Thriller "विश्वरूप" ( completed ) - Page 18 - SexBaba
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Thriller "विश्वरूप" ( completed )

भाई मेरे मैं कहानी को कहानी की तरह पढ़ना चाहता हूँ l कोई भी चरित्र कैसा भी चरित्र हो मैं उसमें लॉजिक ढूंढता हूँ l इसलिए इस बेशक इस फोरम में अनगिनत कहानियाँ हैं पर मैं चुनिंदा कहानियों को पढ़ता हूँ l और हमेशा देवनागरी लिपि को प्राथमिकता देता हूँ l मेरी इस कहानी को अवश्य खत्म करने जा रहा हूँ पर फिर भी क्लाईमेक्स बिना पैर सिर के नहीं होगी इतना आश्वासन देता हूँ l आपकी कहानी मैं अवश्य पढ़ूंगा क्यूँकी आपकी कहानी सर्टिफाइड है
 
हाँ यह बात बहुत से पाठकों ने पहले से ही अनुमान लगा लिया था

बस अगले अपडेट का इंतजार कीजिए वैसे कल देर रात तक पोस्ट कर दूँगा

हाँ पर जैसे कि शुभ्रा ने कहा विश्वा किया वही जो राजा चाहता था पर हुआ नहीं जैसा राजा चाहता था

हाँ भाई सत्तू है तो बहुत होशियार l

विश्वा से हार का खीज उसने केके पर उतारा

भाई सिस्टम में अभी भी भैरव सिंह का रौब और रुतबा काफी हद तक कायम है

हाँ यह भी कोर्ट में एक प्रोसिजर है जुडिशरी सिस्टम में ह्युमनटरीन ग्राउंड में ऐसे केस को कंसिडर किया जा सकता है l भैरव सिंह इसी बात का फायदा उठा रहा है
 
👉एक सौ इकसठवाँ अपडेट

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राज्य के बहु चर्चित राजगड़ मल्टिपल को-ऑपरेटिव सोसाइटी आर्थिक व आपराधिक मामलों पर आज स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुनवाई शुरु किया गया l अदालत में प्रोसिक्यूशन के लिए वादी पक्ष के गवाह, वकील विश्व प्रताप महापात्र और इस केस में तहकीकात करने वाले एक्जिक्युटीव मैजिस्ट्रेट श्री नरोत्तम पत्री जी उपस्थित थे, केस के शुरुआत में वादी पक्ष के वकील विश्व प्रताप महापात्र ने केस के संबंधित गवाह और मैजिस्ट्रेट श्री नरोत्तम पत्री की कानूनी सुरक्षा की मांग की l जिस पर अदालत शायद कल अपना फैसला सुनाए l पर अपनी डिफेंस स्वयं करने की मांग कर स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट को यशपुर लाने वाले राजगड़ के राजा, सम्मानीय राजा साहब श्री भैरव सिंह क्षेत्रपाल जी निजी कारण उल्लेख कर कोर्ट की कारवाई को अतिरिक्त सात दिन आगे करने के लिए अनुरोध किया है l

हमने जब वह निजी कारण के बारे में जानकारी प्राप्त करने की कोशिश की तो सूत्रों से पता चला है कि बीते कल उनकी सुपुत्री की मंगनी तय की गई थी l पर ऐन मौके पर मंगनी की रस्म के कुछ ही समय पूर्व वर लापता हो गए हैं l आश्चर्य की बात यह है कि वर वधु से उम्र में काफी बड़े हैं और कटक भुवनेश्वर ट्विन सिटी के नामचीन बिल्डर हैं, श्री कमल कांत महानायक उर्फ केके l पर हैरानी की बात यह है कि राजगड़ के गाँव वाले इसे मंगनी के बजाय शादी कह रहे थे l और वर शादी की मंडप छोड़ कर भाग गया है l खैर जो भी हो इतना अवश्य सच है की राजगड़ के महल में एक अनुष्ठान हो रहा था पर उसमें वर की अनुपस्थिति के कारण बाधा उत्पन्न हो गया l यह निःसंदेह किसी भी पिता के लिए दुःख का कारण है l इसलिए अदालत राजा साहब को मनःस्थिति को समझते हुए इस केस में रियायत बरतने के लिए निर्णय किया है l कल अदालत उन्हें कितने दिन की रियायत देती है यह पता चलेगा l पर चूँकि राज महल से वर लापता हुआ है और राजा साहब ने थाने में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करायी है, अदालत ने पुलिस को अतिशीघ्र इस पर रिपोर्ट प्रस्तुत कर अदालत में पेश करने का आदेश दिया है l

