज झोपड़े के बाहर रह लूंगा..

हाक़िम - मंगरू तेरी माँ और मेरी माँ दोनों को उस डाकी से कल मैं आजाद करवा दूंगा..

मंगरू - ऐसा सच में हो सकता है हाक़िम?

हाक़िम - हाँ.. मंगरू..

मंगरू - हाक़िम यहाँ से थोड़ा छुपके चल.. मेरा झोपड़ा आने वाला है..

मंगरू हाक़िम को अपने झोपड़े में ले आता है जहा कुछ भी नहीं था एक तार पर कुछ कपड़े थे और एक तरफ कुछ बिछा के सोने का सामान..

मंगरू हाक़िम को झोपड़े में छोड़कर उर्मि के पास चला जाता है और उसे हाक़िम के बारे में बात करता है उर्मि अपने साथ कुछ लेकर मंगरू के साथ लचकते हुए उसके झोपड़े में आ जाती है और हाक़िम के गले लग जाती है..

उर्मि - पहले इतना पीछे पड़ी रहती थी तब पलट के भी नहीं देखा और अब मेरे बिना रह भी नहीं पा रहे..

हाक़िम - काबिले की सरदारनी होने वाली है तू.. बस यही बताने बुलाया था..

उर्मि - छोडो इस बात को.. एक दम से सरदार बनने का भुत आ गया है तुम पर.. चलो में भोजन लाई हूँ..

हाक़िम - अपने हाथों से खिलाओगी तो खाऊंगा..

उर्मि जैसे तुम बोलो...

मंगरू झोपड़े से बाहर चला जाता है..

उर्मि झोपड़े में कुछ बिछा कर उसके हाक़िम के साथ बैठ जाती है और उसे अपने हाथ से भोजन बनाकर खिलाने लगती है और उसीके साथ खुद भी भोजन करती है..

हाक़िम और उर्मि भोजन करने के पश्चात् उसी जगह एक दूसरे से लिपटकर लेट जाते है..

हाक़िम उर्मि को अपने ऊपर खींचकर चूमने लगता है..

उर्मि - अरे अरे मुख से मुख मिलाकर ऐसे चुम्बन करते हो जैसे मैं कहीं भाग जाउंगी.. मुझे दम तो लेने दो..

हाक़िम उर्मि की चोली खोलते हुए - तू है इतनी मस्त यार क्या करू..

उर्मि - तुम ना क्या क्या बोल जाते हो समझ आता ही नहीं है..

हाक़िम - उस डाकी ने तेरे साथ तो कुछ नहीं किया ना उर्मि..

उर्मि - मैं तो केवल तेरी हूँ हाक़िम.. तेरे अलावा कोई और छुएगा तो उसकी जान ले लुंगी.

हाक़िम घाघरा खोलते हुए उसे नीचे ले लेता है और जीन्स खोलकर उसकी चुत में लंड घुसा देता है..

उर्मि - अह्ह्ह.. हाक़िम तुम्हारा पहले से बड़ा लग रहा है..

हाक़िम - आंनद आ रहा है ना तुम्हे मेरी उर्मि..

उर्मि - हाँ.. हाक़िम बहुत आंनद आ रहा है.. पर बहुत दर्द भी होने लगा है.. आह्ह

हाक़िम उर्मि को घोड़ी बना लेता है चोदने लगता है..

सारी रात उर्मि और हाक़िम दोनों एक दूसरे को प्रेम करते है और सुबह तक साथ ही बिना कपड़ो के लिपटे रहते है..

हकीम सुबह मंगरु के झोपड़े से निकलकर बाहर आ जाता है और जंगल की तरफ चला जाता है वहां पर वह सोचने लगता है कि कैसे सरदार डकी को हराकर वह कबीले का सरदार बन सकता है उसने अपने मन में तय कर लिया था कि वह किसी भी तरह डकी को हराकर कबीले का सरदार बनेगा और अपनी मां और मौसी को उसके चंगुल से आजाद करवा कर अपने साथ रखेंगी और कबीर का सरदार बनकर दोनों को अपने पास रखेगी उसके बाद वह उर्मि से विवाह करेगा और उर्मी को कबीले की सरदारनी बनाएगा..

हातिम जानता था कि उसके पास एक महीने का समय है और एक महीने में उसे दिया गया काम करके वापस भी जाना है लेकिन वह इतना जल्दी वीरेंद्र सिंह की जागीर में जाकर बैरागी से नहीं मिलना चाहता था और वह चाहता था कि जब अगली अमावस्या आने का समय हो उससे पहले ही वह बैरागी से मिलकर जड़ी बूटी ले ले और वहां से चला जाए..

मगर उससे पहले वह चाहता था कि काबिले की दशा बदल दे और डाकी को हराकर नया शासन स्थापित करें जिससे कबीले के सभी लोग फिर से सुख शांति से अपना जीवन यापन करें और कबीले में सुख शांति और संपन्निता बनी रहे वह अपने नाना लक्खा की तरह काबिले को फिर से इस संपन्नता और सुख से भरा हुआ देखना चाहता था जैसे पहले था..

हाकीम रातभर उर्मी के साथ रहने से उसके लिए भी मन में प्रेम जागने लगा था और वह चाहता था की उर्मी के साथ हो विवाह करके प्रेम से रह सके और साथ ही अपनी मां मुन्नी और मौसी शीला को भी अपने साथ रख सके.. आज उसने निश्चय कर लिया था कि वह डाकी को ललकार देगा और उसे लड़कर किसी भी तरह से हरा देगा चाहे उसके लिए उसे बंदूक का सहारा लेना पड़े या फिर कोई और पेत्तरा इस्तेमाल करना पड़े उसने सोच लिया था कि डॉगी को आज हराकर उसे जान से मार देगा और उसको उसके किए की सारी सजा देगा..

मगर यह सब करने से पहले उसने आज जागीर जाकर जागीर में हो रही गतिविधियों को जाने का और यह भी तय करेगा कि उसे कब और कैसे बैरागी से मिलना है और कब उस जड़ी बूटी हासिल करनी है जिससे वह अपना दिया गया काम आसानी से पूरा कर सकेगा और वापस जब अपनी दुनिया में जाएगा या अगले जन्म में जाएगा तो वह जड़ी बूटी लेकर ही जाएगा.. हकीम जंगल के मुहाने पर था और अब वह जागीर की तरफ चल रहा था जहां उसे महल में प्रवेश करने से पहले ही दरबारों ने रोक दिया और महल के भीतर प्रवेश करने नहीं दिया जिससे हकीम बिन महल की गतिविधियां जाने ही वहां से लौट आया मगर उसने रास्ते में किसी सैनिक से इस बारे में बात करके यह जान लिया था कि अभी बैरागी मैं कोई भी इस प्रकार की जड़ी बूटी नहीं बनाई है पर वीरेंद्र सिंह ने सिपाही पश्चिम की तरफ भेजे है जिससे जड़ी बूटी का निर्माण हो सके इसलिए हाक़िम बेफिक्र होकर वापस आ गया और पहले कबीले का सरदार बनने का निश्चय किया..

जंगल के मुहाने पर नदी के किनारे बसी हुई बस्ती जो बंजारा उसे भरी हुई थी और उनके झोपड़ी और बीच में सरदार के बड़े से आलीशान तंबू से सजी हुई थी वहां पर कई लोग अपने-अपने काम में लगे हुए थे और डाकी जो भोगविलास में व्यस्त था उसने अपने सामने नाच रही महिलाओं को देखते हुए मदिरापान करना शुरू कर दिया था.. डाकी के कई विश्वसनीय साथी उसके साथ थे जो डाकी को संभालते थे और सुरक्षित रखते थे इसी के साथ में वह लोग कबीले के दूसरे लोगों पर अत्याचार भी करते थे जिससे पूरा कबीला परेशान था और बस्ती के सभी लोग अपनी अपनी तरफ से डाकी से डर कर छुपाते रहते थे और सोचते थे कि वह कभी डकी से ना मिले और डाकी की नजर से बचे रहे..

जहां पर कल हकीम ने शीला और उर्मी से बात की थी वहीं पर आज फिर से शीला उपस्थित होकर हकीम के सामने खड़ी थी और हकीम उसके सामने बैठा हुआ उसे देखे जा रहा था और कबीले की रीति और नीति जानने के लिए आतुर था.. वह शीला से नए सरदार बनने के लिए उसे क्या करना होगा और किस तरह उसे सरदार को ललकार ना होगा और इसी के साथ में उसे किस तरह द्वंद युद्ध किया जाएगा और उसमें क्या-क्या हो सकता है और क्या-क्या कार्य किए जाएंगे इससे अवगत होने के लिए शीला से बात कर रहा था..

शीला बड़ी सी चट्टान के पीछे घास में पीठ के बल लेटी थी और हाक़िम उसकी चुत में लंड घुसाये उसके ऊपर लेटा हुआ उसे धीरे धीरे चोदता हुए बात कर रहा था.

हाक़िम - और बता मौसी.. मेरे ललकारने के बाद डाकी क्या करेगा?

शीला - हाक़िम तू डाकी को ललकारेगा तो उसके कुछ देर बाद काबिले के मध्य में तेरा और उसका द्वन्द युद्ध होगा जिसमे तुम दोनों एक दूसरे के साथ कोई एक हथियार लेकर लड़ोगे.. और एक दूसरे को हारने के लिए प्रयास करोगे. डाकी को तलवार बाजी बहुत अच्छी तरह अति है और उसके साथीयों को भी..

हाक़िम शीला के बोबे मसलकर उसे चोदते हुए - मैं उसे हरा दूंगा तो फिर क्या होगा मौसी?

शीला - अह्ह्ह.. उसके बाद तू काबिले का नया सरदार बन जाएगा और काबिले को तेरा हर हुकुम मानना पड़ेगा.. डाकी की सभी दासी तेरी दासी बन जायेगी. मैं और मुन्नी भी.. तू जिसके साथ चाहे जो कर सकेगा.. तू चाहे तो उर्मि के साथ तय हुआ तेरा विवाह भी तोड़ सकता है.. उसे तेरी बात माननी होगी..

हाक़िम - मौसी तेरी तेरी बेटी और तूने मेरी इतनी सेवा की है कि तुम दोनों पर मेरा दिल आ गया है और अब मैं तुम दोनों को बिल्कुल भी नहीं छोड़ने वाला मैं सरदार बन जाऊंगा तो तुम दोनों मेरे साथ रहोगी..

शीला - हाक़िम तूने फिर से मेरे अंदर ही निकाल दिया.. ऐसा बार बार करेगा तो जानता है क्या होगा?

हाक़िम शीला कि चुत से लंड निकालते हुए - तू माँ बन जायेगी मौसी.. और क्या होगा? उर्मि और मंगरू के बाद तीसरा बच्चा पैदा होगा तेरी योनि से...

शीला अपने घाघरे से चुत साफ करती हुई - कल से पता नहीं क्या हो गया है तुझे जब भी मिलता है ऐसे बात करता है जैसे मैं तेरी मौसी नहीं कोई दासी हूं..

हाक़िम शीला के होंठ चूमते हुए - मौसी अब जा.. जाकर बोल दे मां से कि मैं डाकी को ललकार ने आ रहा हूं और वह मेरा इंतजार करें अब मैं उसे हराकर सरदार बन जाऊंगा और आज ही इस काबिले के नियम को बदलकर वापस उसी तरह चलाऊंगा जैसे नाना जी चला रहे थे.. अब किसी को डरने की जरूरत नहीं है..

मौसी - एक बार फिर सोच ले हाक़िम...

हाक़िम शीला को घुमा जे उसकी गांड पर थप्पड़ मारता हुआ - सोच लिया शीला.. अब अपने ये मोटे मोटे चुत्तड़ हिलाती हुई चली जा और बता दे सबको कि मैं आ रहा हूँ... और माँ से भी कह देना..

शीला - जाती हूँ हाक़िम..

शीला लचक्ति हुई कबीले की तरफ चली जाती है और दूसरी तरफ हाकीम इस पेड़ के नीचे आकर अपने सामान में से पिस्तौल निकाल लेता है जो बड़े बाबा जी ने उसे दी थी इसी के साथ वह वापस आ जाता है और कबीले में घुसता हुआ सभी को ललकार डाकी से मिलने की बात करता है..

सरदार.. सरदार..

क्या हुआ बाला? क्यों हाँफ्ता हुआ आ रहा है? क्या करण है जो तू मेरे एकान्त के पल में दखल दे रहा है..

बाला - सरदार.. हाक़िम..

डाकी - हाक़िम क्या?

बाला - हाक़िम ने आपको द्वन्द युद्ध के लिए ललकारा है..

डाकी अपने आगे घोड़ी बनी हुई काबिले की नई नई जवाँ हुई लड़की के बाल खींचकर उसकी गांड पर थप्पड़ मारते हुए कहा - इतनी हिम्मत उस हाक़िम कि? आज तो उसे जीवन से हाथ धोना पड़ेगा..

मुन्नी तम्बू में आकर हाथ जोड़ते हुए - नहीं सरदार.. माफ़ कर दो हाक़िम को..

डाकी लड़की कि चुत में से लंड निकालता हुआ - माफ़ नहीं मुन्नी आज साफ करूंगा तेरे हाक़िम को तेरे बाप लाखा की तरह..

