Doctor Maa ke Sath Sambandh - SexBaba
  • From this section you can read all the hindi sex stories in hindi font. These are collected from the various sources which make your cock rock hard in the night. All are having the collections of like maa beta, devar bhabhi, indian aunty, college girl. All these are the amazing chudai stories for you guys in these forum.

    If You are unable to access the site then try to access the site via VPN Try these are vpn App Click Here

Doctor Maa ke Sath Sambandh

hotaks

Administrator
Staff member
Joined
Dec 5, 2013
Messages
31,768
पेश है आपके सामने एक नयी कहानी
 
शहर के एक पॉश इलाके में एक छोटा लेकिन बहुत ही सलीके से सजा हुआ प्राइवेट क्लिनिक है। बाहर बोर्ड पर लिखा है— "डॉ. अंजलि, एम.डी. (General Physician)"।

अंजलि की उम्र 42 साल है, लेकिन उसे देखकर कोई कह नहीं सकता। योग और अनुशासन ने उसके शरीर को एक तराशा हुआ रूप दिया है। उसकी त्वचा अभी भी मखमली है, और जब वह सफेद एप्रन पहनती है, तो उसकी शख्सियत में एक अजीब सा आकर्षण और अधिकार (Authority) झलकता है। वह एक डॉक्टर होने के साथ-साथ एक माँ भी है, जो अपने घर और करियर को अकेले संभाल रही है।

उसका पति, जो विदेश में एक बड़ा कॉन्ट्रैक्टर है, साल में मुश्किल से एक या दो बार ही घर आता है। पैसों की कोई कमी नहीं है, लेकिन अंजलि के बिस्तर में पिछले कई सालों से एक ठंडी खामोशी पसरी हुई है। एक जवान और खूबसूरत औरत के शरीर की ज़रूरतें अक्सर उसके डॉक्टर वाले एप्रन के नीचे दबी रह जाती हैं।

उसका बेटा, आर्यन, अब 19 साल का हो चुका है। वह कॉलेज में है और दिखने में बिल्कुल अपने पिता जैसा गठीला और लंबा है। आर्यन अक्सर अपनी माँ के क्लिनिक पर हाथ बटाने या बस वक्त बिताने चला आता है।

दोपहर के दो बज रहे हैं। क्लिनिक में आखिरी मरीज जा चुका है। बाहर धूप तेज़ है और क्लिनिक के अंदर एसी की ठंडी हवा एक अजीब सा सुकून दे रही है। अंजलि अपनी केबिन में बैठी कुछ फाइल्स देख रही है। सफेद शर्ट के ऊपर डॉक्टर का कोट है, और उसने अपने बालों को एक जूड़े में बांध रखा है जिससे उसकी लंबी और गोरी गर्दन साफ चमक रही है।

तभी केबिन का दरवाज़ा धीरे से खुलता है और आर्यन अंदर कदम रखता है। क्लिनिक अब पूरी तरह खाली है, सिर्फ माँ और बेटा इस ठंडे और शांत माहौल में अकेले हैं।

आर्यन केबिन के अंदर आता है और अपनी माँ के सामने वाली कुर्सी पर आराम से धंस जाता है। अंजलि अपनी फाइलें एक तरफ रखती है और चश्मा उतारकर अपनी मेज पर रख देती है। उसकी आँखों में थकावट तो है, लेकिन बेटे को देखकर एक सुकून भरी चमक आ जाती है।

"बड़ी देर कर दी आज? कॉलेज में कोई एक्स्ट्रा क्लास थी या फिर दोस्तों के साथ कहीं निकल गया था?" अंजलि ने अपनी कुर्सी के पीछे टेक लगाते हुए पूछा।

आर्यन मुस्कुराया, "नहीं माँ, बस वो प्रोजेक्ट सबमिट करना था। और वैसे भी, बाहर इतनी गर्मी है कि कहीं जाने का मन ही नहीं हुआ। सोचा आपके साथ ही घर चलूँगा।"

अंजलि ने घंटी बजाकर अपने अटेंडेंट को दो कप चाय लाने का इशारा किया। अगले कुछ मिनटों तक उनके बीच कॉलेज के प्रोफेसरों, असाइनमेंट के बोझ और आर्यन के दोस्तों की शरारतों पर बातें होती रहीं। अंजलि एक माँ की तरह उसकी बातें सुन रही थी, बीच-बीच में उसे टोकती और कभी-कभी उसकी किसी बात पर खिलखिलाकर हँस पड़ती।

बातों-बातों में ज़िक्र विदेश में बैठे आर्यन के पिता का चल पड़ा।

"आज पापा का फोन आया था सुबह," अंजलि ने चाय का कप उठाते हुए कहा। "कह रहे थे कि इस बार कॉन्ट्रैक्ट कुछ ज़्यादा ही बड़ा मिल गया है। शायद दिवाली पर भी उनका आना मुश्किल हो।"

आर्यन के चेहरे पर थोड़ी मायूसी आई। "पापा हमेशा काम में ही उलझे रहते हैं। आपको नहीं लगता माँ कि उन्हें अब वापस आ जाना चाहिए? आखिर कब तक हम ऐसे अलग-अलग रहेंगे? आपको उनकी कमी महसूस नहीं होती?"

अंजलि चाय की चुस्की लेते हुए कुछ पल के लिए खामोश हो गई। उसकी नज़रें खिड़की से बाहर की धूप पर टिकी थीं। "बेटा, ज़िम्मेदारियाँ इंसान को बहुत दूर ले जाती हैं। कमी तो खलती है, पर अब आदत सी हो गई है। खैर, तू बता... शाम के खाने में क्या बनवाना है? आज तेरा मनपसंद मलाई कोफ्ता बनवाऊँ?"

आर्यन अपनी माँ के चेहरे को गौर से देख रहा था। उसे महसूस हुआ कि माँ की इस सादगी और मुस्कुराहट के पीछे एक अकेलापन है जिसे वो कभी ज़ाहिर नहीं होने देतीं। वे दोनों काफी देर तक खाने के मेनू, घर की साफ-सफाई और आने वाले संडे के प्लान्स पर चर्चा करते रहे।

पूरे क्लिनिक में सिर्फ उन दोनों की आवाज़ें गूँज रही थीं। कोई हड़बड़ी नहीं थी, बस एक लंबा और गहरा संवाद था जो माँ-बेटे के बीच के उस मज़बूत धागे को दिखा रहा था,

केबिन की खिड़की से बाहर का आसमान अब गहरा नारंगी होने लगा था। दिन भर की तपिश अब हल्की ठंडी हवा में बदल रही थी। अंजलि ने अपनी मेज पर रखी आखिरी फाइल बंद की और उसे दराज में रख दिया। उसने अपनी कलाई घड़ी देखी—साढ़े छह बज चुके थे।

"चलो आर्यन, अब निकलना चाहिए। आज वैसे भी क्लिनिक में काफी देर हो गई," अंजलि ने उठते हुए कहा। उसने अपना सफेद डॉक्टर वाला एप्रन उतारा और उसे पीछे टंगे हैंगर पर बड़े करीने से टांग दिया। एप्रन हटने के बाद उसकी नीली रेशमी कुर्ती और सफेद ट्राउज़र उसके व्यक्तित्व को एक अलग ही कोमलता दे रहे थे।

आर्यन भी कुर्सी से उठा और अपना बैग कंधे पर लटका लिया। "हाँ माँ, चलिए। मुझे भी भूख लगने लगी है।"

अंजलि ने अपना हैंडबैग उठाया और एक बार कमरे का मुआयना किया कि कहीं कोई लाइट या एसी खुला तो नहीं रह गया। वह अपनी चीज़ों को लेकर हमेशा बहुत अनुशासित रहती थी। जब वे केबिन से बाहर निकले, तो गलियारे में हल्की छाया थी। अटेंडेंट पहले ही जा चुका था, इसलिए पूरा क्लिनिक अब सिर्फ उन दोनों के कदमों की आवाज़ से गूँज रहा था।

"आज तुम ड्राइव करोगे या मैं करूँ?" अंजलि ने क्लिनिक के मुख्य दरवाजे का ताला लगाते हुए पूछा। चाबियों का गुच्छा उसके हाथ में खनका, जिसकी आवाज़ उस शांत शाम में साफ सुनाई दी।

"मैं ही करूँगा माँ, आप थक गई होंगी दिन भर पेशेंट्स देख-देख कर," आर्यन ने चाबियाँ अपनी ओर बढ़ाने का इशारा किया। अंजलि ने मुस्कुराते हुए चाबियाँ उसे थमा दीं।

वे दोनों सीढ़ियों से नीचे उतरकर पार्किंग की ओर बढ़े। पार्किंग लॉट में अब सिर्फ अंजलि की सफेद सेडान खड़ी थी। शाम की हल्की रोशनी कार के कांच पर चमक रही थी। आसपास के पेड़ों से पक्षियों के चहचहाने की आवाज़ें आ रही थीं।

गाड़ी के पास पहुँचकर आर्यन ने रिमोट से लॉक खोला। बीप-बीप की आवाज़ हुई। अंजलि पैसेंजर सीट की तरफ गई और अपना बैग पीछे वाली सीट पर रखा। गाड़ी के अंदर बैठने से पहले उसने एक बार गहरी सांस ली और ढलते सूरज को देखा।

"आज की शाम कितनी शांत है न, आर्यन?" उसने धीरे से कहा।

आर्यन ने ड्राइवर सीट पर बैठते हुए जवाब दिया, "हाँ माँ, बहुत। बस अब जल्दी घर पहुँचकर हाथ-मुँह धोकर चाय पीते हैं।"

अंजलि कार में बैठी और दरवाजा बंद किया। वह भारी दरवाजा बंद होने की आवाज़ उस खामोश पार्किंग में एक अंत की तरह गूँजी—जैसे आज का कामकाजी दिन खत्म हो गया हो। आर्यन ने इंजन स्टार्ट किया, हेडलाइट्स जलाईं और गाड़ी धीरे-धीरे क्लिनिक के गेट से बाहर निकलकर मुख्य सड़क की ओर बढ़ चली।

गाड़ी अब शहर की मुख्य सड़क पर थी, जहाँ शाम के ट्रैफिक की पीली लाइटें और शोर-शराबा शुरू हो गया था। केबिन के अंदर एक तरफ इंजन की दबी हुई आवाज़ थी और दूसरी तरफ एसी की हल्की सी सरसराहट। आर्यन का पूरा ध्यान सड़क पर था, और अंजलि बगल वाली सीट पर आराम से सिर टिकाए बाहर भागती रोशनी को देख रही थी।

"आर्यन..." अंजलि ने धीमे से चुप्पी तोड़ी, "मलाई कोफ्ता का तो तूने दोपहर में कहा था, पर मुझे लग रहा है कि साथ में कुछ ताज़ा सब्जियाँ भी होनी चाहिए। फ्रिज में तो बस वही दो-चार सूखी हुई भिंडियाँ पड़ी हैं।"

आर्यन ने गियर बदलते हुए हल्का सा सिर हिलाया, "माँ, आप जैसा कहो। वैसे भी बाहर का खाना खा-खा कर मैं बोर हो गया हूँ। आपके हाथ का बना सादा खाना ही बेस्ट होता है।"

अंजलि मुस्कुराई, "चापलूसी करना तो कोई तुझसे सीखे। अच्छा सुन, यहाँ से जो अगला मोड़ है, वहाँ से गाड़ी मार्केट की तरफ घुमा ले। पास ही में वो जो नया 'मार्ट' खुला है ना, वहीं चलते हैं। वहां सब्जियाँ एकदम फ्रेश मिल जाती हैं और थोड़ा घर का दूसरा राशन भी देखना है।"

आर्यन ने इंडिकेटर दिया और गाड़ी को मार्केट वाली लेन में डाल दिया। शाम का वक्त था, इसलिए बाज़ार में काफी चहल-पहल थी। लोग अपने थैले लिए इधर-उधर घूम रहे थे।

"माँ, आपको नहीं लगता कि आप दिन भर क्लिनिक में थकने के बाद ये सब काम खुद करके अपनी थकावट बढ़ा लेती हो?" आर्यन ने चिंता जताते हुए कहा, "आप मुझे लिस्ट दे दिया करो, मैं कॉलेज से आते वक्त ले आया करूँगा।"

अंजलि ने प्यार से आर्यन की तरफ देखा, "अरे बुद्धू, ये गृहस्थी के काम थकावट नहीं, बल्कि मन को सुकून देते हैं। दिन भर मरीज़ों की बीमारी और उनकी परेशानियों को सुनने के बाद, शाम को ताज़ा टमाटर और पालक चुनना मेरे लिए एक तरह की थेरेपी जैसा है। और फिर, तेरे साथ इसी बहाने थोड़ी और बातें भी तो हो जाती हैं।"

गाड़ी अब मार्ट की पार्किंग में पहुँच चुकी थी। आर्यन ने एक खाली जगह देखकर गाड़ी वहां सलीके से खड़ी कर दी। इंजन बंद होते ही एक पल के लिए केबिन में गहरा सन्नाटा छा गया।

"अच्छा चल, तू यहीं गाड़ी में बैठना चाहेगा या अंदर चलेगा मेरे साथ?" अंजलि ने अपना पर्स संभालते हुए पूछा।

आर्यन ने मुस्कुराकर दरवाजा खोला, "अकेले आपको इतने सारे थैले थोड़े ही उठाने दूँगा। चलिए, आज आपकी पसंद की सब्जियाँ मैं उठवाता हूँ।"

अंजलि अपनी सीट से उतरी और गाड़ी का दरवाज़ा बंद करते हुए बोली, "ठीक है, फिर जल्दी चल। वरना अच्छी सब्जियाँ तो लोग छाँट कर ले जाएँगे, हमारे हिस्से में बस डंठल ही बचेंगे।"

शाम की हल्की ढलती रोशनी में माँ-बेटा उस जगमगाते हुए मार्ट की ओर बढ़ गए। क्लिनिक की थकान अब धीरे-धीरे एक आम घरेलू शाम की व्यस्तता में बदल रही थी।

मार्ट के अंदर दाखिल होते ही ठंडी हवा और हल्की रोशनी ने उनका स्वागत किया। आर्यन ने बाहर से ही एक ट्रॉली खींच ली और अपनी माँ के पीछे-पीहार हो लिया। शाम का वक्त था, इसलिए मार्ट में काफी चहल-पहल थी, लेकिन अंजलि को इन सब की आदत थी। वह बहुत ही सलीके से गलियारों के बीच से रास्ता बनाते हुए सीधे 'प्रोड्यूस सेक्शन' (सब्जी विभाग) की ओर बढ़ी।

"आर्यन, तू वो बास्केट देख, और मैं जरा टमाटर चेक करती हूँ," अंजलि ने कहा। वह एक-एक टमाटर को हाथ में उठाकर बड़े गौर से देख रही थी। एक डॉक्टर होने के नाते, साफ-सफाई और क्वालिटी को लेकर वह बहुत ज्यादा चूजी थी।

आर्यन ट्रॉली पकड़े खड़ा अपनी माँ को देख रहा था। अंजलि ने बड़े ध्यान से लाल और कड़क टमाटर छाँटकर एक थैली में डाले, फिर वह खीरे और ताजी हरी मिर्च की तरफ मुड़ गई। "देख, ये खीरे बिल्कुल ताजे हैं। सलाद के लिए अच्छे रहेंगे," उसने एक खीरा आर्यन की तरफ बढ़ाते हुए कहा।

आर्यन ने मुस्कुराकर उसे ट्रॉली में रख दिया। "माँ, आप तो जैसे लैब में रिसर्च कर रही हों, वैसे सब्जियाँ चुनती हो।"

अंजलि खिलखिलाकर हँस पड़ी, "बेटा, अच्छी सेहत अच्छी रसोई से ही शुरू होती है। अगर सामान ही बासी होगा, तो खाने में वो स्वाद कहाँ आएगा?"

वे धीरे-धीरे आगे बढ़े। अंजलि ने कुछ ताजी पालक की गड्डियां उठाईं और फिर अदरक-लहसुन के सेक्शन की ओर चली गई। आर्यन बीच-बीच में अपनी पसंद की कुछ चीजें, जैसे डार्क चॉकलेट का एक पैकेट और कुछ नट्स, चुपके से ट्रॉली में डाल देता, जिस पर अंजलि उसे तिरछी नज़र से देखकर मुस्कुरा देती।

"और कुछ रह गया माँ?" आर्यन ने पूछा जब वे राशन वाले गलियारे (Aisle) में पहुँचे।

"हाँ, थोड़ा आटा लेना है और शायद चायपत्ती खत्म होने वाली है," अंजलि ने जवाब दिया। उन्होंने अगले पंद्रह-बीस मिनट बड़े ही इत्मीनान से घर की छोटी-मोटी जरूरतों का सामान इकट्ठा करने में बिताए। उनके बीच दालों के भाव, साबुन की खुशबू और घर के स्टॉक को लेकर काफी लंबी बातें हुईं। अंजलि को अच्छा लग रहा था कि उसका बेटा इन सब छोटे कामों में इतनी दिलचस्पी ले रहा है।

बिलिंग काउंटर पर काफी भीड़ थी, इसलिए उन्हें करीब दस मिनट इंतज़ार करना पड़ा। अंजलि ने अपना कार्ड निकाला, लेकिन आर्यन ने पहले ही अपना फोन निकाल लिया था। "माँ, आज ये मेरी तरफ से। पापा ने पिछले हफ्ते जो पैसे भेजे थे, वो अभी वैसे ही रखे हैं।"

अंजलि ने पहले तो मना करना चाहा, पर बेटे के चेहरे पर गर्व देखकर वह मान गई। "ठीक है, बड़े साहब। आज आपकी कमाई से ही घर चलेगा।"

सामान पैक होने के बाद, आर्यन ने दोनों भारी थैले अपने हाथों में उठा लिए। वे मार्ट के ऑटोमैटिक दरवाजों से बाहर निकले, जहाँ अब रात की ठंडक और स्ट्रीट लाइट्स की रोशनी फैल चुकी थी। पार्किंग तक का रास्ता छोटा था, लेकिन आर्यन बड़े ध्यान से अपनी माँ के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहा था ताकि उसे कोई धक्का न लगे।

गाड़ी के पास पहुँचकर आर्यन ने डिक्की (Boot) खोली और सामान को सलीके से अंदर रखा। अंजलि ने राहत की सांस ली और अपनी सीट की तरफ बढ़ी। "चलो, अब जल्दी घर चलते हैं। काम काफी हो गया आज," उसने सीट बेल्ट लगाते हुए कहा।

आर्यन ने भी गाड़ी स्टार्ट की। मार्ट की भीड़ को पीछे छोड़ते हुए, उनकी सफेद सेडान अब रात के सन्नाटे में घर की ओर बढ़ने लगी।

गाड़ी मार्ट की पार्किंग से निकलकर मुख्य सड़क की ढलती हुई रोशनी में शामिल हो चुकी थी। रात का वक्त था और शहर की स्ट्रीट लाइट्स कार के डैशबोर्ड पर बारी-बारी से परछाइयां बना रही थीं। केबिन के अंदर एक बहुत ही आरामदायक और घरेलू सा माहौल था।

अंजलि ने सीट से थोड़ा पीछे झुककर अपनी आँखें मूंद लीं। दिन भर की थकान अब धीरे-धीरे शरीर पर भारी पड़ रही थी। आर्यन ने देखा कि माँ थोड़ी शांत हैं, तो उसने रेडियो की आवाज़ थोड़ी और कम कर दी।

"आज काफी सामान हो गया, है ना माँ?" आर्यन ने ट्रैफिक पर नज़र रखते हुए चुप्पी तोड़ी।

अंजलि ने आँखें खोलीं और उसकी तरफ देखकर मुस्कुराई। "हाँ, और शुक्र है कि तुम साथ थे। वरना अकेले इतने भारी थैले उठाना और फिर गाड़ी चलाना... काफी मुश्किल हो जाता। सच कहूँ तो, अब मुझे महसूस होता है कि तुम वाकई बड़े हो गए हो।"

आर्यन थोड़ा शरमा गया। "बड़ा तो होना ही था माँ। आखिर कब तक आप सब कुछ अकेले संभालती रहेंगी? वैसे भी, पापा के बिना ये घर और क्लिनिक संभालना कोई छोटी बात नहीं है। मैं तो बस आपकी थोड़ी सी मदद कर देता हूँ।"

अंजलि कुछ पल के लिए खामोश रही, फिर उसने खिड़की के बाहर भागते हुए पेड़ों और दुकानों को देखते हुए कहा, "तुम्हारे पापा भी बहुत मेहनत कर रहे हैं वहां। कल फोन पर कह रहे थे कि वहां का प्रोजेक्ट अब अंतिम चरण में है। उन्हें अपनी मेहनत का फल मिल रहा है, लेकिन मुझे कभी-कभी लगता है कि इस चक्कर में उन्होंने घर का बहुत सारा समय खो दिया है। तुम्हारी पूरी किशोरावस्था (Teenage) उन्होंने वीडियो कॉल पर ही देख ली।"

आर्यन ने गियर बदलते हुए जवाब दिया, "मुझे उनसे कोई शिकायत नहीं है माँ। मुझे पता है वो हमारे भविष्य के लिए ही वहां हैं। लेकिन हाँ, आपकी कमी को वो कभी पूरा नहीं कर पाए। घर में जो आपकी अहमियत है, वो किसी और की नहीं हो सकती।"

अंजलि ने प्यार से आर्यन के हाथ पर अपना हाथ रखा। "और मेरी हिम्मत तुम हो, आर्यन। जब तुम कॉलेज से लौटकर क्लिनिक आ जाते हो, तो मेरी आधी थकान तो वहीं मिट जाती है। अच्छा ये बताओ, अगले हफ्ते तुम्हारे कुछ एग्जाम्स भी तो थे ना? उनकी तैयारी कैसी चल रही है?"

बातों का सिलसिला अब आर्यन की पढ़ाई, उसके कॉलेज के नए दोस्तों और आने वाले सेमेस्टर की चुनौतियों की ओर मुड़ गया। अंजलि एक अनुभवी गाइड की तरह उसे सलाह दे रही थी—कभी करियर को लेकर, तो कभी जीवन के अनुशासन को लेकर।

"माँ, आप कभी-कभी बिल्कुल अपनी प्रोफेसर वाली टोन में आ जाती हैं," आर्यन ने हँसते हुए कहा।

"क्या करूँ? डॉक्टर होने के साथ-साथ एक माँ भी तो हूँ। और एक माँ का काम कभी खत्म नहीं होता," अंजलि ने चुटकी लेते हुए जवाब दिया।

वे इसी तरह छोटी-छोटी बातों में उलझे रहे—कभी खाने के मसालों पर चर्चा, तो कभी पुरानी यादों का ज़िक्र। गाड़ी अब उनकी कॉलोनी के गेट के अंदर दाखिल हो चुकी थी। सड़कों पर अब सन्नाटा था और सिर्फ उनके घर की खिड़कियों से आती मद्धम रोशनी दिखाई दे रही थी।

गाड़ी धीरे-धीरे उनके घर के पोर्टिको में आकर रुकी। इंजन बंद होते ही एक अजीब सी शांति छा गई, जिसमें सिर्फ उन दोनों की साँसों की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
 
ड्राइंग रूम की लाइट जलाते ही घर जगमगा उठा। आर्यन ने सामान के थैले सीधे रसोई की स्लैब पर रख दिए, जबकि अंजलि सोफे पर बैठकर अपनी सैंडल उतारने लगी। दिन भर की भागदौड़ और क्लिनिक की व्यस्तता के बाद, घर की यह शांति बहुत सुखद लग रही थी।

"ओह, आखिरकार घर पहुँच गए," अंजलि ने एक लंबी राहत की सांस लेते हुए कहा। "आर्यन, तू ये सामान यहीं रहने दे, मैं आकर इसे सलीके से जमा दूँगी। अभी तो बस ऐसा लग रहा है कि गरम पानी से नहा लूँ तो सारी थकान मिट जाए।"

आर्यन रसोई से बाहर आया और बोला, "हाँ माँ, आप जाओ। वैसे भी पसीने और धूल से काफी चिपचिपाहट महसूस हो रही है। मैं भी अपने कमरे में जाकर शावर ले लेता हूँ, फिर फ्रेश होकर सब्जी काटने में आपकी मदद करूँगा।"

अंजलि मुस्कुराते हुए उठी और अपने कमरे की ओर बढ़ने लगी। "ठीक है, तू जा। मैं भी बस पंद्रह-बीस मिनट में आती हूँ। आज शावर की बहुत सख्त ज़रूरत है।"

आर्यन भी अपने कमरे की तरफ मुड़ गया। "ठीक है माँ, मिलते हैं थोड़ी देर में।"

अंजलि अपने बेडरूम में दाखिल हुई और दरवाज़ा धीरे से बंद कर लिया। उसने खिड़की के परदे गिराए और अपना बैग मेज पर रखा। वह आईने के सामने खड़ी हुई और अपने जूड़े को खोल दिया, जिससे उसके घने बाल उसके कंधों पर बिखर गए। उसने एक गहरी सांस ली और अपने बाथरूम की ओर बढ़ गई।

उधर आर्यन भी अपने कमरे में पहुँच चुका था। उसने अपनी शर्ट उतारी और तौलिया उठाकर सीधे बाथरूम का रुख किया। घर के दो अलग-अलग कोनों में, माँ और बेटा दोनों ही दिन भर की धूल और थकान को उतारने के लिए तैयार थे। बाहर हॉल में अब सन्नाटा था, बस रसोई में रखे ताजे टमाटरों और सब्जियों की महक हवा में घुली हुई थी।

रसोई में पहुँचते ही मसालों और ताजी कटी हुई सब्जियों की एक मिली-जुली खुशबू हवा में तैरने लगी। अंजलि ने चॉपिंग बोर्ड निकाला और बहुत ही सलीके से प्याज काटने लगी। उसके हाथ बड़ी फुर्ती से चल रहे थे—सालों का अनुभव जो था।

आर्यन ने पास आकर चाकू उठाना चाहा, "माँ, लाओ प्याज मैं काट देता हूँ, आपकी आँखों में पानी आ जाएगा।"

अंजलि ने मुस्कुराकर उसे कोहनी से थोड़ा पीछे धकेला, "अरे हट, तू रहने दे। तू काटेगा तो आधे मोटे और आधे पतले होंगे। फिर ग्रेवी सही नहीं बनेगी। तू बस आराम से वहां स्टूल पर बैठ और मुझे ये बता कि तेरे उस नए प्रोजेक्ट का क्या हुआ जिसके बारे में तू कल बता रहा था?"

