#221.
नीली अंगूठी: (25.01.2002, शुक्रवार, होटल ग्रैण्ड होम, न्यूयार्क, अमेरिका)
आकृति इस समय न्यूयार्क के होटल ग्रैण्ड होम के सुइट रुम में विक्रम के साथ रुकी थी। विक्रम इस समय दूसरे कमरे में आराम कर रहा था और आकृति ड्रांइगरुम में सोफे पर लेटी हुई अपनी पिछली जिंदगी के
बारे में सोच रही थी।
आकृति को वेदालय के समय से सिर्फ और सिर्फ आर्यन से ही प्यार था, पर शलाका के उसकी जिंदगी में आने के बाद से आर्यन का आकृति के प्रति झुकाव कम होता गया। अतः वेदालय की पढ़ाई समाप्त होने के बाद आर्यन ने आकृति के स्थान पर शलाका को अपने लिये चुना।
कुछ दिन बाद आकृति को पता चला कि आर्यन ने शलाका से विवाह कर लिया है और वह उसके लिये ब्रह्मलोक से अमृत लाने गया है।
आकृति के लिये यह सुनहरा मौका था आर्यन की लिखी पुस्तक वेदांत
रहस्यम को चुराने का।
आकृति जानती थी कि अगर उसके हाथ वेदांत रहस्यम लग गई तो वह आर्यन को कैसे भी उससे विवाह करने के लिये मना लेगी? यही सोच आकृति ने सुर्वया से कहकर अपने चेहरे पर एक दिन के लिये शलाका का रुप चढ़वा लिया।
अब आकृति, शलाका की अनुपस्थिति में उसके घर पहुंच गई, पर वह अभी वेदांत रहस्यम् को ढूंढ ही रही थी कि तभी वहां आर्यन अमृत लेकर आ गया।
आर्यन ने आकृति को शलाका समझकर प्यार किया। उस रात आकृति, आर्यन को धोका देना नहीं चाह रही थी...वह बताना चाह रही थी कि वह शलाका नहीं बल्कि आकृति है, परंतु आर्यन के प्यार के अहसास तले वह बहती चली गई।
अगली सुबह आकृति ने अमृत को पी लिया, परंतु अमृत पीते ही आर्यन को आकृति की सच्चाई पता चल गई और वह क्रोधित हो गया, परंतु आकृति वहां से मौका पाकर भाग निकली।
आर्यन के पास से लौटकर जब आकृति दोबारा सुर्वया से अपना रुप प्राप्त करने वापस पहुंची, तो उसे पता चला कि अब वह कभी भी आकृति के रुप में नहीं आ सकती, क्यों कि उसने शलाका के रुप में अमृतपान कर लिया था। इसकी वजह से गुस्सा होकर आकृति ने सुर्वया को अपने जादुई दर्पण में कैद कर लिया।
इस घटना के नौ माह के बाद आकृति ने एक सूर्य के समान तेजस्वी बालक को जन्म दिया, पर एक रात आर्यन गुस्से में आकृति के पास आया और उसके पुत्र को लेकर कहीं चला गया?
उस घटना के 5000 वर्ष बीत जाने के बाद भी, आकृति को कभी आर्यन, शलाका या उसका पुत्र दिखाई नहीं दिया।
आकृति ने यह समझ लिया कि आर्यन और शलाका उसके पुत्र को किसी को देकर मर चुके हैं?