मुन्नी डाकी के पैर पकड़ लेती है और क्षमा की भीख मागती हुई हाक़िम को समझाने की बात करती है मगर डाकी नहीं मानता और मुन्नी को एक जोरदार थप्पड़ के साथ एक तरफ कर देता है और रोती हुई मुन्नी को छोड़ कर बाहर जाने लगता है कि मुन्नी को हकीम की दी हुई गोली याद आ जाती है और वह उसे एक प्याली में मिलाकर मदिरा के साथ डाकी को परोसती हुई कहती है - सरदार हाक़िम बच्चा है आप उसे माफ़ कर दो..

डाकी मदिरा का प्याला पीकर मुन्नी का बोबा पकड़ कर अपने आगे से हटा देता है और बाहर आ जाता है और द्वन्द युद्ध कि जगह हाक़िम को खड़ा देखकर उसके सामने आ जाता है..

डाकी हल्का सा नशे में - गलती कि जो तेरी माँ के कहने पर तुझे पिछली बार जीवित छोड़ दिया.. किन्तु इस बार तू जीवित नहीं बच्चेगा.. मैं आज तेरे प्राण लेकर तेरी माँ मुन्नी को तेरा मरा हुआ मुंह दिखाऊंगा.. उठा ले तलवार.. और कर मेरा सामना.. मैं भी देखु तेरा जैसा डरपोक कितने समय मेरे आगे खड़ा रहता है..

हाक़िम पिस्तौल निकालकर - साले तूने मेरी माँ को मेरा मरा हुआ मुंह दिखायेगा.. पहले तो सोचा था तुझे हरा कर यहां से जीवित जाने दूंगा पर अब नहीं.. हाक़िम चिल्लाते हुए जो भी इस डाकी कि तरफ है वो सब मेरे सामने आ जाओ.. मैं अभी तुम्हारा खात्मा किये देता हूँ..

डाकी और उसके साथ उसके कई साथी हसते हुए - अरे ये खिलौना क्या है.. लगता है..

सरदार ये वस्त्र भी बहुत अतरंगी पहनें हुए है..

लगता है कोई साया है इसके ऊपर..

सरदार इसे ख़त्म कर दो.. और बता दो आपके जैसा ताक़तवर इस काबिले में कोई और नहीं..

डाकी तलवार लेकर - आज तेरा अंतिम दिन है हाक़िम.. तेरे नाना लाखा जैसे तू भी आज मेरे हाथों मरेगा..

शीला और उर्मि दोनों एक दूसरे से संवाद करते हुए हाक़िम को देख रहे थे और हाक़िम और डाकी एक दूसरे को मारने की नीयत से एक दूसरे के सामने अपने हथियार लेकर खड़े थे वही उर्मी और शीला एक किनारे खड़ी होकर हकीम को देख रही थी जो अपने हाथ में पिस्टल लिए हुए डाकी के सामने खड़ा था शीला और उर्मी बहुत चिंतित थी और डरते हुए सोच रही थी कि हाकीम आप भी अगर भाग जाए तो उसकी जान बच सकती है मगर हाकीम भागने वाला नहीं था उधर मुन्नी भी उसे तंबू से बाहर निकाल कर आ चुकी थी और आखरी बार डाकी से अपने बेटे हकीम को छोड़ देने और जान देने की बात कर रही थी उसके साथ शीला और उर्मि भी आ गई थी... मगर डाकी ने किसकी एक बात नहीं सुनी और सबको धक्का देते हुए किनारे पर गिरा दिया जिससे हकीम गुस्सा हो गया और चिल्लाते हुए अपनी पिस्तौल का निशान डाकी के सर पर करते हुए पिस्तौल चला दी..

काबिले के सभी लोग घेरा लगाकर यह सब होता देख रहे थे और जैसे ही हकीम में पिस्टल चलाई बंदूक की निकली गोली से डाकी का सर फट गया और वह जमीन पर गिर गया.. कबीले के सारे लोग हकीम को आश्चर्य की नजर से देखने लगे और सोचने लगे कि उसके पास ऐसा क्या है जिसके चलने से इतनी दूर से डाकी का सर इतना तेज फट गया और वह मर के जमीन पर गिर गया.. काबिले के सभी लोगो के मन में उत्साह जाग उठा और डाकी के मरने पर वह लोग मुस्कुराते हुए खुशी से झूमने लगे मगर डाकी के साथियों ने हकीम पर हमला कर दिया और उसे मारने के नियत से अपनी अपनी तलवार उठाकर उसके पास बढ़ने लगे मगर हकीम ने एक-एक करके सबको गोली मार दी और कल 13 लोगों को जो डाकी के विश्वसनीय थे सबको मौत के घाट उतार दिया..

मुन्नी शीला और उर्मि ऐसा होते देखकर आश्चर्यचकित थी और उन्हें अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था कि कैसे हकीम ने एक ही झटके में द्वन्द युद्ध की ललकार देकर अपने छोटे से हथियार से डाकी और उसके सभी साथियों को इतनी जल्दी मार डाला और अपनेआपको कबीले का नया सरदार बना दिया.. मुन्नी बहुत खुश थी और उसे अब हातिम पर बहुत गर्व महसूस हो रहा था.. कबीले के सभी लोगों ने हकीम को अपने कंधे पर उठा लिया और उसकी जय जयकार करते हुए सरदार की गद्दी पर बैठा दिया सरदार की गद्दी पर बैठकर हकीम ने सभी को फिर से खुलकर जीने का कहते हुए फिर डाकी के बनाये हुए सभी कठोर नियम बदल दिए.. और पहले जैसे लाखा की सरदारी में काबिला चल रहा था वैसे ही काबिले को चलाने की बात कही जिससे काबिले के सभी लोग खुशी से झूम उठे और सभी हकीम के पैरों में गिरते हुए उसकी धूल को माथे से लगाकर झूमते नाचते गाते हुए रात के जश्न का आयोजन करने लगे..

रात को जश्न के आयोजन में काबिले के सभी लोग नए सरदार के बनने की खुशी का इजहार कर रहे थे और चारों तरफ कबीले के लोग खुशी से हंसते मुस्कुराते हुए ढोल मंजीरे की ताल पर नाच गा रहे थे वहीं महिलाएं भी उसी खुशी में शामिल होती हुई मर्दों के साथ नाच गा रही थी और एक जलती हुई आग के आसपास सभी लोग घेरा बांधकर बैठे हुए यह सब कार्यक्रम कर रहे थे.

गौतम के कहने पर सभी ने उन लोगों की लाशों को पास के ही जंगल में दफना दिया और अब गौतम मुन्नी के पास आ गया..

सरदार के तंबू के अंदर मुन्नी एक तरफ कोने में अपने घुटनों को मोड़कर हाथों से बंधे हुए बैठी हुई थी..

हाक़िम तम्बू में आते हुए - पूरा कबिला देख लिया.. और तुम यहां बैठी हो..

मुन्नी उठकर हाक़िम को गले लगाते हुए - तुमने आखिरकार अपने नाना जी का बदला ले लिया हाक़िम.. तु उस डाकी हो हरा कर सरदार बन ही गया.. तेरी माँ आज बहुत खुश है..

हाक़िम मुन्नी कि कमर थामकर उसके गर्दन पर अपने होंठ रखकर चूमता हुआ - ये सब मैंने नानाजी का बदला लेने के लिए नहीं किया मां.. नहीं इस कबीले का सरदार बनने के लिए मैंने डाकी को मारा है.. मैंने तो बस तुझे पाने के लिए यह सब किया है.. मैं तुझे कबीले की सरदारनी बनाता हुआ देखना चाहता हूँ..

मुन्नी हाक़िम से अलग होते हुए - यह कैसे मुमकिन है हकीम... मैं तेरी मां हूं और तू मेरे साथ ऐसा नहीं कर सकता.. उर्मी के साथ तेरी शादी से हुई है और उसी के साथ होगी..

हाक़िम फिर मुन्नी को बाहों में भरता हुआ - मैंने कब उर्मि से विवाह के लिए मना किया है मां.. मगर उर्मी के साथ में तेरे और मौसी के साथ भी विवाह करूंगा.. तुम तीनो से विवाह करके मैं इस काबिले को नए वारिस दूंगा..

मुन्नी हाक़िम को देखते हुए - ऐसा नहीं हो सकता हाक़िम..

हाक़िम मुन्नी के घाघरे में हाथ डालता हुआ - सब होगा माँ.. मैंने कहा था ना सरदार बनने के बाद तेरी चुत मारूंगा..

मुन्नी - हाक़िम छोड़ मुझे.. मैं तेरी माँ हूँ..

हाक़िम छोड़ते हुए - और मैं इस काबिले का सरदार.. मौसी ने बताया है की जश्न में मुझे अपनी पसंदीदा औरत चुनने का पूरा अधीकार है.. जश्न के बाद मैं अपनी पसंद की औरत चुन लूंगा.. फिर देखता हूँ तू अपने सरदार का हुकुम कैसे नहीं मानती..

मुन्नी हाक़िम का हाथ पकड़ कर - हाक़िम.. क्या हो गया है तुझे? मैं तेरी माँ हूँ.. कुछ तो लिहाज़ कर..

हाक़िम - किस बात का? मौसी ने बताया है कि मेरे ऊपर किसी का दबाव नहीं होगा मैं जिसे भी चाहु अपना बना सकता हूँ.. आज जश्न के बाद मैं तुझे अपना बना लूंगा.. तैयार रहना माँ..

मुन्नी गुस्से के साथ हाक़िम को देखकर - अगर तू ऐसा करेगा तो मैं तुझे ललकार दूंगी और कल तेरा मेरा द्वन्द युद्ध होगा.. और तुझे मुझे भी मारना होगा..

हाक़िम प्यार से करीब जाकर मुन्नी को गले लगाते हुए - ललकार कर तो देख.. पुरे काबिले के सामने नंगा करके ऐसा चोदुँगा कि याद रखेगी..

मुन्नी - हाक़िम तू गलत कर रहा है अपनी माँ के साथ..

हाक़िम मुन्नी के होंठ चूमते हुए - मर्ज़ी तेरी है माँ.. मेरी दासी बनकर एक कोने में पड़े रहकर मुझसे प्रेम करना है या काबिले कि सरदारनी बनकर सबपर हुकुम चलाते हुए मुझसे प्रेम करना है..

मुन्नी - अगर मैं तेरी सारी बात मान लूं तो तूझे भी मेरे साथ एक वादा करना पड़ेगा..

हाक़िम मुन्नी के होंठों का रस पीता हुआ - बोल ना माँ..

मुन्नी गंभीरता से - तुझे मेरी हर बात माननी होगी.. और जो भी मैं कहु करना होगा..

हाक़िम मुस्कुराते हुए - मैं तेरा गुलाम बनकर रहूँगा माँ.. बस बिस्तर में तुझे मेरा गुलाम बनना पड़ेगा..

मुन्नी हाक़िम को दूर करते हुए - जा अपनी सरदारनी को जश्न के बाद अपनाकर मिलना..

काबिले मैं जलती हुई एक बड़ी सी आग के इर्द-गिर्द सभी कबीले के लोग जश्न बनाते हुए ढोल मंजीरे बजाते हुए नाचते गाते हुए झूम रहे थे गा रहे थे और खुशियां मना रहे थे वही जश्न में अब खाना भी लगने लगा था और सभी खुशी से खाते हुए नए सरदार को बधाइयां दे रहे थे और अपनी अपनी तरफ से तोहफे दे रहे थे.. हकीम सरदार की गाद्दी पर बैठा हुआ अपने सामने चल रहे जश्न को देखा हुआ खुशी से झूम रहा था उसके आसपास में कई दासियां और कई बांदीया थी.. जो डाकी के मरने के बाद अब उसकी दासियां बन चुकी थी.

जश्न के बाद जब काबिले के एक बुजुर्ग आदमी ने हकीम से अपने मनपसंद की औरतो को चुनकर अपने साथ रखने के लिए और सरदारनी बनाने के लिए कहा तो हकीम अपनी गाद्दी पर से उठ गया और सामने खड़े हुए कबीले के सभी लोगों को देखा हुआ बोला..

हाक़िम - मैं मेरे आस-पास में जितनी भी मेरी दासियां हैं उन सभी को आजाद करता हूं और उन्हें आजादी देता हूं कि वह काबिले में अपनी मनमर्जी से रह सकेंगी और अब उन्हें किसी के भी गुलाम बने रहने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी..

बुजुर्ग - आपने ये नेक कार्य किया है अब काबिले से अपनी सरदारनी भी चुनो सरदार..

हाक़िम - मैं मुन्नी और शीला दोनों बहनो को जो मेरी माँ और मौसी भी है उन्हें सरदारनी बनाता हु.. और इसके साथ जैसा कि पहले तय था उर्मि को भी विवाह करके अपनी सरदानी बनाता हूँ..

कभी लेकर सभी लोग चकित थे कि कैसे हाक़िम ने बिना किसी लाज शरम और परवाह के अपनी बात कह दी थी और कबीले के सभी लोगों को अब उसकी बात माननी होगी.. काबिले के किसी भी व्यक्ति ने उसकी बात का निरादर नहीं किया और सहर्ष उसकी बात स्वीकार कर ली और अब काबिले के सरदार के रूप में हाकीम गाड़ी पर बैठा हुआ था और उसी के साथ में कुछ सेविकाओं ने मुन्नी शीला और उर्मी को साथ में तैयार करके हकीम की गद्दी के आसपास बैठा दिया..

