Antarvasna kahani वक्त का तमाशा - Page 11 - SexBaba
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Antarvasna kahani वक्त का तमाशा

"आहहहाहाः एसस्सस्स.......उफफफफफ्फ़ अहहाहा हां ना पापा अहहहाआ..." स्नेहा भी अपने ही खेल में अब तड़पने लगी थी और बस सिसकियाँ ही ले रही थी, उसके मूह से एक लफ्ज़ नहीं फुट रहा था



उंगलियों का जादू चालू रखते रखते राजवीर ने अपनी जीभ स्नेहा की जांघों पे रख दी और उन्हे हल्के से चाटने लगा और साथ ही अपने एक हाथ को उसके चुचों पे रख दिया...



"अहहहाआ, पापा, आइ आम कमिंग हहहहा.... मैं आ रही हूँ येस्स अहहहाआ.." स्नेहा ने जैसे ही चेतावनी दी, राजवीर ने उंगलियाँ निकाली और अपनी जीभ उसकी चूत के अंदर घुस्सा दी










"ओह्ह्ह हाआँ पापा. ऐसे ही अहहहहा... ईसस्स्सस्स माईंन्न्न् आ रहियीई उईईईईईई....." कहके स्नेहा ने अपना चूत रस राजवीर के मूह पे छोड़ दिया जिसे राजवीर बड़े मज़े से पीने लगा.....





"अहहाहा चाचा जी अहहहाहा मेरे ससुर जी उफ़फ्फ़ अहहाहा....उम्म्म्म" कहके स्नेहा अपनी जगह से उठी और राजवीर के होंठों पे टूट पड़ी और उन्हे किसी कुतिया की तरह चूसने लगी, काटने लगी... दोनो लोग अपने जिस्मो की गर्मी को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे थे और बेकाबू होते जा रहे थे....




"पापा आआहहहा..." स्नेहा ने एक सिसकारी लेके राजवीर को देखा, दोनो की आँखें सुर्ख लाल हो चुकी थी, दोनो अपने बदन की गर्मी को महसूस कर रहे थे और एक दूसरे के जिस्मो के साथ खेलने में लगे हुए थे, दोनो के बदन पसीने से भीग चुके थे, तक दोनो चुके थे, लेकिन रुकना कोई नहीं चाहता था.. राजवीर पास पड़े पलंग पे जाके लेट गया और स्नेहा को एक नज़र देखा, स्नेहा कूद के पलंग पे किसी भूखी शेरनी की तरह चढ़ गयी और राजवीर के लंड को अपनी थूक से भिगो के उसको अपनी चूत के छेद पे सेट कर दिया, और धीरे धीरे उसपे बैठने लगी...





"अहाहाहहहा ओह..." स्नेहा की चीखें निकलती जैसे जैसे लंड उसकी चूत के अंदर जाता, भीगी हुई चूत में लंड डालने में कोई दिक्कत नहीं हुई, लेकिन एक बार जब लंड पूरा का पूरा अंदर चला गया और स्नेहा की चूत की दीवारों से टकराने लगा, उसकी जान निकलने लगी




"ओा अहाहा नूऊओ.....बाहर निकालो इसे अहहहहा पापा आहहहहा, टेक दिस मॉन्स्टर अहहहहाअ औत्त्तत्त......" स्नेहा कह तो यही रही थी लेकिन अपने एक हाथ नीचे ले जाके लंड को मज़बूती से पकड़े हुई थी...




"अहहहाआ...पापा, फक मी ना अहाहहाअ..." स्नेहा ने अपने हाथ उँचे लेके कहा, स्नेहा के इस इशारे से राजवीर अपने लंड को अंदर बाहर करने लगा, पहले धीरे धीरे, और जब स्नेहा के दर्द को मज़े में बदलते देखा तो उसके धक्कों की स्पीड बढ़ती गयी









कभी राजवीर लंड को अंदर बाहर करता तो कभी स्नेहा अपनी चूत को उछाल उछाल के उससे चुदवाती, रूम काफ़ी ठंडा था लेकिन इनके जिस्मो की गर्मी से वहाँ का तापमान भी बढ़ने लगा था, दोनो के बदन पसीने में भीग चुके थे, रूम में केवल बस चुदाई की आवाज़ें गूँज रही थी




"अहहहाआ..पापा फक मी अहाहा एस्स अहाहहाहा...." स्नेहा अपनी चूत को लंड पे उछालती हुई कहती




"हाआँ मेरी ज्योति बेटी.. अहहाहा यह ले ना पापा के लंड को अपनी चूत के अंदर आहहाहा.." राजवीर जवाब में देता




पूरे कमरे में चूत से लंड और टटटे टकराने की आवाज़ें आ रही थी, स्नेहा पसीने से बहाल हो चुकी थी, लेकिन रुकने का नाम नहीं ले रही थी, राजवीर का लंड भी जवाब देने वाला था, लेकिन वो कंट्रोल करके बस स्नेहा की चूत के चिथड़े करने के मूड में था....




"अहहा पापा, कुतिया को और चोदिये ना अहाहा.. दम नहीं है क्या मेरे ना मर्द पापा आआहहहाअ.." स्नेहा के बदन की गर्मी उसके शब्दों में भी दिख रही थी...