पुलिस ने भी अपनी तहकीकात तेज कर दी है l अब तक के लिए इतना ही l मैं सुप्रिया कुमारी रथ प्राइम टाइम बुलेटिन नभ वाणी से l नमस्कार

वैदेही टीवी बंद कर देती है l पीछे मुड़ कर देखती है विश्वा और उसके सारे दोस्त खाना खा रहे थे l पाँचों की ध्यान सिर्फ खाने पर थी l वैदेही उनसे अपना ध्यान हटा कर गौरी की तरफ देखती है l गौरी बड़ी गहरी चिंतन में खोई हुई थी l

वैदेही - क्या हुआ काकी... क्या सोच रही हो... कहाँ खो गई हो...

गौरी - (अपनी सोच से बाहर आती है) नहीं... कुछ भी तो नहीं...

वैदेही - सुबह से देख रही हूँ... तुम खोई खोई सी रहने लगी हो...

टीलु - क्यूँ नहीं रहेगी बोलो... अरे दीदी... हम सब दावत खाने चले गए... बुढ़िया को यहीं छोड़ गए... कम से कम... कुछ पकवान तो लाने चाहिए थे ना...

गौरी - मुहँ बंद कर नाशपीटे...

टीलु खी खी कर हँसने लगता है l पर गौरी की चेहरा देख कर वैदेही टीलु के तरफ देख कर आँखे दिखा कर चुप रहने के लिए कहती है l

वैदेही - क्या हुआ काकी...

गौरी - (वैदेही की तरफ़ देख कर) वैदेही... मैंने... इन क्षेत्रपालों की दरिंदगी देखी है... तुमने झेला भी है... तुम सांप पर विश्वास कर सकती हो... पर इन क्षेत्रपालों को... हरगिज नहीं..

वैदेही - पर अब हुआ क्या है काकी...

गौरी - देखना... राजा कुछ ना कुछ करके... केस की सुनवाई को... खिंचता जाएगा... और धीरे धीरे अपने दुश्मनों को... निपटाता जाएगा... तुझे क्या लगता है... वह दूल्हा जो ग़ायब है... वह कभी मिलेगा... नहीं... वह अब कभी भी... दुनिया के सामने नहीं आएगा... क्यूँकी... मैं दावे के साथ कह सकती हूँ... वह अब तक... आखेट गृह के जानवरों का निवाला बन चुका होगा...

विश्व - (खाना खा चुका था, हाथ धो कर वैदेही के पल्लू से हाथ साफ करते हुए) तो काकी... क्या आपको... उस वर के गायब होने का दुख है...

गौरी - नहीं... शायद हाँ... ऐसा लग रहा है... जैसे कोई बवंडर आने वाला है... जिसके लिए... राजा ने दरवाजा खोल दिया है... कई जिंदगियां अब तहस नहस होने वाले हैं...

विश्वा - काकी... अगर वह केके... अब इस दुनिया में नहीं है... तो यह भी सच है कि... उसकी मौत की मातम मनाने वाला कोई है भी नहीं... और वह कोई संत महात्मा तो था नहीं... बेग़ैरत... बेईमान... मतलब परस्त था... बुढ़ापे में... राजा जैसे सांप की बात मान कर... एक कम उम्र की लड़की से शादी करने बेशरमो की तरह दौड़ा चला आया...