हकीम ने एक साथ तीनों से विवाह किया और यह ऐलान कर दिया कि अब से उर्मि, मुन्नी और शीला इस कबीले की सरदारनी है और उनकी कोख से जो पहला बच्चा जन्मेगा वह आने वाला कबीले का वारिश होगा..

काबिले के सभी लोगों ने हकीम की बात को स्वीकार कर लिया और नाचते गाते हुए उसके नाम के जय-जय कार लगाते हुए जश्न के बाद अपने-अपने तंबू की ओर चले गए और सोने लगे..

जश्न समाप्त होने के बाद रात का समय हो चुका था जहां पर अंधेरी अमावस के काले प्रकाश ने धरती को अपने आगोश में ले लिया था और हर तरफ अधकार ही अंधकार था.. जंगल के मुहाने पर नदी के किनारे बसी हुई इस बस्ती को देखकर ऐसा लगता था जैसे संतकर में इस बस्ती में चलती हुई मसाले और लालटेन इस अंधकार को दूर कर रही है और जीवन का नया स्रोत बताती हुई रोशनी का प्रकाश फैल रही है..

हकीम नशे में चूर अपने सरदार की गद्दी से उठा और लड़खड़ाते हुए कदमों के साथ अपने तंबू की ओर जाने लगा मगर रास्ते में ही उसने अपने तंबू से लगाते हुए दूसरे तंबू जहां दासी और बाँदिया दिया रहा करती थी उसमें जा घुसा..

हातिम ने देखा कि अब वहां कोई नहीं था और सिर्फ उर्मी और उसकी मां शीला वहा उपस्थित थी.. जो तंबू में लगे हुए बिस्तर पर अगल-बगल लेटी हुई सो रही थी..

हकीम लड़खड़ाते हुए कदमों के साथ बिस्तर के ऊपर चला गया और गिरते हुए शीला के ऊपर आ गया..

गौतम के गिरने से उर्मी और शीला दोनों को पता लग गया है कि हकीम यहां आ गया है और उनके बिस्तर में आ लेटा है..

शीला हाक़िम को देखकर - सरदार...

हाक़िम शीला के होंठपर अपने होंठ रखते हुए - सरदार नहीं मौसी.. हाक़िम.. तुम्हारा हाक़िम..

उर्मि अपने बगल में लेटी हुई अपनी माँ के ऊपर हाक़िम को लटा देखकर गुस्से से भर गई और बिस्तर से उठने लगी तो हाक़िम ने शीला से चुम्बन तोड़कर उर्मि का हाथ पकड़ लिया और उसे वापस अपने पास खींचते हुए बोला मदिरा के नशे में - तू कहाँ जा रही है?

उर्मि अपनी माँ शीला के ऊपर लेटे हुए हाक़िम को गुस्से से देखकर बोली - तुमने अच्छा नहीं किया हाक़िम.. तूने मुझे सरदारनी बनाने का वादा किया था..

हाक़िम - बना तो दिया तुझे सरदारनी.. फिर क्यों रूठी हुई है..

उर्मि - मेरे साथ माँ और मौसी को क्यों बनाया.. तूमने अपनी माँ और मौसी से विवाह क्यों किया?

हाक़िम शीला के ऊपर से उठकर उर्मि को शीला के बगल लटाता हुए उर्मि के ऊपर आकर उसे चूमते हुए कहता है - इतना क्रोध अपने हकीम पर? किसी पराई से तो विवाह नहीं कीया ना.. देख तेरी मां को ऊपर से नीचे तक.. मौसी अब भी कितनी योवन से भरपूर है..

अगर मैं मौसी को नहीं अपनाऊगा तो कौन अपनायेगा उर्मि? डाकी ने दासी बना के रखा था मौसी और माँ को.. उनका क्या होता?

शीला करवट लेकर उर्मि और हाक़िम के पास आते हुए - उर्मि छोड़ दे अपना क्रोध.. हाक़िम ने कुछ गलत नहीं किया.. ये तो केवल हम तीनो को सुखी रखना चाहता है..

उर्मि - माँ आप बीच में मत बोलो.. और हाक़िम का पक्ष लेना बंद करो.. ये मेरे और मेरे पति के बीच की बात है..

शीला हाक़िम का गाल चूमती हुई - उर्मि अब हाक़िम मेरा भी पति है.. और हाक़िम पर मेरा भी उतना अधिकारी है जितना तेरा..

उर्मि - होगा.. किन्तु हाक़िम मुझे ज्यादा प्रेम करता है..

शीला - वो तो हाक़िम ही बता देगा..

हाक़िम शीला का बोबा पकड़कर मसलते हुए - तुम दोनों माँ बेटी हो या दुशमन? कैसे कुत्ते बिलियो जैसे लड़ती हो..

उर्मि हाक़िम का हाथ शीला के बोबे पर से हटाते हुए - लड़ाया भी तो तूमने है.. हम माँ बेटी को एकदूसरे सौतन बना दिया..

शीला हाक़िम का हाथ पकड़ कर अपने बोबे पर वापस रखवाती हुई - उर्मि हाक़िम हमारे पति के साथ साथ काबिले का सरदार भी है.. हाक़िम को खुश रखना हमारी पहली प्राथमिकता है..

हाक़िम नशे में - छोडो ना अब ये बातें.. तुम दोनों दासी के तम्बू में क्या कर रही हो...

उर्मि क्रोध से - जाकर अपनी माँ से पूछो.. जिसने हम दोनों को सरदार के तम्बू से निकाल कर यहां रहने को कहा है..

शीला - उर्मि.. मुन्नी का अधिकार हमसे पहले है हाक़िम पर.. और मुन्नी ने सिर्फ आज रात के लिए हमें यहां रहने के लिए कहा है..

उर्मि - कहा नहीं है माँ.. हुकुम सुनाया है मुन्नी मौसी ने.. हम दोनों को..

सरदार... सरदार.... बाहर से कोई आवाज डेता है हाक़िम - कौन?

मैं मंगरू सरदार...

हाक़िम हसते हुए शीला और उर्मि के बीच में पीठ के बल लेट जाता है और उनसे कहता है..

हाक़िम - लगता है मंगरू नहीं चाहता आज उसकी माँ और बहन एक साथ मुझसे चुदे..

उर्मि जोर से - क्या बात है मंगरू?

मंगरू - सरदार को मुन्नी मौसी ने सरदार के तम्बू में बुलवाया है..

हाक़िम खड़ा होने लगता है कहता है - जाकर बोल मैं आ रहा हूँ...

उर्मि हाक़िम का हाथ पकड़ कर - और हम? हाक़िम तुम आज रात हमें छोड़कर जाओगे?

शीला - उर्मि मत रोक हाकिम को.. जाने दे...

हाक़िम बारी बारी से शीला और उर्मि के होंठ चूमते हुए - आज रात की बात है.. कल से हर रात तुम्हारे नाम होगी..

हाक़िम खड़ा होकर तम्बू से बाहर निकल जाता है और अपने तम्बू में घुस जाता है..

हाक़िम जब तम्बू के अंदर घुसा तो उसने देखा कि मुन्नी बिस्तर पर बैठी हुई थी मैंने आज अपने आप को इस तरह तैयार किया था कि वह किसी दुल्हन की तरह लग रही थी और उसे देखकर कोई नहीं कर सकता था कि वह एक 38-40 साल की महिला है.. आज उसका रूप खुलकर सामने आया था और उसकी आभा इस अंधकार में रात को प्रकाश दे रही थी..

हाक़िम नशे में लड़खड़ाते हुए कदमों के साथ करने के पास आ गया और उसके पास बिस्तर पर बैठ गया..

हाक़िम प्यार से - बहुत सुन्दर लग रही हो माँ..

मुन्नी हाक़िम को देखकर मुस्कुराते हुए - तू भी तो चाँद का टुकड़ा लग रहा है..

हाक़िम अपनी टीशर्ट उतारते हुए - क्यों बुलवाया मुझे?

मुन्नी अपने हाथ से मदिरा का प्याला हाक़िम को देती हुई - एक पत्नी अपने पति को रात में अपने पास क्यों बुलाती है.. समझा नहीं आता तुम्हे? तुम्हे जो चाहिए वो देने बुलाया है..

हाक़िम प्याला लेकर एक तरफ रखते हुए - मदिरा पिने से ज्यादा आंनद तो तुम्हारे होंठ चूमने से आता है माँ..

मुन्नी हाक़िम को अपने ऊपर खींचती हुई - तो चुम ले अपनी माँ के होंठ हाक़िम.. तेरी माँ अब तेरी है..

हाक़िम मुन्नी के होंठ पर अपने होंठ रखते हुए - बहुत मीठे होंठ है माँ तेरे..

मुन्नी चूमते हुए - हाक़िम... तूने अपने होंठो से मेरे होंठ मिलाकर मेरे होंठों को अपना गुलाम बना लिया है.. तेरा इतना प्यार से चूमना मेरे अंग अंग में नई उमंग भर रहा है.. आज मेरी देह के साथ मेरा मन भी तुझे अपनाने को आतुर है.. मैं अपनेआप को तेरे कदमो में समर्पित करती हूँ हाक़िम..

हाक़िम ने टीशर्ट उतार दी थी और अब कमर से ऊपर नंगा था उसने मुन्नी की चोली खोलकर उसपर तने हुए चुचक छेड़ते हुए कहा - माँ तेरे मन की सारी व्यथा तेरी छाती पर तनकर खड़े हुए स्तन के ये दाने बता रहे है.. मैं जानता हूँ जितना मैं तुझे पाने को आतुर हूँ उतना ही तू भी मुझे अपनाने के लिए उत्सुक है.. मेरे सीने में तीर की तरह चुभते तेरे दोनों चुचक इस बात का प्रमाण है कि हमारा मिलन वासना नहीं प्रेम है.. माँ मैं आज भी बचपन की तरह तेरे इन दोनों स्तन से दूध पीना चाहता हूँ.. क्या तुम मुझे दूध पीलाओगी?

मुन्नी हाक़िम का सर पकड़कर उसके मुंह में अपना एक बोबा देती हुई - हाक़िम.. तू कबसे मुझसे पूछने लगा.. बचपन में तो भागता हुआ आकर मेरी चोली सरकाता हुआ अपना ये प्यारा मुंह मेरे स्तन से लगा देता था और मन भरके दूध पी लेता था.. आज तू अपनी माँ का दूध पिने से पहले पूछ रहा है.. हाक़िम मैं तेरी माँ हूँ मेरा दूध पिने के लिए तुझे मुझसे पूछने की क्या आवश्यकता?

हाक़िम बोबा चूसते हुए - माँ तेरे स्तन से अब अमृत की धार नहीं बहती.. लगता है तेरे छाती में दूध जम गया है..

मुन्नी हाक़िम का सर सहलाती हुई - कुछ महीनों बाद फिर से निकल आएगा मेरे बच्चे... फिर जी भरके पी लेना अपनी माँ का दूध.. तुझे कोई नहीं रोकने वाला..

हाक़िम अपने दोनों हाथों से मुन्नी के छाती के सुडोल और उन्नत उभार का मर्दन करता हुआ चूसता हुआ कहता है - माँ उस के लिए तो हमें कुछ करना पड़ेगा.. जिसमे तुम्हे दर्द झेलना पड़ेगा..

मुन्नी मुस्कुराते हुए हाक़िम के मुंह से होना बोबा निकालकर उसके होंठो पर चुम्बन करती हुई - मैं हर पीड़ा झेलने को तैयार हूँ हाक़िम.. तूने तो अपनी माँ की छाती से मुंह लगा लिया मुझे भी तेरे सीने से मुंह लगाने दे हाक़िम..

हाक़िम बिस्तर पर पीठ के बल लेट जाता और मुन्नी उसके सीने पर आकर अपनी जीभ से हाक़िम के निप्पल्स चाटने लगती है फिर अपने दोनों होंठो लगाकर ऐसे चुस्ती है जैसे हाक़िम के निप्पल्स में से दूध निकाल देगी.. हाक़िम आहे भरते हुए कामुकता से सिसकियाँ भरने लगता है और अपनी माँ मुन्नी की चुदाई कला और ज्ञान से प्रभावित होकर मुन्नी को अपने सीने के दोनों निप्पल्स चुसवाने लगता है..

हाक़िम - अह्ह्ह.. माँ खा जाओगी क्या मेरे निप्पल्स को..

मुन्नी हाक़िम के निप्पल्स चूसना छोड़कर होठो पर आते हुए - हाक़िम.. पता है जब बचपन में तुझे अपने अलग सुलाती थी तब तू हर रात वापस मेरे पास आकर मेरे ऊपर चढ़कर सो जाता था.. मुझे कितना सुख मिलता था तेरे मेरे ऊपर सोने से.. तू तब मुझे प्राण से प्रिय था और अब भी मुझे प्राण से प्रिये है...

हाक़िम मुन्नी के होंठो को चूमकर अपने पेंट खोलकर नीचे सरकाते हुए - माँ.. पुरे काबिले में तुझसे सुन्दर कोई और औरत नहीं है.. मैं बहुत पहले से तुझे पाने के स्वप्न देखता आया हूँ आज मेरा स्वप्न पूरा होगा...