राजवीर ने अपने लंड को स्नेहा की चूत से निकाला "पल्लुक्क्कककक" की आवाज़ के साथ और उसके होंठों को चूस के बिस्तर से खड़ा किया, अपनी एक उंगली पीछे ले जाके उसकी गान्ड के अंदर घुसा दी



"अहहहहा नूऊ..." स्नेहा ने आँखें बंद करके कहा



"बेटी हो ना, अब से रखैल बनो मेरी रंडी..." राजवीर ने स्नेहा के एक चुचे को मूह में भर के कहा और पास पड़ी कुर्सी के भरोसे स्नेहा को कुतिया बनने को कहा.. कुछ कहे बिना स्नेहा भी उसकी बात मान गयी और कुतिया बन के अपनी टाँगें खोल दी.. राजवीर ने अपने गीले लंड को स्नेहा की गान्ड पे रखा और हल्का सा धक्का दे दिया




"अहहहहा नूऊओ....पापा नहिन्न उफफफफ्फ़.... धीरे धीरे प्लीज़ अजाहाहहाहा" स्नेहा भी आने वाले के दर्द के बारे मीं सोच के डर रही थी लेकिन उसके साथ वाले मज़े का सोच के फिर अपने मन को बहला लेती









धीरे धीरे कर जब गान्ड चुदाई का दर्द मज़े में तब्दील हुआ, स्नेहा भी चीख चीख के मज़े लेने लगी




"अहहा हां पापा अहहाहा फाड़ दो आज ज्योति की गान्ड को आहहहहहा.. और ज़ोर से पापा अहहहहाअ य्आहह" स्नेहा अपनी गान्ड को पीछे ले जाके राजवीर के लंड को और अंदर महसूस करती हुई बोलती




"उम्म्म अहहहा...यह ले ना ज्योति अहहहहा क्या गान्ड है तेरी, उफ़फ्फ़ अहहहा.. साली जब चलती है तो जी करता है अहहहा इन्हे पकड़ के मसल दूं अहाहहाअ..क्या चुचियाँ है तेरी आहुउऊम्म्म्मम..... अहाहहा दूध पिला दे अपने बाप को भी अहहाहा आएआःाहहहा तःप्प्प्प्प ठप्प्प्प्प्प्प्प... अहहाहा क्या चूत है तेरी अहाआहहा.." राजवीर स्नेहा की गान्ड में लंड अंदर बाहर करते करते बोलने लगा



"अहाहहा हां तो अहाहौईइ पापा किसने रोका अहहहहा.... हां चोद ना अपनी रांड़ बेटी को अहहहा बहू को भी चोद अहहहहाहा दिया अहाहा.. भाभीयाहहहहहा को भी अहहहा, आज बेटी को चोद अहहहहाहा दो ना अहहहा.. कल भतीजी कोआहहा अहाहौईइ माँ चोदना ना अहहहहाआ...सब को अहहहौईईई रंडी बना देना अपनी अहाहहाहा..."




स्नेहा की बातें सुन राजवीर से और नहीं रहा गया, लंड को गान्ड से अलग कर राजवीर ने स्नेहा को सीधा किया और अपना सारा माल उसके चेहरे पे छोड़ दिया जिसे स्नेहा भी एक टॉप रंडी के जैसे अपने गले के अंदर गटाकने लगी









"अहाहाः उर्रफफफफ्फ़......पी लो मेरी बेटी अहहहहा..... येस्स अहहहहा.."



"अहहाहा हाँ पापा दो ना अपना माल अहहाहा और पिलाओ...." स्नेहा ने सब गले के अंदर गटक लिया और राजवीर के लंड को फिर से निचोड़ने लगी....
 
"अभी तक तुमने मुझे अपना गिफ्ट नहीं दिया.." रिकी ने ज्योति से गाड़ी में बैठते हुए कहा



"अभी तक आपने मुझे बर्तडे पार्टी भी तो नहीं दी ना.." ज्योति ने हंस के कहा और दोनो गाड़ी से घर जाने के लिए निकले जब एग्ज़ॅम सेंटर से बाहर आए



"ओह हो, स्टारबक्क्स में गये थे कल, वो क्या था फिर.." रिकी ने अपनी नज़र रोड पे ही टिका के कहा



"रिकी राइचंद.. नाम में कितना वज़न है, नाम भी छोड़ो... सिर्फ़ सरनेम में कितना वज़न है, स्टारबक्क्स की कॉफी को पार्टी बोलता है, क्या यार.." ज्योति ने मज़ाक में कहा, जिसे सुन रिकी ने कुछ जवाब नहीं दिया और गाड़ी चलाता रहा



"वैसे, आपको याद है लास्ट टाइम आपने पार्टी कहाँ दी थी.. तो वैसी नहीं, तो अट लीस्ट उसका आधा तो खर्चा करो.." ज्योति ने अपना मूह रिकी की तरफ घुमा दिया



"याद है याद है... इस वीकेंड मैं महाबालेश्वर आउन्गा, तो वहाँ वी विल डू इट.. इधर शीना इस नोट वेल, ऐसी हालत में अच्छा नही लगेगा यार,होप यू अंडरस्टॅंड.." रिकी ने गाड़ी को मोढ़ के कहा



"हां जी, चिंता नहीं है, गिफ्ट भी महाबालेश्वर में दूँगी ओके.." ज्योति ने हँस के कहा और सीधी होके बैठ गयी.. जब तक दोनो घर पहुँचते तब तक दोनो के बीच फिर एक खामोशी सी रही, हाला कि ज्योति दिमाग़ से आक्टिव ही थी, तिरछी नज़रों से बार बार रिकी की तरफ देखती जिसकी आँखें तो रोड पे थी, लेकिन कुछ सवाल थे उसकी आँखों में और दिमाग़ से भी वो उस वक़्त ज्योति के साथ नहीं था, किसी सोच में डूबा हुआ था... ज्योति ने फिर अपनी आँखें सीधी की और अपनी टॅबलेट पे फिर कुछ लिखने लगी