सीलु - हाँ... उसके साथ जो भी हुआ होगा... वह उसकी कर्मों का फल होगा... वही उसकी किस्मत में लिखा था... जिसे उसीने ही चुना था...

टीलु - हाँ... (वैदेही की पल्लू से अपना हाथ पोछते हुए) वह कहावत है ना... सांप की फन से... जो अपना पिछवाड़ा खुजाएगा... वह यम दर्शन किए बिना कहाँ जाएगा...

वैदेही - यह कहाँ की कहावत है...

टीलु - क्या दीदी... आपने कभी सुना नहीं...

सीलु - (टीलु के सिर के पीछे एक टफली मार कर) हमने भी नहीं सुना... किसने कहा था... कब कहा था...

टीलु - तुझे भी नहीं पता... एक महान... आदमी ने कहा था...

विश्व - ऐ.. ज्यादा सीन मत बना... अब बोलो कौन महान आदमी था...

टीलु - क्या... मैंने था... कह दिया... सॉरी सॉरी... एक महान आदमी ने कहा है...

वैदेही - ओ... अब मैं समझ गई... और वह महान आदमी तु है...

टीलु - वाह दीदी वाह.. (सबसे) देखा... दीदी समझ गई...

विश्व और बाकी मिलकर टीलु झुका कर दो चार घुसे बरसा देते हैं l वैदेही उन सबको रोकती है l टीलु वैदेही के पीछे छिप जाता है l तभी दास सादे कपड़े में वहाँ पर आता है l

विश्व - क्या बात है दास बाबु... आप... अचानक यहाँ..

दास - तुम लोगों की बातेँ बाहर तक सुनाई दे रही थी... बात तो सच है... केके गायब है... मुझे उसे ढूढ़ना है... और रिपोर्ट बना कर... अदालत में पेश करना है...

विश्व - आपने जैसा रिपोर्ट... अनिकेत रोणा पर बनाया था... वैसा ही रिपोर्ट इस गुमशुदगी पर बना कर अदालत में पेश कर दीजिए...

दास - यह लास्ट ऑप्शन है... क्या और कोई रास्ता है... इस
बार... भैरव सिंह... मुझ पर हावी होने की कोशिश करा है... मैं ज़वाब में उस पर हावी होना चाहता हूँ...

विश्व - दास बाबु... रिपोर्ट एक दिन में नहीं बनती... आप भी कुछ दिनों की मोहलत मांगिये... फिर तहकीकात शुरु कीजिए... क्यूँकी... भैरव सिंह ने... एसपी ऑफिस से... केके की जान को खतरा बता कर... पुलिस को बाराती बनाया था... पर केके तो... महल के भीतर से गायब हुआ है ना... वह भी... भैरव सिंह के अपने सिक्युरिटी के बीच...

दास - (मुस्करा देता है) समझ गया... मुझे क्या करना है... अच्छी तरह से समझ गया...

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अगले दिन सुबह क्षेत्रपाल महल के छत पर व्हीलचेयर पर नागेंद्र सिंह को बिठा कर कुछ नौकर रुप के दिखाए जगह पर रख देते हैं l रुप सबको नीचे जाने के लिए कहती है, जो नौकर नागेंद्र को लाए थे वह सब नीचे चले जाते हैं l रुप व्हीलचेयर को धकेल कर छत पर थोड़ी दूर लेकर आती है l जहां से पूरा गाँव दिख रहा था l सुबह की नरम धूप के रंग में रंगी गाँव बहुत ही खूबसूरत दिख रहा था l

रुप - (चहकते हुए) देखो दादाजी... कितना सुंदर यह गाँव है... पर दूर से... (चेहरा संजीदा हो जाता है) आप लोगों की... झूठी अहं के चलते... इस गाँव की अंदर की पिंजर... ढांचा और जिंदगी... बदसूरत हो गई है... पर... पर अब बदलेगा... या यूँ कहूँ... बदल रहा है... (नागेंद्र की तरफ मुड़ कर) क्यूँकी अब इस महल की रौनक छूट रहा है... जाहिर है... वह रौनक... खुशियाँ... अब धीरे धीरे... गाँव में बसने वाली है... या यूँ कहूँ... शायद... बसने लगी है...