मुन्नी अपना घाघरा खोलते हुए - हाक़िम.. तू मेरा पुत्र और सरदार दोनों है तेरा हर हुकुम मानना मेरा काम.. ले आज तेरी माँ तेरे आगे अपना सबकुछ हार जाना चाहती है.. आ मेरे हाक़िम.. कर ले अपनी हठ पूरी..

हाक़िम अपनी माँ मुन्नी कि चुत पर आकर उसकी चुत को करीब से देखकर सहलाता है और फिर एक नज़र अपनी माँ मुन्नी को देखकर अपने होंठ झट से मुन्नी कि गुलाबी चुत पर लगा कर चुत चाटना शुरु कर देता है..

मुन्नी - अह्ह्ह्ह... हाक़िम ये क्या कर रहा है तू.. ऐसा मत कर.. ये बुरा है.. अह्ह्ह्ह... हाक़िम... नहीं...

मुन्नी को अब से पहले चुत चटवाने का सुख नहीं मिल पाया था और अब हाक़िम उसकी चुत चाटकर उसे सुखी कर रहा था जिसे मुन्नी ऊपरी तौर से नकारते हुए अंदर ही अंदर काम सुख कि तृप्ति से भरी जा रही थी उसकी कामुकता चरम ओर थी और हाक़िम के चुत चाटने के कुछ ही मिनटों में वो किसी सुनामी कि तरह बह गई और अकड़ते हुए झड़ गई..

मुन्नी शर्म से पानी पानी होकर अपना मुंह उतरी हुई चोली से ढक्कर छिपाने लगी और हाक़िम से शर्माने लगी..

हाक़िम मुन्नी के चेहरे से चोली हटाकर उसके मुखड़े को देखता हुआ कहता है - इतनी लाज करने कि क्या आवश्यकता माँ.. अब मैं तेरा पति भी हूँ..

मुन्नी - हाक़िम तूने ये क्या किया.. वहा होंठ नहीं लगाते मगर तू लगा रहा है और मैं अपने आपे से बाहर हो रही हूँ..

हाक़िम - मैं जानता हूँ माँ तुम बहुत प्यासी हो और काम सुख से वंचित भी.. मैं तुम्हे आज पूरा तृप्त कर दूंगा..

मुन्नी - हाक़िम अब वहा होंठों से मत छूना.. मुझे लाज आएगी..

हाक़िम - छूना तो पड़ेगा माँ.. तू मेरी छुलो... मैं तुम्हारी छू लेता हूँ..

मुन्नी हैरानी से - क्या?

हाक़िम मुन्नी के ऊपर आकर 69 कि पोजीशन में आता हुआ - माँ आरम्भ करो..

मुन्नी - क्या? अह्ह्ह्ह..

हाक़िम फिर से अपनी माँ मुन्नी कि चुत को मुंह में लेकर चूसना चाटना शुरु कर देता है और मुन्नी सिसकियाँ लेते हुए हाक़िम के अपने मुंह पर लटक रहे लंड को देखने लगती है जो उसके मुंह पर खड़ा हुआ पड़ा हुआ था... मुन्नी ने चुत चटाई का मज़ा लेते हुए हाक़िम का लंड पकड़ कर बिना कुछ सोचे समझें मुंह में भर लिया और वो भी चूसने लगी..

69 में दोनों माँ बेटे एक दूसरे के गुपतांग को मुंह से मज़ा दे रहे थे.इस बार भी मुन्नी से रहा ना गया और वो झड़ते हुए हाक़िम के मुंह पर ही फारीक हो गई और उसके मुंह से हाक़िम का लंड निकल गया..

हाक़िम अपना चेहरा मुन्नी के घाघरे से साफ करके बिस्तर पर घुटनो के बल खड़ा हो जाता है और अपने सामने शर्म से लाल होकर चेहरा छुपाती अपनी माँ मुन्नी को देखता है जो किसी नई नवेली दुल्हन सी शर्म से हाक़िम के सामने नग्न होकर बैठी थी..

हाक़िम ने मुन्नी का हाथ पकड़ के अपनी तरफ खींचा और उसके बाल पकड़ कर अपने लंड पर झुकाते हुए अपनी माँ मुन्नी के मुंह में वापस अपना लंड घुसा दिया और उसे लंड चूसा दिया.. मुन्नी शर्म से हाक़िम का लंड मुंह में भरकर चूसे जा रही थी..

हाक़िम काम के सुख से अभीबूत होकर आँख बंद करके अपनी माँ से मुखमैथुन का सुख ले रहा था और उसका दिल मुन्नी पर आता जा रहा था...

हाक़िम ने थोड़ी देर अपनी माँ मुन्नी को अपना लंड चूसाने के बाद उसे लेटा दिया और उसकी चुत पर अपना लंड रगढ़ते हुए छेद पर लगा कर दबाव ड़ालते हुए अपनी माँ मुन्नी कि चुत में लंड पेल दिया..

मुन्नी दर्द और सुकून के मिश्ररित भाव से - अह्ह्ह्ह... हाक़िम... अह्ह्ह्ह... अह्ह्ह...

हाक़िम अपना आधा लंड अंदर करके - उफ्फ्फ माँ.. कितनी टाइट है तेरी चुत..

मुन्नी - अह्ह्ह्ह... हाक़िम.. धीरे करना..

हाक़िम - डाकी कि रखैल बनने के बाद भी इतनी सिकुड़ी हुई चुत..

मुन्नी - हाक़िम.. डाकी बहुत कम हाथ लगाता था मुझे.. उसे नई नई जवाँ हुई औरत ही पसंद थी..

हाकिम - तू चिंता मत कर माँ अब मैं हाथ लगाऊंगा ना तुझे..

मुन्नी ने सिसकियाँ लेते हुए हाक़िम का पूरा लंड चुत में ले लिया और हाक़िम मुन्नी के चेहरे पर दर्द और सुकून के घुले हुए भाव देखकर कामुकता से उसे मिशनरी पोज़ में चोदने लगा..

मुन्नी - अह्ह्ह.. हाक़िम आराम से.. तेरी माँ हूँ..

हाक़िम मिशनरी पोज़ अपनी माँ मुन्नी की चुत मार रहा था और मुन्नी कामुकता और मादकता के मिश्रित भाव अपने चेहरे पर लाकर सिसकियां लेते हुए अपने बेटे हाकिम से चुदवा रही थी.. दोनों के संभोग की खबर तंबू के आसपास तैनात पहरेदार को भी हो रही थी..

मुन्नी कि चुत का जादू हाक़िम पर चल गया था और वो अपनी सिसकियाँ भरती हुई माँ को देखते हुए उसकी चुत में उसीके साथ झड़ गया..

मुन्नी शर्माते हुए - और कोई हुकुम मेरे सरदार.. जो आपकी ये दासी पूरा कर सके..

हाक़िम अपनी माँ का बोबा मसलते हुए - हाँ...

मुन्नी - क्या सरदार..

हाक़िम मुन्नी को पकड़कर घोड़ी बनाते हुए - तेरी सवारी करनी है माँ..

मुन्नी अपने दोनों हाथ पीछे करके हाक़िम को देती हुई - कर लो सरदार अपनी घोड़ी की सवारी..

गौतम चुत में लंड पेलकर अपनी माँ के दोनों हाथ पकड़ लेता है और पीछे से झटके पर झटके मारने लगता है जिसकी आवाज तम्बू से बाहर जा रही थी और पहरेदार के कान में साफ साफ सुनाई पड़ रही थी..

हाक़िम ने अपनी माँ मुन्नी को इस तरह कुछ देर तक चोदा और फिर उसके हाथ छोड़ कर बाल पकड़ लिए और जोर जोर से झटके मारते हुए मुन्नी की चीखे निकाल दी जिससे बाहर खड़े पहरदार भी चीखे सुनकर कामुक हो उठे और लंड पकड़ कर हिलाने लगे...

हकीम ने इतनी जोर से झटके मारे की मुन्नी रोते हुए हाथ छोड़कर उससे विनती की कि उसे छोड़ दे और छोड़कर उसे आराम करने दे..

हाक़िम अपनी माँ को पीछे से घोड़ी बनाकर बाल पकड़ के चोद रहा था और उसकी माँ मुन्नी रोते हुए आगे हाथ जोड़कर हाक़िम से उसे छोड़ देने को कह रही थी.. मुन्नी की हालत खराब होने लगी थी और वो चुत में झटके खाते हुए आह्ह.. उह्ह्ह... करती हुई हाक़िम के सामने गिड़गिड़ा रही थी..

हाक़िम को अपनी माँ पर तरस आ गया और उसने चुत से लंड निकाल दिया और अपनी माँ को पलट दिया फिर कमर में हाथ डालकर उठा लिए और खड़ा होकर उसे लंड पर उछाल उछाल कर चोदने लगा जिसमे मुन्नी को पहले की तुलना में कम दर्द हो रहा था और वो हाक़िम के गले में हाथ डालकर उसके लंड से झटके खा रही थी...

मुन्नी शर्म के मारे आंख बंद करके सिसक रही थी और हाक़िम उसे चोदे जा रहा था..

हाक़िम तम्बू के अंदर बीच में नंगा खड़ा होकर अपनी नंगी माँ को ऐसे चोदे जा रहा था जैसे वो कोई सस्ती रंडी हो..

हाक़िम को अपनी माँ मुन्नी की चुत का नशा हो गया था उसने मुन्नी को चोदते हुए मदिरा का प्याला पी लोया औरक पल के लिए मुन्नी को बिस्तर ओर पटक दिया और प्याले में और मदिरा डालकर पिने लगा..

मुन्नी रोरही थी और सोच रही थी की उसका बेटा हाक़िम कितना बड़ा चोदू राजा है.. मुन्नी ने अपने आंसू पोंछ लिए और अपनी चुत को देखा जो पानी से गीली थी और गुलाबी से लाल होकर हलकी सूज चुकी थी...

मुन्नी समझ चुकी थी कि अगर वो यहां रहेंगी तो हाक़िम उसके रातभर चैन से नहीं सोने देगा ना ही प्यार चोदेगा.. हाक़िम पर नशा हो चूका था..

मुन्नी ने मौका देखा और अपने कपड़े हाथ में लेकर तम्बू के पीछे से चुपचाप निकल के लंगड़ाकर लचकती हुई भागने लगी.. हाक़िम ने जब अपनी माँ को तम्बू के पीछे से भागते देखा तो मुस्कुराते हुए अपनी जीन्स से सिगरेट और लाइटर लेकर चलता हुआ नंगा ही तंबू के पीछे मुन्नी के पीछे चल दिया..

मुन्नी लचकती हुई और लंगड़ाती हुई तंबू के पीछे से भागकर जंगल की तरफ भाग गई.. कुछ दूर जाने के बाद वो उसी छप्पर पर आकर एक पत्थर पर बैठ गई और कपड़े पहनने ही वाली थी हाक़िम ने मुन्नी के कपड़े छीन लिए और दूर फेक दिए..

मुन्नी - हाक़िम मैं और नहीं झेल पाउंगी तुझे.

हाक़िम सिगरेट जलाता हुआ - माँ आज रात तो मुझे झेलना ही होगा..

मुन्नी - तू मदिरा पी कर धुत है हाक़िम.. इतना जोर से करेगा तो मैं कैसे तुझे संभाल पाउंगी..

हाक़िम - अब प्यार से करूँगा माँ.. आजा..

मुन्नी ना चाहते हुए भी हाक़िम के करीब आकर खड़ी हो गई और हाक़िम ने मुन्नी के होंठो को चूमना शुरू कर दिया और इस बार उसी जगह घास में लिटा कर झटके मारने शुरू कर दिया..

मुन्नी - अह्ह्ह्ह... हाक़िम.. प्रेम से..

हाक़िम - हां माँ..

हाक़िम पीठ के बल घास में लेट गया और मुन्नी को अपने ऊपर खींचकर झटके मारने लगा..

मुन्नी हाक़िम को चूमते हुए - अह्ह्ह तू कब और कैसे इतना बड़ा बन गया रे.. मुझे तो पता ही नहीं चला..

हाक़िम चुत में झटके मारता हुआ - जामुन खाके माँ..

मुन्नी - इसी प्रेम से मुझे अपना बनाके रखेगा ना हाक़िम..

हाक़िम - हां माँ... हमेशा तुझे अपना बनाके रखूँगा..

मुन्नी - वापस चल ना हाक़िम.. यहां कोई जानवर आ जाएगा..

हाक़िम मुन्नी को लंड पर ही बैठाके वापस तम्बू की तरफ चल देता है और रास्ते में लंड पर उछाल उछाल के अपनी माँ मुन्नी को छेड़ता हुआ मज़े लेता है जीपर मुन्नी शर्म से पानी पानी होकर मुस्कुराते हुए हाक़िम के सीने में अपने मुंह छिपा लेती है..

हाक़िम मुन्नी तम्बू के पीछे से ही वापस तम्बू के अंदर ले आता है और बिस्तर में पटक के वापस मिशनरी में धीरे धीरे अपनी माँ को अपना प्रेम बताते हुए चोदने लगता है..

हाक़िम - अब तो नहीं भागेगी ना माँ..

मुन्नी - अह्ह्ह हाक़िम... इतना प्रेम से मुझे भोगेगा तो क्यों भागने लगी मैं...

हाक़िम - गलती हो गई माँ जो थोड़ा जोर लगा दिया मैं..