"यह क्या लिखती रहती हो टॅबलेट पे तुम बार बार.." रिकी ने खामोशी तोड़ते हुए कहा



"अरे वाह, यू हॅव रीयलाइज़्ड कि मैं भी आपके साथ हूँ.. वाह वाह, क्या नज़र है आपकी भैया.." ज्योति ने हँसते हुए कहा



"मैं इसमे यह नोट करती हूँ कि जब जब हम साथ होते हैं तब तब आप कहीं सोच में डूब जाते हो, तो इसमे काउंट कर रही हूँ ऐसी कितनी बार हुआ है, देखो देखो, काफ़ी इन्सिडेंट्स हैं.." ज्योति ने टॅबलेट आगे बढ़ा के कहा



"उहह....हटाओ इसे, कुछ भी लिखती हो..." रिकी ने टॅबलेट को देखे बिना हाथ से पीछे कर दिया



"सही बोल रही हूँ, कभी हिसाब करेंगे कि ऐसा कितनी बार किया है आपने..हिहहिहीई.,," ज्योति ने टॅबलेट को अपने बॅग में डाल दिया



"चलो जी, यह लो.. घर आ गया..." रिकी ने गाड़ी मोडते हुए कहा और दोनो मेन गेट के पास आ गये..



"चलो, आप जाओ, मैं निकलती हूँ यहाँ से, आज थोड़ा जल्दी पहुँच जाउ कल से, तो अच्छा होगा.." ज्योति ने बाहर आके रिकी से कहा



"अंदर आओ और शीना से मिल लो, ऐसे नहीं अच्छा लगता यार.." रिकी ने घर के अंदर आते हुए कहा



"अरे भैया, मेरे 30 मिनिट्स निकल जाएँगे, प्लीज़ समझिए ना, आंड कल रात को शीना से मिल लिया, आधे घंटे तक हम ने बातें की.." ज्योति ने उत्साह से ड्राइवर साइड की सीट पे बैठ के कहा



"आंड किसने कहा कि तुम गाड़ी चला के जाओगी महाबालेश्वर तक, ड्राइवर है उसे ले जाओ.." रिकी ने कह के ड्राइवर को बुलाना ही चाहा के ज्योति ने उसे रोक दिया



"भैया, प्लीज़ जाने दो ना, कितने दिन हुए लोंग ड्राइव पे नहीं गयी अकेली... आंड आइ प्रॉमिस, आइ स्वेर के हर 30 मिनिट्स में आपको फोन करती रहूंगी..प्लीज़ प्लीज़..." ज्योति ने मासूम चेहरा बना के कहा



"ज्योति, हाइवे की बात है, आंड यू नो कैसे कैसे लोग मिल जायें यार, ड्राइवर रहेगा इट विल बी सेफ.." रिकी ने फिर ज्योति को मनाना चाहा



"गॉड प्रॉमिस भैया, प्लीज़ जाने दो ना अकेले, चलो बस 15 मिनिट्स में कॉल करती रहूंगी.." ज्योति ने फिर रिकी से कहा जिसे रिकी मना नही कर सका और वहाँ से निकल गयी



अभी तोड़ा देर आगे ज्योति निकली ही थी कि उसके मोबाइल पे प्राइवेट नंबर से कॉल आया



"हां बोलो, मैं अकेली ही हूँ.." ज्योति ने फोन उठा के कहा



"ब्रावो गर्ल, आख़िर भाई को कन्विन्स कर ही दिया.." सामने वाले ने खुश होके जवाब दिया



"वो छोड़ो, अब क्या करूँ वो बताओ" ज्योति ने वॉरली स्थित जसलोक हॉस्पिटल के सामने गाड़ी रोक के कहा



"अब रूको, 5 मिनिट में तुम्हे एक पार्सल मिलेगा...जैसे ही वो पार्सल मिलेगा, मैं कॉल कर दूँगा.." कहके फिर उसने फोन कट कर दिया



"कमाल है, फोन कट करने से पहले कुछ नहीं बोलता, ना ही फोन रिसीव करने पे.." ज्योति ने खुद से कहा और खिड़की खोल के बाहर देखने लगी, नॉर्मली इस वक़्त वॉरली रोड पे भीड़ काफ़ी रहती है, सामने जसलोक में गाड़ियों का ताँता लगा हुआ था, उसके पास इंडिया के सबसे अमीर आदमी का सबसे महेंगा घर.. ज्योति यह सब देख रही थी कि एक तेज़ बाइक की आवाज़ से उसका ध्यान उस तरफ खीचा, जैसे ही उसने उसे देखा, वो डर गयी और मूह अंदर कर दिया और कुछ ही सेकेंड्स में वो बाइक तेज़ी से उसके सामने से गुज़री...