लकवाग्रस्त अपाहिज सा नागेंद्र की ओर मुस्कराते हुए रुप देखती है l नागेंद्र के आँखों में रुप के लिए गुस्सा झलक रहा था l रुप नागेंद्र की भावनाओं को दरकिनार कर नागेंद्र से कहती है l

रुप - दादाजी... आपमें ना... ताकत बहुत है... बेकार में मुझ पर गुस्सा कर... ताकत को जाया कर रहे हो... इसी गुस्से को... अगर खड़े होने के लिए... इस्तमाल किए होते... तो शायद.. अब तक खड़े भी हो गए होते... (नागेंद्र अपनी टेढ़ी मुहँ से गुँ गुँ कर रुप को झिड़कने लगता है) वैसे... जानते हैं... मैं पिछले दो दिनों से बहुत खुश हूँ... अपनी खुशी को आज मैं आपके साथ बाँटने इस छत पर लाई हूँ... अगर चाची या भाभी होतीं... तो उनसे यह खुशी शेयर कर रही होती... बार बार कर रही होती... नाच रही होती झूम रही होती... वह क्या है ना... लड़कियाँ अपनी खुशी को... ज्यादा देर तक पेट में... दबा कर नहीं रख सकती... इसलिए किसी को भी... बता देना बहुत जरूरी होता है... अब इस महल में... आप से बेस्ट कौन हैं... जिनसे अपनी दिल की बात कही जाए... और सबसे छुपाई भी जाए.... जानते हैं... राजा साहब... मेरे अनाम... पर अपनी भड़ास... अपनी खीज निकालने के लिए... ओर अपनी बेटी को.. उसकी नाफरमानी और बदतमीजी को... सबक सिखाने के लिए... एक बुढ़े लंगुर से शादी तय कर दी थी... हूँह्ह... मुझे और मेरे अनाम को नीचा दिखाने के लिए... मेरे दोस्तों को कटक और भुवनेश्वर से झूठ बोल कर उठा लाए थे... क्यूँकी जाहिर है... इस शादी के खिलाफ विक्रम भैया... चाचा चाची सभी थे... राजा साहब को यह लगा... उनकी इस कदम पर... सब मेरे लिए पैरों में गिर कर गिड़गिड़ाएंगे... पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ... जो जो रस्में... भैया... चाचा चाची को निभाने चाहिए थे... उन्हीं रस्मों को निभाने के लिए... मेरे दोस्तों से कहा गया... पर वह कहते हैं ना... बाप से बढ़कर बेटा... विकी भैया ने ऐसा खेल खेला... के राजा साहब को जब पता चलेगा... यकीन मानिये दादा जी... उनको तो हार्ट अटैक आ जाएगा...