मुन्नी - अह्ह्ह्ह.. थोड़ा जोर.. हाक़िम तूने तो मेरे प्राण ही निकाल दिए थे.. अब वैसा मत करना..

हाक़िम - अकड़ क्यों रही है.. होने वाला है क्या माँ तेरा..

मुन्नी - हाँ हाक़िम.. अह्ह्ह्ह...

हाक़िम - मैं भी झड़ने वाला हूँ माँ...

हाक़िम और मुन्नी एकसाथ झड़ जाते है और दोनों एक दुसरे के बदन से लिपटे हुए एक दूसरे जो देखने लगते है..

हाक़िम - क्या देख रही हो माँ..

मुन्नी हाक़िम को चूमकर - तुम्हे मेरे सरदार...

हाक़िम मुन्नी को अपने ऊपर खींचकर उसके होंठो के करीब अपने होंठ लाकर उसकी साँसे अपनी साँसों से मिलाते हुए - हाक़िम.. मुन्नी का हाक़िम..

मुन्नी चूमते हुए - तूने तो खड़े होने लायक़ नहीं छोड़ा मेरे हाक़िम..

हाक़िम हसते हुए - खड़े होकर क्या करेगी माँ.. अब तो तेरे लेटने का समय है..

मुन्नी शर्म हसते हुए - धत...

सुबह सुबह की पहली किरण निकलते ही हकीम तंबू से बाहर आ गया और अंगड़ाइयां लेते हुए इधर-उधर देखने लगा उसने कबीले में सब तरफ देखा और इस मनोहर सुबह को महसूस करता हुआ टहलने लगा.. उसके सिपाही ढोला गोला बासा मंगरू मुंडा जागा पौखा सब उसे सालामी दे रहे थे..

और तुम कुछ देर घूम कर वापस अपने तंबू में आ गया और उसने देखा की मुन्नी अब भी उसी तरह प्यार से सो रही है.. उसने प्यार से मुन्नी को जगाया..

हाक़िम - सुजार चढ़ आया है माँ..

मुन्नी मुस्कुराते हुए हाक़िम को अपनी तरफ खींचकर चूमती हुई - रात को सोने नहीं दिया और अब भी सोने से मना करहा है.. बड़ा जालिम है रे तू..

हाक़िम पेंट खोलकर मुन्नी के ऊपर से चादर हटाकर उसकी चुत में लंड पेलता हुआ - सरदार को जालिम कहती हो.. सजा तो मिलेगी माँ..

मुन्नी हसते हुए - आराम से.. बहुत दर्द हो रहा है..

हाक़िम धीरे धीरे चोदते हुए - ये तो मुझे जालिम बोलने से पहले सोचना चाहिए था..

उर्मि और शीला तम्बू में आते हुए - हम भी तुम्हारी पत्नी है सरदार.. सिर्फ तुम्हारी माँ का अधिकार नहीं तुमपर..

हाक़िम दोनों को बिस्तर में आने का इशारा और मुन्नी की चुत से लंड निकालकर बिस्तर पर पीठ के बल लेट गया उसका लंड खड़ा था जिसे शीला ने आगे बढ़ कर अपने मुंह में ले लिया और मुन्नी भी शीला के साथ हाक़िम के लंड को चूसने लगी..

दोनों बहने हाक़िम के लंड को ऐसे चूस रही थी जैसे बच्चे लॉलीपॉप को..

हाक़िम ने उर्मि को अपने पास खींचते हुए उर्मि के होंठो को चुम लिया..

शीला और मुन्नी हाक़िम के दोनों आण्डों को मुंह में लेकर प्यार से चूस रही थी और अब उर्मि मुन्नी और शीला के बीच बैठकर उसके लंड को चूसने लगी..

हाक़िम मुन्नी शीला और उर्मि तीनो को अपने लंड और आंड चूसते चाटते देखकर काम के सुख से ओत प्रोत हो गया था..

और अब उसने तीनो की चुदाई एक साथ करनी शुरू कर दी..

हाक़िम अपनी माँ मौसी और बहन की चुत में ऐसा खोया कि उसे पता ही नहीं चला कब एक महीना उसे होने का आ गया..

 
अपडेट 53

सरदार... सरदार..

क्या हुआ ढोला.. सुबह सुबह क्यों आये हो? क्या बात है?

सरदार.. नदी का प्रवाह बढ़ने लगा है.. इस बार बारिश में नदी के आसपास की सारी जगह डूबने की सम्भावना है.. आस पास के काबिले अपना पड़ाव यहां से उठाकर कहीं और डालने की बात कर रहे है.. हमें भी कोई कदम उठाना होगा..

हाक़िम - ठीक है ढोला.. तुम आज काबिले का अगला पड़ाव डालने के लिए कोई और जगह देखो और रात को मुझे बताओ... कल हम यहां से अपना पड़ाव उठा लेंगे और नदी के बहाव क्षेत्र से दूर चले जाएंगे.. मंगरू को भी अपने साथ ले जाना..

ढोला - सरदार... कल पढ़ाव उठाना अशुभ होगा.. कल अमावस्या है.. और नदी का प्रवाह कभी भी असामान्य रूप से बढ़ सकता है..

हाक़िम चौंकते हुए - कल अमावस्या है?

ढोला - हाँ सरदार.. कल अमावस्या है.. और मैंने काबिले का अगला पड़ाव डालने के लिए जगह भी देख ली है जो यहां से 12 मिल दूर पूर्बमें है.. हमें आज ही यहां से अगले पढ़ाव के लिए निकलना होगा..

हाक़िम गहरी सोच में खो जाता है जिसे उस सोच से बाहर निकालते हुए ढोला आगे कहता है - क्या हुआ सरदार? किस स्वप्न में चले गए.. हमें आज ही अगले पढ़ाव के लिए निकलना होगा..

हाक़िम - ठीक है.. तुम मंगरू के साथ पुरे काबिले को कह दो कि हम अगले पढ़ाव के लिए सूरज चढ़ते ही निकलेंगे..

ढोला - ठीक है सरदार..

हाक़िम - ढोला..

ढोला - जी सरदार...

हाक़िम - मैं जागीरदार से मिलने जा रहा हूँ तुम मंगरू के साथ मिलकर पुरे काबिले को अगले पढ़ाव तक ले जाओ.. मगर ध्यान रहे.. अगले पढ़ाव पर पानी कि उचित व्यवस्था हो..

ढोला - मैं सब देख चूका हूँ सरदार.. वहा एक छोटा पानी का स्रोत है जो नदी से निकलता है और अविरल बहता है.. आप निश्चित होकर जागीरदार से मिल आइये मगर सरदार पौखा बता रहा था आज जागीरदार किसी पर हमले के लिए सेना लेकर निकल चूका है.. सरदार.. जागीरदार वीरेंद्र सिंह ने आस पास की सारी रियासत तो पहले ही जीत ली अब पता नहीं किसपर हमले के लिए सेना लेकर जा रहा है...

हाक़िम - ढोला क्या कह रहा है? ये कब हुआ?

ढोला - सरदार आप पिछले एक महीने से आपकी पत्नियों के साथ थे.. मंगरू ने आपको बताना भी चाहा मगर आपने उसे जाने को कह दिया.. मैंने भी इन गतिविधियों से आपको सचेत करने का प्रयास किया किन्तु ऐसा करने में नाकाम रहा..

हाक़िम - मतलब बैरागी...

ढोला - बैरागी की मृत्यु हो चुकी है सरदार.. अफवाह है की जागीरदार ने उसकी हत्या कर दी.. रानी सुजाता भी मारी गई..

हाक़िम सर पकड़ के बैठता हुआ - इसका मतलब.. अब मैं बैरागी से नहीं मिल पाऊंगा..

ढोला - सरदार ये आप क्या कर रहे है.. हमें अभीकुछ देर में निकलना होगा..

हाक़िम - वीरेंद्र सिंह.. उसके पास जदिबूती की सारी जानकारी होगी.. इससे पहले की जोगी उससे नर्क दिखाए.. मुझे अब उससे ही मिलकर मुझे वो जदिबूती हासिल करनी पड़ेगी..

ढोला - कोनसी जदिबूती.. और कौन जोगी सरदार..

हाक़िम - कुछ नहीं ढोला.. तुम पुरे काबिले को कह दो की पढ़ाव की जगह बदलने वाली है सब अपना सामान बाँध ले..

ढोला जाते हुए - जी सरदार..

मंगरू - आपने बुलाया सरदार..

हाक़िम - मंगरू मैं जागीरदार के पास जा रहा हूँ.. ढोला ने एक नई जगह देखी है जहाँ अगला पढ़ाव डाला जाएगा.. उर्मि के साथ माँ और मौसी सकुशल अगले पड़ाव तक पहुंच जाए ये तुम्हारा काम है..

मंगरू - जी सरदार.. मैं समझा गया.. मगर आपका जागीर जाना उचित नहीं होगा.. पौखा ने कहा है जागीरदार बदल गया है अब वो काबिले के सरदारो से नहीं मिलता..

हाक़िम - वो सब तू मुझपर छोड़ दे मंगरू.. तू बस वही कर जो मैं कहता हूँ..

मंगरू - जी सरदार..

हाक़िम काबिले से चल देता है और जागीरदार के महल के पास पहुंचते पहुंचते सूरज चढ़ आया था और महल के आस पास हाक़िम लोगों को भागता हुआ देखता है.. हर तरफ अफरा तफरी मची हुई थी.. ऐसा लगता था की लोग अपनी जान बचा के वहा से भाग रहे है..

हाक़िम जब तक महल के दरवाजे पर पंहुचा उसने देखा की वहा कोई नहीं था और हर तरफ उजाड़ और ताबही का मंजर था.. वीरेंद्र सिंह को उसने महल के हर कोने में और आस पास की हर जगह देखा मगर उसे कहीं नहीं पाया.. हाक़िम सोच रहा था की अब वो क्या करेगा? कैसे जड़ी बूटी हासिल करेगा?

हाक़िम वीरेंद्र सिंह को ढूंढ़ते हुए दुपहर की शाम कर चूका था मगर उसका कहीं पता नहीं था और अब हाक़िम यही सोच रहा था की वो वापस जाकर वीरेंद्र सिंह और बैरागी को क्या जवाब देगा?

हाक़िम अपने आप को इस सब का दोष देने लगा की वो भोग विलास में इतना डूब गया की उसे अपने लक्ष्य की याद ही नहीं रही..

हाक़िम काबिले के अगले पड़ाव की और चल दिया था की रास्ते में उसे जोगी की याद आई और वो सोचने लगा की जोगी को वीरेंद्र का पता होगा और वो वीरेंद्र सिंह को जरुर ढूंढ़कर उसे बता सकता है मगर अब जोगी उसे कहा मिलेगा? हाक़िम को उसी जगह की याद आई जागा जोगी की कुटीया थी.. हाक़िम तेज़ी से अपने कदम बढ़ाता हुआ जोगी की उस कुटिया के पास आ गया जहाँ उसने देखा की जोगी घोर विलाप के आंसू अपनी आँखों से बहा रहा है और वो जहाँ बैठा है वो मृदुला की क़ब्र थी..

हाक़िम - एक्सक्यूज़ मी अंकल...

जोगी अपनी रूआसी आँखों मी गुस्सा भरके हाक़िम की तरफ देखकर - कौन है तू और यहां क्या कर रहा है?

हाक़िम - अंकल मैं फ्यूचर.. मतलब भविष्य से आया हूँ और आपकी मदद चाहता हूँ..

जोगी - मैं तेरी कोई मदद नहीं कर सकता लड़के चला जा यहां नहीं तो मेरा क्रोध मुझे तेरे प्राण लेने पर विवश कर देगा.. चला जा अपने प्राण बचाके यहां से..

हाक़िम - देखो अंकल.. मैं चला जाऊँगा तो बहुत गलत हो जाएगा.. जिन लोगों ने मुझे यहां भेजा है उन्होंने कुछ काम देकर भेजा था मगर मैं वो काम नहीं कर पाया.. अगर वापस जाऊँगा तो मुझसे मेरा बड़ा लंड... मतलब मेरी शक्तियां छीन लेंगे और मुझे वापस दुख दर्द तकलीफ के साथ जीने को मजबूर कर देंगे.. आप प्लीज मेरी मदद करिये..

जोगी - लड़के तू मेरी बात मान और चला जा यहां से नहीं तो तेरे लिए ये घड़ी जीवन की अंतिम घड़ी हो जायेगी..

हाक़िम - मैं बिना आपसे मदद लिए नहीं जाऊँगा अंकल..

जोगी अपने क्रोध पर नियंत्रण रखते हुए - तू ऐसे नहीं मानेगी.. बता तुझे क्या चाहिए..

हाक़िम - अंकल.. वीरेंद्र सिंह का पता चाहिए..

जोगी क्रोध से - तू वीरेंद्र सिंह के साथ है? मैं तुझे जीवित नहीं छोडूंगा..

ये कहते हुए जोगी ने अपने सुला हाक़िम की तरफ फेंका मगर जोगी का सुला हाक़िम के ऊपर आकर बेअसर हो गया और जोगी हाक़िम को रहस्य की निगाहो से देखने लगा.. जोगी ने हाक़िम के गले में वही ताबिज़ देखा जो उसने बैरागी के गले में देखा था जब उसने बैरागी की क़ब्र के पास पड़ा हुआ देखा था.. और जोगी समझा चूका था की ये ताबिज़ वही है और इसके करण ही हाक़िम की रक्षा हुई है..