इसके बाद आकृति ने अपने पुत्र को ढूंढने की अनेकों कोशिशें की लेकिन वह सफल न हो सकी।
अब अमरत्व को प्राप्त कर चुकी आकृति पूरी पृथ्वी पर अपने अमरत्व का अभिशाप लिये हजारों वर्षों तक भटकती रही। इन हजारों वर्षों में आकृति ने बहुत सी छोटी-छोटी शक्तियों को प्राप्त किया।
हजारों वर्षों के बाद एक दिन मकोटा ने आकृति को देख लिया। चूंकि आकृति का चेहरा शलाका से मिल रहा था, इसलिये मकोटा आकृति को लेकर अराका द्वीप पर आ गया।
अराका पर आने के बाद आकृति को पता चला कि शलाका अराका द्वीप की देवी थी। आकृति, शलाका को मरा समझ मकोटा के बताए निर्देशों पर चलने लगी, परंतु उसने कभी भी मकोटा को अपने सत्य के बारे में नहीं बताया।
आकृति ने सुर्वया को अभी तक अपने साथ रखा था। एक दिन सुर्वया के माध्यम से आकृति को सुयश के बारे में पता चल गया।
सुयश की शक्ल हूबहू आर्यन से मिलती थी, यह देख आकृति हैरान हो गई, परंतु वह अब मकोटा के दिये नीलदंड और सुर्वया की दिव्यदृष्टि के माध्यम से लगातार सुयश पर नजर रखने लगी।
फिर एक दिन आकृति को रोजर का हेलीकॉप्टर अराका द्वीप के ऊपर उड़ता दिखाई दिया। हेलीकॉप्टर के क्रैश होने के पहले ही आकृति ने अपनी शक्तियों से रोजर को बचा लिया।
बाद में उसने रोजर को सुनहरे मानव का रुप देकर सुप्रीम को भटकाने की कोशिश की।
कुछ दिन बाद जब सुप्रीम भी तबाह हो गया तो सुयश कुछ अन्य लोगों के साथ अराका द्वीप पर आ गया। तभी एक दिन सुयश पर नजर रखते हुए आकृति को हनुका का सिंहासन दिखाई दिया।
यहां से आकृति को एक नई कहानी का पता चला कि सुयश ही पूर्वजन्म का आर्यन है। आकृति को पता था कि शलाका अब मर चुकी है, इसलिये वह एक बार फिर अपना आकृति वाला रुप पाने के लिये बेचैन हो उठी।
तभी एक रात तौफीक ने एक पेड़ की कोटर में छिपी वेदांत रहस्यम् को ढूंढ लिया और उसके आखिरी पेज पर बनी आकृति की आँखें छूकर वह आकृति के पास पहुंच गया।
उस दिन आकृति को यह भी पता चल गया कि आर्यन ने उसके पुत्र को मारा नहीं था, अपितु एक काँच के अष्टकोण में छिपाकर जमीन के नीचे छिपा दिया था और इसका रहस्य अब सिर्फ वेदांत रहस्यम् में ही था।
यह देख आकृति वेदांत रहस्यम् पाने के लिये तौफीक को लेकर सुयश के पास पहुंच गई और जब सबकुछ सही होने वाला था कि तभी एक बार फिर शलाका ने आकृति की जिंदगी में आकर उसका सारा खेल बिगाड़ दिया।
अब आकृति जान गई थी कि शलाका अभी तक जीवित है और उसके रहते वह कभी भी सुयश के साथ विवाह नहीं कर सकती। इसलिये आकृति सही मौके का इंतजार करने को सोच वहां से वापस आ गई।
अब सुर्वया के माध्यम से उसे पता चला कि अगर वह सुनहरी हिरनी से उसकी कस्तूरी छीनकर, उसे पीसने के बाद अपने चेहरे पर मले, तो उसका आकृति वाला रुप फिर से वापस आ सकता है।
यह जानने के बाद आकृति, सुनहरी हिरनी बनी मेलाइट को पकड़कर अराका ले आई और उसे भी रोजर व सुर्वया की भांति एक कमरे में बंद कर दिया।
इसके बाद आकृति को एक रहस्य की बात पता चली कि यदि वह देवराज को खुश कर दे, तो उनके आशीर्वाद स्वरुप वह इस जन्म में सुयश को अपने साथ विवाह के लिये तैयार कर सकती है।
इसलिये आकृति ने देवराज इंद्र की हजारों वर्षों पहले खोई दिव्य तलवार व सुनहरी ढाल को उन्हें सौंपने का प्लान बनाया।
यह वही दिव्य तलवार व ढाल थी, जिसे इंद्र ने दैत्यराज वृत्रा को हराकर उससे छीनी थी।