भैया ने इस खेल में... मेरे दोस्तों को भी शामिल कर दिया... और जानते हैं... अनाम के दोस्त... उस चिरकुट लंगुर को... महल अंदर आए और महल में ही कहीं छुपा दिया... जिसे राजा साहब... अपने नाकारे निकम्मे पहरेदारों के साथ... इंस्पेक्टर दास को लेकर... अंदर ढूढ़ने लगे... तभी... भैया ने मेरे भाई होने का रस्म अदा किया... आह...(झूम कर घूम जाती है) क्या कहूँ दादाजी... पहले तो भैया ने गाँव वालों को वहाँ से भगा दिया... ताकि कोई गवाह ना बन जाएं... फिर.. चाची से नए जुते लेकर... अनाम को पहना दिया... हा हा हा... अनाम भी भौचक्का रह गया... क्यूँकी अनाम तक को पता नहीं था... क्या हो रहा था... चाचा ने अपनी जेब से खंजर निकाल कर अनाम के हाथों में थमा दिया... चाची के पास मेरे सहेलियाँ भागते हुए आईं... आरती और तिलक की थाली दी... चाची ने अनाम की आरती उतारी और तिलक भी लगाया... तब तक... अंदर से इंस्पेक्टर भी आ गया... अपने साथ लाए फोर्स को... विवाह बेदी तक... दो लाइन में खड़ा कर दिया... और अनाम को... वैदेही दीदी ने... हाथ थाम कर... उन पुलिस वालों के बीच से लेकर आईं... मेरे बगल में बिठा दिया... (एक गहरी साँस छोड़ते हुए) हूँ ह्म्म्म्म... वैदेही... आपको... याद है ना दादाजी... पाईकराय खानदान की अंतिम चराग... जिसकी आह अब क्षेत्रपाल घर परिवार सबको जला रही है... खैर... फ़िर भैया ने... (चहकते हुए) पंडित से... जल्दी जल्दी मंत्र पढ़वाया... फटा फट... जल्दी जल्दी... बिल्कुल राजधानी एक्सप्रेस की तरह... फ़िर अग्नि के फेरे भी लगवा दिए... और... (गले में मंगलसूत्र निकाल कर दिखाती है, और अपनी भौंहे नचा कर) अनाम मेरे गले में मंगलसूत्र पहना दिया... अब मैं... क्षेत्रपाल नहीं रही... मैं अब... (बड़े एटीट्यूड के साथ) रुप नंदिनी विश्व प्रताप महापात्र हूँ... अब मैं विश्व की हो गई हूँ... हम अब विश्वरूप हैं... विश्वरूप...

नागेंद्र की आँखे बड़ी और फैली हुई दिखने लगी थी l मुहँ फाड़े हैरत भरे नजरों से रूप को अबतक सुने जा रहा था l उसके चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे वह कोई असंभव सी बात सुन लिया हो l रुप मुस्कराते हुए पूछती है

रुप - आपकी हालत समझ सकती हूँ... आपको यकीन नहीं हो रहा है... पर यह सच है... उतना ही सच... जितना कि सूरज का निकलना... हमारी साँसे चलना... यह देखिए... (अपनी बालों के बीच छुपाये माँग की सिंदूर को दिखाती है) मैं अब... इस घर में... विश्व प्रताप की व्याहता हूँ...

नागेंद्र अब उबलने लगता है l गहरी गहरी साँसे चलनी लगती है l शरीर का ज्यादातर हिस्सा काम नहीं कर रहा था पर फिर भी वह व्हीलचेयर से उठने की कोशिश कर रहा था l मानों उठ कर रुप की गला दबोच लेगा l रुप नागेंद्र की असहायता देख कर सहानुभूति के साथ कहती है l

रुप - दादाजी... मुझे समझ में नहीं आ रहा... आपको किस बात का गुरुर है... ना हाथ आपके साथ है... ना आपके पैर... ना ताकत... आपका दिन शुरु होता है... तो उन लोगों के रहमोकरम से... जिनकी जिंदगियों को अपने बर्बाद कर दिया था.... सिर्फ साँस और एहसास ही तो आपके साथ है... वर्ना... आपकी इसी गुरुर ने... आपसे... आपका दूसरा बेटा... बहु... और पोते को... दूर कर दिया... बड़ा पोता और बहू भी अब कभी इस महल में वापस नहीं आयेंगे... पर भरोसा रखिए... इस केस के खत्म होने तक... और ज्यादा से ज्यादा... अट्ठाइस दिन... सिर्फ तब तक इस महल की मेहमान हूँ... उसके बाद भी... अगर राजा साहब को सजा हो जाती है... और आपका साँस आपके साथ दे... मैं आपको अपने साथ ले जाऊँगी और सेवा करती रहूँगी... आपकी आखरी साँस तक... दादाजी मैं आपको तड़पाने के लिए ना यह सब किया है... ना ही आप लोगों से कोई बदला लेने... मैंने बस अपने हिस्से की जमीन... अपने हिस्से का आसमान ले लिया है... जो मेरा था... मेरी किस्मत में लिखा था... और आप लोग मुझे कभी नहीं दे सकते थे...