जोगी गुस्से में - तू वीरेंद्र सिंह को क्यों पूछ रहा है?

हाक़िम - जदिबूती के लिए..

जोगी - कोनसी जदिबूती?

हाक़िम - अरे वही जिसे खाकर वो अगले 800 सालों के लिए अमर हो गया.. मगर आपने उससे सारा भौतिक सुख छीनकर उसे धरती पर नर्क भोगने के लिए आजाद के दिया.. मैं उस जदिबूती के बारे में वीरेंद्र सिंह से पूछना चाहता हूँ जिससे मे वापस भविष्य में जा सकूँ.. और वापस भविष्य में जाकर वीरेंद्र सिंह को वही जड़ीबूटी खिला सकूँ जिससे वीरेंद्र सिंह मर कर मुक्त हो सके और बैरागी आगे आयाम पर जा सके..

जोगी - तू कैसे जानता है आज बैरागी को मैंने वीरेंद्र सिंह के सर पर बाँध दिया है..

हाक़िम आगे आते हुए - देखो अंकल... मैंने कहा मैं भविष्य से आया हूँ..

जोगी का शेर दहाड़ने लगता है..

हाक़िम - अंकल संभालो इस शेर को.. कहीं काट वात लेगा तो मैं जान और जहान दोनों से चला जाऊँगा..

जोगी - मैं तेरी मदद नहीं करूँगा लड़के.. तू जा यहां से वरना मैं तेरे गले से ये ताबिज़ निकालकर तेरी जान ले लूंगा..

हाक़िम पास आकर बैठते हुए - अंकल.. मैं जानता हूँ आपको दुख है तकलीफ है और मृदुला के जाने की बहुत पीड़ा है.. पर आपने वीरेंद्र सिंह के साथ बैरागी को भी सजा दे दी.. जो उन्होंने 300 सालों तक भोगा है.. अब और नहीं अंकल.. आप अपना गुस्सा शांत करके मेरी मदद करो अंकल...

जोगी - तू मुझसे झूठ कहता है.. तू भविष्य से कैसे आ सकता है.. भूतकाल और भविष्य पर किसका जोर चलता है..

हाक़िम - आज नहीं चलता मगर हो सकता है आगे चलकर चले.. देखो.. मैं झूठ नहीं बोल रहा है.. मेरा विश्वास करो... वीरेंद्र सिंह अब हर साधू सन्यासी और तांत्रिक के पास जाकर आपके बंधन को काटने की विद्या सीखेगा मगर उसे सफलता नहीं मिलेगी और आखिर में वो मुझे भविष्य से यहां अपने पिछले जन्म में भेजेगा..

जोगी हाक़िम के सर पर हाथ रखकर उसकी सारी यादे देखता है... और जब वापस आता है उसके मुंह से आवाज आती है - मृदुला..

जोगी - मृदुला??

हाक़िम - क्या हुआ? मृदुला... अंकल ओ अंकल.. प्लीज मुझे वीरेंद्रसिंह के पास वापस वो जदिबूती लेकर जाने में मेरी मदद करें..

जोगी - मुझे ले चल बेटा... अगले जन्म में मुझे ले चल..

हाक़िम - मुझे जड़ी बूटी लेकर जाना है अंकल... आपको लेजाकर क्या करूँगा...

जोगी - अगर तू मुझे नहीं ले जाएगा तो मैं तुझे यही समाप्त कर दूंगा.. मुझे मेरी मृदुला से मिलना है.. मैंने जाते हुए उससे वादा किया था..

हाक़िम - पर मृदुला तो आपको छोडके जा चुकी है.. आप कैसे उसे मिलोगे?

जोगी - मृदुला ने कुसुम बनकर जन्म लिया है.. और अगर तू मुझे अपने साथ लेकर नहीं गया और मुझे मेरी मृदुला से नहीं मिलवाया तो मैं तेरा काबिला समाप्त कर दूंगा...

हाक़िम - ठीक है ठीक है.. पर वीरेंद्र सिंह का क्या? बैरागी? वो कैसे मुक्त होंगे?

जोगी - तू मुझे उनके पास ले जा मैं उसका बंधन खुद ही काट दूंगा और वो मेरे बंधन से आजाद हो जाएंगे..

हाक़िम - पर मेरी शर्त है..

जोगी - क्या?

हाक़िम - मुझे ये पावर चाहिए जैसे आप सर पर हाथ रखकर सब देख लेते हो मुझे भी सीखना है..

जोगी - ये एक सिद्धि है बेटा.. अगर तू मुझे वापस ले गया तो मैं तुझे ये सिद्धि दे दूंगा..

हाक़िम - ठीक है.. कल सुबह मुझे जंगल पूर्व वाली झील पर मिलना..

जोगी - और एक बात सिर्फ मृदुला का ही नहीं मुन्नी का भी अगला जन्म हुआ है तेरे ही समकालीन..

हाक़िम - कौन?

जोगी - प्रमिला..

हाक़िम - मेरी माँ मुन्नी अगले जन्म में मेरी बुआ पिंकी है...

जोगी - हाँ... अब जा कल मैं तुझे झील के पास मिलूंगा सुबह समय से आ जाना...

*************

इतना समय क्यों लग गया तुम्हे..

हाक़िम रोते हुए - कुछ नहीं अंकल... बस ऐसे ही.. चलो उस पेड़ के नीचे आपको गाड़ना होगा फिर मैं इस झील में उतर जाऊँगा और हम दोनों अगले जन्म में पहुंच जाएंगे...

जोगी - रुको मैं खड्डा का निर्माण करता हूँ..

हाक़िम - ठीक है.. फ़ालतू मेहनत नहीं करनी पड़ेगी..

जोगी खड्डा बना देता है और उसमे बैठ जाता वही हाक़िम जोगी के ऊपर मिट्टी डालकर उसके दबा देता है और नंगा होकर रोते हुए झील में उतर जाता है..

वीरेंद्र सिंह गौतम को होश में आते देखकर - बैरागी ये देखो.. गौतम वापस आ गया है.. लगता है इसने हमारा कार्य सफल कर दिया है..

बैरागी - हुकुम पहले इसे पूरी तरफ होश में आने दो और पूछो कि क्या ये जदिबूती लाने में सफल हो भी पाया है या नहीं..

वीरेंद्र सिंह - गौतम... गौतम..

गौतम होश में आते हुए - बड़े बाबाजी.. प्रणाम..

वीरेंद्र सिंह उत्सुकता से - बोल बेटा.. क्या तुम वो जड़ी बूटी लाये हो.. क्या मेरा कार्य सफल हुआ है?

बोलो बेटा..

गौतम - जदिबूती तो नहीं ला पाया बाबाजी.. मैं जब तक महल पंहुचा सब बर्बाद हो चूका था..

वीरेंद्र सिंह क्रोध से - क्या?

बैरागी - तुमसे जो कहा गया था तुमने जरुरत उससे विपरीत कुछ किया होगा तभी ये कार्य सफल नहीं हुआ.. अब हमने हमेशा ऐसे ही रहना पड़ेगा..

गौतम - नहीं.. नहीं रहना पड़ेगा.. मैं कुछ ऐसा लाया हूँ जो बाबाजी के समस्या का समाधान करके मुक्ति दे देगा.. और तुमको भी आजाद कर देगा..

वीरेंद्र सिंह क्रोध को भूलकर ख़ुशी से - क्या? क्या लाया है जो मुझे मृत्यु दे देगा.. और मुक्त कर देगा उस अभिश्राप से..

गौतम - वो आप खुद ही पेड़ के नीचे खोद कर देख लो..

वीरेंद्र सिंह - नहीं वो तुम्हे खोदना पड़ेगा.. तभी तुम्हारी गाडी हुई चीज यहां आ पाएगी..

गौतम - ठीक चलते है.. मगर मेरी एक शर्त है..

वीरेंद्र सिंह - क्या?

गौतम - आपको मुक्ति मिलने मेरे पास जो है वो तो नहीं छीन जायेगा ना..

बैरागी - नहीं गौतम.. ऐसा कुछ नहीं होगा..

गौतम पेड़ के नीचे आते हुए - आप सच कह रहे है?

वीरेंद्र सिंह - हाँ.. सच है गौतम.. यकीन आ ये तो मैं तुझे अपनी सारी सिद्धिया और ज्ञान देकर मुक्ति लूंगा..

गौतम खड्डा खोदते हुए - ठीक है कोई पुराना मिलने वाला है आपका जिसमे में लाया हूँ..

वीरेंद्र सिंह - ऐसा कौन मेरा पुराना मिलने वाला हो सकता है जो मेरी मुक्ति कर सके..

गौतम खड्डे खोड़कर - खुद देख लो..

वीरेंद्र सिंह जोगी को देखकर उसके पैरों में गिरता हुआ - माफ़ी... माफ़ी... माफ़ी... दे दो मुझे.. मेरी गलती की माफ़ी दे दो महाराज...

जोगी - मैं तुझे मुक्ति देने ही आया हूँ वीरेंद्र सिंह..

बैरागी - मुझे भी माफ़ी चाहिए बाबा..

जोगी - तुझे नहीं मुझे तुझसे माफ़ी मांगनी चाहिए रागी... मैं इतना क्रोध में था कि मृदुला के मरने का क्रोध तेरे ऊपर भी उतार दिया.. और तुझे वीरेंद्र सिंह के साथ बाँध दिया.. लेकिन अब मैं तुम्हे इस बंधन से मुक्त करने आ गया हूँ...

गौतम - अंकल बाबाजी को मुक्त करने से पहले बाबाजी मुझे अपनी सिद्धिया देना चाहते है..

जोगी - बेटा तू प्रकृति से खिलवाड़ मत कर.. वीरेंद्र सिंह ने जो हासिल किया है वो आम विद्या नहीं है.. और ना ही तू इसे संभाल पायेगा..

गौतम - तो क्या अब आप वो सर ओर हाथ रखकर यादे देखने वाला मंतर भी नहीं सिखाओगे मुझे? मतलब आपने मुझे चुतिया बना दिया..

जोगी - मैं तुझे वो दूंगा जिसकी तुझे जरुरत है.. मगर उसकी मांग मत कर जो तेरे किसी काम का नहीं..

गौतम उदासी से - ठीक है.. अब जल्दी मुक्ति दो बाबाजी और बैरागी को.. बेचारे 300साल से लटके हुए है..

जोगी बीरेंद्र सिंह और बैरागी पर से अपने बंधन को वापस ले लेता है जिसके कारण बैरागी कि आत्मा अपने नए आयाम में चली जाती है और पुनर्जन्म के लिए आगे बढ़ जाती है वही वीरेंद्र सिंह के ऊपर से बामधन हटते ही वो फिर से एक आम इंसान बन जाता है जो 73 वर्ष का वृद्ध होता है.. मगर अब वो अपनी मर्ज़ी का खा सकता था पहन सकता था और सो भी सकता था..

वीरेंद्र सिंह हाथ जोड़ कर - मुझे माफ़ कर दो..

जोगी - अब जो हुआ उसे भूल जाओ वीरेंद्र सिंह.. तुम्हारे करण बहुत लोगों का कल्याण भी हुआ जिसका फल तुम्हे मिलेगा.. तुम चाहो तो मृत्यु को गले लगा सकते हो या कुछ और साल जीवित रहकर मन मुताबित जीवन जी सकते हो..

वीरेंद्र सिंह हाथ जोड़कर - मुंहे तो मृत्यु ही चाहिए.. बहुत तरसा हूँ मैं मृत्यु के लिए अब जीने की लालसा ख़त्म हो गई है.. मगर एक बार में विरम से मिलना चाहता हूँ और उसे अपने जाने की बात बतलाना चाहता हूँ...

जोगी - जैसा तुम चाहो वीरेंद्र सिंह.. आज तुम्हरे प्राण स्वाहा हो जायेगे...

गौतम - देखो अंकल अब चलो.. और ये भेस नहीं चलेगा.. बाबाजी आश्रम में कुछ अच्छे कपड़े होंगे?

वीरेंद्र सिंह - विरम सबकी व्यवस्था कर देगा..

गौतम जोगी को आश्रम में ले आता है और जोगी नहा कर वर्तमान के कपड़े पहन लेता है गौतम भी नहा कर नये कपड़े पहन लेता है..

गौतम - आज रात यही रहो अंकल.. कल सुबह में कुसुम से मिलवाने ले जाऊँगा आपको..

जोगी - ठीक है बेटा..

***********

तू नहीं आता वही अच्छा था.. दोपहर से मेरी चुत में घुसा हुआ है मन नहीं भरता क्या तेरा? मैं कितना झेल पाउंगी तुझे.. मेरी चुत फिर पहले जैसी कर दी तूने.. कमीने तेरी माँ हूँ थोड़ी तो शर्म कर.. जिस चुत से निकला है उसीको चोद चोद के सुजा दिया है.. पहले तेरी शकल देखकर प्यार आता था अब शर्म आती है..

गौतम मिशनरी में पेलते हुए - शर्म तो औरत का गहना होता है माँ.. तू शरमाते हुए इतनी प्यारी लगती है कि क्या कहु.. माँ जब तू चुदवाते हुए मुंह बनाती है ना दिल कि धड़कन बढ़ जाती है.. मन करता है तुझे ऐसे ही चोदता रहू..