आर्यन वहीं काउंटर के पास रखे स्टूल पर बैठ गया और अपनी माँ को काम करते हुए देखने लगा। "प्रोजेक्ट तो ठीक चल रहा है माँ, बस थोड़ी रिसर्च बाकी है। वैसे आप अकेले सब कर लेती हो, मुझे बुरा लगता है कि मैं बस बैठा रहता हूँ।"

"बेटा, माँ के लिए अपने बच्चे को खिलाना कोई काम नहीं, सुकून होता है," अंजलि ने कड़ाही चढ़ाते हुए कहा। अचानक उसकी नज़र कोने में रखे खाली दूध के जग पर पड़ी। वह ठिठक गई। "ओह! एक गड़बड़ हो गई।"

आर्यन ने चकित होकर पूछा, "क्या हुआ माँ? नमक खत्म हो गया क्या?"

अंजलि ने अपना माथा पीटा, "नमक नहीं रे, हम मार्ट से दूध लाना ही भूल गए! सुबह की चाय और रात को तेरे पीने के लिए दूध बिल्कुल नहीं है। मेरा ध्यान ही नहीं रहा, इतनी सारी सब्जियों के चक्कर में मुख्य चीज़ ही रह गई।"

आर्यन तुरंत खड़ा हो गया। "कोई बात नहीं माँ, इसमें इतना परेशान होने वाली क्या बात है? नीचे नुक्कड़ वाली डेयरी खुली होगी अभी। मैं बस पाँच मिनट में लेकर आता हूँ।"

अंजलि ने उसे पर्स से पैसे देते हुए कहा, "सुन, ज्यादा दूर मत जाना, अगर नुक्कड़ वाली दुकान बंद हो तो लौट आना, हम बिना दूध के काम चला लेंगे। रात काफी हो गई है और मैं नहीं चाहती कि तू बेवजह बाहर भटके।"

"अरे माँ, मैं बच्चा नहीं हूँ अब। आप बस कड़ाही चढ़ाओ, मैं गया और आया," आर्यन ने चाबी उठाई और मुस्कुराते हुए बाहर की ओर लपका।

अंजलि उसे जाते हुए देखती रही। उसके चेहरे पर एक संतोष भरी मुस्कान थी। उसने गैस धीमी की और गुनगुनाते हुए मसाले भूनने लगी। घर में मलाई कोफ्ते की ग्रेवी पकने की आवाज़ और उसकी खुशबू अब गहराने लगी थी।

"ये लीजिए माँ, डेयरी खुली थी," आर्यन ने दूध का पैकेट काउंटर पर रखते हुए कहा।

अंजलि ने मुस्कुराकर उसे देखा, "शुक्रिया बेटा। अब जल्दी से हाथ धोकर आ जा, खाना ठंडा हो रहा है।"

दोनों मेज पर आमने-सामने बैठ गए। अंजलि ने आर्यन की थाली में दो रोटियाँ और कोफ्ता परोसा। पहला निवाला लेते ही आर्यन की आँखों में चमक आ गई। "माँ, सच में... आपके हाथ के खाने का कोई मुकाबला नहीं है। होटल का खाना इसके सामने कुछ भी नहीं है।"

अंजलि ने धीरे से रोटी का टुकड़ा तोड़ा, "बस-बस, इतनी तारीफ मत कर। मुझे पता है तुझे भूख लगी है इसलिए सब अच्छा लग रहा है।"

अगले आधे घंटे तक उनके बीच बहुत ही सहज और लंबी बातें हुईं। अंजलि ने उसे अपने मेडिकल कॉलेज के दिनों के कुछ पुराने किस्से सुनाए, कैसे वह और उसके पिता पहली बार मिले थे। आर्यन बड़े ध्यान से सुन रहा था। बातों-बातों में हँसी-मजाक भी हुआ और दिन भर की सारी थकान जैसे उस खाने की मेज पर धुल गई।

जब खाना खत्म हुआ, तो मेज पर बर्तनों का ढेर लगा था। अंजलि उठी और बर्तन समेटने लगी, "चलो, अब मैं ये साफ कर लेती हूँ, फिर सो जाते हैं।"

आर्यन ने अचानक उसका हाथ पकड़ लिया और उसे वापस कुर्सी पर बिठा दिया। "नहीं माँ, आज नहीं। आज बर्तन मैं धोऊँगा। आप सुबह से क्लिनिक में खड़ी रहती हैं, फिर आपने बाज़ार में वक्त बिताया और अब खाना भी बनाया। अब आप सिर्फ आराम करेंगी।"

अंजलि ने विरोध करना चाहा, "अरे रहने दे आर्यन, तू थक जाएगा। तुझे कल जल्दी कॉलेज भी जाना है।"

आर्यन ने ज़िद पकड़ ली, "बिल्कुल नहीं माँ। ये मेरा घर भी है। आप जाइए अपने कमरे में और आराम से कोई किताब पढ़िए या सो जाइए। मैं बस दस मिनट में सब चकाचक कर दूँगा।"

अंजलि ने हार मान ली। उसके चेहरे पर गर्व और प्यार का मिला-जुला भाव था। "ठीक है, बड़े साहब। आज आपकी हुकूमत चलेगी। पर ध्यान से, वो कांच के गिलास मत तोड़ देना।"

"भरोसा रखिये माँ," आर्यन ने हँसते हुए एप्रन पहना और सिंक की ओर बढ़ गया।

अंजलि अपने कमरे की ओर बढ़ी। जाते-जाते उसने मुड़कर देखा, आर्यन बहुत ही तल्लीनता से बर्तन धो रहा था। उसे लगा कि उसका बेटा अब वाकई उसकी ताकत बन गया है। वह अपने कमरे में दाखिल हुई, मद्धम रोशनी वाली नाइट लैंप जलाई और बिस्तर पर लेट गई। दिन भर की भागदौड़ के बाद, बिस्तर की कोमलता उसे सुकून दे रही थी।

जब अंजलि रसोई में पहुँची, तो वह हैरान रह गई। सिंक पूरी तरह साफ था, एक भी बर्तन बाहर नहीं था और स्लैब को भी आर्यन ने गीले कपड़े से पोंछकर चमका दिया था। डाइनिंग टेबल की कुर्सियां भी अपनी जगह पर सलीके से लगी थीं।

"अरे वाह!" अंजलि के मुँह से धीरे से निकला।

आर्यन वहीं खड़ा अपना हाथ पोंछ रहा था। माँ को देखकर वह मुस्कुराया, "देख लीजिए डॉक्टर साहब, क्लिनिक की तरह यहाँ भी सब हाइजीनिक (hygienic) है या नहीं?"

अंजलि ने पास आकर उसके सिर पर हाथ फेरा, "तूने तो वाकई कमाल कर दिया आर्यन। मुझे लगा था तू बस बर्तन धोकर छोड़ देगा, पर तूने तो पूरा किचन ही चकाचक कर दिया। बहुत बढ़िया!"

आर्यन ने गर्व से सिर हिलाया। तभी अंजलि को याद आया कि वह दूध गरम करना भूल गई थी। वह स्टोव की ओर बढ़ी और दूध का पतीला चढ़ाया।

"सुन आर्यन," अंजलि ने मुड़कर कहा, "तूने बहुत काम कर लिया। अब तू ऊपर अपने कमरे में जा और आराम कर। मैं यहाँ दूध गरम कर रही हूँ, जैसे ही उबल जाएगा, मैं यहीं काउंटर पर ढक कर रख दूँगी। तू जब सोने लगे, तो नीचे आकर अपना गिलास लेकर पी लेना। ठीक है?"

आर्यन ने एक लंबी जम्हाई ली, "ठीक है माँ। वैसे भी अब मुझे नींद आ रही है। आप भी ज्यादा देर मत जागना। गुड नाइट!"

"गुड नाइट बेटा, सो जा," अंजलि ने उसे जाते हुए देखा।

आर्यन सीढ़ियों की ओर बढ़ा। उसका कमरा पहली मंजिल (First Floor) पर था। सन्नाटे भरे घर में उसकी सीढ़ियाँ चढ़ने की 'धप-धप' की आवाज़ गूँजी और फिर ऊपर के कमरे का दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ आई।

अंजलि अकेली रसोई में खड़ी थी। दूध उबलने का इंतज़ार करते हुए वह खामोशी से खिड़की के बाहर रात के अंधेरे को देख रही थी। उसे महसूस हो रहा था कि आज की शाम, सालों बाद, उसे एक बहुत ही मुकम्मल और शांत अहसास दे गई थी। दूध में उबाल आया, उसने गैस बंद की और पतीले को जाली से ढंक दिया।

फिर वह भी धीरे-धीरे अपने कमरे की ओर बढ़ गई, यह सोचकर कि उसका बेटा अब वाकई उसकी परछाईं बन चुका है।

आर्यन ने अपने कमरे का दरवाज़ा बंद किया और सीधे अपनी स्टडी टेबल की ओर बढ़ा। मेज पर बिखरी हुई कुछ किताबें और आधा खुला हुआ जर्नल उसे उसके अधूरे असाइनमेंट की याद दिला रहे थे। उसने अपनी टी-शर्ट उतारी, कुर्सी पर फेंकी और नंगे बदन ही लैपटॉप खोलकर बैठ गया।

अगले आधे घंटे तक वह पूरी तरह से अपने कॉलेज के काम में डूब गया। उसने कुछ नोट्स तैयार किए, पिछले हफ्ते के छूटे हुए लेक्चर के पीडीएफ (PDF) चेक किए और अपने प्रोजेक्ट की रूपरेखा को अंतिम रूप दिया। काम खत्म करने के बाद उसने एक लंबी अंगड़ाई ली और अपनी गर्दन के तनाव को कम करने के लिए उसे दोनों तरफ झटका।

"चलो, आज का कोटा तो पूरा हुआ," उसने खुद से बुदबुदाते हुए लैपटॉप बंद कर दिया।

अब वक्त था थोड़ा 'मी-टाइम' (Me-time) का। वह अपने बिस्तर पर ढह गया और तकिए का सहारा लेकर अपना फोन निकाला। सबसे पहले उसने इंस्टाग्राम खोला। रंग-बिरंगी रील्स, दोस्तों की पार्टियों की तस्वीरें और मीम्स की बाढ़ के बीच वह बस अंगूठा चलाता रहा। कभी किसी पुरानी दोस्त की फोटो पर रुकता, तो कभी किसी फनी वीडियो पर मुस्कुरा देता।

इंस्टाग्राम से मन भरा तो वह यूट्यूब पर चला गया। वहां उसने कुछ टेक-रिव्यूज देखे और फिर कुछ पुरानी यादों को ताजा करने के लिए कुछ अनप्लग्ड गानों की प्लेलिस्ट चला दी। मद्धम संगीत कमरे के सन्नाटे में घुलने लगा। फोन की स्क्रीन की नीली रोशनी उसके चेहरे पर चमक रही थी और वह बस बिना किसी मकसद के एक वीडियो से दूसरे वीडियो पर स्क्रॉल करता रहा।

रात अब गहरी हो चली थी। बाहर की दुनिया सो चुकी थी, लेकिन आर्यन का दिमाग अभी भी उन वीडियो और सूचनाओं के समंदर में तैर रहा था। उसे अहसास ही नहीं हुआ कि वक्त कैसे पंख लगाकर उड़ गया। अचानक उसे याद आया कि नीचे रसोई में माँ ने उसके लिए दूध रखा है।

आर्यन ने एक लंबी जम्हाई ली और बिस्तर से उठ खड़ा हुआ। उसने अपनी टी-शर्ट वापस नहीं पहनी, बस अपने लोअर में ही कमरे से बाहर निकला। उसे पता था कि उसकी माँ की नींद बहुत कच्ची है, और वह उन्हें इस वक्त जगाना नहीं चाहता था।

उसने सीढ़ियों पर अपने पैर बहुत ही सावधानी से रखे। हर कदम पर वह ध्यान दे रहा था कि लकड़ी की सीढ़ी कहीं 'चूँ' की आवाज़ न कर दे। पहली मंजिल से नीचे उतरते वक्त पूरे घर में एक अजीब सा, भारी सन्नाटा था, जिसमें केवल क्लॉक की 'टिक-टिक' सुनाई दे रही थी।

"माँ सो रही होंगी," उसने मन ही मन सोचा। उसने नीचे हॉल की लाइट नहीं जलाई, बस अपने फोन की टॉर्च की हल्की रोशनी फर्श पर डाली ताकि किसी फर्नीचर से टकरा न जाए।

अंजलि के कमरे का दरवाज़ा बंद था और अंदर से कोई आवाज़ नहीं आ रही थी। आर्यन दबे पाँव रसोई की ओर बढ़ा। रात के इस पहर में रसोई का स्टील और टाइल्स टॉर्च की रोशनी में थोड़े ठंडे और चमकदार लग रहे थे।

रसोई के काउंटर पर वही पतीला रखा था जिसे उसकी माँ ने ढक कर छोड़ा था। आर्यन ने टॉर्च को स्लैब पर टिकाया और धीरे से जाली हटाई। दूध अब भी हल्का गुनगुना था। उसने पास ही रखा अपना पसंदीदा कांच का गिलास उठाया। सन्नाटे में गिलास के शेल्फ से टकराने की हल्की सी 'खनक' हुई, जिससे आर्यन एक पल के लिए ठिठक गया और माँ के कमरे की तरफ देखा।

जब उसे यकीन हो गया कि सब शांत है, तो उसने बहुत ही सावधानी से पतीले से दूध गिलास में डालना शुरू किया। दूध के गिरने की धार वाली आवाज़ उस खामोश रसोई में बहुत साफ़ सुनाई दे रही थी।

आर्यन ने बहुत ही सावधानी से अपने कदम पीछे मोड़े। एक हाथ में दूध का गिलास था और दूसरे हाथ में फोन, जिसकी टॉर्च की रोशनी वह नीचे फर्श पर डाल रहा था ताकि रास्ता साफ दिखे। घर का सन्नाटा अब पहले से कहीं ज्यादा गहरा महसूस हो रहा था, जैसे दीवारें भी सांस ले रही हों।

जैसे ही वह सीढ़ियों की ओर बढ़ने के लिए अपनी माँ के बेडरूम के दरवाजे के सामने से गुजरा, उसके कदम ठिठक गए।

हवा में एक बहुत ही महीन और दबी हुई आवाज़ तैर रही थी। यह आवाज़ इतनी धीमी थी कि अगर घर में ज़रा भी शोर होता, तो शायद सुनाई न देती। आर्यन ने अपनी साँसें रोक लीं। उसे लगा शायद माँ नींद में कुछ बोल रही हैं या शायद कोई सपना देख रही हैं।

उसकी जिज्ञासा (curiosity) ने उसे रुकने पर मजबूर कर दिया। उसने टॉर्च बंद की और अंधेरे में ही दीवार का सहारा लेकर अपना कान धीरे से दरवाजे की लकड़ी के पास ले गया।

अंदर से रह-रह कर हल्की-हल्की सिसकारियों की आवाज़ आ रही थी। वह आवाज़ किसी दर्द की नहीं थी, बल्कि उसमें एक अजीब सी बेचैनी और भारीपन था। ऐसा लग रहा था जैसे कोई अपनी ही साँसों को काबू करने की कोशिश कर रहा हो, लेकिन नाकाम हो रहा हो। सिसकारियों के बीच बीच में चादर के रगड़ने की सरसराहट भी साफ सुनाई दे रही थी।

आर्यन का दिल ज़ोर से धड़कने लगा। वह समझ नहीं पा रहा था कि अंदर क्या हो रहा है। क्या माँ की तबीयत खराब है? क्या उन्हें कोई तकलीफ हो रही है? या फिर इस आधी रात के सन्नाटे में वह कुछ ऐसा सुन रहा था जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी।

वह वहीं जड़वत (frozen) खड़ा रह गया, हाथ में दूध का गिलास अब भी वैसा ही था, लेकिन उसका पूरा ध्यान उस बंद दरवाजे के पीछे छिपी उन सिसकारियों पर टिक गया था।

एक पल के लिए उसने सोचा कि अंदर झाँक कर देखे, पर फिर उसे लगा कि आधी रात को माँ के कमरे में बिना दस्तक दिए जाना ठीक नहीं होगा। घबराहट और उलझन में, उसने अपने कदम पीछे खींचे और दबे पाँव सीढ़ियों की ओर बढ़ गया।

ऊपर अपने कमरे में पहुँचकर उसने सबसे पहले दूध का गिलास मेज पर रखा। उसने एक घूँट भी नहीं पिया; उसकी भूख और प्यास जैसे कहीं गायब हो गई थी। वह अपने बिस्तर के कोने पर बैठ गया और अपनी हथेलियों में सिर टिका लिया।

"क्या माँ की तबीयत खराब है?" उसने खुद से सवाल किया। "क्या उन्हें कोई बुरा सपना आया है? या फिर क्लिनिक की थकान की वजह से उन्हें तेज बुखार तो नहीं चढ़ गया?"

आर्यन को याद आया कि शाम को माँ काफी थकी हुई लग रही थीं। एक डॉक्टर होने के बावजूद, वह अपनी सेहत को अक्सर नजरअंदाज कर देती थीं। वह सोच रहा था कि शायद उन्हें सांस लेने में तकलीफ हो रही हो या कोई पुराना दर्द उभर आया हो। लेकिन वो आवाजें... वे कुछ अलग थीं, कुछ ऐसी जो उसने पहले कभी नहीं सुनी थीं।

वह बिस्तर पर लेटा तो सही, पर उसकी आँखें छत की ओर टिकी थीं। कमरे का पंखा एक ही रफ्तार से घूम रहा था, लेकिन आर्यन का दिमाग घोड़े की तरह दौड़ रहा था। "अगर उन्हें वाकई जरूरत हुई और मैं ऊपर सोता रहा, तो?" यह सोचकर उसे अपनी फिक्र होने लगी।

एक तरफ माँ की फिक्र थी और दूसरी तरफ वो संकोच (hesitation) जो उसे वापस नीचे जाकर पूछने से रोक रहा था। वह बस इसी उधेड़बुन में लगा रहा कि क्या उसे नीचे जाकर एक बार फिर से चेक करना चाहिए या सुबह होने का इंतज़ार करना चाहिए। रात का सन्नाटा अब उसे और भी डरावना और भारी लगने लगा था।
 
बिस्तर की चादर को झटक कर आर्यन खड़ा हुआ। उसने दूध के गिलास की ओर देखा जो मेज पर ज्यों का त्यों रखा था, पर उसकी प्यास अब चिंता में बदल चुकी थी। उसने बिना कोई आवाज़ किए अपने कमरे का दरवाज़ा खोला और फिर से उन्हीं अंधेरी सीढ़ियों की ओर बढ़ गया।

उसके दिल की धड़कन साफ़ सुनाई दे रही थी। वह धीरे-धीरे, एक-एक कदम फूंक-फूंक कर नीचे उतरा। हॉल में पसरा सन्नाटा अब और भी गहरा लग रहा था। वह सीधा माँ के बंद दरवाज़े के पास पहुँचा।

इस बार उसने संकोच छोड़ दिया और अपना सिर दरवाज़े की लकड़ी से बिल्कुल सटा दिया। वह अपनी साँसें रोककर अंदर की हलचल को पकड़ने की कोशिश कर रहा था।

"माँ...?" उसने बहुत धीरे से, लगभग फुसफुसाते हुए मन में कहा।

अंदर से अभी भी वही हल्की, टूटी-टूटी सिसकारियाँ आ रही थीं। आवाज़ इतनी मद्धम थी कि ऐसा लग रहा था जैसे कोई तकिए में मुँह छिपाकर रो रहा हो या फिर अपनी तकलीफ को बाहर आने से रोक रहा हो। बीच-बीच में चादर के सरकने और बेड के हल्के से हिलने की आवाज़ भी आ रही थी।

आर्यन की पेशानी पर पसीना आ गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या उसे दरवाज़ा खटखटाकर पूछना चाहिए? अगर वह सो रही हैं और यह सिर्फ नींद में है, तो उन्हें जगाना ठीक नहीं होगा। लेकिन अगर वह दर्द में हैं?

वह वहीं अंधेरे गलियारे में मूर्ति की तरह खड़ा रहा। दरवाज़े के उस पार से आती उन रहस्यमयी सिसकारियों ने उसे एक ऐसी उलझन में डाल दिया था जिससे निकलना उसके लिए मुश्किल होता जा रहा था। वह बस वहीं खड़ा रहकर यह समझने की कोशिश करता रहा कि आखिर उस बंद कमरे के अंदर माँ किस हाल में हैं।

आर्यन ने एक गहरी सांस ली, अपने पसीने से तर हाथों को पोंछा और अपनी उंगलियों को मोड़कर दरवाजे की लकड़ी पर टिका दिया।

खट... खट... खट...

दस्तक की आवाज़ उस सन्नाटे भरे घर में किसी धमाके जैसी लगी। आर्यन का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। "माँ...?" उसने धीमी लेकिन स्पष्ट आवाज़ में पुकारा। "माँ, आप ठीक तो हैं?"

अंदर से आ रही वो सिसकारियाँ अचानक रुक गईं। एक एकदम से छा जाने वाला सन्नाटा पसर गया। आर्यन वहीं खड़ा इंतज़ार करने लगा। 10 सेकंड बीते... 20 सेकंड... कोई जवाब नहीं। उसका डर अब और बढ़ने लगा था। "माँ, दरवाज़ा खोलिए... मुझे आपकी आवाज़ सुनाई दे रही थी। क्या तबीयत ठीक नहीं है?"

करीब 30 से 40 सेकंड तक कोई हलचल नहीं हुई। आर्यन बस दरवाज़े के हैंडल की ओर देख रहा था। तभी, अंदर से कुछ सरसराहट हुई—जैसे कोई हड़बड़ी में चादर ठीक कर रहा हो या बिस्तर से उठ रहा हो। फिर नंगे पैरों के ज़मीन पर चलने की हल्की आवाज़ आई।

अंततः, कुंडी खुलने की आवाज़ हुई—कड़क।

दरवाज़ा धीरे से खुला। कमरे के अंदर की मद्धम 'नाइट लैंप' की रोशनी बाहर गलियारे में फैली। अंजलि सामने खड़ी थी। उसके बाल थोड़े बिखरे हुए थे और चेहरा थोड़ा लाल था, जैसे उसे बहुत तेज़ गर्मी लग रही हो या वह अभी-अभी किसी गहरी नींद से जागी हो। उसकी साँसें अभी भी थोड़ी भारी थीं।

उसने अपनी शॉल को थोड़ा और कस कर लपेटा और आधी खुली आँखों से आर्यन को देखा। "आर्यन? इतनी रात को यहाँ क्या कर रहे हो बेटा? तुम सोए नहीं?" उसकी आवाज़ में एक अजीब सी थकावट और भारीपन था, लेकिन वह दिखने में ठीक लग रही थी।

आर्यन ने राहत की सांस ली, पर उसकी नज़रें माँ के चेहरे पर टिकी थीं। "माँ, मैं... मैं दूध लेने नीचे आया था, तो आपके कमरे से कुछ आवाज़ें आ रही थीं। मुझे लगा शायद आपको बुखार है या कोई तकलीफ हो रही है। आप ठीक तो हैं न?"

अंजलि ने एक फीकी मुस्कान दी और अपने माथे से पसीना पोंछा। "अरे नहीं बेटा, कुछ नहीं। बस... बस थोड़ा बुरा सपना देख लिया था और शायद उमस (Humidity) की वजह से बेचैनी हो रही थी। मैं बिल्कुल ठीक हूँ। तू बेकार में घबरा गया।"

गलियारे की मद्धम रोशनी में आर्यन ने एक कदम आगे बढ़ाया। अंजलि दरवाजे के फ्रेम का सहारा लेकर खड़ी थी, उसकी साँसें अभी भी पूरी तरह सामान्य नहीं हुई थीं।

"माँ, आप कह रही हैं कि आप ठीक हैं, लेकिन आपकी आँखें कुछ और ही कह रही हैं," आर्यन ने धीमी और संजीदा आवाज़ में कहा।

बिना किसी हिचकिचाहट के, आर्यन ने अपना दाहिना हाथ धीरे से उठाया और अपनी हथेलियों के पीछे का हिस्सा अंजलि के गाल और माथे पर रख दिया। जैसे ही उसकी खाल माँ की त्वचा से छुई, वह ठिठक गया।

अंजलि का चेहरा दहकते हुए अंगारे जैसा गर्म था। वह तपिश इतनी तेज़ थी कि आर्यन को महसूस हुआ जैसे उसे वाकई बहुत तेज़ बुखार चढ़ आया हो।

"ओह गॉड! माँ, आप तो आग की तरह तप रही हैं!" आर्यन ने चौंकते हुए अपना हाथ हटाया, लेकिन उसकी उंगलियों पर अब भी वह गर्मी महसूस हो रही थी। "आपको बहुत तेज़ बुखार है। और आप कह रही हैं कि आप ठीक हैं? आप खुद एक डॉक्टर होकर अपनी सेहत के साथ इतनी लापरवाही कैसे कर सकती हैं?"

अंजलि ने घबराकर अपनी पलकें झुका लीं और थोड़ा पीछे हटने की कोशिश की। "नहीं आर्यन... वह... वह बस शायद कमरे में घुटन हो रही थी इसलिए। बुखार नहीं है मुझे, बस थोड़ा 'फ्लश' (flush) महसूस हो रहा है। तू परेशान मत हो बेटा, तू जा सो जा।"

आर्यन ने उसकी बात अनसुनी कर दी और कमरे के अंदर कदम रख दिया। "बिल्कुल नहीं माँ। इस हालत में मैं आपको अकेला नहीं छोड़ सकता। आपका पूरा शरीर गरम है। चलिए, पहले बेड पर लेटिये, मैं थर्मामीटर लेकर आता हूँ। अगर बुखार ज्यादा हुआ तो हमें अभी दवाई लेनी होगी।"

अंजलि ने अपने बेटे के चेहरे पर वह कड़कपन और फिक्र देखी, जो अक्सर एक पिता या बड़े भाई में होती है। वह कुछ बोल नहीं पाई, बस खामोशी से अपने बिस्तर की ओर बढ़ गई। आर्यन वहीं खड़ा रहा, उसकी नज़रें अपनी माँ की उस बेचैनी को पढ़ने की कोशिश कर रही थीं, जो बुखार से कहीं ज्यादा गहरी लग रही थी।

"आप बस यहीं लेटिये माँ, मैं अभी आया," आर्यन ने लगभग आदेश देते हुए कहा और फुर्ती से गलियारे की ओर लपका। वह नीचे की मंज़िल पर बने उस छोटे से मेडिकल कैबिनेट के पास पहुँचा जहाँ अंजलि अपनी ज़रूरी दवाइयाँ और उपकरण रखती थी। उसने कांपते हाथों से डिजिटल थर्मामीटर निकाला और वापस कमरे की ओर दौड़ा।

जब वह कमरे में पहुँचा, अंजलि बिस्तर के किनारे बैठी थी, उसकी आँखें आधी झुकी हुई थीं और वह गहरी साँसें ले रही थी। कमरे की मद्धम पीली रोशनी उसके चेहरे की लालिमा को और गहरा दिखा रही थी।

"लीजिए माँ, इसे मुँह में रखिये," आर्यन ने थर्मामीटर आगे बढ़ाते हुए कहा।

अंजलि ने धीरे से थर्मामीटर लिया और अपनी जीभ के नीचे दबा लिया। पूरा कमरा एक भारी सन्नाटे में डूब गया, जिसमें सिर्फ दीवार घड़ी की आवाज़ सुनाई दे रही थी। आर्यन वहीं घुटनों के बल बिस्तर के पास बैठ गया, उसकी नज़रें थर्मामीटर की छोटी सी स्क्रीन पर जमी थीं। उसे एक-एक सेकंड एक घंटे जैसा लग रहा था।

टीप... टीप... टीप...