"ताप्प्प्प्प्प...." की आवाज़ से जब उसने अपनी सीट के नीचे देखा तो एक मीडियम साइज़ का पार्सल पड़ा था



"व्हाट दा फक ईज़ दिस..." ज्योति ने चिल्लाया और गाड़ी का दरवाज़ा खोल के दौड़ के बाहर आई कि उसका ध्यान फिर उसके बजते हुए फोन पे गया



"यह क्या है..." ज्योति ने फोन उठा के कहा



"पार्सल है, मैने कहा तो था.." सामने से जवाब आया



"पर यह गाड़ी में कैसे..." ज्योति ने शॉक होके पूछा



"एक बाइक तुम्हारे पास से गुज़री होगी, शायद उसी ने अंदर फेंका होगा..हाहहहा" फिर उसे मज़किया जवाब मिला



"ऐसे कोई पार्सल देता है, आइएम फक्किंग स्केर्ड नाउ.. सीधा रोक के हाथ में नहीं दे सकता था क्या.." ज्योति ने लंबी साँसें लेते हुए कहा और फिर गाड़ी के अंदर बैठ गयी



"पिज़्ज़ा डेलिवर करने नहीं आया था वो स्वीटहार्ट,... एनीवे, अब पार्सल उठाओ पहले.." सामने वाले की आवाज़ फिर कड़क हो गयी



ज्योति ने उसके कहने पे पार्सल उठा लिया.. "हां ले लिया"



"अब ओपन करो..."



"ओके वेट... हाँ कर दिया.." उसने पार्सल खोल के कहा और उसके अंदर कुछ चीज़ें रखी हुई थी



"अंदर क्या क्या है ज़रा बताओ.."



"अंदर, एक तो चाबियों का गुच्छा है.. और दूसरा कुछ छोटे छोटे पॅकेट्स हैं, लाइक थोड़े केमिकल्स... आंड एक बॉटल है, इसमे भी कुछ लिक्विड है...पता नही क्या है..." ज्योति ने स्मेल करने की कोशिश की बट पहचान नही पाई



"ग्रेट.. अब मैं तुम्हे एक अड्रेस टेक्स्ट करता हूँ.. सबसे पहले तुम्हे उस अड्रेस पे जाना है" इतना कहके सामने से आवाज़ बंद हो गयी



"हेलो...फिर क्या करना है.." ज्योति ने सोचा शायद फोन कट हो गया लेकिन स्क्रीन पे देखा तो ड्यूरेशन चालू थी



"पहले यह करो..." फिर उसे ठंडी कड़क आवाज़ सुनाई दी और फोन कट हो गया
 
"कमाल है अब यह कहाँ.." ज्योति ने इतना ही कहा कि फिर उसे वापस कॉल आया



"और हां, अड्रेस भी शायड पार्सल में ही होगा, तुमने देखा नहीं.." सामने से उसे जवाब मिला वो कहती उससे कुछ पहले... इतना सुन कर पर ज्योति ने ठीक तरीके से पार्सल में देखा तो कोने में एक छोटा सा काग़ज़ रखा हुआ था..



"रूको , है यहीं..." ज्योति ने काग़ज़ उठा के कहा और उसे खोल के अड्रेस देखने लगी



"राइटिंग तो सॉफ है ना स्वीटहार्ट.." सामने से फिर जवाब मिला ज्योति को



"प्रिंटेड है, बट यह अड्रेस तो..." ज्योति ने इतना ही कहा के फिर उसे टोक दिया गया



"सस्शह...... नही बताओ, जानता हूँ मैं...हाहहहाहा..." कहके फिर फोन कट हो गया



ज्योति ने कुछ देर अड्रेस वाला काग़ज़ हाथ में पकड़े रखा और सोचने लगी..



"यह अड्रेस सुना हुआ है शायद...." ज्योति ने खुद से कहा और फिर याद करने लगी इसके बारे में लेकिन उसे कुछ याद नहीं आया




"चलो, देखते हैं क्या है, बट .." ज्योति ने फिर खुद से कहा और अड्रेस की तरफ चल दी..



"हां बताओ, पहुँच गयी मैं इस अड्रेस पे.." ज्योति ने अपनी गाड़ी बाहर खड़ी करी और मेन गेट की तरफ बढ़ गयी



"ग्रेट.. अब ध्यान से सुनो.. जो मैं कह रहा हूँ.. तुम्हे दिए दो कामो में से यह पहला काम है, यह सफल नहीं होता तो दूसरा काम भी नहीं हो पाएगा.. कुछ समझ ना आए तो मुझे याद करना, मैं कॉल कर दूँगा..." सामने से उसे जवाब मिला और फिर उसे निर्देश मिलने लगे के उसे क्या करना था..


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"भाई, कितने दिन से वी हॅव नोट मेड आउट ना.." शीना ने पास बैठे रिकी से कहा जो कुछ बिज़्नेस मॅगज़ीन पढ़ रहा था



"हैं...." रिकी ने अचंभे में आके जवाब दिया



"नहीं समझ आया, हिन्दी में कहूँ... कितने दिन से हमन्‍ने सेक्स नहीं किया ना भाई" शीना ने सीधा चेहरा बना के कहा



"वो मैं समझ गया, अपनी हालत देखो, घर पे सब को चिंता है तुम्हारी, एक पेर यूँ हवा में लटक रहा है, एवववव.. स्मेल भी अच्छे से नही कर रही ..यूक्कक... और तुम्हे सेक्स की पड़ी है,..हाहहहा.." रिकी ने शीना का मज़ाक उड़ाते हुए कहा



"हाहहाहा... बहुत हँसी आई, पेर हवा में हुआ तो क्या, सेक्स में भी पेर हवा में ही उठाना पड़ता है ना" शीना ने आँख मारते हुए कहा



"शांति शांति.. कोई सुन ना ले, और फिर भाई भाई बोलने लगी.. " रिकी ने अपनी मॅगज़ीन को बंद करके कहा



"कोई नहीं सुनेगा, मोम डॅड और चाचू बाहर गये हैं, ज्योति है नहीं, भाभी का होना या ना होना सब सेम ही है..और नर्स अपने रूम में है, वो एक घंटे के बाद आएगी..इसलिए, वी आर अलोन बेबी.. फ़ायदा उठा लो मेरे अकेलेपन का..हीही.." शीना ने थोड़ा सा तकिये पे उपर होके कहा