सुमन - हां.. तू तो मुझे चोदता रहेगा मगर मेरा क्या? मुश्किल से चाल सही हुई थी तूने आते ही वापस मुझे लंगड़ी घोड़ी बना दिया.. दोपहर से बस नंगा करके लिटा रखा है.. ना खाना खाया है ना कुछ और..

गौतम चुत में झाड़ता हुआ - मतलब भूक लगी है मेरी माँ को? अभी तो रात के 10 बजे कोई ना कोई रेस्टोरेंट खुला होगा.. बाहर चलके खाते है..

सुमन गुस्से से आँख दिखाती हुई - लंगड़ी करके बाहर ले जाएगा खाना खिलाने? तूझे बिलकुल शर्म नहीं है ना.. और अब निकाल अपने लंड को मेरी चुत से बाहर.. कैसी लाल कर दी है..

गौतम लंड निकालता हुआ - ठीक है माँ.. अच्छा यही आर्डर कर लेते है रुको.. बताओ क्या खाओगी?

सुमन अपनी चुत से निकलता वीर्य साफ करते हुए - कुछ मगा ले..

गौतम - ठीक है हांडी मटन और नान मगा लेता हूँ.. रायते के साथ..

सुमन ब्रा पेंटी पहनते हुए - नहीं.. आज मंगलवार है.. तू कुछ वेज मंगा..

गौतम - मिक्स वेज कर देता हूँ चपाती के साथ.. और कुछ?

सुमन बेड से खड़ी होती हुई - नहीं..

और लचकती हुई बाथरूम चली जाती है..

हेलो बुआ?

हां मेरे बाबू..

कैसी हो?

मैं अच्छी.. तू तो टूर ओर क्या गया गायब ही हो गया.. पता नहीं कैसे निकला है ये महीना तुझसे बात किये बिना..

अब नहीं जाऊँगा बुआ.. I love you.. पता है किसी ने मुझे बताया है कि पिछले जन्म में आप मेरी माँ थी..

काश इस जन्म में भी होती मेरे बाबू..

मेरी नहीं तो क्या हुआ मेरे बच्चे ही तो हो बुआ..

कल आ रही हूँ मैं तेरे पास.. अब मिले भी ना रहा जाता मेरे बाबू..

बुआ गाँव आना.. कल गाँव जा रहा हूँ मैं..

क्यों?

बुआ कल कुसुम को बंधन में लेने वाला हूँ..

अरे पर तीन महीने बोला था ना अभी तो एक ही हुआ है..

बुआ वो नाराज़ है एक महीने उससे भी बात नहीं कि थी तो मेरा फ़ोन तक नहीं उठा रही.. लगता है मेरी शामत आने वाली है..

अरे अरे.. इतना भी क्या अपनी होने वाली पत्नी से डरना..

डरना तो पड़ेगा बुआ वो कोई आम लड़की थोड़ी है.. शैतान है उसके अंदर अगर उसे खुश नहीं रखूँगा तो मेरा पता नहीं क्या हाल करेगी वो..

ठीक है.. वो तो खुश हो जायेगी..

फ़ोन तो उठाये मेरा..

अरे तू चिंता मत कर मैं बोल देती हूँ उठा लेगी फ़ोन..

थैंक्स बुआ.. यू आर बेस्ट..

सुमन - किसका फ़ोन है?

गौतम - बुआ का.. बात करोगी..

सुमन - मैं क्या बात करूंगी.. तू कर ले..

गौतम सुमन का हाथ पकड़ कर खींचते हुए - अरे बुआ माँ बनने वाली है..

सुमन - पता है.. बताया था जगमोहन ने..

गौतम - मेरे बच्चे की...

सुमन हैरात से - क्या?

पिंकी - ग़ुगु..

गौतम फ़ोन स्पीकर पर डाल कर - बुआ माँ को सब पता है हमारे बारे में..

पिंकी - क्या कह रहा है तू.. पागल हो गया है क्या..

गौतम - लगता है खाना आ गया.. बुआ माँ से बात करो..

सुमन - पिंकी..

पिंकी - भाभी ग़ुगु की बात को सीरियस मत लेना वो मज़ाक़ कर रहा है..

सुमन - मैं सब जानती हूँ पिंकी.. अब मुझसे छिपाने की जरुरत नहीं है तुम्हे.. मुझे तेरे और गौतम के रिश्ते से कोई ऐतराज़ नहीं है..

पिंकी - भाभी क्या आप भी..

सुमन - अब मैं कुछ छिपाना नहीं चाहती तुझसे पिंकी.. मैं भी गौतम के साथ वैसे ही रिश्ते में हूँ जैसे कि तू..

पिंकी - भाभी ग़ुगु आपका बेटा है.. उसके साथ आप.. ये सही नहीं है..

सुमन - ये बात तुम कर रही हो पिंकी.. हवस में अंधी होकर अपने भतीजे के साथ सोने में तुम्हे शर्म नहीं आई और मुझे सही गलत समझा रही हो.. पिंकी मैं जानती हूँ तुम भी गौतम से बहुत प्यार करती हो.. मैं तुम्हे कुछ नहीं कहूँगी..

पिंकी - भाभी.. ग़ुगु के साथ आपका वो रिश्ता समाज के लिए पाप है.. आपने मुझे अपने बारे में बता दिया है पर आप और किसीसे इस बात का जिक्र तक नहीं करना.. कुसुम से तो बिलकुल नहीं..

सुमन - मैं अच्छे से जानती हूँ पिंकी.. मुझे किसके साथ क्या बात करनी है.. तूम उसकी चिंता मत करो..

गौतम - खाना तैयार है माँ.. आ जाओ..

सुमन - लो बात करो अपनी बुआ से..

गौतम - हाँ बुआ..

पिंकी - कमीने कुत्ते अपनी माँ के साथ ही सो गया तू.. भाभी ने सब बता दिया कैसे तूने भाभी के साथ अपना रिश्ता बनाया..

गौतम हसते हुए - बुआ अब मैं क्या करू.. आपकी तरफ माँ से भी बहुत प्यार करता हूँ..

पिंकी - अच्छा.. तो क्या भाभी को नंगा ही रखेगा घर में.. बेचारी तुझे इतना प्यार करती है और तू उनके साथ पता नहीं क्या क्या करता है.

गौतम खाना खाते हुए - आप आ जाओ ना.. बचा लो अपनी भाभी को मुझसे..

पिंकी - जल्दी आउंगी.. अब खाना खा..

गौतम - अच्छा किस्सी तो दे दो गीली वाली..

पिंकी - उम्महां... अब मिलूंगी ना भाभी के साथ मिलकर तेरा चीरहरण करूंगी.. चल बाय..

गौतम - love you बुआ..

पिंकी - love you too बाबू..

सुमन - बाय पिंकी..

पिंकी - बाय भाभी.. ज्यादा तंग करें तो एक थप्पड़ रख देना इस शैतान के..

सुमन हसते हुए - अच्छा ठीक है.. बाय...

सुमन और गौतम खाना ख़ाकर वापस बेड ओर आ जाते है..

सोने दे ना ग़ुगु..

मैं कहा रोक रहा हूँ सोने से माँ..

ऐसे छेड़खानी करेगा तो कैसे सो पाउंगी.. तू वापस शुरू हो गया.. देख सोने वरना सच में एक थप्पड़ मार दूंगी..

अच्छा ठीक है मेरी माँ.. सो जाओ..

तू कहा जा रहा है?

कहीं नहीं.. छत पर..

क्यों?

बस ऐसे ही..

नहीं जाना.. यहां आ.. मेरे पास.. सो जा तू भी..

गौतम सुमन को बाहों में भरकर लेट जाता है..

अरे अब किसका फ़ोन आ गया तेरे फ़ोन पर?

कुसुम का है माँ..

बात कर क्या कहती है..

कहेगी क्या.. मुझे ताने मारेगी..

बात तो कर..

हेलो...

बोलो?

क्या बोलू?

बुआ ने कहा तुम कुछ बोलना चाहते हो तो बोलो..

इतना गुस्से में क्यों है तू? एक महीने बात नहीं कि तो इतनी नाराज़गी?

एक महीना... तुम्हारे लिए सिर्फ एक महीना है.. पता है मेरा कितना बुरा हाल हुआ है.. रोज़ तुम्हे याद करके.. मन तो कररहा है फ़ोन में घुसकर तुम्हारा वो हाल करू कि याद रखो तुम..

अच्छा सॉरी ना कुसुम..

सॉरी.. सोरी से सब ठीक नहीं होता.. कितने फ़ोन और massage किये पर तुम हो कि.. छोडो.. जो कहना है कहो मुझे सोना है..

अकेले सोना है? मेरे साथ नहीं सोना चाहती?

मसखरी करने के लिए फ़ोन किया है? कितने बुरे तो तुम.. जरा भी अंदाजा नहीं है तुम्हे मेरे मन का.. क्या बीत रही है मेरे ऊपर.. और तुम्हे इस रात में मसखारी करनी है..

ठीक है मेरी प्यारी कुसुम.. कल आ रहा हूँ मैं तुझे लेने.. मैं भी तेरे बिना नहीं रह पाऊंगा अब...

फिर से मसखरी.. देखो ऐसा करोगे ना तो याद रखना मैं भी बहुत सताऊंगी तुम्हे..

मज़ाक़ नहीं कर रहा पागल.. सच में कल आ रहा हूँ मैं माँ को लेकर.. यक़ीन ना हो तो बात कर लो..

सुमन - हेलो कुसुम...

कुसुम - हाँ बड़ी माँ..

सुमन - गौतम मज़ाक़ नहीं कर रहा बेटा.. कल वो सच में आ रहा है.. और कल ही तेरे साथ बंधन करके तुझे अपने साथ ले आएगा..

कुसुम ख़ुशी से - सच..

गौतम सुमन से फ़ोन लेकर - और क्या मज़ाक़ कर रहा हूँ?

कुसुम - हाय.. मुझे तो लाज आ रही है..

गौतम - अभी से.. अभी तो कुछ हुआ भी नहीं..

कुसुम फ़ोन काटते हुए - छी...

सुमन मुस्कुराते हुए - बेचारी...

गौतम बिन बताये सुमन कि पेंटी सरकाकर लंड अंदर घुसाते हुए - माँ गलती से चला गया..

सुमन सिसकते हुए - अह्ह्ह.. बार बार यही गलती करता है ना तू..

गौतम - माँ गलती से अंदर फिसल गया सच्ची..

सुमन - अह्ह्ह.. बेशर्म.. अब चोद भी गलती से रहा है क्या?

गौतम - माँ.. पता नहीं.. अपने आप लंड अंदर बाहर हो रहा है..

सुमन - झूठे मक्कार.. बहाने बहाने से चुत में घुसा देता है.. कहता है गलती से हो गया. अह्ह्ह.. आराम से मदरचोद..

गौतम चोदते हुए - गाली कितनी प्यारी लगती है तुम्हारे मुहसे माँ...

सुमन - कमीने मेरा बेटा नहीं होता ना.. बहुत मार खाता तू..

गौतम - घोड़ी बनो ना..

सुमन - बाल नहीं खींचेगा..

गौतम - ठीक है..

सुमन घोड़ी बनती हुई - प्यार से कर..

गौतम चुत में ड़ालते हुए - आराम से करूँगा माँ तुझे भी मज़ा आएगा..

सुमन चुदवाते हुए - अह्ह्ह... अह्ह्ह... अह्ह्ह...

गौतम टीवी पर एक ब्लू फ़िल्म चला देता है और अपनी माँ को घोड़ी वाले पोज़ में चोदता रहता है..

सुमन - अब झड़ भी जा.. मैं कितना झेलू तुझे.. तू तो बस चोदना ही जानता है.. झड़ने का नाम ही नहीं लेता..

गौतम - माँ यार मैं क्या करू? आप जल्दी झड़ जाती हो तो.. मेरा होने में टाइम लगता है..

सुमन मिशनरी में चुदवाती हुई - एक घंटा हो गया.. जलन सूजन और अब दर्द भी होने लगा है मुझे.. और तू है कि बस..

गौतम चुत में झड़ते हुए - अच्छा बस हो गया माँ...

सुमन - अह्ह्ह... महीने भर से दूर तो बहुत याद आता था अब आ गया है तो ऐसा लगता है दूर ही अच्छा था.. कितना गन्दा चोदता है तू.. कुसुम का तो पता नहीं क्या हाल होगा.. देख... कितना सूज गई है फिर से..

गौतम - चाटकर सूजन कम करदु.. आप कहो तो?

सुमन - अब सो जा शहजादे.. कल जाना भी है गाँव...

गौतम - ठीक है माँ..

अह्ह्ह...

क्या हुआ? ठीक तो हो माँ...

कल इतना बुरा किया और पूछ रहा है ठीक हूँ या नहीं.. वापस लंगड़ी कर दिया तूने..

अच्छा सॉरी माँ.. लो आओ मैं गोद में उठाके ले चलता हूँ..

नहीं रहने दे मैं चलकर ही गाडी में बैठ जाउंगी..

गौतम सुमन को उठाते हुए - ज्यादा नखरे मत किया करो... समझी..

सुमन - अरे दरवाजा तो बंद कर दे.. और लॉक भी कर दे..

गौतम - ठीक है..