थर्मामीटर ने बीप की आवाज़ की। आर्यन ने झपटकर उसे लिया और रोशनी की तरफ करके रीडिंग देखी। उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं।

"103.2 डिग्री!" आर्यन के मुँह से लगभग एक चीख निकली। "माँ! आपको इतना तेज़ बुखार है और आप कह रही थीं कि आप ठीक हैं? इतना टेम्परेचर तो डेंजरस हो सकता है!"

अंजलि ने अपनी आँखें मूँद लीं और धीरे से अपना सिर पीछे तकिये पर टिका दिया। "आर्यन... वो... मुझे लगा शायद बस थकान है। मुझे अंदाज़ा नहीं था कि इतना ज़्यादा होगा।"

आर्यन का चेहरा पीला पड़ गया था। "थकान से इतना बुखार नहीं आता माँ। आपकी साँसें भी तेज़ चल रही हैं और चेहरा बिल्कुल दहक रहा है। मैं अभी ठंडे पानी की पट्टी और पैरासिटामोल लेकर आता हूँ। मैं आपको इस हालत में सोता हुआ नहीं छोड़ सकता।"

अंजलि ने कमज़ोरी से अपना हाथ उठाकर उसे रोकने की कोशिश की, "बेटा, तू परेशान मत हो, मैं खुद डॉक्टर हूँ, मैं देख लूँगी..."

"आज आप डॉक्टर नहीं, सिर्फ मेरी माँ हैं," आर्यन ने उसकी बात काटते हुए कहा। उसकी आवाज़ में एक अजीब सी मजबूती थी जो अंजलि को खामोश कर गई। "आप बस लेटी रहिये, मैं सब संभालता हूँ।"

"माँ, ये लीजिये। पहले ये दवाई खाइए, फिर मैं पट्टी करूँगा," आर्यन ने बिस्तर के पास बैठकर दवाई की गोली हाथ में लेते हुए कहा।

अंजलि ने धीरे से अपनी आँखें खोलीं। उसने दवाई की ओर देखा और फिर अपना चेहरा दूसरी तरफ फेर लिया। "नहीं आर्यन... इसकी ज़रूरत नहीं है। मैं... मैं बस थोड़ा सो जाऊँगी तो सुबह तक ठीक हो जाऊँगी। दवाइयों से मुझे वैसे ही सारा दिन उलझन रहती है।"

आर्यन हैरान रह गया। "क्या कह रही हैं आप? आप खुद मरीज़ों को डांटती हैं जब वो दवाई नहीं लेते, और अब खुद बहाने बना रही हैं? माँ, टेम्परेचर बहुत ज़्यादा है।"

"अरे बेटा, वो... वो बस थकावट की वजह से 'हीट' (heat) बढ़ गई है शरीर की," अंजलि ने तकिये में अपना सिर थोड़ा और धंसाते हुए कहा। "अभी दवाई लूँगी तो रात भर पसीना आएगा और नींद खराब होगी। तू बस जा और सो जा, मैं सुबह देख लूँगी।"

आर्यन ने गिलास मेज पर रखा और थोड़ा सख्त लहजे में बोला, "सुबह तक का इंतज़ार नहीं कर सकते। आप बच्चों की तरह बहाने बना रही हैं। क्या आपको कड़वी लगती है? या फिर आप बस मुझे परेशान करना चाहती हैं?"

अंजलि ने एक कमज़ोर सी मुस्कान दी, उसकी साँसें अभी भी भारी थीं। "नहीं रे... बस मन नहीं कर रहा। तू समझता क्यों नहीं? मुझे पता है मेरे शरीर को क्या चाहिए। बस थोड़ी देर शांति से लेटने दे।"

आर्यन ने देखा कि माँ की ज़िद उनकी कमज़ोरी पर भारी पड़ रही थी। उसने दवाई वाली हथेली उनके और करीब की। "माँ, प्लीज़। मेरे लिए। अगर आप ये दवाई नहीं खाएंगी, तो मैं भी यहीं बैठा रहूँगा, पूरी रात। मैं ऊपर नहीं जाने वाला।"

अंजलि ने आर्यन की आँखों में देखा—वहां सिर्फ फिक्र और ज़िद थी। उसने महसूस किया कि उसका छोटा सा बेटा आज एक अभिभावक (guardian) की तरह व्यवहार कर रहा है।

"तू बहुत ज़िद्दी हो गया है," अंजलि ने धीरे से फुसफुसाते हुए कहा। उसने हार मान ली और धीरे से उठकर बैठने की कोशिश की, लेकिन बुखार की वजह से उसका सिर चकरा गया। आर्यन ने तुरंत आगे बढ़कर उसके कंधे को सहारा दिया ताकि वह गिर न जाए।

"माँ, यह कोई मज़ाक नहीं है!" आर्यन ने थोड़ा तेज़ आवाज़ में कहा, उसकी आँखों में फिक्र और झुंझलाहट साफ़ थी। "अगर आप अभी यह दवाई नहीं लेंगी, तो मैं अभी पापा को फोन लगा रहा हूँ। उन्हें ही देखने दीजिये कि उनकी 'डॉक्टर पत्नी' अपनी सेहत के साथ क्या खिलवाड़ कर रही है।"

अंजलि ने तकिये में मुँह छिपा लिया और धीरे से बुदबुदाई, "नहीं आर्यन... उन्हें परेशान मत कर। वह वहाँ काम में व्यस्त होंगे। मैं... मैं बस थोड़ी देर में ले लूँगी, प्रॉमिस।"

"नहीं माँ, अभी!" आर्यन ने अपना हाथ जेब में डाला, पर उसे अहसास हुआ कि उसका फोन ऊपर अपने कमरे में चार्जिंग पर लगा रह गया है। उसकी नज़र बगल में बेडसाइड टेबल पर रखी अंजलि के फोन पर पड़ी।

उसने बिना सोचे-समझे झपटकर माँ का फोन उठा लिया। "मैं उन्हीं के फोन से पापा को वीडियो कॉल करता हूँ, तभी आप मानेंगी।" अंजलि ने उसे रोकने के लिए हाथ बढ़ाया, "आर्यन, रुक... मत कर..." लेकिन कमज़ोरी की वजह से वह बस बिस्तर पर ही रह गई।

आर्यन ने जैसे ही फोन का लॉक खोला—जो शायद अभी हाल ही के इस्तेमाल की वजह से अनलॉक ही था—उसकी उंगलियाँ स्क्रीन पर ठिठक गईं। उसका चेहरा सफेद पड़ गया और वह जो कुछ बोलने वाला था, शब्द उसके गले में ही फंस कर रह गए।

फोन के ब्राउज़र पर एक एडल्ट साइट खुली हुई थी। स्क्रीन पर जो दृश्य और शब्द थे, वे किसी भी बेटे के लिए अपनी माँ के फोन पर देखना अकल्पनीय था। आर्यन का दिमाग सुन्न हो गया। उसे अचानक उन सिसकारियों, उस तेज़ बुखार जैसी तपिश, और माँ के चेहरे की उस अजीब लालिमा का मतलब समझ आने लगा, जिसे वह अब तक 'बीमारी' समझ रहा था।

वहाँ कोई घृणा (hatred) नहीं थी, न ही कोई गुस्सा। था तो सिर्फ एक गहरा शॉक (Shock)। उसे समझ नहीं आया कि वह क्या प्रतिक्रिया दे। वह जिस माँ को एक आदर्श, एक शांत डॉक्टर और एक निस्वार्थ ममता की मूरत मानता था, उनके व्यक्तित्व का यह छिपा हुआ पहलू उसके सामने एकदम नग्न होकर आ गया था।

अंजलि ने आर्यन के चेहरे के उड़ते हुए रंग को देख लिया था। वह समझ गई थी कि आर्यन ने क्या देख लिया है। कमरे में एक ऐसा सन्नाटा छा गया जो किसी भी शोर से ज़्यादा भयानक था।

आर्यन ने बिना एक शब्द बोले, बिना माँ की तरफ देखे, धीरे से फोन वापस टेबल पर रख दिया। उसके हाथ हल्के से कांप रहे थे। उसने दवाई की गोली और पानी का गिलास भी वहीं छोड़ दिया। वह मुड़ा और भारी कदमों से, बिना पीछे मुड़े कमरे से बाहर निकल गया। उसका दिमाग सुन्न था, पैर मशीन की तरह चल रहे थे। वह सीधा ऊपर अपने कमरे की ओर बढ़ गया, पीछे अपनी माँ को उस स्तब्ध अंधेरे में अकेला छोड़कर।

आर्यन सीधा लेटा हुआ छत पर घूमते पंखे की परछाईं को घूर रहा था। कमरे में सिर्फ पंखे की 'सर-सर' सुनाई दे रही थी, लेकिन उसके कानों में अभी भी नीचे के कमरे से आई वो सिसकारियाँ गूँज रही थीं।

उसकी आँखों के सामने बार-बार फोन की वो स्क्रीन और उस पर खुली साइट घूम रही थी। उसे अब समझ आ रहा था कि वो '103 डिग्री बुखार' असल में क्या था। वह जिसे कोई जानलेवा बीमारी समझकर घबरा रहा था, जिसे थर्मामीटर से नाप रहा था और जिसके लिए दवाइयाँ लाने के लिए पागलों की तरह भाग रहा था—वह असल में उसकी माँ की अपनी एक एकांत और निजी दुनिया का हिस्सा था।

"धिक्कार है मुझ पर!" आर्यन ने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं और तकिये में अपना चेहरा दबा लिया। उसे खुद पर इतनी शर्म महसूस हो रही थी कि उसे लग रहा था वह अब कभी माँ की आँखों में आँखें डाल कर बात नहीं कर पाएगा।

उसे अपनी नादानी पर गुस्सा आ रहा था। "मैं कितना बड़ा बेवकूफ हूँ," उसने खुद से बुदबुदाते हुए कहा। "माँ बार-बार कह रही थीं कि मैं ऊपर चला जाऊँ, वो बार-बार कह रही थीं कि वो ठीक हैं... पर मैं अपनी ज़िद पर अड़ा रहा। मैंने जबरदस्ती उनका फोन उठाया, उनका लॉक खोला... मैंने उनकी प्राइवेसी (Privacy) की धज्जियाँ उड़ा दीं।"

वह सोच रहा था कि माँ इस वक्त नीचे क्या महसूस कर रही होंगी। क्या वह शर्मिंदा होंगी? क्या वह डर गई होंगी? एक तरफ उसे उस सच्चाई को देखकर शॉक लगा था, तो दूसरी तरफ उसे इस बात का पछतावा था कि उसने अपनी माँ को उस स्थिति में ला खड़ा किया जहाँ अब उनके बीच एक कभी न मिटने वाली असहजता (Awkwardness) पैदा हो गई थी।

पूरी रात वह करवटें बदलता रहा। कभी उसे माँ के अकेलेपन का अहसास होता, तो कभी अपनी मर्यादा लांघने का दुःख। सुबह की पहली किरण तक उसकी आँखों से नींद कोसों दूर थी। वह बस इसी उधेड़बुन में था कि जब सूरज निकलेगा और वह नीचे जाएगा, तो क्या वह दोबारा वही 'नॉर्मल' बेटा बन पाएगा?

रात खत्म हो गई थी, लेकिन आर्यन के मन का द्वंद्व (Conflict) अभी शुरू ही हुआ था।

शुरुआत के कुछ मिनट तो अंजलि बिल्कुल सुन्न रही। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह ज़मीन में धंस जाए या उठकर आर्यन को रोके। उसका चेहरा शर्म से लाल था, और दिल की धड़कनें अभी भी सामान्य नहीं हुई थीं। उसे पता था कि आर्यन ने फोन की स्क्रीन देख ली है और इसी वजह से वह बिना कुछ बोले, इतनी हड़बड़ी में ऊपर भागा है।

लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, उसकी घबराहट एक अजीब सी शांति और फिर एक बहुत ही हल्की सी मुस्कान में बदलने लगी।

उसने अंधेरे में ही तकिए को अपनी बाहों में समेटा और सोचने लगी, "पागल लड़का... कितना डर गया था।" उसे याद आया कि कैसे आर्यन बदहवास होकर थर्मामीटर लेकर आया था, कैसे उसने 103 डिग्री बुखार की रीडिंग देखकर लगभग अपनी जान निकाल ली थी, और कैसे वह एक छोटे बच्चे की तरह ज़िद कर रहा था कि वह उसे दवाई खिलाकर ही मानेगा।

उसे अपने बेटे की उस मासूमियत और नादानी पर अंदर ही अंदर हँसी आ रही थी। उसे इस बात की कोई शिकायत नहीं थी कि उसने उसका फोन देख लिया, बल्कि उसे इस बात का सुकून था कि उसका बेटा उसकी इतनी परवाह (Care) करता है। उसे अहसास हुआ कि आर्यन अब सिर्फ उसका बच्चा नहीं रहा, बल्कि वह उसकी सेहत और उसकी खुशी का रक्षक बन गया है।

"कितना फिक्रमंद था मेरे लिए..." उसने मन ही मन सोचा। उसकी वो सिसकारियाँ, जिन्हें आर्यन ने 'बीमारी' समझ लिया था, दरअसल एक लंबे समय के अकेलेपन और दबी हुई इच्छाओं का नतीजा थीं, जिसे वह एक डॉक्टर होने के नाते भी शायद कभी बयां नहीं कर पाती।

अंजलि को हल्की सी शर्मिंदगी तो महसूस हो रही थी कि उसके बेटे ने उसके व्यक्तित्व का वो सिरा छू लिया जो दुनिया से छिपा था, पर उसके ममतामयी दिल में आर्यन के लिए प्यार और बढ़ गया। उसे पता था कि सुबह होते ही वह आर्यन को समझा लेगी और फिर से सब कुछ 'नॉर्मल' कर देगी।

इसी संतोष और हल्की सी मुस्कान के साथ, उसकी भारी आँखें धीरे-धीरे बंद होने लगीं। दवाइयाँ तो उसने नहीं ली थीं, लेकिन बेटे की उस बेपनाह फिक्र ने उसके मन को एक ऐसी शांति दी कि वह गहरी नींद की आगोश में चली गई।
 
ऊपर के कमरे में आर्यन ने रात भर की उधेड़बुन के बाद आखिरकार हिम्मत जुटाई। उसने अपना बैग उठाया, गहरी साँस ली और धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतरने लगा। उसका दिल अभी भी ज़ोर से धड़क रहा था। उसे लग रहा था कि वह माँ का सामना कैसे करेगा? क्या वह कल रात वाली बात छेड़ेंगी? या फिर एक भारी खामोशी उनके बीच हमेशा के लिए दीवार बन जाएगी?

जब वह नीचे पहुँचा, अंजलि रसोई के काउंटर पर खड़ी चाय छान रही थी। वह बिल्कुल शांत और सहज दिख रही थी, जैसे कल रात कुछ हुआ ही न हो।

"आ जा आर्यन, नाश्ता लग गया है। जल्दी कर वरना कॉलेज के लिए देर हो जाएगी," अंजलि ने बिना पीछे मुड़े, बहुत ही स्वाभाविक आवाज़ में कहा।

आर्यन मेज के पास आया और कुर्सी खींचकर बैठ गया। उसने अपनी नज़रें झुका रखी थीं, जैसे फर्श की टाइल्स में कोई बहुत ज़रूरी चीज़ ढूँढ रहा हो। वह अपनी प्लेट में रखे पराँठे को देख तो रहा था, पर उसे उठाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। कमरे में सन्नाटा इतना गहरा था कि घड़ी की टिक-टिक भी हथौड़े की तरह लग रही थी।

अंजलि ने चाय का कप उसके पास रखा और उसके सिर पर बहुत ही कोमलता से हाथ फेरा। उस एक स्पर्श ने आर्यन के अंदर के सारे बांध तोड़ दिए। उसने अपनी नज़रें ऊपर नहीं उठाईं, बस अपनी आवाज़ को स्थिर रखने की कोशिश की।

"माँ..." उसकी आवाज़ थोड़ी भर्राई हुई थी। "मुझे... मुझे कल रात के लिए सॉरी कहना है। मुझे आपका फोन नहीं छूना चाहिए था। मेरी वजह से आपको... आपको बुरा लगा होगा। मैं बस... आपकी फिक्र कर रहा था पर मुझे अपनी हद पार नहीं करनी चाहिए थी।"

अंजलि ने एक लंबी और गहरी साँस ली। उसने आर्यन के सामने वाली कुर्सी खींची और बैठ गई। उसने अपना हाथ आर्यन के हाथ पर रखा, जो अभी भी कांप रहा था।

उसने बहुत ही शांत और प्यार भरी आवाज़ में कहा, "पगले, सॉरी किस बात के लिए? उस फिक्र के लिए जो तूने अपनी माँ के लिए दिखाई? या उस प्यार के लिए कि तू रात भर मेरे कमरे के बाहर खड़ा रहा?"

आर्यन ने धीरे से अपनी नज़रें ऊपर उठाईं। उसने देखा कि माँ की आँखों में कोई गुस्सा या शर्मिंदगी नहीं थी, बल्कि एक अजीब सा सुकून और गर्व था।

अंजलि ने थोड़ी शरारत भरी मुस्कान के साथ कहा, "हाँ, मेरा फोन मेरा अपना निजी कोना है, और शायद तू अभी इतना बड़ा नहीं हुआ कि उस कोने को पूरी तरह समझ सके। पर इसका मतलब यह नहीं कि तूने कोई गुनाह कर दिया। तू मेरा बेटा है, और तेरी फिक्र ही मेरी सबसे बड़ी दवाई है। अब ये 'सॉरी-वोरी' छोड़ और चुपचाप नाश्ता कर, वरना टिफिन ठंडा हो जाएगा।"

आर्यन के सीने से जैसे एक बहुत बड़ा पत्थर हट गया। उसने एक हल्की मुस्कान दी और पराँठे का निवाला तोड़ा। वह समझ गया था कि रिश्ता चाहे कितना भी परिपक्व (mature) क्यों न हो जाए, माँ की ममता हमेशा उन असहज सच्चाइयों से बड़ी होती है।

नाश्ते की मेज पर अब माहौल थोड़ा हल्का तो हुआ था, लेकिन एक अनकही हिचकिचाहट अभी भी हवा में तैर रही थी। अंजलि जानती थी कि आर्यन एक समझदार और संवेदनशील लड़का है, और अगर उसने इस बात को यहीं सुलझाया नहीं, तो शायद वह हमेशा के लिए अपने मन में एक गांठ बांध लेगा।

उसने चाय का घूँट लिया और बहुत ही शांत भाव से आर्यन की ओर देखा, जो अब भी थोड़ा सिमटा हुआ बैठा था।

"आर्यन," अंजलि ने बहुत ही कोमल स्वर में उसे पुकारा। आर्यन ने अपनी नज़रें उठाईं।

"बेटा, कल रात जो हुआ... मैं चाहती हूँ कि तू उसे एक अलग नज़रिए से देख। देख, हम सब इंसान हैं। चाहे कोई डॉक्टर हो, माँ हो या बेटा—हर किसी का अपना एक निजी संसार होता है, अपनी कुछ ज़रूरतें और अपना एक तरीका होता है खुद को शांत रखने का।"

उसने थोड़ा रुक कर आर्यन के हाथ पर अपना हाथ रखा। "कल जो तूने देखा या सुना, वह कोई बीमारी नहीं थी जिसे दवाइयों से ठीक किया जा सके। वह बस एक तरीका था मेरे अपने तनाव (stress) को दूर करने का। कभी-कभी शरीर और मन को शांत करने के लिए इंसान को अपने अकेलेपन में कुछ चीज़ों का सहारा लेना पड़ता है। इसमें न कुछ गलत है, न कुछ शर्मनाक।"

आर्यन खामोशी से सुन रहा था। उसे अहसास हुआ कि उसकी माँ उसे एक 'बच्चे' की तरह नहीं, बल्कि एक 'वयस्क' (adult) की तरह समझा रही हैं।

अंजलि ने हल्की मुस्कान के साथ बात जारी रखी, "और सुन... अगली बार अगर कभी तुझे रात को ऐसी कोई आवाज़ सुनाई दे, या लगे कि मैं बेचैन हूँ, तो तुझे पागलों की तरह घबराने या थर्मामीटर लेकर दौड़ने की ज़रूरत नहीं है। तेरी माँ अपनी देखभाल करना जानती है। तू बस ये समझ ले कि वो मेरा अपना 'मी-टाइम' है।"

उसने थोड़ा मज़ाकिया लहजे में उसकी नाक खींची, "तू बस अपनी पढ़ाई और अपनी लाइफ पर ध्यान दे। मेरी फिक्र करना अच्छी बात है, पर इतनी भी नहीं कि तू खुद की नींद खराब कर ले। समझ गया?"

आर्यन के चेहरे पर अब एक वास्तविक राहत आई। उसे समझ आ गया कि माँ उससे कुछ छिपा नहीं रही हैं, बल्कि उसे यह बता रही हैं कि वह भी एक हाड़-मांस की इंसान हैं जिनकी अपनी एक प्राइवेट लाइफ है।

"जी माँ, मैं समझ गया। सॉरी फिर से, कि मैंने बात को कुछ और ही समझ लिया था," आर्यन ने मुस्कुराते हुए कहा।

"चल अब, मुस्कुराता हुआ कॉलेज जा। और हाँ, रास्ते में वो दूध का खाली पैकेट डस्टबिन में डाल देना जो तू कल रात काउंटर पर ही छोड़ आया था," अंजलि ने हँसते हुए उसे विदा किया।

आर्यन अपना बैग उठाकर बाहर निकला, तो उसे महसूस हुआ कि सुबह की हवा आज वाकई बहुत ताज़ा है। उनके बीच का वो भारीपन अब एक गहरी समझ में बदल चुका था।

शाम का समय था। बाहर आसमान में गोधूलि की लालिमा धीरे-धीरे धुंधली होकर स्याह हो रही थी। घर के अंदर की फिजा अब बिल्कुल बदल चुकी थी। सुबह की वो हल्की सी हिचकिचाहट और रात का वो भारीपन अब कहीं नहीं था। रसोई से फिर वही चिर-परिचित मसालों की खुशबू आ रही थी, जो इस घर की जीवंतता का प्रतीक थी।

आर्यन कॉलेज से वापस आकर हाथ-मुँह धोकर डाइनिंग टेबल पर बैठ गया था। अंजलि ने आज सादा लेकिन स्वादिष्ट खाना बनाया था—दाल तड़का, भिंडी की सब्जी और फुल्के।

"आज कॉलेज में क्या खास हुआ?" अंजलि ने रोटी पर घी लगाते हुए बहुत ही सहजता से पूछा।

आर्यन ने एक निवाला लिया और बोला, "वही रूटीन माँ। बस आज लाइब्रेरी में थोड़ा ज्यादा वक्त बिताया। प्रोजेक्ट के लिए कुछ पुरानी रिपोर्ट्स देखनी थी। और हाँ, आज तो कैंटीन का समोसा खाकर मेरा पेट ही भर गया था, पर आपकी दाल की खुशबू ने फिर से भूख जगा दी।"

अंजलि ने हँसते हुए उसकी थाली में एक और रोटी रखी। "समोसे कम खाया कर, सेहत के लिए अच्छे नहीं होते। और क्लिनिक में भी आज काफी रश था। मौसम बदल रहा है न, तो वायरल के पेशेंट्स बहुत बढ़ गए हैं।"

दोनों के बीच बातें इतनी सामान्य थीं कि लग ही नहीं रहा था कि कुछ घंटों पहले उनके बीच कोई असहज स्थिति बनी थी। वे फिल्म की चर्चा करने लगे, जो अगले हफ्ते रिलीज होने वाली थी। आर्यन ने अपने दोस्तों के किसी मज़ाक का ज़िक्र किया, जिस पर अंजलि खिलखिलाकर हँस पड़ी।

खाना खत्म करने के बाद, आर्यन ने अपनी प्लेट उठाई। अंजलि ने उसे देखा और मुस्कुराई, "आज फिर बर्तन धोने का इरादा है क्या?"

आर्यन ने मज़ाक में सिर हिलाया, "नहीं माँ, आज मेरा कोटा पूरा हो गया है। आज आप धोइये, मैं ज़रा अपनी पढ़ाई खत्म करता हूँ।"

"जा-जा, पढ़ाई कर," अंजलि ने प्यार से उसे झिड़का।

आर्यन जब अपनी सीढ़ियों की ओर बढ़ा, तो उसने पीछे मुड़कर देखा। माँ अपनी धुन में रसोई समेट रही थीं। दोनों को पता था कि अब उनके बीच कोई पर्दा नहीं है, बल्कि एक ऐसी समझ है जो शब्दों से परे है। रात का सन्नाटा अब डरावना नहीं, बल्कि एक सुकून देने वाली चादर जैसा था।

करीब आधे घंटे बाद, जब आर्यन ने ऊपर अपना थोड़ा काम निपटा लिया, उसे फिर से दूध की याद आई। इस बार उसके कदमों में वह हिचकिचाहट नहीं थी जो पिछली रात थी। वह सीढ़ियों से उतरकर सीधे रसोई की ओर बढ़ा।

रसोई का नज़ारा बिल्कुल बदला हुआ था। अंजलि अपना काम खत्म कर चुकी थी। स्लैब बिल्कुल साफ था, बर्तन अपनी जगह पर सलीके से लगे थे और सिंक सूखा हुआ था। अंजलि काउंटर के पास खड़ी अपनी आखिरी चाय का कप हाथ में लिए खिड़की के बाहर देख रही थी।

आर्यन को आता देख वह मुड़ी और मुस्कुराई, "आ गया दूध पीने? मुझे लगा था आज तू ऊपर ही सो जाएगा।"

आर्यन ने मुस्कुराते हुए शेल्फ से अपना गिलास निकाला, "बिना दूध के नींद कहाँ आती है माँ? और वैसे भी, आज तो मुझे पता है कि दूध कहाँ रखा है और टेम्परेचर भी बिल्कुल सही होगा।"

उसने हल्की शरारत के साथ बात कही, जिस पर अंजलि ने बस अपनी आँखें घुमाईं और मुस्कुरा दी। आर्यन ने पतीले से दूध गिलास में डाला। दूध अब भी हल्का गुनगुना था।

"माँ, आप बहुत जल्दी काम खत्म कर लेती हैं," आर्यन ने दूध का घूँट लेते हुए कहा। "अभी तो मैंने सोचा था कि शायद आप यहीं मिलेंगी।"

अंजलि ने अपना चाय का खाली कप सिंक में रखते हुए कहा, "आदत हो गई है बेटा। और फिर, घर साफ रहता है तो मन को भी शांति मिलती है। अब तू ये दूध खत्म कर और चुपचाप सोने जा। कल सुबह जल्दी उठना है।"

आर्यन ने गिलास खाली किया और उसे सिंक में धोकर रख दिया। "जी माँ, आप भी सो जाइये। आज रात आपको 'बुखार' नहीं चढ़ना चाहिए," उसने बहुत ही दबे स्वर में, मज़ाक और मासूमियत के मेल के साथ कहा।

अंजलि ने उसे हल्का सा धक्का दिया और हँसते हुए बोली, "चल बदमाश, ज्यादा स्मार्ट मत बन। गुड नाइट!"