"ह्म्‍म्म, लगता है दिमाग़ पे भी चोट आई है..." रिकी ने अपने दोनो हाथ बेड पे रख के कहा और चेहरा शीना के पास ले गया



"आंड यस, आइ डॉन'ट स्मेल बॅड... टेस्ट कर लो... टेस्ट कर के..." शीना एक दम सुखी आवाज़ में बोली..और उसके होंठ धीरे धीरे कर खुलने लगे, रिकी की नज़र शीना के चेहरे से उसकी आँखों से होती हुई सीधा उसके होंठों पे पड़ी, उसकी आँखों में बेशुमार प्यार था, होंठों पे प्यास... बिना कुछ कहे रिकी थोड़ा सा आगे झुका जिसे देख शीना की आँखें बंद और होंठ खुल गये.. दोनो की साँसें हल्की सी तेज़ होने लगी, दोनो की साँसें बिल्कुल गरम, रिकी ने एक हाथ में शीना का हाथ थाम के महसूस किया के शीना का बदन भी गरम हुआ पड़ा है, प्यार से उसने शीना के हाथों को अपने हाथों में जकड लिया और अपने होंठ शीना के होंठों पे रख दिया




"उम्म्म्मम.....उम्म्म्ममममाअहहाहहूंम्म्मममम...." दोनो की सिसकी निकली और एक दूसरे के चुंबन में डूब गये




"उम्म्म्म...अहहह..." शीना ने फिर सिसकी ली और अपने होंठ रिकी के होंठों से अलग कर दिए.. दोनो अलग तो हुए लेकिन एक दूसरे की आँखों में ही देखते रहे, दोनो के चेहरे लाल हो चुके थे, नशा दोनो देख सकते थे एक दूसरे की आँखों में..



"मन ही नहीं भरता मेरा क्या करूँ.." शीना ने धीरे से कहा और फिर अपने होंठों से रिकी के होंठों को हल्का सा सक किया और उससे अलग हो गयी










"वैसे भाई..." शीना ने मुस्कुराते हुए ही कहा



"भाई, वैसे आप एक बात बताओ.. बुरा नहीं लगाना हाँ.." शीना ने आँखें बड़ी करके कहा



"ह्म्म, बोलो... वैसे, यूआर समेलिंग उम्म्म्ममम..... फॅंटॅस्टिक.." रिकी ने लंबी साँस लेके कहा और फिर जीभ अपने उपरी होंठ पे घुमाई



"हाहाहा, किकी !! ... अच्छा मैं पूछ रही थी, किस तो लंडन की गोरियों को भी किया होगा ना आपने, तो वो ज़्यादा अच्छी हैं या मैं.." शीना ने रिकी को चिढ़ाना जारी रखा



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"नहीं... आइ कॅन'ट डू दिस... जो तुम कह रहे हो वो अगर पासिबल भी हुआ तो भी मैं नहीं करूँगी.." ज्योति ने फोन पे सामने वाले को चिल्ला के कहा



"पासिबल तो है स्वीटी... मैं जानता हूँ अच्छे से, और वो तुम भी जानती हो, लेकिन बात यह है कि तुम क्यूँ नहीं करोगी, तुमने तो कहा था तुम हमारे साथ हो... फिर अचानक क्यूँ पीछे हट रही हो.." सामने से उसे बहुत धीमी आवाज़ में जवाब मिला



"देखो, तुम क्यूँ कर रहे हो मैं नहीं जानती, लेकिन इससे मेरी फॅमिली..."



"स्श्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह..... तुम्हारी फॅमिली नहीं है, तुम अच्छे से जानती हो यह..और अगर तुम नहीं करोगी तो काम तो मेरा तब भी होगा, लेकिन मैं चाहता हूँ तुम करो.." फिर उसे समझाने की टोन लेनी पड़ी



"लेकिन मैं ही क्यूँ.." ज्योति ने सब भूल के सबसे अहेम सवाल उठाया जिसे सुन कुछ देर सामने वाले की आवाज़ भी नहीं आई



"कहो, अब क्यूँ खामोश हो... मैं ही क्यूँ, और यह काम तो स्नेहा भाभी भी कर सकती है ना, फिर भी तुम मुझसे ही क्यूँ यह करवाना चाहते हो..." ज्योति ने अपनी गाड़ी में बैठते ही उँची आवाज़ में कहा



"तुम्हारा अतीत क्या है ज्योति..." सामने से एक ठंडी आवाज़ में उसे जवाब मिला जिसे सुन ज्योति कुछ समझी नहीं



"अतीत.. मतलब.. क्या कहना चाहते हो तुम.." ज्योति की आवाज़ थोड़ी नीची हुई लेकिन बेचेनी बढ़ गयी



"तुम राइचंद'स की बेटी तो नहीं हो यह तो तुम जान चुकी होगी.. है ना.." सामने से भी आवाज़ उतनी ही नीची थी



"ह्म्‍म्म..." ज्योति सिर्फ़ इतना ही कह पाई



"मैं उसी अतीत की बात कर रहा हूँ.." सामने से फिर उसे जवाब मिला और फोन कट हो गया
 
"देखो, यह बात किसी को पता नहीं लगनी चाहिए, समझे तुम.." ज्योति इस वक़्त वहीं खड़ी थी जहाँ कुछ देर पहले वो फोन पर बतिया रही थी