अब नागेंद्र का मुहँ एक ओर थोड़ा टेढ़ा हो गया था l गुस्से के कारण किसी सांप की तरह फुत्कार रहा था l उसकी टेढ़े मुहँ से लार बहने लगा था l रुप नागेंद्र की ऐसी हालत देख कर थोड़ा डर जाती है और भागते हुए नीचे नौकरों को बुलाने जाती है l थोड़ी देर बाद कुछ नौकर ऊपर आते हैं और नागेंद्र को उसके कमरे में ले जाते हैं और उसके बिस्तर पर सुला देते हैं l नागेंद्र अभी भी गहरी गहरी साँसे ले रहा था l रुप उसके माथे पर हाथ फेरती है l कुछ देर बाद कमरे में भैरव सिंह आता है l भैरव सिंह को देख कर रुप नागेंद्र को छोड़ कर उठ जाती है और बेड के सिरहाने एक किनारे पर खड़ी हो जाती है l

भैरव सिंह - बड़े राजा जी को क्या हुआ...

रुप - उनकी हवा पानी बदलने के लिए... नौकरों की मदत से... छत पर ले गई थी...

भैरव सिंह - तुम भूल कैसे गई... अंतर्महल में रहने वाली... नौकरों के सामने नहीं जाती...

रुप - महल में... जब मैंने... आपकी मुहँ से... हम का रुतबा खो बैठी.. और तुम पर आ गई... इसलिए शायद... दासी बराबर हो गई... और वैसे भी... केके साहब से आपने लगभग रिश्ता जोड़ ही दिया था... अगर शादी हो गई होती... तो अंतर्महल वाली बंधन से थोड़ी आजादी होती...

भैरव सिंह - (बात बदल कर) छत पर... बड़े राजा जी को क्या हुआ...

रुप - शायद... अपनी लाचारी और बेबसी पर उन्हें गुस्सा आया...

भैरव सिंह - गुस्सा... किस बात पर... तुमने उन्हें ऐसा क्या कहा...

रुप - मैंने... मैंने उन्हें... सब सच बताया... एक एक शब्द... अक्षरश सच बताया...

भैरव सिंह - ऐसा कौनसा सच बता दिया... जिस पर उन्हें अपनी लाचारी और बेबसी पर गुस्सा आया...

रुप - वही... परसों सुबह से लेकर देर शाम तक... महल में जो भी कुछ हुआ... अक्षरश सब बता दिया... बड़े राजा जी की घर में... शहनाई बज रही थी... पर उस जलसे में... उन्हें कोई पूछने वाला तक नहीं था... अगर वह मंडप के पास होते... जो भी हुआ अपनी आँखों से देख सकते थे...

भैरव सिंह - (जबड़े और मुट्ठीयाँ भिंच जाती हैं, चेहरा सख्त हो जाती है)

रुप - बड़े राजा जी से विस्तार से कहा तो उन्हें गुस्सा आया... पर... आपको क्यूँ गुस्सा आ गया... क्या आपको लगता है... कुछ जानना बाकी रह गया इसलिए... आप चाहें तो... विस्तार से... आपको भी कह सकती हूँ...

भैरव सिंह - (दबी आवाज में) बदजात... जुबान बंद रख...

रुप - कुछ सच्चाई सुनी नहीं जा सकती... कुछ झेली नहीं जा सकती...

भैरव सिंह - अभी हारे नहीं हैं हम... बस इतने पर इतरा रही हो...

रुप - ना... हरगिज नहीं... बस अपनी किस्मत पर इतरा रही हूँ... वह किस्मत जो आपने लिखने की कोशिश की... पर कलम टुट गया...