"गुड नाइट माँ!" आर्यन मुस्कुराते हुए ऊपर की ओर बढ़ गया।

रसोई की लाइट बंद करते हुए अंजलि के मन में एक गहरा संतोष था। घर में अब कोई अनकही बात नहीं थी, कोई भारीपन नहीं था। सब कुछ साफ़, पारदर्शी और गरिमापूर्ण था। रात की खामोशी अब दोनों के लिए सुकून भरी थी।

आर्यन सीढ़ियों की ओर बढ़ा तो सही, लेकिन दूसरी या तीसरी पायदान पर पहुँचते ही उसके कदम ठिठक गए। उसके मन में एक ऐसा सवाल कौंधा जिसने उसे वापस मुड़ने पर मजबूर कर दिया। वह धीरे से घूमा और रसोई की दहलीज पर खड़ी माँ को देखने लगा।

आर्यन के चेहरे पर इस वक्त भावनाओं का एक अजीब सा संगम था। उसकी आँखों में वो मासूमियत थी जो बचपन में हुआ करती थी, आवाज़ में थोड़ी हिचकिचाहट और कल रात की घटना को लेकर मन के किसी कोने में दबी हुई हल्की सी शर्म।

उसने रेलिंग को कसकर पकड़ा और धीमी आवाज़ में पूछा, "माँ... एक बात पूछूँ?"

अंजलि, जो रसोई की लाइट बंद करने ही वाली थी, रुक गई। उसने मुड़कर आर्यन की ओर देखा, "हाँ बेटा, बोल?"

आर्यन ने नज़रें थोड़ी झुका लीं और फिर हिम्मत जुटाकर कहा, "कल रात... जो कुछ हुआ... उसके बाद मुझे एक डर लग रहा है। कल तो मैंने आपकी उन आवाज़ों को और शरीर की गर्मी को गलत समझ लिया था। लेकिन माँ, अगर कभी भविष्य में आपको वाकई में तेज़ बुखार हो या सच में कोई तकलीफ हो... तो मुझे कैसे पता चलेगा? मैं तो यही सोचकर रुक जाऊँगा कि शायद आप अपने 'निजी पल' में हैं।"

सवाल बहुत ही गहरा और संजीदा था। आर्यन की चिंता जायज़ थी—कहीं कल की उस घटना की वजह से उनके बीच संवाद की वो डोर न टूट जाए जो मुश्किल समय में काम आती है।

अंजलि कुछ पल के लिए शांत रही। उसने आर्यन के चेहरे पर पसरी उस फिक्र को देखा जो बिल्कुल शुद्ध थी। वह धीरे से चलकर सीढ़ियों के पास आई और आर्यन के कंधे पर हाथ रखा।

उसने बहुत ही सुकून भरी आवाज़ में कहा, "बेटा, माँ और बेटे के बीच एक ऐसा अदृश्य तार होता है जिसे किसी 'गलतफहमी' की ज़रूरत नहीं पड़ती। अगर कभी मुझे वाकई तुम्हारी ज़रूरत होगी, तो मेरी आवाज़ में वो दर्द और पुकार खुद-ब-खुद आ जाएगी जिसे तू पहचान लेगा। और दूसरी बात..."

उसने आर्यन की आँखों में झाँककर मुस्कुराते हुए कहा, "अब तू इतना बड़ा और समझदार हो गया है कि तू 'दिखावे' और 'हकीकत' के बीच का फर्क समझ सके। भरोसा रख, अगर कभी मुझे तकलीफ हुई, तो मैं खुद तुझे आवाज़ दे दूँगी। अब उस बात को लेकर अपने मन में कोई बोझ मत रख।"

आर्यन के चेहरे पर एक राहत भरी मुस्कान आ गई। उसकी सारी उलझन उस एक जवाब से सुलझ गई थी।

"थैंक यू माँ। गुड नाइट," उसने हल्के मन से कहा।

"गुड नाइट, मेरे फिक्रमंद डॉक्टर!" अंजलि ने चुटकी ली और आर्यन मुस्कुराता हुआ तेज़ी से ऊपर अपने कमरे की ओर बढ़ गया।
 
रात का सन्नाटा एक बार फिर गहरा चुका था। घड़ी की सुइयां 1:00 बजे का वक्त दिखा रही थीं। ऊपर अपने कमरे में आर्यन गहरी नींद में था, लेकिन अचानक उसकी आँखें खुल गईं। पता नहीं कोई सपना था या मन की कोई गहरी बेचैनी, पर उसकी नींद पूरी तरह उड़ चुकी थी।

वह बिस्तर पर लेटा रहा, लेकिन उसके दिमाग में एक सवाल बार-बार कौंध रहा था। क्या कल रात जो हुआ, वह सिर्फ एक इत्तेफाक था? क्या माँ आज वाकई ठीक हैं?

बिना किसी शोर के, आर्यन बिस्तर से उठा। आज उसने फोन की टॉर्च नहीं जलाई। वह अंधेरे का आदी हो चुका था। वह दबे पाँव सीढ़ियों से नीचे उतरा। दिल की धड़कन आज भी तेज़ थी, पर उसमें कल जैसी घबराहट नहीं, बल्कि एक अजीब सी जिज्ञासा थी।

वह माँ के कमरे के दरवाज़े के पास पहुँचा। गलियारे में वही सन्नाटा था। उसने अपनी साँसें रोकीं और धीरे से अपना कान दरवाज़े की लकड़ी से सटा दिया।

वही आवाज़ें...

आज भी कमरे के अंदर से वही हल्की-हल्की सिसकारियों की गूँज सुनाई दे रही थी। वह टूटी हुई साँसें और चादरों की सरसराहट बिल्कुल कल रात जैसी ही थी। आर्यन को अब थर्मामीटर की ज़रूरत नहीं थी, न ही उसे यह जानने की ज़रूरत थी कि माँ को बुखार है या नहीं।

उसे अब समझ आ गया था कि यह माँ की दिनभर की थकान, तनाव और उनके अपने अकेलेपन को दूर करने का उनका निजी तरीका था। वह आवाज़ें जिसे वह कल तक 'तकलीफ' समझ रहा था, वह दरअसल उनकी अपनी एक दुनिया थी जहाँ वह कुछ पलों के लिए सिर्फ 'अंजलि' थीं, न कि किसी की माँ या कोई डॉक्टर।

आर्यन कुछ पलों तक वहीं खड़ा रहा। उसके चेहरे पर अब कोई हैरानी नहीं थी, न ही कोई बेचैनी। उसने शांति से अपना सिर दरवाज़े से हटाया। उसने महसूस किया कि हर इंसान के पास एक ऐसा कमरा होता है जहाँ वह अपनी भावनाओं को आज़ाद छोड़ देता है।

वह बिना कोई आहट किए चुपचाप ऊपर अपने कमरे में वापस आ गया। बिस्तर पर लेटकर वह छत की ओर देखने लगा। उसके मन में अब कोई कड़वाहट या शर्म नहीं थी। उसने सोचा कि माँ दिन भर सबके लिए कितनी मज़बूत बनी रहती हैं, शायद रात के इन चंद पलों में ही वह खुद को ढूँढती होंगी।

एक गहरी और सुकून भरी साँस लेकर उसने आँखें मूँद लीं। वह समझ चुका था कि 'निजता' (Privacy) का सम्मान करना ही सबसे बड़ी परिपक्वता है। इसी सोच के साथ, कुछ ही देर में वह गहरी और शांत नींद की आगोश में चला गया।

अगली सुबह की शुरुआत बिल्कुल वैसी ही हुई जैसी हर रोज़ होती थी। खिड़की से आती ताज़ी हवा और रसोई से आती बर्तनों की खनक ने आर्यन की नींद खोली। रात की उस खोज के बाद आर्यन के मन में अब एक अजीब सी शांति थी। वह अब अपनी माँ को सिर्फ एक 'अभिभावक' के तौर पर नहीं, बल्कि एक 'इंसान' के तौर पर देख पा रहा था।

नाश्ते की मेज पर सब कुछ सामान्य था। अंजलि ने ताज़े पराँठे और दही परोसा। दोनों ने हँसी-मजाक किया, कॉलेज के प्रोजेक्ट्स पर बात की और अंजलि ने उसे ढेर सारी हिदायतें दीं। रात के उस सन्नाटे और उन आवाज़ों का कोई ज़िक्र नहीं था, पर आर्यन के व्यवहार में आज एक नई तरह की गंभीरता और सम्मान था।

"माँ, आज शाम को आप क्लिनिक में अकेली होंगी क्या?" आर्यन ने चाय का आखिरी घूँट लेते हुए पूछा।

अंजलि ने टिफिन पैक करते हुए कहा, "हाँ बेटा, आज नर्स लता छुट्टी पर है और शाम को मरीज़ों का काफी रश रहता है। थोड़ा हेक्टिक (hectic) होने वाला है आज, क्यों?"

आर्यन मुस्कुराया और अपना बैग उठाते हुए बोला, "बस ऐसे ही पूछ रहा था। आप अपना ध्यान रखना।"

शाम के ठीक पांच बजे, जब अंजलि अपने केबिन में एक मरीज़ की फाइल देख रही थी, तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। उसने सिर उठाकर देखा तो हैरान रह गई। आर्यन दरवाजे पर खड़ा था, उसकी शर्ट की आस्तीनें मुड़ी हुई थीं और चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान थी।

"तुम यहाँ? इस वक्त?" अंजलि ने चश्मा उतारते हुए पूछा।

"मैंने सोचा आज नर्स नहीं है, तो आपकी हेल्प कर दूँ। आखिर मैं भी तो डॉक्टर का बेटा हूँ, पर्चियाँ बनाना और मरीज़ों को नंबर से बुलाना तो मैं भी कर सकता हूँ," आर्यन ने अंदर आते हुए कहा।

अंजलि की आँखें खुशी से चमक उठीं। उसे समझ आ गया कि आर्यन यह सब क्यों कर रहा है। वह उसकी थकान और उसके काम के बोझ को कम करना चाहता था।

पूरी शाम आर्यन ने एक सहायक की तरह क्लिनिक का सारा बाहरी काम संभाला। वह मरीज़ों से शांति से बात कर रहा था, फाइलें मैनेज कर रहा था और बीच-बीच में माँ के लिए पानी और चाय का भी इंतज़ाम कर रहा था। अंजलि ने केबिन के अंदर से उसे काम करते देखा, तो उसे अहसास हुआ कि उसका बेटा वाकई बहुत बड़ा और ज़िम्मेदार हो गया है।

काम के बीच में जब भी उनकी नज़रें मिलतीं, एक मूक संवाद होता—एक ऐसा रिश्ता जहाँ अब शब्दों की ज़रूरत नहीं थी। आर्यन अपनी माँ के संघर्ष और उनकी मेहनत को करीब से देख रहा था, और अंजलि अपने बेटे की उस निस्वार्थ सेवा को महसूस कर रही थी।

क्लिनिक का व्यस्त समय खत्म होने के बाद, घर की रसोई से आती खुशबू और डाइनिंग टेबल पर सजी थालियाँ दिन भर की थकान को कम करने के लिए काफी थीं। रात के करीब 9 बज रहे थे। अंजलि और आर्यन आज साथ में खाना खाने बैठे थे। माहौल में एक बहुत ही सुकून भरी और घरेलू शांति थी।

अंजलि ने आर्यन की थाली में गर्मागर्म दाल परोसी और खुद भी सामने बैठ गई। "आज सच में तूने बहुत बड़ी मदद कर दी आर्यन। मुझे अंदाज़ा नहीं था कि तू इतनी कुशलता से क्लिनिक का रश संभाल लेगा। सच कहूँ तो, आज मुझे थकान बहुत कम महसूस हो रही है।"

आर्यन ने निवाला तोड़ते हुए मुस्कुराकर कहा, "अरे माँ, इसमें कौन सी बड़ी बात है? बल्कि आज मुझे अहसास हुआ कि आप अकेले इतना सब कैसे मैनेज करती हैं। इतने तरह के लोग, उनकी परेशानियाँ... और आप सबके साथ कितनी शांति से पेश आती हैं। सच में, आप बहुत 'सुपरवुमन' टाइप की डॉक्टर हैं।"

अंजलि धीरे से हँसी। "सुपरवुमन नहीं रे, बस ज़िम्मेदारी है। जब मरीज़ ठीक होकर जाता है, तो सब थकान मिट जाती है। पर हाँ, आज तेरा वहाँ होना मेरे लिए एक बड़े सपोर्ट जैसा था।"

दोनों के बीच बातें बहुत ही सरल और गहरी थीं। आर्यन ने कॉलेज के कुछ किस्से सुनाए और अंजलि ने अपने मेडिकल कॉलेज के दिनों की कुछ पुरानी यादें साझा कीं। बातचीत का सिलसिला ऐसा था कि पता ही नहीं चला कि कब डिनर खत्म हो गया।

खाने के बाद, आर्यन ने अपनी प्लेट उठाई और बहुत ही सहजता से बोला, "माँ, आप जाकर आराम कीजिये। आज क्लिनिक में आपने बहुत काम किया है। किचन मैं संभाल लूँगा।"

अंजलि उसे गौर से देखती रही। उसे महसूस हुआ कि आर्यन के मन में जो कल रात और आज सुबह की उलझन थी, वह अब पूरी तरह एक सम्मान और सेवा भाव में बदल चुकी थी। अब उनके बीच कोई पर्दा या असहजता नहीं बची थी।

"ठीक है भाई, आज तू ही 'घर का डॉक्टर' बन जा," अंजलि ने प्यार से उसके गाल थपथपाए और कमरे की ओर बढ़ने लगी।

आर्यन ने रसोई की लाइट जलाई और बर्तन समेटने लगा। आज रात घर का कोना-कोना एक अलग ही पवित्रता और मिठास से भरा हुआ था। दोनों ने एक-दूसरे के व्यक्तित्व के उन कोनों को स्वीकार कर लिया था जो अक्सर शब्दों में नहीं कहे जाते।

रसोई की दीवारों पर पीली रोशनी की चमक थी और बाहर रात का गहरा सन्नाटा। आर्यन ने दूध का पतीला चूल्हे पर रखा और गैस जला दी। वह धीमे-धीमे चम्मच से दूध को हिला रहा था, तभी पीछे से हल्की खनक सुनाई दी। अंजलि अपनी नाइट गाउन पर शॉल ओढ़े रसोई में दाखिल हुई।

"अभी तक सोया नहीं?" अंजलि ने काउंटर का सहारा लेकर खड़े होते हुए पूछा। उसकी आवाज़ में एक सुकून भरी थकावट थी।

"बस माँ, दूध गरम हो जाए फिर जाऊंगा," आर्यन ने अपनी नज़रें पतीले पर ही टिकाए रखीं। दूध में उबाल आने ही वाला था। उसने गैस धीमी की और एक लंबी सांस ली।

कल रात से जो बातें उसके सीने में दबी थीं, और आज शाम क्लिनिक में जो उसने महसूस किया था, वह सब अब जुबान पर आने के लिए बेताब था। उसके चेहरे पर एक हल्की हिचकिचाहट थी, वह शब्दों को चुन रहा था ताकि कोई बात गलत न लग जाए।

"माँ..." उसने बहुत धीरे से शुरुआत की।

"हूँ?" अंजलि ने उसे गौर से देखा।

आर्यन ने दूध को दो गिलासों में पलटा और एक गिलास माँ की ओर बढ़ाते हुए बोला, "आज क्लिनिक में मैंने आपको देखा... आप दूसरों के दर्द को इतनी आसानी से सुन लेती हैं, उनका इलाज करती हैं। पर मुझे आज अहसास हुआ कि आप अपनी थकान, अपना अकेलापन और अपनी ज़रूरतें किसी से नहीं कहतीं।"

वह थोड़ा रुका, फिर नज़रे झुकाकर बोला, “उस रात मैं जो कुछ भी समझ रहा था या जो मैंने देखा... मुझे पहले लगा कि मैं शर्मिंदा हूँ। पर आज दिन भर आपके साथ रहने के बाद मुझे समझ आया कि आप भी तो एक इंसान हैं। आपकी अपनी भी एक लाइफ है जिसे शायद मैं अब तक सिर्फ 'माँ' के चश्मे से देख रहा था।"

उसकी आवाज़ में थोड़ी शर्म थी लेकिन बहुत सारा सम्मान। "मैं बस ये कहना चाहता था कि... आप जैसी भी हैं, आप दुनिया की सबसे अच्छी माँ हैं। और अब मैं आपकी प्राइवेसी का उतना ही सम्मान करूँगा जितना आपकी ममता का करता हूँ।"

रसोई में एक पल के लिए खामोशी छा गई। दूध की भाप उनके बीच के उस आखिरी धुंधलके को भी साफ कर रही थी। अंजलि ने गिलास थामा और आर्यन की आँखों में देखा। उसकी आँखों में एक अजीब सी नमी थी, पर होठों पर एक ऐसी मुस्कान जो कह रही थी कि आज उसका बेटा वाकई में 'बड़ा' हो गया है।

"शुक्रिया आर्यन," अंजलि ने बस इतना ही कहा, पर उन दो शब्दों में पूरी कायनात का सुकून था।

आर्यन ने दूध का गिलास हाथ में पकड़ा हुआ था, लेकिन उसकी नजरें अभी भी नीचे फर्श पर थीं। वह अपनी बात कहने के लिए पूरी हिम्मत जुटा रहा था। उसे पता था कि विषय संवेदनशील है, लेकिन उसकी फिक्र उसकी झिझक से कहीं ज्यादा बड़ी थी।

आर्यन ने एक गहरी सांस ली और माँ की ओर देखते हुए बहुत ही संजीदगी से बोलना शुरू किया।

"माँ... उस रात जो हुआ, उसके बाद मेरी उत्सुकता (curiosity) बढ़ गई थी। मैं समझ नहीं पा रहा था कि वो सब क्या था, इसलिए मैंने इसके बारे में थोड़ा पढ़ा और रिसर्च की कि आखिर यह सब क्या होता है और शरीर पर इसका क्या असर पड़ता है।"

अंजलि खामोश रही, वह बस आर्यन की बातों को गहराई से सुन रही थी।

आर्यन ने आगे कहा, "जहाँ तक मैंने पढ़ा और समझा है... मैं जानता हूँ कि यह तनाव कम करने का एक तरीका है, लेकिन माँ, इसे रोज-रोज करना शायद सही नहीं है। लेखों (articles) में लिखा था कि इसकी अति करने से आपकी सेहत, स्टैमिना (Stamina) और वाइटालिटी पावर (Vitality Power) में कमी आ सकती है। आप दिन भर क्लिनिक में इतनी मेहनत करती हैं, इतनी भागदौड़ करती हैं... मैं नहीं चाहता कि किसी भी वजह से आपकी ऊर्जा कम हो या आपको कमजोरी महसूस हो।"

उसके चेहरे पर कोई निर्णय (judgment) नहीं था, सिर्फ एक डॉक्टर के बेटे की वैज्ञानिक फिक्र और एक बच्चे की अपनी माँ के प्रति चिंता थी।

उसने धीमी आवाज में बात खत्म की, "मैं बस आपकी सेहत को लेकर फिक्रमंद हूँ माँ। आप हम सबके लिए बहुत ज़रूरी हैं, और आपकी वाइटालिटी ही इस घर की जान है। इसलिए... बस अपना ख्याल रखियेगा।"

रसोई में एक गरिमापूर्ण सन्नाटा पसर गया। अंजलि ने देखा कि आर्यन ने इस विषय को कितनी परिपक्वता (maturity) के साथ एक स्वास्थ्य संबंधी चिंता (health concern) से जोड़ दिया था। उसकी बातों में कोई अश्लीलता नहीं थी, बल्कि एक शुद्ध और वैज्ञानिक दृष्टिकोण था।

अंजलि ने एक लंबी सांस ली और आर्यन के कंधे को थपथपाते हुए कहा, "तू वाकई अब बड़ा हो गया है आर्यन। तूने न सिर्फ मेरी स्थिति को समझा, बल्कि एक डॉक्टर की तरह मेरी सेहत की भी फिक्र की। मैं तेरी बात का ध्यान रखूँगी। अब तू फिक्र छोड़ और शांति से जाकर सो जा।"

अगले पंद्रह दिन आर्यन के लिए किसी कशमकश से कम नहीं थे। घर का माहौल ऊपरी तौर पर तो बिल्कुल सामान्य था—वही सुबह की चाय, वही क्लिनिक की बातें और वही शाम का साथ। लेकिन आर्यन के मन के किसी कोने में एक बेचैनी घर कर गई थी।

उस रात की बातचीत के बाद आर्यन को लगा था कि शायद चीजें बदलेंगी। उसे उम्मीद थी कि उसकी वैज्ञानिक सलाह और उसकी फिक्र का माँ पर असर होगा। लेकिन हकीकत कुछ और ही थी। पिछले दो हफ्तों से, जब भी रात के सन्नाटे में घर की लाइटें बुझतीं और आर्यन अपने कमरे में सोने की कोशिश करता, उसे नीचे के कमरे से वही चिर-परिचित आहटें सुनाई देतीं।

वह रोज़ रात को जागता, छत को घूरता और दीवार घड़ी की टिक-टिक के साथ उन सिसकारियों को सुनता। उसे अब उन आवाजों से कोई 'शॉक' नहीं लगता था, बल्कि एक गहरी चिंता होने लगी थी।

उसने गौर किया था कि पिछले कुछ दिनों में अंजलि के चेहरे पर थकान की लकीरें थोड़ी गहरी हो गई थीं। सुबह जब वह नाश्ते की मेज पर आती, तो उसकी आँखों के नीचे हल्के काले घेरे साफ़ दिखते थे। हालाँकि वह मुस्कुराकर अपनी थकान छिपा लेती थी, लेकिन आर्यन की पारखी नज़रें देख पा रही थीं कि उसकी वाइटालिटी और स्टैमिना वाकई प्रभावित हो रहे थे।

"माँ खुद एक डॉक्टर हैं, फिर भी वह अपनी सेहत के साथ यह खिलवाड़ क्यों कर रही हैं?" आर्यन अक्सर खुद से यह सवाल पूछता।

उसके मन में कई विचार आते—क्या यह तनाव का कोई बहुत गहरा रूप है? या फिर माँ को मेरी बातों का बुरा लगा और उन्होंने उसे नज़रअंदाज़ कर दिया? उसे अपनी मर्यादा का भी ख्याल था, लेकिन माँ की गिरती सेहत उससे देखी नहीं जा रही थी। उसने महसूस किया कि सिर्फ एक बार कह देना काफी नहीं था।

आज शाम जब वह कॉलेज से घर लौट रहा था, तो उसने मन ही मन एक कड़ा निर्णय लिया। उसने सोचा कि चुप्पी साध लेने से समस्या हल नहीं होगी। एक बेटा होने के नाते, अगर वह आज अपनी माँ को सही रास्ता नहीं दिखा पाया, तो शायद वह खुद को कभी माफ़ नहीं कर पाएगा।

"आज मुझे फिर से बात करनी होगी। चाहे कितनी भी हिचकिचाहट क्यों न हो, चाहे माहौल कितना भी असहज क्यों न हो जाए, पर मुझे उन्हें समझाना होगा कि यह 'रूटीन' उनकी सेहत के लिए ठीक नहीं है।"

घर पहुँचते ही उसने देखा कि अंजलि रसोई में शाम की चाय बना रही थी। वह थकी हुई लग रही थी, उसने अपनी गर्दन को हल्के से झटका दिया जैसे कि वह दर्द में हो। आर्यन ने अपना बैग सोफे पर रखा और गहरी साँस ली। उसने खुद को मानसिक रूप से तैयार किया कि आज का संवाद कल के दूध वाले संवाद से कहीं ज्यादा गंभीर और सीधा होगा।

सूरज ढल रहा था, और आर्यन खिड़की के पास खड़ा होकर बस उस सही पल का इंतज़ार करने लगा जब वह एक बार फिर मर्यादा और ममता के बीच का वह पुल पार कर अपनी माँ से बात कर सके।

डिनर के बाद का समय था। आज रात घर का सन्नाटा कल की तुलना में कुछ ज़्यादा भारी लग रहा था। अंजलि मेज साफ कर रही थी, लेकिन उसकी हरकतों में वो फुर्ती नहीं थी जो अमूमन होती थी। आर्यन वहीं बैठा रहा, उसने अपना हाथ अपनी माँ के हाथ पर रखा और उन्हें रुकने का इशारा किया।

"माँ, बैठिए। मुझे आपसे कुछ बहुत ज़रूरी बात करनी है," आर्यन की आवाज़ में एक ऐसी दृढ़ता थी जिसे अंजलि टाल नहीं सकी। वह धीरे से सामने वाली कुर्सी पर बैठ गई।

आर्यन ने कुछ पल खामोशी से उनकी थकी हुई आँखों में देखा। "पिछले 15 दिनों से मैं देख रहा हूँ माँ। मैंने आपसे कहा था कि आपकी सेहत गिर रही है, लेकिन कुछ भी नहीं बदला। आपकी आँखें, आपकी ये थकान... सब कुछ बता रही हैं कि आप अभी भी उसी रूटीन में फंसी हुई हैं। क्यों माँ? आप तो खुद डॉक्टर हैं, आप इसके परिणामों को मुझसे बेहतर जानती हैं।"

अंजलि ने पहले तो नज़रे चुराने की कोशिश की, लेकिन जब उसने आर्यन की आँखों में छिपी बेपनाह फिक्र देखी, तो उसका बांध टूट गया। उसने एक लंबी और बोझिल साँस ली और अपना चेहरा अपने हाथों में छिपा लिया।

"आर्यन..." उसकी आवाज़ थकी हुई और कंपकपाती हुई थी। "मुझे लगा था कि मैं इसे कंट्रोल कर लूंगी। मुझे लगा था कि तेरी बात सुनने के बाद मैं रुक जाऊँगी। लेकिन सच तो ये है कि..." वह रुकी, जैसे शब्द गले में फंस रहे हों।

उसने आर्यन की ओर देखते हुए बहुत ही बेबसी से कहा, "बेटा, ये अब मेरी इच्छा (choice) नहीं रही, ये मेरा एक एडिक्शन (Addiction) बन चुका है।"