"ठीक है मेडम, पर आप जो काम कह रहे हो वो काम करना कहाँ है, और बोल रहे हैं कि किसी को पता नहीं लगना चाहिए, अब यह काम जो आपने कहा है करने को

इसमे तो कितने दिन लग जाएँगे, और उपर से काम जब होगा तब सब को दिखेगा ही ना, फिर छुपाना कैसे है..." उसके सामने खड़े शख्स ने उसे जवाब दिया



"तुम यह सब काम रात में करोगे, कोई तकलीफ़ नहीं है कि यह काम तुम कितने वक़्त में करोगे, भले ही रात के दो या तीन घंटे काम करो, लेकिन काम होना चाहिए

बस..." ज्योति ने फिर उसे धीरे से कहा



"ठीक है मेडम, बट आप चलिए और दिखाइए तो यह काम एग्ज़ॅक्ट्ली कहाँ और क्या करना है, तभी तो मैं कुछ समझ पाउन्गा.." सामने वाले शख्स ने फिर उसे उतनी ही आवाज़ में जवाब दिया



"ओह्ह्ह, धीरे नहीं बोल सकते, तुम सही में आर्किटेक्ट ही हो या नहीं" ज्योति ने उसकी टोन से इरिटेट होके कहा



"ओह मेडम, आर्किटेक्ट ही हूँ, बेरोज़गार हूँ मतलब यह नहीं कि आप कुछ भी बोलो, एक तो ऑलरेडी बहुत टेन्षन है, चलिए अब दिखाइए नहीं तो मैं जा रहा हूँ.."

उस बंदे ने फिर अपनी आवाज़ उँची कर जवाब दिया



"देखो बन्नी..या जो भी तुम्हारा नाम है, धीरे से बात करो, और बेरोज़गारी की चिंता नहीं करो, आ जाओ मेरे पीछे पहले.." ज्योति ने उसे हिदायत दी और उसे अपने पीछे बुला लिया, बन्नी नाम का शक़्क्स भी उसके पीछे चला गया और आस पास के एरिया को देखने लगा.. ज्योति ने चाबियों का गुच्छा निकाला और एक एक कर सब ट्राइ करने लगी, जब ताले की सही चाबी लग गयी, तब मैं दरवाज़ा खोल के उसने बन्नी को सिर्फ़ इशारा किया और दोनो अंदर चले गये...



"अब ध्यान से सुनो, तुम्हे इस रूम में क्या क्या करना है.. " ज्योति और बन्नी दोनो इस वक़्त एक कमरे में थे और ज्योति उसे हिदायत देने लगी के उसे क्या क्या करवाना था



"देखिए, सब मज़ाक साइड में, ज्योति जी, लेकिन मैं समझा नहीं कि यह काम क्यूँ करना है, आइ मीन बनी बनाई चीज़ को तोड़ के फिर से उसे..." बन्नी ने इतना ही कहा के ज्योति ने उसे टोक दिया



"देखो, तुम्हे जो कहा जा रहा है वैसा करो, अगर नहीं कर सकते तो रहने दो, मैं किसी और से करवा लूँगी..अब कोई भी सवाल नहीं होना चाहिए, ठीक है.."

ज्योति ने उसे उंगली दिखाते हुए कहा



"ओके... बट यह काम के लिए कुछ स्पेशलिस्ट्स भी चाहिए मुझे, एक दो दिन दीजिए, मैं उन्हे ढूँढ के आपको कॉंटॅक्ट करता हूँ और हम काम शुरू कर देंगे.." बन्नी ने पहली बार ज्योति को सीरीयस होके जवाब दिया था



"ओके, बेटर.." ज्योति ने सिर्फ़ इतना कहा और अपने क्लच में से 50000 की गॅडी निकाल कर बन्नी के हाथ में थमा दी



"अगर किसी को कुछ भी पता चला, तो याद रखना, वो तुम्हारी ज़िंदगी की सबसे बड़ी भूल होगी" ज्योति ने बन्नी को यह चीज़ ऐसे अंदाज़ में कही के बन्नी वहीं खड़े खड़े काँपने लगा



पैसे ले देके दोनो लोग वहाँ से निकल गये, बन्नी के जाते ही ज्योति वापस उस कमरे में गयी और पॅकेट में जो दूसरे केमिकल्स पड़े थे वो वहीं पे दिए हुए निर्देश के मुताबिक रख के फिर लॉक करके बाहर निकली.. मेन गेट लॉक और बिना देरी किए वो वहाँ से तेज़ी से निकल गयी



"हां भैया.." ज्योति ने रिकी का फोन उठा के कहा



"ज्योति, तुम अब तक नहीं पहुँची, अभी विलसन का फोन आया था, कुछ डिस्कशन के लिए..ठीक हो तुम.."



"हां भाई, कार पंक्चर हो गयी थी, इसलिए टायर बदलने में टाइम लग गया, अभी बस पहुँच ही रही हूँ, इन 10 मिन्स" ज्योति ने गाड़ी चलना जारी रखा



"ओके, चलो पहुँच के फोन करो मुझे.."



"ओके भाई, बाइ.." ज्योति ने भी जवाब दिया और जल्दी से गाड़ी भगाने लगी



"क्या हुआ रिकी, ज्योति का फोन आया कि नहीं.." राजवीर ने रिकी से पूछा



"हां चाचू, वो बस अभी पहुँच जाएगी, गाड़ी का टाइयर पंक्चर था इसलिए देर हुई, बट शी ईज़ फाइन.." रिकी ने राजवीर से कहा और दोनो नीचे की तरफ जाने लगे



"ओके, और हां वो सेठ के सौदे हुए हैं, वो सब तो ठीक है.. लेकिन उसके साथ साथ दूसरे कुछ काम भी होते हैं, तुम एक काम करो, आज तुम हमारे नेटवर्क के सभी लोगों को बुलाओ मिलने के लिए, मिलने की जगह बाहर ही रखना, उनसे मिलके कुछ बातें करनी है, कल तुम महाबालेश्वर जाओगे एग्ज़ॅम देके, इसलिए आज ही निपटा देते हैं यह चीज़ ओके..