भैरव सिंह - मत भूलो... यहाँ किस्मत हम लिखा करते हैं... परसों वही हुआ... जिसकी किस्मत में जो लिखा था...

रुप - वही तो कह रही हूँ... परसों मेरे साथ वही हुआ... जो मेरी किस्मत में लिखा हुआ था... और वह भी हुआ... जो आपने नहीं लिखा था...

भैरव सिंह - (अपनी दांत पिसते हुए) अब तुम... यहाँ से जा सकती हो...

रुप - जी... जैसी आपकी मर्जी...

रुप कमरे से निकल जाती है l भैरव सिंह एक कुर्सी खिंच कर नागेंद्र के बगल में बैठ जाता है l रुप ने उसे एक तरह से गुस्सा दिला गई थी l इसलिए पहले वह खुद को नॉर्मल करता है फिर नागेंद्र की ओर देखता है l नागेंद्र गहरी गहरी साँसें ले रहा था l

भैरव सिंह - बड़े राजा जी... अगर आप नाराज हैं... की परसों की बातेँ ही नहीं... बल्कि इन कुछ दिनों में जो भी कुछ हुआ... हमने आपसे जिक्र नहीं किया... तो आपकी नाराजगी जायज है... पर हम... रुप के मन में... थोड़ा डर बिठाना चाहते थे... और यह दिखाना चाहते थे... हम जब चाहें... उसकी किस्मत को... ठिकाने लगा सकते हैं... बाकी कुछ ऐसे लोग थे... जिन्हें हम सबक पढ़ाना चाहते थे... (उठ जाता है और बिस्तर के छोर पर आकर खड़ा होता है) थोड़ा गलत तो हुआ... पर... असल में... हम चाहते थे... विश्व... इतना मजबूर हो जाए... वह रुप नंदिनी के लिए... खुल कर सामने आ जाए... पर ऐसा... हो नहीं पाया... हम इस शादी की आड़ में... केके को ठिकाने लगाना चाहते थे... बस वही हो गया...

इतना कह कर भैरव सिंह चुप हो कर नागेंद्र की ओर देखता है l नागेंद्र की होंठ खुले थे लार बहती जा रही थी और आँखे नम थीं l क्यूँकी उसे एहसास हो रहा था, विश्व और रुप की चोरी की शादी और उसमें उसीके परिवार का शामिल होने के बारे में भैरव सिंह या उसके आदमियों को कुछ भी मालूम नहीं है l और सबसे अहम बात यह कांड क्षेत्रपाल महल की परिसर में पुलिस की देख रेख में हुआ था l रुप ने सच कहा था नागेंद्र ना सिर्फ लाचार था और बेबस भी था l सब जानते हुए भी भैरव सिंह को अवगत नहीं करा सकता था l इसलिए नागेंद्र की आँखे नम थीं l नागेंद्र अपनी आँखे बंद कर लेता है l भैरव सिंह समझता है, विश्व ने जिस तरह से उसकी सोच को मात दे कर केके को छुपा दिया वह भी उसीकी महल में, शायद इसी बात से नागेंद्र दुखी है l कमरे से बाहर आता है कुछ नौकरों को नागेंद्र के पास जाने की हिदायत दे कर अपनी रणनीतिक कमरे की ओर जाता है l बीच रास्ते में भीमा आकर सिर झुका कर खड़ा हो जाता है l

भीमा - हुकुम...

भैरव सिंह - क्या बात है...

भीमा - दारोगा आया है... आपसे मिलने...

भैरव सिंह - तुमने वज़ह पूछी...

भीमा - जी हुकुम... वह केके के बारे में कुछ बताने आया है...

भैरव सिंह अपनी भौंहे सिकुड़ कर सोचने लगता है फिर अपना सिर हिला कर दीवान ए आम कमरे में जाता है l भीमा उसके पीछे पीछे चल देता है l कमरे में पहुँच कर देखता है दास एक आदम कद फोटो के सामने खड़ा था l वह भैरव सिंह की फोटो थी जिसमें भैरव सिंह हाथ में गन लिए एक मरे हुए शेर के सिर पर पैर रख कर खड़ा था l आहट पा कर दास पीछे मुड़ता है l

भैरव सिंह - कहो इंस्पेक्टर... कैसे आना हुआ...