आर्यन स्तब्ध रह गया। उसने इस शब्द की उम्मीद नहीं की थी।

अंजलि ने आगे कहा, "दिन भर का तनाव, वो अकेलापन और फिर रात का वो सन्नाटा... शुरुआत में ये सिर्फ सुकून पाने का एक ज़रिया था। लेकिन अब, मुझे खुद नहीं पता कि कब ये मेरी मजबूरी बन गया। मैं रात को लेटी होती हूँ, मेरा दिमाग कहता है कि 'नहीं अंजलि, ये गलत है, तेरी सेहत गिर रही है', लेकिन मेरा शरीर मेरी बात नहीं सुनता। मैं चाहकर भी खुद को रोक नहीं पाती आर्यन। मुझे खुद से चिढ़ होने लगती है, पर मैं इस चक्रव्यूह से बाहर नहीं निकल पा रही हूँ।"

अंजलि की आँखों में आँसू थे—एक ऐसी माँ के आँसू जो अपने ही मन के सामने हार चुकी थी। वह एक सफल डॉक्टर थी, एक आदर्श माँ थी, लेकिन इस एक निजी कमज़ोरी ने उसे भीतर से झकझोर दिया था।

आर्यन को अब गुस्सा नहीं, बल्कि अपनी माँ के लिए गहरी सहानुभूति महसूस हुई। उसने देखा कि उसकी माँ किसी 'बुराई' में नहीं, बल्कि एक 'बीमारी' की गिरफ्त में थी।

"माँ, आपने इसे स्वीकार किया, यही सबसे बड़ी बात है," आर्यन ने उनका हाथ मजबूती से थामते हुए कहा। "अगर ये एडिक्शन है, तो हम इससे लड़ेंगे। आप अकेली नहीं हैं। अब इसे रोकना मेरी भी ज़िम्मेदारी है।"

आर्यन ने अपनी माँ की आँखों में झाँका। वहाँ ग्लानि और बेबसी की एक गहरी परत थी। उसने महसूस किया कि सलाह और उपदेशों का समय अब निकल चुका है; अब समय था साथ खड़े होने का। एक डॉक्टर जब खुद मरीज़ बन जाए, तो उसे दवा से ज़्यादा देखभाल की ज़रूरत होती है।

आर्यन ने एक पल के लिए भी झिझक नहीं दिखाई। उसने अंजलि के हाथों को अपने हाथों में थोड़ा और कस लिया।

"माँ, अकेलेपन से लड़ना आसान नहीं होता, और जब कोई चीज़ लत बन जाए, तो इच्छाशक्ति भी जवाब दे देती है," आर्यन ने बहुत ही शांत और सुलझे हुए लहजे में कहा। "आप खुद को रोक नहीं पा रही हैं क्योंकि रात का वो सन्नाटा आपको मजबूर कर देता है। इसलिए, मैंने एक फैसला किया है।"

अंजलि ने सवालिया नज़रों से उसे देखा।

आर्यन ने एक हल्की मुस्कान के साथ कहा, "आज से मैं आपके साथ आपके ही कमरे में सोऊंगा। बिल्कुल वैसे ही, जैसे मैं बचपन में सोया करता था।"

अंजलि के चेहरे पर हैरानी के भाव थे। "लेकिन आर्यन... तू अब बड़ा हो गया है, तेरा अपना स्पेस है... और मैं नहीं चाहती कि मेरी वजह से तेरी नींद खराब हो।"

"मेरी नींद आपकी सेहत से बढ़कर नहीं है माँ," आर्यन ने दृढ़ता से कहा। "जब मैं छोटा था और मुझे डर लगता था, तब आप मुझे अपने पास सुलाती थीं। आज आपको मेरी ज़रूरत है। जब मैं आपके पास रहूँगा, तो आप अकेला महसूस नहीं करेंगी। हम बातें करेंगे, पुरानी यादें ताज़ा करेंगे और जब तक आपको गहरी नींद नहीं आ जाएगी, मैं वहीं रहूँगा। आपकी ये लत सिर्फ तभी टूटेगी जब वो 'अकेलापन' खत्म होगा।"

अंजलि की आँखों से एक आँसू टपक कर आर्यन के हाथ पर गिरा। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि उसका बेटा इतना बड़ा और समझदार हो गया है कि वह उसकी गरिमा को ठेस पहुँचाए बिना उसे इस दलदल से निकालने के लिए खुद को समर्पित कर रहा है।

"तुझे सच में लगता है कि इससे फर्क पड़ेगा?" अंजलि ने धीमी आवाज़ में पूछा।

"पक्का पड़ेगा माँ," आर्यन ने मुस्कुराते हुए उसका हाथ थामकर उसे खड़ा किया। "चलिए, आज से हमारा ये नया रूटीन शुरू होता है। आप चलिए, मैं दूध लेकर आता हूँ।"

उस रात, सालों बाद आर्यन अपना तकिया लेकर अपनी माँ के कमरे में गया। उसने कमरे की वो भारी और तनावपूर्ण खामोशी को खत्म करने के लिए हल्की-फुल्की बातें शुरू कीं। वह बिस्तर के एक तरफ लेट गया, और अंजलि दूसरी तरफ।

अंजलि को बहुत समय बाद एक ऐसी सुरक्षा और सुकून का अहसास हुआ जिसकी उसे कमी थी। उसे लगा कि उसके पास अब एक ऐसा प्रहरी (Guardian) है जो उसे खुद उसकी कमज़ोरियों से बचा लेगा। उस रात, कमरे में कोई सिसकारी नहीं थी, कोई छटपटाहट नहीं थी; बस माँ-बेटे की धीमी गुफ्तगू थी जो धीरे-धीरे सुकून भरी नींद में तब्दील हो गई।
 
अगली सुबह जब खिड़की से सूरज की पहली किरण कमरे में आई, तो उसने एक बहुत ही शांत और पवित्र दृश्य देखा। सालों बाद अंजलि की नींद बिना किसी मानसिक बोझ या थकान के खुली थी। उसके चेहरे पर वह भारीपन नहीं था जो पिछले पंद्रह दिनों से घर कर गया था।

नाश्ते की मेज पर आज का नज़ारा कुछ अलग ही था। अंजलि ने आज सादे परांठे नहीं, बल्कि आर्यन की पसंद का खास पोहा और अदरक वाली चाय बनाई थी। उसकी चाल में एक नई ऊर्जा थी और आँखों में वो चमक वापस लौट आई थी, जो कहीं खो गई थी।

"आज तो नींद बहुत गहरी आई," अंजलि ने चाय का कप आर्यन की ओर बढ़ाते हुए मुस्कुराकर कहा। उसकी आवाज़ में वो खनक थी जो आर्यन ने बहुत समय से नहीं सुनी थी।

आर्यन ने पोहे का लुत्फ लेते हुए कहा, "सच में माँ! और मुझे तो पता ही नहीं चला कि कब बातें करते-करते हम सो गए। आपकी वो मेडिकल कॉलेज वाली कहानी सुनते-सुनते मुझे कब नींद आई, याद ही नहीं।"

अंजलि ने कुर्सी खींचकर उसके सामने बैठते हुए कहा, "पता है आर्यन, मुझे अहसास ही नहीं हुआ था कि बस किसी का साथ होना कितना बड़ा फर्क पैदा कर सकता है। रात भर मुझे एक बार भी वो बेचैनी नहीं हुई। मुझे लग रहा है जैसे मेरा मन बहुत हल्का हो गया है।"

आर्यन ने माँ का हाथ थामकर संजीदगी से कहा, "मैंने कहा था न माँ, अकेलापन ही हर मुश्किल की जड़ होता है। अब जब हम साथ हैं, तो वो 'एडिक्शन' आपको छू भी नहीं पाएगा। आज आपका चेहरा बहुत फ्रेश लग रहा है, क्लिनिक में मरीज़ भी कहेंगे कि आज डॉक्टर साहिबा बहुत खुश हैं।"

दोनों खिलखिलाकर हँस पड़े। नाश्ते के दौरान वे अब उस पुरानी समस्या पर नहीं, बल्कि आने वाले कल की योजनाओं पर बातें कर रहे थे। वे छुट्टियों में कहीं बाहर घूमने जाने की प्लानिंग करने लगे और उन किताबों के बारे में चर्चा की जो वे साथ मिलकर पढ़ सकते थे।

अंजलि को महसूस हुआ कि उसके बेटे ने न केवल उसे एक बुरी लत से बचाया है, बल्कि उनके रिश्ते को एक ऐसे पायदान पर ले आया है जहाँ सम्मान और विश्वास की जड़ें बहुत गहरी हैं।

चाय खत्म करके जब आर्यन अपना बैग उठाकर कॉलेज के लिए निकलने लगा, तो अंजलि ने उसे दरवाज़े तक छोड़ा। "शाम को जल्दी आना, मैं तेरी पसंद की खीर बनाऊँगी," उसने प्यार से कहा।

"बिल्कुल माँ! और शाम को फिर से ढेर सारी बातें करेंगे," आर्यन ने हाथ हिलाते हुए विदा ली।

आज हवा में एक अलग ही मिठास थी। घर अब सिर्फ चार दीवारों का ढांचा नहीं था, बल्कि एक ऐसा सुरक्षित किला बन गया था जहाँ ममता और समझदारी ने मिलकर हर बुराई को बाहर का रास्ता दिखा दिया था।

रात की खामोशी एक बार फिर घर पर दस्तक दे रही थी, लेकिन आज इस खामोशी में कोई बोझ नहीं था। डिनर के बाद आर्यन और अंजलि अपने कमरे में आ गए। कमरे की हल्की नीली नाइट लैंप की रोशनी में माहौल बहुत ही शांत और सुरक्षित महसूस हो रहा था।

बिस्तर पर लेटे हुए आर्यन ने तकिया ठीक किया और बोला, "माँ, आज क्लिनिक में वो खन्ना जी आए थे क्या? जो हमेशा अपनी बीमारी से ज्यादा अपनी पड़ोसन के झगड़ों की बात करते हैं?"

अंजलि खिलखिलाकर हँस पड़ी। "हाँ! आज तो हद ही हो गई। उन्हें जुकाम था, पर वो मुझे ये समझा रहे थे कि उनके घर के सामने वाली आंटी ने कैसे उनके गमले थोड़े बाईं तरफ खिसका दिए। आधा घंटा तो उन्होंने सिर्फ गमलों की पॉलिटिक्स पर निकाल दिया!"

आर्यन ने हाथ से इशारा करते हुए खन्ना जी की मिमिक्री की, "डॉक्टर साहिबा, आप दवा तो दे रही हैं, पर क्या आपके पास उन गमलों का कोई इलाज है?"

दोनों कमरे में ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे। हँसी के ये गुब्बारे उस कमरे की सारी पुरानी यादों और भारीपन को उड़ा ले जा रहे थे। हँसते-हँसते अंजलि की आँखों में खुशी के आँसू आ गए। उसे याद भी नहीं था कि वह पिछली बार इस तरह कब बेफिक्र होकर हँसी थी।

"तू ना... बिल्कुल अपने पापा पर गया है, वैसी ही फालतू की बातें करके हँसाना जानता है," अंजलि ने अपना कंबल ओढ़ते हुए कहा।

"अरे माँ, हँसना सबसे बड़ी थेरेपी है," आर्यन ने थोड़ा गंभीर होते हुए लेकिन प्यार से कहा। "अब देखिये, रात के सवा ग्यारह बज रहे हैं और हमें नींद आने लगी है। कोई तनाव नहीं, कोई बेचैनी नहीं। बस अच्छे जोक्स और आपकी ये प्यारी सी हँसी।"

अंजलि ने आर्यन की तरफ करवट ली और उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोली, "थैंक यू आर्यन। मुझे वापस 'मैं' बनाने के लिए शुक्रिया।"

"गुड नाइट माँ, अब आँखें बंद कीजिये।" आर्यन ने लाइट बंद करते हुए कहा।

"गुड नाइट बेटा," अंजलि ने सुकून से अपनी आँखें मूंद लीं।

अंधेरे कमरे में अब सिर्फ दो इंसानों की शांत और गहरी साँसों की आवाज़ थी। कोई पुरानी लत, कोई अकेलापन अब उस कमरे की चौखट पार करने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था। कुछ ही मिनटों में दोनों गहरी और मीठी नींद की आगोश में समा गए।

देखते-देखते एक सप्ताह बीत गया। यह सात दिन उस घर के लिए किसी बड़े बदलाव से कम नहीं थे। जो घर कभी भारी खामोशी और अनकहे तनावों से भरा रहता था, अब वहाँ सुबह की चाय के साथ हँसी की गूँज सुनाई देती थी और रात के सन्नाटे की जगह सुकून भरी नींद ने ले ली थी।

इन सात दिनों में आर्यन और अंजलि का रिश्ता एक नए धरातल पर पहुँच गया था। अब यह सिर्फ माँ-बेटे का रिश्ता नहीं था, बल्कि दो ऐसे दोस्तों का साथ था जो एक-दूसरे की परवाह बिना कहे करना जानते थे।

हर रात आर्यन अपना तकिया और पढ़ाई का सामान लेकर माँ के कमरे में पहुँच जाता। वे कभी किसी किताब पर चर्चा करते, कभी आर्यन उसे अपने कॉलेज के 'गॉसिप्स' सुनाता, तो कभी अंजलि उसे पुराने किस्से सुनाती।

जो एडिक्शन (लत) अंजलि के लिए एक बेबसी बन चुका था, वह अब पूरी तरह गायब हो चुका था। उसका मन अब रात के उस 'अंधेरे कोने' में नहीं भागता था, क्योंकि वह कोना अब आर्यन की बातों और ठहाकों से भर गया था।

एक हफ्ते के भीतर ही अंजलि की काया पलट गई थी। उसकी आँखों के नीचे के काले घेरे गायब हो गए थे, चेहरे पर एक कुदरती चमक (Natural Glow) लौट आई थी और क्लिनिक में उसकी ऊर्जा (Energy) पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई थी।

एक सप्ताह पूरा होने पर, शनिवार की शाम को दोनों ने साथ में डिनर बनाया। किचन में संगीत बज रहा था और दोनों साथ में सब्जियाँ काट रहे थे।

"माँ, आपने गौर किया?" आर्यन ने टमाटर काटते हुए पूछा। "आज पूरे सात दिन हो गए हैं और आपने एक बार भी सिरदर्द या थकान की शिकायत नहीं की।"

अंजलि रुक गई और उसने खिड़की के बाहर ढलते सूरज को देखा। उसने महसूस किया कि उसकी वाइटालिटी (Vitality) और काम करने की शक्ति अब चरम पर थी। "तू सही कह रहा है आर्यन। मुझे अब याद भी नहीं आता कि वो बेचैनी कैसी होती थी। मुझे लगता है कि मैंने उस लत को बहुत पीछे छोड़ दिया है। अब मुझे उसकी ज़रूरत ही महसूस नहीं होती।"

आर्यन ने मुस्कुराकर माँ को देखा। उसे गर्व था कि उसने अपनी माँ को उस दलदल से बाहर निकाल लिया था।

उस रात भी, जब वे सोने के लिए लेटे, तो कोई डर नहीं था। अंजलि को अहसास हुआ कि जीवन में 'विकल्प' हमेशा होते हैं, बस हमें सही हाथ थामने की ज़रूरत होती है। आर्यन के खर्राटों की हल्की आवाज़ अंजलि के लिए किसी लोरी से कम नहीं थी। उसने सुकून से अपनी आँखें बंद कीं और एक ऐसी दुनिया में खो गई जहाँ सिर्फ शांति थी।

रात के सन्नाटे में घड़ी की सुइयां 2:00 बजे का वक्त दिखा रही थीं। कमरे में हल्की नीली रोशनी बिखरी हुई थी। अचानक आर्यन की नींद खुली। शायद उसे थोड़ी गर्मी महसूस हो रही थी या शायद नींद का झोंका टूट गया था।

जैसे ही उसकी चेतना वापस आई, उसे अपने शरीर पर एक भारीपन का अहसास हुआ।

आर्यन ने महसूस किया कि उसकी माँ, जो गहरी नींद में थीं, सोते-सोते अनजाने में उसकी ओर खिसक आई थीं। अंजलि का एक हाथ आर्यन के सीने पर रखा हुआ था, और उनकी टांगें आर्यन की टांगों के ऊपर चढ़ी हुई थीं। बचपन में यह एक बहुत ही सामान्य बात थी—जब वह छोटा था, तो इसी तरह माँ से चिपककर सोता था।

लेकिन आज, 15 दिनों की इस मशक्कत और 'एडिक्शन' वाली बातचीत के बाद, आर्यन को यह स्पर्श थोड़ा अजीब लगा।

उसके मन में एक अजीब सी कशमकश शुरू हो गई। एक तरफ तो यह वही ममता भरा स्पर्श था जिसे वह बचपन से जानता था, लेकिन दूसरी तरफ, अब वह एक वयस्क (Adult) था। उसे याद आया कि कैसे पिछले कुछ दिनों से वे इस 'अकेलेपन' और 'लत' से लड़ रहे थे।

उसने अंधेरे में अपनी माँ के चेहरे की ओर देखा। अंजलि बहुत ही मासूमियत और सुकून से सो रही थीं। उनके चेहरे पर वह बेचैनी बिल्कुल नहीं थी जो 'उस' लत के दौरान हुआ करती थी। ऐसा लग रहा था जैसे उन्हें सालों बाद कोई सुरक्षित ठिकाना मिला हो।

आर्यन का दिल ज़ोर से धड़कने लगा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे।

क्या वह धीरे से माँ का हाथ हटा दे?

या फिर इसे एक सामान्य 'स्लीपिंग पोस्चर' (Sleeping posture) समझकर सो जाए?

उसे थोड़ा संकोच (Awkwardness) महसूस हो रहा था। उसे लगा कि कहीं माँ की नींद न खुल जाए और वे असहज महसूस न करने लगें। उसने बहुत ही सावधानी से, बिना कोई आहट किए, अपनी साँसों को नियंत्रित किया। उसे अहसास हुआ कि माँ शायद अनजाने में उस सुरक्षा (Security) को ढूँढ रही थीं जो उन्हें इस लत से दूर रख रही थी।

उसने अपनी नज़रें छत की ओर कर लीं। वह अजीब सा अहसास अभी भी बना हुआ था, लेकिन उसने खुद को समझाया कि यह सिर्फ एक माँ का अपने बेटे पर अटूट भरोसा है। वह करीब आधे घंटे तक वैसे ही बुत बना लेटा रहा, जब तक कि उसकी आँखों में दोबारा नींद का बोझ नहीं आ गया।

रात के सन्नाटे में घड़ी की सुइयां अब 3:00 बजे का वक्त दिखा रही थीं। कमरे की हल्की नीली रोशनी में सब कुछ धुंधला सा था। आर्यन की नींद एक बार फिर खुली, लेकिन इस बार झटके से। उसे अपने शरीर के निचले हिस्से में एक अजीब सी गर्मी और भारीपन का अहसास हुआ।

नींद और होश के बीच झूलते हुए आर्यन ने महसूस किया कि अंजलि सोते-सोते और भी करीब खिसक आई थीं। उनकी टांग अब आर्यन के शरीर पर काफी ऊपर की ओर थी और अनजाने में वह आर्यन के निजी अंगों (Private area) को स्पर्श कर रही थी।

अंजलि गहरी और बेफिक्र नींद में थीं, उनकी सांसें बिल्कुल स्थिर थीं। लेकिन उनके शरीर की कुदरती गर्मी और उस अनचाहे स्पर्श ने आर्यन के शरीर में एक अजीब सी सनसनी पैदा कर दी थी। वह एक जवान लड़का था और शारीरिक रूप से इस तरह के स्पर्श के प्रति संवेदनशील था। उस स्पर्श से उसे एक हल्की सी सिहरन महसूस होने लगी, जो उसे अंदर तक झकझोर रही थी।

उसका दिल अब ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा था। उसके मन में विचारों का बवंडर उठ खड़ा हुआ:

"क्या माँ को पता है? नहीं, वह तो गहरी नींद में हैं।"

"क्या मुझे उन्हें जगाना चाहिए? नहीं, इससे वे बहुत शर्मिंदा हो जाएंगी।"

"क्या मुझे बस धीरे से हट जाना चाहिए?"

उसे बहुत ही अजीब और असहज (Awkward) महसूस हो रहा था। एक तरफ उनकी माँ की वो पवित्र ममता थी जिसने उसे बचपन से पाला था, और दूसरी तरफ यह एक अनजाना शारीरिक दबाव था जिसने उसके शरीर में प्राकृतिक प्रतिक्रिया (Natural response) पैदा कर दी थी। वह अपनी जगह पर बिल्कुल जम गया था, हिलने-डुलने से भी डर रहा था कि कहीं कोई गलत हरकत न हो जाए या माँ जाग न जाएं।

उसे अहसास हुआ कि माँ शायद अपनी उस 'लत' (Addiction) को छोड़ने के संघर्ष में अनजाने में एक 'सहारे' या 'सुरक्षा' की तलाश कर रही थीं, लेकिन यह स्थिति अब आर्यन की सहनशक्ति और उसकी नैतिकता की परीक्षा ले रही थी। वह पसीने से तर-बतर हो रहा था, जबकि बाहर का मौसम ठंडा था।

रात के उस सन्नाटे में कमरे की हवा जैसे भारी हो गई थी। आर्यन का पूरा शरीर पसीने से भीग चुका था। अंजलि की टांग का दबाव और उनके शरीर की कुदरती गर्मी अब सीधे उसके लंड पर महसूस हो रही थी। अंजलि गहरी नींद में थीं, लेकिन उनके शरीर का वह अनजाना स्पर्श आर्यन के पौरुष को जगाने के लिए काफी था।

आर्यन ने महसूस किया कि उसका लंडधीरे-धीरे कड़ा होने लगा था और उसमें एक तेज़ सनसनी दौड़ रही थी। उसे अपनी इस शारीरिक प्रतिक्रिया पर बहुत ही असहज (Awkward) और अंदर ही अंदर ग्लानि महसूस हो रही थी। "यह मेरी माँ हैं," वह बार-बार अपने मन को समझा रहा था, लेकिन शरीर की प्राकृतिक उत्तेजना उसके काबू से बाहर हो रही थी।

अंजलि की जांघ का घेरा अब उसके लंड के बिल्कुल ऊपर था, और उनके हिलने-डुलने से जो रगड़ पैदा हो रही थी, वह आर्यन की बर्दाश्त से बाहर होती जा रही थी। उसे डर था कि अगर यह उत्तेजना और बढ़ी, तो शायद उसकी माँ की नींद खुल जाए और वे इस स्थिति को देखकर शर्म से पानी-पानी हो जाएं।

उसने तय किया कि वह इस तरह बुत बनकर नहीं लेटा रह सकता। उसे अपनी माँ को धीरे से सही स्थिति में लाना ही होगा ताकि यह असहज स्पर्श खत्म हो सके।

उसने अपनी सांसें रोकीं और बहुत ही सावधानी से अपना हाथ चादर के नीचे ले गया। उसका दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि उसे अपनी पसलियों में उसकी चोट महसूस हो रही थी। उसने बहुत ही कोमलता से अंजलि की टांग के पास अपना हाथ रखा। वह नहीं चाहता था कि माँ अचानक जाग जाएं।

उसने अपनी उंगलियों से धीरे-धीरे माँ की टांग को ऊपर की ओर से पकड़कर थोड़ा सरकाने की कोशिश की। जैसे ही उसने स्पर्श किया, उसे अंजलि की त्वचा की मखमली नरमी और उस 'लत' के कारण आने वाली शरीर की तपिश महसूस हुई। उसका हाथ हल्का सा कांप रहा था।

उसने इंच-दर-इंच बहुत ही धीरज के साथ माँ की टांग को अपने लंड के ऊपर से हटाकर थोड़ा बगल की ओर खिसकाना शुरू किया। हर सेकंड उसे लग रहा था कि माँ अभी आँखें खोल देंगी। वह पसीने से तर-बतर था, लेकिन उसका पूरा ध्यान सिर्फ इस बात पर था कि वह इस 'असहज' स्थिति से बाहर निकल सके और अपनी माँ की गरिमा को भी ठेस न लगने दे।

आखिरकार, उसने उनकी टांग को सुरक्षित दूरी पर कर दिया। लेकिन उस स्पर्श और उस गर्माहट ने आर्यन के मन और शरीर में एक ऐसी हलचल मचा दी थी, जिसे शांत करना अब उसके लिए नामुमकिन लग रहा था।
 
पंद्रह मिनट बीत चुके थे, लेकिन कमरे का सन्नाटा आर्यन के लिए किसी शोर से कम नहीं था। वह आँखें मूँदकर सोने की नाकाम कोशिश कर रहा था, पर उसका शरीर उसके काबू में नहीं था। चादर के नीचे उसका लंड अब पूरी तरह से अकड़ चुका था और उसमें एक तेज़ टीस उठ रही थी। माँ की जांघ की वो रगड़ और उनके शरीर की वो भीनी-भीनी खुशबू उसके दिमाग पर इस कदर हावी हो गई थी कि नींद कोसों दूर भाग चुकी थी।

आर्यन सीधा लेटा हुआ छत को घूर रहा था। उसका लंड पजामे के अंदर इतनी सख्ती से तना हुआ था कि उसे कपड़े की रगड़ भी अब और ज़्यादा उत्तेजित कर रही थी। एक जवान लड़के के लिए इस तरह की शारीरिक प्रतिक्रिया कुदरती थी, लेकिन जिस परिस्थिति में वह था, वहाँ उसे घोर असहजता महसूस हो रही थी।

उसके मन में एक अजीब सा द्वंद्व चल रहा था: "मैं यहाँ माँ की मदद करने आया हूँ, उन्हें इस लत से बाहर निकालने आया हूँ... और मेरा शरीर इस तरह रिएक्ट कर रहा है? क्या मैं गलत कर रहा हूँ?"