"ओके चाचू, तो मैं बाजू के हिल्टन में ही बुला लेता हूँ सब को, आप भी 5 बजे तक आ जाइए.." रिकी ने राजवीर से कहा जिसे सुन राजवीर ने हामी भर दी
 
कुछ देर के बाद मिलने का कहके राजवीर और रिकी दोनो ही अपने अपने काम में लग गये, जहाँ राजवीर अमर के साथ कुछ प्रॉपर्टी के बारे में बात चीत करने गया,

वहीं रिकी शीना के कमरे में पहुँच गया... पहुँच के देखा तो शीना आराम से सो रही थी और नर्स भी नहीं थी, रिकी ने धीरे से कमरे को लॉक किया और शीना के पास जाके बैठा, कुछ वक़्त तक शीना को यूही उसके चेहरे को देखता रहा जो सोते वक़्त भी उतना ही प्यारा लग रहा था.. रिकी ने हल्के से शीना के हाथ को पकड़ के अपने हाथों में लिया और धीरे धीरे उसे चूमने लगा.. चूमते चूमते रिकी की आँखें नम होने लगी थी..



"आइ आम सो सॉरी शीना... शायद यह.." रिकी ने बस इतना ही कहा के शीना ने अपनी आँखें खोल दी



"आप क्यूँ सॉरी बोल रहे हो, आप थे क्या जिसने मुझे मारने की कोशिश की.. हिहीही." शीना ने हँस के कहा और रिकी को देखने लगी. रिकी की आँखें अभी भी नम थी, और उसने अपनी आँखें नीचे झुका दी, जैसे गुनेहगार करते हैं अपना गुनाह कबूल कर के



"भाई, प्लीज़ टेल मी ना क्या हुआ, मैं तो सोने की आक्टिंग कर रही थी, आपको देखा तो.. किस करते करते रोने लगे, बताइए ना प्लीज़.." शीना ने फिर ज़ोर देके कहा



"नतिंग.." रिकी ने भारी आवाज़ के साथ कहा, एक रुआंसी आवाज़ में, सिर्फ़ एक शब्द बोलने में भी उसे बहुत तकलीफ़ हो रही थी..



"भाई, ऐसे झूठ नहीं बोलो प्लीज़.. बताओ तो क्या हुआ.." शीना ने फिर ज़ोर देके कहा, लेकिन इस बार रिकी कुछ कहने के बदले वहाँ से निकल गया



"भाई.... भाई, व्हाट हॅपंड.. भाई..." शीना उसे आवाज़ लगाती रही लेकिन रिकी नहीं रुका



"आज बीसीसीआइ के बाप का फोन आया था, आइपीएल के फिकच्स्चर्स और स्क्वाड्स आ गये हैं, तुम सब को मैल किए हैं , देख लो... आज ही हमे बताना है कि आइपीएल किसको जीतवाना है, " राजवीर और रिकी दोनो इस वक़्त वॉरली में होटेल हिल्टन में बैठे हुए थे और राजवीर यह सब निर्देश सामने बैठे हुए अपने नेटवर्क के लोगों को दे रहा था



"हां, हम ने देख लिया वो सब, लेकिन विन्नर ऐसे कैसे अभी ही डिसाइड कर लें, अभी तो कोई भाव खुला नहीं है, आज अगर हम डिसाइड कर लेंगे तो आगे सब को खिलाना बहुत दिक्कत वाला काम होगा हमारे लिए" उनमे से एक ने जवाब दिया



"विक्रम ने जो डील की थी उसमे बीसीसीआइ का हिस्सा काफ़ी कम है, उपर से वो वीडियोस, इसलिए बीसीसीआइ का बाप ऐसे बदला ले रहा है.. अब हम पीछे नहीं हट सकते.." राजवीर ने जवाब दिया और अपनी ड्रिंक लेने लगा



"ठीक है, 2013 में तो हमारा अपना शहेर ही जीता था, उसी को जीतवाओ, कौन सोचेगा कि दो बार एक टीम ले जा सकती है"



"नहीं, बॅंगलुर रखो, वो हर बार सेमी में जाके निकल जाती है, इस बार भी लोग ऐसा ही सोचेंगे" किसी और ने कहा



"मैं तो कहता हूँ हयदेराबाद रखो या पंजाब, आज तक इनसे किसी ने उम्मीद नहीं बाँधी.." एक के बाद एक टीम्स के नाम आते गये और राजवीर सब को ध्यान से सुनने लगा



"रिकी, तुम क्या कहते हो.." राजवीर ने रिकी को देखा के वो कुछ सोच में डूबा हुआ था और उसकी आँखें ठीक सामने की दीवार की तरफ थी



"चाचू, 2012 का विन्नर कोलकाता.. जब उन्होने जीता तो सब को लगा एक फ्लूक है, हाला कि उन्होने डिफेंडिंग चॅंपियन्स को हराया उन्ही के घर में, लेकिन फिर भी फँस के अलावा कोई कन्विन्स नहीं हुआ उनके टॅलेंट के बारे में, 2013 में सेमी में भी नहीं आए.. इस बात पे मोहोर लग गयी कि 2012 बस एक फ्लूक था.. 2014, फिर वो जीतेंगे..इसमे पैसा आएगा.." रिकी ने अपनी सोच से बाहर आते हुए कहा