दास - आपने... कल सुबह थाने में रिपोर्ट दर्ज करायी थी... और अपने वक़ील के हाथों... अदालत में... दोपहर को... हम ही पर... नाकारी का इल्ज़ाम लगवा दिया..

भैरव सिंह - कुल इंस्पेक्टर कुल... लगता है... बहुत गर्म हो रहे हो... भीमा...

भीमा - जी हुकुम...

भैरव सिंह - जरा पंखा तेज चालाओ... इतनी तेज चालाओ.. के आज इंस्पेक्टर साहब की गर्मी उतर जाए... (भीमा कमरे में लगे सारे पंखे चला देता है) बैठिए... इंस्पेक्टर साहब... (कह कर भैरव सिंह बैठ जाता है)

दास - माफ़ कीजिए राजा साहब... जब मैं ड्यूटी पर होता हूँ... तब किसी के साथ... बैठ नहीं सकता... खास कर वह अगर... कोर्ट में मुल्जिम हो...

भैरव सिंह - अच्छा... तो अब आप ड्यूटी पर हैं... कहिये.. कौनसी ड्यूटी बजाने आए हैं...

दास - फिलहाल तो आपकी बजाने आया हूँ...

भैरव सिंह - (कुर्सी की आर्म रेस्ट को कसके पकड़ लेता है) इंस्पेक्टर...

दास - आई मीन... आप ही की ड्यूटी बजाने आया हूँ... आपने परसों अदालत में... प्रधान के हाथों... बड़ी चालाकी से... क्या झूठ बोला... शादी नहीं... मंगनी थी... मंगनी से केके की गुमशुदगी में... पुलिस को गवाह बना दिया... और जज ने भी... आपकी केस में सुनवाई की एक्सटेंशन के लिए... हमसे रिपोर्ट माँग की है...

भैरव सिंह - इंस्पेक्टर... गलत क्या कहा है... आप ही के सामने तो केके गायब हुआ है...

दास - ना... हमारे आँखों के सामने नहीं... आपके महल के भीतर से... जिसकी सिक्युरिटी... आप ही के प्रबंधन में थी... हम तो... बाराती थे... बारात को... महल के द्वार तक पहुँचाना ही हमारा जिम्मा था...

भैरव सिंह - फिर भी आप जानते हैं... आपने तो ढूँढा भी था... कमरे में क्या... केके बाथरुम में भी नहीं मिला था...

दास - कमरे में नहीं मिला... बाथरुम में भी नहीं मिला... पर इसका मतलब यह तो नहीं... के केके... उसी कमरे में था... महल में पच्चीस से ज्यादा कमरे हैं... क्या पता... आपने ही उसे किसी और कमरे में बंद कर दिया हो... और पुलिस को गुमराह कर रहे हों...

भैरव सिंह - इंस्पेक्टर... (गुर्राते हुए) यह बताओ... केके के बारे में... क्या जानकारी लाए हो...

दास - अरे जानकारी कहाँ... तहकीकात तो अब शुरु होगा... उसके लिए... मैं खास ऑर्डर लेकर आया हूँ...

भैरव सिंह - (भौंहे सिकुड़ कर) खास ऑर्डर...

दास - जी राजा साहब... आपकी एफआईआर को हमने बहुत सीरियसली लिया है... हमारे पास जो भी सबूत थे... उन्हें अदालत में पेश कर... केके को ढूंढने के लिए... खास परमिशन ले ली है... (कह कर एक काग़ज़ अपनी जेब से निकालता है) उस दिन महल की सेक्यूरिटी... आप ही की... ESS के गार्ड्स और उनका इनचार्ज अमिताभ र