वह अपनी साँसों पर काबू पाने की कोशिश कर रहा था, पर जैसे-जैसे वह खुद को शांत करने की कोशिश करता, उसका ध्यान बार-बार अपने लंड की उस कठोरता पर ही चला जाता। उसे महसूस हो रहा था कि अगर उसने जल्द ही कुछ नहीं किया, तो यह तनाव उसे पागल कर देगा। उसे डर था कि कहीं नींद में करवट लेते समय उसका उत्तेजित अंग फिर से माँ को टच न कर जाए, जो उनके रिश्ते की गरिमा के लिए बहुत बुरा होता।

वह बिस्तर पर बिल्कुल जम गया था। उसका हाथ अनजाने में चादर के ऊपर ही मुट्ठी में भिंच गया था। उसे लग रहा था कि शायद बाथरूम जाकर ठंडे पानी से मुँह धोना या खुद को थोड़ा शांत करना ही एकमात्र रास्ता है। लेकिन उसे यह भी डर था कि कहीं उसके उठने की आहट से माँ की कच्ची नींद न टूट जाए और वे उससे कोई सवाल न कर बैठें।

अंजलि अभी भी बगल में बहुत ही सुकून भरी और गहरी साँसें ले रही थीं। उन्हें अंदाज़ा भी नहीं था कि उनका बेटा इस वक्त अपनी मर्दानगी और अपनी नैतिकता के बीच कितनी बड़ी लड़ाई लड़ रहा है। आर्यन के माथे पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं, और उसका लंड अभी भी अपनी पूरी सख्ती के साथ इंसाफ मांग रहा था।

नीली नाइट लैंप की उस मद्धम और मायावी रोशनी में आर्यन की नज़रें अनजाने में अपनी माँ के चेहरे पर ठहर गईं। कमरे का सन्नाटा अब उसके दिल की धड़कन के साथ ताल मिला रहा था। उसने देखा कि अंजलि के चेहरे पर एक ऐसी मासूमियत और शांति थी जो पिछले कई सालों से गायब थी।

अंजलि का चेहरा तकिये पर थोड़ा तिरछा था, जिससे उनके गले की सुराहीदार बनावट साफ़ दिखाई दे रही थी। उनके खुले हुए बाल बिस्तर पर बिखरे थे, जो रोशनी में रेशम की तरह चमक रहे थे। आर्यन ने गौर किया कि आज उनकी त्वचा कितनी कोमल और तरोताजा लग रही थी—शायद एक हफ्ते की सुकून भरी नींद और उस 'लत' से दूरी का ही यह असर था।

उनकी सांसें बहुत ही धीमी और लयबद्ध थीं, जिससे उनके सीने पर रखी चादर बहुत ही धीरे-धीरे ऊपर-नीचे हो रही थी। उस हल्की रोशनी में उनकी बंद पलकें और गुलाबी होंठों की बनावट आर्यन को एक अलग ही खूबसूरती का अहसास करा रही थी।

आर्यन के मन में एक अजीब सा टकराव शुरू हो गया। वह जानता था कि यह उसकी माँ हैं, उसकी दुनिया की सबसे पवित्र हस्ती। लेकिन एक पुरुष के तौर पर, उसकी आँखें उस सौंदर्य को अनदेखा नहीं कर पा रही थीं। उसे महसूस हुआ कि अंजलि सिर्फ एक 'माँ' ही नहीं, बल्कि एक बेहद आकर्षक स्त्री भी थीं, जिसे उसने शायद अब तक सिर्फ अपनी ज़रूरतों के चश्मे से देखा था।

उनकी इस खूबसूरती और पास से आती उनके शरीर की कुदरती महक ने आर्यन के लंड के तनाव को और ज़्यादा बढ़ा दिया। वह पजामे के अंदर अब पत्थर की तरह सख्त हो चुका था और उसमें एक मीठी सी खुजली और बेचैनी हो रही थी।

आर्यन को खुद पर गुस्सा भी आ रहा था और वह खुद को रोक भी नहीं पा रहा था। "मैं क्या सोच रहा हूँ? मुझे यहाँ से उठ जाना चाहिए," उसने मन ही मन खुद को झिड़का। लेकिन उनकी उस मोहक सूरत ने उसे जैसे वहीं जकड़ लिया था। वह पसीने से भीगा हुआ था और उसकी धड़कनें उसके कान के पास शोर मचा रही थीं।

उसे डर था कि अगर उसने अपनी नज़रे नहीं हटाईं, तो शायद वह कोई ऐसी भूल कर बैठेगा जिसकी भरपाई कभी नहीं हो पाएगी।

कमरे की उस मद्धम नीली रोशनी और रात के सन्नाटे ने जैसे आर्यन के सोचने-समझने की शक्ति को सुन्न कर दिया था। वह जवानी की उस दहलीज़ पर था जहाँ शरीर के हॉर्मोन्स (hormones) और प्राकृतिक आवेग अक्सर दिमाग की नैतिकता पर हावी हो जाते हैं। 18-19 साल की उस कच्ची उम्र में, इस तरह की उत्तेजना और शारीरिक निकटता का अनुभव उसके लिए बिल्कुल नया और भ्रमित करने वाला था।

आर्यन का दिल किसी नगाड़े की तरह बज रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि जो वह महसूस कर रहा है, वह सही है या गलत; उसे बस उस पल की गर्माहट और आकर्षण ने अपनी गिरफ्त में ले लिया था। उसका लंड पजामे के अंदर अपनी पूरी कठोरता के साथ तना हुआ था, जिससे उसे एक अजीब सी बेचैनी और दबाव महसूस हो रहा था।

पता नहीं उस पल उसके मन में क्या आया, या शायद उसके शरीर के अनियंत्रित आवेग ने उसे मजबूर कर दिया—उसने बहुत ही कांपते हुए हाथों से अपना एक हाथ धीरे से अंजलि के Boobs के ऊपर रख दिया।

जैसे ही उसकी हथेलियों ने उस कोमलता और उभार को छुआ, आर्यन के पूरे शरीर में बिजली जैसी एक लहर दौड़ गई। चादर के पतले कपड़े के ऊपर से भी उसे माँ के शरीर की वह मखमली गर्माहट और उनके दिल की धड़कन साफ़ महसूस हो रही थी। अंजलि अभी भी गहरी और बेखबर नींद में थीं, उन्हें अंदाज़ा भी नहीं था कि उनका बेटा, जिसे वह अपना रक्षक मान रही थीं, इस वक्त किस मानसिक और शारीरिक द्वंद्व से गुज़र रहा है।

आर्यन की सांसें अब तेज़ और भारी हो गई थीं। उसका हाथ वहीं जम गया था। उसे एक तरफ तो उस स्पर्श से एक अद्भुत सुख मिल रहा था, लेकिन दूसरी तरफ उसे अपनी ही इस हरकत पर अंदर ही अंदर बहुत डर भी लग रहा था। उसे महसूस हुआ कि यह स्पर्श उस 'पवित्रता' की सीमा को लांघ रहा था जिसे वह अब तक संजोए हुए था।

उसका लंड अब और भी ज़्यादा अकड़ गया था, और उसे लग रहा था कि अगर माँ इस वक्त जाग गईं, तो वह कभी भी उनसे नज़रे नहीं मिला पाएगा। फिर भी, उस जवानी के जोश और पहली बार महसूस हो रहे इस शारीरिक आकर्षण ने उसे अपनी जगह से हिलने नहीं दिया।

कमरे के उस भारी सन्नाटे में आर्यन का दिल किसी नगाड़े की तरह धड़क रहा था। उसका हाथ माँ के Boobs के उभार पर थमा हुआ था और उसकी साँसें तेज़ थीं। उसे हर पल यह डर सता रहा था कि शायद अंजलि अभी अपनी आँखें खोल देंगी और यह सब एक भयानक मोड़ ले लेगा।

मिनट दर मिनट बीतते गए। घड़ी की टिक-टिक के अलावा कमरे में और कोई आवाज़ नहीं थी। अंजलि की गहरी और लयबद्ध साँसों में कोई बदलाव नहीं आया। वे उसी मासूमियत और सुकून के साथ सोती रहीं, जैसे उन्हें दुनिया की किसी बात की खबर न हो।

जब काफी देर तक कुछ भी नहीं हुआ और अंजलि की नींद में कोई खलल नहीं पड़ा, तो धीरे-धीरे आर्यन के शरीर का तनाव कम होने लगा। जो डर उसे अंदर ही अंदर खा रहा था, वह अब एक अजीब सी राहत में बदल गया। उसे महसूस हुआ कि शायद इस स्पर्श ने माँ की नींद में कोई बाधा नहीं डाली, बल्कि उनके शरीर की कुदरती गर्मी और सानिध्य ने आर्यन के मन की उथल-पुथल को भी धीरे-धीरे शांत कर दिया।

जवानी के उस पहले शारीरिक आवेग और उत्तेजना के बाद, अब उसके शरीर में एक सुस्ती और थकान छाने लगी थी। उसका लंड, जो अब तक पत्थर की तरह सख्त था, धीरे-धीरे ढीला पड़ने लगा। वह पसीने से तर-बतर था, लेकिन अब उसके मन में वो पहले वाली घबराहट नहीं थी।

उसी अवस्था में, अपनी माँ के शरीर की गर्माहट को महसूस करते हुए, आर्यन की पलकें भारी होने लगीं। उसे अहसास भी नहीं हुआ कि कब उसकी सोच और उसका डर धुंधलाने लगा। पंद्रह-बीस मिनट के उस तनावपूर्ण संघर्ष के बाद, वह उसी स्थिति में—अपना हाथ वहीं रखे हुए—गहरी और बेखबर नींद की आगोश में समा गया।

रात का वह रहस्यमयी और विचलित करने वाला पल अब एक शांत और खामोश नींद में बदल चुका था।

सूरज की रोशनी रसोई की खिड़की से छनकर डाइनिंग टेबल पर पड़ रही थी, लेकिन आज उस रोशनी में कल जैसी गर्माहट और बेफिक्री नहीं थी। आर्यन के लिए यह सुबह किसी भारी बोझ जैसी थी। रात की वो धुंधली यादें और अपनी माँ के Boobs पर अनजाने में रखा हुआ उसका हाथ—यह सब उसके दिमाग में एक फिल्म की तरह चल रहा था।

नाश्ते की मेज पर सन्नाटा पसरा था। अंजलि ने हमेशा की तरह गरमागर्म परांठे और चाय टेबल पर रखी।

"आर्यन, आज तू बहुत चुप है? रात को नींद ठीक से नहीं आई क्या?" अंजलि ने प्यार से पूछते हुए उसकी प्लेट में परांठा रखा।

आर्यन ने अपनी नजरें अपनी प्लेट से ऊपर नहीं उठाईं। वह बस दही और परांठे के साथ ज़बरदस्ती उलझा हुआ था। "नहीं माँ... बस थोड़ा सा सिर भारी है, शायद पढ़ाई का स्ट्रेस होगा," उसने हकलाते हुए जवाब दिया।

अंजलि को उसका यह व्यवहार बहुत अजीब लगा। कल तक जो बेटा चहक-चहक कर बातें कर रहा था, मज़ाक कर रहा था, वह आज आँखें मिलाने से भी कतरा रहा था। उसने गौर किया कि आर्यन का चेहरा थोड़ा लाल था और वह बार-बार अपनी उंगलियों को मरोड़ रहा था। उसे लगा शायद रात को सोते समय कोई बुरा सपना देखा होगा या तबीयत ढीली होगी, इसलिए उसने ज़्यादा कुरेदना ठीक नहीं समझा।

"ठीक है, कॉलेज से आकर थोड़ा आराम कर लेना। मैंने टिफिन में तेरी पसंद की सब्जी रख दी है," अंजलि ने उसका माथा चूमने के लिए हाथ बढ़ाया, लेकिन आर्यन अनजाने में ही थोड़ा पीछे हट गया।

यह देख अंजलि के हाथ ठिठक गए। उनके मन में एक पल के लिए उलझन आई, पर उन्होंने इसे सुबह की जल्दबाज़ी समझकर नज़रअंदाज़ कर दिया।

आर्यन ने जल्दी-जल्दी अपना टिफिन बैग में डाला। उसे उस कमरे और उस माहौल से बाहर निकलने की जल्दी थी। उसे लग रहा था जैसे उसके चेहरे पर उसकी 'गलती' साफ़ लिखी हुई है और माँ कभी भी उसे पढ़ लेंगी।

"मैं चलता हूँ माँ, लेट हो रहा हूँ," उसने बस इतना कहा और बिना पीछे मुड़े तेज़ी से घर से बाहर निकल गया।

सीढ़ियाँ उतरते समय उसके दिल की धड़कन अभी भी तेज़ थी। उसके हाथ में अभी भी उस मखमली अहसास की सिहरन बाकी थी, जिसने उसे रात भर बेचैन रखा था। वह कॉलेज तो जा रहा था, लेकिन उसका मन उसी बिस्तर और उसी नीली रोशनी वाले कमरे में अटका हुआ था।

डिनर की मेज पर आज वह खनक और ठहाके गायब थे जो पिछले एक हफ्ते से घर की रौनक बने हुए थे। आर्यन ने बमुश्किल दो निवाले खाए और अपनी नजरें थाली में ही गड़ाए रखीं। अंजलि उसे बार-बार देख रही थी; उसकी ममता भरी नजरें भांप चुकी थीं कि कुछ तो बहुत गहरा और बेचैन करने वाला आर्यन के मन में चल रहा है।

उसे लगा कि शायद क्लिनिक वाली बात या उसकी 'लत' को लेकर आर्यन अब भी किसी Trauma में है, या शायद कल रात कुछ ऐसा हुआ जिसे वह कह नहीं पा रहा।

डिनर के बाद, रोज की तरह आर्यन ने दूध गरम किया। रसोई की पीली रोशनी में उसका चेहरा उतरा हुआ और थका हुआ लग रहा था। अंजलि दबे पाँव पीछे से आई और काउंटर का सहारा लेकर खड़ी हो गई।

"आर्यन..." उसने बहुत ही कोमल स्वर में पुकारा।

आर्यन के हाथ से चम्मच लगभग छूटते-छूटते बचा। "जी माँ?" उसने बिना मुड़े जवाब दिया।

"दूध गरम हो गया है, यहाँ बैठ मेरे पास," अंजलि ने पास की स्टूल की ओर इशारा किया। आर्यन हिचकिचाते हुए बैठा, उसके हाथ कांप रहे थे और वह अभी भी अपनी माँ की आँखों में झाँकने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था।

अंजलि ने अपना हाथ उसके ठंडे पड़ चुके हाथ पर रखा। आर्यन को तुरंत कल रात के उस स्पर्श की याद आई और उसके शरीर में एक सिहरन दौड़ गई।

"बेटा, सुबह से देख रही हूँ, तू खुद में नहीं है। क्या बात है? क्या तू अब भी मेरी उस बात (एडिक्शन) को लेकर परेशान है? या मुझसे कोई गलती हुई है?" अंजलि की आवाज़ में एक अजीब सी फिक्र और दर्द था।

आर्यन ने घूँट भरा, गला सूख रहा था। "नहीं माँ... ऐसा कुछ नहीं है। बस... मन थोड़ा भारी है।"

"मुझसे मत छुपा आर्यन। मैं तेरी माँ हूँ, तेरी धड़कनें पहचानती हूँ। तू किसी गहरे सदमे में लग रहा है, जैसे कोई बात तुझे अंदर ही अंदर खा रही है। अगर तू मुझसे नहीं कहेगा, तो किससे कहेगा? क्या तुझे मेरे साथ सोने में असहजता (Awkwardness) हो रही है? अगर ऐसा है, तो तू अपने कमरे में सो सकता है, मैं ठीक हूँ अब," अंजलि ने उसे परखते हुए कहा।

आर्यन का लंड पजामे के अंदर एक बार फिर उस पुरानी याद और माँ की आवाज़ की मिठास से हरकत करने लगा। उसे अपनी इस शारीरिक प्रतिक्रिया पर इतनी घृणा हो रही थी कि उसकी आँखों में आँसू आ गए। वह बस इतना चाहता था कि वह सब उगल दे, पर शब्द होंठों तक आकर जम रहे थे।

दूध के गिलास से उठती भाप आर्यन की धुंधली आँखों के सामने एक कोहरे जैसी छा गई थी। अंजलि की ममता भरी आवाज़ और उसकी आँखों में छिपी फिक्र ने आर्यन के संयम का आखिरी बांध भी तोड़ दिया। उसे लग रहा था जैसे वह कोई बहुत बड़ा अपराधी है, जिसने अपनी ही माँ के विश्वास और पवित्रता के साथ छल किया है।

जैसे ही अंजलि ने उसके कंधे पर हाथ रखा, आर्यन के शरीर में एक सिहरन दौड़ी। वह और नहीं रुक सका। उसका गला रुंध गया और अगले ही पल, रसोई की उस शांत हवा में आर्यन की सिसकियों की आवाज़ गूँज उठी।

वह फूट-फूट कर रोने लगा। उसके आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। उसने अपना चेहरा अपने दोनों हाथों में छिपा लिया और उसके कंधे बुरी तरह कांपने लगे। यह सिर्फ रोना नहीं था, यह उस अंतर्द्वंद्व का विस्फोट था जो कल रात से उसके सीने में दबा हुआ था।

अंजलि पूरी तरह चिंता और दहशत में आ गई। उसने ऐसा मंजर कभी नहीं देखा था। उसका बहादुर और समझदार बेटा, जो उसे संभाल रहा था, आज इस कदर टूट जाएगा, इसकी उसने कल्पना भी नहीं की थी।

"आर्यन! बेटा... क्या हुआ? मुझे बता, कोई बात है क्या? किसी ने कुछ कहा? तेरी तबीयत ठीक नहीं है?" अंजलि बदहवास होकर उसके पास घुटनों के बल बैठ गई और उसके हाथों को चेहरे से हटाने की कोशिश करने लगी।

आर्यन की हिचकियाँ बंध गई थीं। वह बस इतना कह पा रहा था, "माँ... मैं... मैं बहुत बुरा हूँ। मैं आपकी मदद करने चला था, पर मैं खुद गिर गया। मुझे माफ़ कर दो माँ... मुझे माफ़ कर दो।"

अंजलि का दिल बैठ गया। उसे लगा शायद आर्यन अपनी माँ की उस 'लत' को देख कर अंदर से इतना आहत हो गया है कि वह खुद को संभाल नहीं पा रहा। उसे लगा कि उसके बेटे पर इस पूरी स्थिति का बहुत गहरा ट्रॉमा हुआ है।

"चुप हो जा मेरा बच्चा... तू क्यों बुरा है? तूने तो मुझे नई ज़िंदगी दी है। तू रो मत, तू मुझे डरा रहा है," अंजलि ने उसे अपने गले से लगा लिया।

आर्यन का सिर अब अंजलि के उसी सीने के पास था जिसे उसने कल रात छुआ था। उस स्पर्श की याद और अभी की इस ममता भरी आगोश के बीच का अंतर उसे और भी ज़्यादा कचोट रहा था। वह उनके सीने से लगकर और भी ज़ोर से रोने लगा, जैसे कोई छोटा बच्चा अपनी गलती पर अपनी माँ के आंचल में छिपकर माफ़ी मांग रहा हो।

अंजलि उसे सहलाती रही, लेकिन उसके मन में हज़ारों सवाल उठ रहे थे। उसे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर कल रात से ऐसा क्या बदल गया कि उसका बेटा आज इतना असहाय महसूस कर रहा है। वह बस उसे अपने सीने से चिपकाए रही, जबकि आर्यन के आंसुओं से उसकी साड़ी भीगती जा रही थी।

रसोई की उस धुंधली रोशनी में आर्यन की सिसकियाँ अब भारी सासों में बदल चुकी थीं। अंजलि उसे अपने सीने से लगाए हुए उसके सिर को सहला रही थी

आर्यन ने धीरे से अपना चेहरा अंजलि के आंचल से हटाया। उसकी आँखें लाल थीं और चेहरा आंसुओं से भीगा हुआ। उसने एक लंबी और कांपती हुई सांस ली, जैसे वह अपनी पूरी हिम्मत बटोर रहा हो।

"माँ... मुझे माफ़ कर देना। मैं... मैं आपकी मदद करने आया था, लेकिन कल रात..." आर्यन की आवाज़ लड़खड़ा रही थी।

अंजलि ने उसके हाथों को थाम लिया, उसकी धड़कनें तेज़ हो रही थीं। "क्या हुआ कल रात आर्यन? साफ़-साफ़ बोल बेटा।"

आर्यन ने नज़रें झुका लीं, वह अपनी माँ की आँखों में नहीं देख पा रहा था। "कल रात जब मेरी नींद खुली, तो आप मेरे बहुत करीब सो रही थीं। आपकी टांग मेरे ऊपर थी और... और मुझे बहुत अजीब सा महसूस हो रहा था। मैं एक जवान लड़का हूँ माँ, मेरा शरीर मेरे काबू में नहीं रहा। मुझे पसीना आ रहा था, मेरा प्राइवेट पार्ट को कुछ हो गया था और मैं... मैं खुद को रोक नहीं पाया।"

अंजलि के चेहरे का रंग उड़ गया, वह बुत बनकर उसे सुनती रही।

आर्यन ने रोते हुए आगे कहा, "पता नहीं मुझे क्या हुआ, मैंने... मैंने अपना हाथ आपके सीने पर रख दिया था। मैं बस उसे महसूस करना चाहता था। मुझे पता था कि आप मेरी माँ हैं, लेकिन उस वक्त मेरा दिमाग सुन्न हो गया था। मैं काफी देर तक हाथ वहीं रखकर लेटा रहा और फिर... फिर मुझे नींद आ गई।"

आर्यन ने अपना सिर झुका लिया और फूट-फूट कर दोबारा रोने लगा। "मुझे अपनी नज़र में गिर जाने का अहसास हो रहा है माँ। मैं गंदा हूँ। मैं आपकी पवित्रता का सम्मान नहीं कर पाया। इसी ग्लानि ने मुझे सुबह से मार डाला है। मैं आपसे नज़रें नहीं मिला पा रहा था क्योंकि मुझे लग रहा था कि मैंने आपके विश्वास का खून किया है।"

रसोई में एक ऐसी खामोशी छा गई जिसे काटा जा सकता था। अंजलि के हाथ, जो आर्यन को सहला रहे थे, हवा में ही ठिठक गए। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि जिस बेटे को वह अपनी ढाल मान रही थी, वह अपनी ही माँ के प्रति ऐसी शारीरिक भावनाएं और हरकत कर बैठा।

अंजलि के दिमाग में एक तरफ माँ की ममता थी और दूसरी तरफ एक औरत की गरिमा। वह अवाक (Shocked) रह गई। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह गुस्सा करे, रोए या अपने बेटे को संभाले। आर्यन की इस सच्चाई ने उनके बीच के उस महीन पर्दे को हटा दिया था जिसे समाज कभी स्वीकार नहीं करता।

रसोई की उस भारी खामोशी में आर्यन अपनी गर्दन झुकाए, सिसकियाँ भर रहा था। उसे लग रहा था कि अब शायद आसमान फट जाएगा या उसकी माँ उसे धक्के मारकर घर से निकाल देंगी। अंजलि के चेहरे पर पहले तो हैरानी और सदमे के बादल छाए, लेकिन जैसे ही उसने अपने बेटे की उस मासूमियत और बेतहाशा डर को देखा, उसका ममता भरा दिल पसीज गया।

उसने देखा कि आर्यन अपनी ही नज़रों में कितना गिर चुका है। एक डॉक्टर होने के नाते वह जानती थी कि अगर इस वक्त उसने आर्यन को डांटा या उससे नफरत की, तो यह उसके दिमाग पर एक ऐसा गहरा ट्रॉमा (Trauma) छोड़ देगा जिसे वह पूरी ज़िंदगी नहीं मिटा पाएगा। जवानी की दहलीज पर खड़ा एक लड़का अपने प्राकृतिक आवेगों (Natural impulses) से लड़ रहा था और अपनी गलती मान रहा था—यह अपने आप में उसकी सच्चाई का सबूत था।

अंजलि ने एक गहरी साँस ली और अचानक... वह धीरे से मुस्कुरा दी। फिर वह मुस्कुराहट एक हल्की सी हँसी में बदल गई।

आर्यन ने चौंककर अपनी गीली आँखों से माँ की तरफ देखा। उसे समझ नहीं आया कि वह रो रहा है और माँ हँस क्यों रही हैं? क्या वह पागल हो गई हैं या उसे और भी सज़ा देने वाली हैं?

अंजलि ने हँसते हुए अपने हाथ से आर्यन के आँसू पोंछे और उसके गाल को हल्के से सहलाया।

"बस इतनी सी बात?" अंजलि ने बहुत ही प्यार और शरारत भरे अंदाज़ में कहा।

आर्यन हक्का-बक्का रह गया। "माँ... आप... आप हँस रही हैं? मैंने इतनी बड़ी बात कही और आप कह रही हैं कि बस इतनी सी बात?"

अंजलि ने उसे सहारा देकर खड़ा किया और उसे गले से लगाते हुए बोली, "पागल लड़के! तूने इसे अपनी जान पर बना लिया था? देख आर्यन, तू अब बच्चा नहीं रहा। तू एक जवान मर्द बन रहा है। इस उम्र में शरीर में हॉर्मोन्स का उतार-चढ़ाव होना, किसी स्पर्श से उत्तेजित हो जाना या कुछ नया महसूस करना... यह सब बायोलॉजिकल (Biological) है। इसमें तेरी कोई गलती नहीं है।"

उसने आर्यन की आँखों में झाँकते हुए बहुत ही साफ़ लहजे में कहा, "तूने जो किया, वह एक पल का भटकाव था। तूने जानबूझकर मुझे चोट पहुँचाने के लिए ऐसा नहीं किया। अगर तू बुरा होता, तो आज मेरे सामने खड़ा होकर रो नहीं रहा होता। तूने अपनी सच्चाई बता दी, यही साबित करता है कि तेरा चरित्र कितना साफ़ है।"

आर्यन को जैसे हज़ारों किलो के बोझ से आज़ादी मिल गई। उसकी सिसकियाँ रुक गईं, हालाँकि हिचकियाँ अभी भी आ रही थीं।

"लेकिन माँ... मैंने आपको छुआ... वह गलत था," आर्यन ने धीमी आवाज़ में कहा।

अंजलि ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, "गलत तब होता जब तू उसे अपना अधिकार समझता। तू डरा हुआ है क्योंकि तू मुझसे प्यार करता है। अब रोना बंद कर। एक डॉक्टर की माँ होने के नाते मैं जानती हूँ कि जवानी में ये सब चीज़ें कितनी आम होती हैं। तुझे खुद को 'अपराधी' समझने की ज़रूरत नहीं है। तू अभी भी मेरा वही प्यारा और रक्षक बेटा है।"

रसोई का माहौल जो अभी तक मातम जैसा था, वह अब एक अजीब सी शांति और अपनापन में बदल गया था। आर्यन को लगा जैसे उसकी माँ ने उसे एक नई ज़िंदगी दे दी हो।

आर्यन को ऐसा महसूस हो रहा था जैसे उसके सीने से कई मनों का बोझ एक पल में उतर गया हो। उसकी माँ की उस समझदारी भरी हँसी और माफी ने उसे एक नया जीवनदान दे दिया था। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि जिस बात को वह अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा गुनाह मान रहा था, उसकी माँ ने उसे एक डॉक्टर और एक अभिभावक के नज़रिए से इतनी सहजता से स्वीकार कर लिया।

रसोई की हवा अब हल्की हो चुकी थी। आर्यन ने अपनी शर्ट की आस्तीन से आँखों के बचे-खुचे आँसू पोंछे और एक गहरी, राहत भरी साँस ली। अंजलि उसे बड़े प्यार से देख रही थी, जैसे कह रही हो कि 'पगले, तू अभी भी मेरा छोटा बच्चा ही है।'

आर्यन ने थोड़ा संभलते हुए कहा, "माँ, आप वाकई महान हैं। मुझे लगा था कि आज सब खत्म हो जाएगा। लेकिन..." वह थोड़ा रुका और अपनी नज़रे झुकाते हुए बोला, "माँ, मुझे लगता है कि कल रात जो हुआ, वह दोबारा न हो और मैं अपनी इस गलती को सुधार सकूँ, इसलिए आज से मैं अपने कमरे में ही सोऊंगा। मुझे डर है कि कहीं मेरा शरीर फिर से बेकाबू न हो जाए और मैं आपकी गरिमा को ठेस पहुँचा दूँ।"

अंजलि ने आर्यन की बात बड़े ध्यान से सुनी। उसने देखा कि आर्यन अब भी थोड़ा डरा हुआ है और खुद पर भरोसा नहीं कर पा रहा है।

अंजलि ने आगे बढ़कर आर्यन का हाथ थामा और उसे अपनी ओर खींचते हुए बहुत ही शांत और सुदृढ़ लहजे में कहा, "नहीं आर्यन, तू कहीं नहीं जाएगा। तू मेरे ही साथ सोएगा।"

आर्यन चौंक गया। "लेकिन माँ... अगर फिर से वैसा कुछ हुआ तो?"