"लेकिन रिकी वो तो हम बॅंगलुर या हयदेराबाद के साथ भी कर सकते हैं.. फिर कोलकाता ही क्यूँ.." राजवीर ने फिर एक वाजिब सवाल उठाया



"बॅंगलुर नहीं चाचू, फाइनल बॅंगलुर में ही है, आज तक होम टीम फाइनल नहीं जीती, यह सब जानते हैं, तो बॅंगलुर में बॅंगलुर नहीं जीतेगी यह कोई भी सोच सकता है, और बॅंगलुर की टीम ज़्यादा मज़बूत है, इसलिए हम उसका भाव भी अच्छे से नहीं निकाल पाएँगे. कोलकाता की टीम में सब ठीक है पर वो धार नहीं है जो लोगों को चाहिए, इसलिए कोलकाता.. हयदेराबाद की मॅचस लास्ट एअर की मैने देखी, कोई भी हयदेराबाद की मॅच पे सट्टा कम खेलता है, या कोई खेलता है तो
हयदेराबाद के भाव में ज़्यादा फेरफार नहीं होता.. कोलकाता मुझे सेफ बेट लग रही है चाचू, और उसके भाव को गिराने के लिए भी एक आइडिया है.. एलेक्षन्स के चलते इस बार पहला राउंड यूएई में है, वहाँ कोलकाता की 5 मॅचस हैं, 1 मॅच जीतवाओ, 4 हरवाओ.. ठीक उसी वक़्त सीरीस का भाव निकालेंगे हम जिसमे कोलकाता का भाव कुछ नहीं होगा.. और तुमने कौनसी टीम कही थी.." रिकी ने एक बंदे की तरफ इशारा करके कहा



"पंजाब और हयदेराबाद.."



"पंजाब, दूसरी टीम फाइनल की, ऐसी टीम जो आज तक सेमी में भी नहीं आई, यूएई लीग में इसे सब मॅच जित्वाओ, 3र्ड स्पॉट पे पहुँचना है इसको, मतलब यह कि यूएई की सब मॅचस जीतने के बाद इंडिया में आके उसे सेक्यूर कर दो टॉप 4 में, लेकिन रन रेट के चलते वो 3 नंबर होनी चाहिए.."



"पंजाब ही क्यूँ.." राजवीर ने उसे टोक के कहा



"पंजाब आज तक सेमी में भी नहीं आई चाचू, सीरीस स्टार्ट होने के पहले ही उसके भाव में कुछ नहीं होगा, जिसका फ़ायदा हमे ही होना है.. सबसे कम भाव बॅंगलुर राजस्थान मुंबई और चेन्नई का होगा, जब मॅग्ज़िमम पैसा वहाँ जाएगा, तो कम से कम पैसा कोलकाता और पंजाब पे लगेगा.. हम सब का फ़ायदा कितना वो हम बाद में भी हिसाब कर सकते हैं, लेकिन चेन्नई बॅंगलुर में या मुंबई राजस्थान में हम को कुछ नहीं मिलने वाला.. और बॅंगलुर की पिच पे अगर फाइनल है तो

हाइ स्कोरिंग ही होगी, वो कॅल्क्युलेशन भी मेरे दिमाग़ में सेट है, फिलहाल मेरे हिसाब से यह टीम्स होनी चाहिए, विन्नर कोलकाता.. इसके अलावा अगर किसी और को कुछ हो दिमाग़ में तो बता सकता है.." रिकी ने अपनी बात ख़तम करके कहा



"हयदेराबाद, चेन्नई, राजस्थान, मुंबई सब जीत चुकी हैं और सब की तारीफ हुई थी.. बॅंगलुर कभी नहीं जीती लेकिन फिर भी मज़बूत रहती है पूरी सीरीस में, इन सब के अलावा हमारे पास यही दो टीम्स रहती है जिन्हे अंडरडॉग्स कह लो, " रिकी ने फिर अपनी बात कही और खामोश हो गया



रिकी की बात सुन हर कोई चक्कर खा गया, उसकी कॅल्क्युलेशन किसी को समझ नहीं आई लेकिन फिर भी किसी ने मना नहीं किया, काफ़ी देर खामोश रह रह के सब ने एक के बाद एक हामी भरी, जिससे राजवीर भी कन्विन्स हो गया..



"ठीक है रिकी, आइपीएल पूरा तुम हॅंडल करना, कितने रन, कितने विकेट्स.. हम यह सब कैसे करते हैं तुम्हे समझा दिया जाएगा." राजवीर ने अपना फ़ैसला सुनाया और बीसीसीआइ के बाप को फोन करने लगा
 
"आप मुझे बताओगे कि नहीं.." शीना ने रिकी से गुस्से भरी आवाज़ में पूछा.. रिकी इस वक़्त शीना के साथ ही बैठा हुआ था और उसे अपने हाथ से खाना खिला रहा था



"क्या बताऊ स्वीटहार्ट, वो तो समझाओ पहले.." रिकी अंजान बनते हुए बोला



"आप नहीं जानते मैं क्या कह रही हूँ.. अच्छा, सुनो, आज दोपहर को जो मेरे यहाँ बैठ के रो रहे थे, उसका क्या.. क्यूँ रो रहे थे, और सॉरी क्यूँ कहा मुझसे.." शीना ने मुद्दे की बात पे आके कहा



"अरे ऐसे ह