दैत्यराज वृत्रा उस समय का एकमात्र ड्रैगन सर्प था, जिसने उस युद्ध में इंद्र का जबड़ा भी तोड़ दिया था। इंद्र ने वह तलवार अपने अद्भुत शौर्य के प्रदर्शन के रुप में अपने पास रखी थी।
वरदान के बारे में सोच आकृति ने इंद्र की दिव्य तलवार को ढूंढकर अपने कमरे में टांग दिया और इंद्र की सुनहरी ढाल विल्मर से छीनने के लिये सनकिंग जहाज पर जा पहुंची।
आकृति ने जहाज पर पहुंचकर जहाज पर मौजूद एक लड़की क्राउली का रुप धारण कर लिया। उसके बाद उसने विल्मर से सुनहरी ढाल तो छीन ली, पर जैसे ही वह वापस अराका द्वीप पर आने चली कि तभी मकोटा ने अपना नीलदंड वापस उससे छीन लिया।
तभी आकृति को बर्फ के गोले में बंद विक्रम मिला, जो अपनी स्मृतियां खो चुका था।
आकृति ने स्वयं को वारुणि बताया और विक्रम को एक नीली अंगूठी पहना दी, जिससे वारुणि अपनी मानसिक तरंगों से विक्रम को ढूंढ ना सके। फिर वह विक्रम को लेकर न्यूयार्क आ पहुंची।
पर एक दिन जब वह मामा सूशी रेस्टोरेंट में विक्रम के साथ बैठी थी, कि तभी उसे फिर से शलाका दिखाई दी। शलाका को देखकर आकृति रेस्टोरेंट में ही एक स्थान पर छिप गई।
पर विक्रम ने शलाका को देख लिया और उसे आकृति समझ वारुणि कहकर संबोधित करने लगा। पर शलाका उस समय पता नहीं क्यों कुछ जल्दी में थी? वह एक अंजान व्यक्ति के साथ जैसे ही वहां से हटी,
आकृति, विक्रम को लेकर वापस एक सुनसान से पार्क में पहुंच गई। जहां पर कोई कैमरा नहीं लगा था।
फिर शाम को वह विक्रम को लेकर वापस होटल में आ गई, पर आकृति अब ज्यादा देर नहीं करना चाहती थी, वह तो जल्दी से जल्दी वापस अराका पहुंचकर तलवार व ढाल को देवराज इंद्र के हवाले कर उनसे आशीर्वाद प्राप्त करना चाहती थी।
अब आकृति अपनी सोचों से बाहर आ गई। पर आकृति के पास इस समय विक्रम के अलावा कोई और ऐसा साधन नहीं था, जिसके माध्यम से वह अराका द्वीप पर वापस जा सके? इसलिये जल्दी-जल्दी उसने एक नई कहानी गढ़ना शुरु कर दिया।
कुछ ही देर में आकृति ने एक नई कहानी को रच लिया था। कहानी बनाने के बाद वह सोफे से उठी और विक्रम के कमरे में प्रवेश कर गई।
विक्रम इस समय अपने बिस्तर पर बैठा, अपने हाथ की नीली अंगूठी को उतारकर उसे देख रहा था।
विक्रम के हाथ की अंगूठी को निकला देख एक पल के लिये आकृति सिहर उठी।
“अरे-अरे! यह क्या कर दिया?” आकृति ने घबराते हुए कहा- “मैंने तुम्हें कहा था कि ये अभिमंत्रित अंगूठी है और तुम्हें इसे 10 दिनों तक अपने हाथ में ही पहन कर रखना होगा।” यह कहकर आकृति ने बेड पर बैठते हुए विक्रम को वापस अंगूठी पहना दी।
“लगता है तुम्हें याद नहीं है वारुणि, पर मुझे इस अंगूठी को पहने आज 10 दिन हो गये।” विक्रम ने आकृति को देखते हुए कहा- “और मुझे नहीं लगता कि मुझे अब इस अंगूठी की कोई आवश्यकता है....मैं इस समय बिल्कुल स्वस्थ महसूस कर रहा हूं।” यह कहकर विक्रम ने दोबारा से अंगूठी उतारी और उसे आकृति के
हाथों में पकड़ा दिया।
“लगता है कि अब विक्रम नहीं मानने वाला...पर इससे पहले कि वारुणि इससे सम्पर्क करने की कोशिश करे, मुझे विक्रम को लेकर किसी भी हाल में अराका जाना ही होगा।” वारुणि ने मन ही मन सोचा और विक्रम को नई कहानी सुनाने की तैयारी करने लगी।
पता नहीं कि अब आगे क्या होना था? पर नियति ने शायद विक्रम का अराका पर जाना तय कर दिया था।
जारी रहेगा_____