अंजलि ने मुस्कुराते हुए उसके सिर पर हाथ फेरा, "देख बेटा, पिछले एक हफ्ते से तेरे साथ सोने की वजह से मुझे जो सुकून मिला है, उसकी मुझे अब आदत हो गई है। सच तो यह है कि अब मुझे अकेले सोने में डर लगता है। वो अकेलापन और वो पुरानी 'लत' मुझे फिर से घेर लेगी अगर तू मेरे पास नहीं रहा। रही बात कल रात की, तो वह सिर्फ एक शारीरिक प्रतिक्रिया थी, कोई पाप नहीं। हम इसे मिलकर संभालेंगे।"

उसने आर्यन की आँखों में आँखें डालकर कहा, "अगर हम आज डर कर अलग कमरों में सो गए, तो हमारे बीच हमेशा के लिए एक पर्दा गिर जाएगा। मैं चाहती हूँ कि तू इस सहजता को स्वीकार करे। तू मेरा बेटा है, और मेरा रक्षक भी। आज से हम साथ ही सोएंगे, और बिना किसी झिझक के बातें करेंगे। मुझे तुझ पर पूरा भरोसा है कि तू अपनी सीमाओं को जानता है।"

आर्यन को अपनी माँ की बातों में एक ऐसी शक्ति महसूस हुई जिसने उसकी सारी शंकाओं को खत्म कर दिया। उसे लगा कि माँ सही कह रही हैं—भागना समाधान नहीं है, बल्कि साथ रहकर उस कमजोरी को जीतना ही असली बहादुरी है।

"ठीक है माँ... जैसा आप कहें। मैं आपको अकेला नहीं छोड़ूँगा," आर्यन ने अब आत्मविश्वास के साथ कहा।

उस रात जब वे वापस कमरे में गए, तो माहौल में कोई तनाव नहीं था। आर्यन ने अपना तकिया लगाया और अंजलि उसके बगल में लेट गई। आज की रात पहले से कहीं ज्यादा पारदर्शी और सुकून भरी थी। दोनों ने लाइट बंद की और अंधेरे में फिर से पुरानी कहानियों का सिलसिला शुरू हो गया, जैसे उस 'सच' ने उनके बीच के डर को हमेशा के लिए दफन कर दिया हो।
 
अगली सुबह जब सूरज की पहली किरण कमरे में आई, तो वह अपने साथ एक नई ताज़गी और गहरा सुकून लेकर आई थी। आर्यन की नींद खुली तो उसने देखा कि अंजलि पहले ही उठ चुकी थी और रसोई से चाय की भीनी-भीनी खुशबू आ रही थी। रात का वह भारीपन, वह डर और वह सिसकियाँ—सब जैसे एक बीते हुए कल की बात हो गई थीं।

नाश्ते की टेबल पर आज फिर से वही पुरानी रौनक लौट आई थी। आर्यन अब अपनी माँ से नज़रें मिला पा रहा था। सच बोलने के बाद उसके मन का कोना-कोना साफ़ हो चुका था।

"आज परांठे थोड़े ज़्यादा कुरकुरे बने हैं माँ," आर्यन ने मुस्कुराते हुए कहा।

अंजलि ने चाय का घूँट भरते हुए उसे प्यार से देखा। "अच्छी बात है, कम से कम आज तेरा ध्यान खाने पर तो है, वरना कल तो तू बस थाली को घूर रहा था।" दोनों इस बात पर खिलखिलाकर हँस पड़े। कल रात की उस स्वीकारोक्ति ने उनके बीच की दीवार को गिराकर एक ऐसा पुल बना दिया था, जहाँ अब कोई भी बात 'निषिद्ध' नहीं थी।

इन तीन-चार दिनों में आर्यन का आत्मविश्वास लौट आया था। उसे अब अपनी शारीरिक प्रतिक्रियाओं पर शर्मिंदगी महसूस नहीं होती थी, क्योंकि उसे पता था कि उसकी माँ उसे समझती है।

हर रात वे साथ सोते, दिन भर की बातें करते और मज़ाक-मस्ती करते हुए सो जाते। अंजलि की वह 'पुरानी लत' अब पूरी तरह एक धुंधली याद बन चुकी थी। अब उसे किसी बनावटी सुकून की ज़रूरत नहीं थी, क्योंकि बेटे का साथ ही उसका सबसे बड़ा 'हीलर' बन गया था।

एक शाम, जब वे वॉक से लौट रहे थे, आर्यन ने महसूस किया कि अब उनके बीच कोई हिचकिचाहट नहीं बची है। वे एक-दूसरे के हाथ में हाथ डालकर चलते, जैसे दुनिया के सबसे अच्छे दोस्त हों। आर्यन ने अपनी माँ को उस अंधेरे से खींच निकाला था, और बदले में अंजलि ने उसे 'वयस्कता' (Adulthood) की उन उलझनों से आज़ादी दिला दी थी जो हर लड़के को भीतर ही भीतर खाती हैं।

घर अब सच में एक स्वर्ग जैसा लगने लगा था, जहाँ सच बोलने की आज़ादी थी और हर गलती के लिए माफ़ कर देने वाली ममता।

रात के सन्नाटे में घड़ी की सुइयां फिर से 2:00 बजे का वक्त दिखा रही थीं। कमरे में वही हल्की नीली रोशनी थी और बाहर हवाओं की हल्की सरसराहट। आर्यन की नींद अचानक खुली, और उसे तुरंत वही पुराना अहसास हुआ जिसने कुछ दिन पहले उसे हिलाकर रख दिया था।

आर्यन ने महसूस किया कि अंजलि गहरी नींद में करवट लेकर फिर से उसके बिल्कुल करीब आ गई थीं। उनका कोमल हाथ आर्यन के सीने पर रखा था, और उनकी टांगें अनजाने में आर्यन के लंड को स्पर्श कर रही थीं। उनके शरीर की वो परिचित गर्माहट और त्वचा की नरमी सीधे आर्यन के पौरुष को जगा रही थी।

लेकिन आज रात, आर्यन के मन में वह पुराना 'ट्रॉमा' या डर नहीं था। उसे याद आया कि कैसे उसकी माँ ने उसकी सच्चाई को हँसकर स्वीकार किया था और उसे अपराधी बनने से बचा लिया था।

जैसे ही अंजलि की जांघ का दबाव उसके लंड पर बढ़ा, उसमें कुदरती तौर पर सख्ती आने लगी। वह पजामे के अंदर धीरे-धीरे अकड़ने लगा। स्पर्श इतना सीधा और गहरा था कि आर्यन की साँसें भारी होने लगीं। उसे महसूस हुआ कि अंजलि नींद में थोड़ी और करीब खिसकीं, जिससे उनके शरीर की रगड़ ने आर्यन के अंदर एक तेज़ सनसनी पैदा कर दी।

आर्यन सीधा लेटा हुआ छत को देख रहा था। उसका दिल धड़क रहा था, लेकिन इस बार वह खुद को 'गंदा' महसूस नहीं कर रहा था। वह जानता था कि यह सिर्फ एक शारीरिक सच्चाई है।

अंजलि नींद में बहुत ही सुकून से थीं। उनका चेहरा आर्यन के कंधे के पास था और उनकी साँसों की गर्माहट आर्यन की गर्दन पर महसूस हो रही थी। आर्यन ने सोचा कि क्या वह फिर से उन्हें दूर हटाए? या फिर माँ की उस बात को याद करे कि 'यह सब नॉर्मल है'।

उसने बहुत ही धीरे से, कांपते हुए हाथ से अपनी माँ की टांग को छुआ। इस बार वह डरा हुआ नहीं था, बल्कि उस स्पर्श को समझने की कोशिश कर रहा था। अंजलि की त्वचा रेशम जैसी मुलायम थी। आर्यन का लंड अब पूरी तरह पत्थर की तरह सख्त हो चुका था और वह चादर के नीचे एक साफ उभार बना रहा था।

उसे लगा कि शायद माँ को पता चल जाएगा, लेकिन अंजलि की गहरी साँसें बता रही थीं कि वे पूरी तरह बेखबर हैं। आर्यन ने अपनी आँखें बंद कर लीं और उस अनचाहे लेकिन सुखद अहसास को महसूस करने लगा, जो उसके और उसकी माँ के बीच के इस नए, पारदर्शी (Transparent) रिश्ते का एक हिस्सा बन चुका था।

कमरे में पसरा सन्नाटा अब एक ऐसी भारी और गरम खामोशी में बदल गया था, जहाँ शब्दों की ज़रूरत नहीं थी। आर्यन की साँसें तेज़ थीं और उसका लंड पजामे के अंदर अपनी पूरी कठोरता के साथ अंजलि की जांघ के नीचे दबा हुआ था। जब उसे बर्दाश्त करना मुश्किल लगा, तो उसने बहुत ही धीमी, कांपती हुई आवाज़ में अपनी माँ को पुकारा।

"माँ... माँ..."

अंजलि की नींद टूटी। उसने अपनी पलकें झपकाईं और उसे तुरंत वस्तु स्थिति (Reality) का अंदाज़ा हो गया। उसे महसूस हुआ कि उसकी जांघ आर्यन के उस सख्त हिस्से पर टिकी हुई है जो पिछले कुछ दिनों से उनके बीच चर्चा और तनाव का विषय बना हुआ था।

अंजलि ने कोई हड़बड़ी नहीं दिखाई। उसने न तो अपना पैर हटाया और न ही कोई हैरानी जताई। वह बस कुछ पलों तक आर्यन की आँखों में देखती रही। उन आँखों में डर था, उत्तेजना थी और एक अनजाना सवाल था।

अंजलि ने एक गहरी और समझदारी भरी साँस ली। उसने तय कर लिया था कि वह अपने बेटे को अब और किसी 'गिल्ट' या 'ट्रॉमा' में नहीं रहने देगी। उसने बहुत ही सहजता से अपनी स्थिति बदली—लेकिन दूर जाने के लिए नहीं, बल्कि और करीब आने के लिए।

वह धीरे से बिस्तर पर थोड़ा ऊपर की ओर सरकी।

उसने अपनी जांघ को पूरी तरह से आर्यन के लंड के ऊपर जमा दिया। उस सीधे दबाव और जांघ की मखमली रगड़ से आर्यन के शरीर में बिजली जैसी एक लहर दौड़ गई। उसका लंड अब और भी ज़्यादा अकड़ चुका था। अंजलि ने वहीं रुककर आर्यन का हाथ पकड़ा। उसका हाथ पसीने से गीला और कांप रहा था।

अंजलि ने बिना कुछ बोले, आर्यन के उस हाथ को उठाया और धीरे से अपने Boob के ऊपर रख दिया।

आर्यन के होश उड़ गए। उसने महसूस किया कि उसकी हथेली माँ के उस नरम और गरम उभार पर है, जिसे उसने कुछ रात पहले अनजाने में छुआ था। लेकिन इस बार यह 'अनजाना' नहीं था—यह माँ की अपनी मर्जी और स्वीकृति थी।

कमरे की उस नीली रोशनी में दोनों एक-दूसरे को देख रहे थे। अंजलि की आँखों में एक अजीब सी शांति और 'सुरक्षा' का भाव था। उसने जैसे मौन रहकर यह संदेश दे दिया था कि 'अगर तुझे इस स्पर्श से सुकून मिलता है और तेरी उत्तेजना शांत होती है, तो मुझे कोई ऐतराज नहीं है।'

आर्यन का हाथ उस गोलाई को महसूस कर रहा था, और उसका लंड माँ की जांघों के बीच उस गर्मी का आनंद ले रहा था जिसे वह अब तक सिर्फ सपनों में या डर में महसूस करता था। उस रात, माँ और बेटे के बीच का वह 'पर्दा' पूरी तरह से हट गया था। कोई शब्द नहीं बोला गया, लेकिन उस स्पर्श ने सब कुछ कह दिया था।

उस रात कमरे की नीली रोशनी में एक अनजानी शांति छा गई थी। आर्यन का हाथ अंजलि के Boob की गर्माहट को महसूस कर रहा था और अंजलि की जांघ का दबाव सीधे उसके लंड पर था। धीरे-धीरे वह उत्तेजना एक गहरे सुकून में बदल गई और दोनों इसी अवस्था में एक-दूसरे के करीब गहरी नींद में सो गए।

अगली सुबह जब सूरज की किरणें कमरे में आईं, तो माहौल में कोई घबराहट नहीं थी। अंजलि ने तय कर लिया था कि वह इस मामले को पूरी तरह से सुलझा देगी ताकि आर्यन के मन में 'पाप' या 'ग्लानि' का एक कतरा भी न बचे।

नाश्ते के बाद, जब घर में सब शांत था, अंजलि ने आर्यन को अपने पास बुलाया और उसे सोफे पर अपने बगल में बिठाया। उसने आर्यन का हाथ अपने हाथ में लिया और बहुत ही शांत और गंभीर स्वर में बात शुरू की।

"आर्यन, कल रात जो हुआ, उस बारे में मैं तुझसे कुछ कहना चाहती हूँ," अंजलि ने उसकी आँखों में झाँकते हुए कहा।

आर्यन ने नज़रें थोड़ी झुकाईं, लेकिन इस बार वह कांप नहीं रहा था।

अंजलि ने बहुत ही सुलझे हुए लहजे में कहा, "देख बेटा, कल रात जो हुआ वह पूरी तरह से नॉर्मल (Normal) है। एक डॉक्टर के तौर पर और तेरी माँ के तौर पर मैं जानती हूँ कि मानव शरीर कैसे काम करता है। हम दोनों पिछले कुछ समय से जिस मानसिक तनाव और अकेलेपन से गुज़र रहे थे, उसमें एक-दूसरे का शारीरिक सानिध्य (Physical Proximity) हमें सुकून दे रहा है।"

उसने आर्यन के हाथ को सहलाते हुए आगे कहा, "इसमें गिल्ट (Guilt) महसूस करने का कोई मतलब नहीं है।"

आर्यन ने धीरे से पूछा, "लेकिन माँ... क्या यह गलत नहीं है? लोग क्या कहेंगे?"

अंजलि ने दृढ़ता से जवाब दिया, "गलत और सही की परिभाषा समाज तय करता है, लेकिन हमारी स्थिति अलग है। हमने कुछ भी गलत नहीं किया है। हम एक-दूसरे की ढाल बने हुए हैं। अगर मेरा स्पर्श तुझे शांत करता है और तेरी मौजूदगी मुझे उस पुरानी 'लत' से दूर रखती है, तो यह हमारे लिए एक दवा (Medicine) की तरह है। हमारे बीच जो विश्वास है, वही सबसे बड़ी सच्चाई है।"

उसने आर्यन को समझाते हुए कहा कि शरीर की ज़रूरतें और हॉर्मोन्स का असर प्राकृतिक है। अगर वे इसे एक-दूसरे के साथ सहजता से स्वीकार कर लेते हैं, तो यह किसी अपराध के दायरे में नहीं आता।

"मैं चाहती हूँ कि तू खुद को कोसना बंद करे। हम दोनों एक-दूसरे की ज़रूरत हैं और इस 'साथ' में कोई गंदगी नहीं है, सिर्फ एक अटूट भरोसा है।"

आर्यन को अपनी माँ की इन बातों से एक अद्भुत मानसिक शक्ति मिली। उसे अहसास हुआ कि उसकी माँ कितनी आधुनिक और समझदार सोच रखती हैं। उन्होंने एक झटके में उसके मन के सारे अंधेरे को साफ कर दिया था। अब उनके बीच कोई पर्दा नहीं था, सिर्फ एक गहरी समझ और बिना किसी शर्त का साथ था।

रात का वक्त था और पूरे घर में एक ऐसी खामोशी थी जो उदासी वाली नहीं, बल्कि सुकून भरी थी। किचन से बर्तनों की खनक और मसालों की खुशबू आ रही थी। आर्यन और अंजलि अब उस दौर से बाहर निकल आए थे जहाँ वे एक-दूसरे से नजरें चुराते थे। अब उनके बीच एक ऐसी पारदर्शिता आ गई थी जिसने उनके रिश्ते को और भी गहरा और दोस्ताना बना दिया था।

डिनर की टेबल पर अंजलि ने गरमा-गरम कढ़ी-चावल परोसे। आर्यन ने पहला निवाला लिया और अपना चेहरा बिगाड़ लिया।

"माँ, आज नमक थोड़ा कम नहीं लग रहा? या फिर मेरा टेस्ट खराब हो गया है?" आर्यन ने शरारत से अंजलि की तरफ देखते हुए कहा।

अंजलि ने तुरंत अपनी प्लेट से एक चम्मच चखा और फिर आर्यन को घूर कर देखा। "बिल्कुल ठीक है! तुझे बस बहाना चाहिए मेरी कुकिंग में मीन-मेख निकालने का। अगली बार से खुद बना लेना, फिर पता चलेगा।"

आर्यन हँस पड़ा। "अरे माँ, मैं तो बस चेक कर रहा था कि आप कितनी जल्दी चिढ़ती हैं। वैसे कढ़ी लाजवाब बनी है, बस पकोड़े थोड़े और सॉफ्ट हो सकते थे।"

"अच्छा? और कल जो तूने जली हुई ऑमलेट खिलाई थी, उसका क्या?" अंजलि ने चिढ़ाते हुए कहा और आर्यन के गाल पर हल्की सी चपत लगा दी।

पूरे डिनर के दौरान दोनों इसी तरह एक-दूसरे की टांग खींचते रहे। यह नोकझोंक उनके बीच के उस भारीपन को पूरी तरह खत्म कर चुकी थी जो पिछले दिनों के वाकये से पैदा हुआ था। आर्यन को महसूस हो रहा था कि उसकी माँ अब सिर्फ एक गार्जियन नहीं, बल्कि उसकी सबसे अच्छी दोस्त बन चुकी हैं जिनसे वह दुनिया की कोई भी बात कर सकता है।

खाना खाने के बाद आर्यन ने ज़िद की कि आज बर्तन वह धोएगा।

"तू रहने दे आर्यन, सुबह कॉलेज भी जाना है," अंजलि ने कहा।

"नहीं माँ, आज 'डॉक्टर साहिबा' को आराम मिलना चाहिए। आखिर पूरे दिन पेशेंट्स को जो झेला है आपने," आर्यन ने मुस्कुराते हुए उन्हें सोफे की तरफ धकेल दिया।

अंजलि सोफे पर बैठकर अपने बेटे को काम करते देख रही थी। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि जो लड़का कुछ दिन पहले तक अपनी पहचान और जवानी की उलझनों में खोया हुआ था, वह आज इतना ज़िम्मेदार और खुशमिजाज हो गया है। उसे अहसास हुआ कि उसने आर्यन को 'माफ' करके और उस रात की बात को 'नॉर्मल' बताकर न सिर्फ उसे बचाया, बल्कि अपने अकेलेपन का सबसे खूबसूरत इलाज भी ढूँढ लिया।

रात के 11 बज रहे थे। घर की लाइटें धीरे-धीरे बंद होने लगीं।

"आर्यन, जल्दी आ जा... मुझे नींद आ रही है," अंजलि ने अपने कमरे से आवाज़ लगाई।

आर्यन ने किचन की लाइट बंद की और मुस्कुराते हुए अपने कमरे की ओर नहीं, बल्कि माँ के कमरे की ओर बढ़ गया। अब उसे पता था कि उसे कहाँ होना चाहिए और अंजलि को भी पता था कि उसका सुकून कहाँ है।

रात के 12 बज चुके थे। कमरे में सन्नाटा था, लेकिन वह सन्नाटा खामोश नहीं था; उसमें एक अजीब सी गर्माहट और भारीपन था। आर्यन और अंजलि दोनों लेटे हुए थे, लेकिन नींद किसी की आँखों में नहीं थी। पंखे की हल्की आवाज़ और एक-दूसरे की सांसों की लय साफ़ सुनाई दे रही थी।

अंजलि की पीठ आर्यन की तरफ थी, लेकिन उसे महसूस हो रहा था कि आर्यन जागा हुआ है और बेचैन है। उधर आर्यन के मन में एक तूफान उठा हुआ था। माँ की कही हुई बातें—"यह सब नॉर्मल है," "इसमें कोई गिल्ट नहीं है"—उसके कानों में गूँज रही थीं। उसकी जवानी का जोश और उस स्पर्श की याद उसे सोने नहीं दे रही थी।

आखिरकार, अपनी धड़कनों पर काबू पाते हुए, आर्यन की रुँधी हुई आवाज़ अंधेरे को चीरते हुए निकली।

"माँ..." उसने बहुत ही धीमी और कांपती हुई आवाज़ में पुकारा।

अंजलि धीरे से मुड़ी और उसकी आँखों में झाँका। नीली रोशनी में उसकी आँखें चमक रही थीं। "जाग रहा है? क्या हुआ बेटा?"

आर्यन ने एक लंबी साँस ली, जैसे वह अपनी सारी हिम्मत बटोर रहा हो। "माँ... मुझे नींद नहीं आ रही। कल रात जो हुआ... और जो आपने सुबह कहा... उसके बाद से मेरा मन बस एक ही जगह अटका है।"

उसने थोड़ा रुककर, अंजलि की आँखों में सीधे देखते हुए वह बात कह दी जिसे कहने की हिम्मत शायद ही कोई बेटा कर पाता।

"माँ... क्या मैं... क्या मैं आपके वो छू सकता हूँ? फिर से... इस बार होश में?"

कमरे का तापमान जैसे एक डिग्री और बढ़ गया। अंजलि ने अपनी पलकें नहीं झपकाईं। वह बस उसे देखती रही। उसे आर्यन की आवाज़ में कोई हवस नहीं, बल्कि एक अजीब सी मासूमियत, जिज्ञासा और उस 'स्वीकृति' की तलाश दिखी जो उसने सुबह उसे दी थी।

अंजलि ने कोई गुस्सा नहीं दिखाया। वह जानती थी कि अगर उसने आज मना किया या झिड़का, तो जो 'पारदर्शिता' उन्होंने बनाई है, वह फिर से ढह जाएगी। उसने महसूस किया कि आर्यन उससे कुछ 'छुपकर' नहीं कर रहा, बल्कि अपनी माँ से 'इजाज़त' मांग रहा है।

अंजलि ने धीरे से मुस्कुराते हुए अपनी चादर थोड़ी नीचे की और आर्यन का हाथ पकड़कर उसे अपने Boob के ऊपर रख दिया।

"अगर इससे तुझे सुकून मिलता है और तेरा डर खत्म होता है... तो तू छू सकता है आर्यन। मैंने कहा था न, हमारे बीच अब कुछ भी गलत नहीं है," अंजलि की आवाज़ में एक अजीब सी स्थिरता और ममता थी।

जैसे ही आर्यन की हथेलियों ने उस कोमल और भारी उभार को छुआ, उसके पूरे शरीर में एक करंट सा दौड़ गया। इस बार वह 'चोरी' नहीं कर रहा था, बल्कि उसकी माँ ने खुद उसे यह अधिकार दिया था। उसके लंड ने पजामे के अंदर अपनी पूरी ताकत से सिर उठाया, लेकिन उसका ध्यान अब उस रेशमी स्पर्श पर था।

आर्यन ने धीरे-धीरे अपनी उंगलियाँ चलानी शुरू कीं। उसे अंजलि के दिल की धड़कन अपनी हथेली के नीचे महसूस हो रही थी। वह पल उनके रिश्ते की पुरानी सारी परिभाषाओं को जलाकर राख कर रहा था और एक ऐसी नई दुनिया बना रहा था जहाँ सिर्फ वे दोनों थे—बिना किसी पर्दे के, बिना किसी शर्म के।

कमरे की उस मद्धम रोशनी में आर्यन का हाथ अंजलि के Boob की कोमलता को महसूस कर रहा था। उसके लिए यह अहसास बिल्कुल नया और जादुई था। एक जवान लड़के के मन में उठी जिज्ञासा और शरीर की उत्तेजना ने उसे और भी बेबाक बना दिया था।

उसने बहुत ही धीरे से अपनी उंगलियां उस गोलाई पर फिराईं और अपनी माँ की आँखों में देखते हुए एक मासूम सा सवाल कर दिया।

"माँ... यह इतने सॉफ्ट क्यों हैं? मैंने अपनी लाइफ में कभी ऐसी चीज़ नहीं देखी... मेरा मतलब है, कभी छुई नहीं। यह अहसास इतना अलग और सुकून देने वाला क्यों है?" आर्यन की आवाज़ में एक अजीब सी हैरानी थी।

अंजलि ने उसकी इस मासूमियत पर एक हल्की सी मुस्कान दी। उसने आर्यन का हाथ हटाया नहीं, बल्कि उसे वहीं थामे रखा ताकि वह सहज महसूस करे।

"पगले, यह कुदरत की बनावट है," अंजलि ने एक डॉक्टर के लहजे में समझाना शुरू किया। "बायोलॉजिकल तौर पर, महिलाओं के सीने में मुख्य रूप से फैटी टिश्यू और ग्रंथियां होती हैं। यह कोमलता इसलिए होती है ताकि वे एक बच्चे के लिए पोषण का ज़रिया बन सकें। यह शरीर का सबसे संवेदनशील और ममता भरा हिस्सा होता है।"

आर्यन मंत्रमुग्ध होकर सुन रहा था। उसका लंड पजामे के अंदर अपनी पूरी कठोरता के साथ अंजलि की जांघ से सटा हुआ था, लेकिन उसका दिमाग इस वक्त माँ की बातों में खोया था।

अंजलि ने थोड़ा हँसते हुए आगे कहा, "और तुझे आज यह इतना 'नया' लग रहा है? तुझे याद भी नहीं होगा कि बचपन में तूने मुझे इस चीज़ के लिए कितना परेशान किया है। जब तू छोटा था, तो बिना इसे पकड़े या मुँह में लिए सोता ही नहीं था। घंटों तक तू यहीं चिपका रहता था, और अगर मैं ज़रा भी दूर होती, तो तू पूरा घर सिर पर उठा लेता था।"

यह सुनकर आर्यन का चेहरा शर्म से लाल हो गया। "सच में माँ? मैं इतना जिद्दी था?"