गौतम रास्ते में उसी पहाड़ी के नीचे आजाता है..

सुमन - बाबाजी के पास क्यों लाया है? गाँव जाना था ना..

गौतम किसीको फ़ोन करता हुआ - एक और आदमी है जो गाँव चलेगा..

हेलो... हाँ.. नीचे बरगद के पास.. ठीक आ जाओ...

सुमन - कौन आदमी गौतम?

गौतम - है कोई बाबाजी चाहते है बंधन के समय वो उपस्थित रहे...

सुमन - मुझसे तो कुछ नहीं कहा बाबाजी ने..

गौतम - पर मुझसे कहा था... लो वो आ गया.. कैसे हो अंकल...

किशोर जोगी को गाडी में बैठाते हुए - गौतम बड़े बाबाजी और बैरागी...

गौतम - जानता हूँ...

जोगी - बहुत तरक्की कर ली है दुनिया ने..

गौतम गाडी चलाता हुआ - हाँ अंकल..

जोगी - ये तुम्हारी माँ है..

गौतम - हाँ... आप तो सब जानते हो..

सुमन - ये कौन है गौतम?

गौतम - माँ ये बाबाजी के पापा जी है.. जो बाबाजी नहीं कर सकते वो सब ये कर सकते है.. उन्होंने बताया है कि बुआ पिछले जन्म में मेरी माँ थी.. अंकल माँ के बारे में बताओ ना कुछ.. अगले पिछले जन्म में माँ कौन थी..

जोगी - क्या करेगा ये जानकार बेटा...

सुमन - नहीं नहीं.. मुझे कुछ ऐसी पहेली बुझा दो कि ये मुझसे झूठ ना कह पाए कभी..

जोगी - तेरा बेटा जब भी झूठ बोलेगा तुझे पता चल जाएगा बेटी...

सुमन - कैसे?

जोगी - तेरा मन तुझे बता देगा..

गौतम - अंकल ऐसा मत करो... यार..

सुमन - अब बोल बच्चू...

गौतम - अंकल ठीक नहीं किया आपने.. अब आपको मृदुला से नहीं मिलवा सकता..

सुमन - कौन मृदुला?

गौतम - कुसुम पिछले जन्म में इनकी बेटी मृदुला थी.. और ये 300 साल पहले से यहां आये है..

सुमन हसते हुए - चल झूठा..

गौतम - अंकल आप ही समझा दो..

जोगी - बेटी ये सच कह रहा है...

सुमन - अच्छा..

गौतम - हाँ.. और मैं कोई टूर पर नहीं गया था.. पिछले जन्म में गया था बड़े बाबाजी के काम से..

सुमन - बड़े बाबाजी तुझसे मिले थे?

गौतम - सिर्फ मिले नहीं थे.. उन्होंने ही मुझे पिछले जन्म में भेजा था.. ताकि मैं जदिबूती लाकर उनको दे सकूँ और वो मर सके.. बड़े बाबाजी को अंकल ने ही जागीरदार से एक फ़कीर बना दिया था.. और 300 साल से बड़े बाबाजी अपनी सजा काटरहे थे..

सुमन - क्या कह रहा है ग़ुगु...

गौतम - सच कह रहा हूँ माँ.. मैं जदिबूती कि जगह अंकल को ले आया और अंकल ने बड़े बाबाजी और उनके ऊपर जो बैरागी की आत्मा थी दोनों को मुक्ति दे दी..

जोगी - और कितना समय है बेटा..

गौतम - बस आधे घंटे में पहुंच जायेंगे अंकल.. वैसे कुसुम तो आपको पहचानेगी नहीं फिर आप क्या करोगे?

जोगी - मैंने मृदुला से वादा किया था बेटा.. मैं उसे मिलने जरुर आऊंगा.. वो जैसे ही मुझे देखेगी उसे सब याद आ जाएगा..

गौतम - बैरागी भी?

जोगी - इस जन्म में उसके लिए अब तू ही बैरागी है बेटा..

सुमन - क्या बात हो रही मेरी तो कुछ समझ नहीं आता..

गौतम - आप मत समझो.. लो अंकल आ गया गाँव भी.. मिल लो आपकी मृदुला से...

हेमा - आओ बेटा... ये बहुत अच्छा फैसला किया तुमने जो बंधन जल्दी करने की हामी भर ली.. आज रात बहुत धूमधाम से सब होगा..

मानसी - आओ जमाई राजा.. बड़ा इंतजार हो रहा है तुम्हारा.. आओ सुमन..

गौतम - कुसुम कहा है?

मानसी - थोड़ा सब्र रखो जमाई राजा.. कुसुम अपने कमरे में है.. शाम को बंधन के बाद आराम से मिल लेना और ले जाना अपने साथ..

शाम को पंचायत के सामने बंधन की सारी रस्मे हो जाती है और गौतम कुसुम को पत्नी के रूप में स्वीकार कर लेता है..

कुसुम - छत ओर क्या कर रहे हो?

गौतम - किसीको मिलना है तुमसे..

कुसुम - कौन?

गौतम - तुम्हारे बाबा..

कुसुम - बाबा?

गौतम - हाँ.. देखो..

कुसुम जोगी को देखकर आंसू बहती हुई - बाबा...

जोगी - रोते हुए - मृदुला..

सुमन नीचे से ऊपर छत पर आती हुई - गौतम??

जोगी - मैंने वादा किया था ना मृदुला.. मैं तुमसे मिलने जरुर आऊंगा..

कुसुम - बाबा... आप कहा चले गए थे..

जोगी - मृदुला.. तूने व्यर्थ ही हठ करके जान गवा दी.. अगर बैरागी की बात मानकर जंगल से बाहर चली जाती तो शायद मुझे और तुझे मिलने के लिए इतना इंतेज़ार नहीं करना होता..

कुसुम - बाबा.. आप अब कहीं नहीं जाएंगे ना..

जोगी - जाना तो पड़ेगा मृदुला.. प्रकृति के नियम तोड़कर मैं यहां नहीं रह सकता मुझे वापस उस दुनिया में जाना होगा...

कुसुम - मैं भी आपके साथ चलूंगी बाबा...

जोगी कुसुम के सर ओर हाथ रखकर - नहीं मृदुला.. मैं तुझे तेरी सारी विद्या जो पिछले जन्म में तेरे पास थी उसे तुझे स्मरण करवा रहा हूँ.. अब तू साधारण नहीं है..

गौतम - ओ अंकल ये सब मत करो.. ये पहले ही मुझे बहुत तंग करती है इतना ताक़त और शक्ति पाने के बाद तो ये पागल हो जायेगी..

कुसुम हस्ती हुई - बाबा... ये बहुत मनमौजी है..

जोगी - इसका उपचार तो तू ही कर सकती है मृदुला... अब मुझे जाने दे.. अब मैं सुख से रह पाऊंगा वहा..

कुसुम गले लगते हुए - बाबा..

सुमन हैरात से - मतलब... सच में..

गौतम सुमन - और क्या मैं मज़ाक़ कर रहा था..

जोगी - अपना ख्याल रखना मेरी बच्ची...

जोगी ये कहकर जने लगता है..

गौतम - वापस जाओगे कैसे ससुर जी?

जोगी - मरने से पहले वीरेंद्र सिंह से मैंने आयामों के मध्य का रहस्य जान लिया था.. मेरे लिए वापस जाना कठिन नहीं.. लेकिन अब मेरी मृदुला की रक्षा और सुख तेरे ऊपर है बेटा..

गौतम - टेंशन मत लो.. ससुर जी..

कुसुम - बाबा.. मेरी चिंता मत करो..

जोगी जाते हुए - सुखी रह मेरी बच्ची..

जोगी के जाने के बाद..

सुमन - कुसुम सँभालना अपने गौतम को.. मुंह मारने की आदत है इसे...

कुसुम गौतम को पकड़कर उसके लंड ओर हाथ लगती हुई - आप फ़िक्र मर करो बड़ी माँ.. घर के अलावा अगर ये किसी और के साथ मुंह काला करना भी चाहेगा तो इसका सामान खड़ा नहीं होगा..

गौतम - ऐ जादूगरनी... ये फालतू का जादूगर टोना मुझे ओर मत करना समझी ना..

कुसुम मुस्कुराते हुए - जादू तो हो चूका है..

सुमन - घर की मतलब?

कुसुम - मैं आपका मन पढ़ सकती हूँ बड़ी माँ.. मैं गौतम का मन भी पढ़ सकती हूँ.. घर की मतलब घर की..

सुमन - कुसुम.. तू?

कुसुम - हाँ बड़ी माँ.. आप और बुआ सब..

गौतम - और भाभी..

कुसुम - हम्म भाभी भी घर की है..

गौतम कुसुम और सुमन को बाहों में भरकर - मतलब दोनों दुल्हन आज मेरे साथ.....


*******************

एक जोर का थप्पड़ सो रहे गौतम के गाल पर पड़ता है....

गोतम नींद से जागता हुआ - हा.... क्या.. क्या हुआ..

सुमन गुस्से में - खड़ा हो जा.. कब तक सोता रहेगा.. ऊपर से नींद में अनाप शनाप बोले जा रहा है... जल्दी से तैयार हो जा... आज बाबाजी के जाना है.. तेरे पापा भी आज जल्दी थाने चले गए..

गौतम. - ये पुलिस क्वाटर?

सुमन - तो और क्या महल में रहता है तू... उठा जा.. और ये सपने देखना बंद कर...

गौतम - मतलब ये सब सपना था...

सुमन गुस्से से - ओ सपनो के सौदागर... उठता है या और एक जमाउ तेरे गाल पर... बस सपने ही देखता रहता है दिन रात...

गौतम सोच रहा था की कितना हसीन सपना था.. जिसमे उसकी सारी ख्वाहिश और इच्छाएं पूरी हो रही थी.. वो उठकर बाथरूम में चला जाता है और आम दिनों की तरह मुट्ठी मारके नहाता है और फिर अपना कीपेड फ़ोन उठाकर अपनी माँ सुमन को उसी पुरानी और बाबा आदम के जामने की बाइक जिसे उसके बाप जगमोहन ने दिलवाया था उसपर बैठाकर बाबाजी के चल पड़ता है..

गौतम उदासी से - पेट्रोल नहीं है..

सुमन - 500 का नोट देती हुई.. डलवा ले..

गौतम 200 का पेट्रोल डलवा कर 300 जेब में डाल लेता है और सुमन को बाबाजी के पास उसी पहाड़ी के नीचे बरगद के पास ले आता है..

सुमन - चल ऊपर..

गौतम - नहीं जाना आप जाओ..

सुमन - सुबह से देख रही हूँ जब से जागा है अजीब बर्ताव कर रहा है.. क्या बात है..

गौतम कुछ नहीं... आप जाओ मैं यही इंतेज़ार कर लूंगा..

सुमन - ठीक है तेरी मर्ज़ी पर यही मिलना.. समझा..

सुमन चली जाती है और गौतम के फ़ोन ओर आदिल का फ़ोन आता है..

आदिल - क्या कर रहा था रंडी?

गौतम - नींद में तेरी अम्मी शबाना को चोद रहा था..

आदिल - अबे लोड़ू.. फालतू बात मत कर..

गौतम - तो बोल ना रंडी के क्या बात है..

आदिल - रांड चोदने चलेगा रात को..

गौतम - पैसे तू दे तो चल...

आदिल - आज तक कौन तेरा बाप ठुल्ला दे रहा था.. रात को 7 बजे घर आ जाना..

गौतम - ठीक है गांडू... फ़ोन कट हो जाता है...


गौतम मन में - कितना हसीन सपना था यार... काश वो सब सच होता...
 
चोदू शायर के कुछ दोहे..

खाके गोली सेक्स की, चोदे माँ को बाप;

बेटा देखे छेद से, पकड़कर अपना सांप;

अंगड़ाई लेकर आह भरे, रहे माँ बेचैन;

बेटे से ही चुद गई, जब मिले नैन से नैन;

दुनिया का दस्तूर है, मानो मेरी बात;

बहन के साथ काट लो, सर्दीयों की रात;

नयी पीढ़ी से मिल रही, दर्द भरी सौगात;

बेटा कहता माँ से, तू चोदुँगी सारी रात;

पानी आँखों का मरा, मरी शर्म औ लाज;

कहे भाई अब बहन से, मुंह में लेले आज;

भाई भी करता नहीं, भाई पर विश्वास;

भाई से बात बंद है, भाभी खासमखास;

सुबह में पूजा करें, दिन में करें कलेश;

रात को बेटे से चुदके, माँ करती है ऐश;

बचे कहाँ अब शेष हैं, दया, धरम, ईमान;

बेटे लंड पर बैठाकर, अब माँ को देते ज्ञान;

घर में ही अब टूट रही, बहनो के छेद की सील;

माँ भी बेटे से चुद कर, इंस्टा पर बनती रील;

फैला है पाखंड का, अन्धकार सब ओर;

माँ को चोदो पटक पटके, मचा-मचा कर शोर;

पहन मुखौटा धरम का, करते दिन भर पाप;

भाई ही ले लेते है, बहनो की चुत का नाप
 
अगली कहानी किस पर लिखू?

Incest me mom son yaa bhai bahan

Adultery

Romantic

Horror

Fantasy

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भाभी देवर वाली स्टोरी किसी रहेगी रोमांस में?
 
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