"जिद्दी? तू तो आफत था!" अंजलि ने मज़ाक में उसकी नाक खींची। "आज तू इसे एक 'मर्द' की नज़र से देख रहा है और तुझे यह उत्तेजित कर रहा है, लेकिन मेरे लिए तू आज भी वही छोटा आर्यन है जिसे इसी सीने से लगकर सुकून मिलता था। इसीलिए मैंने कहा कि इसमें कुछ भी 'गंदा' नहीं है। यह सिर्फ एक चक्र है जो घूमकर वापस वहीं आ गया है।"

आर्यन ने अब और भी विश्वास के साथ उस उभार को अपनी हथेली में भर लिया। उसे महसूस हुआ कि माँ की इस बेबाकी ने उसके अंदर के सारे 'पाप' को धो दिया है। उसे अपनी माँ के शरीर से अब डर नहीं लग रहा था, बल्कि एक गहरा लगाव महसूस हो रहा था।

"तो क्या मैं... मैं इसे थोड़ा और महसूस कर सकता हूँ? जैसे बचपन में करता था?" आर्यन ने धीरे से फुसफुसाते हुए पूछा।

कमरे की नीली रोशनी में आर्यन का हाथ अब पूरी तरह से अंजलि के Boob की गोलाई पर जम चुका था। जैसे-जैसे वह उसे सहला रहा था, उसके मन में एक और जिज्ञासा उठी। उसने महसूस किया कि जब वह छूता है, तो अंजलि की सांसें भी थोड़ी भारी हो रही हैं।

उसने अपनी माँ की आँखों में झाँकते हुए बहुत ही धीमे से पूछा, "माँ... जैसा कि आपने कहा कि यह बहुत संवेदनशील हिस्सा है... तो क्या जब मैं इसे इस तरह छू रहा हूँ, तो आपको भी वैसी ही संवेदना महसूस होती है जैसी मुझे हो रही है? क्या आपको भी अच्छा लग रहा है?"

अंजलि ने एक लंबी और गहरी सांस ली। उसने महसूस किया कि आर्यन अब सिर्फ एक जिज्ञासु बच्चा नहीं रहा, बल्कि वह एक पुरुष की सहज संवेदनाओं को समझने की कोशिश कर रहा है। उसने सच्चाई को छुपाने की कोशिश नहीं की।

"हाँ आर्यन," अंजलि ने बहुत ही शांत और मधुर आवाज़ में कहा। "जैसा कि मैंने तुझे बताया, यह शरीर का सबसे संवेदनशील हिस्सा होता है। यहाँ की नसें सीधे दिमाग और भावनाओं से जुड़ी होती हैं। जब तू इसे इस तरह कोमलता से छूता है, तो मुझे भी वैसी ही झनझनाहट और सुखद अहसास होता है।"

उसने आर्यन के हाथ के ऊपर अपना हाथ रखा और उसे थोड़ा और ज़ोर से दबाया।

"देख बेटा, शरीर की बनावट ऐसी है कि स्पर्श चाहे ममता भरा हो या आकर्षण भरा, शरीर अपनी प्रतिक्रिया देता ही है। एक औरत के तौर पर, मुझे भी यह महसूस होता है। और सच तो यह है कि पिछले कई सालों से मैं जिस अकेलेपन और 'लत' से लड़ रही थी, उसमें यह स्पर्श मुझे एक अजीब सा सुकून और 'जीवित' होने का अहसास दे रहा है।"

अंजलि ने उसकी आँखों में देखते हुए आगे समझाया, "संवेदना होना गलत नहीं है, आर्यन। यह जीवन का हिस्सा है। अगर मेरे शरीर को तेरे स्पर्श से अच्छा लग रहा है, तो इसका मतलब यह नहीं कि मैं 'बुरी माँ' हूँ। इसका मतलब सिर्फ यह है कि हम दोनों इंसान हैं और हमें एक-दूसरे की गर्माहट की ज़रूरत है।"

आर्यन के लिए यह सुनना किसी चमत्कार से कम नहीं था। उसे अब तक लग रहा था कि शायद वह अकेले ही इस तूफान में जल रहा है, लेकिन माँ की इस बेबाकी ने उसे यह अहसास दिलाया कि वे दोनों एक ही नाव में सवार हैं।

आर्यन का लंड अब पजामे की सीमाएं तोड़ देने को बेताब था। अंजलि की जांघों के बीच उसकी रगड़ और सीने पर उसका हाथ—इन दोनों संवेदनाओं ने उसे एक ऐसी दुनिया में पहुँचा दिया था जहाँ सिर्फ वे दोनों थे।

"तो माँ... क्या हम इसी तरह... रोज़... एक-दूसरे को महसूस कर सकते हैं?" आर्यन ने लगभग फुसफुसाते हुए पूछा।

अंजलि ने उसे अपनी बाहों में और कस लिया। "जब तक तुझे इसकी ज़रूरत है और मुझे इससे सुकून मिलता है... हम ऐसे ही रहेंगे। अब सो जा, मेरा बच्चा।"

उस रात, आर्यन अपनी माँ के सीने पर हाथ रखे और उनके शरीर की महक लेते हुए एक ऐसी गहरी नींद में सोया, जैसी उसने बचपन के बाद कभी नहीं ली थी।
 
सुबह की सुनहरी धूप खिड़की के पर्दों से छनकर कमरे में आ रही थी। आज की सुबह वाकई में तरोताजा थी। आर्यन की नींद जब खुली, तो उसके चेहरे पर एक ऐसी शांति थी जो पिछले कई रातो से गायब थी। रात भर अपनी माँ के जिस्म की गर्माहट और उस 'मखमली अहसास' को महसूस करने के बाद, उसके मन का सारा भारीपन धुल चुका था।

अंजलि भी रसोई में गुनगुनाते हुए नाश्ता बना रही थी। उसके चेहरे पर भी एक अलग ही चमक थी—जैसे किसी ने एक बोझिल पत्थर को उसके सीने से हटा दिया हो।

नाश्ते की टेबल पर आज आलू के परांठे और मक्खन की महक फैली हुई थी। आर्यन ने अपनी कुर्सी खींची और अंजलि की तरफ देखा। अंजलि ने मुस्कुराते हुए चाय का कप उसकी ओर बढ़ाया।

"आज तो बड़ी जल्दी उठ गया? रात को तो देर तक जाग रहा था," अंजलि ने शरारत भरी नज़रों से उसे देखते हुए कहा।

आर्यन थोड़ा सा मुस्कुराया और चाय का घूँट लिया। फिर उसने बहुत ही संजीदगी (Seriousness) से अंजलि का हाथ अपनी हथेली में लिया।

"माँ... मैं बस आपको थैंक यू बोलना चाहता था। कल रात के लिए... और उस सब के लिए जो आपने मुझे समझाया," आर्यन की आवाज़ में एक गहरा सम्मान और अपनापन था।

अंजलि ने उसे टोकना चाहा, पर आर्यन ने अपनी बात जारी रखी।

"सच कहूँ तो, मुझे डर था कि मैं अपनी इन भावनाओं के नीचे दब जाऊँगा। मुझे लगता था कि मैं कोई गुनाह कर रहा हूँ। लेकिन आपने जिस तरह से मुझे अपनी संवेदनाओं के बारे में बताया और मुझे वह हक दिया... उससे मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे मैं फिर से जी उठा हूँ। आपने मुझे 'मर्दानगी' के उस डर से बाहर निकाल लिया जो मुझे अंदर ही अंदर खा रहा था।"

अंजलि ने बड़े प्यार से आर्यन के हाथ को थपथपाया। "पगले, शुक्रिया किस बात का? मैंने वही किया जो एक माँ और एक दोस्त को करना चाहिए। अगर मैं तुझे नहीं समझती, तो कौन समझता? और देख, आज तू कितना खुश और रिलैक्स दिख रहा है। यही मेरे लिए सबसे बड़ा ईनाम है।"

आर्यन ने मुस्कुराते हुए परांठे का निवाला लिया। "सही कह रही हैं आप माँ। आज मुझे कॉलेज जाने में कोई झिझक नहीं हो रही। मुझे लग रहा है कि मैं दुनिया का सामना कर सकता हूँ क्योंकि घर में मेरा 'सुकून' मेरे पास है।"

अंजलि की आँखों में ममता की एक बूंद छलक आई। "बस, यही आत्मविश्वास मुझे चाहिए था। अब जल्दी से नाश्ता खत्म कर, वरना देर हो जाएगी।"

दोनों ने हँसते-खेलते नाश्ता किया। अब उनके बीच कोई ऐसी दीवार नहीं थी जिसे लांघने में डर लगे। वे जानते थे कि रात फिर आएगी, और वह नीली रोशनी वाला कमरा फिर से उनके उन 'निजी' और 'सच्चे' पलों का गवाह बनेगा।

शाम की ढलती रोशनी के साथ घर में एक अलग ही मादकता और सुकून घुल गया था। अब आर्यन और अंजलि के बीच वह 'पर्दा' नहीं था, जिसने उन्हें हफ्तों तक बेचैन रखा था। आज का दिन दोनों के लिए बहुत हल्का और खुशहाल रहा। रात के खाने का वक्त हुआ, तो डाइनिंग टेबल पर माहौल पहले से कहीं ज्यादा जीवंत था।

अंजलि ने आज रात के खाने में पनीर की सब्ज़ी और गरमा-गरम फुल्के बनाए थे। आर्यन टेबल पर बैठा अपनी माँ को देख रहा था, जो रसोई में काम करते हुए आज कुछ ज्यादा ही फुर्तीली और आकर्षक लग रही थीं।

"आज तो बड़ी खुशबू आ रही है माँ, पनीर में कुछ खास डाला है क्या?" आर्यन ने अपनी कुर्सी को थोड़ा आगे खिसकाते हुए पूछा।

अंजलि ने एक तिरछी नज़र उस पर डाली और मुस्कुराते हुए बोली, "खास क्या होगा? बस वही मसाले हैं। पर हाँ, आज बनाने का 'मन' थोड़ा ज्यादा अच्छा था।"

आर्यन ने शरारत से अपनी भौहें ऊपर कीं। "अच्छा? तभी मैं कहूँ कि आज सब्ज़ी इतनी... 'नर्म' और 'रसीली' क्यों लग रही है? बिल्कुल कल रात के अहसास जैसी।"

अंजलि का हाथ एक पल के लिए चकला-बेलन पर ठिठका। उसने पलटकर आर्यन को देखा, उसकी आँखों में एक हल्की सी चमक और शरारत थी। "बड़ा हो गया है तू, अब बातों को घुमाना भी सीख गया है? 'नर्म' चीज़ों की कद्र कुछ ज्यादा ही करने लगा है आजकल।"

आर्यन थोड़ा सा झेंपा, पर फिर उसने हिम्मत जुटाई। "अब क्या करें माँ, जब 'उस्ताद' इतना अच्छा सिखाने वाला हो, तो शागिर्द तो निखरेगा ही न? आखिर कल रात आपने ही तो कहा था कि 'कुदरत की बनावट' को समझना चाहिए।"

अंजलि ने हँसते हुए अपनी थाली उसके सामने रखी। "ज़्यादा बातें मत बना। चुपचाप खाना खा, वरना यह 'नर्म' पनीर ठंडा होकर सख्त हो जाएगा, फिर मत कहना कि मज़ा नहीं आया।"

"सख्त चीज़ें तो वैसे भी आजकल मुझे परेशान कर रही हैं माँ, पनीर का नरम होना ही बेहतर है," आर्यन ने बहुत ही हल्के डबल मीनिंग अंदाज़ में कहा ।

अंजलि के शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। "अच्छा जी? तो तुझे 'नरमी' का इतना शौक हो गया है? ध्यान रख, कहीं ये शौक तुझे रात भर जागने पर मजबूर न कर दे।"

"जागने में जो मज़ा है, वो सोने में कहाँ? और फिर, जब नींद न आए तो 'लोरी' सुनाने के लिए आप तो हैं ही," आर्यन ने अपनी आवाज़ को थोड़ा धीमा और गहरा करते हुए कहा।

अंजलि ने चाय का घूँट लिया और उसे एक गहरी नज़र से देखा। "लोरी सुनाऊँगी या कुछ और... यह तो वक्त ही बताएगा। फिलहाल खाना खत्म कर, फिर देखते हैं कि आज रात तेरी 'जिज्ञासा' तुझे कहाँ ले जाती है।"

पूरे डिनर के दौरान वे इसी तरह की हल्की-फुल्की और अर्थपूर्ण बातें करते रहे। हवा में अब एक अनजानी सी उत्तेजना और गहरा खिंचाव था। दोनों जानते थे कि खाना खत्म होने के बाद, जब लाइटें बंद होंगी, तो वह नीली रोशनी वाला कमरा फिर से उनके नए प्रयोगों और स्पर्शों का गवाह बनेगा।

रात के सन्नाटे में कमरे की वही जानी-पहचानी नीली रोशनी एक जादुई माहौल बना रही थी। डिनर के समय की वो हल्की-फुल्की शरारत और 'डबल मीनिंग' बातों ने हवा में एक मीठी सी बेचैनी घोल दी थी। जैसे ही दोनों बिस्तर पर लेटे, कमरे का तापमान अचानक बढ़ता हुआ महसूस हुआ।

आर्यन सीधा लेटा हुआ था, लेकिन उसकी साँसें तेज़ थीं। उसने करवट ली और अपनी माँ की ओर देखा। उसकी आँखों में एक अजीब सी बेबसी, एक गहरी चाहत और जैसे कुछ 'मांगने' वाली मासूमियत थी। वह बिना बोले ही अपनी माँ से उस सुखद स्पर्श की भीख मांग रहा था जिसने उसकी रातों की नींद और दिन का चैन छीन लिया था।

अंजलि ने उसकी उन प्यासी और मांगने वाली आँखों को देखा। उसने महसूस किया कि आर्यन अब पूरी तरह से उसके प्रभाव में है और उसका शरीर उस 'कोमलता' के लिए तड़प रहा है।

अंजलि के चेहरे पर एक बहुत ही दिलकश और समझदारी भरी मुस्कान आई। उसने धीरे से करवट ली और आर्यन के चेहरे के करीब आकर फुसफुसाते हुए कहा, "इतने गौर से क्या देख रहा है? डर मत... आ, छू ले।"

जैसे ही अंजलि ने ये शब्द कहे, आर्यन के दिल की धड़कन मानो एक पल के लिए रुक गई। उसने कांपते हुए अपने दोनों हाथ बढ़ाए। इस बार उसकी उंगलियों में झिझक कम और पाने की तड़प ज़्यादा थी। उसने धीरे से अंजलि के Boobs पर अपनी हथेलियां जमा दीं।

"आह..." आर्यन के मुँह से एक धीमी कराह निकली।

जैसे ही उसकी हथेलियों ने उन भारी और रेशमी उभारों को महसूस किया, उसके लंड ने पजामे के अंदर अपनी पूरी ताकत से एक झटका लिया। वह अब इतना सख्त हो चुका था कि पजामे का कपड़ा उसे छोटा पड़ रहा था।

अंजलि ने अपनी आँखें बंद कर लीं और आर्यन के हाथों की हरकतों को महसूस करने लगी। "आर्यन... तू कल कह रहा था न कि तुझे 'नरमी' पसंद है? देख ले, यह सब तेरा ही है। तू जितना चाहे इसे महसूस कर सकता है," अंजलि की आवाज़ अब थोड़ी भारी और गहरी हो गई थी।

आर्यन अब सिर्फ छू नहीं रहा था, बल्कि वह धीरे-धीरे उन्हें अपनी मुट्ठी में भरने की कोशिश कर रहा था। उसे अंजलि के शरीर की महक और उनकी तेज़ होती साँसों ने दीवाना बना दिया था। वह अपनी उंगलियों से उस 'संवेदनशीलता' को टटोल रहा था जिसके बारे में माँ ने कल रात बताया था।

कमरे की उस नीली रोशनी में, माँ और बेटे के बीच का यह दृश्य किसी पवित्र मर्यादा और शारीरिक आकर्षण के बीच की उस धुंधली लकीर पर खड़ा था, जिसे अब वे दोनों पार कर चुके थे।

रात के उस सन्नाटे में कमरे की गर्मी और बढ़ गई थी। आर्यन की हथेलियाँ अंजलि के सीनों (Boobs) की गोलाई को धीरे-धीरे सहला रही थीं। लेकिन तभी उसे अपनी उंगलियों के नीचे कुछ बहुत ही अलग और 'सख्त' महसूस हुआ।

अंजलि के मखमली और नरम उभारों के बिल्कुल बीचों-बीच, कपड़े के ऊपर से ही दो छोटी, दाने जैसी चीज़ें उभरी हुई थीं जो पत्थर की तरह कड़क महसूस हो रही थीं। आर्यन ने अपनी उंगलियों से उन्हें हल्का सा दबाया और फिर अपनी माँ की आँखों में झाँका।

आर्यन की साँसें अब और भी तेज़ हो चुकी थीं। उसने अपनी उंगली से उस उभरे हुए हिस्से को गोल-गोल घुमाते हुए बहुत ही धीमी और जिज्ञासु आवाज़ में पूछा।

"माँ... यह क्या है? अभी तो आपने कहा था कि ये बहुत सॉफ्ट होते हैं, लेकिन इस सॉफ्ट-सॉफ्ट के बीच ये दोनों हिस्से इतने कड़क क्यों हो गए हैं? ये उंगली पर चुभ रहे हैं माँ..."

अंजलि के मुँह से एक हल्की सी 'आह' निकली और उसने अपनी आँखें मूँद लीं। आर्यन का वह सीधा सवाल और उसकी उंगलियों का वह दबाव अंजलि के शरीर में बिजली के झटके जैसा अहसास पैदा कर रहा था।

उसने अपनी आँखें खोलीं, जिनमें अब एक अजीब सी चमक और 'मदहोशी' थी। उसने एक गहरी और कांपती हुई साँस ली और धीरे से समझाना शुरू किया।

"आर्यन... इसे निप्पल कहते हैं। जैसे मैंने तुझे बताया था कि यह शरीर का सबसे संवेदनशील हिस्सा होता है, वैसे ही यह उत्तेजना का थर्मामीटर भी होता है।" अंजलि की आवाज़ अब पहले से कहीं ज़्यादा भारी और लड़खड़ा रही थी।

उसने आर्यन का हाथ पकड़कर उसे थोड़ा और ज़ोर से दबाया। "जब तू इन्हें इस तरह सहलाता है और जब मेरा शरीर तेरे स्पर्श से उत्तेजित होता है, तो ये अपने आप कड़क हो जाते हैं। यह इस बात का संकेत है कि मुझे तेरा यह छूना... बहुत अच्छा लग रहा है। मेरा शरीर तुझे 'रिस्पॉन्स' दे रहा है, बेटा।"

आर्यन के होश उड़ गए। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि उसकी माँ का शरीर उसके छूने से इस तरह प्रतिक्रिया दे रहा है। उसका लंड पजामे के अंदर अपनी चरम सीमा पर था और उसकी नसों में खून तेज़ी से दौड़ रहा था।

"मतलब... आपको भी उतना ही मज़ा आ रहा है जितना मुझे?" आर्यन ने लगभग फुसफुसाते हुए पूछा।

अंजलि ने अपना सिर धीरे से हिलाया। "हाँ... और भी ज़्यादा। तू जितना इन्हें छेड़ता है, उतनी ही सिहरन मेरे पूरे जिस्म में दौड़ती है। अब तू ही देख ले, कुदरत ने इस कोमलता के बीच कितनी गहराई छिपाई है।"

आर्यन ने अब और भी बेबाकी से उन कड़क निप्पल्स को अपनी उंगलियों के बीच दबाना और मसलना शुरू कर दिया। अंजलि का शरीर बिस्तर पर धीरे-धीरे अकड़ने लगा था और उसकी भारी साँसें कमरे के सन्नाटे को चीर रही थीं।

कमरे की उस मदहोश कर देने वाली नीली रोशनी में समय जैसे ठहर गया था। आर्यन की उंगलियाँ अंजलि के कपड़ों के ऊपर से उन सख्त निप्पल्स को महसूस कर रही थीं, लेकिन अब उसके मन की प्यास सिर्फ स्पर्श से नहीं बुझ रही थी। वह उस कोमलता और उस उभार को साक्षात् देखना चाहता था, बिना किसी रुकावट के।

उसका गला सूख रहा था और दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि उसे अपनी पसलियों पर उसकी चोट महसूस हो रही थी।

आर्यन ने अपनी उंगलियाँ थोड़ी देर के लिए रोकीं और बहुत ही धीमी, कांपती हुई आवाज़ में अपनी माँ की आँखों में झाँकते हुए कहा।

"माँ... क्या मैं... क्या मैं इन्हें देख और छू सकता हूँ?"

अंजलि ने थोड़ी हैरानी से उसे देखा और हल्की सी मुस्कान के साथ कहा, "पगले, तू अभी क्या कर रहा है? तू इन्हें छू ही तो रहा है और क्या कर रहा है?"

आर्यन की हिचकिचाहट अब और बढ़ गई थी। उसने अपनी नज़रें झुका लीं और अपनी माँ के कुर्ते के गले की ओर इशारा करते हुए बहुत ही दबी आवाज़ में कहा, "ऐसे नहीं माँ... मेरा मतलब है... बिना कपड़ों के। मैं इन्हें बिल्कुल करीब से... अपनी आँखों से देखना चाहता हूँ।"

कमरे में जैसे सन्नाटा और गहरा हो गया। अंजलि की साँसें एक पल के लिए रुक गईं। उसने सोचा नहीं था कि आर्यन इतनी जल्दी और इतनी बेबाकी से यह मांग कर देगा। लेकिन फिर उसने देखा कि उसका बेटा कितनी उम्मीद और कितनी सच्चाई से उससे यह 'इजाज़त' मांग रहा है।

अंजलि को अपनी कही हुई बात याद आई—"यह सब नॉर्मल है।" उसने महसूस किया कि अगर वह आज यहाँ रुक गई, तो शायद आर्यन फिर से उसी 'गिल्ट' के अँधेरे में चला जाएगा।

अंजलि ने एक लंबी और गहरी साँस ली। उसने धीरे से अपना हाथ ऊपर उठाया और अपने कुर्ते के बटनों की ओर ले गई। उसकी उंगलियाँ भी थोड़ी कांप रही थीं, लेकिन उसकी आँखों में आर्यन के लिए एक अजीब सी 'स्वीकृति' थी।

"ठीक है आर्यन... अगर तेरी जिज्ञासा तुझे यहाँ तक ले आई है, तो मैं तुझे रोकना नहीं चाहती। देख ले कि कुदरत ने क्या बनाया है," अंजलि ने बहुत ही कोमल आवाज़ में कहा।

उसने धीरे-धीरे अपने कुर्ते के बटन खोले और कपड़े को अपने कंधों से थोड़ा नीचे खिसका दिया। जैसे ही कपड़ा हटा, कमरे की उस मद्धम रोशनी में अंजलि के वह दूधिया सफेद और भारी Boobsआर्यन की आँखों के सामने थे। उनके बीचों-बीच वह गुलाबी-भूरे रंग के सख्त निप्पल्स बिल्कुल किसी नगीने की तरह चमक रहे थे।

रात के अभी 11:30 ही बजे थे। कमरे की मद्धम नीली रोशनी अंजलि के सुडौल और नग्न ऊपरी शरीर पर पड़कर एक जादुई चमक पैदा कर रही थी। आर्यन की आँखें फटी की फटी रह गई थीं। उसने अपनी ज़िंदगी में पहली बार किसी महिला को इस रूप में देखा था, और वह भी अपनी ही माँ को।

अंजलि के उन भारी और मखमली Boobs की गोलाई और उनके बीचों-बीच चमकते हुए वे सख्त निप्पल्स... यह सब आर्यन के लिए एक 'विजुअल शॉक' जैसा था।

आर्यन का दिल इतनी तेज़ धड़क रहा था कि उसे लगा वह सीना चीरकर बाहर आ जाएगा। उसके दिमाग में हज़ारों नसें एक साथ फटने को तैयार थीं। उत्तेजना, घबराहट, सुखद अहसास और उस 'नग्न' सत्य को एक साथ स्वीकार करना उसके किशोर मन के लिए बहुत भारी पड़ गया।

जैसे ही उसने अपना कांपता हुआ हाथ उन नग्न कोमलताओं की ओर बढ़ाया, अचानक उसके सिर में एक तेज़ चकराने जैसा अहसास हुआ। आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा और आवाज़ें गूँजने लगीं। वह उस 'अति-उत्तेजना' को बर्दाश्त नहीं कर पाया और बिस्तर पर पीछे की ओर लुढ़क गया।

वह बेहोश हो चुका था।

अंजलि घबरा गई। "आर्यन! आर्यन! क्या हुआ बेटा?" उसने तुरंत अपना कुर्ता संभाला और आर्यन के चेहरे पर थपकियाँ देने लगी। लेकिन आर्यन एक गहरी और बेसुध नींद (Shock-induced sleep) में जा चुका था। अंजलि ने राहत की सांस ली कि वह सिर्फ बेहोश हुआ है। उसने उसे प्यार से कंबल ओढ़ाया, उसके माथे को चूमा और खुद भी उसके बगल में लेट गई।

सूरज की तेज़ रोशनी जब आर्यन की आँखों पर पड़ी, तो उसकी नींद टूटी। वह झटके से उठकर बैठ गया। उसका सिर थोड़ा भारी था। उसे याद आया कि कल रात क्या हुआ था—वह नग्न मंजर, वह 'निप्पल्स' की कड़वाहट, और माँ की वह 'खुली अनुमति'।

उसने देखा कि अंजलि कमरे में नहीं थी, शायद वह रसोई में नाश्ता बना रही थी। आर्यन ने अपने शरीर की ओर देखा, उसका लंड सुबह की कुदरती सख्ती के साथ अकड़ा हुआ था। कल रात जो उसने देखा था, वह उसके दिमाग में किसी फिल्म की तरह घूम रहा था।

वह उठकर बाथरूम की ओर बढ़ा, लेकिन उसके मन में एक ही सवाल था—"क्या वह सच था या कोई सपना?"

तभी रसोई से अंजलि की आवाज़ आई, "उठ गया आर्यन? जल्दी फ्रेश होकर आ जा, नाश्ता तैयार है।"

आर्यन की धड़कनें फिर से तेज़ हो गईं। वह सोच रहा था कि अब वह माँ का सामना कैसे करेगा? क्या माँ कल रात की उस 'अधूरी' बात को आगे बढ़ाएँगी या फिर से सब नॉर्मल हो जाएगा?
 
Back
Top